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शनिवार, 15 अगस्त 2009

स्वाईन-फ्लू ---- फेस मास्क किन लोगों के लिये है ?


आज कल अखबार में या टीवी चैनलों पर फेस-मास्क के बारे में इतना कुछ दिख रहा है कि दर्शक तो यह सब देख कर चकरा गया है । इतनी बातें सुनने देखने के बाद भी लोग शायद निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि वे मास्क पहनें कि नहीं !! ऐसे अवसर पर अमेरिकी सैंटर ऑफ डिसीज़ कंट्रोल की सिफारिशों का ध्यान अवश्य कर लेना चाहिये क्योंकि यह एक अत्यंत विश्वसनीय साइट है और जो यह कह रहे हैं उस पर आप बिना किसी ज़्यादा सोच-विचार के विश्वास कर सकते हैं।


इन की वेबसाइट पर इन्होंने इस बात का जवाब देने के लिये जनता को दो हिस्सों में बांटा है ---वो लोग जिन्हें बीमारी नहीं है और वे लोग जो बीमारी से जूझ रहे हैं। और एक विशेष बात यह है कि जब यह संस्था फेस-मॉस्क के बारे में कुछ सिफारिश कर रही है तो यह नहीं कह रही कि वे लोग जिन्हें स्वाईन-फ्लू है या नहीं है, बल्कि यह कहा जा रहा है कि जिन लोगों को फ्लृ-जैसी बीमारी है या नहीं है, यह कहना यहां ज़रूरी था क्योंकि नोट करने वाली बात यह है कि फ्लू-जैसी बीमारी तो किसी को मौसमी फ्लू की वजह से भी हो सकती है क्योंकि स्वाईन-फ्लू का तो तब चलेगा जब ज़रूरत पड़ने पर टैस्ट वैस्ट किये जायेंगे। इसलिये ऐसे लोगों के लिये भी फिलहाल फेस-मास्क से संबंधित वही सब सिफारिशें माननी होंगी जो कि बीमारी( फ्लू जैसी बीमारी --- influenza like illness) से जूझ रहे लोगों के लिये मान्य होंगी।


आज कि चर्चा करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि स्वाईन-फ्लू के लिये कुछ लोगों को हाई-रिस्क माना गया है जिन में इस बीमारी के होने का खतरा दूसरे सामान्य लोगों की बजाये ज़्यादा होता है । ये हाई-रिस्क वाले लोग हैं ------पांच साल से कम उम्र के बच्चे, 65 वर्ष से ज़्यादा उम्र के लोग, 18 वर्ष से कम उम्र के वे लोग जिन्हें लंबे समय के लिये एसप्रिन दी जा रही है, गर्भवती महिलायें, ऐसे लोग जो किसी भी पुरानी बीमारी ( जैसे कि श्वास-प्रणाली से संबंधित---इस में दमा रोग भी शामिल है, मधुमेह, दिल के किसी रोग, लिवर के रोग, गुर्दे के रोग आदि से पहले से जूझ रहे हैं, जिन लोगों की इम्यूनिटि ( रोग प्रतिरोधक क्षमता) पहले ही से किसी कारण वश बैठी हुई है ---चाहे यह कुछ दवाईयों के असर से हो या फिर कुछ रोगों की वजह से जिनमें एच-आई-व्ही संक्रमण शामिल है।


सी.डी.सी की सिफारिशों के अनुसार अगर नॉन-रिस्क श्रेणी के लोगों में कोई फ्लू जैसे लक्षण नहीं हैं तो उन्हें फेस-मास्क लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन अगर कोई हाई-रिस्क श्रेणी वाला बंदा किसी भीड़-भाड़ वाले एरिया में जा रहा है तो उसे मास्क ज़रूर लगा लेना चाहिये और जहां तक हो सके उसे इस तरह के एरिया में जाने से बचे ही रहना चाहिये।


और दूसरी विशेष बात यह है कि जो लोग हाई-रिस्क में आते हैं उन्हें फ्लू-जैसी बीमारी ( नोट करें कि यहां भी स्वाईन-फ्लू नहीं बल्कि फ्लू जैसी बीमारी ही कहा गया है ---क्योंकि टैस्ट नहीं हुआ है) से ग्रस्त परिवार जनों की देखभाल से थोड़ा बच कर रहना चाहिये ---- अकसर यह संभव नहीं होता, ऐसे में वे हाई-रिस्क व्यक्ति जो केयर दे रहे हैं उन्हें फेस-मास्क लगा लेना चाहिये।


और जहां तक चिकित्सा कर्मीयों का संबंध है जो कि फ्लू जैसी बीमारी या स्वाईन-फ्लू जैसी बीमारी से ग्रस्त पब्लिक के इलाज में लगे हुये हैं उन्हें तो N95 जैसा फेस-मास्क पहन कर ही रखना चाहिये और यह सिफारिश उन हैल्थ-कर्मियों के लिये है जिन्हें कोई दूसरी शारीरिक व्याधि नहीं है अर्थात् वे हाई-रिस्क श्रेणी में नहीं आते । जो हैल्थ-कर्मी स्वयं हाई-रिस्क श्रेणी में आते हैं उन के लिये तो बताया गया है कि अगर हो सके तो उन की सेवायें उन्हें उस कार्य-क्षेत्र से थोड़ा हटा कर लेनी चाहिये ---- और वे चिकित्सा के जिस भी कार्य-क्षेत्र में काम करें उन्हें N95 जैसे फेस-मास्क पहने रखना चाहिये।


और जिन लोगों में स्वाईन-फ्लू जैसी बीमारी होने का शक हो या जिन में यह बीमारी कंफर्म है उन्हें तो जहां तक हो सके फेस-मास्क पहन कर ही रखना चाहिये । इस बीमारी से ग्रस्त महिलायें भी स्तन-पान करवाते समय फेस-मास्क अवश्य पहनें।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

स्वाईन-फ्लू ---वैसे आंकड़े तो बस आंकड़े ही हैं !!


मुझे किसी भी बीमारी के आंकड़े बहुत अजीब से लगते हैं ---कितना आसान है किसी अखबार में या टीवी में यह दिखा देना कि इस बीमारी से रोज़ाना दो मौतें हो रही हैं जब कि टीबी से हर मिनट में दो मौतें, दिल की बीमारी से दिन में 6301 मौतें, मधुमेह से 5479 मौतें, धूम्रपान/तंबाकू की वजह से 2740 मौतें, कैंसर से 1507 मौतें हो जाती है-----यह सब कह कर शायद लोगों को समझाने बुझाने की कोशिश की जाती है।


लेकिन मैं कभी भी इन आंकड़ों से प्रभावित कम ही होता हूं ---मुझे लगता है कि जिन दूसरी बीमारियों की वजह से होने वाली हम हज़ारों मौतें गिनाते हैं, उन की बात अलग है, वे बहुत हद तक लोगों की जीवन-शैली से संबंधित हैं, दारू पीने वाला जानता है कि वह अपना लिवर खराब कर रहा है, तंबाकू इस्तेमाल करने वाला भी बहुत कुछ पहले से जानता है ----और दूसरी बात यह कि ये लोग अकसर अचानक ही तो लुप्त नहीं हो जाते---अकसर तिल तिल मरते हैं, है कि नहीं ? इसलिये परिवार वालों को भी अपने मन को समझाने का अच्छा खासा टाइम मिल ही जाता है।


लेकिन आप देखिये कि यह जो नया फ्लू आया है ----बैठे बैठे अचानक किसी के घर का कोई सदस्य –छोटा हो या बड़ा अगर इस की चपेट में आ जाये और कुछ ही दिनों में उस का नंबर आ जाये तो सारे परिवार के लिये कितने सदमे की बात है। शायद इस का अनुभव किसी दूसरे के लिये लगाना मुमकिन नहीं होगा। आंकड़े कुछ भी चीख-चिल्ला रहे हों, लेकिन उस परिवार के लिये तो आंकड़े 100 प्रतिशत हो गये कि नहीं ?


आंकड़ों की बात छिड़ी है तो मैं आज के दा हिंदु में स्वाईन-फ्लू से संबंधित एक ग्राफिक देख कर बड़ा हैरान परेशान हूं--- उस का सोर्स वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाईज़ेशन बताया गया है ---- आप के साथ मैं वहां दी गई सूचना साझी कर रहा हूं --


बीते समय में हो चुके फ्लू पैनडैमिक ( past flu pandemics) ---
सन 1918 – स्पैनिश फ्लू --- 200-400लाख मौतें
सन 1957- ऐशियन फ्लू ---- 10- 40 लाख मौतें
सन 1968- हांग-कांग फ्लू ---- 10—40 लाख मौतें


वैसे यह फ्लू की विभिन्न महांमारियों के दौरान हुई मौतों की गिनती की रेंज मेरी समझ में नहीं आई , 200से 400 लाख मौतें ----इतना जबरदस्त अंदाज़ा। बहरहाल, आप देखिये कि 1918 के 40-50 साल के बाद जो फ्लू की महांमारियां फैलीं उन में हुई मौतों की संख्या पहली महांमारी के मुकाबले लगभग पांच फीसदी ही रहीं।


इस से हमें और भी आशा बंधती है --- क्योंकि 1957 और 1968 का दौर भी वह दौर था जब डॉयग्नोसिस एवं उपचार के क्षेत्र में इतनी उन्नति नहीं हुई थी ---आज तो हम लोग टैस्टिंग की बात कर रहे हैं, वायरस को खत्म कर देने वाली दवाईयां हमारे पास हैं, वायरस से होने वाली बीमारियों के बेसिक फंडे हम समझ चुके हैं, जन-संचार के माध्यमों ने जबरदस्त तरक्की की है, लेकिन इस के साथ ही साथ हम ने अपने पर्यावरण को भी तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जो कि इस तरह के नये नये जीवाणुओं को पैदा करने के लिये एवं पनपने हेतु एक सुनहरा मौका देती है ------अब इन सब का क्या परिणाम होगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।


घबराने वाली तो कोई बात है ही नहीं, बस कुछ ज़रूरत बातें समझ लेने के बाद मानने की बात है। जो भी है, महांमारी तो अब बिना फैल ही रही है---- फ्लू की जितनी पुरानी महांमारियां हुई हैं उन में फ्लू फैलने वाली वायरसों को जितना फैलने में छः महीने लगे थे उतना तो यह एच1एन1 वॉयरस छः हफ्तों में ही फैल चुकी है।

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

स्वाइन-फ्लू --- बचने के लिये ज़्यादा लंबे-चौड़े लफड़े में क्या पड़ना !

मैंने एक बार कहीं पढ़ा था कि ज़िंदगी में जो चीज़ें बेहद आवश्यक एवं महत्वपूर्ण होती हैं वे अत्यधिक साधारण होती हैं, और जो चीज़ें इतनी ज़्यादा अहम् होती हैं कि जिन के बिना रहा ही नहीं जा सके, वे तो हमें मुफ्त में ही मिलती हैं---जैसे कि हवा, सूर्य की रोशनी, पानी आदि। तो भी ये सब चीज़ें तो प्रकृत्ति के वरदान ही हैं। लेकिन हमारे लालच ने इन का भी इतना शोषण किया है कि अब ये भी बगावत पर उतारू हो गये हैं।

नतीजा यह है कि स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी एक महमारी के रूप में हमारे सामने है। एक नैचुरल सी बात है कि इस महामारी के बारे में इतनी सारी खबरें आ रही हैं कि किसी भी आदमी का सिर चकरा जाए। कुछ को तो यही लग रहा है कि जो लोग महंगे महंगे टैस्ट करवा लेंगे और हर समय मास्क पहने रखेंगे, वे इस के प्रकोप से बच जायेंगे। लेकिन ऐसी बात नहीं है, यह बीमारी भी अमीर-गरीब में कोई फर्क नहीं रखती । कुछ बातें केवल मन को तसल्ली देने का काम ज़रूर कर लेती हैं।

महांमारी तो अब आ ही गई है, आगे चल कर यह क्या रूप अख्तियार करेगी, इस रहस्य का जवाब तो समय की कोख में छुपा हुआ है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर लग रहा है कि इस महांमारी का जो खौफ़ पैदा हो गया है आने वाले समय में वह मार्कीट में कुछ वस्तुओं का बाज़ार ज़रूर गर्म कर देगा।

मैं पढ़ रहा था कि अगर फलां-फलां तरह के साबुन से हाथ धोयें जायें या ऐसे हैंड-रब का इस्तेमाल किया जाये तो इस से बचा जा सकता है। सोच रहा हूं कि क्या लोगों को इस तरह की सलाह दी जाये और अगर सलाह दी भी जाये तो क्या वे इस को मान लेंगे। कहां से मान लेंगे ? ---- उन की दूसरी प्राथमिकतायें भी तो हैं ( मेरी मां का दो दिन पहले रोहतक से फोन आया कि मेरा भाई चार-छः दुकानों पर पता कर आया है, चीनी नहीं मिल रही , इसलिये गुड़ की चाय पी रहे हैं !!)---- जिस देश के करोड़ों लोगों को नहाने के लिये अंग्रेज़ी क्या कपड़े धोने वाला साबुन भी उपलब्ध नहीं है और करोड़ों ऐसे लोग जो हाथ धोने के लिये मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कैसे आप कह सकते हैं कि अब अगर आपने स्वाईन-फ्लू से बचना है तो फलां फलां साबुन खरीद लो।----करोड़ों लोगों के लिये बस यह एक शायद खोखली सी सलाह ही होगी क्योंकि चाह कर भी वे यह सब खर्च नहीं कर पाते।

जहां तक मेरी समझ है कि साबुन कोई भी हो लेकिन अगर इसी महांमारी के बहाने ही सही हमारा देश खांसना और छींकना सीख जाये तो भी बचाव ही बचाव है। हज़ार में से एक ने अगर मास्क खरीद भी लिया तो भी क्या यह महांमारी रूक जायेगी।

इस महांमारी का हम सब को मिल जुल कर सामना करना होगा ---- यह नहीं कि डा चोपड़ा तो घर में बहुत ही महंगे साबुन इस्तेमाल कर लेगा, अल्होकल युक्त हैंड-रब भी खरीद कर लेकर आयेगा, ज़रूरत पड़ने पर फेस-मास्क भी मिल ही जायेंगे, इसलिये उसे दूसरों के साथ क्या। शायद उसे दूसरों के साथ कोई सरोकार न होता अगर वह अपने किसी प्राइवेट प्लेनेट पर रह रहा होता और उसे हर समय अपने ही घर में रहना होता, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसे भी दिन में 10-12 घंटे पब्लिक के बीच ही रहना है, उन के बीच ही रहना है, सांस भी वहीं लेना है, बैंक एवं डाकखाने की लाइन में खड़े भी होना है, ठसाठस भरी बस में भी यात्रा करनी है, उस के बच्चों ने भी स्कूल जाना है, सब के साथ मिक्स होना है------------तो, फिर बात वहां पर आकर खत्म होती है कि यह महांमारी किसी एक बंदे के द्वारा सारी सावधानियां बरत लेने से थमने वाली नहीं।

हमें पब्लिक को सचेत करना होगा कि मास्क नहीं है तो कोई गम नहीं है, ज़रूरत पड़ने पर आप अपने रूमाल को ही मास्क की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं और फिर उसे अच्छी तरह धो सकते हैं। बहुत से स्कूलों के बच्चों की जेब में रूमाल ही नहीं होता, उन्हें यह बताने का यह एक उचित अवसर है कि रूमाल रखने से कैसे आप की अपनी सेहत की ही रक्षा होती है। और खास बात और कि ज़रूरी नहीं सारे बच्चे बाज़ार से ही रूमाल खरीदें, आखिर घर में बने किसी रूमाल में या अगर रूमाल नहीं भी है तो किसी साफ़,सुथरे सूती कपड़ा का स्कूली बच्चों द्वारा रूमाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तो इस में क्या बुराई है !!

अब तो प्राइवेट अस्पतालों को भी स्वाईन फ्लू टैस्टिंग की एवं इलाज की अनुमति मिल गई है, इसलिये मुझे लगता है कि बहुत से अस्पताल तो इस से संबंधित विज्ञापन भी समाचार-पत्रों में जारी करने की तैयारी में जुटे होंगे। देखते हैं आने वाले समय में स्वाईन-फ्लू की टैस्टिंग के लिये कैसी होड़ लगती है।

और एक बेहद ज़रूरी बात यह भी है कि जहां तक हो सके अपनी इम्यूनिटी को बढ़ाने की चेष्टा करनी चाहिये ---अगर वॉयरस शरीर में चली भी जाये तो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता ही उसे धर-दबोचे। और इस के लिये सात्विक आहार लेना होगा जो संतुलित भी हो, उपर्युक्त मात्रा में पानी पीना चाहिये और इन सब से बहुत ज़रूरी है कि कम से कम अब तो प्राणायाम् करना शुरू कर लिया जाये।

बस, इतना कुछ ही कर लें। और कर भी क्या सकते हैं। मैं भी घर में मौजूद साधारण साबुन ही इस्तेमाल कर रहा हूं , लेकिन बार बार हाथ धो लेने में कभी भी आलस नहीं करता हूं -------लेकिन इस महांमारी की वजह से अब अपने एवं दूसरों के खांसने-छींकने के बारे में ज़्यादा सचेत रहना होगा ----- इस के अलावा कोई चारा भी तो नहीं होगा। बस, जो कुछ सहज-स्वभाव से बचाव के लिये कर पायें, बिल्कुल ठीक है, बाकी इस प्रभु पर छोड़ दें, जो भी होगा अच्छा ही होगा !!a