Sunday, August 23, 2009

ब्रेड --- पाव रोटी या पांव रोटी ?

कल रात टीवी पर मैं एक रिपोर्ट देख रहा था जिस में वह बाज़ार में मिलने वाली डबल-रोटी ( ब्रैड) की पोल खोल रहे थे --- पाव-रोटी को पांव रोटी कहा जा रहा था।

उस प्रोग्राम में बार बार यही ऐलान किया जा रहा था कि यह प्रोग्राम देखने के बाद कल से आप अपना नाश्ता बदल लेंगे। अलीगढ़ की एक ब्रेड फैक्ट्री में खुफिया कैमरे की मदद से ली गई वीडियो दिखाई जा रही थी जिस में दिखाया जा रहा था कि किस तरह किस गंदे से फर्श पर ही मैदा फैला कर उसे पैरों से गूंथा जा रहा था।

प्रोग्राम ऐंचर करने वाली पत्रकार बिल्कुल सही कह रही थी कि यह गोरख-धंधा केवल छोटे शहरों एवं कस्बों तक ही महदूद नहीं है --- मैट्रो शहरों में रहने वाले लोग यह ना समझ लें कि ऐसा तो छोटे शहरों में ही हो सकता है।

खुफिया कैमरे ले कर कुछ पत्रकार दिल्ली के नांगलोई, बादली एवं सुल्तानपुरी एरिया में भी जा पहुंचे। डबल-रोटी बनाने वाली जगहों पर गंदगी का वह आलम था कि क्या कहें ---हर तरफ़ मक्खियां, कीड़े मकौड़े भिनभिना रहे थे जिधर मैदा गूंथा जा रहा था पास ही में वहां पर काम करने वालों की खाने की प्लेटें बिखरी पड़ी थीं।

इस स्टोरी को कवर करने वाला संवाददाता दिखा रहा कि कितना खराब मैदा इस्तेमाल किया जा रहा है ---यह इतना कठोर हो चुका था कि उस के ढले बने हुये थे।

फिर इन पत्रकारों ने इन स्थानों से ली गई ब्रेड को दिल्ली की एक जानी-मानी लैब से टैस्ट करवाया। सिर्फ़ एक ब्रैंडेड ब्रेड को छोड़ कर बाकी सभी ब्रेड के सैंपल पीएच ( pH) में फेल पाये गये। और एक में तो फंगस ( फफूंदी) लगी पाई गई। मेरी तरह आप ने भी अनुभव किया होगा कि कईं बार घर में फ्रिज में रखी हुई तथाकथित फ्रेश-ब्रेड में भी फफूंदी लगी पाई जाती है।

और इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि ब्रेडों के इन विभिन्न सैंपलों में किस किस तरह के कैमीकल पाये गये । जो ब्रेड ग्राहक के हाथ में जाये वह बिल्कुल सफेद हो इसलिये गेहूं को ब्लीच गिया था। ब्रेड में प्लास्टर ऑफ पैरिस ( plaster of paris ---POP) भी पाया गया। बाज़ार में खमीर की कमी होने की वजह से yeast ( खमीर) की जगह फिटकड़ी का इस्तेमाल किया गया था। इन के साथ साथ ब्रेड में घटिया किस्म के वनस्पति तेल, तरह तरह के प्रिज़र्वेटिव एव पोटाशियम ब्रोमेट भी पाया गया ---इस का खुलासा रिपोर्ट में किया गया।

रिपोर्ट में बताया गया था कि लोग समझते हैं कि वे ब्रैंडेड ब्रेड खा रहे हैं ---रिपोर्ट में यह भी दिखाया गया कि किस तरह से कूड़ा-कर्कट बीनने वालों से बड़ी कंपनियों की ब्रैडों के खाली रैपर ले कर उन में चालू किस्म की ब्रैड भर दी जाती है----रिपोर्ट में कहा गया कि बाज़ार में बिकनी वाली 60 से 70 फीसदी डबल-रोटी कुछ इन्हीं तरह की परिस्थितियों में तैयार की जाती है जहां पर साफ़-सफ़ाई का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा जाता।

लेकिन मुझे इस रिपोर्ट में जो कुछ कमियां दिखीं वह यह थीं कि इसे बहुल लंबा खींचा गया ---- लगभग एक-डेढ़ घंटे तक यह प्रोग्राम खिंच गया, और बीच में बार बार कमर्शियल ब्रेक। मुझे सब से ज़्यादा इन डबल-रोटियों की लैब रिपोर्ट देखने की ललक थी। लेकिन उन रिपोर्टों को टीवी की स्क्रीन पर दिखाया नहीं गया ---- मुझे यह बहुत अटपटा लगा। एक प्राइवेट लैब के डायरैक्टर ने बस अपने हाथ में थामी रिपोर्ट में बता दिया कि अधिकतर सैंपल पीएच( pH) के मापदंड पर खरे नहीं उतरते पाये गये।

और जिन कैमीकल्स की बात मैंने ऊपर की उन के बारे में भी किसी लैब-रिपोर्ट को टीवी स्क्रीन पर नहीं दिखाया गया । मैं जिस बात की एक घंटे से प्रतीक्षा कर रहा था वह मुझे दिखी नहीं ---इसलिये मुझे निराशा ही हुई।

यह भी बताया गया कि किस तरह से कुछ डबल-रोटी निर्माता इस की पैकिंग पर इस के तैयार होने की तिथि के आगे बाद की तारीख लिखवा देते हैं। ऐसा इसलिये किया जाता है कि तैयार होने के तीन-चार दिन बाद ब्रैड किसी के भी खाने लायक नहीं रहती।

आप को भी लग रहा होगा कि क्यों आप के पड़ोस वाला दुकानदार किसी अच्छी कंपनी की ब्रैड मांगने पर क्यों किसी स्थानीय, चालू किस्म के ब्रांड को आपको थमा देने में इतनी रूचि लेता है। सब मुनाफ़ाखोरी का चक्कर है। और जहां पर मुझे ध्यान है कि अधिकतर चालू किस्म की ब्रेड पर तो इस के तैयार होने की तारीख प्रिंट ही नहीं हुई होती ----इसलिये इन दुकानदारों की चांदी ही चांदी।

वैसे तो हम लोग भी नियमित ब्रैड लेने के बिल्कुल भी शौकीन नहीं है ---जहां तक मेरी बात है मुझे तो मैदे ( refined flour) से बनी कोई भी वस्तु परेशान ही करती है ---- तुरंत गैस बन जाती है, सारा सारा दिन सिर दर्द से परेशान हो जाता हूं ---इसलिये मैं तो ब्रैड से बहुत दूर ही रहता हूं । लेकिन अब जब भी इसे खरीदूंगा तो केवल बढ़िया कंपनी( बढ़िया ब्रैंड) र की खरीदूंगा जिस पर उस के तैयार होने की तारीख अच्छी तरह से प्रिंट हो -----बस, ज़्यादा से ज़्यादा यही कर सकते हैं, और क्या !!

मुझे याद है कि बचपन में हमारे मोहल्ले में एक ब्रेड-वाला सरदार आया करता था जो एक ट्रंक में ब्रैड लाया करता था जो कि वह खुद तैयार किया करता था । बिल्कुल थोड़ी सी ब्रैडें उस के पास हुआ करती थीं -----लेकिन आज कल बस हर तरफ़ लालच का इतना बोलबाला है कि आम आदमी करे तो आखिर करे क्या ?

मैंने कुछ साल पहले ऐसे ही किसी से सुन तो रखा था कि कुछ ब्रेड की कंपनियों में मैदे को पैरों से गूंथा जाता है। जब मैं यह प्रोग्राम देख रहा था तो मुझे अमृतसर के कुलचे याद आये --- यह केवल अमृतसर में ही बनते हैं और वहीं पर ही मिलते हैं, यह अमृतसर की एक स्पैशलिटी है। और मैं बचपन से ही इन्हें खाने का बहुत शौकीन रहा हूं। लेकिन हुआ यह कि कुछ साल पहले मैं अमृतसर गया हुया था ---अपने पुराने स्कूल के पास ही हमारा एक बचपन का दोस्त सतनाम रहा करता था --- तो मैं उस का पता ढूंढता ढूंढता एक मकान में घुसा ही था कि क्या देखता हूं कि एक घर के आंगन में एक दरी पर हज़ारों कुलचे बिखरे पड़े हैं जिन पर कम से कम हज़ारों ही मक्खियां भिनभिना रही थीं ----शायद उस जगह पर कुचले तैयार हो रहे थे -----उस दिन के बाद मैंने कभी कुलचे न ही खाये और न ही ता-उम्र कभी खाऊंगा। मुझे वह मंज़र याद आता है तो बड़ी तकलीफ़ होती है।

7 comments:

  1. हमारे गांव में बूढे बुजुर्ग तो यह बात हमेशा से कहते आए हैं .. वे पावरोटी को पांव से गूंधे हुए आटे से बनने के कारण नहीं खाते हैं .. पर हमलोग उन्‍हें गलत समझते थे .. यह सोंचकर की आजकल छोटे छोटे काम के लिए मशीनें आ गयी हैं .. तो इतनी बडी फैक्‍टरी में ऐसा क्‍यूं होगा .. हमलोग यहां भी गलत निकले !!

    ReplyDelete
  2. दुखद
    शर्मनाक
    और वीभत्स .........लेकिन आज से नहीं है..........

    ये तो शुरू से ही ऐसे होता है....
    _________आप बस बचाव में ही बचाव है
    कि तर्ज़ पर ख़ुद को बच्चा सकते हैं
    और कोई उपाय नहीं........

    ReplyDelete
  3. डाक्टरसाहब!
    बहुत ही अच्छी जानकारी से अवगत कराया। दुख तो इस बात का है कि लोगो मे जागरुकता की कमी है या अनदेखा करते है।
    बहुत ही सुन्दर, आभार!

    गणेशचतुर्ती पर हार्दिक मगलकामनाऍ।
    यह पढने के लिये किल्क करे।
    हिन्दी ब्लोग जगत के चहूमुखी विकास की कामना सिद्धिविनायक से

    मुम्बई-टाईगर
    SELECTION & COLLECTION

    ReplyDelete
  4. वैसे पक जाने के बाद उसके कीटाणु तो मर ही जाते हैं फिर भी मैदा तो खराब होता ही है और नूदल्स का भी यही हाल है >

    ReplyDelete
  5. सुना तो हमने भी था कि ब्रैड का निर्माण पाँव से गुंथे आटे के जरिए किया जाता है। लेकिन कहते हैं न कि इन्सान आखोँ देखी पर अधिक विश्वास करता है। कल-परसों जब टेलीवीजन के माध्यम से साक्षात ऎसा होते देखा तो तब जाकर विश्वास हुआ कि हमने सच ही सुना था।
    डाक्टर साहब कोई ऎसी गोली/कैप्सूल हो तो बताईये,कि जब भूख लगे तो उसे खाकर क्षुधा शाँत हो जाये। वर्ना तो अब दुनिया में खाने लायक बचा क्या है!!

    ReplyDelete
  6. सिंथेटिक दूध, पांव की रोटी, रंगी सब्ज़िया, ... जाएं तो जाएं कहां, खाएं तो खाएं क्या???????

    ReplyDelete
  7. बाप रे अब डबल रोटी भी बन्द,धन्यवाद

    ReplyDelete