जीना हम सब का दूभर हो चुका है …प्लास्टिक की वजह से …लेकिन हरेक को लगता है ..मैंनू की? (मुझे क्या?)....बस, यही सोच हमें खत्म कर देगी…
कल रात जुहू चौपाटी जाने का मौका मिला…लेकिन मज़ा बिल्कुल नहीं आया …मज़ा आना तो बहुत दूर की बात है, ऐसे लग रहा था कि कब यहां से वापिस लौट जाएं…कारण? …कारण यही कि रात के दस-ग्यारह बजे का वक्त था और गंदगी के ढेर लगे हुए थे …हर तरफ़ ….ढेर जो जगह जगह लगे हुए थे वे तो थे ही, इस के इलावा दूर तक जहां तक नज़र जा पा रही थी ..पॉलीथीन की थैलियां ही थैलियां बिखरी पड़ी थीं…और भी तरह तरह का कचरा….ज़्यादातर प्लास्टिक ही था …
बहुत ज़्यादा बुरा लगा ...वैसे तो यह पहली बार नहीं थी …हां, मेरी सब से पहली जुहू चौपाटी की यादें पचास-बावन वर्ष पुरानी हैं..हम लोग बंबई आते तो हमारी चाची जी हमें एक दिन जुहू , एक दिन गिरगांव चौपाटी, एक दिन बांद्रा के ओपन-एयर थियेटर में किसी फिल्म को दिखाने ले जाया करतीं…
तब जुहू चौपाटी पर जाना एक उत्सव, एक मेले में जाने जैसा होता था …सीधा उन की गाड़ी जुहू चौपाटी पर ही रुकती ….वहां पर टहलने वहलने का कोई रिवाज नहीं था..बस, वहां पहुंचते ही एक-आधा घंटा समंदर को खूब अच्छे से निहारना….समंदर को देखते देखते आंखें थक जाया करती थीं, दिल नहीं भरता था उन मस्त लहरों को देख कर…और उस के अंदर दूर तक पानी में जाना ….पैंट वैंट सब कुछ गीला हो जाता था …एक दूसरे के ऊपर पानी फैंकना …और उस ज़माने के फिल्मी गीतों का याद आ जाना और गुनगुनाना... हा हा हा हा हा ....जैसे कि ...आ मुलाक़ातों का मौसम आ गया ...
मुझे नहीं याद कभी कोई गंदगी हम ने वहां देखी हो ….पालीथीन तब था ही कहां।….यह बीमारी तो हमें बाद में लगी है …
फिर जब पानी में खेल कर थक जाते तो फिर वहां पर सेव-पूरी, भेल-पूरी, पानी-पूरी, चाट-पापड़ी, बर्फ के रंग बिरंगे मीठे गोले, पाव भाजी….जो भी मन करता, खाते रहते, थक जाते ….
फिर जब हमें बंबई में रहने लगे तो कोई भी हमारे पास आता तो हम भी उस को जूहू चौपाटी एक दिन शाम को ज़रूर ले कर जाते …यह आज से ३०-३५ साल पुरानी बातें होंगी ..लेकिन तब भी कभी कभी कोई प्लास्टिक की पन्नी आदि पानी के साथ बाहर आ जाती तो सब को बहुत बुरा लगता …लेकिन फिर भी गंदगी न के बराबर थी ….और इसी चक्कर में पानी में आगे तक जाना बंद हो गया …जाते भी तो अनमने से ..क्योंकि थोड़ा बहुत गंद तो दिखने लगा था …
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| ऐसे कईं ढेर प्लास्टिक के दिखाई दिए कल रात .... |
लेकिन अभी कुछ सालों से तो पानी में जाने की हिम्मत नहीं होती …इतनी गंदगी …हर तरफ फैला कचरा ….फिर भी कुछ लोग जो शायद बाहर गांव से आए होते हैं, वे अंदर पानी में भीगने के लिए चले ही जाते …
लेकिन अब तो हर तऱफ़ इन प्लास्टिक की थैलियों के इतने बड़े बड़े पहाड़ देख कर तो यही कोशिश रहती है कि आए हैं तो थोड़ा टहल लेते हैं, लेकिन समंदर का पानी पैरों तक न ही पहुंचे तो ठीक है ….वैसे भी इतनी गंदगी है कि कौन इतना गंद लांघ कर अंदर पानी का तरफ़ उस में भीगने जाए….
कल कुछ महीनों बाद ही जुहू चौपाटी पर जाने का सबब हुआ था …सोचता कईं बार हूं कि चाहूं तो रोज़ सुबह …नहीं तो सप्ताह में एक दिन तो जा ही सकता हूं (पास ही हैं…दो तीन किलोमीटर की तो कोई दूरी नहीं होती ..क्या ख्याल है? ).....लेकिन बस इच्छा ही नहीं होती ….यह सब देख कर …।
मैंने जुहू चौपाटी के ऊपर कईं पोस्टें लिखी हैं …सुबह सुबह कईं ट्रालीयां और दर्जनों सफाई सेवक वहां पर यह सब बीन रहे होते हैं …यह अंबार भी संभवतः इन्हीं सफाई कर्मियों द्वारा ही इकट्ठा कर के रखा हुआ होगा …सुबह ट्राली आयेगी और उठा ले जाएगी…और कल भी समंदर उसमें हमारा फैंका हुआ कचरा वापिस हमारे ऊपर फैंक कर चला जाएगा…समंदर अपने पास कुछ नहीं रखता….
| जूहू पर फोटोग्राफर, चाय वाला और मालशी |
सरकारें कितना करें?...लगभग हर सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगाया….कितनी कितनी लंबी कानूनी प्रक्रिया चलने के बाद यह बैन लगा ….लेकिन इस का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है …..हम यही सोचते हैं कि मेरी चार पांच थैलियों से क्या हो जाएगा….
दो सप्ताह पहले की बात है कि मैं बंबई के जे जे अस्पताल से पांच मिनट की दूरी पर किसी गली से गुज़र रहा था …मैंने दो सफाई सेवकों को देखा ….वह गली से कचरा निकाले जा रहे थे ….आप देखिए इस अंबार को ….इन सफाई सेवकों के काम को सलाम है ….
| सफाई सेवक ना हों तो...इसकी कल्पना ही कर के देखिए .... |
मेरे पास जब कोई सफाई सेवक आता है तो मैं उसे गुटखा-पानमसाले के लिए ,या तंबाकू चबाने के लिए मना करता हूं तो लगभग हमेशा यही जवाब मिलता है …क्या करें, काम ही इतना गंदा है, बिना इस को चबाए कैसे जी पाएंगे, कैसे काम कर पाएंगे। फिर भी मैं इस के बावजूद भी थोड़ा ज्ञान ज़रूर बांट देता हूं लेकिन उन की बात के सामने मुझे मेरी ही बात, मेरा ज्ञान बिल्कुल थोथा और फोका सा दिखता है….।शायद हम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते …जिन हालात में हमारे ये साथी काम करते हैं….आए दिन गटर की सफाई के दौरान किसी न किसी युवा सफाई सेवक की जान चली जाती है …। कानून हैं, सब कुछ है, लेकिन असल में क्या है, किसी से छुपा नहीं है…।
| Waiting in queue for getting uploaded on Clean-up Truck |
बंबई के एक स्टेशन के बाहर मैंने कचरा उठाने वाला एक ट्रक देखा ….बहुत बड़ा ट्रक…मैं पांच मिनट तक उस को देखता रहा , इस तरह के लगभग एक सौ के करीब बड़े बड़े बंडल उस में ठूंसे जा रहे थे …मैं देखते देखते थक गया….और वहां से निकल गया …यह एक स्टेशन की बात है ….और दिन में दो बार यह ट्रक आता है ….कचरा उठाने के लिए ….यह बाहर गांव से आने वाली गाड़ियों का कचरा है अधिकतर ….सारा प्लास्टिक, प्लास्टिक..प्लास्टिक …..जोमैटो, स्विगी से मंगवाए खाने के पैकेट, पानी की खाली बोतलें, जंक फूड के खाली पैकेट ….जिस भी प्लास्टिक की आप कल्पना कर सकते हैं, सब कुछ था ….
सोचने वाली बात है कि यह सब यहां से तो उठा लिया जाता है, लेेकिन जाता कहां होगा….
प्लास्टिक के ऊपर पिछले २०-२५ बरसों से इतना लिखा जा चुका है, सरकारों ने इतना काम किया है, इतना हमें समझाया है, इतना डराया है, लेकिन हम नहीं सुधरेंगे …क्योंकि हम ने खतरों से खेलने की ठान रखी है …हर तरफ प्लास्टिक, हर तरफ़ गंदगी….हर तऱफ़ कूड़े का जलाया जाना ….।
प्लास्टिक पर इतना लिखने के बाद ही मुझे लग रहा है कि यह सब लिखना भी बेवकूफी है ….कोई असर नहीं होगा ….लेेकिन आज तो लिखने का मेरा एक मक़सद है …मेरा अपना एक स्वार्थ है …मैंने कल से यह प्रण किया है कि मैं अब बाज़ार में जाते वक्त हमेशा कपड़े का थैला या थैले ले कर जाया करूंगा ….अगर मेरे पास यह नहीं होगा तो नहीं लाऊंगा बाज़ार से ….।
पता नहीं हम टमाटर, अंगूर, आलू-बुखारे, आम के दबने से इतने डरते क्यों हैं…..आज से पचास साल पहले हमारी मांएं कैसे लाती थीं सब्जी, एक हाथ में प्लास्टिक की बड़ी सी टोकरी (जिस में टमाटर, अंगूर, धनिये जैसी नाज़ुक चीजें…) और दूसरे हाथ में कपड़े का एक थैला….आलू, प्याज़, पेठा, बैंगन …सब कुछ हार्ड-कोर , रफ-टफ चीज़ें उस थैले में …(हमें मां के साथ बाज़ार जाने का एक ही क्रेज़ होता कि गन्ने का रस पिएंगे या आईसक्रीम दिलवाएगी मां…और वह ज़रूर दिलाती भीं …लेकिन मुझे नहीं याद कभी इतनी अकल भी थी कि मां के हाथ से टोकरी या थैला ही पकड़ लेते …..)....और मज़े की बात …मां को पता रहता था कि कौन सी सब्जी पहले लेनी है, कौन सी बाद में ..ताकि बाद में यह दबने-वबने वाली सिरदर्दी हो ही न। …..और हां, कईं बार अंगूर, या जामुन आदि कागज़ के लिफाफे में डाल कर दुकानदार दे देता था .। और घर पहुंच कर , सारी सब्जियां ज़मीन पर पलट कर फिर भिंडी को अरबी से अलग करना, टींडे को आलू से .....वक्त तो लगता था भई इस में।
सीधी सीधी बात है …जहां चाह वहां राह ….हम में से कोई भी इंसान हो कितना बेवकूफ लगता है सात सब्जियों को, तीन फलों को पालीथीन की थैलियों में डाल कर, अपने दोनों हाथों की उंगलियों की खूंटी पर टांगे, ढिलक रही पतलून को किसी तरह संभालते हुए घर तक पहुंचता है …अगर खुशकिस्मत हुआ तो ….वरना कभी नींबू वाली थैली ने जवाब दे दिया तो कभी पैंचो पपीता नीचे गिर जाता है, कभी एक आम, दो आलू बुखारे …..और कभी कभी ढीली पैंट भी गिरने की कगार पर होती है ...
चलिए, अपने ही से शुरुआत करते हैं….अब भी बहुत देर हो चुकी है…लेकिन फिर भी कहीं पढ़ा था …फिरोज़पुर के एक स्कूल में प्रिंसीपल के दफ्तर के बाहर ….There is never a wrong time to do the right thing!!
And of course, journey of 3000 miles starts with the single step. What do say? I ban plastic from my life with immediate effect. कुछ दिनों बाद फिर एक पोस्ट लिखूंगा कि अपने इस प्रण पर कायम रहा या बस ऐसे ही यह भी मेरे लफ़ाफे़ेबाजी़ थी …..
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| सरकारों से जितना हो पा रहा है, कर रही हैं, लेकिन अगर जनता ही न सुधरे तो सरकारें क्या करें...देखिए, जूहू पर इस तरह के डस्टबिन रखे पड़े हैं कईं जगह, लेकिन देखिए, खाली पड़े हैं...इतना कचरा, इतना कबाड़ की इन विशाल कचरा पेटियों में भी यह समा न पाए....। एक बार फिर से प्रण दोहरा दूं....आज से मैंने इन पन्नियों आदि का त्याग किया ...न इन को इस्तेमाल करूंगा और दूसरों को भी इस के लिए प्रेरित करूंगा....हम लोगों की ज़िंदगी के लिए यह करना अब इतना ज़रुरी हो गया है कि पानी नाक तक आ गया है....। ऐसे ही ज्ञान पेलने से क्या हासिल, हम भी कुछ शुरूआत तो करें ....। हिंदी फिल्मों ने भी हर मौके के लिए गाने हैं....जैसे कचरे की बात चल रही थी तो मुझे महमूद का वह गीत याद आ गया जिसमें वह कबाड़ी का रोल कर रहा है ....इस में देखिए कि पहले कबाड़ भी किस तरह का होता था ...खाली डिब्बा, खाली बोतल .... 😂 |
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| आप भी देखिए आज की टाइम्स आफ इंडिया में छपी यह फोटो ....१२ जुलाई २०२६ |




प्लास्टिक धरती का कैंसर है और वर्तमान में जनता प्लास्टिक का हद से ज्यादा प्रयोजन कर रही है।
जवाब देंहटाएंआपका आलेख बहुत अच्छा लगा।
मैं यथासंभव प्लास्टिक प्रयोग से बचता हूँ ।
जी हां, आप ने बिल्कुल सही फ़रमाया .... हर जगह प्लास्टिक ....चाय प्लास्टिक की थैली में, प्लास्टिक के कप में, गर्म दाल, दूध, दही सब कुछ चालू किस्म के प्लास्टिक की थैली में ...इस की वजह से हमारी ज़िंदगी में ज़हर घुल रहा है, वातावरण में भी और नदी-नाले-समंदर सभी त्रस्त हैं इस के कहर से ....पता नहीं यह कैसे गायब होगा हमारी ज़िंदगी से ...या हम ही पहले इस की चपेट में आ जाएंगे...
हटाएंस्थिति सच में बहुत भयावह है ...
प्लास्टिक धरती का कैंसर है और वर्तमान में जनता प्लास्टिक का हद से ज्यादा प्रयोग कर रही है।
जवाब देंहटाएंआपका आलेख बहुत अच्छा लगा।
मैं यथासंभव प्लास्टिक प्रयोग से बचता हूँ ।
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