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Wednesday, September 9, 2009

तीस तरह के स्वाईन-फ्लू के वैक्सीन

चीन में सब से पहले स्वाईन-फ्लू का वैक्सीन तैयार हो चुका है और इसी हफ्ते से वहां पर लोगों को यह लगाना शूरू कर दिया जायेगा। वहां पर स्वाईन-फ्लू की स्थिति काफ़ी चिंताजनक है।
चीन में 1 अक्टूबर को उन का नैशनल डे ( National Day) है जिस में लाखों लोग शिरकत करते हैं और उस समारोह में बड़ी बड़ी हस्तियां भी मौजूद रहेंगी –इसलिये किसी तरह का रिस्क नहीं लिया जा सकता।
कल हम लोग वैक्सीन के इस्तेमाल के लिये विभिन्न देशों की अपनी अपनी प्राथमिकताओं की बात कर रहे थे --- चीन ने भी यह निर्णय़ लिया है कि इसी हफ्ते से उन दो लाख के करीब लोगों की वैक्सीन लगा दिया जाये जिन्हें चीनी नेशनल डे समारोह के कार्यक्रम में भाग लेना है।
ये वैक्सीन बनते कैसे हैं ?
मुख्यतः इस तरह का वैक्सीन तैयार करने के लिये वायरस को मुर्गी के अंडे में डाला जाता है और कुछ दिनों पश्चात उस के अंदर से तरल पदार्थ निकाल कर उसे शूद्ध कर लिया जाता है।
The main method is by injecting seed virus into embryonic chicken eggs and harvesting the fluid after several days and purifying it.
वैसे तो वैक्सीन बनाने की दो विधियां हैं--- 90प्रतिशत से भी ज़्यादा इंफ्लूऐंजा वैक्सीन इनऐक्टिवेटिड वैक्सीन ( “inactivated vaccines”) होते हैं –इस का मतलब यह है कि इस तरह का वैक्सीन मृत वायरस से तैयार होता है।
दूसरे तरह के वैक्सीन होते हैं लाइव-एटैनूएटेड ( “live attenuated vaccines) जिन्हें ऐसी एनफ्लुएंजा वॉयरस से बनाया जाता है जो कमज़ोर पड़ी होती है लेकिन मृत नहीं होती।
स्वाईन-फ्लू के तीस तरह के वैक्सीन
लगभग तीस तरह के वैक्सीन तैयार हो रहे हैं। जैसा कि पहले ही कहा गया है कि अधिकतर तो इनऐक्टिवेटिड वैक्सीन ही होंगे। यह जो तरह तरह के वैक्सीन तैयार हो रहे हैं इन को शुद्ध करने की प्रक्रिया अलग अलग है और कुछ में एक एडिटिव ( जिसे एडजुवेंट भी कहा जाता है) भी डाला जाता है ।
इस एडजुवेंट के रहने से वैक्सीन के द्वारा शरीर में ऐंटीबाडीज़ तैयार करने की शक्ति बढ़ जाती है और इसे किल्ड-वैक्सीन ( killed vaccines) में डाला जाता है।
वैक्सीन का दाम
इस वैक्सीन को बनाने वाली कंपनियां विभिन्न देशों के लिये अलग अलग दाम तय करेंगी। अमीर मुल्कों को इस की एक खुराक के लिये 10 से 20 यूएस डालर खर्च करने होंगे जब कि मध्यम वर्गीय देशों को इस का आधा दाम ही भरना होगा। और गरीब मुल्कों को तो उस से भी आधी कीमत में ये वैक्सीन उपलब्ध हो जायेंगे।

इस में तो कोई शक ही नहीं कि किसी देश के भी सभी लोगों को यह वैक्सीन लग नहीं पायेगा। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि जनता इस वैक्सीन से हिप्नोटाईज़ ही हो जाये।
वैक्सीन के अलावा भी बहुत सी ऐसी सावधानियां भी तो हैं जिन के द्वारा इस बीमारी से बचा जा सकता है ---जैसे कि लोगों द्वारा आपस में मिलते समय उपर्युक्त दूरी बनाये ( किस को मिस करने का मशवरा !) रखना, किसी एरिया में जब यह ज़्यादा फैल रहा हो तो वहां के स्कूल बंद कर देना, ज़्यादा भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जाने से गुरेज करना, ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां और अपनी साफ़-सफ़ाई का पूरा पूरा ध्यान रखना।
किसी भी देश की सारी जनता को यह वैक्सीन दो बार लगाया जा सके, यह अभी तो बिल्कुल असंभव सी बात है।
संबंधित पोस्टें
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Tuesday, September 8, 2009

स्वाईन-फ्लू से बचाव का टीका


स्वाईन-फ्लू से बचाव का टीका इसी महीने में आ जाने की संभावना है। वल्र्ड हैल्थ आर्गेनाइज़ेशन के अनुसार अब तक तो इस महामारी का प्रकोप मद्दम सा ही रहा है लेकिन आगे जैसे सर्दी का मौसम दस्तक दे रहा है इस महामारी के वॉयरस के अपना रूप बदलने के आसार है ( mutation of the virus) जिस से यह बीमारी उग्र रूप धारण कर सकती है। लेकिन इस में घबराने की कोई बात नहीं है क्योंकि ये सब अनुमान ही है।
क्या यह टीका बाज़ार से खरीदा जा सकेगा ?
शुक्र है कि यह टीका किसी व्यक्ति द्वारा बाज़ार से खरीदा नहीं जा सकेगा, वरना जिस की पहुंच होती वह तो इसे लगवा लेता और जिन लोगों को यह टीका लगना बहुत ही ज़रूरी होता वे इस से वंचित ही रह जाते।
इस टीके के बारे में विभिन्न देशों की सरकारें यह तय करेंगी कि यह उस देश में किन किन लोगों को सब से पहले लगना है।
सभी देशों की सब से पहले प्राथमिकता तो होगी वहां के स्वास्थ्य वर्कर ताकि जिन लोगों ने इस बीमारी से ग्रस्त लोगों की देखभाल करनी है वे स्वयं तो तंदरूस्त रहें।
वैसे कुछ देश यह निर्णय ले सकते हैं कि यह टीका उपलब्ध होते ही छोटे छोटे स्कूल के बच्चों को एवं उन बच्चों को जो अभी प्री-स्कूल में हैं यह टीका लगा दिया जाये क्योंकि ये बच्चे आपस में ज़्यादा सटे रहते हैं।
कुछ देश वहां की गर्भवती महिलायों को सब से पहले सुरक्षा प्रदान करने का निर्णय ले सकते हैं।
जो भी हो, यह सब कुछ टीकों की उपलब्धता पर निर्भर करता है ---समृद्ध देशों ने तो अपने सारे लोगों को टीका लगाने की स्कीम तैयार की हुई है जब कि मध्यम वर्गीय देशों ने 1% से 15-20% लोगों के लिये ही टीके की स्कीम बनाई है।
ऐसा भी नहीं है कि जिन अमीर मुल्कों ने अपनी सारी जनसंख्या को इस से बचा लेने का मनसूबा बनाया हुया है, उन्हें शुरू में ही ऐसा करने का अवसर नहीं मिल पायेगा।
इन टीकों की भी पूरी वैरायिटि है
शायद आप को यह जानकर हैरानगी हो कि तीस तरह के टीके स्वाईन-फ्लू से बचाव के तैयार हो रहे हैं। अब यह सब कैसे हो रहा है, कैसे होते हैं ये तैयार और इन का दाम सरकार को कितना पड़ेगा, इस के बारे मे अगली पोस्ट में बात करेंगे। और यह भी चर्चा करेंगे कि अगर विकासशील देशों को इस की उपर्युक्त खराकें न मिल पाईं तो क्या होगा ?
इसे भी ज़रूर देखें ...
महामारी अब, वैक्सीन सितंबर में

Saturday, August 15, 2009

स्वाईन-फ्लू ---- फेस मास्क किन लोगों के लिये है ?


आज कल अखबार में या टीवी चैनलों पर फेस-मास्क के बारे में इतना कुछ दिख रहा है कि दर्शक तो यह सब देख कर चकरा गया है । इतनी बातें सुनने देखने के बाद भी लोग शायद निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि वे मास्क पहनें कि नहीं !! ऐसे अवसर पर अमेरिकी सैंटर ऑफ डिसीज़ कंट्रोल की सिफारिशों का ध्यान अवश्य कर लेना चाहिये क्योंकि यह एक अत्यंत विश्वसनीय साइट है और जो यह कह रहे हैं उस पर आप बिना किसी ज़्यादा सोच-विचार के विश्वास कर सकते हैं।


इन की वेबसाइट पर इन्होंने इस बात का जवाब देने के लिये जनता को दो हिस्सों में बांटा है ---वो लोग जिन्हें बीमारी नहीं है और वे लोग जो बीमारी से जूझ रहे हैं। और एक विशेष बात यह है कि जब यह संस्था फेस-मॉस्क के बारे में कुछ सिफारिश कर रही है तो यह नहीं कह रही कि वे लोग जिन्हें स्वाईन-फ्लू है या नहीं है, बल्कि यह कहा जा रहा है कि जिन लोगों को फ्लृ-जैसी बीमारी है या नहीं है, यह कहना यहां ज़रूरी था क्योंकि नोट करने वाली बात यह है कि फ्लू-जैसी बीमारी तो किसी को मौसमी फ्लू की वजह से भी हो सकती है क्योंकि स्वाईन-फ्लू का तो तब चलेगा जब ज़रूरत पड़ने पर टैस्ट वैस्ट किये जायेंगे। इसलिये ऐसे लोगों के लिये भी फिलहाल फेस-मास्क से संबंधित वही सब सिफारिशें माननी होंगी जो कि बीमारी( फ्लू जैसी बीमारी --- influenza like illness) से जूझ रहे लोगों के लिये मान्य होंगी।


आज कि चर्चा करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि स्वाईन-फ्लू के लिये कुछ लोगों को हाई-रिस्क माना गया है जिन में इस बीमारी के होने का खतरा दूसरे सामान्य लोगों की बजाये ज़्यादा होता है । ये हाई-रिस्क वाले लोग हैं ------पांच साल से कम उम्र के बच्चे, 65 वर्ष से ज़्यादा उम्र के लोग, 18 वर्ष से कम उम्र के वे लोग जिन्हें लंबे समय के लिये एसप्रिन दी जा रही है, गर्भवती महिलायें, ऐसे लोग जो किसी भी पुरानी बीमारी ( जैसे कि श्वास-प्रणाली से संबंधित---इस में दमा रोग भी शामिल है, मधुमेह, दिल के किसी रोग, लिवर के रोग, गुर्दे के रोग आदि से पहले से जूझ रहे हैं, जिन लोगों की इम्यूनिटि ( रोग प्रतिरोधक क्षमता) पहले ही से किसी कारण वश बैठी हुई है ---चाहे यह कुछ दवाईयों के असर से हो या फिर कुछ रोगों की वजह से जिनमें एच-आई-व्ही संक्रमण शामिल है।


सी.डी.सी की सिफारिशों के अनुसार अगर नॉन-रिस्क श्रेणी के लोगों में कोई फ्लू जैसे लक्षण नहीं हैं तो उन्हें फेस-मास्क लगाने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन अगर कोई हाई-रिस्क श्रेणी वाला बंदा किसी भीड़-भाड़ वाले एरिया में जा रहा है तो उसे मास्क ज़रूर लगा लेना चाहिये और जहां तक हो सके उसे इस तरह के एरिया में जाने से बचे ही रहना चाहिये।


और दूसरी विशेष बात यह है कि जो लोग हाई-रिस्क में आते हैं उन्हें फ्लू-जैसी बीमारी ( नोट करें कि यहां भी स्वाईन-फ्लू नहीं बल्कि फ्लू जैसी बीमारी ही कहा गया है ---क्योंकि टैस्ट नहीं हुआ है) से ग्रस्त परिवार जनों की देखभाल से थोड़ा बच कर रहना चाहिये ---- अकसर यह संभव नहीं होता, ऐसे में वे हाई-रिस्क व्यक्ति जो केयर दे रहे हैं उन्हें फेस-मास्क लगा लेना चाहिये।


और जहां तक चिकित्सा कर्मीयों का संबंध है जो कि फ्लू जैसी बीमारी या स्वाईन-फ्लू जैसी बीमारी से ग्रस्त पब्लिक के इलाज में लगे हुये हैं उन्हें तो N95 जैसा फेस-मास्क पहन कर ही रखना चाहिये और यह सिफारिश उन हैल्थ-कर्मियों के लिये है जिन्हें कोई दूसरी शारीरिक व्याधि नहीं है अर्थात् वे हाई-रिस्क श्रेणी में नहीं आते । जो हैल्थ-कर्मी स्वयं हाई-रिस्क श्रेणी में आते हैं उन के लिये तो बताया गया है कि अगर हो सके तो उन की सेवायें उन्हें उस कार्य-क्षेत्र से थोड़ा हटा कर लेनी चाहिये ---- और वे चिकित्सा के जिस भी कार्य-क्षेत्र में काम करें उन्हें N95 जैसे फेस-मास्क पहने रखना चाहिये।


और जिन लोगों में स्वाईन-फ्लू जैसी बीमारी होने का शक हो या जिन में यह बीमारी कंफर्म है उन्हें तो जहां तक हो सके फेस-मास्क पहन कर ही रखना चाहिये । इस बीमारी से ग्रस्त महिलायें भी स्तन-पान करवाते समय फेस-मास्क अवश्य पहनें।

Friday, August 14, 2009

स्वाईन-फ्लू ---वैसे आंकड़े तो बस आंकड़े ही हैं !!


मुझे किसी भी बीमारी के आंकड़े बहुत अजीब से लगते हैं ---कितना आसान है किसी अखबार में या टीवी में यह दिखा देना कि इस बीमारी से रोज़ाना दो मौतें हो रही हैं जब कि टीबी से हर मिनट में दो मौतें, दिल की बीमारी से दिन में 6301 मौतें, मधुमेह से 5479 मौतें, धूम्रपान/तंबाकू की वजह से 2740 मौतें, कैंसर से 1507 मौतें हो जाती है-----यह सब कह कर शायद लोगों को समझाने बुझाने की कोशिश की जाती है।


लेकिन मैं कभी भी इन आंकड़ों से प्रभावित कम ही होता हूं ---मुझे लगता है कि जिन दूसरी बीमारियों की वजह से होने वाली हम हज़ारों मौतें गिनाते हैं, उन की बात अलग है, वे बहुत हद तक लोगों की जीवन-शैली से संबंधित हैं, दारू पीने वाला जानता है कि वह अपना लिवर खराब कर रहा है, तंबाकू इस्तेमाल करने वाला भी बहुत कुछ पहले से जानता है ----और दूसरी बात यह कि ये लोग अकसर अचानक ही तो लुप्त नहीं हो जाते---अकसर तिल तिल मरते हैं, है कि नहीं ? इसलिये परिवार वालों को भी अपने मन को समझाने का अच्छा खासा टाइम मिल ही जाता है।


लेकिन आप देखिये कि यह जो नया फ्लू आया है ----बैठे बैठे अचानक किसी के घर का कोई सदस्य –छोटा हो या बड़ा अगर इस की चपेट में आ जाये और कुछ ही दिनों में उस का नंबर आ जाये तो सारे परिवार के लिये कितने सदमे की बात है। शायद इस का अनुभव किसी दूसरे के लिये लगाना मुमकिन नहीं होगा। आंकड़े कुछ भी चीख-चिल्ला रहे हों, लेकिन उस परिवार के लिये तो आंकड़े 100 प्रतिशत हो गये कि नहीं ?


आंकड़ों की बात छिड़ी है तो मैं आज के दा हिंदु में स्वाईन-फ्लू से संबंधित एक ग्राफिक देख कर बड़ा हैरान परेशान हूं--- उस का सोर्स वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाईज़ेशन बताया गया है ---- आप के साथ मैं वहां दी गई सूचना साझी कर रहा हूं --


बीते समय में हो चुके फ्लू पैनडैमिक ( past flu pandemics) ---
सन 1918 – स्पैनिश फ्लू --- 200-400लाख मौतें
सन 1957- ऐशियन फ्लू ---- 10- 40 लाख मौतें
सन 1968- हांग-कांग फ्लू ---- 10—40 लाख मौतें


वैसे यह फ्लू की विभिन्न महांमारियों के दौरान हुई मौतों की गिनती की रेंज मेरी समझ में नहीं आई , 200से 400 लाख मौतें ----इतना जबरदस्त अंदाज़ा। बहरहाल, आप देखिये कि 1918 के 40-50 साल के बाद जो फ्लू की महांमारियां फैलीं उन में हुई मौतों की संख्या पहली महांमारी के मुकाबले लगभग पांच फीसदी ही रहीं।


इस से हमें और भी आशा बंधती है --- क्योंकि 1957 और 1968 का दौर भी वह दौर था जब डॉयग्नोसिस एवं उपचार के क्षेत्र में इतनी उन्नति नहीं हुई थी ---आज तो हम लोग टैस्टिंग की बात कर रहे हैं, वायरस को खत्म कर देने वाली दवाईयां हमारे पास हैं, वायरस से होने वाली बीमारियों के बेसिक फंडे हम समझ चुके हैं, जन-संचार के माध्यमों ने जबरदस्त तरक्की की है, लेकिन इस के साथ ही साथ हम ने अपने पर्यावरण को भी तहस-नहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जो कि इस तरह के नये नये जीवाणुओं को पैदा करने के लिये एवं पनपने हेतु एक सुनहरा मौका देती है ------अब इन सब का क्या परिणाम होगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।


घबराने वाली तो कोई बात है ही नहीं, बस कुछ ज़रूरत बातें समझ लेने के बाद मानने की बात है। जो भी है, महांमारी तो अब बिना फैल ही रही है---- फ्लू की जितनी पुरानी महांमारियां हुई हैं उन में फ्लू फैलने वाली वायरसों को जितना फैलने में छः महीने लगे थे उतना तो यह एच1एन1 वॉयरस छः हफ्तों में ही फैल चुकी है।

Tuesday, August 11, 2009

स्वाइन-फ्लू --- बचने के लिये ज़्यादा लंबे-चौड़े लफड़े में क्या पड़ना !

मैंने एक बार कहीं पढ़ा था कि ज़िंदगी में जो चीज़ें बेहद आवश्यक एवं महत्वपूर्ण होती हैं वे अत्यधिक साधारण होती हैं, और जो चीज़ें इतनी ज़्यादा अहम् होती हैं कि जिन के बिना रहा ही नहीं जा सके, वे तो हमें मुफ्त में ही मिलती हैं---जैसे कि हवा, सूर्य की रोशनी, पानी आदि। तो भी ये सब चीज़ें तो प्रकृत्ति के वरदान ही हैं। लेकिन हमारे लालच ने इन का भी इतना शोषण किया है कि अब ये भी बगावत पर उतारू हो गये हैं।

नतीजा यह है कि स्वाइन फ्लू जैसी बीमारी एक महमारी के रूप में हमारे सामने है। एक नैचुरल सी बात है कि इस महामारी के बारे में इतनी सारी खबरें आ रही हैं कि किसी भी आदमी का सिर चकरा जाए। कुछ को तो यही लग रहा है कि जो लोग महंगे महंगे टैस्ट करवा लेंगे और हर समय मास्क पहने रखेंगे, वे इस के प्रकोप से बच जायेंगे। लेकिन ऐसी बात नहीं है, यह बीमारी भी अमीर-गरीब में कोई फर्क नहीं रखती । कुछ बातें केवल मन को तसल्ली देने का काम ज़रूर कर लेती हैं।

महांमारी तो अब आ ही गई है, आगे चल कर यह क्या रूप अख्तियार करेगी, इस रहस्य का जवाब तो समय की कोख में छुपा हुआ है। लेकिन इतना मुझे ज़रूर लग रहा है कि इस महांमारी का जो खौफ़ पैदा हो गया है आने वाले समय में वह मार्कीट में कुछ वस्तुओं का बाज़ार ज़रूर गर्म कर देगा।

मैं पढ़ रहा था कि अगर फलां-फलां तरह के साबुन से हाथ धोयें जायें या ऐसे हैंड-रब का इस्तेमाल किया जाये तो इस से बचा जा सकता है। सोच रहा हूं कि क्या लोगों को इस तरह की सलाह दी जाये और अगर सलाह दी भी जाये तो क्या वे इस को मान लेंगे। कहां से मान लेंगे ? ---- उन की दूसरी प्राथमिकतायें भी तो हैं ( मेरी मां का दो दिन पहले रोहतक से फोन आया कि मेरा भाई चार-छः दुकानों पर पता कर आया है, चीनी नहीं मिल रही , इसलिये गुड़ की चाय पी रहे हैं !!)---- जिस देश के करोड़ों लोगों को नहाने के लिये अंग्रेज़ी क्या कपड़े धोने वाला साबुन भी उपलब्ध नहीं है और करोड़ों ऐसे लोग जो हाथ धोने के लिये मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें कैसे आप कह सकते हैं कि अब अगर आपने स्वाईन-फ्लू से बचना है तो फलां फलां साबुन खरीद लो।----करोड़ों लोगों के लिये बस यह एक शायद खोखली सी सलाह ही होगी क्योंकि चाह कर भी वे यह सब खर्च नहीं कर पाते।

जहां तक मेरी समझ है कि साबुन कोई भी हो लेकिन अगर इसी महांमारी के बहाने ही सही हमारा देश खांसना और छींकना सीख जाये तो भी बचाव ही बचाव है। हज़ार में से एक ने अगर मास्क खरीद भी लिया तो भी क्या यह महांमारी रूक जायेगी।

इस महांमारी का हम सब को मिल जुल कर सामना करना होगा ---- यह नहीं कि डा चोपड़ा तो घर में बहुत ही महंगे साबुन इस्तेमाल कर लेगा, अल्होकल युक्त हैंड-रब भी खरीद कर लेकर आयेगा, ज़रूरत पड़ने पर फेस-मास्क भी मिल ही जायेंगे, इसलिये उसे दूसरों के साथ क्या। शायद उसे दूसरों के साथ कोई सरोकार न होता अगर वह अपने किसी प्राइवेट प्लेनेट पर रह रहा होता और उसे हर समय अपने ही घर में रहना होता, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसे भी दिन में 10-12 घंटे पब्लिक के बीच ही रहना है, उन के बीच ही रहना है, सांस भी वहीं लेना है, बैंक एवं डाकखाने की लाइन में खड़े भी होना है, ठसाठस भरी बस में भी यात्रा करनी है, उस के बच्चों ने भी स्कूल जाना है, सब के साथ मिक्स होना है------------तो, फिर बात वहां पर आकर खत्म होती है कि यह महांमारी किसी एक बंदे के द्वारा सारी सावधानियां बरत लेने से थमने वाली नहीं।

हमें पब्लिक को सचेत करना होगा कि मास्क नहीं है तो कोई गम नहीं है, ज़रूरत पड़ने पर आप अपने रूमाल को ही मास्क की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं और फिर उसे अच्छी तरह धो सकते हैं। बहुत से स्कूलों के बच्चों की जेब में रूमाल ही नहीं होता, उन्हें यह बताने का यह एक उचित अवसर है कि रूमाल रखने से कैसे आप की अपनी सेहत की ही रक्षा होती है। और खास बात और कि ज़रूरी नहीं सारे बच्चे बाज़ार से ही रूमाल खरीदें, आखिर घर में बने किसी रूमाल में या अगर रूमाल नहीं भी है तो किसी साफ़,सुथरे सूती कपड़ा का स्कूली बच्चों द्वारा रूमाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तो इस में क्या बुराई है !!

अब तो प्राइवेट अस्पतालों को भी स्वाईन फ्लू टैस्टिंग की एवं इलाज की अनुमति मिल गई है, इसलिये मुझे लगता है कि बहुत से अस्पताल तो इस से संबंधित विज्ञापन भी समाचार-पत्रों में जारी करने की तैयारी में जुटे होंगे। देखते हैं आने वाले समय में स्वाईन-फ्लू की टैस्टिंग के लिये कैसी होड़ लगती है।

और एक बेहद ज़रूरी बात यह भी है कि जहां तक हो सके अपनी इम्यूनिटी को बढ़ाने की चेष्टा करनी चाहिये ---अगर वॉयरस शरीर में चली भी जाये तो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता ही उसे धर-दबोचे। और इस के लिये सात्विक आहार लेना होगा जो संतुलित भी हो, उपर्युक्त मात्रा में पानी पीना चाहिये और इन सब से बहुत ज़रूरी है कि कम से कम अब तो प्राणायाम् करना शुरू कर लिया जाये।

बस, इतना कुछ ही कर लें। और कर भी क्या सकते हैं। मैं भी घर में मौजूद साधारण साबुन ही इस्तेमाल कर रहा हूं , लेकिन बार बार हाथ धो लेने में कभी भी आलस नहीं करता हूं -------लेकिन इस महांमारी की वजह से अब अपने एवं दूसरों के खांसने-छींकने के बारे में ज़्यादा सचेत रहना होगा ----- इस के अलावा कोई चारा भी तो नहीं होगा। बस, जो कुछ सहज-स्वभाव से बचाव के लिये कर पायें, बिल्कुल ठीक है, बाकी इस प्रभु पर छोड़ दें, जो भी होगा अच्छा ही होगा !!a

स्वाईन फ्लू --- जितना हो सके बच लें।

स्वाईन फ्लू की खबरों से अखबारें भरी पड़ी हैं। आज ही के दा हिंदु के फ्रंट-पेज पर एक तस्वीर दिखी ---मुंबई के एक म्यूनीसिपल स्कूल की एक टीचर आठ-दस साल के बच्चों की क्लास ले रही है---सब बच्चों के साथ ही साथ टीचर जी ने र्भी स्वाईन-फ्लू से बचने के लिये मास्क पहना हुआ है।

यह तस्वीर बहुत अजीब सी लगी। वैसे भी टीवी चैनलों पर जो तस्वीरें दिखाई जा रही हैं उन में लोग बदहवास से मास्क लगाये हुये दिख रहे हैं। एकदम लगता है कि जैसे कि पैनिक सा फैल गया है।

लेकिन सोचने की बात है कि अंधाधुंध केवल मास्क पहन लेने से या थोड़ी बहुत गला खराब-खांसी, जुकाम, बुखार हो जाने पर और बिना टैस्ट करवाये ही टैमीफ्लू खा लेने से क्या सब ठीक हो जायेगा, यह महामारी रुक जायेगी क्या ?
वैसे तो स्वाईन-फ्लू का टैस्ट जितना महंगा है ( लगभग दस हज़ार रूपये ) उसे अभी तक तो कुछ चिंहित सरकारी संस्थानों में ही किया जाता रहा है लेकिन आज सरकार ने प्राइवेट संस्थानों को इस की टैस्टिंग की व इस के इलाज की अनुमति दे दी है।

इस में कोई शक नहीं कि इस स्वाईन-फ्लू ने एक महांमारी का रूप तो ले ही लिया है। लेकिन बार बार यह भी कहा जा रहा है कि घबराने की कोई बात नहीं ----केवल हमें बेसिक साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखना है। छींकने, खांसने का सलीका लोग अभी भी सीख लें तो इस बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है।

मैं कल कहीं पढ़ रहा था कि नाक साफ़ करने के लिये टिश्यू का इस्तेमाल करें और फिर इसे फैंक दें। कितने लोग हैं जो कि देश में नाक साफ़ करने के लिये टिश्यू का प्रयोग करते हैं ---- केवल अच्छी तरह से नाक साफ करन के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोने की बात बेहद ज़रूरी है।

जब से यह महांमारी के फैलने की खबरें आने लगी हैं, लगता है कि फेस-मास्क, तरह तरह के ऐंटीसैप्टिक साबुनों आदि की भी लाइनें लग जायेंगी।

वर्ल्ड हैल्थ आर्गेनाइज़ेशन ने स्वाईन-फ्लू से बचने के लिये जो दिशा-निर्देश जारी किये हैं उन में से कुछ इस प्रकार हैं --
---भीड़-भाड़ वाली जगहों पर जितना हो सके कम समय व्यतीत करें।
----घर दफ्तर की खिड़की वगैरा खोल कर रखें।
----अपने नाक और मुंह को छूने के बाद अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोएं।
----अगर आप स्वाईन-फ्लू से ग्रस्त किसी मरीज़ की देखभाल कर रहे हैं तो मास्क पहनें।
और कुछ बातें ना करने के लिये भी कहा गया है जैसे कि ---
---जिस व्यक्ति में इंफ्लूऐंजा जैसे लक्षण दिखें उस से कम से कम एक मीटर की दूरी अवश्य बनायें।
---बिना डाक्टरी सलाह के कोई भी वायरस-नाशक दवा जैसे कि टैमीफ्लू आदि लेनी शुरू न कर दें।
---अगर आप बीमार नहीं हैं तो मास्क मत पहनें।
---मास्क के गलत प्रयोग से बीमारी के फैलने में किसी तरह की सहायता मिलने की बजाये इस के और भी फैलने की आशंका बढ़ जाती है।

हां, अगर आप किसी ऐसी जगह पर हैं जहां पर इस बीमारी से ग्रस्त बहुत से लोग एक साथ इलाज आदि करवा रहे हैं तो मास्क पहन लेना चाहिये। अगर मास्क नहीं भी है तो इस काम के लिये एक बड़ा-सा रूमाल इस्तेमाल करने में क्या बुराई है।

सोच रहा हूं जो तस्वीर मैंने आज देखी उस में जो मास्क बच्चों ने लगा रखे थे वे उन्हें स्कूल द्वारा सप्लाई किये गये होंगे या उन्होंने उस के पैसे अपनी जेब से भरे होंगे, लेकिन एक बार मास्क लगा लेने में किसी चीज़ का हल भी तो नहीं है।

Saturday, June 13, 2009

फ्लू की महामारी अब, वैक्सीन सितंबर तक ----यह भी कोई बात है !

आज कल के अखबार पढ़ कर बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न अवश्य उठता होगा कि यार, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो एच1एन1फ्लू को एक महामारी घोषित कर दिया है लेकिन इस से बचाव के लिये टीका सितंबर तक आने की बातें हो रही है, कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि तब तक इस की विनाश लीला बेरोकटोक चलती रहेगी।

इस बात का उत्तर जानने के लिये कि इस के टीका सितंबर तक आने की बात क्या बार बार कही जा रही है, विभिन्न प्रकार के टीकों के बारे में थोडा़ ज्ञान होना ज़रूरी लगता है।

मोटे तौर पर वैक्सीन दो प्रकार के होते हैं --- लाइव वैक्सीन एवं किल्ड वैक्सीन --- अब देखते हैं कि क्यों इन वैक्सीन को जीवित वैक्सीन या मरा हुआ वैक्सीन कहा जाता है। यह अपने आप में बड़ा रोचक मुद्दा है जिसे हमें दूसरे साल में माइक्रोबॉयोलॉजी के विषय के अंतर्गत पढ़ाया जाता है।

तो सुनिये, सब से पहले तो यह कि इन वैक्सीन में रोग पैदा करने वाले विषाणु, कीटाणु अथवा वॉयरस ही होते हैं, यह क्या आप तो चौंक गये कि अब यह क्या नई मुसीबत है!! लेकिन इस में चौंकने की या भयभीत होने की रती भर भी बात नहीं है क्योंकि इन विषाणुओं, वॉयरस के पार्टिकल्ज़ के उस रूप को वैक्सीन में इस्तेमाल किया जाता है जिस के द्वारा वे किसी भी स्वस्थ व्यक्ति में रोग-प्रतिरोधक शक्ति तो पैदा कर दें लेकिन किसी भी हालत में रोग न पैदा कर सकें। ( हुन मैंनू ध्यान आ रिहै इस गल दा ---पंजाबी वीर चंगी तरह जानदे हन कि खस्सी कर देना ---बस समझ लओ मितरो कि एस वॉयरस नूं या जर्म नूं खस्सी ही कर दित्ता जांदा )।

Antigenicity- हां and Pathogenicity- ना, को समझ लें ? ---- ये दो परिभाषायें वैक्सीन के संदर्भ में वैज्ञानिक लोग अकसर इस्तेमाल करते हैं। पैथोजैनिसिटी से मतलब है कि कोई जीवाणु अथवा वॉयरस को उस रूप में इस्तेमाल किया जाये कि वैक्सीन के बाद यह मरीज़ में वह बीमारी तो किसी भी स्थिति में पैदा करने में सक्षम हो नहीं लेकिन इस में मौज़ूद एंटीजैन की वजह से इस की एंटीजैनिसिटी बरकरार रहे। एंटीजैनिसिटी बरकरार रहेगी तो ही यह वैक्सीन किसी व्यक्ति के शरीर में पहुंच कर उस रोग से टक्कर लेने के लिये अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता तैयार कर पाता है, मैडीकल भाषा में कहूं तो ऐंटीबाडीज़ तैयार कर पाता है। तो कोई भी वैक्सीन तैयार करने से पहले इन सब बातों का बेहद बारीकी से ख्याल रखा जाता है।

अब स्वाभाविक है कि आप सब को उत्सुकता होगी कि यह जीवित एवं मृत वैक्सीन का क्या फंडा है ---- इस के बारे में हमें केवल यह जानना ज़रूरी है कि लाइव वैक्सीन में तो जो जीवाणु अथवा वॉयरस पार्टिकल्ज़ इस्तेमाल होते हैं वे लाइव ही होते हैं, जी हां, जीवित होते हैं लेकिन बस उन्हें वैक्सीन में डाला उस रूप ( in medical term, we say it is used in an attenuated form ) में जाता है कि वे उस बीमारी से जंग करने के लिये सैनिक (ऐंटीबाडीज़) तो तैयार कर सकें लेकिन किसी भी हालत में बीमारी न पैदा कर पायें। और जहां तक डैड वैक्सीन ( इन्एक्टिव वैक्सीन)की बात है उस में तो मृत वायरस अथवा जीवाणु ही इस्तेमाल किये जाते हैं जो कि मरे होने के बावजूद भी अपनी ऐंटिजैनिसिटी थोड़ी बरकरार रखे होते हैं यानि कि किसी व्यक्ति के शरीर में पहुंचते ही ये उस के विरूद्ध ऐंटीबॉडीज़ तैयार करनी शुरू कर देते हैं। और हां, इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हर वैक्सीन के लिये यह अवधि तय है कि वह शरीर में पहुंचने के कितने समय बाद अपना जलवा दिखाना ( ऐंटीबाडीज़ तैयार) शुरू करता है।

यही कारण है कि कईं बार हमें जब तुरंत ऐंटीबाडीज़ की आवश्यकता होती है तो हमें कोई ऐसा उपाय भी इस्तेमाल करना होता है जिस के द्वारा हमें ये ऐंटीबाडीज़ पहले से ही तैयार शरीर में पहुंचानी होती हैं ---ताकि वह समय भी नष्ट न हो जब कि कोई वैक्सीन ऐंटीबाडीज़ बनाने में अपना समय़ ले रहा है।

ऐंटीजन एवं ऐंटीबाडी की बात एक उदाहरण से और भी ढंग से समझ लेते हैं ( चाहे इस उदाहरण का वैक्सीन से कोई संबंध नहीं है ) --जब हमारी आंख में धूल का एक कण भी चला जाये तो यह तुरंत गुस्से में आ कर ( लाल हो जाती है) और आंख से पानी निकलना शुरू हो जाता है। आंख में धूल के कण को आप समझिये की यह एक ऐंटीजन है और आंख से निकल रहा पानी उस धूल-मिट्टी से आप को निजात दिलाने की कोशिश कर रहा होता है।

एक कीचड़ में छलांगे लगाते हुये नन्हें मुन्नों बच्चों का बहुत ही बढ़िया सा विज्ञापन आता है ना ----दाग अच्छे हैं ----तो हम कह सकते हैं कि वैक्सीन भी अच्छे हैं, ये अनगिनत लोगों का रोगों से प्रतिरक्षण करते हैं।

हां, तो महामारी अब घोषित हो गई और वैक्सीन सितंबर तक --- इस का जवाब यह है कि इतना सारा काम करने में समय तो लगता ही है ना ---- अब तो हम सब लोग मिल कर यही दुआ करें कि यह सितंबर तक भी आ जाये तो गनीमत समझिये। इस तरह की वैक्सीन की टैस्टिंग भी बहुत व्यापक होती है। एक बात और कि क्या न वैक्सीन को पहले ही से तैयार कर लिया गया ? ---इस का जवाब यह है कि जिस वॉयरस का पता चले ही कुछ अरसा हुआ है, तो पहले से कैसे इस के वैक्सीन को तैयार कर लिया जाता, आखिल वैक्सीन तैयार करने के लिये वॉयरस नामक का विलेन भी तो चाहिये।

अब मन में यह ध्यान आना कि ये वैक्सीन तैयार करने इतने ही आसान हैं तो एचआईव्ही का ही वैक्सीन क्यों नहीं अब तक बन पाया ----इस क्षेत्र में भी बहुत ही ज़ोरों-शोरों से काम जारी है लेकिन वहां पर समस्या यह आ रही है कि एचआईव्ही की वायरस बहुत ही जल्दी जल्दी अपना स्वरूप बदलती रहती है इसलिये जिस तरह की वायरस से बचाव के लिये कोई वैक्सीन तैयार कर उस का ट्रायल किया जाता है तब तक एचआईव्ही वॉयरस का रंग-रूप ही बदल चुका होता है जिस पर इस वैक्सीन का कोई प्रभाव ही नहीं होता। लेकिन चिकित्सा विज्ञानी भी कहां हार मान लेने वाली नसल हैं, बेचारे दिन रात इस की खोज़ में लगे हुये हैं। इन्हें भी हम सब की ढ़ेरों शुभकामनाओं की आवश्यकता है।

अभी जिस विषय पर लिखना जरूरी समझ रहा हूं ---वह है जैनेटिकली इंजीनियर्ज वैक्सीन ( genetically-engineered vaccines). इस पर बाद में कभी अवश्य चर्चा करेंगे।

आज जब मैं सुबह सुबह यह पोस्ट लिख रहा हूं तो मुझे अपनी गवर्नमैंट मैडीकल कालेज की अपनी एक बहुत ही आदरणीय प्रोफैसर साहिबा --- डा प्रेमलता वडेरा जी की बहुत याद आ रही है, उन्होंने हमें अपने लैक्चर्ज़ में इतने सहज ढंग से समझाया बुझाया कि आज पच्तीस साल भी आप तक अपनी बात उतनी ही सहजता से हिंदी में पहुंचा पाया। वह हमें नोट्स तो देती ही थीं लेकिन हम लोग भी उन्हें रोज़ाना दो-तीन बार पढ़ लेना अच्छा लगता था जिस से बेसिक फंडे बहुत अच्छी तरह से क्लियर होते रहते थे। वे अकसर मेरे पेपर का एक एक पन्ना सारी क्लास को दिखाया करती थीं कि यह होता है पेपर में लिखने का ढंग। थैंक यू, मैडम। मुझे बहुत गर्व है कि हम लोग बहुत ही सम्मानीय,समर्पित मैडीकल टीचरों की क्रॉप के प्रोड्क्ट्स है जिन्हें हम लोग आज भी अपना आदर्श मानते हैं।

और हां, जहां तक एच1एन1 स्वाईन फ्लू की बात है , इस के लिये हम सब का केवल इतना कर्तव्य है कि बेसिक सावधानियां बरतते रहें जिन के बारे में बार बार मीडिया में बताया जा रहा है, बाकी जैसी प्रभुइच्छा। अब हम लोगों के लालच ने भी ने भी प्रकृति का दोहन करने में, उस का शोषण करने में कहां कोई कसर छोड़ रखी है अब उस का समय है हमें समझाने का। शायद कबीर जी ने कहा है --कभी नांव पानी पर, कभी पानी नांव पर !!

आज एक खबर जो सुबह अंग्रेज़ी के पेपर में दिखी जिस ने तुरंत इस पोस्ट लिखने के लिये उठा दिया ---वह यह थी कि दिल्ली में एक छः साल की बच्ची को फ्लू है जो कि विदेश से आई है-- उसे क्वारैंटाइन में रखा गया है और उस के दादू ने उस के साथ स्वेच्छा से रहना स्वीकार किया है।(उस बच्ची के साथ साथ उस महान दादू के लिये भी हमारी सब की बहुत बहुत शुभकामनायें)। पता नहीं, इस तरह की अनूठी कुरबानियों के बावजूद इन बुजुर्गों की इतना दुर्दशा क्यों है, कभी किसी ने सुना कि जब किसी बूढे़-बूढ़ी को बोझ की एक गठड़ी समझ कर ओल्ड-एज होम में पटक के आया जाता है तो उन के पोते-पोतियां भी उन के साथ रहने चले गये ------ मैंने तो ऐसा कभी नहीं सुना !!