शनिवार, 4 जुलाई 2026

सम्मान जीते जी होता है ...बाद में क्या !

मरणोपरांत तो माईं लफ़्ज़ ही इतना मायूसी से भरा है। जानता हूं जाना सब ने है, कोई बच के नहीं निकल पाएगा। फिर भी मरणोपरांत लफ्‍ज़ सुनते ही माईं उदासी घेर लेती है जैसे … अकसर बड़े बड़े सम्मान देते वक्त इस का इस्तेमाल होता है …अच्छा, एक बात है कि 'मरने के बाद' वाले शब्द से फिर भी बेहतर है मरणोपरांत …क्योंकि हिंदी भी अधिकतर आम आदमी ने इतनी अच्छी से भी नहीं पढ़ी होती कि वह सन्धि-सन्धि विच्छेद तक पहुंच पाए…और जो इस के लिए फिरंगी लफ़्ज़ है…पास्थूमसली …आप पढ़ने वाले ही अनुमान लगाएं कि इस लफ़्ज़ का अर्थ ही कितने लोग समझ पाते होंगे …

कुछ ख्याल लिख लूं ..पहले ….बहुत दिनों से इस विषय पर अपने उद्गार प्रगट करना चाह रहा था …६०० शब्द लिखे भी थे, लेकिन ब्लॉगर ड्राफ्ट में कहीं छिपे पड़े हुए थे…आज फिर से ख्याल आया कि उसे पूरा करना है …मुश्किल ही से मिला ….वरना पूरा लिखने की इस वक्त कोई मंशा नहीं थी …

हां, पंद्रह बीस बरस पहले की बात है …मैं अमृतसर के पुतलीघर इलाके में स्थित पिपली साहिब गुरुदारे के आगे से निकल रहा था …उस के बाहर किसी स्वयं-सेवी संस्था ने कोई सामाजिक संदेश देते हुए एक बड़ा सा बैनर लगा रखा था …मैंने पढ़ा …उन दिनों वाट्सएप नही था, इसलिए सब कुछ बड़े ध्यान से पढा करते थे …यहां तक कि मूंगफली खा कर कागज़ का खाली लिफाफा भी फैंकने से पहले थोड़ा देख लेते थे ….शायद कुछ काम की बात ही मिल जाए।

हां, तो उस पर जो भी लिखा था कि उस की चंद बातें मेरे दिलोदिमाग में घर कर गईं …एक तो था कि जीते जीते तो किसी ने रोटी नहीं पूछी …और मरने के बाद लाश के मुंह में खालिस देसी घी का डिब्बा उंडेल रहे हैं….जीते जीते मैं तरसता रहा कि कोई मेरे पास आ कर बैठे …लेकिन नहीं, किसी को वक्त ही न मिला ..अब बीसियों लोग मेरी लाश को घेर के बैठे हैं….मेरे जीते जी इन में से किसी के पास वक्त नहीं था, मैं अकेलेपन की वजह ही से धीरे धीरे मरता चला गया ..अब मैं क्या करूं इन के घडि़याली आंसूओं का …। 

यह सब हम लोग अपने आस पास देखते हैं, महसूस करते हैं…मध्यम वर्ग की, उच्च मध्यम वर्ग की ही बात नहीं है …अरबोंपति बुड्ढे मारे मारे फिरते हैं…कितनी की खबरें अखबार में आती रही हैं और अभी हाल फिलहाल में जब वे इस जहां से रुख्सत हुए तो वही परिवार वाले उस की चिरशांति और सद्गगति के लिए उसे आग देने आ पहुंचते हैं ..जैसे जीते जी सब कुछ सामान्य रहा हो ….

कुछ दिन पहले मैं किसी वरिष्ठ संपादक के यहां बैठा हुआ था ...उन की लाईब्रेरी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा ...उन में ६०-७० के दशक के धर्मयुग, इलस्ट्रेटेड वीकली ...और भी बहुत कुछ करीने से सजा रखा था ...अचानक मेरी नज़र जिस किताब पर पड़ी और वहीं टिकी रह गई ....वह थी काका हाथरसी की एक किताब...


पहले काका हाथरसी के बारे में...मेरी उन से पहचान कब हुई? ...पहले स्कूल-कालेज के जब वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह होते थे तो इनाम के रूप में किताबें दी जाती थीं ...और कईं बार तो किताबों का चुनाव करने का भी मौका मिलता था ...आप पहले से चुनाव कर सकते थे अपनी रुचि के मुताबिक ...

हां, तो मैं स्कूल में पढ़ता था और मेरी बड़ी बहन कालेज में थीं ...उन को ऐसे ही कॉलेज के एक समारोह में दो किताबें मिली थीं...एक तो गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि (इंगलिश में) और दूसरी थी काका हाथरसी की फुलझड़ियां ...पहली किताब तो मेरे लिए क्या, सारे घर के लिए काला अक्षर भैंस बराबर थी ...बस अकसर किसी न किसी के हाथ में नज़र आती और साथ में यह बात की टैगोर को इसी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था ...लेकिन काका हाथरसी की किताब अकसर कोई न कोई पढ़ता दिख जाता ...बिल्कुल पतली सी किताब थी ...लेकिन जो भी उस को पढ़ता वह हंसता और दूसरों को काका के हसगुल्ले सुना कर हंसा देता ....इस का मतलब यही हुआ कि मेरी वाकफ़ियत काका से ५० साल से भी पुरानी है ..है कि नहीं? सीधा सीधा हिसाब है ..। 

हंसने हंसाने वाले लेखक और फिल्मी कलाकार बहुत पसंद किए जाते थे ....क्योंकि खुश रहने का यही एक माध्यम था ...रेडियो में तो आते होंगे ये हास्यकवि ..लेकिन होली इत्यादि पर आते होंगे ...मुझे नहीं याद ऐसा कोई अवसर। 

हां, तो उन संपादक महोदय के घर जब मैंने काका हाथरसी पर लिखी किताब देखी तो मैं दंग रह गया ...मैं कुछ समझ नहीं पाया....मैं जल्दी से उस किताब के पन्ने पलटने लगा ...मेरी व्यग्रता देख कर उन्होंने कहा कि इसे आप ले जाइए ..आराम से पढ़िेए...लेकिन यह बात मुझे नापसंद है कि किसी के घरेलू पुस्तकालय से कोई किताब उठा लाओ...फिर उसे न पढ़ो और न लौटाओ....और बस कुछ वक्त के बाद जब वह ढूंढने पर भी न मिले तो उसे गुम घोषित कर दिया....मुझे इस बात से बहुत नफ़रत है ...

इसलिए मैं वह किताब वहां से पढ़ने के लिए उठा कर लाने की सोच भी नहीं सकता था ..हां, फोटो मैंने बहुत सी ली हैं...शेयर करूंगा ...और देखूंगा कहीं आनलाईन मिली तो ले लूंगा...

इस किताब का शीर्षक था ...काका हाथरसी ..अभिनंदन ग्रंथ ...इस का प्रकाशन वर्ष है ...१९७६ ...आज से पूरे पचास वर्ष पहले छपी थी ..काका जिन का जन्म १९०६ का है, उन्होंने उस वर्ष अपनी आयु के ७० वर्ष पूरे किए थे ...और डा गिरिराजशरण अग्रवाल ने इस ग्रंथ का संपादन किया था ...मैंने जब से यह किताब देखी है, मेरा खयाल है कि इस से बड़ा सम्मान जीते जी किसी का हो ही नहीं सकता...

आखिर क्या देख लिया मैंने इस ग्रंथ में ...पूछिए, क्या नहीं देखा इस में। सब से पहले तो उस ज़माने के समकालीन जाने-माने साहित्यकारों ने काका के बारे में अपने उद्गगार प्रकट किए हैं....पचास के करीब तो होंगे ज़रूर ....और इन में उस दौर के अन्य चोटि के व्यंग्यकार भी शामिल हैं...

तो यह था रुतबा उस दौर में हास्य-व्यंग्य का ..

यह तो जैसे एक ट्रेलर है ...इस ग्र में ४५० पन्ने हैं...

और इस ग्रंथ में है काका की विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के साथ तस्वीरें ..अलग अलग अवसरों पर ...जिन के नीचे लिखा है कि उन्होंने काका को प्रेरित किया कि ऐसे ही हास्य-व्यंग्य से आप देश समाज का मनोरंजन करते रहिए, जन मानस का मार्ग-दर्शन करते रहिेए…

४५० पन्नों के ग्रंथ में इस तरह के पन्नों को तो गिनती में लिया ही नहीं गया ....

इस तरह कि किताब किसी को उस के जीते जी भेंट किये जाना….इस से बड़ा सम्मान हो ही नहीं सकता….उन के बीसियों समकालीन साहित्यकारों ने उन के बारे में अपने विचार लिखे और काका की रचनाएं भी इस में पढ़ने को मिल गईं…जिन को सुन कर हम लोग बचपन में लोट-पोट हो जाया करते थे …वैसे वह हास्य-व्यंग्य का सुनहरा दौर था …फिल्में हों या साहित्य हो या स्टेज हो…आज कल तो हंसने के नाम पर क्या चल रहा है, आप भी तो सब जानते हैं …कोई कुछ ऐसा कह देता है कि जेल की सैर कर आता है, मुकद्मेबाजी शुरु हो जाती है …और वैसे भी टीवी पर जो मशहूर शो आते हैं वे भी कहां देखे जाते हैं…बात बात दूसरों का बेहूदा मज़ाक, फूहड़पना, द्वि-अर्थी संवाद ….कभी यह सब देखने-सुनने को मै आतुर नहीं हुआ ..हां, कभी कभी देख भी लेते हैं …लेकिन ये जो स्टैंड-अप कॉमेडी वाले शो हैं, इन का तो फ्री पास भी मिले तो भी न जा पाऊं….शायद वे अपनी जगह, अपनी उम्र के हिसाब से ठीक ही हैं, हमारे लिए ही उन का सिलेबस अब ऑउट ऑफ सिलेबस हो चुका है …। 

इतने इतने बड़े सम्मान मरने के बाद मिल पाते  हैं. …मुझे खुशी है कि काका का एक ऐसा ही सम्मान पदमश्री उन को १९८५ में मिल गया था …यानि कि इस किताब के छपने के दस बरस बाद और उन के इस दुनिया से जाने से १० साल पहले …(वे १९९५ में स्वर्गलोक सिधार गए)...। 

जीते जीते भी तो लोगों का काम नज़र आ ही जाता होगा….ढूंढ कर उन को तरह तरह के सम्मान मिलने चाहिए….क्योंकि फौजियों को छोड़ कर उन सब लोगों का काम तो जीते जी नज़र आ ही जाता है …ऐसे में उन के मरने के बाद मिलने वाले अवार्ड्स के बारे में मेरे खयाल बहुत अलग हैं…बस मैं इस से आगे कुछ नहीं लिखना चाहता। जीते जी किसी को मिले तो वह उस की गर्मी पा कर चंद बरस और सिर उठा कर जी ले …वरना उस के जाने के बाद ……वही मरणोपरांत वाली उदास कर देने वाली बात ……। लेकिन, हां, फौजियों के लिए …जो अपने देश की रक्षा के लिए या अन्य कारणों से अपने प्राणों की आहूति दे कर वीरगति को प्राप्त करते हैं, उन को तो मरणोपरांत जितना सम्मानित किया जा सके, कम है। वैसे भी जीते जी भी आर्मड-फोर्स के जवानों-अधिकारियों को समय समय पर वीरता पुरस्कारों, विशिष्ठ सेवा पुरस्कारों इत्यादि से नवाज़ा ही जाता है ….उन सब की हौसलाफ़ज़ाई के लिए यह सब क़ाबिलेतारीफ़ है। 

अवार्ड ही नहीं …सभी तरह के सम्मान जैसे किसी रोड़ का नामकरण किसी बडे़ नामे गिरामी कलाकार, नेता, साधु-संयासी  के नाम पर रखना भी उस के जीते जी ही जाना चाहिए …सारा हिसाब किताब एक दम सांसों के चलते चलते चुकता ….वह भी देखे, उसे भी अच्छा लगे……बाद में किस ने देखा …..वैसे भी आज कल तो पुरानी सड़कों के नाम, पुराने शहरों-कसबों तक के नाम बदलने वाला काम भी ट्रेंडिंग है …कम से कम कोई बंदा जीते जी तो फूल कर कुप्पा हो पाए…। 

बस, पोस्ट का यही आशय है कि सारा हिसाब किताब जीते जी हो जाना चाहिए ..वरना पीछे रह जाने वाले अवार्ड लेते हैं और बाद में बड़े अफ़सोस के साथ यह भी कहते हैं कि काश…यह उन के जीते जी उन को मिल गया होता। बहुत सी ऐसी उदाहरणें हैं जिन को जीते जी तो नज़रअंदाज़ किया गया लेकिन मरने के बरसों बाद उन पर तरह तरह के सम्मानों की बौछार की गई ….वैसे तो यह सब भी इतना सीधा सपाट नहीं होता ….क्योकि इस में तरह तरह की राजनीति भी घुस आती है ……

कुछ भी हो दोस्तो, माईं, हमें तो वही बात मुर्दे के मुंह में घी का डिब्बा जबरदस्ती ठूंसने वाली बात बार बार याद आती है …चलिेए, छोड़तेें हैं इस टॉपिक को यहीं पर , पानी को मथने वाली बात है ….काका हाथरसी की लिखी एक बात याद करते हैं…और उस के बाद मेरी एक प्रकाशित कविता……

धार्मिक शिकारी ..

बहुत सुन चुके काव्य अलौकिक, 

कुछ लौकिक आनंद लीजिए। 

छंद छंद कर ‘काका’ कवि से , 

कलियुग के छलछंद सीखिए। 

दलबंदी के पुष्प संजोकर, 

चाटुकारिता का घिस चंदन। 

दंभ-द्वेष का दीप दिखाकर, 

करते रहो प्रभु का बंदन। 

सदाचार की बानी बोलें, 

ऐसे त्यागी तोते पालो।

“रिश्वत लेना महापाप है”

फाटक के ऊपर लिखवा लो। 

(क्रमश:)





ऐसा होता था हास्य-व्यंग्य भी उस दौर की फिल्मों में ....आज भी बार बार देखते हैं, हर बार हंसते हैं....

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

गिरते पेड़, कुचलते लोग ...

अभी इस पोस्ट को समेटने से पांच मिनट पहले यह पेपर मेरे हाथ में आया ....

हमें यह नहीं याद कि आज से ४०-५० बरस पहले जब कोई पेड़ गिरता था तो साथ में किसी न किसी की जान भी ले लेता था…पहले हनेरी-झक्खड़ (अंधेरी-तूफ़ान) आने पर, मूसलाधार गर्ज के साथ बारिश होने से पेड़ों की टहनियां कभी कभी टूट जाया करती थीं …जब बारिश थमने के बाद हम बाहर निकलते और यह सब देखते तो बहुत ज़्यादा हैरानी भी होती और अजीब भी लगता…


कईं बार पेड़ की बड़ी शाखाएं सड़क के बीचों बीच गिर जाती जिसे बहुत से लोग उठा कर या घसीट कर वहां से हटा देते ताकि आने जाने वालों को कोई दिक्कत न हो…


यह अभी कुछ साल पहले की ही बात है कि जिन शहरों में हम रहे हैं, वहां हनेरी-झक्खड़ आने पर पेड़ों के गिरने की खबरें आने लगीं….और एक दो बड़े पेड़ गिर भी जाते तो अखबार में फोटो आ जाती…अकसर लोग वहां पर उसे देखने जाते …और ऐसे लगता था जैसे उस पेड़ के जाने पर वहां आने वाले सारे लोग शोक-संतृप्त हैं…भावुक से दिखा करते थे उसे गिरा हुआ देख कर …


कईं बार पेड़ जो सड़क के बीचोंबीच गिरता तो उसे सड़क से हटाने के लिए कईं लोग आरी, हथौड़ी लेकर पहुंचे होते …और खासी मशक्कत के बाद उसे वहां से हटाया जाता …


लेकिन अभी बिना किसी तूफ़ान के…सामान्य बारिश में भी आए दिन पेड़ गिरने लगे हैं…और बड़े बड़े पेड़ जिस आसानी से छोटी छोटी बात पर गिरने लगे हैं उतनी ही आसानी से हटाए जाने लगे हैं…देखते ही देखते उसे काट कर हटाने वाली मशीनें पहुंच जाती हैं….चंद मिनटों में काट कर उसे हटा दिया जाता है …क्योंकि अब सारा सिस्टम सैट है, यह सब को समझने की ज़रूरत है, बस पेड़ के गिरने का ही इंतज़ार हो रहा होता है जैसे…


इधर बंबई में बहुत पेड़ गिर रहे हैं….अखबार में तो बहुत से कारण लिखे होते हैं…लेकिन अधिकतर पेड़ों के गिराए जाने का कारण यही दिखता है कि हमने जब जब भी विकास किया, पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाई ….सैंकड़ों-हज़ारों पेड़ जो भी हमारे रास्ते में आए हमने उन को अपने रास्ते से हटाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी…आप भी अखबार पढ़ते होंगे, कोई ऐसा विकास-कार्य देखा आपने जो इसलिए रुक गया या टल गया या जिस का रास्ता बदल दिया गया क्योंकि उस के रास्ते में हज़ारों पेड़ आ रहे थे …मुझे ऐसा एक प्रोजैक्ट भी याद नहीं है ….एक बार जब फाईल पर फैसला ले लिया गया कि पेड़ हटने हैं तो वे हट के ही रहेंगे …किसी भी कीमत पर ….कोर्ट-कचहरी भी जाने से कुछ होता नहीं …ग्रीन ट्रिब्यूनल, पर्यावरण क्लियरैंस …सब कुछ मैनेज हो जाता है और हो ही रहा है …ज़्यादा से ज़्यादा ये संस्थान ऐसे कह देते हैं कि इतने पेड़ ट्रांसप्लांट कर के इधर से उधर लगवाने होंगे, या इतने हज़ार पेड़ या इतने लाख पेड़ किसी दूसरी जगह पर रोपने होंगे ….इस से आगे मैं कुछ नहीं लिख सकता, मैं भी मजबूर हूं…


कईं बार अखबार में आता है कि जो पेड़ अचानक इतनी संख्या में गिरने लगते हैं उस के पीछे यह कारण भी होता है कुछ स्वार्थी तत्व उस की जड़ों में एसिड या कुछ और कैमीकल डाल कर उसे कमज़ोर करते हैं ताकि वह आसानी से नेचुरल तरीके से गिर जाए और उसे नेचुरल डैथ की श्रेणी मेंं लिया जा सके….


जिस स्कूल बस में वह ११ साल का विहान घर लौट रहा था ...पहुंच कहीं और ही गया। 

और भी कारण तो हैं ही, लेकिन बंबई में तो आए दिन जो सड़क किनारे बड़े बड़े विशाल पेड़ गिर रहे हैं उन का कारण यही है कि यहां पर सड़कों का कंकरीटीकरण बड़ी संख्या में हो रहा है….और उस से पहले जो ज़मीन तैयार होती है, उस के अंतर्गत रास्ते में या किनारे पर खड़े बड़े बड़े पेडों की जड़ें भी अच्छी खासी कट जाती हैं….हमें तो इन की यह हालत देख कर ही डर लगता है …पता नहीं उद्यान विभाग के विशेषज्ञों को क्यों नहीं लगता ….फिर दो दिन बाद देखते हैं कि उस सारे रास्ते पर कंक्रीट बिछ गया है, बढ़िया मजबूत सड़क बन गई है …और वह पेड़ भी वहां पर खड़ा है…कमज़ोर जड़ों के एक बात, और दूसरी बात यह कि जितनी बची भी हैं, उस का भी कंकरीट गला दबा देती है…रिजल्ट क्या? …….रिजल्ट यही जो दो दिन पहले हुआ …एक स्कूल बस जा रही थी ..अचानक एक पीपल का पेड़ उस पर गिरा …एक ११ साल का बच्चा तो वहीं ढेर हो गया और कईं घायल हो गए ….


इस केस में बीएमसी के तीन चार कर्मचारी अधिकारी सुस्पेंड हो गए हैं ….क्या हो जाएगा इस से ……उन को नौकरी से हटाने से भी क्या हो जाएगा….वैसे तो ऐसा कुछ होगा नहीं ….ऐसे हटाए जाने लगे लोग नौकरियों से तो दफ्तर खाली हो जाएंगे ….रही बात राहत की …किसी बेचारी दंपति का इकलौता एक ११ साल का बच्चा जो जला गया, उसे तुम क्या ही राहत दे पाओगे …….। ऐसी बात करना भी बेहद असंवेदनशील लगता है ….। 


अभी मुंबई में बारिश शुरु हुए १-२ दिन ही हुए थे कि यह हादसा हो गया …एक नहीं पेड़ तो १५० के करीब गिरे हैं …लेकिन अब पेड़ों के गिरने की खबरें कोई खबरें नहीं लगतीं जब तक उन के नीचे कोई शख्स न दब जाए….और हां, आए दिन जो कमज़ोर पड़ रहे पेड़ों की टहनियां गिरने से जो मोटर-कारें क्षतिग्रस्त हो रही हैं, वे तो किसी गिनती में ही नहीं हैं….बस, अगर उस वक्त उनके अंदर कोई बैठा नहीं है या वे कहीं पार्क की हुई हैं तो बस लोग इस बात ही से खुश हो जाते हैं कि जान बची सो लाखों पाए….कुछ वर्ष पहली हमारी थार जीप जो यहीं पाली हिल की मेन रोड़ पर पार्क की हुई थी, एक बड़ी सी टहनी उस पर गिरने से सुबह उस की छत पूरी फटी हुई थी …..बड़ा माथा-पच्ची हुई थी उसे ठीक करवाने में ….। 




देवानंद के पड़ोस की बिल्डिंग 


उसी रोड पर थोड़ा आगे देवानंद रोड़ पर देवानंद के घर के साथ वाली बिल्ड़िंग में भी कल एक बहुत बड़ा पेड़ गिरा हुआ दिखा …शाम के वक्त मैं टहल रहा था तो मैंने पास खड़े एक भेल बेचने वाले से पूछा कि यह कैसे हुआ। उसने बताया कि पेड़ तो गिरा परसों लेकिन एक ड्राईवर और एक दंपति जो उस कार में थे, उन की जान बच गई…..गिरते हुए इतने बड़े पेड़ ने उन की कार के बोनट को बस छुआ और लमलेट हो गया….


देखिए, कितनी सफाई से तुरंत उस पेड़ को काट फाट के साफ कर दिया गया है …पेड़ गिरने के बाद लकड़ी समेटने वाले सक्रिय हो जाते हैं …क्योंकि आज कल लकड़ी भी एक तरह को सोना ही है …


मैंने ऊपर लिखा कि कईं जगहों पर ऐसा भी देखा गया कि बड़े पेड़ों की जड़ें कमज़ोर करने के लिए उस की जड़ों में एसिड या इसी तरह का कोई केमीकल डाल दिया जाता है ताकि वे जल्दी से जल्दी गिरें और इस तरह के गिरोह के लोगों का काम आसान हो …..लकड़ी बिके और काम निपटे ….। 


कुछ दिन पहले एक खबर टाइम्स में दिखी कि मुंबई के पाली हिल इलाके में सभी पुराने पेड़ों का चेक-अप चल रहा है …तीन चार दिन चलने वाला था…मेरा ख्याल भी था कि किसी दिन देख कर आऊंगा …एक वैन में कुछ मशीनें थीं, कुछ विशेषज्ञ टाइप लोग थे ऐसा कहा गया था उस खबर में जो पुराने पेड़ों का अल्ट्रासाऊंड कर के …यह पता करेंगे कि उन की जड़ें कितनी गहरी या मजबूत या कमज़ोर हैं और बिना उन को काटे यह भी पता करेंगे कि उन के तने कितने स्वस्थ या अस्वस्थ हैं, कहीं वे अंदर से खोखले तो नहीं हो चुके ….कहने का मतलब की पुराने पेड़ों की सेहत की पूरी जांच। मैं सोच रहा था कि ये हेल्थ-चैकअप इन पाली हिल के पेड़ों का ही क्यों, फिर पता चला कि यह चैक-अप बहुत महंगा होता है ……..मुझे नहीं पता कि पेड़ों के इस चैक-्अप को कोई स्पांसर्स मिला था या बीएमसी अपने खर्च कर यह करवा रही थी…कुछ नहीं पता मुझे ….लेेकिन उस जांच के बाद यह तय किया जाना था कि कौन सा पेड़ गिरा दिया जाए किसी छोड़ दिया जाए….पता नहीं जो दो दिन पहले पाली हिल वाला जो पेड़ गिरा है, उस का हैल्थ-कार्ड का क्या कह रहा था …गिरने के बाद तो वह अंदर से पूरा खोखला दिख रहा है …। 


कल ही मैं सुबह जब कहीं जा रहा था तो एक और बहुत बड़ा पेड़ गिरा हुआ था …किसी पुरानी खंड़हर बिल्डिंग के सामने …पता नहीं मुझे तो कहीं भी पेड़ का गिरना सामान्य नहीं लगता …कितने पेड़ होते होंगे जो अपनी मौत मरते होंगे, लेकिन बहुतेरों को तो हमारा लालच, भ्रष्टाचार, हमारी उपेक्षा….ये सब मिल कर गिरा के मार देते होंगे …



उम्रदराज़ पेड़ आम तौर पर मरते नहीं, बढ़ती उम्र के साथ और भी सुंदर दिखने लगते हैं जैसे यह हमारी कॉलोनी में खड़ा यह पेड़ ….जैसे जैसे बड़ा हो रहा है, इस की सुंदरता निखर रही है …किस्मत वाला है, सरकारी कालोनी के इतने बड़े इलाके में मस्ती से खड़ा है ……..और सब का चहेता है, आप इस फोटो मेें देख ही रहे हैं….वैसे इस के यहां होने से हम अपने आप को इस से ज़्यादा किस्मतवाला मानते हैं…….है कि नहीं?

मेरा एक लेख यह भी है, १० साल पुराना...मैंने भी कल फिर से देखा, आप भी देखिएगा कभी ...लोग दो तरह के होते हैं...


और एक बूढ़े, कमज़ोर की बात भी सुन लीजिए....वह इतना कमज़ोर होने पर भी क्यों नहीं गिरना चाहता ....किस के लिए फ्रिकमंद है ....पढ़िए....


मंगलवार, 30 जून 2026

सत्यकथाएं, मनोहर कहानियां तो बहुत पीछे रह गईं ....

आज से ५०-६० साल पहले कुछ मासिक पत्रिकाएं थीं जैसे कि सत्यकथा, मनोहर कहानियां, सच्ची दुनिया….१९७० में हम लोग स्कूल में थे और किताबों-पत्रिकाओं की दुकानों पर ये भी डिस्पले की होती थीं…


इन को पढ़ना ज़्यादा अच्छा नहीं माना जाता था …लेकिन दसवीं या उस के बाद की कक्षाओं में पहुंचते पहुंचते इन पत्रिकाओं की एक-आध कहानी पढ़ ही लेते थे और सारी की सारी पत्रिका के पन्ने तो उलटा-पलटा लेते ही थे …


इस तरह की पत्रिकाओं को पढ़ने का हमारे यहां किसी को भी कोई शौक न था …तो फिर यह कैसे हमारे हाथों तक पहुंचती थी….


दरअसल मेरे बड़े मामा को इस तरह की जासूसी और जुर्म की पत्रिकाओं पढ़ने का बड़ा चस्का था….जब भी वह हमारे यहां आते - यही कोई साल में एक दो बार ..दो तीन दिन के लिए …तो मैं अकसर उन को लेटे-लेटे इसी तरह की किताबें पढ़ता ही देखता …

अभी लिखते लिखते ख्याल आ रहा है कि मेरी मां उन को कईं बार टोका भी करती थीं …क्या राम (उन का नाम), तुम यह सब क्या पढ़ते रहते हो, ऐसा क्या है इन पत्रिकाओं में …


खैर, मामा की आदत जैसी थी वैसी ही बरकरार रही …लेकिन हां, वे इंगलिश की कारवां और रीडर-डाइजेस्ट और इंडिया टूडे जैसी पत्रिकाएं भी खूब पढ़ते थे …

मुझे कभी यह सत्यकथा, मनोहर कहानियां….सच्ची दुनिया…ये सब पढ़ कर अच्छा नहीं लगा…प्रेम-प्रसंग में हत्या, जुर्म या लूट-पाट यही कुछ होता था …और यह भी कहा जाता था कि ये सब सच्ची घटनाओं पर आधारित हुआ करती थीं…ज़रूर होंगी, क्यों कि उन के अंदर जुर्म की विचलित करने वाली तस्वीरें भी छपी होती थीं…


लेकिन आज कल जिस तरह की खबरें रोज़ाना देखने-पढ़ने को मिल रही हैं, उस से यही लगता है कि इस दौर में तो वे पत्रिकाएं भी बहुत पीछे रह गई हैं…हां, अभी सत्यकथा तो मिलती है, लेकिन बहुत कम …अब जब रोज़ाना क्राइम का कंटैंट बाज़ार में धड़ल्ले से आ रहा है, ऐसे में कहां तक वे पत्रिकाएं भी अपने को इतना अपडेट कर पाएं….आज कल तो क्राइम-तक का रोज़ाना एक आधे घंटे का बुलेटिन आने लगा है …और एक नहीं, कईं यू-ट्यूब चैनल हैं ऐसे जो सुबह से शाम तक जुर्म के सभी ऐंगल दिखा दिखा कर सिर दुखा कर दम लेते हैं…। 


सिया, तू काहे की सिया…


सिया काण्ड ने तो देश की नींद उड़ा दी है …कितने दिन हो गए सिया के शातिर दिमाग का ही ख्याल बना रहता है हर वक्त। एक २० साल की लड़की इतनी क्रिमिनल-माईंडेड भी हो सकती है। इस केस से जुड़ी एक एक बात हिला देने वाली है। पूरी एक ओटीटी की सीरीज़ जैसी….उस से भी डरावनी। 


जाने वाला गया …अब मोमबती पकड़ के कैंडिल मार्च करें या कुछ और …वह नहीं आने वाला… तीन परिवारों की ज़िंदगी बिना किसी कसूर के बरबाद हो गई …ऊपर से मीडिया वाले उन को परेशान कर रहे हैं, सो अलग। 


मैं तो वैसे भी ओटीटी पर सीरीज़ बहुत कम.. न के बराबर ही देखता हूं। सिर दुखने लगता है ..वही घिसी पिटी गालियां, एडल्ट कंटैंट और मार-धाड़, चीर-फाड़ …कौन देखे यह सब….वैसे भी जब रियल लाईफ में सिया-चेतन जैसे किरदार मौजूद हैं, आप को सब कुछ लाइव बताने के लिए …तो ओटीटी के किस्से-कहानियों में रखा ही क्या है…


लोकल ट्रेन में कत्ल ….

कौन सा ओटीटी प्लेटफार्म हमें ऐसा कुछ लाईव दिखा सकता है …जो बंबई की लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास कोच में भरे लोगों ने देखा कि एक आदमी ने एक २२ साल के युवक को चाकू से मार डाला…तमाशबीन देखते रह गए …व्हीडियो बनाते रहे ….पकड़ा गया, लेकिन उस से क्या, जाने वाला गया …जो वॉयरल हुई व्हीडियो ने फौरन दुनिया के कोने कोने तक पहुंचा दिया, क्या यह काम सत्यकथाएं कर सकती हैं….


खरबूजा खाने से मौत …

एक परिवार के चार मैंबर कुछ दिन पहले तरबूज़ खा के मर गए…उस में चूहेमार दवा की मिलावट पाई गई …अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है कि वह कैसे उस तरबूज़ तक पहुंची …


सात साल के लड़के की ओक्सीटोसिन इंजेक्शन लगने से मौत …

किसी रंजिश के चलते एक आदमी ने पड़ोसी के सात साल के बच्चे में जानवरों को लगने वाला ओक्सीटोसिन इंजेक्शन घोंप दिया ….वह मर गया …यह कल की खबर थी …मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था …लेकिन फिर जब मैंने गूगल पर जा कर थोड़ी रिसर्च की तो कुछ कुछ समझ में आया कि उस की मौत क्यों हुई होगी….। 

ये ओक्सीटोसिन के टीके पशुओं का दूध निकालने से पहले देते हैं …यह सब तो हम लोग पचास पचपन बरस पहले भी अपनी आंखों से देखते रहे हैं …किस तरह से गाय या भैंस को दूध वाले का बेटा कुक्कू झट से एक पहले से भरा हुआ टीका ठोंक देता था…जी हां, बिल्कुल सही लिखा है, ठोक देता था, क्योंकि टीका लगाते तो मेडीकल स्टाफ हैं, दूसरे तो ठोकते ही हैं…अंजाम कुछ भी हो….कोई परवाह नहीं। 


मुहर्रम के जूलूस में जहर वाले कैप्सूल फैंकने की साजिश …

दो दिन पहले जुलूस में एक आदमी ने पब्लिक में दर्द-निवारक कैप्सूल बांटने चाहे ताकि लोगों का शारीरिक दर्द कम हो …और उन की इम्यूनिटी बढ जाए। ५० किलो ज़िंक-सल्फाईड मंगवाता है आनलाईन और ३० हज़ार खाली कैप्सूल …फिर उन को भरने काम करता रहा, एक सस्ती सी लॉज में किराए पर एक कमरा ले कर रह रहा था। पेपर में लिखा था कि उस का टॉरगेट था ३० हज़ार लोगों को निपटा देना…लेकिन खबर ही पागल पन जैसी लगी थी …चूहेमार दवाई ठीक है, ज़हर है, लेकिन चूहों की तरह ३० हज़ार लोग वहीं के वहीं थोड़े न ढेर हो जाएंगे…कुछ लक्षण होंगे ….कुछ खाएंगे, कुछ नहीं खाएंगे…अभी उसने थोड़े ही केप्सूल बांटे थे कि पुलिस के हत्थे चढ़ गया….

आज के पेपर में यही आया है कि उस का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है….खिसका हुआ है हर तरह से…ऐसा काम इसी तरह का ही इंसान कर सकता है ….। 


देशी घी की मिलावट ….

अभी अभी हमारे एक सीनियर डाक्टर ने एक व्हीडियो शेयर की है जिस में बताया गया है कि देशी घी के नाम पर इतनी मिलावट, इतनी धोखेबाजी हो रही है, पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल हो रहा है ….टैलो नाम आप को याद होगा, यह कोई नईं बात नहीं है….जहां तक मुझे ख्याल है ये सब धंधे हम कम से कम ३०-४० साल से तो देखते ही आ रहे हैं…..पशुओं की चर्बी को देशी घी में मिलावट के लिए इस्तेमाल करना या पशुओं की चर्बी से तैयार किया घी और तेल होटलों, रेस्टरां में इस्तेमाल होना ….अब ये खबरें पुरानी हो गई हैं …सब जानते हैं …लेेकिन हम जान कर अनजान बनने का मज़ा ले रहे हैं ..यही सोच कर कि होता होगी मिलावट कहीं और, हमारे आस पास तो नहीं है ….चलिए, खुशफ़हमी का आनंद लीजिए….

लेकिन एक बात जो आज के संदर्भ में बहुत ज़रुरी है …वह लिख कर इस पोस्ट को बंद करता हूं …कुछ महीने पहले मैं अपने किसी मित्र के पास बैठा हुआ था …अचानक फोन आया …जैसे डिलीवरी वालों का आता है …पता चला कि राजस्थान से उन का शुद्ध देशी घी आ रहा है ….बताने लगे कि ऑन-लाईन एक व्हीडियो देखी थी कि ये लोग शुद्ध घी बेचते हैं ….और इसीलिए उन्होंने भी एक किलो आर्डर कर दिया ….दो हज़ार रुपए में एक किलो था….

वह बंदा एक किलो देसी घी की बोतल दे गया ….फिर वह दोस्त उस को हर तरफ़ से देखने लगा …पूछने लगा कि क्या यह आप को सही लग रहा है …

मैं हंसने लगा …

वह कहने लगा कि इस बार तो मंगवा लिया है ..आगे से ऑनलाईन पेमेंट करने की जल्दी नहीं करूंगा…

पंगा यह है कि आज कल यू-ट्यूब पर अनेकों व्हीडियोज़ की भरमार है …जो लोग देशी घी बनाते दिखते हैं …हर कोई कह रहा है उस का शुद्ध नहीं …शुद्धतम् है….लोग कंफ्यूज़ हैं….बडे़ बड़े ब्रांडों के देशी घी का हाल आए दिन मीडिया में हम देख रहे हैं….किसे कैद हुई, किसे फांसी। सब कुछ चल रहा है ….मैंने तो जहां भी इस तरह के देशी घी के किलो-दो किलो के जार देखे हैं, सब यही कहते हैं कि यह हमारे जानने वाले ने भेजा है, यह नज़दीकी रिश्तेदार ने भेजा है ….


मेरी एक ख्वाहिश है …कभी इन सब स्टार्ट-अप्स को एक टास्क दिया जाए …१५००-१६०० का जितने का यह एक किलो देशी घी बेचते हैं ….इन को इतने पैसे का भैंस का शुद्ध दूध दिया जाए…और अपने सामने कहा जाए कि करो इस से एक किलो देशी घी तैयार ….अपने आप दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा….


आज के रियल वर्ल्ड में सत्यकथाएं, मनोहर कहानियां तो क्या क्राईम नावल, मर्डर मिस्ट्री वाली फिल्में, क्राईम-शो ....सब पीछे हैं, जितने खुराफाती हम हो चुके है ....जितने मक्कार, शातिर, चालबाज़, फांदेबाज़, फ्रॉड.....हम कुछ भी कर सकते हैं ...पैसे, सैक्स, ईश्क, लोभ, लालच के चक्कर में ......बच के रहिए...।

पहले कईं बार अखबार में पढ़ लेते थे जब कोई बड़ा क्राईम होता था तो फलां फलां अभियुक्त पकड़ा गया ....और उसने कबूला कि उस को यह जुर्म करने की प्रेरणा या आईडिया सत्यकथा या मनोहर कहानीयों में प्रकाशित इस कहानी से आया ....अब तो भरमार है, सोशल मीडिया है, ओटीटी है, नेट है, सब कुछ है ...कुछ भी सर्च करने की बस थोड़ी तकलीफ है.....


सोमवार, 29 जून 2026

नाई, हेयर ड्रेसर, हेयर सैलून और नौआ...

कल इतवार का लगभग आधा दिन मेरा एक हेयर-ड्रेसर की दुकान पर बरबाद हो गया…मुझे तीन-चार हफ्तों में एक बार बाल ट्रिम करवाने ही पड़ते हैं…वरना मेरा सिर दर्द होने लगता है …इसलिए मुझे बालों की लंबाई का ख्याल करना ही पड़ता है ….

बाल कटवाने के मेरे कुछ कायदे-कानून हैं…एक तो यह है कि मैं जिस शहर में रहने लगता हूं…चाहे वहां दस साल रहूं या पांच साल…हेयर-ड्रेसर कभी नहीं बदलता और उस दुकान में जो कारीगर होता है उसे भी नहीं बदलता…अगर कभी जाऊं और वह न दिखे, तो लौट आता हूं ..वरना, हर बार एक एक बात समझानी नये कारीगर को बहुत मुश्किल काम होता है …। अभी भी जहां पर मैं बाल कटवाने जाता हूं…(हमारे बचपन के दिनों में कहते थे कि हजामत करवा लो अब, बाल इतने बढ़ गए हैं)...वह दुकान मेेरे घर से लगभग आधा घंटे की दूरी पर है …४-५ किलोमीटर की दूरी पर है। 


ये जो मैंने इतनी तरह के नाई ऊपर लिख दिए हैं, ज़रा इन के बारे में बात करें…


नाई…यह आज से ५०-६० बरस पहले हुआ करते थे …हैं तो अब भी हैं, लेकिन अब हम लोग इन के खोखों से बाहर हो गये हैं…बचपन में नाई के पास जाने का मतलब, बालों पर मशीन चलने से होने वाला दर्द, उस्तरे के एक दो कट, और ऊपर से फिटकड़ी की रगड़ाई से जलन ….लेकिन बाहर आते ही जैसे ही पिता जी एक छोटे से लिफाफे में (यही कोई ५०-१०० ग्राम होती होगी)...बर्फी दिला देते, मैं सब कुछ भूल कर उन की साईकिल के अगले डंडे पर बैठ कर खुशी से खिला हुआ घर लौट आता…। नाई की दुकान की एक खासियत थी …एक तो उसने उस्तरा तेज़ करने के लिए एक चमड़े की बेल्ट टंगी होती थी, एक पुरानी सी मशीन जो बाल नोंचते नोंचते बीच बीच में अटक जाती थी और दीवारों पर अखबारों से काट कर आटे की लई से चिपकी हेमा मालिनी, धर्मेंद्र, राजेेश खन्ना, मुमताज की अलग अलग मुद्राओं में फोटो …और लकड़े की बैंच पर पड़ी एक दो मायापुरी ….और हां, इन दुकानों पर लोग कमीज़ उतार कर हाथ ऊपर कर के बगलें साफ़ करवाने से भी गुरेज नहीं करते थे …देख कर ही बड़ा अजीब सा लगता था…


हेयर-ड्रैसर …कॉलेज तक पहुंचे तो हेयर-ड्रेसर …यह थोड़ी साफ सुथरी दुकानें थीं …कांच वांच के दरवाज़े लगे हुए ..शायद कूलर वूलर का भी कुछ जुगाड़ होता था …और अंदर टीवी पर कुछ न कुछ चल रहा होता …अभी तक अधिकतर इन पर ही जा कर बाल कटवाए हैं…पैसे कम लगते हैं, इसलिए नहीं …बस, इसलिए क्योंकि मेरा तजुर्बा ऐसा रहा है कि इन में काम करने वाले कारीगर अपने काम में बहुत माहिर होते हैं…सारा वर्क-लोड का गणित है …।

आज से तीस साल पहले जब यह बगलें वगलें कटवाने का काम भी हेयर-ड्रैसर के पास ही होते देखा तो क्या करें, बस, एक आईडिया आया कि तब से हमेशा हेयर-ड्रेसर के पास अपनी ही किट ले कर जाता हूं ..कुछ ज़्यादा नहीं, एक महंगी से डेढ़-दो हज़ार की कैंची है, दो कंघे हैं और एक ट्रिमर है …पहले ट्रिमर नहीं था तो अपना उस्तरा अलग से ले कर जाना पड़ता था…। और हां, हेयर-ड्रैसर की दुकानों में भी ए.सी लग गये थे …लेकिन चलाते उसे सोच-समझ कर …बेतहाशा कभी नहीं….


हेयर-सैलून …या यूनिसेक्स हेयर स्टूडियो ….ये बहुत हाई-फाई हेयर-केयर सेंटर….पैसे तो बहुत ज़्यादा लगते ही हैं, उस की भी कोई बात नहीं …लेकिन इन का माहौल ऐसा होता है कि कस्टमर किसी कारीगर को कुछ बता नहीं सकता…और जाते ही अकसर वे बाल धोने लगते हैं…बस, मैं एक बार बेटे के साथ गया था इस तरह की एक जगह में …और दोबारा वहां न जाने की ठान ली…। कहने का मतलब यह है कि ये ठिकाने अपने सिलेबस में नहीं हैं। 


नौआ….अच्छा, आप सोच रहे होंगे की नाई, हेयर ड्रेसर, हेयर सैलून तो चलो देखा है, यह नौआ क्या हुआ। इस के बारे में मेरी जितनी जानकारी है, उसे लिख देता हूं। स्कूल में पढ़ते थे तो कॉलोनी में एक बंदा था, जो रेल महकमे में काम करता था और अपनी आमदनी को थोड़ा बढ़ाने के लिए साईकिल के कैरियर पर एक छोटी सी लोहे की ट्रंकी रख कर बाल काटने जाता था …मैंने कईं बार देखा उस को ..मुझे नहीं पता उन की कोई दुकान थी, या किसी के बुलाने पर जाता था …। लेेकिन मुझे इतना अच्छे से याद है कि जो उन का बड़ा बेटा था…उस को जब कॉलोनी के लड़के नौआ-नौआ के नाम से पुकारते तो वह आग-बबूला हो जाता….पहले तो गालियों की बौछार, उस से मामला अंडर-कंट्रोल हुआ तो ठीक, वरना वह तमाचे जड़ने लगता था ….पता नहीं उसे क्यों इतना बुरा लगता था …मुझे यह समझ न तब ही आया ..और न ही आज आया…नाई को नौआ कहते ही हैं…उसमें कौन सी गलत बात है …हां, वह चिढ़ता था, तो लोग उसे बार बार नौआ नौआ कहा करते थे…। 


एक ऐसे ही होम-विज़िट करने वाले नाई से हमारा भी वास्ता पड़ा ….


यह आज से बीस-बाईस साल पहले की बात है…हम लोग हरियाणा के यमुनानगर में पहुंचे ही थे कि वहां पर एक मरीज़ आया मेरे पास….कहने लगा कि बाल काटने का काम भी करता हूं …मैं आप के यहां आऊंगा..मैंने हां कर दी। 


वह अगले दिन अपनी स्टील की ट्रंकी लेकर पहुंच गया…जिसमें उस की मशीन थी …और दूसरे औज़ार भी …तब तक मैं अपनी किट से बाल कटवाने लगा था…मैंने उसे साफ बता दिया कि मेरे बालों में और वह हाथ से चलने वाली मशीन नहीं लगानी….(जो हम लोग बचपन में देखा करते थे)...सर्दी के दिन थे…छत पर हम बैठ गए ..हम सब ..मैं और बेटे …लेकिन उसने ऐसे बाल काटे जैसे घास काटते हैं….बेटों ने तो तौबा कर ली उसी दिन फिर कभी उस की पकड़ में न आने की …मैंने एक मौका और दिया…सर्दी के दिनों में छत के ऊपर चारपाई मैं बैठा और वह भी वहीं पर कहीं …इतनी फुर्ती और अपने काम की इतनी तारीफ़ कि मैं फलां फलां अफसर की कटिंग करता हूं और फलां फलां बड़ा अफसर तो दिल्ली जा कर भी मुझे ही बुलवाता है …। खैर, मैंने भी दो बार उस से कटवाने के बाद तौबा कर ली…। दरअसल, यह नाई नहीं नौआ था …। 




फुटपाथ पर भी नाई ….बंबई में जो काम लोग हज़ारों में करवाते हैं, उसे दस-बीस में भी करवाने के सभी जुगाड़ हैं…जब मेैं फुटपाथ पर लोगों को दाढ़ी बनवाते या बाल कटवाते हुए देखता हूं …तो उन कारीगरों की मन ही मन तारीफ़ किए बिना रह पाता। मेरी नज़र में ये अपने काम में सब से ज़्यादा माहिर होते हैं …क्योंकि जो कुछ हो रहा है, लाइव हो रहा है, फुटपाथ पर बैठ कर दाढ़ी बनवाना और दाढ़ी बनाना, बाल काटना अपने आप में एक फ़न है ….मैं अकसर इन को देख कर बहुत हैरान होता हूं….हैरान से भी ज़्यादा, इन के टेलेंट से बहुत ज़्यादा प्रभावित होता हूं …। 


कल बाल कटवाने वाली बात तो कहीं पीछे छूट गई …..


कस बाल कटवाने वाली बात तो कहीं गुम ही हो गई…उस के बारे में लिख कर बंद करूं इस पोस्ट को …

हां, तो मैं सुबह दस बजे के करीब अपने हेयर-ड्रेसर के पास पहुंच गया..लेकिन तीनों कुर्सियों पर लोग बैठे हुए थे …

अकसर मुझे १०-१५ मिनट से ज़्यादा का इंतज़ार नहीं करना पड़ता …लेकिन कल तो काम लंबे ही चल रहे थे ….


एक 30-35 का जवान लड़का किसी माटुंगा वर्कशाप में काम करता है (वह कारीगर को बता रहा था)...पहले उसने शेव करवाई, फिर बहुत फेशियल…और फिर स्टीमिंग …..और फिर पता नहीं फेशियल मसाज ….एक डेढ़ घंटे की पूरी स्कीम थी ….। उस के चेहरे की मालिश के लिए एक वॉयब्रेटिंग मशीन का इस्तेमाल किया गया…वैसे तो वह जिम में वर्क-आउट करने वाला लगता था …पता नहीं अलग से उसे अपने चेहरे का इतना वर्क-आउट करवाने की क्या ज़रुरत आन पड़ी। 


दूसरी कुर्सी पर….एक बुर्जु्ग थे …यही कोई ६०-६५ की उम्र थी….पहले उन्होंने अपनी मूछों पर काला कलर लगवाया….बड़ी बारीकी से काम किया गया उन का ….फिर उन को छोड़ दिया गया….कुछ वक्त बाद उन की मूछों पर शैंपू किया गया….फिर उन की शेव हुई और फिर चेहरे की मसाज हुई।


वक्त ज्यादा लग रहा था, मैंने अपने बैग से एक मैगज़ीन निकाली …और पढ़ने लगा ..मोबाईल पर गाने सुनने लगा….दुकान मालिक कहने लगा कि आवाज़ थोड़ी बढ़ा दें, आप जो गाने सुनते हैं, हमें भी बहुत पसंद हैं…

हां, तीसरी कुर्सी पर जो अधेड़ उम्र (५०-५५ बरस के) सज्जन बैठे थे उन की शेविंग होनी थी …अच्छे से शेविंग हुई ….और फिर कारीगर ने पूछा …और बताओ?

कोई जवाब नहीं आया …तो कारीगर ने कहा …हां, बताओ फेशियल या मसाज भी ..

हां, हा, करो दोनों करो …जवाब मिला…

बस, फिर उस बंदे का काम ऐसे शुरु हुआ कि खत्म होने को ही नहीं आ रहा था …

पहले उस के चेहरे की फेशियल की गई …वही पैक लगाया गया, फिर स्टीमिंग …फिर कारीगर ने हाथ में एक मशीन पहन ली और उस से उन के चेहरे की रगड़ाई की …

और उस के बाद उस के सिर की चंपी की गई ..उसी मशीन से ..

फिर उस बंदे की पीठ पर मसाज की गई …एक गोल से दिखने वाले मसाजर के साथ ..जो भी बहुत ज़्यादा वॉयब्रेट कर रहा था ….
इतना होने के बाद …उस ने खड़े होकर अपने बाजू ऊपर उठा दिए …कि करो, बगलें भी साफ़ करो ….

सच में …यह बंदा तो पूरा चमक चुका था…पूरा कायाकल्प ….


अब मेरी बारी थी …१०-१२ मिनट में मेरे बाल काटे गए ….जैसे वह हर बार पूछता है कि और कुछ। मैंने कहा ..नहीं, यार, कुछ नहीं और। दरअसल कुछ साल पहले मैंने भी देखा देखी एक बार सिर की मसाज किसी हेयर-ड्रैसर की दुकान से करवाई थी …एक मशीन वह सिर पर फिराता रहा ..दस-पंद्रह मिनट….बाद में मेरी ऐसी आफ़त आई कि मेरा तो सिर ही घूमने लगा ..पूरा दिन चक्कर आते रहे ….बस, उस दिन से तौबा कर ली..। 


ये तो नाई, नौआ से जुड़ी अपनी यादों बातों का एक ट्रेलर ही है, कभी लिखने लगें तो दस-बीस कागज़ काले कर दें….चलिए, अभी के लिए इतना ही ….। 


और हां, अभी मैं बाहर आ ही रहा था कि एक बुजुर्ग आए ….करवाने तो दाढ़ी ही आए थे …लेकिन पता नहीं कैसे एक नये कारीगर ने पूछ लिया…कि बाल भी कटवाएंगे। उन्होंने कहा ..जब हैं ही नहीं, तो काटोगे क्या। मेरे वाला कारीगर हंसने लगा …मैंने पूछा तो कहने लगा कि अभी पिछले हफते ही तो कटवा के गए हैं, इस उम्र में इतने बाल भी नहीं है उनके और इतनी जल्दी बढ़ते भी नहीं है, इसलिए कह रहे हैं कि जब हैं ही नहीं, को काटोगे क्या।😂 



रविवार, 21 जून 2026

कर्नाटक टिफिन रूम भी बंद हुआ ...

कुछ महीने पहले मेरे बेटे ने दो चार बार कहा होगा कि घर के पास ही एक अच्छा साउथ इंडियन फूड सेंटर खुला है..बढ़िया है, अगर कभी इच्छा हो तो चले जाओ करो…लेकिन जैसे आज कल के बच्चे, वैसे ही मां-बाप….जैसे बच्चे हमारी बात को आई-गई कर देते हैं, वैसे ही मां-बाप भी …मैंने भी कुछ खास ध्यान नहीं दिया …यही सोच कर कि आज कल की खाने-पीने की अलग पसंद हैं, हम जैसे पुराने लोगों की अलग…


मैंं न कभी उधर गया और न ही इस के बारे में पूछने की ज़रूरत ही समझी …क्योंकि मेरी यहां वहां ऐसे ही कुछ भी ट्राई करने में कोई दिलचस्पी नहीं रही कभी भी। 


खैर, कुछ ऐसा हुआ एक दिन कि हम सभी से जा रहे थे और वहां पर खाने के लिए चले गए…पहली बार मैंने उस जगह को देखा था ..नाम था …कर्नाटक टिफिन रुम…वहां पर साउथ इंडियन फूड मिल रहा था ..मैंने डोसा खाया…






मैंने डोसा खाया और इतना पसंद आया कि मैंने उस जैसा डोसा घर के बाहर अपनी अभी तक की ज़िंदगी में कभी नहीं खाया था …मैंने जब यह बात बेटे को बताई तो उसने कहा कि मैं तो आप को कह ही रहा था …(घर के बाहर वाली बात इस लिए लिखी कि घर का डोसा तो हर घर में दुनिया का सब से बढ़िया होता ही है…इस में कोई दो राय नहीं)...जैसे मां का बनाया घर का खाना दुनिया का सब से लज़ीज खाना होता है …मांएं जैसे एक बैंच-मार्क सैट कर के चली जाती हैं और फिर ज़िंदगी भर हर खाने-पीने की चीज़ की मां के हाथ से बनी दाल-सब्जी से तुलना करते रहते हैं….और यह पक्की बात है ..अच्छा, लिखते लिखते याद आया कि जैसे हम लोग अपनी मां का खाना याद करते हैं, हमारी मांएं अपनी ज़िंदगी में अपनी माओं (नानी) के खाने की तारीफ़ें करती नहीं थकतीं…जैसे मेरी मां अकसर कहती थी कि नानी के हाथ के करेले, राजमाह, बैंगन का भर्ता…..सब कुछ बेहतरीन था नानी का ….।और हमें सुन कर हैरानी होती थी कि अरे यह क्या, मां के आगे भी कोई है…खाने बनाने में।


बाज़ार के मसाले डोसे से मुझे जो शिकायत है ….


मसाले दोसे बाहर जब खाते हैं तो लगभग सभी जगह जितनी जगहों पर मैं गया हूं ..सांभर एक दम पतला, और दोसा भी बिल्कुल पतला। 


अब पंगा यह है कि जो लोग डाईटिंग पर हैं या उस रेस्टतां में डेटिंग के चक्कर में गए हैं, उन को तो कुछ भी चलेगा….लेकिन यहां तो डाईटिंग-डेटिंग की कोई बात नहीं है, हमें तो भूख लगी है, हम तो भई पेट भरने के लिए जा रहे हैं…लेकिन कुछ मज़ा अकसर आता नहीं …हम वे आलू ही न थोड़ा खाने जा रहे हैं…


मुझे ऐसा लगता है कि रेस्टरां दोसे के मेटीरियल में और सांभर की दाल में बचत करना चाहते हैं….चाहते क्या हैं, करते ही हैं…। एक बात और यही बात मैंने एक बार किसी के सामने कही तो उसने अपना ज्ञान बघार दिया कि असल में सांभर का सही तरीका यही होता है ……..ठीक है, अगर यही पानी जैसा सांभर ही सही तरीका है, तो रखो यार इसे अपने आप ….हमें अपनेे छोले-भटूरे ही मुबारक हैं…। 


वैसे भी साउथ इंडियन फूड से मेरी पहचान बहुत बाद में हुई ….


इडली से पहली मुलाकात….


पांचवी छठी कक्षा में पढ़ते थे ..पैदल डीएवी स्कूल जाते थे ..रास्ते में अमृतसर का मशहूर दुर्ग्याणा मंदिर पड़ता था, उस के बाहर कुछ लोग स्टील के डिब्बों में कुछ सफेद सफेद रंग के गोले से पानी जैसी दाल के साथ बेचते दिखते थे….इसी फुटपाथ पर कुछ मांगने वाले भी बैठे होते थे ….और इस बालपन में मेरे अंदर यह बात बैठ गई कि यह गरीबों का खाना है, कुछ लोग मुफ़्त में बांटने आते हैं….यह बिल्कुल ईमानदारी से लिख रहा हूं…कोई भी इस बात को अन्यथा न ले, जैसा महसूस करता था उन दिनों वही लिखा है…


बात ऐसे ही कईं साल तक देखते रहे इडली सेवा ….बाद में बहुत वर्षों के बाद जब कालेज जाने लगे तो यह भी देखा कि अमृतसर मंदिर में जो श्रद्रालु लोग दूसरे प्रांतों से आते थे …वे अकसर उस सफेद रंग के गोले को खाते थे …..बडे़ चाव से ….उस सफेद रंग के गोले को इडली कहते हैं, यह तो ३० साल की उम्र में पता चला होगा …या इस से भी बाद में। हां, उस सफेद गोले का दाम बहुत कम था …जहां तक मेरी याद मेरा साथ दे रही है, यही कोई पंद्रह या पच्चीस पैसे में एक सफेद रंग का गोला (इडली) मिल जाता था ….। 


उस गोले को खाने का तो क्या, उस का स्वाद चखने का तो प्रश्न ही न था, क्योंकि ऐसा लगता था कि यह हमारे लिए नहीं है…..। 


डोसे से पहली मुलाकात….


२५ साल की उम्र होने पर रोहतक पीजीआई से थोड़ी दूर एक रेस्टरां था जहां पर चाईनीज़ फूड मिलता था …१९८० के दशक के आखिरी सालों की बातें हैं ..उस का नाम था ..मामा मियां….दुकान का नाम याद नहीं आ रहा ….और मुझे यकीं है ब्लॉग पढ़ने वाले भी याद नहीं कराएंगे …खैर, कोई बात नहीं, माडल टाउन एरिया की उस दुकान मेें मसाला-दोसा भी मिलने लगा था ….लिखते लिखते देखिए मुझे याद आ ही गया…अनुपम स्वीट्स, माडल टाउन, रोहतक …


शायद पहली बार या दूसरी बार दोसा खाया था कि १९९० के आसपास …तब तो कुछ और जगहों पर मिलने लगा था….


बंबई में डोसा …..


बंबई में डोसा माटुंगा में श्रीसुंदर का ही अधिकतर खाया, फिर मुंबई सेंट्रल में गीता भवन में एक दो बार (बाद में कभी नहीं गए), फिर मुंबई सेंट्रल में कल्पना और उडिपी ….इन में भी अच्छा मिल जाता था …लेकिन माटुंगा वाला (जिस का उद्घाटन जार्ज फर्नाडिज़ ने किया था ..). । 


अभी कुछ बरसों से माटुंगा के रामाश्रय, और मैसूर दोसा और षणमुखानंद हाल के सामने मद्रास डोसा….ये सब भी बढ़िया हैं…


हमने दोसे को सामान्य दाल रोटी की तरह ही खाया जब भी खाया….छुरी-कांटे से कभी बात बनी नहीं, एक बार भी नहीं ….


और हां, इन सालों में हैदराबाद, बैंगलोर, त्रिचि, केरला गए तो वहां भी डोसा ही ढूंढते रहते …बैंगलोर और हैदराबाद में अच्छा लगा …शायद बाकी जगह हम ही ठिकाने पर न पहुंच पाए हों। 


यह मैं भी कहां का कहां निकल आया….अपनी पसंद नापसंद लिखने बैठ गया…किसी को इस में क्या रुचि हो सकती है….खैर, मैं तो क.टी.एच के बंद होने की बात कर रहा था ..और दूसरा मुझे आज का अपना एक एक्सपिरिएंस शेयर करना है …

कुछ दिन पहले पता चला कि केटीएच में तोड़-फोड़ चल रही थी, पुलिस भी आई हुई थी और वह बंद हो गया है…यह आज सुबह की तस्वीर है …पहले इस के ऊपर एक छत हुआ करती थी …अब वह गायब है….पता नहीं अब कब खुलेगा., बंद क्यों हो गया…आसपास किसी से पूछो तो कोई सीधे मुंह जवाब नहीं देता …वही बम्बईया स्टाईल में कंधे उचका कर कह देते हैं…क्या मालूम। मालूम नहीं। 


आज जिस इडली-वडा स्टाल को ट्राई किया …..


कुछ महीने पहले मेरा एक मरीज़ किसी इडली-वडा स्टाल की बहुत तारीफ़ कर रहा था ….जब किसी खाने पीने की चीज़ की कोई सिख जेंटलमेन तारीफ़ करता है तो वह मेरे लिए काबिलेगौर होती है क्योंकि अमूमन इन के खाने-पीने के स्वाद बढ़िया ही होेते हैं….वह तो कह रहा था कि मैं किसी दिन ले आऊंगा …आप के सारे स्टाफ के लिए भी …मुझे ठीक नहीं लगा …मैंने ऐसे ही मना कर दिया। वह बंदा इस स्टाल की बड़ी तारीफ़ कर रहा था …कि सुबह कुछ घंटे में ही सारा सामान बेच कर चला जाता है। आप को सुबह जल्दी जाना होगा…

आज कुछ साउथ इंडियन खाने की इच्छा हुई ..तो घर के पास ही एक बेन्ने नाम से दुकान है…कुछ दिन पहले शाम के वक्त गया तो बीस-तीस लोगों की लाइन, वापिस लौट आया… ..आज नौ बजे गया …तो दुकान के बाहर आठ-दस लोग लाइन में खड़े थे ….अब यह लाइन में खडे़ होकर डोसे की दुकान में दाखिला लेना …इतना सब्र नहीं है, न ही इतनी कोई मजबूरी…..


फिर मैंने सोचा कि सरदार जी ने जिस स्टाल के बारे में बताया था, उस का पता करें…मैं उस जगह के आस पास ढूंढ ही रहा था कि एक रिक्शे वाले से पूछा कि एक इडली की मशहूर दुकान है ..कहां है, उसने सामने इशारा किया कि दुकान नहीं है, बस, यहां पर बेचने आता है ….बहुत ज़्यादा मशहूर जगह है। 




ठीक है, मैं भी चला गया ..लेेकिन एक कहावत है न कि सेलिंग लाईक हॉट केक्स (हाथों हाथ किसी चीज़ का बिकना) …यह वहां पर चरितार्थ होती दिखी ….सारे परिवार को ठीक से सांस लेने की फ़ुर्सत न थी ….तीस रुपए की एक इडली, तीस में एक मेदू वडा और तीस में ही एक दाल का वडा….मैंने भी दो इडली ली …और साथ में उसने पतली सी दो तीन तरह की चटनी भी डाल दी ….


मैं पास ही अपने स्कूटर पर बैठ कर खाने लगा …तभी मेरी नज़र पास ही दो बाल्टीयां लेकर बैठे एक इंसान पर पड़ी…जो प्लेटे धो रहा था …एक बाल्टी में बचा खुचा डालो, दूसरी में प्लेट को डुबो दो और तीसरी में डुबो कर बाहर निकाल लो….प्लेट अगले ग्राहक के लिए तैयार …


चलो जी, प्लेटें भी हो गईं साफ, ग्राहकों के अगले बैच के लिए 

वैसे यह बात यहां पर कोई नयीं नहीं दिखी …आप जहां भी कुछ खा रहे हैं, थोड़ा सा उस के आगे देखेंगे तो यही कुछ दिखेगा…हां, लेकिन एक बात की उस स्टाल वाले की तारीफ़ करनी होगी कि हर प्लेट पर एक बटर-पेपर जैसा पेपर बिछा कर ही चीज़ परोसा रहा था …लेेकिन चम्मच तो हर किसी को वैसे ही इ्स्तेमाल करना होगा ….जिस धुलाई प्रक्रिया का मैंने ज़िक्र किया है ….

चम्मचों की एक साथ धुलाई हो गई ...
मैं तो भई इस पेपर के चक्कर में इडली खा गया ...

चलिए, यहां खाने का भी शौक पूरा हुआ…आम तौर पर यहां वापिस नहीं आना चाहूंगा ..लेेकिन कभी एमरजैंसी में कुछ खाना हो तो विचार किया जाएगा, जैसा मूड होगा, देखेंगे। हां, आगे से कभी चम्मच इस्तेमाल नहीं किया करूंगा यहां पर….। 


कर्नाटक टिफिन रूम की बात कर रहा था …उस के बंद होने का मुझे बहुत दुःख है, शायद फिर से खुल जाए…पता नहीं …बहुत बढ़िया जगह थी …कियोस्क था …जहां जा कर आर्डर करो, आनलाईन पेमेंट करो …और अपनी बारी का इंतज़ार करो …और बाद में अपनी प्लेट खुद ही डिस्पोज़ करो जा कर …..बढ़िया सर्विस थी….२०० रुपए में डोसा मिल जाता था …लेेकिन सांभर किसी भी चीज़ के साथ नहीं मिलता था ….दो तरह की चटनी ..एक नारीयल की और दूसरी भी …किस चीज़ की? …शायद वह भी नारियल की ही ..लेकिन थोड़े पीले रंग की …। 


कुछ दिन से सोच रहा हूं कि यह टिफिन रूम बंद क्यों हुआ ….खैर, बुरा हुआ ….क्योंकि मुझे पहली बार घर से बाहर का डोसा पसंद आया था…वह भी चांस गया …फिलहाल तो गया ही। 

Closed - आज कर्नाटक टिफिन रूम इस हालत में दिखा ....


अभी यह पोस्ट लिखने के बाद मुझे अपनी बीस साल पुरानी एक पोस्ट याद आ गई..हरियाणा में रहते थे तब....बेटे की जलेबी में प्लास्टिक निकला था उस दिन ....मैंने इतने बरसों बाद आज पढ़ी है ...और जो वीडियो लगाई थी, उसे भी देखिए....यह मेरी ब्लागिंग की शुरुआत थी ...एक भी शब्द बदला नहीं, डिलीट नहीं किया, जोड़ा नहीं ..अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट में ...अगर चाहें तो इसे भी पढ़िए और देखिए ....क्या ये बीमारियां परोसने वाले दोने हैं...18 जनवरी २००८