शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

केक-लैस बर्थ-डे की शुरुआत …..

 


मैं उस ज़माने से हूं जब जन्मदिन का मतलब होता था …सुबह सुबह ढेर सारा हलवा….यह अनुभव वह है जो मैंने देखा ..और जिया….बरसों बरस तक ….यही कुछ २५ बरसों तक …फिर तो केक मिलने आम हो गए….आम तो पहले भी होंगे, लेकिन हमें ही ज़रूरी न लगे होंगे…


खैर, अपने दो जन्मदिन हैं ..एक असली और एक सरकारी …असली जन्मदिन मां ने उस साल के उस महीने में अलग अलग घटनाक्रमों को जोड़ कर बहुत बाद में तैयार की थी ….जैसे कि चीन ने हिंदोस्तान पर उन्हीं दिनों हमला किया था (इस ने साल तय कर दिया)...और नवरात्रोत्सव था उन दिनों …और दूसरा नवरात्र था…इस से महीना तय होगा और दिन और तारीख भी ….इस सब पर मोहर लगा दी हमारे ताऊ जी के पोस्टकार्ड ने जिसमें उन्होंने हमारे आने की बधाई एक कार्ड में लिख भेजी थी …वह कार्ड किसी कारणों से हमारे पिता जी के सरकारी कागज़ों की संदूकची में पड़ा दिख जाता था …हमारी बेवकूफ़ी ने उसे गुम कर दिया है अभी …। 


खैर, यह कोई नईं बात न थी…पहले जन्मदिन ..साल और दिन-महीने को ऐसे ही रि-कंस्ट्रक्ट किया जाता था …


लेकिन अमृतसर के इस्लामाबाद एरिया के जिस स्कूल में जाता था एक दिन उन्होंने कहा कि घर से लेकर आओ किसी को ….मेरी बड़ी बहन १० साल बड़ी है, वह मेरे साथ गई ….मामला यह था कि उन्होंने अपने रिकार्ड में मेरी पक्की जन्म तारीख लिखनी थी ..जहां तक याद है, घर में उस की ब्रिफिंग की गई …उस ज़माने के युवक-युवतियों की तरह वह बड़ी कांफिडेंट थी ….सारी बातचीत उन्होंने की …हां, घर से ब्रिफिंग जो उन की हुई उस में यह भी शामिल था कि एक साल ज़्यादा ही लिखवाना….उन दिनों हमारे मोहल्ले में एक-दो केस ऐसे हो गए थे जिनमें १७ साल की उम्र से कम होने पर किसी का कहीं कालेज में दाखिला न हो सका था …इसलिए हमारे माता-पिता भी अभी से कोई लापरवाही नहीं बरतनी चाहते थे…

खैर, वैसा ही हुआ ..साल तो बहन ने तुरंत बता दिया ….अब मामला महीने और तारीख पर अटक गया…इतना तो लगभग पक्का ही था कि हमने अवतार तो सितंबर ही में लिया है …लेकिन दो चार मिनट सोच विचार कर के, मेरी तरफ़ देख कर (मुझे खाक समझ में कुछ आ रहा था…) उन्होंने २ अक्टूबर पर मोहर लगा दी ..और बस हिंदोस्तान सरकार के रिकार्ड में हमारी जन्म तारीख २ अक्टूबर ही दर्ज हो गई ….


बर्थ-डे केक से बहुत दूर से हम लोग उन दिनों ….


मैं १९६० के दशक के जिस युग की बात कर रहा हूं, यह युग केक-युग से बहुत पहले का युग था …केक तो हमारे ख़्वाबो-ख्याल में भी न था तब…हां, पेस्ट्री महीने में एक-दो बार पिता जी ज़रुर लाते थे ….मल्होत्रा बेकरी से ….लेकिन उस के लिए किसी का जन्मदिन होना ज़रूरी न था….ज़िंदगी में जितनी शुद्ध और बेहतरीन पेस्ट्री खाई …वही थी जिसे स्कूल-कॉलेज के दिनों में खाते रहे …। 


हां, जन्मदिन का मतलब हमारे लिए होता था कि उस दिन मां सुबह पूजा-पाठ कर के बहुत बडी़ पीतल की कडा़ही में ढेर सारा हल्वा (नारियल डाल के) तैयार कर देती …जिसे हम बडे़ चाव से खाते …और अपने जन्मदिन का भरपूर मज़ा लेते …। उन दिनों ज़्यादा खाने वाने के ज़ोमेटो-स्विगी के इतने लफड़े नहीं थे, इसलिए हलवा तो वैसे भी बनता ही रहता था …लेकिन जन्मदिन वाले दिन सुबह सुबह वाले हलवे की बात कुछ तो अलग होती थी ….जहां तक मैं सोच पा रहा हूं …बनता वह भी डालडा घी में ही था…..बाद में शुद्ध घी में हलवा जब बनने लगा तब वह तो स्पेशल इवेंट होता था … 


और हां, शाम के वक्त एक छोटी सी पार्टी होती थी …घर ही में ….समोसे, जलेबी और बर्फी में से कोई १-२ चीज़ें लाई जाती थीं …कईं बार मोतीचूर के लड्‍डू ….मोतीचूर तो मैंने लिख दिया…लेकिन उन दिनों यह मोती-वोती चूर कुछ न थी, बस लड़्डू होते थे …(एक बात याद आ गई ….कईं बार ये इतने सख्त होते थे कि उन्हें बेलन से तोड़ना पड़ा था ….अकसर अडोस पड़ोस में शादी-ब्याह के अवसर पर यही कुछ दिया जाता था …एक बार हमारे एक पड़ोस में शादी थी …हमें भी कुछ ११-२१ इसी तरह के कमबख्त सख्त लड़्डू मिल गए ..लेकिन यह क्या, उन को तो खाने से पहले चकले पर रख कर बेलन से तोड़ना पड़ता था….यह काम करते हुए मेरा बड़ा भाई गालियां निकालता और हमारा यह सब देख कर हंस हंस कर पेट में बल पड़ जाता ….) ….


स्कूल-कॉलेज में किसी को न पता होता …..


स्कूल-कॉलेज में किसी को न ही पता होता कि आज किस का जन्मदिन है ..कभी भी न इस के बारे में किसी ने चर्चा की …। इसलिए घऱ से टॉफियां, चाकलेट ले कर जाने का कोई रिवाज़ ही न था….जब किसी को कुछ पता ही नहीं, तो जन्मदिन की बधाईयां लेने देने का भी कोई चलन न था….कितनी सीधी-सपाट ज़िंदगी होती थी न तब भी..। 


जन्मदिन के कार्ड आने जाने शुरु हो गए फिर ….


यही कोई ४०-५० बरस पहले जन्मदिन के कार्डों का दौर चल पड़ा ….जब किसी रिश्तेदार को, किसी दोस्त को जन्मदिन के कार्ड भिजवाए जाते …


और यह काम अकसर उस के जन्मदिन के बहुत दिन पहले शुरु हो जाता …


अमृतसर हो या बंबई …आर्चीज़ के कार्ड ही खरीदे जाते …क्योंकि जिसे कार्ड भेजा जाता वह बधाई संदेश पढ़ने के बाद फ़ौरन यह चेक करता कि यह किस ब्रांड का कार्ड है, अगर आर्चीज़ का होता तो भिजवाने वाले की साख बढ़ जाती ….


और कईं बार जब आठ-दस कार्ड किसी के यहां आ जाते (वैसे ऐसा होता कम ही था)....तो उन को एक दूसरे के साथ जोड़ कर किसी दीवार पर लटका दिया जाता ….अभी लिखते लिखते ख्याल आया कि यह प्रक्रिया अकसर दीवाली, और नये साल पर मिलने वाले कार्डों को एक साथ जोड़ कर तो ज़रूर की जाती …। एक बात और लिखनी ज़रूरी है ….पहले इन कार्डों की दुकानें भी खूब चलती थीं ….खास कर के आशिकी पट्ठों के दम पर …..अब तो इक्का-दुक्का ही दिखती हैं…कुछ महीने पहले मुझे मुंबई के चर्चगेट इलाके में एक ऐसी ही दुकान अभी भी दिखी तो खुशी भी हुई और हैरानी भी ….


हां, एक बात और …ये ४०-५० साल पहले वाले ख़तो-किताबत के दिन थे …कईं बार नज़दीकी रिश्तेदारों की जन्मदिन की बधाईयां चिट्ठी में भी मिल जाती थीं …और यह भी किसी बर्थ-डे-ग्रिटिंग कार्ड में कम न होती…

मेरी उम्र के नौजवानों को यह भी ज़रूर याद होगा कि उस दौर में कोई ग्रीटिंग्स कार्ड मिलने पर थैंक-यू कार्ड भिजवाने का भी रिवाज़ था ..जो काम व्हाट्सएप दौर में एक 🙏 स्माईली निपटा देती है ...

टेलीग्राम में आने वाली बधाईयां ….


यहां इस ब्लॉग में यह भी दर्ज करना लाजिम है कि हम जिस ६०-७० के दशक के ज़माने से हैं, उन दिनों घर में किसी नए आगमन की सूचना भी टेलीग्राम से दी जाती थी …


फलां फलां के बेटी हुई या बेटा हुआ है …मां-बेटी ठीक हैं….


ठीक तो हैं …ठीक है, लेकिन जब तार वाला तार देने आता तो घर वालों की जान पर बन आती थी जब तक वह तार खोल के पढ़ न लेते ….


यह दौर ही ऐसा था कि तार आने का मतलब होता था कि बुरी खबर ही है …कोई ख़लास ही हो गया है …ऐसे में किसी शुभ आगमन से खुशी भी होती थी और शायद कभी कभी थोड़ा झुंझलाहट भी होती होगी कि यार, यह चिट्ठी में भी तो लिख कर भेेज सकते थे …खैर, हर दौर की अपनी बातें…अपनी यादें…


बर्थ-डे वाली ग्रीटिंग्स की तार ….


यह १९७०-८० के दिनों की बातें हैं ..तार महकमें में २५-३० तारों के मसौदे (क्या लिखूं…मैटर तैयार होते थे) …आपने बस नंबर ही बताना होता था …कि शादी-ब्याह की, सालगिरह की, बधाई भेजनी है या अफसोस करना है किसी चीज़ का ….और ये सस्ते रेट पर उपलब्ध रहती थीं …मुझे नहीं याद कि कभी सालगिरह की बधाई वाली ऐसी ग्रीटिंग्स टेलीग्राम हम ने किसी को भेजी हो या हमें कहीं से आई हो …हां, किसी के परलोकसिधार जाने की तारें जब आती थीं तो सारे घर की जैसे जान ही निकल जाती थी….। सब कुछ याद है बिल्कुल अच्छे से ….कैसे पैरों तले से ज़मीन निकल जाया करती थी…।।


अब कहां दिखते हैं ऐसे ये बर्थ-ेडे ग्रीटिंग्स कार्ड या इस तरह की टेलीग्राम्स भी …मैं विंटेज क्यूटर हूं …एंटीक शॉप के चक्कर लगाता हूं जब तो वहां किसी कोने में ये सब पड़े दिख जाते हैं …मैंने एक बार हंसते हंसते पूछा कि यह कहां से ले आते हो…..तो जवाब मिला …लोग जब रद्दी या कबाड़ बेचते हैं तो फोटोफ्रेम के साथ जब फोटो, बाप-दादा की फ्रेम मे लगी डिग्रीयां, अवार्ड, पुरानी फोटो एल्बम, डॉयरीयां फिंकवाते हैं तो साथ में सभी पुराने ख़त और इस तरह के कार्ड-वार्ड सब रद्दी में दे देते हैं….। 


आज से कोई ४० साल पहले केक का दौर शुरु हुआ …


हां, यही कोई ४० साल पहले ही यह केक-वेक का दौर शुरु हुआ होगा …या यह हमारे लिए, हमारे आस पास के लोगों के लिए यह तब शुरु हुआ होगा ….उस के बाद तो बर्थ-डे को मनाने के कितने नये नये ढंग आ गए …उन के बारे में तो क्या ही लिखें, सारी दुनिया जानती है ….


केक के साथ घर में पार्टीयां होने लगीं …आस पास के दस-बीस बच्चे, आठ-दस रिश्तेदार, जान पहचान वाले भी होते …और वही पुराने कैमरे से एक-दो फोटी खींचनी, केक काटते हुए एक, खाते हुए दूसरी और बच्चे नाच रहे हों तब एक और …बस, फोटो वाला का काम हो गया। कुछ लोग तो उस दौर में भी इस काम के लिए फोटोग्राफऱ को ही बुला लिया करते थे ….। 


फिर कुछ साल पहले बच्चों ने अपने बर्थ-डे का जश्न अलग से मनाना शुरु किया ….अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ, मौज-मस्ती …पार्टी, फिल्में ….खाना-पीना….और अभी कुछ दिन पहले मुझे किसी से पता चला कि उस के आठ-दस साल के बेटे का जन्मदिन था तो उसने अपने दोस्तों को एक रेस्टरां में बुलाया….फिर वहां से वे सारे बच्चे जय हनुमान नाम की फिल्म देखने गए….कुछ बच्चों के मां-बाप भी साथ आए थे ..वक्त बहुत बदल गया है ..हर वक्त की अपनी कहानियां हैं, और यह सब स्वभाविक भी है ….बदलना कुदरत की नियती है ….बदलाव नियम है । जन्मदिन के दिन चेहरों पर केक पोतना शुरु हुआ ... और बर्थ-डे बम्पस वाला चलन भी शुरु हो गया ...।


लेकिन मैंने कैसे केक-लैस बर्थ-डे का फैसला किया ….


इस बार से मैंने केक-लैस बर्थ-डे का फ़ैसला इस लिया कि मैं तो लंबे अरसे से दूध और दूध से बनी चीज़ों का सेवन नहीं करता ….चाय में बस जो कभी दो चार चम्मच दूध जाता है, वही मजबूरी है …वरना, कुछ नहीं। जब से यह सब छोड़ा है, आसान हो गया है …खाना पीना….अब सोचना नहीं पड़ता कि कौन सा पनीर एनॉलॉग है, कौन सा घी शुद्ध है, कौन सी मिठाई मिलावटी है, कौन सा मावा नकली है …….मेरे लिए मिल्क एवं मिल्क प्राडक्टस का अस्तित्व ही खत्म है ….हड्डीयों का जो होगा देखा जाएगा….अभी तो मन की शांति के लिए यह सब छोड़ रखा है और वापिस यह सब खाने-पीने का कुछ इरादा नहीं है ….इतना ज़्यादा मिलावटी सामान के बारे में देख-सुन और पढ़ लिया है कि अब देख कर मक्खी नहीं निगली जाती ….बाकी, दूध और दूध से बने प्राडक्ट्स से मुझे कोई परहेज नहीं है, लेकिन अगर वे खालिस हों और यह मैं तय करूंगा कि क्या ख़ालिस है और क्या मिलावटी क्योंकि ज़िंदगी के पहले २५ बरस तक पंजाब के अमृतसर में इतना खालिस सब कुछ खाया है कि अब सब कुछ देखते-चखते ही समझ में आ जाता है …। 


मैंने अपना ही बर्थ-डे केक-लैस नहीं किया इस बार से …अब मैं जिन को बर्थ-डे केक भिजवाता भी था, उन को भी भिजवाना बंद कर दिया है ….क्योंकि अगर कोई चीज़ मेरे लिए ठीक नहीं तो दूसरे के लिए कैसे ठीक हो सकती है …महंगे से महंगे केक का एक टुकड़ा भी खाना मुझे आफ़त लगता है, इसीलिए मैं हमेशा केक-वेक कटिंग के दौरान गायब ही हो जाता हूं ….। 


बर्थ-डे में मिलने वाला कैश…..


जब मैं ४०-५० साल का हुआ तो बहुत सालों तक मां हर जन्मदिन के मौके पर एक हज़ार, दो हज़ार, पांच हज़ार एक लिफाफे में डाल कर देती सुबह सुबह ….उस के ऊपर अपने हाथों से जन्मदिन की बधाईयां लिख कर ….और कहतीं कि मुझे समझ नहीं आता कि तेरे लिए क्या खरीदूं..तू अपने आप ही कुछ खरीद लेना….मैं खरीद भी लेता अकसर उन पैसों से कुछ न कुछ ….अभी भी कुछ लिफाफे तो मेरे पास पड़े हुए हैं…


मां को मैं अकसर कहता कि ऐसा क्यूं ..क्या ज़रूरत है …मां का हमेशा ज़िंदा रहने तक यही मलाल रहा कि बचपन में बहुत इच्छा होते हुए भी हम तुम्हें बढ़िया बढ़िया महंगे खिलौने नहीं दिला सके …अब मैं चाहती हूं कि तुम अपनी मर्जी से कुछ खरीदो ….मैं मां को कहता कि हे माते, आप लोगों ने जिस प्यार-मोहब्बत से हमें पाल-पोस कर बड़ा किया ….किसी से अच्छे से बात करने की सीख दी, हर तरह के भेद-भाव को न मानने का सबक पढ़ाया…….इन सब के आगे खिलौनों की क्या बिसात है …। 


हाथ से लिखा कोई नोट …..


मैं अभी भी समझता हूं कि अगर ग्रीटिंग्स कार्ड नहीं भी हैं तो भी पोस्टकार्ड पर ही सही किसी नज़दीकी को, किसी दोस्त को, किसी सहयोगी को, किसी सहकर्मी को हाथ से लिख कर कुछ संदेश देते हैं तो देने और लेने वाले को बहुत अच्छा लगता है ….बात वही है कि जन्मदिन के दिन हर बंदे को स्पैशल फील करवाने की ज़रूरत होती है….स्पैशल दिन होता है ….हां, कभी कभी किसी को चिट्ठी भी डाल देता हूं ….लेकिन हाल-फिलहाल कभी मेरी भेजी कोई सामान्य चिट्ठी मिली नहीं ….पहले मिल जाती थीं सब चिट्ठीयां, अब पता नहीं क्यों नहीं मिलती …शायद फर्क यही था कि पहले भिजवाते वक्त पक्का यकीं होता था कि यह फलां फलां दिन मिल जाएगी..अब डाकपेटी में डालते वक्त ही लगता है कि यह कहां अपने ठिकाने पर पहुंचेगी …और वह पहुंचती भी नहीं …..क्योंकि उसे पता होता है कि इसने मुझे पोस्ट करने से पहले जो फोटो खींची है, कुछ दिन बाद वही वाट्सएप पर भिजवा दे तो ठीक है ………..और यही होता है …। 


जाते जाते पेट खराब होने की दवाई की बात …….


हां, उस का ख्याल यूं आया कि अब इस वक्त रात के ११ बज रहे हैं और मेरा दवाई खाने का समय हो गया है ….हां, कुछ दिन पहले असली जन्मदिन वाले दिन रात में बाहर खाना खाया, पांच हज़ार रुपए लगा कर बीमारी मोल ले आए….दो तीन दिन तो ऐसे ही थोड़ा बदन-दर्द और सुस्ती सी बनी रही, जब तीन चार दिन बाद पटाके पड़ने लगे तो बात समझ में आ गई …तीन-चार दिन का पेट खराब को ठीक करने की दवाई चल रही है ….बस, आज की यही हकीकत है ….अभी वहां न कोई पनीर खाया, न शुद्ध घी से बना कुछ और न ही कोई अन्य मिल्क-प्राडक्ट …। 



हम भी अगर बच्चे होते …नाम हमारा होता बबलू-गबलू …..यह गीत था जो लगभग हर बच्चों की पार्टी में बजता था …बहुत बढ़िया बर्थ-डे गीत है …लेकिन मेरा पसंदीदा गीत है ….मुझे यह भी बहुत ज़्यादा पसंद है ….तेरी उम्र की फुलवाड़ी में खिला नया इक फूल..मुबारक साल गिरह …मुबारक साल गिरह …


शनिवार, 26 सितंबर 2026

किसी मंदिर से कम नहीं मराठा-मंदिर....



मराठा मंदिर सिनेमा की आज की तस्वीर ...

मेरे लिए सच में किसी मंदिर से कम नहीं है …मराठा मंदिर ….मराठा मंदिर सिनेमा मुंबई सेंट्रल स्टेशन के लगभग सामने ही है ….आज से ३५ बरस पहले इस के पहली बार दर्शन किए थे …और जब भी उधर से निकलना होता है, कितनी भी जल्दी में रहूं…लेकिन उस के पोस्टरों पर निगाह डाले बगैर आगे बढ़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता …और अब तो मोबाईल हाथ में होता है…एक दो फोटो भी खींच ली जाती हैं….अब तो मराठा मंदिर सिनेमा के गेट के ठीक बाहर मुंबई मेट्रो एक्वा लाईन का स्टेशन भी चालू हो गया है जहां से आप कफ-परेड तक एक तरफ और दूसरी तरफ़ एयरपोर्ट टर्मिनल एक और दो से होते हुए आगे आर.रे...(जवीएलआर) - (आर.रे मानी आर.रे मिल्क कॉलोनी) ..तक जाती है...

आज के ए.आई के दौर में अब ब्लॉगिंग में मन नहीं लगता …लेकिन फिर कुछ दिनों बाद की-पैड पर उंगलियां खुद-ब-खुद थिरकने लगती हैं …यही सोच कर कि अपनी डॉयरी में ही तो लिख रहा हूं और उस से ज़रुरी बात यह कि अगर मेरी उम्र के लोग ही जो थोड़ा बहुत लिखने पाने में सक्षम हैं, वे ही पुराने दिनों के बारे में न लिखेंगे तो फिर और कौन लिखेगा…कौन सहेज कर रखेगा उन सब खट्टी-मीठी यादों को ..। 


कल मेरा एक सहयोगी इंस्टाग्राम पर एक रील देख रहा था …जिस में मराठा मंदिर सिनेमा का नाम आया, १९९२ में रिलीज़ हुई फ़िल्म खुदा-गवाह का ज़िक्र आया…मुझे भी ३४-३५ साल बाद वे मई-जून १९९२ के दिन याद आ गए ..जब एक दोपहर में हम भी यह फिल्म देखने मराठा-मंदिर सिनेमा में यह फिल्म देखने गये थे…पीछे झांकने पर कल ही की बात लगी ….



इस फ़िल्म का गज़ब का करिश्मा था …फ़िल्म तो बेहतरीन थी ही, और नगमें भी एक से बढ़ कर एक …। 


मराठा मंदिर सिनेमा के आगे से जब भी निकलते हैं तो यह अपने आप में एक अच्छा अनुभव रहता है … मैं १९९२ के दिनों की बात कर रहा था …उन दिनों एक हफ्ते पहले तक की फिल्म की टिकट हम लोग खरीद सकते थे …सुबह यही कोई आठ-साढ़े आठ बजे टिकट की बुकिंग शुरु हो जाती थी….मैंने भी खुदा-गवाह की टिकटें कोई तीन-चार दिन पहले ही ली थीं..


यह वह दौर था जब किसी भी सिनेमा थियेटर के बाहर और अंदर ट्रेलर लगे रहते थे ….


ट्रेलर ऐसे होते थे ...४०-५० ऐसे कार्ड सिनेमा हाल में लगाए होते थे और फिल्म के लिए अंदर जाने से पहले और इंटरवल में इन को अच्छे से देखा जाता था...इंटरवल में इसलिए कि कौन सा सीन हो गया, कौन सा अभी आएगा..कभी कोई भूल हो जाती तो पास में खड़ा साथी याद दिला देता ....नहीं, नहीं, यह तो अभी आएगा...



उस दिन शनिवार के दिन भी मेरी इच्छा हुई कि रूटीन में कुछ तो बदलाव किया जाए…कभी तो रास्ता बदल के देखें, थोड़ा लीक से हटें ….(पाश की वह मशहूर कविता अकसर याद आ जाती है ....खतरनाक होता है सपनों का मर जाना...) इसी मंशा के साथ मैंने पहले तो पास ही एक रेस्टरां में लंच किया ..और तब तक मराठा मंदिर में दोपहर के शो का वक्त हो गया….


बुकिंग विंडो लगभग खाली थीं….दो तरह की टिकटें …ड्रेस सर्कल १०० रुपए में और बॉलकनी १५० रुपए में ….ड्रेस सर्कल ही में लोग नहीं दिखते तो बॉलकनी में अकेले बैठने का मन नहीं हुआ….ड्रेस-सर्कल का टिकट लिया …फिल्म थी …दायरा ….अंदर जा कर देखा ..वहां पर १५-२० लोगों से ज़्यादा लोग न थे ….


फिल्म देखते हुए इस बात का रह रह कर ख्याल आ रहा था कि ऐसे हालात में इस तरह के सिनेमा हाल चल कैसे रहे हैं…इनका चलाने ही में इतना खर्च आता है ….फिल्म देखने का अनुभव भी बदल गया है ….फिल्मों का वह करिश्मा नहीं रहा …हर हफ्ते में थियेटर के बाहर लगा फिल्मी पोस्टर बदल जाता है …यही है किसी फिल्म की थियेटर में उम्र। 


इंटरवल के दौरान जब मैं बाहर आया तो कैंटीन में लगे तरह तरह के स्नैक्स ….समोसे, ब्रेड-पकोड़े और चाय की थर्मस दिखीं….लेकिन उन को खरीदने वाला कोई नहीं था…दो चार मिनट ही में इंटरवल खत्म हो गया….इस दौरान मैं थियेटर की लॉबी में उस जगह को देखने लगा जहां पर गुज़रे दौर में ट्रेलर लगे रहते थे ….लेकिन अब वहां पर ट्रेलर नहीं लगते …क्या लगाएं ट्रेलर, देखने वाले ही नहीं रहे …और चार दिनों बाद ट्रेलर कौन बनवाए, कौन लगवाए….


खैर, उन खिड़कियों में (शो-केस) में पुराने ज़माने की ट्राफीयां एवं शील्डें लगी हुई थीं…इस से पहले मैंने यह सब कहीं नहीं देखा था….इंटरवल खत्म होने की घंटी बजने पर भी मैं अंदर नहीं गया….क्योंकि मुझे ऐसा कुछ लगा न था फिल्म में जो मिस हो जाएगा….जहां से भी आगे देख लेंगे, उतना ही काफ़ी है …खैर, मैं उन ट्राफीयों को देखने में लग गया…सभी देख लीं, तो गेटकीपर से पूछा कि ऊपर भी लगी हैं ये ट्राफीयां…उस ने कहा कि हां…..बस, मैंने जल्द ही एक फिल्म और देखने का मन बना लिया….। 


आज के दौर में यह कल्पना करना कि कोई फिल्म किसी थियेटर में २५ सप्ताह तक, ५० सप्ताह तक चली….कितना अचंभित करने वाली बात है ..लेकिन हमने यह सब देखा है, वह रोमांच अनुभव किया है…जब किसी फिल्म के १०० दिन हो जाते थे तो एक साईकिल रिक्शा पर उस फिल्म का पोस्टर लगा कर शहर के बाज़ारों में लाउड-स्पीकर पर यह सूचना दी जाती थी…वे दिन भी क्या दिन थे!!


अच्छा, मैं १९९२ में मराठा मंदिर में रिलीज़ हुई खुदा गवाह फिल्म की बात कर रहा था….जब मैंने देर शाम उन सभी ट्राफीयों की तस्वीरें देख रहा था तो मेरे बार बार ढूंढने पर भी खुदा गवाह की कोई ट्राफी नहीं मिली…बाद में गूगल ने बताया कि यह फिल्म वहां पर १८ सप्ताह तक ही चली…इस फिल्म ने सिल्वर जुबली तो पूरी कर ली थी लेकिन अगले कुछ हफ्तों के लिए यह दूसरे सिनेमा घरों में चलती रही थी…


५० हफ्ते तक किसी फिल्म का चल जाना .....उन दिनों ऐसी फिल्मों का क्या करिश्मा होता होगा...

खैर, मुझे गोल्डन जुबली की ट्राफीयां दो ….एक तो फिल्म शागिर्द और दूसरी फिल्म दाता की दिखीं….हैरानी हुई …५० हफ्ते चलती रही फिल्म …लगभग पूरा एक बरस…दाद देनी पड़ेगी, फिल्म बनाने वालों की भी और उसे जाकर देखने वालों की भी । बहुत बड़ी बात है…शायद हमारी पीढ़ी के लिए कम और आज की जेन-ज़ी के लिए बहुत ज्यादा बड़ी बात। बात वही है कि उस दौर में जनता के पास रेडियो-ट्रांजिस्टर के अलावा सिनेमा हाल में जा कर फिल्म देखना ही मनोरंजन का एक ज़रिया हुआ करता था…। 

मैंने पहले भी किसी ब्लॉग में लिखा था कि पुराने ज़माने में किसी भी सिनेमा घर के बाहर उस फिल्म की १०-२० पैसे की फिल्मी गीतों की छोटी छोटी किताबें मिलती थीं, जिन में उस फिल्म के गीत प्रिंट किये होते थे…और कईं बार उन में फिल्म की संक्षिप्त स्टोरी भी हुआ करती थी …गीतों की यह किताब उन गीतों को गुनगुनाने के लिए बहुत हैंडी साबित होती थी ..खास कर के जब रेडियो पर भी वह गीत बज रहा होता था … मेरे पास इस तरह की किताबों की भी एक क्लेक्शन है …कुछ तो लखनऊ में मिल गई थीं ….और कुछ इधर मुंबई में मिल गई थीं ..। 


मुझे मराठा मंदिर पर यह लिखने का ख्याल कहां से आ गया…मेरे पिछले ब्लॉग पर एक टिप्पणी आई थी, मुझे यही लगा कि उस बंधु की यादों में आज के मराठा मंदिर की यादें भी शामिल कर दी जाएं, इस लिए यह लिखने बैठ गया..वह बंधु भी लखनऊ में रहते हैं….। हां, उन की टिप्पणी का एक अंश यहां लिख रहा हूं…


"डॉ साहब मैं पहली बार अपने पापा के साथ 1958 में गया था तब लोकल ट्रेन और ट्रॉम भी छाती थी। फ़िर दोबारा 1960 में पापा के साथ गया तब मराठा मन्दिर सिनेमा हॉल बना था और इसमें पहली फिल्म मुगल ऐ आज़म लगी थी। पापा के दोस्त जो बॉम्बे के थे j j hospital में सर्विस करते थे। उन्होंने ने टिकट बुक करवा लिये थे। हमने वोह मूवी मराठा मन्दिर में देखी थी। क्या सिनेमा हॉल बना था पुश बैक सीट बिल्कुल एयरोप्लेन वाली फ़्लोर पर क़ीमती सॉफ्ट कार्पेट पैरों के नीचे। पूरे हिंदुस्तान में ऐसा दूसरा सिनेमा हॉल नहीं था। बॉम्बे बहुत बार गया हूँ तब इतनी आबादी नहीं थी और सपोर्ट में ट्रॉम और बस सर्विस भी थी …"


अच्छा एक बात और लिखनी है …शायद आप को यह पहले से पता हो ….यहां मराठा मंदिर में फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को लगे ३० बरस हो चुके हैं….सुबह का शो इसी का होता है ..हाल की टिकट ३० रुपए में और बॉलकनी की ५० रुपए में….लेकिन इस तरह के आंकड़े मुझे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करते …मैं तो बस अपने दौर की सिल्वर और गोल्डन जुबली वाली फिल्मों से ही मुतासिर होता हूं …फिर भी दो चार दिन पहले इसी फिल्म के बारे में जो मराठा मंदिर के बाहर लिखा था, उसे यहां आप के लिए पेस्ट कर रहा हूं…देखिए….।

दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे ...तीसवां साल ...१५४५ वां हफ्ता ....लेकिन मैं इंप्रैस्ड नहीं हूं ....मेरी सूई अभी भी मेरे ज़माने की सिल्वर-गोल्डन जुबली फिल्मों पर टिकी है....वे हमेशा इन "आंकड़ों" पर भारी रहेंगी, यह मेरा ख्याल है ...


अब मराठा मंदिर का यह हाल है….मराठा मंदिर का ही नहीं, सभी थियेटरों का ही, मल्टीप्लेक्स का भी यही हाल है …हर हफ्ते फिल्में बदल जाती हैं …पता ही नहीं लगता कब फिल्म लगी और कब बदल गई ….हिसाब रखना मुश्किल होता है ….यह आज सुबह की फोटो है जो मैंने ऊपर लगाई है….कईं बार तो किसी फिल्म के बारे में पहली बार पता ही इन का नाम इस तरह के पोस्टरों को देख कर चलता है …


मराठा मंदिर सिनेमा को मिला इंटरनेशनल सम्मान...फिल्म उद्योग को ज़िदा रखने के लिए ...

मैं अकसर सोचता हूं कि इस तरह के पुराने सिनेमा घर इस दौर में चल कैसे रहे हैं…यह मेरी समझ से परे की बात है …मुंबई की इतनी प्राईम लोकेशन पर इतनी जगह में यह सिनेमा खड़ा है …यह चल कैसे रहा है, मैं इसी बात पर हैरान हूं ..लेकिन जब मैंने उस दिन इस के शो-रूम में एक अवॉर्ड पड़ा देखा जिस में लिखा था कि मराठा मंदिर को यह अवॉर्ड उन को फिल्म उद्योग को ज़िंदा रखने के लिए दिया जाता है ….वाह, बहुत खूब….। 


अब चलते हैं फिल्म शागिर्द जिसके लिए मराठा मंदिर सिनेमा को गोल्डन जुबली ट्राफी दी गई …यह फिल्म तो सुपरहिट थी ही और इस फिल्म के गीत भी सुपर-डुपर हिट…हम छोटे छोटे थे तो रेडियो पर बजते रहते थे …..एक गीत याद आ रहा है ….- दिल विल प्यार व्यार मैं क्या जानूं रे ....



गुज़रे दौर की फिल्मों की बात करें तो याद आता है कि उस ज़माने में फिल्मी स्टोरी की किताबें भी मिलती थीं...मेरे पास हैं कुछ...मुझे ऐसे लगा जैसे खुदा-गवाह की भी किताब मेरे पास है ...लेकिन नहीं, वह किसी और फिल्म की किताब थी, जिसके पिछले-कवर पर ख़ुदा-गवाह फिल्म की आने वाली किताब का विज्ञापन था ..ये किताबें यही कोई दस रुपए की बिकती थीं....आज कल ऐंटीक-शॉप में कभी कोई दिख जाती है ....पूरी कॉमिक्स की तरह तैयार की गई पूरी फिल्मी स्टोरी...फिल्मी अंदाज़ में ...और उस केे पीछे गीत भी लिखे होते थे ..अभी लगाता हूं यहां किसी किताब का कोई पन्ना ...।


मैं जिस फिल्मी किताब की बात कर रहा था, यह उसी का एक पन्ना है, फिल्म कोई और है...अब देखिए, अगर इतनी बढ़िया तरीके से ४०-५० पन्नों में फिल्म की पूरी कहानी उस दौर में पाठकों तक पहुंच जाती थी तो कमाल ही है ....लेकिन हां, दस रुपए भी उस ज़माने में कम नहीं थे ... 😀 

बात जहां से शुरु की थी ..वही पर वापिस आता हूं …मैं मराठा मंदिर को किसी मंदिर से कम नहीं समझता…दो-तीन पुश्तों का मनोरंजन कर चुके और अभी भी इस विषम दौर में भी डटे हुए हैं, थके-मांदे परेशान लोगों को सुकून मिलता है, अपनी परेशानियां भूल जाते हैं कुछ वक्त के लिए., … बहुत खूब, इन सब के लिए ही तो हम मंदिर में भी जाते हैं, है कि नहीं?…और एक बात….मुझे बहुत से फिल्मी गीत ..जिन में बहुत से रूमानी गीत भी शामिल हैं, वे मुझे बहुत से भजनों से भी बेहतर लगते हैं …प्रेरणा देते हैं, सुकून देते हैं, और रास्ता दिखाने का काम भी करते हैं…सुबह सुबह जो प्रवचन आते हैं टीवी-केबल पर जहां पर बाबा लोग परलोक सुधारने की बात करते हैं, स्वर्ग में भिजवाने की गारंटी लेते हैं, ८४ लाख योनियों से मुक्ति दिलाने की गारंटी लेते हैं…..मेरी इन में कभी कोई रूचि नहीं रही, सिर ज़रूर दुःखने लगता है ….इसलिए पुराने फिल्मी गीत ..कुछ फिल्मी भजन, दोहे सुनने ज़्यादा भाता हैं…..परलोक का क्या है, देख लेंगे उस से बाद में.. एक बार जाने के बाद कौन बताने के लिए लौटा है कि वह कहां पहुंचा, कहां नहीं….


हिंद पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित अमिताभ की जीवनी 

उस दौर में फिल्मी सितारों पर कॉमिक्स की तरह उन की जीवन डॉयमैंड कॉमिक्स और हिंद पाकेट बुक्स प्रकाशित किया करती थीं...




उस दिन हाल से बाहर आते वक्त मैंने ये तस्वीरें खींच लीं..



लिखते लिखते कईं बातें याद आ जाती हैं...१९९० के दशक में हम लोग जिस बिल्डिंग में रहते थे,  उस फ्लैट के एक कमरे से मराठा मंदिर बिल्कुल साफ दिखता था ..और बहुत सी फिल्मों के प्रीमियर की गहमा-गहमी उसी खिड़की से देख लिया करते थे ...शहनाई, नगाड़ों की मन-भावन ध्वनि के बीच  आसमां से प्रीमियर की शाम फिल्मी सितारों का मराठा मंदिर पर उतरना ...इतना सब तो खिड़की से नहीं दिख पाता था ...बढ़िया सी इंपोर्टेड दूरबीन खरीदने का आइडिया 😎 नहीं आया उन दिनों ....!!

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मुंबई वेस्टर्न लाइन ए.सी लोकल सफरनामा....



लंबे अरसे से यह इच्छा रही है कि मैं मुंबई की एयरकंडीशंड लोकल ट्रेन के बारे में अपने तजुर्बे लिखूं…लेकिन टलता रहा …यूं ही …ऐसे ही लगा कि इस पर भी क्या लिखूं…लेकिन दिल है कि मानता नहीं …कह रहा है - लिख, दिल की दिल में न रखा कर, कह दिया कर, लिख कर फ़ारिग हो जाया कर….हल्कापन महसूस होगा…


ठीक है….हल्का ही रहता हूं …यही कोशिश करता हूं …कोई फ़िज़ूल के पंगे में नहीं पड़ता….आज दिल की ही मान कर लैपटाप खोल लिया है …(मैं लिखने का काम लैपटाप पर ही करता हूं…मोबाईल पर सिर्फ़ दूसरों की सोशल मीडिया पोस्टों पर पीठ थपथपाने और ई-मोजी ठेलने का काम ही हो पाता है ..। 


हां, तो मैं बात कर रहा था एयरकंडीशन्‍ड लोकल ट्रेन में सफर करने के बारे में ….मेरा क्या तजुर्बा क्या रहा। 


हां, तो बात ऐसी है कि मुंबई लोकल ट्रेनें कब से शुरु हुई..यह मुझे ठीक से याद नहीं…याद नहीं न ना सही, अब यह लिखने के लिए भी गूगल से पूछ कर सही तारीख लिखूं …यह बडा़ बोरिंग काम लगता है। 


मैंने पिछले दो बरसों में काफ़ी बार मुंबई की ए.सी लोकल ट्रेन में सफ़र किया है ….सफ़र मेरा १०-१५ मिनट का ही होता है ..लेकिन जो एक्सपीरियंस रहे, वह लिख रहा हूं…


बहुत से लोगों को शायद पता न हो कि मुंबई की ए.सी लोकल ट्रेन में सात सीटें मोटरमैन की तरफ़ वाले एक डिब्बे में और सात सीटें पीछे गार्ड वाले डिब्बे के पास वरिष्ठ नागरिकों के लिए रिज़र्व रहती हैं…


ज़ाहिर है कोई ज़्यादा संख्या तो नहीं है, इतने उम्रदराज़ लोग सफ़र करते हैं ….इसलिए मुझे कभी भी यह संख्या पर्याप्त नहीं लगी…लेकिन इस बात का सुकून है कि रेल विभाग ने एक अच्छी शुरुआत तो की …हम सब यह भी समझते हैं कि इस तरह की यात्री सुविधाएं अचानक एक दिन प्लेट में रख कर परोस नहीं दी जातीं…


इस के पीछे संघर्ष होता है …जो लंबे समय तक चलता है….फिर मामले कोर्ट कचहरी तक पहुंचते हैं ….कईं बार कोर्ट के आदेश अनुसार कुछ यात्री सुविधाएं देने पर रेल विभाग को बाध्य होना पड़ता है …जैसे कि आप जो मुंबई के स्टेशनों पर फर्स्ट-एड जैसी चिकित्सा सुविधाएं या स्टेशन के बाहर एम्बूलेंस खड़ी देखते हैं, यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुआ है ….। 


खैर, ये जो सीनियर सिटिजन वाली सात सीटें हैं, इन पर ही जवान लोगों की नज़र रहती है …कैसे इन पर कब्ज़ा किया जाए….



मैंने कुछ दिन तो देखा कि उन सात सीटों में से तीन चार पर या दो तीन पर तो जवान लोग (पुरूष और महिलाएं - अधिकतर पुरुष) बैठे हैं जो किसी भी नज़रिए से ६० के तो नहीं लग रहे ….


और सब से दुःखद बात यह कि उन के सामने ही वरिष्ठ नागरिक आडे़-टेढ़े होकर, कोई तो किसी दीवार का सहारा लेकर खड़े हैं …और इन जवान लोगों की सेहत पर कोई असर नहीं है …ये अपनी रीलों और ओटीटी का आनंद उठा रहे हैं …बिना ऊपर देखे कि कौन खड़ा है, कौन नहीं खड़ा है..


दो-तीन दिन तो मैंने देखा….और यह देख कर तो और भी दुःख हुआ कि उन को कोई उठने के लिए कह भी नहीं रहा ….हैल विद दिस टॉइप ऑफ शिष्टाचार…नहीं, मैं नहीं हूं इतना शिष्टाचारी ….और शायद इस उम्रदराज़ में लोगों में विभिन्न कारणों की वजह से इतना कांफिडेंस भी नहीं रहता या सामने वाला ही इतना ज़्यादा सूटेड-बूटेड है कि उसे उठने के लिए कहने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते …


लेकिन मैं इस बात के बहुत ख़िलाफ़ हूं…और मैंने तो जो भी सामने जवान दिखता …उसे उठने के लिए कहना शुरु कर दिया ..और वे सब एक सेकेंड में उठ भी जाते हैं…उन को पता सब रहता है कि ये सीटें किन के लिए आरक्षित हैं…


एक बार तो बंदा अपनी वेश-भूषा और हाव-भाव और ऐंठन से कोई सीईओ ही लग रहा था …मैंने उठने के लिए इशारा किया और वह उठ गया…


एक बार मेरे से गलती भी हुई …मैं भी नया नया था इस लाइन में …मैंने जिस स्लिम-ट्रिम एक ऐसी ही सीट पर बैठे बंदे को याद दिलाया की यह सीनियर-सिटीजन सीट है तो वह झट से हंसते हुए बोला कि वह भी सीनियर सिटीजन ही है …। 


बस, उस दिन के बाद से तो उस से दोस्ती हो गई …बताने लगा कि बहुत से लोग धोखा खा जाते हैं…मैंने कहा कि तुम लगते ही इतने छोटे हो …


इतने साल हो गए …ज़िंदगी की किताब के पन्ने उलटते-पलटते और लोगों के चेहरे, उन के हाव-भाव समझते, सारा दिन हर उम्र के बंदे से वास्ता पड़ता है ….ड्यूटी पर भी और बाहर भी …ऐसे में सामने वाले की उम्र का सही अंदाज़ा हो ही जाता है ….


बंदे जितनी मर्ज़ी बालों पर, मूछों पर कालिख, डाई या वह अजीबोगरीब लाल मेंहदी पोत ले ….उम्र तो अपने आप जाहिर हो ही जाती है ….वह बात अलग है कि कुछ मेरे जैसे लोग उम्र से पहले ही सीनियर सिटीजन लगने लगते हैं और उम्र से पहले ही सुपर-सीनियर सिटीज़न….कुछ किस्से सुनाता हूं आप को …


एक किस्सा तो यह कि अभी मुझे सीनियर सिटीजन होने में दो साल थे कि दिल्ली मेट्रो में सफर करते वक्त मैं ऐसे ही किसी सीनियर सिटीजन सीट के सामने खड़ा था, अचानक उस सीट पर बैठा एक जवान उठ खड़ा हुआ …मुझे सीनियर सिटीजन समझ कर। 


एक बार मुझे यह अहसास हो गया कि मैं सीनियर सिटीज़न लगने लगा हूं ….फिर तो दिल्ली की मेट्रो में सफ़र करना काफी आसान हो गया…जब तक मैं कानूनन सीनियर सिटीज़न न हो गया….तब तक भी …. 


और सीनियर सिटीजन होते हुए अगर आप की तुलना गुलज़ार से की जाए ..जो कि मेरे से ३० साल उम्र में बड़ा है …तो कैसा लगेगा? …हुआ यूं कि मैं किसी वेलनैस रेज़िडेंशियल प्रोग्राम में था …एक दिन किसी महिला ने क्लास के बाद कहा कि आप बिल्कुल गुलज़ार साहब जैसे लगते हैं, आप अभी कुछ लिख रहे थे तो भी वैसे ही लग रहे थे, और आप के बाल भी और ड्रेसिंग स्टाईल भी वैसा ही है …अब आप मेरी हालत देखिए, इस तरह का कंप्लीमेंट मिलने पर …न मैं हंस पाऊं न रो पाऊं….उम्र से पांच सात बडे़ किसी से तुलना की जाए तो समझ में आती है लेकिन यहां तो तीस साल बडे़ जैसे बंदे सा मैं लग रहा हूं ……यह जान कर, वहां से लौट कर पहले तो मैंने अपनी ड्रेस-सेंस ठीक की …….वही कर सकता था, बाकी सफेद बाल और चेहरे की झुर्रियों हैं तो हम हैं, वे तो वैसे ही रहेंगे…


चलिए, तीसरा किस्सा बताने को दिल मना कर रहा है …इतना ही काफ़ी है, जितना बता दिया है …। 


जवान बैठे हुए और बुज़ुर्ग खड़े हुए …


एक बार मैं जिस ऐ.सी डिब्बे में चढ़ा, उस में सात सीटों पर भले-चंगे हट्टे कट्टे जवान युवक बैठे थे हंसी मज़ाक कर रहे थे…और सीनियर सिटीज़न पास ही खड़े हुए थे. मैंने उस दिन उन के पास जा कर कहा कि ये सीनियर सिटीज़न सीट हैं, उन में से दो-तीन फौरन बोल पड़े …ठीक है, हम उठ जाएंगे लेकिन उन सीटों पर बैठेंगे तो सीनियर सिटीज़न ही (जो पहले से पास ही खड़े थे.)...मैंने कहा कि वह कोई बात नहीं, बैठे कोई भी, लेकिन सीनियर सिटीजन तो होगा…


लेकिन वही हुआ ….सीनियर सिटीजन मना करने लगे उन को कि आप लोग बैठे रहिए…


मुझे सारी बात समझ में आ गई …ये सब के सब बुज़ुर्ग इन सेठों के काम धंधे पर काम करने वाले बाबू, चपरासी हैं….जिन को ये सेठ लोग साथ ही इसीलिए लेकर आते हैं….ताकि सीनियर सिटीजन सीटों पर कब्ज़ा किया जा सके।

 

खैर, मैं फ़िज़ूल के झंझटों में नहीं पड़ता…एक बार बात समझ में आ गई तो मैं इस तरह के ग्रुप को देख कर चुप रहता हूं…। 


जिस ए.सी के डिब्बे में मैं सफ़र करता हूं….


उस का यह हाल है कि उसमें एक दो सीनियर सिटीज़न ऐसे हैं जो खुद खड़े रहते हैं और उन की जगह पर जवान लोग ..(जवान का मतलब ६० साल से कम)....बैठे रहते हैं…और इस डिब्बे में एक जवान तो ऐसा है जो हमेशा सीनियर सिटीज़न की सीट पर बैठा सफर करता है …अच्छा पढ़ा लिखा, किसी अच्छी भली नौकरी पर लगा दिखता है ….लेकिन दो तीन जब से मैंने उसे उठने को कहा है, वह मुझे देखते ही अपने आप उठ जाता है ….


अच्छी बात है, अपने आप उठ जाता है….लेकिन उस की सीट के सामने खड़े सीनियर सिटीज़न को यह बात अच्छी नहीं लगती। बातों बातों में मेरे से पूछ रहा था एक दिन कि आप क्या सप्ताह में एक बार ही आते हैं इस गाड़ी में ….। मेरी बिना वजह ज़्यादा वाकफियत बढ़ाने में कोई रुचि नहीं होती, पहले ही से नहीं थी यह आदत…..अब तो बिल्कुल ही नहीं ….किसी भी अनजान बंदे से कितनी बात करनी है, कैसी करनी है, कब करनी है….यह सब वक्त सिखा देता है ….किताबों में नहीं लिखा रहता यह सब कुछ। 


कल भी जब मैं ट्रेन में चढ़ा तो वह जवान बंदा बैठा था…वह बैठा रहा, उसने मेरी तरफ़ देखा नहीं था, मैंने उसे दूर से कहा कि एक्सक्यूज़ मी….वह उठने लगा तो उस के हमदर्द बुज़ुर्ग ने उसे कहा कि आप बैठे रहिए …उसने उस के साथ बैठे किसी दूसरे जवान को उठने के लिए कहा और मुझे वहां पर बैठने को कहा…मुझे सीट मिलने से मतलब था …




मैंने देखा जैसे ही मैं बैठा तो उस सूटेड-बूटेड बंदे ने पूरे ज़ोर से कोई पाठ पढ़ना शुरु कर दिया ….मैंने सोचा कि यार, तू कुछ भी कर, न कर ….तू चाहे रब को अपने वश में कर ले ….बस, सीनियर सिटीज़न की सीट पर कब्ज़ा न किया कर …..मैंने पहले भी लिखा है कि पास खड़े बुज़ुर्ग कुछ नहीं कहते ….चलिए, यह उन की समस्या है, मैं चुप नहीं रह सकता, मुझे अकसर कोई न कोई डिफाल्टर मिल ही जाता है और इसी चक्कर में सीट मिल जाती है …


अगर हमारे लिए सीट रिज़र्व की गई हैं तो क्यों खड़े हो कर चलें…


कईं बार तो यंगस्टर्ज़ अपने मोबाईल में नीचे नज़रें गड़ाए रखेंगे ….और उन को कहना पड़ता है …..कहना भी क्या, सिर्फ़ उन के कंधे पर हल्के से टैप करने से ही काम हो जाता है ….कईं बार कुछ को कहना भी पड़ता है कि यह सीट बुज़ुर्गौं के लिए है …फिर वे उठ जाते हैं…कईं बार सात नंबर सीट (जो दूसरी तऱफ होती है) वाला कहता है कि लिखा तो नहीं है, उसे कहना पड़ता है कि बाहर डिब्बे के बाहर लिखा है ..और तब तक दूसरे भी उसे कहने लगते हैं …हां, हां, यह सीनियर सिटीज़न की सीट है…। 


यह मैं जिस बंदे के बारे में बता रहा हूं कि वह खुद खड़ा रहता है और जवान लोगों को बुला बुला कर बैठाता है ..यह भी किसी सेठ का मुलाजिम टाइप ही लगता है, जिस की ड्यूटी ही है सीनियर सिटीजन सीट को हथियाना ……..और जिस बंदे के बारे में मैंने लिखा कि वह हमेशा मुझे इन्हीं सीटों पर बैठा या मंडराता दिखता है …मेरी कईं बार इच्छा होती है कि यार, तुम्हें सीनियर सिटीजन बनने की बहुत जल्दी है ….फिर यही सोच कर चुप रहता हूं कि ऐसे ही अनजान लोगों के साथ इतना क्या खुलना…..फिर वह मेरे से दो बातें पूछेगा …ऐसा बंबई का माहौल नहीं है …हर कोई मतलब की बात से काम रखता है …..मैं चिकित्सक हूं ….मरीज़ों के साथ बात करते वक्त इन सब बातों को दरकिनार करना पड़ता है …ताकि वे सहज अनुभव महसूस कर सकें …डाक्टर-मरीज़ का रिश्ता बहुत पवित्र रिश्ता है ….उस दौरान लोग हम से बहुत कुछ साझा कर जाते हैं और उन बातों को हम अपने अंदर दफन कर देते हैं….किसी दूसरे से चर्चा करने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता ….


हां, तो बात लंबी हो गई ….बात सिर्फ इतनी है कि मुंबई की एसी लोकल ट्रेन में किसी सीनियर सिटीजन को सीट लेने के लिए अकसर कहना पड़ता है …नहीं कहते तो न कहें, संस्कारी बनिए, और खड़े रहिए पूरा रास्ता….मैं ऐसे संस्कारों से नफ़रत करता हूं ….हां, जब कोई ज़रूरत मंद बीमार महिला छोटी उम्र की, और कोई मां अपने बीमाार बच्चे के साथ इन सीटों पर बैठी हो, तो उसे उठाने को तो सवाल ही नहीं पैदा होता ….बीमारी, लाचारी छोटी उम्र में भी झलक जाती है, किसी को कहना नहीं पड़ता….


यह मैंने जो हाल लिखा है यह मैंने मुंबई की पश्चिम रेल की एसी लोकल का लिखा है …मध्य रेल पर मैंने एसी लोकल में ज़्यादा सफ़र किया नहीं है ….हां, बात सिर्फ इतनी है कि चिढ़ होती है जब ६५-७०-८० साल के लोग खड़े हों और २५-३० वाले युवक युवतियां ओटीटी के सीरियल निपटाने में मसरूफ हों….और हां, एक बात और भी लिखनी ज़रूरी है …जब इस तरह की सीट पर बैठी किसी युवती को उठना पड़ता है तो साथ की सीटों पर बैठे दो तीन लोग अकसर हमदर्दी करने लगते हैं उससे …आप यहां बैठ जाईए, मैं तो बस अगले स्टॉप पर उतर जाऊंगा…करो यार, हमदर्दी करो, अपनापन दिखाओ, कुछ भी करो, न करो, बस, बुड्डे-बुज़ुर्ग लोगों की सात सीटों को बचा के रखो….


इन एसी लोकल ट्रेनों में महिलाओं के अलग से दो डिब्बे होते हैं….इसलिए बहुत बार लोगों का इन सात सीटों पर ही नज़रें टिकाए रखना, मुझे बहुत खलता है ….मैं किसी भी जवान को टोकने से नहीं चूकता…………लेकिन लोग अकसर नहीं कहते …शायद उनके घुटनों में अभी पूरी जान होगी, मेरे वालों में नहीं है ….खड़ा रहने मेरे लिए एक यातना है ……..। 


PS....Yes, i forgot to add one thing - Benefit of doubt! There are occasions when I come across some defaulter about whose age I can't be sure. Perhaps they are borderline cases, so I give benefit of doubt to such persons. 😂😂😂😂😂😂😂 करना पड़ता है यह भी। Otherwise, to know if a person is senior citizen or not, it is not that difficult.


मंगलवार, 15 सितंबर 2026

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक और सफ़ाई....एक म्यान में दो तलवारें कभी रही हैं?

कल गणेश चतुर्थी का शुभ-पर्व था …और मैंने सोचा कि सुबह सुबह जूहू बीच ही हो कर आया जाए…सुबह ६-७ बजे ही हो कर आ गया ….

जहां से मैं जुहू बीच पर दाखिल हुआ वहां पर यह बाहर से आता पानी समंदर में जाता देख कर चिंता हुई …मैंने अपने पिछले एक ब्लॉग में भी यह बात लिखी थी …लेकिन आज तो बाहर से आने वाला पानी इतनी तेज़ी से बह रहा था कि उस को जवान लोग ही कूद कर क्रॉस कर रहे थे …बुड्ढों के बस की बात न थी …


जुहू बीच पर थोड़ा सा टहलना शुरु किया तो मुझे लगा कि आज तो इतनी गंदगी नहीं है …गंदगी जो समंदर हमें वापिस लौटा जाता है …वह वाली गंदगी …


लेकिन इतने सारे कौवे देख कर कुछ अलग सा लगा ..बहुत ही ज़्यादा कौवे थे …यही लगा कि होगा वहां फैंका हुआ उन के खाने का कुछ ….


लेकिन यह क्या, सामने यह लंबी सी रोड जुहू बीच पर यह क्या बन रहा है ? ..जी हां, यह कोस्टल रोड बन रही है ..बांद्रा से वर्सोवा तक ….हमारी बिल्डिंग जो सी-फेसिंग है …वहां से भी यह अब इस के निर्माण का काम दिखाई देता है ….अभी तो यह काम ही दिखाई देता है ..लेकिन जब कुछ १-२ साल में इस रोड पर सरपट चार पहिया वाहन दौड़ने लगेंगे तो फिर कैसे दिखेगा….कैसे दिखेगा समंदर का यह किनारा …यह तो वक्त ही बताएगा…


हमारी बॉलकनी से समंदर का कुछ ऐसा मंज़र दिख रहा था आज शाम... सामने समंदर के अंदर काम चल रहा है ...

हां, मैं यह तो भूल ही गया था कि कोस्टल रोड हमारे सामने से गुज़रती हुई आगे जुहू बीच से होती हुई तो वर्सोवा तक जाएगी…


लेकिन कल जैसे ही जुहू बीच पर भी चल रहा इस कोस्टल रोड (समुद्र तटीय रोड़) का काम चलता देखा तो एक दम से ध्यान आ गया ….एक बार वहां भी जब यह रोड़ चालू हो जाएगी और वाहन दौडने लगेंगे तो कैसा लगेगा…यह समय ही बताएगा….


अभी मुझे लिखते वक्त ख्याल आ रहा है कि जब यह कोस्टल रोड वर्ली से नरीमन प्वाईंट तक बनी थी , जिस का काफी हिस्सा समंदर के नीचे बना है …तो यही लगता था कि व्यू खत्म हो गया..लेकिन अब वहां पर इतना बढ़िया पोमरनेड तैयार हो गया है कि वहां घूम कर मज़ा आ जाता है …कुछ दिन पहले मैं हाजी अली और महालक्ष्मी मंदिर के पीछे से होते हुए प्रोमेनेड पर टहला तो बहुत बढ़िया लगा….एक दम साफ, सुंदर …और खूबसूरत नज़ारों से भरा हुआ…देखता हूं फोटो दिखती है तो लगाता हूं …)


अभी तो जुहू बीच पर ही घूम लें ..सुबह सुबह आलस त्याग कर जब आया ही हूं तो चलिए, घूमते हैं…


हां, मैं थोड़ा आगे चल कर गया तो देखा कि कबूतर भी वहां पर बहुत से हैं ….


और गंदगी भी तो थी ही ….लेकिन बहुत से स्वच्छता कर्मचारी जी-जान लगा कर सफाई कर रहे थे ….आज से तो गणपति विसर्जन भी शुरू हो जाएगा….


पूरी व्यवस्था बढ़िया लगी ….पुलिस का इंतजाम, वॉच-टावर पर बैठे तैराक, रिस्क्यू टीम, स्वच्छता कर्मी…सब कुछ एक दम तैयार ….


एक जेसीबी टाइप मशीन भी दिखी …कचरा इतना इक्ट्ठा हो जाता होगा तो कैसे उसे ट्राली पर डाला जाए…ट्राली भी चल रही थी …और एक मशीन कल मैंने पहली बार देखी जो साफ रेत पर चल रही थी और रेत के नीचे दबा कचरा निकाल रही थी ….


                                               इस के आगे सरकारें क्या कर लेंगी.....गंदगी फैलाने वाले भी तो सुधरें!

एक काम करता हूं ..सारी तस्वीरें ही यहां लगा देता हूं और उन के नीचे कट्-लाईन लिख देता हूं ….वैसे भी ज़्यादा लिखने का आज मूड नहीं है …एक-डेढ़ महीने बाद अगर ब्लॉग लिखा जाएगा तो यही कुछ होगा ….बस, ऐसे ही यह लिखने वाला काम टलता रहता है ….


एक ख्याल……..मेरा आज का विचार यही है कि हम कुछ भी कर लें, कितने भी तरह के प्लास्टिक ले आएं…मोटे भी, और बायोकम्पोस्टेबल भी …कुछ भी …लेकिन जब तक हम लोग सिंगल यूज़ प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद नहीं करेंगे तब तक कुछ होने वाला नहीं है ………बस, स्वच्छता अभियानों के दौरान बढ़िया बढ़िया झाड़ू पकडे़ हुए, गिरे हुए दस बीस पत्तों के आगे फोटो-शूट ही होते रहेंगे ……सफाई संभव ही नहीं है जब तक यह सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बैन नहीं हो जाता ….बैन तो है लेकिन फिर भी कितना बंद है, कितना चालू …यह कौन नहीं जानता ……हर तरफ़ वही खतरनाक प्लास्टिक की पन्नियों में सब कुछ बिक रहा है ..खाने पीने का सारा सामान, सब्जियां, पकी हुई दालें, सब्जियां, दूध, चाय …सब कुछ इन में ही हमें मिल रहा है …


जब तक ये सिगंल यूज़ प्लास्टिक हमें दिखना बंद नहीं हो जाएगा, इस गंदगी, इस पर्यावरण का कुछ नहीं हो सकता…….यह हम सब जानते हैं लेकिन केले, सेब, करेले, गोभी, अरबी लेते क्यों भूल जाते हैं…..


और इस की एक उदाहरण मैं हूं ….आज मैंने एक दुकान से तीन चीज़ें ली, यही जो ऊपर लिखा है…गोभी, अरबी और छोटे बैंगन ….मेरे बैग के अंदर दो कपड़े की थैलियां थीं…लेकिन जब जल्दी से दुकानदार ने एक प्लास्टिक की पन्नी में बैंगन डाल दिए ..अभी डाल ही रहा था कि मेरे मुंह से अभी थोड़ा सा ही निकला था कि यह पन्नी मत दो …मेरे पास थैला है …लेकिन उसने भी अनसुना किया और मैंने भी सोचा चलो, अब इस बारिश में कौन यह कपड़े के झोले को गीला करे ………हमारी मां तो हमेशा बारिश हो, तूफ़ान हो या कोहरा हो….वह कैसे यह सब कपड़े के थैलों में सहेज लाती थी …….और हमारी इच्छा शक्ति ही इतनी कमज़ोर है कि थैला निकालने में आलस लगता है, बहाने बनाते हैं…..सामान लेने से पहले ही क्यों नहीं वह थैला दुकानदार के आगे कर देते …जैसे ५० साल पहले मां करती थी ……..


इसलिए यह सब लिखा कि हम लोग जो खुद को पढ़े लिखे और मोटीवेटेड कहते हैं ….अगर यह हाल इस तबके का है तो फिर तो एक ही काम से हम लोगों की आदतें सुधरेंगी और हम पुराने तौर तरीकों पर लौटेंगे ……….अगर ये सिंगल-यूज़ प्लास्टिक बाज़ार में दिखना ही बंद हो जाए…………और यह काम केवल और केवल एक ही इंसान के बस का है ….प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ……….वह नारा भी तो है …मोदी है तो संभव है। 

जुहू बीच के जिस किनारे से मैं उधर गया वहां से इतना साफ सुथरा दिखा ..और दूर आप देख सकते हैं जो सी-लिंक या क्या कहें कोस्टल रोड बन रही है ...बांद्रा से वर्सोवा ..जुहू बीच से होती हुई ...


ये भाई साहब सुबह सुबह अपने बेसिक फोन पर किसी एफएम पर पुराने हिट फिल्मी गीतों का आनंद ले रहे थे, बता रहे थे कि हम इधर मच्छीमार नगर में ही रहते हैं....एफएम चैनल कौन सा है, पता नहीं, बच्चों ने लगा दिया है ...कह रहे थे पुराने फिल्मी गीत सुन कर मज़ा आता है ...

मैंने सोचा एक पैनोरैमिक शॉट भी लिया जाए ...

एक तरफ की तो मैंने सी-लिंक के निर्माण की फोटो आप को दिखाई पहले, यह दूसरी तरफ की फोटो हे ...और अगर ज़ूम कर के देखेंगे तो बीच में भी कार्य चल रहा दिख जाएगा...

कौवों की कोई गोष्ठी चल रही है कि यहां इतना सब कुछ साफ रहे तो हमें अच्छा लगता है ...





तैराक तैयार हैं ....किसी ज़रुरतमंद की मदद के लिए ...

जुहू बीच के बीचों बीच चल रहा सी-लिंक का काम ...तस्वीर थोड़ी ज़ूम कर के ली थी ...

जहां से मैं बीच पर उतरा, वहां पर देखा बाहर से पानी तेज़ बहाव के साथ समंदर की तरफ़ भागा जा रहा है ...अब यह कौन सा पानी है, मुझे नहीं पता ...इस का मुझे कुछ ज्ञान नहीं है...

यह पानी की धारा समंदर में समा जाने को आतुर ....पानी कौन सा, कहां से आया...पता नहीं...


जिम्मेदारी के बोझ से लदी एक मां ....


दुनिया भर के लोगों के अच्छे दिन आ गए ..लेकिन हाशिये पर जीने वाले इस तबके को पिछले ५०-६० सालों से वहीं खड़े देख रहा हूं  ...इन को अपने हकों का पता नहीं, पढ़ाई की कमी है, जो पढ़े-लिखे लोग हैं, सरकारी स्कीमों का फायदा वही लोग ले पाते हैं ...इन के दिन भी बदलने चाहिए...यह मेरी इच्छा भी है, दुआ भी ....


हाई-टाईड का चार्ट लगा हुआ है जुहू बीच पर कईं जगह ....लोग को सचेत करने के लिए ..


वही पानी की धारा जो बाहर से आ कर समंदर में मिल जाने को बेताब है ...

वॉच-टावर भी बना हुआ है ...ताकि ज़रूरतमंद लोगों पर नज़र रहे ...


स्वच्छता कर्मचारी पूरी मुश्तैदी से डटे हुए हैं ....जैसे कह रहे हों कि तुम लोग मचाओ गंद, हम हैं न, संभाल लेंगे ....

जुहू बीच का भी हाल चाल कुछ अच्छे से समझ नहीं आता आज कल ...ये बड़ी बड़ी लोहे की चादरें यहां भी बिछाने की नौबत आ पड़ी है...पता नहीं ...किनारा घिसक रहा है, या रेत ही बह गई है ...





सफाई करने के लिए यह क्रेन...यह ट्राली ...व्यवस्था पूरी है ..लेकिन हम लोग गंद मचाना ही बंद नहीं करते ...

ये लोहे की शीटें तो मैंने जुहू बीच पर पहली बार देखी हैं, या पहले कभी नोटिस न की हों या फिर विसर्जन के लिए यह विशेष व्यवस्था होती हो....मालूम नहीं ...

सभी सफाई कर्मचारी अपनी फोटो खिंचवा रहे थे तो मैंने उन्हें कहा कि आप की हाज़िरी लग गई ...कहने लगे कि करना पड़ता है, प्रूफ के लिए के आ गए हैं ...और फिर बीच बीच में भी फोटो ली जाती हैं...वैसे, इस फोटो में आप जो फोटोग्राफर देख रहे हैं, वह पहले पोलरायड कैमरे से उसी वक्त फोटो खींच कर २० रुपए में दे देता था...अब खींचता वह है लेकिन आप के मोबाईल में भेज देता है २० रुपए में ...

मुझे ये तंबू-कनात देख कर उत्सुकता हुई ...




गुज़ारे लायक इतनी मराठी तो आती है कि यह पढ़ कर पता चला कि यहां पर कृत्रिम तालाब भी हैं, गणपति विसर्जन के लिए ....




मैने सोचा सीढ़ीयां चढ़ कर कृत्रिम तालाब भी देखा जाए ...

अरे वाह ...इतनी बढ़िया व्यवस्था ...आप देख सकते हैं मजबूत लोहे से बना यह तालाब ...


कृत्रिम तालाब ...गणपति विसर्जन के लिए ...


हर तरफ चाक-चौबंद सफ़ाई व्यवस्था ....लेकिन हम लोग जो गंद फैलाते हैं हम ही नहीं सुधरते ...





कोई बहुत ज़रुरी सूचना है ...मैंने अभी नहीं पढ़ी....मुझे मराठी पढ़ने के लिए खुला वक्त चाहिए .....जैसे कक्षा १-२ के छात्र पढ़ते हैं ...


मैं इन के पास ही खड़ा था, मैंने कहा कि लोग कचरा बहुत करते हैं....तो इसने कहा का कचरा तो करते हैं लेकिन इस कचरेदान (निर्मल्य कलश) में नहीं डालते ....


इतने कबूतर यहां पर इक्ट्ठे दिखे ...आज कल यहां पर कबूतरों को फीड करना एक बड़ा इश्यू है ...हाईकोर्ट तक ने इस बारे में आदेश दिए हैं ...कि जगह २ पर कबूतरों को फीड नहीं किया जा सकता, केवल निर्धारित स्थानों पर ही इन्हें फीड किया जा सकता है ...कबूतरखाने कवर कर दिए गए हैं...कबूतरों की बीठ से जो सांस की बीमारियां होती हैं, उस के बारे में छाती रोग विशेषज्ञ भी लोगों को बहुत सचेत कर रहे हैं ...



यह थी मेरी कल जुहू बीच पर ली गई आखिरी फोटो ...

लिखने को तो बहुत कुछ लिख दिया …लेकिन बात इतनी सी है कि हम गंद न फैलाएं, बाज आ जाएं सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल से …और जैसे प्रशासन कहता है कि पर्यावरण-फ्रेडली पदार्थों से सिम्बॉलिक गणेश जी की प्रतिमाओं की स्थापना करें …वरना इतना ज़्यादा प्लाटर-आफ-पेरिस और तरह तरह के रंग समंदर में जा कर पर्यावरण से किस तरह से खिलवाड़ करते हैं ….इसके बारे में आप खुद पढ़िए ….


मेरे जैसे लिखने वालों का तो काम है , लिखना ……..बात अगर मन को छू जाए तो मान लीजिए, वरना ….सप्रेम नमस्ते ….खुश रहिए, आबाद रहिए…। 


आज किसी विटेंज शॉप पर कुछ कार्ड देख रहा था ..एक कार्ड बहुत अजीब सा लगा ...आप भी उस के बारे में अगर पढ़ना चाहें.....यह सब इतना अजीब था कि मैंने उसे किसी को पोस्ट करने से पहले उस पर वह सब लिख ही दिया ..आप भी पढ़िए....