मंगलवार, 1 अप्रैल 2008

ऐसा विज्ञापन तो आपने पहले कभी देखा न होगा.......लगी शर्त ?

शिक्षा विभाग, चंडीगढ़ प्रशासन द्वारा जारी इस सरकारी विज्ञापन को मैंने आज सुबह अखबार में जब से देखा है तो मैं यही सोच रहा हूं कि यह किसी परीक्षा के परिणाम की सूचना दे रहा है या किसी सुनामी की चेतावनी दे रहा है। जो भी हो, आप भी यह विज्ञापन देखें और यह फील करें कि यह विज्ञापन हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर भी तो कर रहा है। इतना तनाव और वह भी आठवीं कक्षा के इन बच्चों में !!

लेकिन इस विज्ञापन को देखने के बाद आप प्रशासन की भी चेतनता की दाद दिये बिना कैसे रह पायेंगे! ठीक है, इस तरह की समस्यायें देखी तो जाती हैं....लेकिन अकसर बारहवीं के परिणाम के बाद या कभी कभी दसवीं के परीक्षा परिणामों के बाद भी तो इस तरह की खबरें न्यूज़ में रहती हैं। और हां, उन दिनों एफएम पर इस तरह के प्रोग्राम भी कईं बार सुनाये जाते हैं जिन में कांऊस्लर्ज़ इन छात्रों को परिणामों को फेस करने के टिप्स बताते हैं या तो फिर कईं न्यूज़-पेपरर्ज़ में टीन-एजर्ज़ के जो सप्लीमेंट्स आते हैं उन में इस तरह के विषय कवर होते हैं। लेकिन इस तरह का सरकारी इश्तिहार भई मैंने तो पहली बार ही देखा है।

आठवीं कक्षा का परीक्षा परिणाम घोषित करने से पहले इस तरह की Disaster preparedness देख कर मिक्सड़ फीलिंग्स सी हो रही हैं। बड़े बड़े चिकित्सक तैयार हैं... उन के मोबाइल फोन इश्तिहार में बताये गये हैं।
इस लाइन की तरफ तो ध्यान करिये.....माता-पिता को सलाह दी जाती है कि यदि बच्चा ज्यादा उदास या परेशान लगे तो इन नंबरों पर संपर्क करें बच्चे को अकेला ना छोड़ें, उसका मन लगाएं , भला बुरा कहें..............यह पढ़ कर मेरे मन में तो यही विचार रहा है कि रिजल्ट से पहले ही वह पंजाबी का गीत सीडी में डाल कर तैयार ही रखा जाये....जिस के बोल हैं......खायो पियो ऐश करो मितरो...दिल पर किसे दा दुखायो ना.........और हां, अगर बच्चे के बाप को अच्छा भंगड़ा डालना आता हो और मां को गिद्दा डालना आता है तो ऐसे समय में यह बहुत काम आयेगा क्योंकि प्रशासन भी तो यही कह रहा है कि उदास बच्चे का मन लगायें.......और जब भांगड़ा डालने के बाद सारा परिवार अच्छी तरह हांफ जाये तो किसी फास्ट-फूड रैस्टरां में जाकर चाइनीज़ खाने पर टूट पड़ने के बारे में आप का क्या ख्याल है !!

ओहो, यह क्या भूल हो गई, ....विज्ञापन में बात तो कही गई है कि 31मार्च को आठवीं कक्षा को रिजल्ट आने वाला है लेकिन यह विज्ञापन आज 1 अप्रैल को अखबार में क्या कर रहा है....अगर कल ही किसी के साथ कोई मिसहैपनिंग हो जाती तो !!

खैर, मैं तो फिलहाल यही सोच रहा हूं कि समय बहुत जल्दी बदल रहा है और शायद अगले साल प्रशासन को पांचवी कक्षा के परिणाम से पहले भी ऐसा विज्ञापन देना पड़े। लेकिन ध्यान रहे.....रिजल्ट से पहले, बाद में नहीं !!













इतने सारे मैसेज एक साथ !

यह गीत चंद ही मिनटों में हम सब को इतने सारे मैसेज दे रहा है कि मेरी कमैंट्री की तो ज़रूरत ही नहीं है , बस आप इस पर क्लिक कर के इस के जश्न में खो जाइए। पांच मिनट के लिये अपनी बलोगरी को थोड़ा रोक दें.....यकीन मानियेगा, रीडरशिप में खास फर्क नहीं पड़ेगा।

सोमवार, 31 मार्च 2008

31मार्च का दिन.....मेरी बड़ी बहन और वे ढेर सारे गुलाब !

हर साल 31मार्च के दिन मुझे मेरी बड़ी बहन की बहुत याद आती है और इस के साथ ही साथ उन ढेर सारे गुलाब के फूलों की जिन की माला वह हर 31मार्च की सुबह सवेरे अपने सारे काम काज छोड़ कर बेहद उत्साह के साथ मेरे लिये एक लंबी सी माला सुईं धागे से तैयार किया करती थीं। मेरी बहन मेरे से 10साल बड़ी हैं और आज कल वे यूनिवर्सिटी प्रोफैसर हैं।

यह माला मेरी बहन द्वारा हर 31 मार्च को तैयार कर के एक कागज के लिफाफे में डाल कर मुझे थमा देती थीं.....क्योंकि मुझे यह माला अपने प्राइमरी स्कूल के हैड-मास्टर के गले में डालनी होती थी। जिस स्कूल में मैं पढ़ता था वहां पर फिक्स था कि रिजल्ट 31मार्च को ही आता था और मैं वहां पर चौथी कक्षा तक पढ़ा हूं। इसलिये मुझे यह भी अच्छी तरह से याद है कि मेरी बड़ी बहन किस तरह चाव से सुबह सुबह माला तैयार किया करती थीं। जिस प्यार से, जिस भावना से वह सूईं धागे में एक एक फूल पिरो कर माला बनाती थीं वह मुझे सारी उम्र याद रहेगी....और मुझे उस के कंपैरीज़न में ये बुके वुके के स्टाल कितने नकली, भद्दे, कितने औछे, कितने मतलबी, कितने आर्टीफिशियल , कितने मतलबी से, कितने सैल्फिश से, कितने बेकार से लगते हैं.......उस बहन की पिरोई हुई माला की बात ही कुछ और थी। इसलिये शायद मैंने कभी भी ये बुके-वुके खरीदे नहीं हैं....क्योंकि मुझे इन सब में इतना नकलीपन लगता है कि मैं लिख नहीं सकता। मेरा पक्का विश्वास है कि ये हम लोग एक दूसरे को नहीं देते....एक दूसरे के औहदे को, एक दूसरे की पोजीशन को, एक दूसरे से हमें कितना काम पड़ सकता है ...इन सब को तराजू में रख कर ही यह तय करते हैं कि हम कौन सा बुके किस के लिये ले कर जायेंगे। आप के विचार इससे जुदा हो सकते हैं !


अच्छा तो मैं उस फूलों वाली माला की बात कर रहा था। इस समय भी हमारे घर में गुलाब के फूलों की बहार आई हुई है, लगभग 20-25 पौधे हैं जिन पर ढेरों गुलाब के फूल हर आने-जाने वाले को हर्षोल्लास से भर देते हैं।
हुया यूं कि इस साल बसंत के कुछ दो-चार दिन पहले ही हम ने माली को कहा कि ये जो गुलाब के फूल हैं ये बहुत ऊंचे हो गये हैं, इन की थोड़ा कटिंग कर देना। कह कर हम अपने अपने काम में बिज़ी हो गये....लेकिन कुछ समय बाद क्या देखते हैं कि ये चार-चार पांच पांच फुट की ऊंचाई वाले पौधे उस ने काट कर बिल्कुल ही छोटे छोटे काट दिये हैं .....इन्हें देख कर मेरा मन बहुत दुःखी हुया ...यही लगा कि क्यों नहीं माली के सामने खड़े रहे। लेकिन माली ने कहा कि कटिंग तो इसी तरह की ही बढ़िया होती है ...आप देखना ये अब कितना फैलेंगे। लेकिन मन ही मन कुछ दिन बुरा सा लगता रहा।

लेकिन यह क्या....कुदरत का करिश्मा देखिये....काटने के कुछ ही दिनों बाद ही ...शायद बसंत पंचमी के दो-चार दिन बाद ही इन गंजे पौधे पर छोटी छोटी पत्ते दिखने लग गये...जिन्हें देख कर मेरी तो बांछे खिल गईं क्योंकि मुझे तो इन गुलाब के फूलों से बेहद प्यार है। कुछ ही दिनों में ये इतने तेज़ी से फैल गये कि अब ये गुलाब के फूलों से भरे पड़े हैं.........जिन्हें देख कर मन बहुत खुश होता है। और आज तो वैसे भी 31मार्च का दिन है....मेरे लिये और मेरी बड़ी बहन के लिये विशेष दिन.......इस लिये यह पोस्ट लिख कर उस दिन को मना रहा हूं।

जाते जाते यही सोच रहा हूं कि हम लोग जब बच्चे थे तो हम लोगों के मन में अपने टीचर्ज़ के प्रति बहुत सम्मान हुया करता था....किसी भी तरह से हम इन गुमनाम हस्तियों को अपने मां-बाप से कम नहीं मानते थे.....और इस समय सोचता हूं कि इस प्रकार के संस्कार मेरे जैसे नटखट बालकों के मन में भरने के लिये शायद जैसे मेरी बहन जैसी इस देश की करोड़ों बहनों ने पता नहीं कितनी गुलाब की मालायें तैयार की होंगी। आज भी जब अपने टीचरों के चेहरे मन की आंखों के सामने घूमते हैं तो अपने आप को इन हस्तियों के अहसानों तले इतना दबा पाता हूं कि कह नहीं सकता....यह सोच कर आंखें नम हो जाती हैं कि मुझ जैसे गीली मिट्टी को भी इन टीचर रूपी फरिश्तों ने कहां का कहां पहुंच दिया......साथ में आज का माहौल देख कर एक अभिलाषा भी मन में उठती है कि काश ! आज का शागिर्द भी अपने गुरू को भी उतना ही सम्मान देने लग जाये।

यह रहा टुथपेस्ट/टुथपावडर का कोरा सच......भाग II ( कंक्लूयडिंग पार्ट)

इस पोस्ट में हम ने आज हम यह फैसला करना है कि दांतों की सफाई टुथपेस्ट से हो, किसी आयुर्वैदिक टुथपावडर से हो, या फिर किसी और ढंग से हो। इस पोस्ट को लिखना तो शुरू कर दिया है लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि किस क्रम से शुरू करूं !.............मेरे ख्याल में दांतों की सफाई के लिये लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे विभिन्न तरीकों की चर्चा से शुरू करते हैं......

मैडीकेटिड टुथपेस्टें .....इन दवाई-युक्त पेस्टों को बहुत लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है ...होता यूं है कि जब किसी के दांतों में दर्द होता है, तो कोई मित्र-रिश्तेदार कोई ऐसी मैडीकेटिड टुथपेस्ट के नाम की सिफारिश कर देता है। बस, फिर क्या है ...अगले दिन से सारे परिवार द्वारा वही पेस्ट इस्तेमाल करनी शुरू कर दी जाती है। अकसर जिन लोगों के दांतों में ठंडा लगता है या मसूड़ों से खून आता है तो वे किसी दंत-चिकित्सक के पास जाने की बजाये अपने आप ही इस तरह की पेस्टें खरीद कर रगड़ने को मुनाफे का सौदा मानते हैं। कभी कभी कोई दंत-चिकित्सक भी इलाज के दौरान इस प्रकार की पेस्ट को कुछ दिनों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं............लेकिन ,कुछ लोगों का तो बस यही एटीट्यूड हो जाता है हम क्यों इसे करना बंद करें, हमें तो बस एक बार नाम पता चलना चाहिये और वैसे भी जब हमें इस प्रकार की पेस्टों से आराम सा लग रहा है तो हम क्यों इसे इस्तेमाल करना बंद करें।

आज कल तो अखबारों में कुछ पेस्टें इस तरह के दावे करती भी दिखती हैं कि इन के इस्तेमाल से पायरिया रोग ठीक हो जाता है। आज तक तो मैंने ऐसी कोई करिश्माई टुथपेस्ट ना ही देखी ना ही सुनी कि जो इस पायरिया को ही ठीक कर दे। अगर पायरिया है तो इस का इलाज प्रशिक्षित दंत-चिकित्सक से करवाना ही होगा, और कोई विकल्प तो है ही नहीं, अगर दांतों में ठंडा-गर्म लगता है...तो भी दंत-चिकित्सक के पास जाकर इस का कारण पता करने के उपरांत इस का निवारण करना ही होगा। इस तरह की मैडीकेटिड टुथपेस्टें और कुछ करें ना करें....शायद लंबें समय तक दांत एवं मसूड़ों की बीमारियों के लक्षणों को दबा ज़रूर देती हैं और लोग एक अजीब तरह की फाल्स सैंस ऑफ सैक्यूरिटि में उलझे रहते हैं कि सब कुछ ठीक हो गया है जब कि इन पेस्टों की असलियत तो यह है कि इन के इस्तेमाल के बावजूद दांतों एवं मसूड़ों के रोग अपनी ही मस्ती में अंदर ही अंदर बढ़ते रहते हैं।

इस प्रकार की मैडीकेटिड टुथपेस्टों का नाम कुछ कारणों से मैं यहां लिख नहीं रहा हूं....लेकिन आप में से अधिकांश इन के बारे में पहले ही से जानते हैं और शायद कभी न कभी इन्हें किसी की रिक्मैंडेशन पर इस्तेमाल कर भी चुके होंगे।

आयुर्वैदिक टुथपावडर ....चूंकि मैं आयुर्वैदिक का प्रैक्टीशनर नहीं हूं...इसलिये इस संबंध में मेरे विचार बिल्कुल मेरी आबजर्वेशन पर ही आधारित हैं.....मैं वर्षों से इंतज़ार कर रहा हूं कि कोई आयुर्वैदिक विशेषज्ञ इन आयुर्वैदिक पावडरों के ऊपर भी तो प्रकाश डालें।

आप किसी आयुर्वैदिक पावडर की थोड़ी निंदा कर के तो देखिये...लोग शायद मरने-मारने पर उतारू हो जायेंगे। लेकिन भला क्यों करे निंदा, हम तो बस विज्ञान की बात करेंगे। मैं अकसर सोचता हूं कि हमारे लोगों की आयुर्वैदिक पर इतनी ज़्यादा आस्था होने का सब से फायदा इस तरह के आयुर्वैदिक पावडर एवं पेस्ट करने वाली कंपनियों ने ही उठाया है। फायदा ही नहीं उठाया, चांदी ही कूटी है। क्योंकि कितना आसान है कि किसी पेस्ट का अच्छा सा देसी नाम रख कर के लोगों की इस आस्था के साथ खिलवाड़ करना......ज़्यादातर लोगों को तो बस वैसे ही नाम ही से मतलब है....बस हो गया इन कंपनियों का काम....इन आयुर्वैदिक पेस्टों एवं पावडरों के अंदर क्या है, उधर झांकने की किसी पड़ी है....बस, नाम तो देसी है ना, सब ठीक ही होगा, और क्या ! अकसर लोग यही सोच लेते हैं।

अब इसे पढ़ते हुये आप में से कईं लोग यही सोच रहे हैं ना कि यह डाक्टर क्या कह रहा है, हज़ारों साल पुरानी आयुर्वैदिक चिकित्सा प्रणाली को ही बुरा भला कह रहा है। नहीं, मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा हूं क्योंकि आप की तरह मेरे मन में इस आयुर्वैदिक चिकित्सा प्रणाली का बहुत आदर है, सम्मान है !

अब आप सोच रहे होंगे कि फिर तकलीफ़ कहां है...तो मेरी सुनिये तकलीफ़ केवल यही है कि मेरे विचार में लोगों के आयुर्वैदिक शब्द के प्रति जो सैंटीमेंट्स हैं, उन को एक्सप्लायट किया जा रहा है।

एक विचार मेरे मन में अकसर आता है कि इन आयुर्वैदिक पावडरों की पैकिंग के बाहर इतने ज़्यादा घटक( ingredients) लिखे होते हैं कि एक बार तो खुशफहमी होनी लाज़मी सी ही लगती है कि यह पावडर तो डायरैक्ट अपनी दादी के दवाखाने से ही आ रहा है। लेकिन मेरा एक प्रयोग करने की इच्छा होती है कि जितने पैसों में ये पावडर बाज़ार में मिलते हैं, अगर उतने पैसे में ही इन घटकों को बाज़ार से खरीद कर पीस लिया जाये, तो क्या इतना बड़ा डिब्बा तैयार हो पायेगा। अब इस का जवाब आप सोचें !! वैसे पर्सनली मुझे तो कभी नहीं लगता कि इतने पैसे खर्च कर हम इतना बड़ा डिब्बा तैयार कर सकते हैं।


आज से बीस साल पहले मैंने इन आयुर्वैदिक पावडरों पर एक सर्वे किया था....इस के अंतर्गत मैंने यही पाया था कि कुछ डिब्बों पर विभिन्न घटकों की बात की जाती है कि ये इतने ग्राम , वे इतने ग्राम....और बाद में लिखा होता था कि इसे 100 ग्राम बनाने के लिये बाकी गेरू मिट्टी मिलाई गई है। इस तरह का सर्वेक्षण करने का कारण यही था कि उन दिनों कुछ इस तरह के पावडर बाज़ार में उपलब्ध थे जिन में तंबाखू भी मिला हुया था. लेकिन क्या आज कल ऐसे पावडर नहीं मिलते.....खूब मिलते हैं. इस देश में क्या नहीं बिकता !

हां, तो मैं बात कर रहा था कि मिट्टी की.....वास्तविकता यह है कि ऐसे किसी भी पावडर को दांतों पर घिसने से दांतों की बाहरी परत क्षति-ग्रस्त हो जाती है और दांतों में ठंडा-गर्म लगना शुरू हो जाता है। मेरे पास इतने मरीज़ आते हैं जिन के दांतों की पतली हालत देखते ही मैं एक मंजन का नाम लेकर पूछता हूं कि आप वह वाला मंजन तो नहीं घिस रहे.......बहुत बार मुझे इस का जवाब हां में ही मिलता है।

अब तो लगता है कि मेरी ये बातें सुन कर आप की पेशेन्स जवाब दे रही होगी कि डाक्टर बातों को ज़्यादा घोल-घोल मत घुमा.....हमें तो बस इतना बता कि क्या इन आयुर्वैदिक टुथ-पावडरों का इस्तेमाल जारी रखें। लेकिन मैं भी तो उसी बात ही आ रहा हूं।

मेरा दृढ़ विश्वास तो यही है कि किसी दातुन ( नीम, बबूल आदि) के इलावा अगर आप किसी आयुर्वैदिक मंजन का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो उसे आप स्वयं ही क्यों नहीं तैयार करवा लेते......well, that is just my opinion simply based upon my so many years of keen observation !

सीधी सी बात है कि आप कोई भी आयुर्वैदिक मंजन इस्तेमाल करें ..बस इस बात का ध्यान रखें कि उस में कुछ भी हानिकारक घटक न मिलाया गया हो, और ना ही इस तरह का मंजन खुरदरा ही हो..............लेकिन मेरी दंत-चिकित्सक को बिना किसी दांतों की तकलीफ़ के भी साल में एक बार मिलने की बात अपनी जगह पर अटल है क्योंकि वाहिद एक वह ही शख्स है जो कि यह कह सकता है कि आप के दांत एवं मसूड़ों रोग-मुक्त हैं। वैसे बार बार मुझे यहां जो यह शब्द आयुर्वैदिक मंजन लिखना पड़ रहा है ...मुझे इस के लिये एक अपराधबोध हो रहा है...अब आयुर्वैदिक तो एक निहायत ही कारगुज़ार चिकित्सा पद्धति है और मैं जब यह बार बार लिख रहा हूं कि आयुर्वैदिक मंजन तो यही लगता है कि इस में आयुर्वेद का ही कुछ चक्कर है। ऐसा कुछ नहीं है.....केवल लोगों को एक्सप्लायट करने का एक धंधा है। इसलिये सोच रहा हूं कि इन जगह जगह बिकने वाले पावडरों को देसी पावडर ही क्यों ना कह दिया करूं !!

तो, मैसेज क्लियर है कि आप कुछ भी इस्तेमाल करिये लेकिन वह आप के दांतो एवं मसूड़ों के लिये नुकसानदायक नहीं होना चाहिये और आप के दंत-चिकित्सक के पास नियमित जा कर अपना चैक-अप करवाते रहिये।

वैसे चाहे यह पोस्ट तो मैं आज समाप्त कर रहा हूं लेकिन दातुन के सही इस्तेमाल पर एक पोस्ट शीघ्र ही लिखूंगा।

नमक-तेल, मेशरी, देसी साबुन, राख.... लोग तरह तरह के अन-स्पैसीफाइड तरीकों से भी दांत मांजते रहते हैं। मेरा इन के बारे में यही विचार है कि something is better than nothing……..as long as it does not pose any health hazard !......नमक तेल का इस्तेमाल तो अकसर होता ही है....अब फर्क तो यही है कि कोई तो इसे शौकिया तौर पर कभी कभी कर रहा है लेकिन कोई इसे मजबूरी वश करता है कि उस के पास महंगी पेस्ट-ब्रुश खरीदने का जुगाड़ नहीं है...........लेकिन फर्क क्या पड़ता है, अगर दंत-चिकित्सक द्वारा नियमित किया गया परीक्षण यही कह रहा है कि सब कुछ ठीक ठाक है तो आखिर हर्ज क्या है। इस में कोई शक नहीं है कि इस नमक-तेल को दांतों की सफाई करने का विधान भी तो सैंकड़ों वर्ष पुराना है। लेकिन तंबाकू को जला कर उसे दांतों एवं मसूड़ों पर घिसने का विधान तो कहीं नहीं था...यह तो हमारी ही खुराफात है....ये बंबई में लोगों द्वारा बहुत इस्तेमाल होता है और इस जले हुये तंबाकू को मेशरी कहा जाता है। दांत तो इस से खाक साफ होते होंगे लेकिन मुंह के कैंसर को इस के बढ़िया खुला आमंत्रण तो कोई हो ही नहीं सकता......एक तरह से मुंह का कैंसर मोल लेने का सुपरहिट फार्मूला। अब, कईं लोग देसी साबुन से दांत मांज लेते हैं ....यह भी गलत है क्योंकि इस में मौजूद कैमिकल्स की वजह से मुंह में घाव हो जाते हैं। कुछ लोगों को घर ही में आंच पर बादाम के छिलकों को जला कर मंजन तैयार करते देखा है। भारत के इस भाग में लोगों विशेषकर महिलाओं द्वारा दंदासा बहुत इस्तेमाल होता है.....यह अखरोट की छाल है जिसे दातुन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मुस्लिम भाईयों में दांतों की सफाई के लिये मिस्वॉक का इस्तेमाल होता है ...जिस में बहुत से लाभदायक तत्व होने की बात सिद्ध हो चुकी है।

यह वाली बात यहीं पर यह कह कर समाप्त करता हूं कि आप जो भी वस्तु नित-प्रतिदिन अपने दांतों एवं मसूड़ों पर इस्तेमाल कर रहे हैं , वह हर तरह के नुकसानदायक गुणों से रहित होनी चाहिये और बेहतर होगा कि दंत-चिकित्सक से थोड़ी बात ही कर ली जाये।

सामान्य टुथपेस्ट ----टुथपेस्टों की आज बाज़ार में भरमार है। लेकिन जब मेरे से लोग पूछते हैं कि कौन सा पेस्ट इस्तेमाल करें तो मैं हमारे यहां उपलब्ध बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दो-तीन पेस्टों के नाम गिना देता हूं कि इन में से कोई भी कर लिया करो। इस के बारे में मैं स्वदेशी, देशी या परदेसी के चक्कर में कभी नहीं पड़ना चाहता हूं ....मेरा तर्क है कि अगर किसी टाप कंपनी की पेस्ट मेरे किसी मरीज़ को किसी भी दूसरी पेस्ट के दाम में मिल रही है तो क्यों इस दूसरी (पेस्ट ही !....और कुछ न समझ लीजियेगा!) के चक्कर में पड़ना !

अमीर से अमीर देशों ने इन दांतों की बीमारियों को इलाज के द्वारा दुरूस्त करने की नाकामयाब कोशिशें की हैं, लेकिन अमेरिका जैसे अमीर देशों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये। तो, वैज्ञानिकों ने यह तय कर लिया कि अगर हम मुंह की बीमारियों पर विजय हासिल करना चाहते हैं तो हमें इन से बचाव का ही माडल अपनाना होगा। इसलिये दांतों की बीमारियों से बचने का सब से सुपरहिट साधन आखिर ढूंढ ही निकाल लिया गया जिस की सिफारिश विश्व-स्वास्थ्य संगठन भी करता है.....वह यही है कि हमें दिन में दो बार...सुबह और रात को सोने से पहले किसी भी फ्लोराइड-युक्त टुथपेस्ट से ही दांत साफ करने चाहिये। इसलिये आप भी टुथपेस्ट खरीदते समय यह ज़रूर चैक कर लिया करें कि उस में फ्लोराइड मिला हुया है। यह दांत की बीमारियों से बचने का बहुत बड़ा हथियार है। आज से बीस साल पहले इस फ्लोराइड के उपयोग के बारे में भी देश में दो खेमे बने हुये थे। इस के बारे में अगर कोई प्रश्न हो तो बतलाइएगा, किसी अगली पोस्ट में डिटेल में कवर कर लूंगा। ये फ्लोराइड युक्त पेस्ट को सात साल की उम्र से तो शुरू कर ही लेना चाहिये...लेकिन जैसे ही बच्चा चार साल का हो तो उस के ब्रुश पर इस पेस्ट की बिल्कुल थोड़ी सी पेस्ट लगा कर शुरू किया जा सकता है लेकिन यह ध्यान रहे कि बच्चा पेस्ट खाता न हो।

फिर कभी इस फ्लोराइड के बारे में , इस पेस्ट के एवं इस ब्रुश के बारे में विस्तृत चर्चा करेंगे।

जाते जाते एक बात कहना यह भी चाह रहा हूं कि आज कल हम लोगों का खान-पान भी तो बहुत ज़्यादा बदल गया है, हम ज़्यादा से ज़्यादा रिफाइन्ड चीज़ें खाने लगे हैं, ज़्यादा हार्ड-चीजें हम अपने खाने में शामिल करने से अकसर गुरेज़ ही करते हैं , कच्चे-खाने( सलाद, अंकुरित अनाज एवं दालों आदि) से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि फॉस्ट-फूड को पास लाने की जल्दी में हैं तो फिर इस टुथपेस्ट और ब्रुश को भी तो अपनाना ही होगा।

वैसे अब जब इस पोस्ट को पब्लिश करने का वक्त आया है तो यही सोच रहा हूं कि इस विषय का स्कोप भी इतना विशाल है कि कैसे एक-दो पोस्टों में इस के न्याय करूं....खैर, सब कुछ आप की टिप्पणीयों पर , फीडबैक पर निर्भर है ....आप अगर इस विषय के बारे में और कुछ जानना चाहेंगे तो इस के बारे में लिखते जायेंगे। लेकिन जाते जाते एक काम की बात जो किताबों में लिखी है वह ज़रूर बतानी चाहूंगा कि ब्रुश को पेस्ट के साथ करना शायद इतना लाज़मी भी नहीं है....यह तो केवल ब्रुश की अक्सैप्टेबिलिटी बढ़ाती है। ऐसा कहा जाता है कि अगर किसी को बिना पेस्ट के दांत साफ करने को कहें तो कितने लोग करेंगे..................औरों की तो मैं नहीं जानता, मैं खुद तो नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मैं पिछले 18 सालों से इस फ्लोराइड-युक्त पेस्ट से ही दांत ब्रुश कर रहा हूं............संतुष्ट हूं और ब्रांड-लॉयल भी हूं।

यह रहा टुथपेस्ट/टुथपावडर का कोरा सच......भाग II ( कंक्लूयडिंग पार्ट)

Monday, March 31, 2008


इस पोस्ट में हम ने आज हम यह फैसला करना है कि दांतों की सफाई टुथपेस्ट से हो, किसी आयुर्वैदिक टुथपावडर से हो, या फिर किसी और ढंग से हो। इस पोस्ट को लिखना तो शुरू कर दिया है लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि किस क्रम से शुरू करूं !.............मेरे ख्याल में दांतों की सफाई के लिये लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे विभिन्न तरीकों की चर्चा से शुरू करते हैं......

मैडीकेटिड टुथपेस्टें .....इन दवाई-युक्त पेस्टों को बहुत लोगों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है ...होता यूं है कि जब किसी के दांतों में दर्द होता है, तो कोई मित्र-रिश्तेदार कोई ऐसी मैडीकेटिड टुथपेस्ट के नाम की सिफारिश कर देता है। बस, फिर क्या है ...अगले दिन से सारे परिवार द्वारा वही पेस्ट इस्तेमाल करनी शुरू कर दी जाती है। अकसर जिन लोगों के दांतों में ठंडा लगता है या मसूड़ों से खून आता है तो वे किसी दंत-चिकित्सक के पास जाने की बजाये अपने आप ही इस तरह की पेस्टें खरीद कर रगड़ने को मुनाफे का सौदा मानते हैं। कभी कभी कोई दंत-चिकित्सक भी इलाज के दौरान इस प्रकार की पेस्ट को कुछ दिनों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं............लेकिन ,कुछ लोगों का तो बस यही एटीट्यूड हो जाता है हम क्यों इसे करना बंद करें, हमें तो बस एक बार नाम पता चलना चाहिये और वैसे भी जब हमें इस प्रकार की पेस्टों से आराम सा लग रहा है तो हम क्यों इसे इस्तेमाल करना बंद करें।

आज कल तो अखबारों में कुछ पेस्टें इस तरह के दावे करती भी दिखती हैं कि इन के इस्तेमाल से पायरिया रोग ठीक हो जाता है। आज तक तो मैंने ऐसी कोई करिश्माई टुथपेस्ट ना ही देखी ना ही सुनी कि जो इस पायरिया को ही ठीक कर दे। अगर पायरिया है तो इस का इलाज प्रशिक्षित दंत-चिकित्सक से करवाना ही होगा, और कोई विकल्प तो है ही नहीं, अगर दांतों में ठंडा-गर्म लगता है...तो भी दंत-चिकित्सक के पास जाकर इस का कारण पता करने के उपरांत इस का निवारण करना ही होगा। इस तरह की मैडीकेटिड टुथपेस्टें और कुछ करें ना करें....शायद लंबें समय तक दांत एवं मसूड़ों की बीमारियों के लक्षणों को दबा ज़रूर देती हैं और लोग एक अजीब तरह की फाल्स सैंस ऑफ सैक्यूरिटि में उलझे रहते हैं कि सब कुछ ठीक हो गया है जब कि इन पेस्टों की असलियत तो यह है कि इन के इस्तेमाल के बावजूद दांतों एवं मसूड़ों के रोग अपनी ही मस्ती में अंदर ही अंदर बढ़ते रहते हैं।

इस प्रकार की मैडीकेटिड टुथपेस्टों का नाम कुछ कारणों से मैं यहां लिख नहीं रहा हूं....लेकिन आप में से अधिकांश इन के बारे में पहले ही से जानते हैं और शायद कभी न कभी इन्हें किसी की रिक्मैंडेशन पर इस्तेमाल कर भी चुके होंगे।

आयुर्वैदिक टुथपावडर ....चूंकि मैं आयुर्वैदिक का प्रैक्टीशनर नहीं हूं...इसलिये इस संबंध में मेरे विचार बिल्कुल मेरी आबजर्वेशन पर ही आधारित हैं.....मैं वर्षों से इंतज़ार कर रहा हूं कि कोई आयुर्वैदिक विशेषज्ञ इन आयुर्वैदिक पावडरों के ऊपर भी तो प्रकाश डालें।

आप किसी आयुर्वैदिक पावडर की थोड़ी निंदा कर के तो देखिये...लोग शायद मरने-मारने पर उतारू हो जायेंगे। लेकिन भला क्यों करे निंदा, हम तो बस विज्ञान की बात करेंगे। मैं अकसर सोचता हूं कि हमारे लोगों की आयुर्वैदिक पर इतनी ज़्यादा आस्था होने का सब से फायदा इस तरह के आयुर्वैदिक पावडर एवं पेस्ट करने वाली कंपनियों ने ही उठाया है। फायदा ही नहीं उठाया, चांदी ही कूटी है। क्योंकि कितना आसान है कि किसी पेस्ट का अच्छा सा देसी नाम रख कर के लोगों की इस आस्था के साथ खिलवाड़ करना......ज़्यादातर लोगों को तो बस वैसे ही नाम ही से मतलब है....बस हो गया इन कंपनियों का काम....इन आयुर्वैदिक पेस्टों एवं पावडरों के अंदर क्या है, उधर झांकने की किसी पड़ी है....बस, नाम तो देसी है ना, सब ठीक ही होगा, और क्या ! अकसर लोग यही सोच लेते हैं।

अब इसे पढ़ते हुये आप में से कईं लोग यही सोच रहे हैं ना कि यह डाक्टर क्या कह रहा है, हज़ारों साल पुरानी आयुर्वैदिक चिकित्सा प्रणाली को ही बुरा भला कह रहा है। नहीं, मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा हूं क्योंकि आप की तरह मेरे मन में इस आयुर्वैदिक चिकित्सा प्रणाली का बहुत आदर है, सम्मान है !

अब आप सोच रहे होंगे कि फिर तकलीफ़ कहां है...तो मेरी सुनिये तकलीफ़ केवल यही है कि मेरे विचार में लोगों के आयुर्वैदिक शब्द के प्रति जो सैंटीमेंट्स हैं, उन को एक्सप्लायट किया जा रहा है।

एक विचार मेरे मन में अकसर आता है कि इन आयुर्वैदिक पावडरों की पैकिंग के बाहर इतने ज़्यादा घटक( ingredients) लिखे होते हैं कि एक बार तो खुशफहमी होनी लाज़मी सी ही लगती है कि यह पावडर तो डायरैक्ट अपनी दादी के दवाखाने से ही आ रहा है। लेकिन मेरा एक प्रयोग करने की इच्छा होती है कि जितने पैसों में ये पावडर बाज़ार में मिलते हैं, अगर उतने पैसे में ही इन घटकों को बाज़ार से खरीद कर पीस लिया जाये, तो क्या इतना बड़ा डिब्बा तैयार हो पायेगा। अब इस का जवाब आप सोचें !! वैसे पर्सनली मुझे तो कभी नहीं लगता कि इतने पैसे खर्च कर हम इतना बड़ा डिब्बा तैयार कर सकते हैं।


आज से बीस साल पहले मैंने इन आयुर्वैदिक पावडरों पर एक सर्वे किया था....इस के अंतर्गत मैंने यही पाया था कि कुछ डिब्बों पर विभिन्न घटकों की बात की जाती है कि ये इतने ग्राम , वे इतने ग्राम....और बाद में लिखा होता था कि इसे 100 ग्राम बनाने के लिये बाकी गेरू मिट्टी मिलाई गई है। इस तरह का सर्वेक्षण करने का कारण यही था कि उन दिनों कुछ इस तरह के पावडर बाज़ार में उपलब्ध थे जिन में तंबाखू भी मिला हुया था. लेकिन क्या आज कल ऐसे पावडर नहीं मिलते.....खूब मिलते हैं. इस देश में क्या नहीं बिकता !

हां, तो मैं बात कर रहा था कि मिट्टी की.....वास्तविकता यह है कि ऐसे किसी भी पावडर को दांतों पर घिसने से दांतों की बाहरी परत क्षति-ग्रस्त हो जाती है और दांतों में ठंडा-गर्म लगना शुरू हो जाता है। मेरे पास इतने मरीज़ आते हैं जिन के दांतों की पतली हालत देखते ही मैं एक मंजन का नाम लेकर पूछता हूं कि आप वह वाला मंजन तो नहीं घिस रहे.......बहुत बार मुझे इस का जवाब हां में ही मिलता है।

अब तो लगता है कि मेरी ये बातें सुन कर आप की पेशेन्स जवाब दे रही होगी कि डाक्टर बातों को ज़्यादा घोल-घोल मत घुमा.....हमें तो बस इतना बता कि क्या इन आयुर्वैदिक टुथ-पावडरों का इस्तेमाल जारी रखें। लेकिन मैं भी तो उसी बात ही आ रहा हूं।

मेरा दृढ़ विश्वास तो यही है कि किसी दातुन ( नीम, बबूल आदि) के इलावा अगर आप किसी आयुर्वैदिक मंजन का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो उसे आप स्वयं ही क्यों नहीं तैयार करवा लेते......well, that is just my opinion simply based upon my so many years of keen observation !

सीधी सी बात है कि आप कोई भी आयुर्वैदिक मंजन इस्तेमाल करें ..बस इस बात का ध्यान रखें कि उस में कुछ भी हानिकारक घटक न मिलाया गया हो, और ना ही इस तरह का मंजन खुरदरा ही हो..............लेकिन मेरी दंत-चिकित्सक को बिना किसी दांतों की तकलीफ़ के भी साल में एक बार मिलने की बात अपनी जगह पर अटल है क्योंकि वाहिद एक वह ही शख्स है जो कि यह कह सकता है कि आप के दांत एवं मसूड़ों रोग-मुक्त हैं। वैसे बार बार मुझे यहां जो यह शब्द आयुर्वैदिक मंजन लिखना पड़ रहा है ...मुझे इस के लिये एक अपराधबोध हो रहा है...अब आयुर्वैदिक तो एक निहायत ही कारगुज़ार चिकित्सा पद्धति है और मैं जब यह बार बार लिख रहा हूं कि आयुर्वैदिक मंजन तो यही लगता है कि इस में आयुर्वेद का ही कुछ चक्कर है। ऐसा कुछ नहीं है.....केवल लोगों को एक्सप्लायट करने का एक धंधा है। इसलिये सोच रहा हूं कि इन जगह जगह बिकने वाले पावडरों को देसी पावडर ही क्यों ना कह दिया करूं !!

तो, मैसेज क्लियर है कि आप कुछ भी इस्तेमाल करिये लेकिन वह आप के दांतो एवं मसूड़ों के लिये नुकसानदायक नहीं होना चाहिये और आप के दंत-चिकित्सक के पास नियमित जा कर अपना चैक-अप करवाते रहिये।

वैसे चाहे यह पोस्ट तो मैं आज समाप्त कर रहा हूं लेकिन दातुन के सही इस्तेमाल पर एक पोस्ट शीघ्र ही लिखूंगा।

नमक-तेल, मेशरी, देसी साबुन, राख.... लोग तरह तरह के अन-स्पैसीफाइड तरीकों से भी दांत मांजते रहते हैं। मेरा इन के बारे में यही विचार है कि something is better than nothing……..as long as it does not pose any health hazard !......नमक तेल का इस्तेमाल तो अकसर होता ही है....अब फर्क तो यही है कि कोई तो इसे शौकिया तौर पर कभी कभी कर रहा है लेकिन कोई इसे मजबूरी वश करता है कि उस के पास महंगी पेस्ट-ब्रुश खरीदने का जुगाड़ नहीं है...........लेकिन फर्क क्या पड़ता है, अगर दंत-चिकित्सक द्वारा नियमित किया गया परीक्षण यही कह रहा है कि सब कुछ ठीक ठाक है तो आखिर हर्ज क्या है। इस में कोई शक नहीं है कि इस नमक-तेल को दांतों की सफाई करने का विधान भी तो सैंकड़ों वर्ष पुराना है। लेकिन तंबाकू को जला कर उसे दांतों एवं मसूड़ों पर घिसने का विधान तो कहीं नहीं था...यह तो हमारी ही खुराफात है....ये बंबई में लोगों द्वारा बहुत इस्तेमाल होता है और इस जले हुये तंबाकू को मेशरी कहा जाता है। दांत तो इस से खाक साफ होते होंगे लेकिन मुंह के कैंसर को इस के बढ़िया खुला आमंत्रण तो कोई हो ही नहीं सकता......एक तरह से मुंह का कैंसर मोल लेने का सुपरहिट फार्मूला। अब, कईं लोग देसी साबुन से दांत मांज लेते हैं ....यह भी गलत है क्योंकि इस में मौजूद कैमिकल्स की वजह से मुंह में घाव हो जाते हैं। कुछ लोगों को घर ही में आंच पर बादाम के छिलकों को जला कर मंजन तैयार करते देखा है। भारत के इस भाग में लोगों विशेषकर महिलाओं द्वारा दंदासा बहुत इस्तेमाल होता है.....यह अखरोट की छाल है जिसे दातुन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मुस्लिम भाईयों में दांतों की सफाई के लिये मिस्वॉक का इस्तेमाल होता है ...जिस में बहुत से लाभदायक तत्व होने की बात सिद्ध हो चुकी है।

यह वाली बात यहीं पर यह कह कर समाप्त करता हूं कि आप जो भी वस्तु नित-प्रतिदिन अपने दांतों एवं मसूड़ों पर इस्तेमाल कर रहे हैं , वह हर तरह के नुकसानदायक गुणों से रहित होनी चाहिये और बेहतर होगा कि दंत-चिकित्सक से थोड़ी बात ही कर ली जाये।

सामान्य टुथपेस्ट ----टुथपेस्टों की आज बाज़ार में भरमार है। लेकिन जब मेरे से लोग पूछते हैं कि कौन सा पेस्ट इस्तेमाल करें तो मैं हमारे यहां उपलब्ध बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दो-तीन पेस्टों के नाम गिना देता हूं कि इन में से कोई भी कर लिया करो। इस के बारे में मैं स्वदेशी, देशी या परदेसी के चक्कर में कभी नहीं पड़ना चाहता हूं ....मेरा तर्क है कि अगर किसी टाप कंपनी की पेस्ट मेरे किसी मरीज़ को किसी भी दूसरी पेस्ट के दाम में मिल रही है तो क्यों इस दूसरी (पेस्ट ही !....और कुछ न समझ लीजियेगा!) के चक्कर में पड़ना !

अमीर से अमीर देशों ने इन दांतों की बीमारियों को इलाज के द्वारा दुरूस्त करने की नाकामयाब कोशिशें की हैं, लेकिन अमेरिका जैसे अमीर देशों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये। तो, वैज्ञानिकों ने यह तय कर लिया कि अगर हम मुंह की बीमारियों पर विजय हासिल करना चाहते हैं तो हमें इन से बचाव का ही माडल अपनाना होगा। इसलिये दांतों की बीमारियों से बचने का सब से सुपरहिट साधन आखिर ढूंढ ही निकाल लिया गया जिस की सिफारिश विश्व-स्वास्थ्य संगठन भी करता है.....वह यही है कि हमें दिन में दो बार...सुबह और रात को सोने से पहले किसी भी फ्लोराइड-युक्त टुथपेस्ट से ही दांत साफ करने चाहिये। इसलिये आप भी टुथपेस्ट खरीदते समय यह ज़रूर चैक कर लिया करें कि उस में फ्लोराइड मिला हुया है। यह दांत की बीमारियों से बचने का बहुत बड़ा हथियार है। आज से बीस साल पहले इस फ्लोराइड के उपयोग के बारे में भी देश में दो खेमे बने हुये थे। इस के बारे में अगर कोई प्रश्न हो तो बतलाइएगा, किसी अगली पोस्ट में डिटेल में कवर कर लूंगा। ये फ्लोराइड युक्त पेस्ट को सात साल की उम्र से तो शुरू कर ही लेना चाहिये...लेकिन जैसे ही बच्चा चार साल का हो तो उस के ब्रुश पर इस पेस्ट की बिल्कुल थोड़ी सी पेस्ट लगा कर शुरू किया जा सकता है लेकिन यह ध्यान रहे कि बच्चा पेस्ट खाता न हो।

फिर कभी इस फ्लोराइड के बारे में , इस पेस्ट के एवं इस ब्रुश के बारे में विस्तृत चर्चा करेंगे।

जाते जाते एक बात कहना यह भी चाह रहा हूं कि आज कल हम लोगों का खान-पान भी तो बहुत ज़्यादा बदल गया है, हम ज़्यादा से ज़्यादा रिफाइन्ड चीज़ें खाने लगे हैं, ज़्यादा हार्ड-चीजें हम अपने खाने में शामिल करने से अकसर गुरेज़ ही करते हैं , कच्चे-खाने( सलाद, अंकुरित अनाज एवं दालों आदि) से दूर होते जा रहे हैं क्योंकि फॉस्ट-फूड को पास लाने की जल्दी में हैं तो फिर इस टुथपेस्ट और ब्रुश को भी तो अपनाना ही होगा।

वैसे अब जब इस पोस्ट को पब्लिश करने का वक्त आया है तो यही सोच रहा हूं कि इस विषय का स्कोप भी इतना विशाल है कि कैसे एक-दो पोस्टों में इस के न्याय करूं....खैर, सब कुछ आप की टिप्पणीयों पर , फीडबैक पर निर्भर है ....आप अगर इस विषय के बारे में और कुछ जानना चाहेंगे तो इस के बारे में लिखते जायेंगे। लेकिन जाते जाते एक काम की बात जो किताबों में लिखी है वह ज़रूर बतानी चाहूंगा कि ब्रुश को पेस्ट के साथ करना शायद इतना लाज़मी भी नहीं है....यह तो केवल ब्रुश की अक्सैप्टेबिलिटी बढ़ाती है। ऐसा कहा जाता है कि अगर किसी को बिना पेस्ट के दांत साफ करने को कहें तो कितने लोग करेंगे..................औरों की तो मैं नहीं जानता, मैं खुद तो नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मैं पिछले 18 सालों से इस फ्लोराइड-युक्त पेस्ट से ही दांत ब्रुश कर रहा हूं............संतुष्ट हूं और ब्रांड-लॉयल भी हूं।

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

डॉ. साहब, आप की पोस्ट से पूरी सहमति है। मैं पेशे से वकील हूँ। मगर परिवार में आयुर्वेदिक चिकित्सक होने के कारण मुझे आयुर्वेदिक चिकित्सक बनाने की कवायद हुई थी। उसी दौर में अध्ययन हुआ जो शौकिया तौर पर आज तक जारी है। बाद में परिवार को होमियोपैथी रास आयी, और आयुर्वेद के मेरे गुरूजी ने उसे बढ़ावा भी दिया,यहाँ तक कि खुद को कोई रोग होने की स्थिति में मुझ से दवा सुझाने और ला कर देने को कहते। उसे लेते और फिर उस का असर भी बताते।
आप का यह सुझाव बहुत सही है कि आयुर्वेदिक मंजन या पेस्ट के नाम पर बहुत धोखाधड़ी हो रही है। इस कारण से किसी विश्वसनीय निर्माता द्वारा निर्मित ही काम में लिया जाए या स्वयं का बना हुआ ही, इस से भी सहमत हैं। एक बात और, लोगों की जीवन चर्या ऐसी हो गयी है कि वे तुरत फुरत सब काम निपटा लेना चाहते हैं खाने से लेकर दाँत साफ करने तक के। एक औषध युक्त मंजन/पेस्ट भी यदि मुंह में केवल एक-दो मिनट ही रहा तो उस का कोई अर्थ नहीं। यदि इसे हल्के से एक मिनट रगड़ा जा कर कम से कम दो मिनट और मुंह में रखा जाय और पुनः रगड़ कर मुँह साफ कर लिया जाए तो अच्छे परिणाम देता है। इस के अलावा नित्य एक बार शीशे में मुंह देखते हुए यह तसल्ली कर लेना भी आवश्यक है कि कोई असामान्यता तो वहाँ नजर नहीं आ रही है। यदि है और दो-चार दिन बनी रहती है तो तुरंत चिकित्सक को दिखाना ही चाहिए।
तम्बाकूयुक्त मंजनों का तो बुरा हाल है। इधर एक-दो निर्माता करोड़ पति हो गए हैं अरबपति की ओर बढ़ रहे है। उन के मंजन से एडिक्शन उत्पन्न होता है। और कस्बों में छतें मंजन से लाल हो गयी हैं। लोग पाँच-पाँच बार मंजन करने लगे हैं उसके बिना चैन कहाँ।

आनंद said...

डॉक्‍टर साहब, मैंने तो सुना था कि फ़्लोराइड युक्‍त पेस्‍ट खतरनाक होते हैं, और उन्‍हें तभी प्रयोग करना चाहिए जब कोई डॉक्‍टर बताए, वह भी केवल सीमित समय के लिए। इस बात में कहाँ तक सचाई है? कृपया बताएँ। एक बात और, कि दातुन करने से चबाने की क्रिया के द्वारा दाँतों का व्‍यायाम हो जाता है, शहरों में दातुन दुर्लभ होता है। क्‍या यह व्‍यायाम ज़रूरी है ? यदि हाँ तो दातुन की अनुपस्थिति में दूसरा क्‍या जरिया हो सकता है। तीसरी बात, कि डॉक्‍टर को दिखाने पर वह पूरे दाँत की सफ़ाई करवाने की सलाह देता है। मैंने कहीं पढ़ रखा है कि सफ़ाई कराने से दाँतों की ऊपरी रक्षात्‍मक परत कमज़ोर हो जाती है जिससे बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए डर भी लगता है कि कहीं डॉक्‍टर अपनी कमाई के जुगाड़ में हमारा नुकसान न कर दे। बुरा न मानें लेकिन डॉक्‍टरों की इमेज इन दिनों वकीलों जैसी बन गई है जो मुकदमा जानबूझकर लटकाते जाते हैं। ऐसा अच्‍छा और विश्‍वसनीय डॉक्‍टर जिसकी प्राथमिकता मरीज़ को कम से कम चूना लगाए ठीक करने की हो, वह कहाँ मिलेगा?

खैर, शरीर की बीमारियों के मामले में हम सभी के मन में कई बुनियादी सवाल हैं जिनका जवाब हमें नहीं मिलता है। बीमारी शुरू होने के क्‍या लक्षण हैं?उन्‍हें बढ़ने से पहले अपने स्‍तर पर कैसे रोका जा सकता है? सिर दर्द, कंधा दर्द, खाँसी से लेकर पथरी से लेकर एपेंडिक्‍स ऑपरेशन, दिल की बीमारी, घुटना फेल होने से लेकर बवासीर तक बहुत सारी रोग हैं, उनके संभावित कारण क्‍या हैं ? सरल भाषा में बताने वाला कोई नहीं है। आपसे बड़ी उम्‍मीदें हैं, आपने जो श्रृंखला प्रारंभ की है उसे जारी रखें। धन्‍यवाद

रविवार, 30 मार्च 2008

यह रहा टुथपेस्ट का कोरा सच......भाग I


अकसर ऐसे मरीज़ों से मुलाकात होती रहती है जिन्हें जब टुथपेस्ट और ब्रुश इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है तो वे झट से कह देते हैं ......“ हमें तो भई पेस्ट करना कभी पसंद नहीं आया। एक आयुर्वैदिक पाउडर से ब्रुश के साथ ब्रुश करते हैं ! दांतों की कोई तकलीफ़ नहीं !!”….

अब यह स्टेटमैंट किसी व्यक्ति द्वारा दी गई एक बेहद महत्त्वपूर्ण स्टेटमैंट है जिस का जवाब तुरंत ही एक लाइन में नहीं दिया जा सकता । इसलिये मुझे इस स्टेटमैंट के ऊपर एक पोस्ट लिखने का विचार आया है। .वैसे उस बंदे की बात अपनी जगह कितनी सही लगती है कि डाक्टर, तुम तो कहते हो टुथपेस्ट और ब्रुश....लेकिन अपने दांतो की तो भई आयुर्वैदिक पावडर और ब्रुश के ज़रिये अच्छी खासी निभ रही है, ऐसे में भला हमें क्या पड़ी है कि हम टुथपेस्ट और ब्रुश के चक्कर में पड़ें !

लेकिन इस बात की तह तक पहुंचने के लिये हमें पहले कुछ इधर-उधर की हांकनी पड़ेंगी। एक बात तो यह भी बताना चाहूंगा कि अकसर ऐसे लोगों से भी मिलना होता है जिन के मुंह का निरीक्षण करने के बाद जब हम लोग कैज़ुएली ही पूछ लेते हैं कि आप पेस्ट कौन सी इस्तेमाल करते हैं तो झट से जवाब मिलता है .....“ मैंने तो आजतक न तो ब्रुश किया है और ना ही पेस्ट का ही इस्तेमाल किया है, बस घर का बनाया मंजन ही किया होता है !”....अब हम जब आगे बढ़ेंगे तो इस बात का भी जवाब भी तो ढूंढेंगे.....केवल मरीज की कही बात को झुठलाने के लिये ही नहीं ,लेकिन केवल सच की तलाश करने के लिये।

अच्छा चलिये, कुछ बातें करें। इतने करोड़ों लोग तंबाकू का विभिन्न रूपों में सेवने करते हैं....तो क्या सब को मुंह का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर या शरीर के किसी अन्य अंग का कैंसर हो जाता है ! या हर कोई तंबाकू से पैदा होने वाली बीमारियों की चपेट में आ जाता है। अब इस का जवाब तो एक डाक्टर को देना ही होगा ना, अब इस के जवाब से कोई भाग कर बताये। बात यही है कि सारी कायनात मानती है कि तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन घातक है, लेकिन फिर भी हम अपने आस-पास भी तो देखते हैं कि कुछ हमारे ही सगे-संबंधी-मित्र बरसों से सिगरेट पिये जा रहे हैं और साथ में ठोक कर कहते हैं कि देखो, भई, हम तो पूरी ऐश करते हैं लेकिन हमें तो कोई तकलीफ़ नहीं है। ऐसे ही लोगों की इस तरह की बातें उन के आस-पास रहने वाले वालों को भी इस ज़हर को ट्राई करने के लिये उकसाती हैं। लेकिन फिर भी अन्य लोग इन जहरीली चीज़ों का इस्तेमाल करने से नहीं ना चूकते ! ….अगले बिंदु पर जाने से पहले इतना ज़रूर कहना चाहूंगा कि बरसों से इस्तेमाल करने वाला बंद अपने आप ही यह घोषणा कर के खुश हो रहा है ना कि वह फिट है......क्या सेहत की यही परिभाषा है, क्या इतना कह कर खुश हो लेने से चल जायेगा ?....मुझे तो ऐसा नहीं लगता। हां, अगर कोई फिजिशियन उसे चैक करने के उपरांत यह डिक्लेयर कर दे कि हां, भई, हां, तुम एकदम फिट हो, तो बात दूसरी है !....लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता.....क्योंकि तंबाकू अंदर ही अंदर विभिन्न अंगों पर मार तो करता ही रहता है, हां, यह ठीक है कि उन का ऐसा विकराल रूप अभी न दिखा हो जिस की वजह से तंबाकू का सेवन करने वाले की नींद ही उड़ जाये।

अब, मुंह की ही बात लीजिये.....मेरे पास मुंह के इतने ज़्यादा मरीज़ आते हैं जिन के मुंह के अंदर तंबाकू के तरह-तरह के सेवन के परिणाम-स्वरूप अजीब तरह के छोटे-छोटे घाव नज़र आते हैं। अब हम जैसे डाक्टरों के लिये चिंताजनक बात तो यही है कि अकसर इस तरह की अवस्थाओं की मरीज़ को कोई तकलीफ़ होती नहीं है, लेकिन हमें यह भी पूरा पता है कि अगर तंबाकू का सेवन तुरंत बंद कर के इन का इलाज न किया गया तो इन में से कुछ अवस्थायें जो अभी बहुत इनोसेंट सी दिख रही हैं, वे कभी भी पल्टी मार के मुंह के कैंसर का विकराल रूप धारण कर लेंगी। इसलिये हम लोगों को तंबाकू के सेवन का जम कर विरोध करना ही पड़ता है.....यहां यह तर्क तो बिल्कुल चलता ही नहीं ना कि हर एक तंबाकू का सेवन करने वाले को ही थोड़ा मुंह का कैंसर हो जायेगा..........लेकिन समस्या यही तो है कि हमें भी नहीं पता कि कौन आगे चल कर इस की चपेट में आ जायेगा, इसलिये ऐसी वस्तु के इस्तेमाल को सिरे से ही क्यों न नकार दिया जाये। आशा है कि आप को इन बातों का औचित्य समझ में आ गया होगा।

ऊपर जो बातें की गई हैं उन से एक बात यह भी निकलती है कि किसी व्यक्ति के किसी बीमारी से ग्रस्त होने का मतलब यह भी है कि उस के शरीर में, कुछ विभिन्न कारणों की वजह से, उस बीमारी के पैदा होने की संभावना दूसरों से ज़्यादा है। अब इस बात को इस से ज़्यादा एक्सप्लेन करना इस पोस्ट के स्कोप से बाहर है.....लेकिन यह तो तय ही है ना कि दो बंदे बचपन से मुंह में तंबाकू-चूना दबा रहे हैं, लेकिन एक को मुंह का कैंसर 45 की उम्र में ही काबू कर लेता है लेकिन दूसरा 85 की उम्र में भी मेरे जैसे डाक्टरों को देखते ही झट से तंबाकू की एक और चुटकी होठों के अंदर कुछ इस अंदाज़ में दबाता है कि मानो हम लोगों की खिल्ली उड़ा रहा हो। अच्छा तो आप बतलाईए कि ऐसे में क्या हम इस 85 वर्षीय हवा में उड़ रहे नटखट बुजुर्ग का केस देख कर तंबाकू चूसने का खुला लाइसैंस दे दें ?....नहीं ना, ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता। लेकिन यह डिस्कशन तो कुछ ज़्यादा ही लंबी होती जा रही है, इसलिये अपने मूल प्रश्न पर ही वापिस आता हूं।

अच्छा तो अपनी बात हो रही थी पेस्ट इस्तेमाल करने की या ना इस्तेमाल करने की। अब ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जिन्होंने से कभी पेस्ट नहीं की, कोई मंजन नहीं किया, कोई दातुन नहीं की, केवल हर खाने के बाद कुल्ला ही करते हैं और वे बड़े गर्व से कहते हैं कि यही उन की बतीसी कायम रहने का राज़ है। लेकिन अकसर जब उन के मुंह का निरीक्षण किया जाता है कि तो पाया जाता है कि उन के मुंह से भयानक दुर्गंध तो आ ही रही है, इस के साथ ही वे पायरिया रोग के एडवांस स्टेज से ग्रस्त भी हैं। मैं यहां पर यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि अपनी बात को सिद्ध करने के लिये यह मेरा कोई एक्सट्रिमिस्ट ओपिनियन नहीं है.....यह हमारा दिन-प्रतिदिन का अनुभव है....और इस तरह की पोस्टों पर लिखा एक-एक शब्द पिछले पच्चीस सालों के अनुभव की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही आप तक पहुंच रहा है।

लेकिन हां, कभी कभार, बहुत रियली ऐसा भी होता है कि ऐसे कुछ बंदों में इतना ज़्यादा रोग नहीं भी दिखाई देता। और दूसरी तरफ़ एक सिचुऐशन देखिये कि कोई आदमी रोज़ाना दो बार टुथ-पेस्ट और ब्रुश से दांत भी साफ कर रहा है, जुबान भी नियमित रूप से रोज़ाना सुबह साफ करता है, लेकिन दांतों की सड़न फिर भी उस का पीछा नहीं छोड़ती......कईं बार तो ऐसे लोग फ्रस्ट्रेट हुये होते हैं। तो, यहां पर यही समझने की बात है कि मुंह की बीमारियां केवल टुथपेस्ट या ब्रुश करने या ना करने से ही नहीं होतीं...........लेकिन उन के होने अथवा ना होने में हमारी जीन्स (genes) का रोल है, हमारे मुंह के अंदर पाये जाने वाले जीवाणुओं की किस्मों का रोल है, हमारे थूक की कंपोज़ीशन का रोल है, हमारे खान-पान का, हमारी अन्य आदतों का बहुत अहम् रोल है। वैसे यह लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन फिर कभी इस के बारे में चर्चा करेंगे।

तो, अब मैं जिस बात पर आना चाहता हूं वह यही है कि जो लोग मंजन और ब्रुश से दांत साफ कर रहे हैं....यह उन की पर्सनल च्वाइस है। लेकिन हां, पहले किसी दंत-चिकित्सक को अपना निरीक्षण करवा कर यह ज़रूर सुनिश्चित कर लें कि सब कुछ ठीक ठाक है। और जहां तक इन तरह तरह के मंजनों का प्रश्न है, कुछ में तो बहुत ही खुरदरे तत्व मिले होते हैं। अकसर लोग हमारे पास भी तरह तरह की शीशियां लेकर आते हैं कि यह शीशी बस-अड्डे के सामने सहारनपुर से रोज़ाना आने वाले बाबे से ली थी, क्या कमाल का पावडर है...मेरे सारे परिवार का पायरिया छू-मंतर ही हो गया है। लेकिन अकसर जब इन लोगों के मुंह का चैक-अप किया जाता है तो बात कुछ और ही होती है।

ठीक है, आप तो कैमिस्ट की दुकान से सीलबंद आयुर्वैदिक पावडर का इस्तेमाल करते हैं......और अगर आप का दंत-चिकित्सक भी आप के दांतों का निरीक्षण करने के उपरांत यही कहता है कि सब कुछ एक दम फिट है तो आप भी अपनी जगह बिल्कुल ठीक हैं कि आखिर आप क्यों करें टुथपेस्ट पर स्विच-ओवर !

लेकिन इन सब बातों का पूरा जवाब भी मैं दूंगा, लेकिन इस समय पिछले डेढ़ घंटे से लगातार लिखते लिखते थक सा गया हूं और आप से इजाजत चाहूंगा......लेकिन इस पोस्ट के दूसरे हिस्से में इन पेस्टों और पावडरों( आयुर्वैदिक पावडरों समेत) की खुल कर बात करूंगा.....पेस्ट अथवा पावडर कैसा हो, कितना इस्तेमाल किया जाये।

जो भी हो, मैं अपनी पिछली पोस्ट पर आई एक टिप्पणी का तहे-दिल से शुक्रगुज़ार हूं जिस की वजह से मुझे यह पोस्ट लिखने पर बाध्य होना पड़ा। इस पोस्ट को मैं बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानता हूं ...इसलिये मैंने इसे सुबह-सवेरे फ्रैश रहते हुये लिखने का फैसला किया। इसलिये कहता हूं कि कुछ टिप्पणी हमें झकझोरती हैं कि हां, अब ढूंढ इस बात का जवाब....शायद हम ने भी कभी इतनी गंभीरता से इन महत्त्वपूर्ण बातों के बारे में इतनी गंभीरता से पहले कभी सोचा ही नहीं होता क्योंकि हम अकसर यही सोच कर खुश होते रहते हैं कि एक प्रोफैशनल के नाते हम कह रहे हैं वही पत्थर पर लकीर है.......लेकिन बात तर्क की है, वितर्क की है, विज्ञान की है, तो ऐसे में हमारी एक एक बात इस कसौटी पर खरी तो उतरनी ही चाहिये।

मेरे एक दोस्त ने बिल्कुल सही कहा था कि इस तरह की ब्लोग की दिशा-दशा तो समय ही निर्धारित करता है। अच्छा तो जल्द ही इसी शीर्षक वाली पोस्ट के दूसरे भाग के साथ हाज़िर होता हूं।

अच्छा तो दोस्तो इतनी सीरियस सी और बोरिंग पोस्ट झेलने के बाद मेरी पसंद का एक गीत ही सुन लो !