कल लोकल ट्रेन में मेरे साथ बैठा एक शख्स इंस्ट्राग्राम पर एक व्हीडियो देख रहा था ...हैरान सा भी हो रहा था ...मेरा भी ध्यान उस तरफ़ गया तो मेरी भी आंखे खुली की खुली रह गईं...पत्थर-टाईलें लगाने वाला एक मिस्त्री अपने किसी साथी के दांतों की रगड़ाई कर रहा था ...यह देख कर तो मैं डर गया कि यह काम पत्थर-टाईलें काटने वाली मशीन से किया जा रहा था ....
जब मैंने उस व्हीडियो को अपने मोबाईल पर दो चार बार देखा ..तो अहसास हुआ कि मिस्त्री यह दांतों की डाक्टरी खड़े खड़े ही कर रहा था और एक बात कि मशीन उसने अपने बाएं हाथ में पकड़ी हुई थी...दाएं हाथ से उसने मरीज का सिर थामा हुआ था ....
इस व्हीडियो को देख कर कोई भी कांप जाए ....क्योंकि यह कल्पना डाक्टर ही कर सकते हैं कि यह काम कितना जोखिम भरा रहा होगा....मरीज़ ज़रा सी भी सिर हिला दे, या डाक्टर-मिस्त्री का ही थोड़ा सा भी हाथ हिल जाए तो उससे मुंह का क्या क्या कट-फट जाए, इस का हिसाब लगाना भी मुश्किल है ....दांतों की तो उस ने ऐसी की तैसी कर ही दी ...वह बात बाद में करते हैं...लेकिन दांतों पर जिस तरह से यह कारीगरी की जा रही है अगर यह मशीन होंठ को छू जाए तो होंठ और नाक को छू जाए तो नाक....उड़ के कहां चला जाए पता ही न चले, चीथड़े उड़ जाएं, आंख कौन सा दूर थी....
ईश्वर सब को ऐसी बुद्धि दे कि इस तरह के खतरनाक खेल न खेलें.....।
और भी क्या क्या हैं जुगाड़ .....
बहुत से जुगाड़ हैं जो लोग दांतों पर लगे काले-पीले धब्बे मिटाने के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं....लेकिन यह जो टाइल कटर से धब्बे उतरवाने वाला जुगाड़ मैंने कल पहली बार देखा...।
टुथ स्टेन-रिमूवर ....आज से चालीस-पैंतालीस बरस पहले जब हम लोगों ने डैंटल कॉलेज में दाखिला लिया तो हमें दूसरे साल से अपने इंस्ट्रयूमेंट भी खरीदने होते हैं...उस को प्री-क्लिनिकल ट्रेनिंग कहते हैं ...जब हम लोग फैंटम-हैड पर एक साल काम करने की प्रैक्टिस करते हैं....फैंटम-हैड पर जबाड़े भी लगे होते थे और दांत भी ...हम उन दांतों में अलग अलग तरह के प्रोसिजर करते थे ....
हां, जब हम इंस्ट्रयूमैंट खरीदने जाते तो अकसर देखते कि उस सर्जीकल-स्टोर पर कांच की छोटी छोटी बोतलें रखी होतीं जिन पर लिखा होता ...टुथ स्टेन रिमूवर। हमें तब डैंटिस्ट्री की ए-बी-सी न आती थी ...लेकिन वक्त के साथ अगले एक दो सालों में हमें हमारे सीनियर्स से पता चला कि जो नीम-हकीम, झोला-छाप, फुटपाथ पर बैठे या बिना किसी डिग्री विग्री के दांतों का काम करने वाले दांतों के ऊपर से दाग-धब्बे उतारने के लिए इस लिक्विड का उपयोग करते हैं ...और जो अहम् बात पता चली कि इस तरह का काम भयंकर है ...क्योंकि इस में एसिड मिला होता है ...जो दांतों का दाग तो क्या, उस की बाहरी परत इनैमल भी खरोंच डालता है ....
मरीज़ का हाल? - मरीज़ का हाल यह कि वह उस वक्त तो खुश लेकिन इनैमल उतर जाने से उस को ठंडा-गर्म लगने लगता है और कुछ ही दिनों में वे दाग पहले से भी बदतर रूप में फिर से लौट आते हैं...बाकी रही बात मरीज़ को बातों में उलझाने में, वह झोला-छाप से बढ़िया कौन जानता है। वैसे तो कोई वापिस आएगा ही नहीं शिकायत लेकर ...क्या क्या नहीं चल रहा फुटपाथों पर या फर्जी डाक्टरों के अड्डों पर ....। मुझे यकीं है अभी भी ये टुथ-स्नेर रिमूवर ज़रूर मिलते होंगे ....।
रेती से घिस देना....
इन सभी बरसों में कभी कभी ऐसे मरीज़ भी आए कि जिन्होंने अपने आगे के दांतों से दाग-धब्बे दूर करने के लिए रेती का इस्तेमाल कर लिया....हमें पता तब चलता जब दांतों पर गहरे गड्ढे दिखते और पूछने पर पता चलता कि यह तो दांतों को रेती से घिसने से हुआ है ....इस में भी वही, दांत की बाहरी परत घिस जाती है और वही ठंडा-गर्मी और दाग-धब्बे बद से बदतर हो जाते हैं।
दाग-धब्बे मिटाने वाले पावडर....
अकसर बाज़ारों में देखते रहे हैं कि चूहे, खटमल मारने वाली दवाई, मच्छर भगाने वाली दवाई बेचने वाले यह दांतों के इलाज की सेवा भी करते हैं, एक पैकेट तीस-चालीस रुपए का बेचते हैं ...साथ में लाउड-स्पीकर पर एनाउंसमैंट कि अब पान-गुटखे के धब्बों को खुद ही साफ करें। एक पैकेट इन्होंने खोल रखा होता है ...अगर कोई ट्राई करना चाहे तो खुशी से करे ....उस का कोई पैसा नहीं....
यहां भी वही लफड़ा है कि इस पावडर में भी वही एसिड होता है जो दांतों पर कहर बरपा देता है जैसा मैंने ऊपर लिखा है ...यह काम तो हम लोगों ने बस-अड्डों पर भी और बसों में भी होते देखा है ...।
दाग-धब्बे दूर करने वाली मोबाईल ट्राली.....
पता नहीं आपने देखा है कि नहीं, मैंने तो आज से लगभग १०-१५ बरस पहले लखनऊ की एक मार्कीट में कुछ युवक एक ट्राली लेकर चलते देखे ...जो दांतों से दाग धब्बे उतारने का काम कर रहे थे ...उस के बाद तो मैंने बहुत जगह ये कारीगर देखे हैं....आखिरी बार जब इन को देखा था तो ये दाग-धब्बे दूर करने के चालीस रुपए लेते थे...अब पता नहीं....और हां, इन का भी मोडस-ओप्रेन्डाई वही ....वही कोई स्टेन-रिमूवर लिक्विड लेकर अपने पास रखे औज़ारों से दांतों पर लगा देते हैं....यहां स्नेर-रिमूवर के लिक्विड में एसिड के रोने के साथ साथ दूषित औज़ारों से होने वाली भयंकर बीमारियों का भी भरपूर जोखिम ...।
लेेकिन यह दाग होते क्यों हैं दांतों पर .....
दो तरह के दाग होते हैं दांतों पर ....
बाहरी और अंदरूनी ...
बाहरी दाग धब्बे ....
ये होते हैं ब्रुश ठीक से न करने पर ...या कुछ खाने-पीने की चीज़ों की वजह से होते हैं और गुटखा, पानमसाला तंबाकू की वजह से भी ये बाहरी दाग धब्बे - बाहरी इसलिए कहते हैं क्योंकि ये दांत की सतह की ऊपर होते हैं....और सामान्य तौर पर ये आसानी से छूट भी जाते हैं ...किसी डेंटल क्लीनिक पर जा कर आप को स्केलिंग करवानी होगी ....और वह खाने-पीने की आदत छोड़नी होगी ताकि फिर से न हो यह सब कुछ .....लेकिन आदतें तो कम ही छूटती दिखी हैं मुझे ....वारिस शाह न आदतां जांदीयां ने, चाहे कट्टो पोरियां पोरियां जी ......
देखने में चाहे जितने भी खराब लग रहे हैं, लेकिन ये भी बाहरी दाग ही हैं....जो तंबाकू, पान वान की वजह से हैं.. ७० बरस का यह मरीज़ दो चार दिन पहले आया था ...मैंने कहा कि ये आदतें छोड़ दें, हम यह सब कालिख हटा देंगे, कहने लगा कि पान इस उम्र में कहां छूट पाएगा, क्या फर्क पड़ता है ...!!
अंदरूनी दाग-धब्बे ....
इस का सब से बड़ा कारण है ....फ्लोरोसिस....जिन इलाकों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा रहती है उस इलाकेे में रहने वालों की हड्डियों में भी कुछ जटिलताएं आ जाती हैं और दांतों पर भी पीले-भूरे दाग हो जाते हेैं....जैसे ही ये पक्के दांत मुंह में आते हैं उन पर इस तरह के पीले-भूरे दाग नज़र आते हैं...और यह अकसर बहुत से दांतों में देखे जाते हैं....चूंकि ये दांत के अंदर होते हैं, इसलिए ये स्केलिंग से नहीं जाते ....और इन के लिए भी रेती, और स्टेन-रिमूवर जैसे तरह तरह के जुगाड़ इस्तेमाल किए जाते हैं ....लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता ...पड़ सकता भी नहीं...
इसके लिए भी प्रशिक्षित दंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए ....वह अपने अनुभव से यह फैसला करता है कि क्या ये ब्लीचिंग से ठीक हो जाएंगे, या इन के ऊपर कोई दांतों के कलर की कोई फिलिंग (जैसे कंपोज़िट) कर दी जाए...दाग को छिपाने के लिए.....(उसे थोड़ा सा घिसने के बाद)....या फिर अगर पोर्सिलेन-लैमीनेट की ज़रूरत हो तो मरीज़ को बता दिया जाता है ...
सरकारी अस्पतालों में ज़्यादा से ज़्यादा कंपोज़िट फिलिंग या कंपोज़िट-लेमीनेट तक ही इलाज हो पाता है ...और वह भी कितने लोगों को मिल पाता है या कितने लोग इतने बड़े अस्पतालों तक पहुंच कर यह काम करवा पाते हैं ....यह भी एक मुद्दा है .....। इसलिए लोग फिर जुगाड़ की तरफ हो लेते हैं....।
टाइल कटर वाली घिसाई और दंत चिकित्सक द्वारा की जाने वाली घिसाई ....
टाइल कटर वाली घिसाई के तो जोखिम की बात ही क्या करें....लेकिन दंत चिकित्सक भी जो इस तरह के दांत की फिलिंग से पहले थोडी़ बहुत घिसाई करता है, वह हर तरह की सावधानी बरतता है ....सब से पहला लक्ष्य उस का यही होता है कि कुछ भी हो, मरीज़ का कुछ परेशानी नहीं होनी चाहिए, उस की तकलीफ नहीं बढ़नी चाहिए, इसीलिए जब हम लोग एयर-रोटर (हाई-स्पीड टर्बाइन) को दांतो पर चलाते हैं तो हम पूरी तरह से सचेत रहते हैं....लगातार पानी का जेट चलता रहता है, और मरीज़ को यह पहले हिदायत दी जाती है कि जब यह मशीन चल रही हो तो हिलना-ढुलना नहीं है, अगर मशीन रुकवानी है तो हाथ से इशारा कर देना, हम रुक जाएंगे.....और एक ज़रूरी बात , दंत चिकित्सक को कालेज ही से इतना पक्का कर दिया जाता है कि दांत के ऊपर रखने के बाद ही उस मशीन को चालू करना है और दांत पर ही बंद करने के बाद उसे बाहर निकालना है ....।इतनी सावधानी के बावजूद भी कभी कभी जब कोई ज़्यादा हिल-ढुल करने वाला बंदा सिर हिला देता है और अगर वह ड्रिल थोडा़ सा होंठ को भी छू जाए तो रक्त बहने लगता है ..उस जगह को दबाने भऱ ही से रुक जाता है, दो मिनट में....कोई परेशानी नहीं होती और हां, कईं बार दंत-चिकित्सक के हाथ में वह चुभ जाती है ....। मतलब यही कि बेहद सचेत रह कर काम करना पड़ता है ...इसीलिए जब से वह टाइल-कटर को अपनी बड़ी सी मशीन से दांतों की रगडाई करते देखा तो बहुत बेचैनी महसूस हुई ....इसलिए यह बात लिख दी ...........अब कौन यह सब पढ़ेगा ....इंस्टा वाली उस की पोस्टों तो लाखों-करोडो़ं ने देखी होगी ....लेकिन इस लेख को कौन पढ़ेगा, कौन शेयर करेगा....चलिए, जो मुझे मुनासिब लगा मैंने लिख दिया.......आग बुझाने वालों में नाम तो शामिल हो जाएगा मेरा ......
कोई सवाल हो तो नीचे कमैंट में लिखिए....जवाब ज़रूर दूंगा....
लिखते लिखते मो रफी साहब का पंजाबी गीत याद आ गया....१९५९ की पंजाबी फिल्म थी ...सफेद दांत हंसने से बाज़ नहीं आते ...और लोग बेकार में शक करने लग जाते हैं... जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो जालंधर रेडियो स्टेशन से यह गीत शाम को बहुत बार बजा करता था ...
पिछली पोस्ट अंगीठी पर लिख कर मैंने सोचा कि अब आगे चला जाए...लेकिन जो मुझे वाट्सएप पर मैसेज आए या जो पाठकों-मित्रों ने कमैंट लिखे....उस से मुझे लगा कि अभी अंगीठी की आग को मंद करने का वक्त नहीं आया....एक मित्र ने लिखा कि उन की मां ठिठुरती सर्दी में उन को स्कूल जाने से पहले बाजरे के पुअे बना कर खिलाती थीं....बस, फिर क्या था, हमारी भी बहुत सी यादें ताज़ा हो गईं ...जिन को लिखे बिना अंगीठी पर चर्चा तो अधूरी लगती....। इसीलिए अंगीठी पर यह अगली पोस्ट ....तंदूर, चूल्हे, कांगड़ी को बाद में देखेंगे फिर कभी ...
एक बात है कि ब्लॉग लिखते वक्त कंटैंट में कोई तरतीब नहीं बन पाती...जो जैसे याद आता गया, लिखते रहते हैं...मैं तो बिल्कुल ऐसे ही करता हूं ...शायद यही तो अपनी डायरी की यूएसपी है ..है कि नहीं? चलिए...शुरु करते हैं ....
सुबह स्कूल जाते वक्त नहाने के बाद पैर ठंडी की वजह से एकदम सुन्न पड़े होते तो जुराबें पहनने से पैरों को भी अंगीठी के ऊपर थोड़ा सेंक लेते ...पैर गर्म होने पर ही जुराबें पहनते....मैंने अपने पिता जी को अकसर ऐसे करते देखा...।
बाजरे के पुअे से ख्याल आया कि सारे परिवार का एक जबरदस्त मीटिंग प्वाईंट रसोईघर ही होता था जिसमें अग्नि देवता अंगीठी के रूप में बिराजमान होते थी...उस के आस पास सब नीचे बैठे होते ...आगे की तरफ़ हाथ फैलाए, आग तापते ...कभी किसी का हाथ आगे पहुंच जाता, कभी दूसरे का ..तब तक पहले वाला अपने हाथों को आपस में रगड़ लेता...यह सिलसिला एक दम चलता तो बस फिर वहां से उठने का मन ही न करता किसी का ...फिर मां का डॉयलाग....बस, अग्ग दे सामने एक बार बैठ जाओ तो आलस ऐसे जकड़ लेता है कि ....। लेकिन वहां से उठता फिर भी न था...इधर-उधर सारे जहां की बातें, हंसी मज़ाक.....परिवार का असल मीटिंग-प्वाईंट...जहां सब लोग दिल खोल कर बात करते थे ...जो नहीं करता था, उस का पता लग जाता था....।
रात के खाने के बाद -
यही कोई आठ -साढे आठ बजे तक उन दिनों सब का खाना खत्म हो जाता था ...क्योंकि खाने के बाद सोना ही होता था, न टीवी न टेपरिकार्डर --- रेडियो कभी कभी ८-९ रात में लगाने की कोशिश सफल हो जाती थी ....खैर, अंगीठी के पास बैठे बैठे जब खाने की आइटम खत्म होती तो फिर शुरु होता मूंगफली, रेवड़ी का दौर....कभी कभी मूंगफली वाली गज्जक भी मिल जाती....तिल वाली गज्जक तो हमें तभी खाने को मिलती जब किसी का रोहतक से आना जाना होता....क्योंकि हमें यही पता था कि यह गज्जक केवल रोहतक ही में तैयार होती है ....
और हां, सर्दी के दिनों में अमृतसर वासियों की एक खास मिठाई...भुग्गा.....खोए से बनता था, उस के बीच किशमिश खूब हुआ करती थी....मेरी बड़ी बहन की यह सब से पसंदीदा मिठाई थी ....और मेरे पिता जी यह अकसर अमृतसर के लाहौरी गेट बाज़ार से लाते थे ....
अंगीठी की आग मंद पड़ने पर तो मेरी बहन कभी कभी उस में छोटे छोटे आलू (पंजाब में उसे शरला आलू कहते थे, दूसरी जगहों का मुझे नहीं पता)..दबा देती और कुछ वक्त बाद निकाल कर उसे खाती….उसे यह सब करने में बहुत मज़ा आता था और हमें उसे यह करते देख कर ….उस की देखा-देखी हम भी १-२ आलू खा लेते, मज़ा आता….लेकिन बहन के तो ये फेवरेट थे …कोई चटनी नहीं, कोई नींबू नहीं…हां, थोड़ा नमक जरूर एक हाथ में रख लिया करती थीं….बस, उन के पतले पतले छिलके (जो आसानी से उतर जाते थे)..उतारो और खाते जाओ। कभी कभी अंगीठी पर छोलिए (हरा चना) की शाखाओं को भी भून कर उन का आनंद लिया जाता…इसी छोलिए से मुझे याद आया …बात से कैसे बात याद आ जाती है ….अभी कुछ अरसा पहले मैं छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में गया था ….वहां छोलिये की खेती बहुत ज़्यादा होती है…जहां देखो छोलिया बिक रहा था….हाट में, मेले में, बाज़ार में, साईकिल पर, रिक्शा पर छोलिया बिक रहा था…लोग १०-१० रुपए की छोलिए की डंडी लेकर बड़ी चाव से खा रहे थे …वाह! बहुत खूब..खाने की एक सेहतमंद आदत….
मां के हाथों से परोसी हुई एक थाली ...
जब कभी अंगीठी की आग बिल्कुल मंद पड़ने लगती तो मन में थोड़ी उदासी सी छा जाती कि अब यहां से उठना पड़ेगा....वैसे जब आग पूरी ठंड़ी पड़ जाती तो ऐसे लगता जैसे ...Time to wind up!! Pack up, Guys!! Pack up!! जैसे अंगीठी ही ऐलान कर देती ...बहुत हो गया, चलो, अब उठ भी जाओ, निकम्मो....जाओ, अब मुझे भी थोड़ा आराम करने दो ...और तुम लोग भी अपने किसी काम-धंधे में लगो…मुझे तो सुबह फिर से तुम लोगों के लिए तपना होगा….जाओ, अपनी रज़ाईयों में घुस जाओ जा कर…
अमृतसर में दिसंबर से फरवरी के महीने बेहद ठिठुरन से भरे होते थे …अभी भी होते होंगे ..पता नहीं, क्यों कि जब हाल फिलहाल में वहां गया ही नहीं तो किस भरोसे से लिख दूं…!!
रात के खाने के बाद ….लिखने लगा था मैं डिनर के बाद …लेकिन जब ऐसा कोई लफ़्ज़ हम लोगों ने बचपन क्या और जवानी क्या ..हमने इस्तेमाल ही नहीं किया तो कैसे लिख दूं….यह खाना वाना भी हम नहीं कहते थे …पंजाबीयों का एक ही लफ़्ज़ होता है लंच, डिनर के लिए और वह है रोटी खा लओ बई…रोटी तैयार है….मुझे हमेशा ही से यही अच्छा लगता है …दुनिया भर का सारा अपनापन इस में गूंथा पड़ा है …और हां, कभी किसी पंजाबी घर में यह भी कहां सुनने को मिलता था …(अब, पता नहीं, दुनिया बदल गई है बहुत ..खामखां की बनावट और दिखावे का हर तरफ़ बोलबाला है).....नाश्ते के लिए अकसर यही सुना जाता ….आ जाओ, पराेंठे बन गए ने, गर्मागर्म ने…खा लओ…
खैर, रात के खाने के बाद आम तौर पर एक-डेढ़ घंटे ऐसे ही बीत जाते थे …अंगीठी के इर्द-गिर्द…हां, कभी इ दौरान गाजर का हलवा उसी अंगीठी की धीमी पड़ रही आंच पर पकता रहता…और उस में बेसन डाल कर भूने जाने का इंतज़ार भी रहता…बस, उस की मदहोश कर देने वाली बेहद खुशनुमा खुशबू अब भी जस की तस अपने अंदर संभाल कर रखी हुई है …
हमारे सोने के बाद अंगीठी कितना आराम फरमा पाती ?
नहीं, नहीं, अकसर आराम उस के नसीब में लिखा ही न था…अंगीठी के इर्द-गिर्द बैठे बैठे जब थक गए, जम्हाईयां आने लगीं , जहां भर की जितनी ऊट-पटांग बातें होनी थीं, हंसी मज़ाक होना था ..सब कुछ हो गया …तो घर के सभी बाशिंदे बारी बारी से वहां से उठने लगते और जा कर रज़ाई में दुबक जाते …(उस वक्त शरीर इतना गर्म हो चुका होता कि बाहर आंगन में लघुशंका के लिए जाने में भी आलस आता …कौन जाए इतनी ठंडी में, इतने कोहरे में, ओस में …., इसलिए कईं बार उसे जितना हो सकते रोके रखते….)...
अकसर आखिर में मां अकेली रसोईघर में रह जाती …आखिर में एक चुल्लू भर पानी फेंक कर अंगीठी बुझाने का काम भी उसी के सुपुर्द था….और कईं बार अंगीठी के आखिरी वक्त में मां को ख़याल आता कि अभी तो आंच है, सेक अभी बाकी है …इसे इस तरह बुझाना बुरा लग रहा है…तभी सोने से पहले मां एक पीतल की या मिट्टी की हांडी (पंजाबी में उसे कुन्नी कहते हैं..)...में कोई दाल उस पर चढ़ा देती ..और सुबह तक वह एक दम तैयार हो चुकी होती ..और फिर तड़का मार कर वही दाल खाते वक्त हम उंगलियां चाटने लगते….बिल्कुल सच लिख रहा हूं….ऐसा ही होता था।
भोर होते ही फिर से अंगीठी की शामत ….
अंगीठी के मुकद्दर में कितना आराम लिखा था, यह तो आपने ऊपर देख ही लिया…और सुबह होते ही, मुंह अंधेरे ही उस की सारी राख एक लोहे की सीख (पतली छड़ी टाइप, आगे से थोड़ी टेढ़ी की हुई….क्योंकि सीधी उंगली से घी से नहीं, सीधी छड़ी से राख भी नहीं निकल पाती…)...से निकाल कर फिर से उसे जलाने का प्रोजैक्ट शुरु हो जाता ….कईं बार तो यह सुबह शुरु होने वाले प्रोजेक्ट का आगाज़ मां रात ही में पूरा कर के सोती…बस कुछ तैयार कर के …बस, सुबह एक उसे माचिस की तीली (दियासिलाई) का इशारा ही करना होता ….सभी तहें (लेयर्स) उपले, लकड़ीयां, कोयला…सब कुछ रात में ही तैयार कर दिया जाता ….जस्ट रेडी-टू-गो….।
ठिठुरती, हाड-तोड़ ठंडी में, ओस, कोहरे वाले मौसम में अंगीठी का जलना नामुमकिन सा होता….लेकिन कोई ग़म नहीं …स्टैड-बॉय स्रोत तैयार होता …मिट्टी के तेल से जलने वाला स्टोव ….।
अंगीठी ठंडी पड़ने पर उस से निकली राख का क्या?
इस राख को बर्तन मांजने के लिए इस्तेमाल किया जाता …अधिकतर तो बर्तन पीतल या कांसे के ही होते थे, इसलिए इन को मांजने के बाद उन की चमक-दमक देख कर अच्छा लगता था….जब कभी किसी घर में राख न होती तो उसे पड़ोस से भी ले लिया जाता ….गुलज़ार फ़रमाते हैं पड़ोसी के चूल्ह से आग ले ले ….लेकिन चूल्हे की राख तक ले लेने का चलन था, यह भी यहां दर्ज कर देना मुनासिब होगा…राख न होेने पर घर में बर्तन सफाई सेविका जगिन्दरो ..हंगामा कर देती ….और हां, अंगीठी का एक और इस्तेमाल…जगिन्दरो आते ही एक बड़े पतीले में पानी डाल कर अंगीठी पर रख देती और गर्म पानी से ही वह बर्तन घिसती…अपने छोटे से शिशु को अपनी गोद में, अपने शाल से लपेटे हुए….बहुर भली थी जगिन्दरो…बड़ी मेहनत…मेरी मां से उस की बहुत बनती थी …उस के आते ही पहले तो मां उस के लिए चाय रख देती ….सभी बहुत मधुर यादें हैं…मैं और मेरी बड़ी बहन अकसर ये सब बातें कभी कभी याद करते हैं….
रोज़ाना कैंप-फॉयर का मज़ा …
लोहड़ी के दिन बाहर आंगन में, मोहल्ले में कैंप फॉयर होती थी ..लोहड़ी मनाई जाती थी…वह ठीक है, एक रस्म अदायगी रह गई है अब तो ….लेकिन यह जो हर दिन अंगीठी के आस पास बैठ कर सारा कुनबा कैंप-फॉयर की मौज लेता था …वह कैंप-फॉयर बाद में कहां दिखती…। और न ही एक साथ बैठ कर इस तरह से कैंप फिर दिखे …क्योंकि कुकिंग-गैस के चूल्हे आने से धीरे धीरे न नीचे बैठने की ज़रूरत रही न ही आदत, इस के चलते आने वाली पीढ़ीयों में घुटनों में ताकत भी जाती रही ….और फिर इस तरह से अंगीठी के आस पास बैठने की रीत लुप्त ही हो गई…..मैंने ऊपर लिखा कि मैं तो शहरों की बात दर्ज कर रहा हूं….शायद दूर-दराज गांवों में अभी भी कुछ तो रीतियां बची हुई होंगी….पता नहीं…. क्योंकि किसी बड़े नेता के किसी दलित की झोंपड़ी में नीचे बैठ कर रोटी खा लेने से इस का सही अंदाज़ा नहीं होता, न ही हो सकता है ….ये तो शायद क्या कहते हैं बढ़िया सियासी रोटियां सेंकने का एक ज़रिया भर रह गया है …।
अमृतसर ..१९८७, चालीस साल पुरानी लोहडी की एक केंप-फॉयर कॉलेज में ..
आज की पीढ़ी के लिए यह कैंप-फॉयर-वॉयर जैसी बातें बहुत बड़ी होंगी….इन की तस्वीरें ट्रेंडिंग होंगी, इंस्टा पर, एक्स पर ….लेकिन हमारे लिए ये बिलकुल आम बातें हैं क्योंकि हम ने अपने बचपन और जवानी में हम लोगों ने यह सब खूब जिया….इतना भरपूर कि ये बेशकीमनती यादें मेरी कलम से अपने अपने निकलती जा रही हैं….मुझे कोई कोशिश नहीं करनी पड़ रही ….।
एक कैंप-फॉयर में पड़ गया पंगा …
उन दिनों मैं स्कूल में था …यही कोई छठी-सातवीं क्लास में …मेरे से बड़े भैया और बहन कालेज में थे …. एक रात हम सब ऐसे ही अंगीठी के इर्द-गिर्द जमा थे…अच्छे से याद है मुझे बहुत लज़ीज मीट बना हुआ था …गर्मागर्म रोटियां सिक रही थीं….ऐसे ही उस वक्त मेरे भाई-बहन में थोड़ी बहस जैसी हो गई (जो आज के दौर में एक आम बात है, उन दिनों हमारे घर में न थी….शायद मैंने पहली बार उन को आपस में इस तरह से बात करते देखा था…कोई खास बात न थी…)...इसी दौरान भाई ने बहन को कुछ ऐसा कहा कि मेरे पिता जो को गुस्सा आ गया, उसे बुरा भरा कहा …और वे उसे एक-दो झापड़ लगाने के लिए उस की तरफ़ लपके ….लेकिन इसी वक्त से पहले ही वह थाली छो़ड़, खाना बीच ही में छोड़ कर वहां से उठ गया ….यही कड़वी घटना आज तक मेरे दिलो-दिमाग में कैद है …..उन दौर में इस तरह से खाना बीच में छोड़ कर उठना..हिंदी फिल्मों में तो कभी कभार होता होगा…लेकिन असल ज़िंदगी में बहुत बुरा माना जाता था ….कईं बार अब फिल्मों में देखते हैं …कईं शानदार डाईनिंग टेबल पर खा रहे लोगों में से एक बंदा कुछ कह कर उठ खड़ा होता है और बाकी लोग खाते रहते हैं……..लेकिन उस रसोई वाले दिनों में अगर कोई मेरे भाई की तरह से उठ खड़ा हुआ तो फिर पूरा चूल्हा-चौका ही उस दिन के लिए पैक-अप….न किसी का खाने का मन हुआ और न ही मां के पकाने का …..अब लिखते लिखते मैं वे लम्हे फिर से जी पा रहा हूं…इस पंगे के अगले दिन तो सब सामान्य हो गया ….लेकिन मूड सब का खराब ही रहा ….मुझे नहीं पता मेरी बहन ने क्या महसूस किया होगा ….ज़ाहिर है उसे भी बुरा ही लगा होगा ….खैर, यह लिखना भी मैंने यहां इस लेख में ज़रूरी समझा, सो लिख दिया….अगर इसे दबा भी जाता तो अपने आप से ही झूठा पड़ जाता …
अंगीठी बनती कैसे थी ?
अब आते हैं एक रोचक टॉपिक पर …कि यह अंगीठी बनती कैसे थी …अभी फेसबुक पर एक रील दिखी…मिट्टी के गमले से एक अंगीठी बनाने की तरकीब समझा रहा था कोई ज्ञानी…..उसने हमारा वक्त नहीं देखा ..यही लगा….मैं जिस अंगीठी के बारे में लिख रहा हूं वे सभी लोहे की पुरानी बाल्टीयों को इस्तेमाल कर के (क्या कहते हैं आज के ज़्यादा पढ़े-लिखे पेज थ्री वाले लोग …री-साईकिल या अप-स्केलिंग या री-पर्पज़िंग…..) तैयार हुआ करती थीं।
बनी-बनाई हुई, रेडीमेड अंगीठीयां बिकती तो थीं बाज़ार में लेकिन अकसर उन को अच्छा नहीं समझा जाता था क्योंकि उन को बनाने में बिल्कुल खस्ताहाल, जंग से टूटी-फूटी बदहाल बालटी से अंगीठी बना दी जाती थी। यह सोचना भी बिल्कुल ठीक ही रहा होगा…हमारे से पिछली पीढ़ी के अपने अनुभव थे। हमारे अनुभव ही तो हैं जो हमारे छोटे-मोटे फ़ैसलों पर अपनी छाप छोड़ते हैं….।
यह सब मेहनत अब अखरती है ...यह सब काम काश कॉलेज में किए होते ...
हां तो अंगीठी बनाने का प्रोजेक्ट शुरु कैसे होता था…घरों में उन दिनों लोहे की बाल्टीयां ही हुआ करती थीं..कोई मोटा लोहे, कोई पतले लोहे से बनी हुई। घर की किसी पुरानी बाल्टी को किसी ठठेरे (जो लोहे को काटने, फाटने के ही काम किया करता ..लोहे की बाल्टी, ट्रंक, आटे की पेटी….उसे इन्हीं सब कामों से फुर्सत न थी…अभी भी अमृतसर के इस्लामाबाद इलाके के उस छोटे कद के, सांवले रंग-रूप के सरदार जी की शक्ल अच्छे से याद है …अपने काम का एक दम माहिर ….लोहे को ठोंकने-पीटने का उत्साद)....उस के पास सभी इसी तरह के मुरम्मत के मरीज़ ही आते थे …मैं अपनी मां के साथ जाता था….हां, तो वह उस बालटी को रख लेता और २-३ दिन बाद की तारीख दे देता।
उस उस्ताद की डिमांड ही इतनी थी…तीन चार दिन बाद जब मां और मैं उस के पास जाते तो पता चलता कि उसे तो इन दिनों फुर्सत ही न मिली…मेरी मां के कहने पर, हमारी उस पुरानी बाल्टी को ढूंढा जाता और वह उसी वक्त १०-१५ मिनट में तीन-चार रुपए में अंगीठी का ढांचा तैयार कर के हमें थमा देता…
अब चलते हैं अंगीठी बनने के अगले स्टेप की ओर …
इन परफेक्ट कटे हुए अंगीठी के ढांचे को साक्षात् अंगीठी की शक्ल में बदलना अगला अहम् स्टेप होता ….इस काम की माहिर अलग महिलाएं होती थीं….अकसर वे महिलाएं जो मिट्टी के बडे़-छोटे तंदूर बनाया करती थीं…अपने काम की माहिर मेहनती, खुशमिज़ाज महिलाएं। उन को अंगीठी का वह ढांचा थमा कर दिया जाता …और मां थोड़ी ब्रीफिंग भी कर देती…लेकिन आज सोचता हूं कि वह ज़रूरी न थी, क्योंकि वह बात वैसी ही है कि जैसे किसी मोची को जूता गांठने के बारे में, किसी नाई को बाल काटने के बारे में या मुझे दांत के इलाज के बारे में ब्रीफिंग करे …हम तीनों वैसा ही करेंगे जैसा हम ने करना है, जैसा हमें आता है …हां, वे महिलाएँ अपने काम की एक दम माहिर होती थीँ और चिकनी मिट्टी की मदद से वे एक बढ़िया अंगीठी तैयार कर देतीं…
अंगीठी की मेन्टेनेन्स - उस का नियमित रख-रखाव….
अंगीठी जब घर पर बन कर आ जाती तो फिर उस की छोटी मोटी रिपेयर घर पर ही कर ली जाती….उस के लिए मां ने एक मिट्टी के बर्तन में चिकनी मिट्टी घोल कर रखी होती….वह तैयार ही रखी होती …तंदूर या किसी भी अंगीठी की माइनर रिपेयर के लिए …अंगीठी का कोई ‘ मुन्ना’ अगर हिल जाता या थोड़ा टूट जाता …तो उसे भी ठीक कर दिया जाता, फिर उसे कुछ घंटों के लिए तेज़ धूप में सूखने के लिए रख दिया जाता…फिर से जलाने से पहले …इसी चक्कर में भी शायद हर घर में दो अंगीठीयां तो होती ही थीं…एक बहुत बड़ी और एक छोटी …एक लोहे की बड़ी बाल्टी से और दूसरी छोटी बाल्टी से तैयार करवाई हुई…
अंगीठी की मंद पड़ती आग को तेज़ करना …
जब अंगीठी पर रखे तवे से आलू,गोभी, मूली, पनीर के परांठों की झमझम बरसात चल रही होती तो उस अंगीठी की मंद पड़ती आग को तेज़ करने का काम भी साथ साथ चलता रहता था। किसी लोहे की सीख (सीख पंजाबी लफ्ज़ है…इस का मतलब बिल्कुल पतली सी लोहे की डंडी)..को अंगीठी के निचले सुराख से अंदर डाल कर राख नीचे गिराई जाती और खाली हुई जगह में ऊपर से कोयले डाल दिए जाते ….१-२ मिनट के लिए धुआं उठता ज़रूर….लेकिन डालडे में तैर रहे परांठे और लपेटने के सामने यह बिल्कुल भी परेशानी न थी…उसी वक्त अंगीठी की आग फिर से तेज़ हो जाती, लपटें निकलने लगतीं…
अंगीठी पर हाथ तापना ….
अंगीठी के इर्द-गिर्द उस को घेर कर बैठे बैठे आग तापते वक्त कईं बार सब लोग अचानक मौन धारण किए हुए अपने ही खयालों में गुमसुम से बैठे हुए होते …नज़रें टकटकी लगाए हुए तेज़-मंद होते अंगारों पर टिकी रहतीं….आज सोचता हूं तो यही लगता है कि यह सब भी किसी ध्यान साधना से कम थोडे़ न रहा होगा…ठीक है, तब हमें ये फेशनेबुल नाम नहीं आते थे …लेकिन ये लम्हे अपने साथ रहने वाले, अपने अंदर झांकते के लिए काफ़ी होते थे…
यह आग तापने वाला काम भी ऐसा था जो सारे कुनबे को एक साथ बांध कर रखता था …और अंगीठी ने इसे बांधे रखा जब तक अंगीठी चलन में थी….यह बंधन इक बार छिटका तो फिर बिखराव ऐसा शुरु हुआ कि परिवार के सभी लोग एक साथ बैठ कर जो दिल खोल लिया करते थे ….एक दूसरे की आपबीती, दिनचर्या सुनते थे, उन में अपनी बात जोड़ देते थे ….बात से बात निकलती थी, आगे बढ़ती थी, आगे की योजना बनती थी…सपने बुने जाते थे….मज़ाक होता था….और अंगीठ वाली रसोईयों के लुप्त होते होते यह सब भी कम होता होता गायब हो गया….
गजब का खुलापन होता था इस कैंप फॉयर में ….
ऐसी ही एक बात याद आ गई ..आठवीं कक्षा में ..पड़ोस के एक लड़के ने मुझे बार बार चिढ़ाना शुरु कर दिया कि तेरा उस से (मोह्लले की एक लड़की से चक्कर है)...मुझे वह कभी भी किसी के सामने कहने लग गया…मुझे बडा़ अजीब सा लगने लगा …ऐसी कोई बात न थी…वह इन सब कामों का खिलाड़ी लगता था …थोडा़ बड़ा था मेरे से …मैं परेशान हो गया…मेरी पढऩे की इच्छा ही जाती रही ….एक दिन ऐसे ही अंगीठी के इर्द-गिर्द मैं और मेरी बड़ी बहन बैठे हुए थे …मैं अचानक रोने लगा कि मेरा अब पढ़ाई में दिल नहीं लगता क्योंकि टीटू मुझे बार बार यह कह कर चिढ़ाता है …
बहन ने आराम से बात सुन ली, मेरा बोझ हल्का हुआ…और अगले दिन जब टीटू जी महाराज बाहर खेल रहे थे, बहन ने उस को आवाज़ देकर अपने पास बुलाया…और समझा दिया …इतना ही कहा उसे मेरे सामने …..इस तरह की फ़िज़ूल बातें मत किया करो, बेकार में परेशान मत किया करो, यह गलत बात है। बस, टीटू सुधर गया , मेरी बहन ने मेरे दिल में किसी हीरो जैसा दर्जा पा लिया और मैं फिर से आठवीं की पढ़ाई में ऐसा रमा कि मेरिट-स्कॉलरशिप पा गया….तो ऐसी होती थी उस वक्त के बहन-भाईयों की बॉंडिंग …हम कुछ भी शेयर कर लेते थे …और किसी भी मसले को हल भी तुरंत कर दिया जाता था ….मैं अकसर अपनी बहन को यह बात याद दिलाता हूं तो वह बहुत हंसती है…उसे इतनी बातें याद नहीं हैं….कितना याद रखे वह भी, एक नामचीन यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर रह कर रिटायर हो चुकी हैं….। देखने वाली बात यह है कि जब घरों ही में ऐसा स्पोर्ट-सिस्टम होगा तो चिंता, पैनिक, डिप्रेशन या और भी तरह तरह की मानसिक परेशानियों की क्या बिसात कि किसी को घेरा डाल पाएं….सारी काउंस्लिंग, सारी थैरेपी….आपस में भाई बहन बात कर के ही समझ लेते थे, सुलटा लेते थे ….सोचने वाली बात यह भी है कि आज तो हर तरफ़ काउंस्लर, थैरेपिस्ट फैले हुए हैं फिर भी आज की पीढ़ी का इतना कम थ्रेश्होल्ड ….कौन नहीं जानता!!
अंगीठी को कमरे के अंदर ले कर जाने की तमन्ना …
हां, कईं बार सोते वक्त अंगीठी को अपने साथ ही अंदर बेड-रूम में लेकर जाने की इच्छा होती…लेकिन यह काम बड़ी एहतियात से किया जाता…अगर थोड़े से वक्त के लिए ले कर जाते भी तो बडे़ ध्यान से …कईं बार रज़ाई को आग लगते लगते बचती। वैसे भी अंगीठी को सर्दियों के दिनों में अंदर रखने से उस दौर में कईं मौतें होने की खबरें आती रहती थीं…परिवार अंगीठी लेकर अंदर गया …दरवाज़े बंद थे, अंगीठी की वजह से कमरे में इतनी कार्बन-मोनोआक्साईड इक्ट्ठी हो गई कि उस कमरे में मौजूद सभी लोगों की सोते सोते जान ही निकल गई।इसलिेए अंगीठी को कमरे के अंदर लेकर जाने में डर ही लगता था ..जितना वक्त भी लेकर जाते तो खिड़की को भी थोड़ा सा खुला ही रखा जाता था…इसी से कुछ जुड़ी कांगड़ी की यादें भी हैं, वे फिर लिखूंगा किसी दूसरी पोस्ट में…।
छुट्टी पर बाहर हूं थोड़ा इन दिनों …इसलिए यह लंबा संस्मरण….
मैं आज कल बाहर हूं ..कुछ दिनों की छुट्टी पर हूं…इसलिए इस लेख को लिखते, बीच में छोडते, फिर लिखते ३-४ दिन हो गए हैं….बहुत लंबा हो गया है …परवाह नहीं….क्योंकि मैंने इस दौरान इस दस्तावेज़ में दर्ज सभी यादों को जिया है …पढ़ने वालों के न सही, मेरे लिए ये बेशकीमती हैं….यह सब करते हुए कभी नहीं लगता कि इतनी मेहनत कर रहे हैं…क्योंकि यह सब दिल का मामला है …मुझे अपने लिए तो खुशी है ही, दूसरी बात यह भी है कि इन को पढ़ कर बड़ी बहन भी खुश हो जाएगी…अब घर में अंगीठी के इर्दगिर्द लगने वाले रोज़ाना लगने वाली कैंप-फॉयर के कुल दो ही तो गवाह बचे हैं…वह और मैं…बाकी सब को बहुत जल्दी थी शायद हमें छोड़ कर चले जाने की ….।
यह जो इस लेख के ऊपर चिपका एक पोस्टर देख रहे हैं….यह मैने ही बनाया है ….अपने लखनऊ प्रवास के दौरान कुछ बरस पहले कुंअर बेचैना साहब को सुना था …उन की बहुत सी बातें दिल में उतर गईं …उन में एक यह भी है जिसे मैंने पोस्टर के नीचे लिखा है….
“बदन से तेरे आती है मुझे ऐ मां वही खुशबू
जो इक पूजा के दीपक में पिघलते घी से आती है
हज़ारों खुशबुएं दुुनियां में हैं पर उससे छोटी है
किसी भूखे को जो सिकती हुई रोटी से आती है ।।”
कुंअर बेचैन
इन सब अज़ीम अदीबों को बार बार नमन - क्या क्या लिखा छोड़ कर चले जाते हैं, कैसे यह सब इन को सूझता है ….कि इन के अल्फ़ाज़ कहीं लिख कर दोहराते वक्त तो ठीक है, लेेकिन किसी को अगर सुनाने पड़ें तो बिना गला रूंधे सुना ही नहीं पाते ….रोटी से एक बात और याद आ गई …मां को पता था मुझे रोटी कैसे पसंद है …कईं बार मैं उस की फोटी खींच लेता था जब मोबाईल हाथ में होता …ऐसी ही एक तस्वीर मैंने अपने वाट्सएप पर प्रोफाईल फोटो पर लगाई हुई है …यही है वह फोटो….।
मां के हाथ की बनी रोटी ....
एक बात और याद आ गई जाते जाते …मैंने कुछ साल पहले एक पोस्टर बनाया था…मैं जहां काम करता था, उस रास्ते पर अकसर देखता कि मां आग जला कर चूल्हे पर बच्चों की रोटी का जुगाड़ कर रही है और वे उसे हर तरफ़ घेरे खड़े हैं…खिचड़ी तैयार होने की इंतज़ार में ….।
अग्नि देवता को शत्-शत् नमन ….
हर दिन अंगीठी के पास से उठते वक्त मां शुकराना कर के उठती …हमें भी कहती कि यह शुकर ज़रूर किया करो ….अंगीठी के समक्ष हाथ जोड़ कर कहती …जिस भंडारेयों निकलया, ओह भंडारा भरपूर….यह मेरी नानी की सीख थी, जो मां भी अकसर दोहराया करती थी….मुझे भी यह बात अभी याद आई….और हां, अग्नि देवता के पूजा-अर्चना भी होती थी…लोहड़ी के दिन पर विशेष तौर पर होलिका दहन तो घर के बाहर या आंगन में होता लेकिन अंगीठी या चूल्हे में भी आहूति देकर उस का कृत्तार्थ व्यक्त किया जाता है …..
क्या ये सब इसी जीवन की बातें हैं….इतना लिख कर सोच में पड़ गया हूं…!! कौन यकीं करेगा….नहीं तो ना सही, मेरा काम था, इन यादों को सहेजना, और मुझे यह काम करते वक्त बहुत मज़ा आया…उस गुज़रे ज़माने में जाने का मौका मिला …वह पुराना दौर जी लिया हो मैंने जैसे …यह सब लिखते लिखते….क्या यही कम है!!
मां और पोता ...फ़ुर्सत के लम्हों में
इतना लिखने के बाद अगर मैंने इस पोस्ट की मुख्य किरदार की एक फोटो भी यहां न चिपकाई तो अजीब सा लगेगा मुझे, इस से बड़ी एहसानफ़रामोशी क्या होगी ....तो यह रही उन की एक फोटो जिन की वजह से ये सब यादें पहले तो बन पाईँ और फिर लिखने की समझ भी उन से ही आई ...वह भी लिखती थीं....बहुत बढ़िया लिखती थीं...
आज जब मैं सुबह यह लिख रहा था तो विविध भारती एफएम गो्लड पर भी यही गीत बज रहा था ..जैसे वह सब मेरा लिखा पढ़ रहा हो...समझ रहा हो ...मेरी बात के साथ अपनी बात जोड़ता..टिक टिक टिक टिक चलती जाए घड़ी....कल आज और कल की पल पल जुड़ती जाए कड़ी ...😎😁 (यह उस गीत के व्हीडियो का यू-ट्यूब लिंक है)...
मेरे विचार में इस पो्सट को पढ़ने में आसानी होगी अगर इस से पिछली पोस्ट भी देख लेंगे....ऐसा मुझे लगता है ...यह रहा उस का लिंक ....
मैं आज सुबह सोच ही रहा था कि मुझे आज अंगीठी से जुड़ी यादें इस वेब-लॉग पर लिखनी हैं...मैं रिक्शा में था, इतने में मुझे एक चाय की दुकान दिख गई ...अंगीठी पर चाय बन रही थी....यह फोटो आज सुबह की ही है ...यह सबूत ही काफ़ी है कि गैस सिलेंडर की किल्लत तो है ही ...बहुत अरसे बाद किसी अंगीठी पर चाय खौलती देखी....इच्छा हुई कि यही उतर जाऊं और अपने मनपसंद चाय पी लूं, फिर आगे चलूं....
मुंबई -बांद्रा की एक नुक्कड़ की यह तस्वीर ...दिनांक 26 मार्च, 2026
अंगीठी पर लिख रहा हूं....मेरी पीढ़ी के लगभग सभी लोगों की यादें इस के साथ जुड़ी हैं....मुझे अच्छा लगता है कि जब लोग मुझे मैसेज करते है्ं कि हमारी यादें भी तु्म्हारे जैसी ही हैं....क्या लिखा आज एक पाठक ने ...."मेरा मानना है. हम अपनी परछाईयों से ही भागते रहे जब कि आप की दौलत उन्हीं फ्लैशबैक में निहित है.." ...ठीक है, हर किसी को लिखना चाहिए...बात के साथ बात जुड़ती है, बात से बात निकलती है तो ही बात आगे बढ़ती है ....खैर, मैं तो हर किसी को प्रेरित करता हूं कि अपनी डॉयरी लिखने से शुरुआत कीजिए...
हां, तो अंगीठी की बात शुरु हुई थी .....
एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस टॉपिक पर मैं जो अनुभव लिख रहा हूं ...वे सभी पंजाब के अमृतसर शहर की एक मध्यमवर्गीय कॉलोनी से जुड़े हुए हैं...न मैं कभी किसी गांव में रहा और न ही मेरा अमृतसर के किसी बड़े पॉश इलाके में कभी आना जाना हुआ...इसलिए ये सारी यादें एक मध्यमवर्गीय इलाके से जुड़ी हुई हैं....
1960 के दशक का मेरा जन्म है --अमृतसर में ही मेरा अवतार हुआ ...वहां की रेलवे कॉलोनी में ही आंखें खोली, और अगले लगभग 25-26 बरस उसी का ही पानी पिया...हां, तो जहां तक बचपन की याद है कि हर घर के बाहर सुबह और शाम के वक्त एक अंगीठी तैयार कर के रखी जाती थी ... किस लिए ? -- अंगीठी भखन लई ....यानि अंगीठी को भखने के लिए रख दिया जाता था ....मेरे पास अब अंगीठी के भखने के लिए कोई हिंदी लफ़्ज नहीं है, हां, समझा सकता हूं कि अंगीठी को जब आग लगा के घर के बाहर दरवाजे के पास रखा जाता था तो शुरुआत में लगभग 10-15 मिनट उस में से धुआं निकलता रहता था ....फिर अचानक धुआं खत्म हो जाता और उसमें से आग की लपटें निकलने लगती....
मुझे याद है जब अंगीठी अच्छे से भख जाती ...उसमें से आग की ऊंची ऊंची लपटें निकलने लगती तो मां की खुशी देखने लायक होती ....सच में उसे ऐसे लगता जैसे की कोई लाटरी लग गई हो ....क्या गजब का वक्त था, छोटी छोटी बातों में भी कितनी बड़ी बड़ी खुशियां छुपी रहती थीं.....वैसे अंगीठी का अच्छे से लट-लट कर के जलना छोटी बात नहीं थी, घर की गृहिणी को ही पता होता अगर अंगीठी की आग कभी मद्द्म रह जाती तो उस पर खाना तैयार करना और दुनिया भर के आग पर किए जाने वाले काम कितने दुश्वार हो जाते .....
27.3.26 प्रातः 4.30 बजे
अच्छा, एक बात और ….अंगीठी जब जला के घर के बाहर रख दी जाती थी, उस में से धुआँ छटने के बाद आग की लपटें निकलने के इंतज़ार में तो बीच बीच में उसे एक दो बार बाहर जा के देखने भी होता था…यह इसलिए कि कईं बार कुछ छोटी मोटी माइनर एडजस्टमैंट करनी पड़ती थी ….लोहे की किसी पतली सीख (डंडी) से कोयलों को थोड़ा हिलाना ढुलाना पड़ता था ..और कईं बार उसे किसी मोटे कार्डबोर्ड से ( जो कि हमेशा ही अपनी किसी नोटबुक या पुरानी किताब की जिल्द होती थी, और उसे भी ढूंढना पड़ता था.. …अफसोस, उस वक्त स्विग्गी या ज़ोमेटो न था, न ही फ्लिपकार्ट, इसलिए अब रोज़ाना इक्ट्ठे होने वाले कार्डबोर्ड के डिब्बे नहीं होते थे ….) थोड़ी हवा खिलानी पड़ती थी ….और देखते ही देखते आग धधक पड़ती थी …और फ़ौरन अंगीठी को अंदर ले आ कर उस पर बढ़िया, मस्त चाय के लिए पानी चढ़ाया जाता था …सब कुछ इलायची, सौंफ, अदरक-वदरक कूट पर उस में डाल के ….
अच्छा, एक बात और याद आ गई….जब मां घर के गेट के बाहर अपनी अंगीठी उठा कर अंदर लेकर आने के लिए जाती तो आस पास कपूर, सोढ़ी, रामलाल और विद्या की मां और टीटू के घर के आगे पड़ी अंगीठीयों की तरफ़ भी नज़र डाल लेती ….किस की अंगीठी कहां तक पहुंची….हां, कईं बार अगर किसी ने अंगीठी जलाते वक्त उपले या लकड़ीयां थोड़ी गीली इस्तेमाल की होतीं तो फिर अडो़स-पड़ोस वाले बहुत ज़्यादा धुएं से परेशान हो जाते ….लेकिन कोई किसी को कहता कुछ नहीं था, बेहद सब्र था सभी में ….चुपचाप उस धुएं की वजह से हुई अपनी गीली आंखों को हाथों से पोंछ देते थे….बस!
कईं बार अंगीठी को बाहर रखे रखे लंबा अरसा हो जाता …न उसमें से धुआं निकलता, न ही आग की लपटें…सीधा सीधा मतलब होता कि प्रोजेक्ट फेल हो गया है ….जुगाड़ लगाए जाते, कईं बार चल भी जाते…जैसे उस के ऊपर मिट्टी के तेल का छिड़काव किया जाता ताकि उसके प्रजवलन में चु्स्ती आ सके….कईं बार यह काम कर जाता, वरना फिर से दोबारा अंगीठी जलाने की मशक करनी पड़ती….
अधिकतर अंगीठी तैयार करने का काम मां के सुपुर्द ही होता….उसे कोई छुट्टी नहीं, सर दुःख रहा होता तो सिर पर दुपट्टा कस के या दांत दुःख रहा होता तो दांतों पर नसवार लगा कर भी अंगीठी तैयार तो करनी ही होती …कईं बार मैंने पिता जी को भी यह काम करते देखा और मैने भी दो चार बार यह काम किया है ….याद नहीं, ऐसी कौन सी एमरजैंसी आ गई होगी …शायद मां 1-2 दिन के लिए बाहर गई होगी ….
मैंने कल जो फोटो खींची सिगड़ी पर चाय बनती देख कर ….यह उन दिनों एक आम बात थी…हर तरफ़ अंगीठी पर ही चाय बनती थी ….चाय के ठेलों पर, चाय की दुकान पर, हलवाई के यहां, किसी ढाबे पर ….सारा काम बड़ी बड़ी अंगीठीयों पर ही होता था….जिसे हम लोग भट्ठी कहते हैं ….बड़े से मिट्टी के तंदूर टाइप बने होते थे …फिक्स किए होते थे ….जिन में कोयलों से अंगारे निकलते रहते थे …और उन्हीं पर दाल मक्खनी, जलेबियां, समोसे, पूरी-छोले, भटूरे-छोले बना करते थे ….
बचपन की यादों की अलमारी की एक बहुत पुरानी, दीमक की मार से खस्ताहाल हो चुकी एक शेल्फ पर एक कोने में अभी एक ईमानदार सा हलवाई भी रखा पड़ा है ….जो कईं कईं घंटों तक भट्ठी पर खौलते दूध को हिलाता करता और शाम को एक दो ट्रे बर्फी तैयार करता था …देखते ही देखते वो खाली हो जाती थी ….वैसे बर्फी न तो कभी खाई और न ही खाने का कोई स्कोप ही है ….जब भी उधर से गुज़रते पिता जी मुझे छोटे लिफाफे में वह ज़रूर दिलाया करते ….यही कोई एक रूपए के आसपास मिल जाती थी …या इससे भी कम …वाह, क्या महक होती थी …सीधी ज़ुबान पर रखते ही घुल जाती थी …उस हलवाई के पास एक नाई की दुकान थी….जो एक बड़ी सख्त सी मशीन से कटिंग किया करता था, कटिंग क्या, नोचता हो जैसे बालों को ….और फिर उस्तरे को बेल्ट पर घिस कर मेरे सर पर रगड़ दिया करता था…कईं कट लग जाते थे …और जले पर नमक छिड़कने के लिए उन पर फिटकड़ी घिसा देता…बस, मेरा रोना चालू….पिता जी बाहर आते ही मुझे जैेसे ही उस बर्फी की दुकान पर ले कर जाते, मेरा दर्द-वर्द कहां भाग जाता, पता नहीं….50-60 बाद भी जब मुझे इस हलवाई का ख्याल आता है तो मुझे हंंसी आती है …..क्या कमा लेता होगा …इतनी मेहनत मशक्कत के बाद …फिर भी इतना सब्र….इतनी मोहब्बत, खुलूस रखता था सब के लिए….अच्छा, लेते सब इतनी ही थे ….50 ग्राम, 100 ग्राम….एक पाव (250ग्राम) तो किसी मेहमान के घर आने पर ही चाय के वक्त लाई जाती थी…समोसों के साथ….या तो समोसे-जलेबी, वरना …समोसे, बर्फी ….यही मेन्यू था, यही स्कोप और यही दायरा था उस वक्त की मेहमान-नवाज़ी का ….
दिनांक ...28 मार्च 2026
अंगीठी में कोयले कौन से इस्तेमाल होते थे ...
अंगीठी में सामान्यतः हार्ड-कोक ही इस्तेमाल होता था...यह ज़्यादातर कोयले के डिपो से ही लाना होता था...वज़न के हिसाब से बिकता था...बीस-तीस किलो या पूरी एक बोरी लाई जाती थी ..साईकिल रिक्शा पर रख कर ....अगर 10-20 किलो ही होते तो साईकिल के पीछे कैरियर पर ढो लिए जाते।
अंगीठी जलाना भी एक कला है....बहुत इत्मीनान, बहुत फोकस चाहिए....जैसे मैंने ऊपर लिखा कि कुछ बार मैंने भी अंगीठी जलाई..कईं बार जल गई, कईं बार फुस हो कर मुझे मुंह चिढ़ाने लगती।ऐसे ही नहीं कहते ..करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान.....गृहिणियों के पास यह महारत बहुत थी।
(अंगीठी जलाने का आर्ट एंड क्राफ्ट- डॉयग्रैमैटिक )....काश! इस तरह के डायग्राम बनाने में स्कूल-कालेज में इतनी मेहनत की होती....न ही मास्टरों के हाथों पिटना पड़ता और मैं भी कहां से कहां पहुंच चुका होता ....😎
अंगीठी को जलाने के लिेए तैयार करने से पहले सब से नीचे सूखे दो चार गोबर के उपलों के दो चार टुकडे़ रखे जाते जिन पर थोड़ा सा मिटटी का तेल छिड़क दिया जाता ...फिर उन के ऊपर बिल्कुल पतली सी लकड़ीयों के दा चार पांच टुकड़े रखे जाते और फिर उन के ऊपर कोयले सजा दिए जाते ...बहुत ज़्यादा ठंड के दिनों में या बरसात के दिनों में अंगीठी जलाना मुश्किल काम होता..लाटरी लगने जैसा ...लगी तो लगी, नहीं तो ठनठन गोपाल.....खैर, इसी चक्कर में बाहर ओस या बरसात होने की वजह से कईं बार अंगीठी जलाने के लिए उसे घर के बाहर या घर के आंगन में रखने की बजाए, बरामदे में ही रखना पड़ता...
कईं बार यह भी होता कि मिट्टी का तेल (केरोसीन) ही नहीं है....तो फिर गोबर के उपलों के नीचे कुछ बेकार कागज़ भी रख दिए जाते जो जल्दी से आग पकड़ लेते....और फिर यह ऊपर तक अंगीठी से आग की लपटें रुपी न्यूक्लियर रिएक्शन चल निकलता...
रेलवे के फॉयरमैन और उन के थैले में रखा सूत....
आज की पीढ़ी तो रेलवे के फॉयरमैन के नाम से ही वाकिफ़ न होगी...लेकिन डीज़ल, इलेक्ट्रिक इंजन आने से पहले जब स्टीम इंजन ही चलते थे ...मैं 1960-1970 के दशक की बात कर रहा हूं...बाद में तो फिर डीजल ईंजन भी आ गए....स्टीम इंजन की कार्यप्रणाली को समझने के लिए आप को कोई पुरानी फिल्म जैसे शोले (वो ट्रेन डकैती वाला सीन) या विधाता (जिसमें शम्मी कपूर और दिलीप कुमार पर ट्रेन के इंजन में एक गीत फिल्म गया है ...)....हां, तो फॉयरमैन का काम होता था, स्टीम इंजन के अंदर कोयले झोंकते रहना ...सभी फॉयरमैन एक ही से दिखते थे ..क्योंकि सारा दिन काम आग के सामने ही होता था....
जैसा कि मैं ऊपर लिख ही चुका हूं ...मेरी तो भई आंखे ही खुली रेलवे कॉलोनी में ....इसलिए बचपन ही से रेलवे के हर तरह के मुलाजिम को देखते देखते मैं रेलवे के बारे में बहुत कुछ समझ गया....फॉयरमैन, ड्राईवर, खलासी, वर्कशाप के मकेनिक, गार्ड, टीटी, टिकट बाबू, बुकिंग क्लर्क, गैगमैन (एक्टिव गैंगमेन और पैसिव गैंगमैन - जो रसोईये, माली, चपरासी, बाबू के काम में लगे रहना अपना सौभाग्य समझते थे)........मैं क्या, कोई भी इन सब रेल मुलाजिमों को देखते ही पहचान लेता ...बिना वर्दी के भी ....अकसर भाप ईजन के दौर में यह माना जाता था कि फॉयरमैन और ड्राईवर बहुत गुस्से वाले होते हैं....खैर, हर काम की अपनी चुनौतियां हैं....क्या कहें इस बारे में ज़्यादा!
हां, तो बात अटक गई थी फॉयरमैन के ऊपर ....दरअसल भाप ईंजन के पूरे रख-रखाव की जिम्मेदारी इस फॉयरमैन की होती थी ...गाड़ी चलती थी तो कोयले से लेकिन उस के पुर्ज़ों को तो डीज़ल या मोबिल-ऑयल से रवां रखना पड़ता था....मुझे नहीं पता कि यह डीज़ल आयल से होता या मोबिल-ऑयल से ...लेकिन जो भी था, इस को जिस कपड़े से (सूत) से साफ किया जाता, उसे गैंगमैन फैंंकता नहीं था, वह उसे अपने घर ले आता ...चूंकि वह डीज़ल या ऑयल से कुछ भीगा हुआ होता, इसलिए वह आग बहुत जल्दी पकड़ लेता और अंगीठी जलाने के लिए वह बहुत काम की चीज़ साबित होता ...मुझे याद है फ़ायरमैन इस को अपने आस पास के घरों में भी बांट देता....बांटने से भी पहले, शायद लोग उस के घर पर ही इस की डिमांड रखने चले जाते ....
मैंने लिखा न कि मैंने भी कईं बार अंगीठी जलाई है ...मेरे से सब्र शुरु ही से कुछ कम था....उतावला पन ज़्यादा (हिसाब के पेपर में सब कुछ आते हुए भी जब दो चार मूर्खता से भरी गल्तीयां कर आता तो मेरे पिता जी मुझे कह दिया करते ...तू, यार, फुर्ती के चक्कर में गल्ती करता है ...., इस के आगे उन्होंने कभी न डांटा न डपटा, न धमकाया....)...हां, कम सब्र के रहते मैं उस जल रही अंगीठी में ऊपर से तेल फैंक देता ....जिस से चंद लम्हों के लिए तो लपटें दिख जातीं लेकिन लकड़ीयों और उपलों को और उस के बाद कोयलों तक आग पहुंचने में 10-15 मिनट का वक्त तो लगना ही होता था....
सर्दी के दिनों में अंगीठी की डिमांड ---
अमृतसर की कड़ाके की सर्दी (3-4डिग्री तक) के दौरान अंगीठी की डिमांड अचानक बहुत बढ़ जाती ...हर कोई अंगीठी के पास ही बैठना चाहता ...आग तापने के लिए....और साथ में मूंगफली, रेवड़ी खाना और गर्मागर्म खौलती हुई चाय की सुस्कियों का लुत्फ़ उठाते हुए वहां से कोई उठना ही न चाहता....वही परम सुख था...इसी चक्कर में काम लेट हो जाते, सोना लेट हो जाता ...लेकिन जब अंगीठी के पास इस तरह जश्न चल रहा हो ....डालडे में तैर रहे नमक-अजवायन के या फिर आलू के परांठे या देसी घी से चुपड़ी मिस्सी रोटी एक के बाद एक बन रही हो तो भला वहां से उठने को दिल किस का चाहेगा....और अकसर अंगीठी के पास बैठने के लिए किसी बोरी का टुकड़ा (टाट) या फिर लकड़ी की चौकी इस्तेमाल होती ....लेकिन पैर तो भी हमारे ठंड़े पड़े होते ...क्योंकि उस दौर में घर में जुराबें पहनने का चलन नहीं था, हां, जब ठंड की वजह से उंगलियां सुन्न पड़ जाती या नीली होने लगतीं तो मां कीस डांट डपट से ऊन की जुराबें चढ़ानी ही पड़ती.....और फौरन आराम भी आ जाता ....
रेलवे से भी कोयला मिलता था .....
हां, तो रेलवे से भी कोयला मिलता था ...स्टीम ईजन कोयले से चलता था ..हार्ड-कोक से ...जगह जगह जैसे नया कोयला ईंजन में झोंका जाता था, पुराना थोड़ा इस्तेमाल किया कोयला नीचे गिर जाता था ...जिसे गिराना फॉयरमैन का काम होता था ..इतनी गाडि़यां तब भी चलती थीं....जहां तक मेरी धुंधली याद है इस बारे में फिर यह इस्तेमाल किया हुआ कोयला रेल के कर्मचारी खरीद सकते थे ...यही कोई तीन चार रूपए की पर्ची कटवानी होती थी ...फिर वहां से रिक्शा में रखवा कर यह कोयला घर आता था ..हमारे यहां भी एक दो बार आया था, मुझे याद है ....यह अंगीठी में जलाने के लिए बहुत बढ़िया होता था ...और इस की बड़ी डिमांड रहती थी ....और भी कुछ कुछ बातें हैं..धुंधली यादें हैं... फॉयरमैन के द्वारा कोयला नीचे गिराने के बारे में .......लेकिन सब कुछ क्या लिखने बैठें...हमारे लिए इतना ही काफी है कि स्टीम ईजन, उस में काम करने वाला ड्राईवर और फ़ॉयरमैन हमारी बचपनों की यादों का बेशकीमती हुिस्सा हैं.....हम पैदल स्कूल आते जाते वक्त जब भी रेल की लाइनों के पास, किसी माल-गोदाम, किसी लोको-शैड़ के पास ईंजन देखते ही रुक जाते ...10-15 मिनट उस ईंजन को और उस से निकलने वाली भाप को निहारते रहते ....वेहले कम.....वक्त बरबाद करने वाले शौक....
लकड़ी वाला कोयला....
एक कोयला जो लकड़ी से बनता है ...वह भी बिकता था ...लेकिन उसे उन दिनों सिर्फ़ कपड़े प्रैस करने वाली इस्तरी में इस्तेमाल के लिए ही खरीदा जाता था...महंगा होता था... कॉलोनी में जो प्रैस वाले यूपी से आए भाई लोग
यह काम करते थे, उन के पास बहुत भारी भरकम प्रैस होती थी जिन में यही कोयला इस्तेमाल होता था...जिस की वजह से कईं बार टैरीकॉट, टैरीलीन या दुपट्टे आदि में कभी कभी एक दो सुऱाख भी हो जाते थे (कईं बार सिगरेट से भी पिता जी की कमीज़ पर छेद हो जाते थे) ...फिर लोगों की उस प्रेस वाले के साथ थोड़ी कहा-सुनी हो जाती थी ....मुझे तो यह काम बढ़िया लगता था ...मैं तो कईं बार उस के पास जा कर खड़ा हो जाता था ...पान चबाते चबाते जिस स्वैग से वह भारी भरकम प्रैस को उठाता, फिर बार बार उसमें राख को नीचे गिराता ..सब कुछ यादों में कैद है ....
बाद में कुछ बरसों बाद जब गैस वैस आ गई तो भी, बिजली की प्रैस इस्तेमाल होने लगी तो भी यह कोयला तो लोग घर में आग तापने के लिए लाते थे ... और हां, यह कैसे भूल गया कि उन दिनों भुट्टा (छल्ली) भूनने के लिए भी यही कोयला इस्तेमाल करते थे ...इस काम में भी यू-पी बिहार से आए लोगों का वर्चस्व था ...एक दम बढ़िया भुट्टे खाए जो उन दिनों फिर कभी न नसीब हुए....न वो भुट्टे ही रहे (अब तो जी.एम क्रॉप वाले हैं शायद ...कोई स्वाद नहीं, कोई बात नहीं ...फीके फाके ......कौन खाए, इन को ....इसलिए कभी मैं तो नहीं खाता यह सब ...) ....
हां, हमारे घर में भी एक छोटी सी लोहे की प्रैस होती थी जिसे मेरी बहन ही इस्तेमाल करती थीं अपने कपड़ों के लिए....उसमें भी यही लकड़ी वाले कोयले (हां, लिखते लिखते याद आया....इन को कच्चे कोयले कहते थे ) डाले जाते थे ...मुझे यह सब होते देखना बहुत भाता था....कल की बातें लगती हैं....। बहन 10 साल बड़ी हैं, कभी आलस नहीं करती थीं ये सब काम करने में ...।
भट्ठी ....
भट्ठी के बारे में तो मैंने ऊपर भी लिखा है कि वह भी उन दिनों हार्ड-कोक से ही चलती थी ..हलवाई हो, ढाबे हों....लेकिन हां जो भुजवा की भट्ठी होती थी, वह लकड़ीयों के साथ जलती थीं....
लिखते लिखते अब मैं हो गया हूं बोर ....
कईं बार कुछ लिखने लगो तो वह बहुत खिंच जाता है जैसे गीली लकड़ी से आग जलाने के चक्कर में कईं बार हम उलझ जाते हैं....धुआं ही धुआं हर तरफ़ लेकिन आग का नामो-निशान नहीं ....इस पोस्ट को शुरु किए तीन दिन हो गए...मुझे मेरे स्वभाव का पता है मैं अगर इस वक्त जिस भी हालत में यह है , अगर इसे बंद नहीं करूंगा तो फिर यह कभी पूरी ही न करूंगा या ऐसे ही पड़ी रहेगी, पोस्ट नहीं करुंगा ...क्योंकि दो चार दिन बाद लगने लगेगा कि इस में पोस्ट करने जेैसा है ही नहीं......बस, ऐसा ही करता हूं मैं.....वैेसे भी अपने लिखा तो मैं पढ़ता नहीं....क्योंकि अपनी ही लिखी कुछ बातों को लिखते थोड़ा अन्कम्फर्टेबल सा लगता है (लगना बिल्कुल नहीं चाहिए, अगर लिखने वालों को यह लगेगा तो कैसे चलेगा) ...दरअसल बात पूरी सच्चाई पर टिकी होती है ....99 प्रतिशत ....लेकिन कुछ बातें यही कोई एक प्रतिशत भी झूठी नहीं होती, लेकिन उन 1-2 फीसदी को मैं लिखते वक्त दबा जाता हूं ...उन को भी लिखूंगा ज़रूर लेकिन नौकरी से जब रिटायर हो जाऊंगा ...प्रभु कृपा रखें ...सेहतमंद रखें...।
इस पोस्ट का दूसरा पार्ट भी लिखना होगा ..जिस में उपले, चूल्हे, कांगड़ी की बातें साझा करनी है....और उस के बाद किसी पोस्ट में तंदूर के किस्से भी तो ब्यां करने हैं .....यह सब गैस की किल्लत की वजह से हो पाया....ये यादें कुरेद कुरेद कर हरी करनी पड़ रही हैं ...अच्छा है इसी बहाने सहेजी जा रही हैं....।
लिखते लिखते यह मेरे संस्मरण कम और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतो का एक निबंध सा ही लगने लगा है ...खैर, जो भी है, सब कुछ सच है ....सच के सिवा कुछ नहीं....कुछ दिखावा नहीं, प्रपंच नहीं ...हां, आटे में नमक बराबर ...1-2 प्रतिशत तथ्य दबा ज़रुर लिए हैं....इतना खोट भी ज़रूरी है ...24 कैरेट सोने के तो गहने ही नहीं बन पाते ...😃
आज मैं बरसों बाद सुबह उठ कर लिखने बैठा हूं...जब मैंने ठीक 20 बरस पहले ब्लॉग लिखना शुरु किया था ...तो मैं अगले आठ-दस बरस तड़के चार पांच बजे यह डॉयरी लिखने बैठ जाता था...ठिठुरने भरी सर्दी होती या फिर सुबह सुबह पसीने छुटाने वाली गर्मी..मैं एक दो घंटे लिख ही लेता था...अब तो बरसों से सुबह उठ कर लिखना तो दूर, उठने की इच्छा ही नहीं होती...बहुत बार सोचता हूं कि ऐसा क्या था, गुज़रे दौर में...फिर ख्याल आया कि तब मां थी, वह सुबह सुबह उठ जाती और अपने लिखने, पढ़ने, सिलने, पूजा-पाठ, योग ...के काम में लग जाती और उन को देखते देखते हम भी जल्दी उठने लगे...खैर, 10 साल होने को हैं मां को उड़ारी मारे हुए...इसलिए उन के बाद हम भी घोर आलसी हो गए...
यह जो मैं पोस्ट लिख रहा हूं इस वक्त....इसे लिखने के लिए मैं पिछले 8-10 दिन से उतावला हूं....लेकिन हर रोज़ आज शाम में लिखूंगा, नहीं ..कल सुबह लिखूंगा...ब्लॉग का मामला ऐसा है कि एक बार अगर कोई ख़याल आ जाता है तो जब तक वो अपने आप को लिखवा नहीं लेता, चैन से बैठने नहीं देता....
पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि जिस तरह से दुनिया पर पागलपन तारी है इस वक्त, कुकिंग गैस की किल्लत की तो बात ही क्या करें, हम लोगों को घासलेट पर ही न लौट आना पड़े कहीं....सामान्य ज्ञान भी कितना असामान्य है ....गूगल से तो पता कर ही लेंगे...मैंने ठीक ठाक साईंस की पढ़ाई की है लेकिन इस वक्त (बिना गूगल से पूछे) मुझे यह भी पता नहीं है कि घासलेट कहां से आता है .....लेकिन इस से जुड़ी यादें हैं बहुत सी ....मेरी उम्र 60 साल से ऊपर है ....इसलिए यही पीढ़ी है अगर जो चाहे जितना चाहे अपनी जाने से पहले बातों को समेट के चली जाए....वरना मेरे से पिछली पीढ़ी जो अब 80-90 के चक्कर में ज़िदगी की सीढ़ी के आखिरी पायदान को पकड़े खड़ी है, उन में से कितने हैं अपनी यादें लिख पाने की इच्छा ही रखते हैं....
जब हमारे मां-बाप हमारे आसपास होते हैं तो हमें लगता है कि इन से जो बातें पूछनी हैं, बाद में पूछ लेंगे ....लेकिन वक्त फुर्र कर के उड़ जाता है और हमारे सवाल अंदर ही दबे रह जाते हैं....यहां तक कि हमें अपने दादा से पिछली पीढ़ी से जुड़े किसी शख्स का नाम या किरदार ही नहीं पता होता ....यह सच है बिल्कुल....
इसलिए मैं सोचता हूं कि अपनी यादों को अपने अनुभवों को संजोते रहना चाहिए....बिना किसी तरह की अपेक्षा किए हुए...यह भी एक धर्म ही है, साधना है, तपस्या ही है ...लिखने के लिए बैठना.....
सुबह सुबह राहत इंदौरी की बात याद आ गई ....
आंख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो....
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो....
इस पो्स्ट का शीर्षक ही बहुत कुछ ब्यां कर देता है ...जब मेरी पीढ़ी के लोग 1960 के दशक की पैदावार ..जब वे अपने दिनों की बातें करेंगे को घासलेट की ही नहीं, सिगड़ी, तंदूर, चूल्हे, हीटर, स्टोव की बातें भी अनायास उमड़ने लगती हैं...वे हमें अच्छी लगें या न लगें, असहज करें या खुश, भूलना चाहें भी अगर ....लेकिन ये बार बार उछल-कूद करती ही रहती हैं....लिखने वालों के पास एक साधन है, लिख कर फ़ारिग हो जाते हैं....मैं भी वही काम करने बैठा हूं ....यह पोस्ट में लिखने से इसलिए भी गुरेज़ करता रहा क्योंकि बातें इतनी सारी हैं....बहुत लिखना पडे़गा...फिर सोचा कि शुरु तो करूं...एक नहीं तो दो तीन पोस्टों में लिख लूंगा....मुझे कौन रोक रहा है?
घासलेट की बात करते वक्त कुछ छूट गया था लगता है .....
घासलेट की मैं कुछ यादें लिखीं...अधिकतर तो सरकारी डिपो से मिलने वाले मिट्टी के तेल की ही थीं....जो अकसर पांच लिटर की पीपी में किसी महीने मिला तो मिला, नहीं तो डिपो के चक्कर काट काट के शांत बैठ जाते थे ....और उसी डिपो वाले की किसी दुकान से उसे बाज़ार के रेट पर खरीदना पड़ता था ....जहां तक मुझे याद पड़ता है ....राशनिंग के उस दौर में सामान्य घर में यही कोई पांच लिटर घासलेट लग ही जाता था ....
मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के अलावा, इसे लालटेन और दीयों में भी इस्तेमाल किया जाता था ....क्योंकि बत्ती बार बार गुल हो जाना आम सी बात थी ....बहुत ही आम....लालटेन के अलावा हर घर में तीन चार दीये भी होते थे ....अधिकांश किसी दारु की बोतल के ढक्कन में छेद कर के कपड़े की बत्ती डाल कर बनाए हुए....उन दिनों भी कहीं भी पौवों की कमी कभी महसूस नहीं होती थी ...अधिकतर इस काम के लिए पव्वे की कांच की बोतल ही काम में ली जाती थी ...अधिये की खाली बोतल से तैयार दीए भी दिख तो जाते थे, बहुत कम.....क्योंकि इतना मिट्टी का तेल होता ही क्हां था....
शादी-ब्याह में जब बैंड वाले चलते थे ...बड़ी बड़ी लाइटों के साथ तो उन में भी मिट्टी के तेल का इस्तेमाल होता था और ट्रेनों के परिचालन में भी स्टेशनों पर सिगनेल के लिए जो लाईटें जलाई जाती थीं उन में भी यही मिट्टी का तेल इस्तेमाल होता था। और इतिहास गवाह है कि मिट्टी के तेल ने अनगिनत बहु-बेटियों की जान भी ली है...यह भी उस दौर का काला सच है ....स्टोव जब भी फटा, उसने बहु-बेटी को ही अकसर चपेट में लिया ....बड़ा पक्षपात करता था स्टोव भी ........और सुनवाई? - कौन सुनाएगा, किसी की सुनवाई....जो हालात आज हैं इसी से अंदाज़ा लगा लीजिए कि आज से 50-60 बरस पहले हालात कितने भयावह होंगे ...
बत्ती गुल होने पर मिट्टी के दीए की मदद से खाना पकाया जाता, पढ़ाई लिखाई का काम निपटाया जाता (दिन की रोशनी में या बत्ती के रहते समय बरबाद करना और दीए की रोशनी में बैठ कर हिसाब की किताब पकड़ लेना, यह दिखावा, टाईम-पास भी अकसर देखने को मिल जाता ...अकसर)....हां, पेपरों के दिनों में रात में बत्ती गुल होना एक गंभीर मुद्दा हो जाता ....दीए वीए में क्या कोई पढ़ता, क्या याद रहता ...सारा साल पढ़े नहीं ...और सारी मशक्कत एक रात पहले ही करने से जैसे ...। यह लिखते लिखते मुझे मेरा एक कज़िन याद आ गया....वह अकसर किताब ही पेपर होने के एक -दो दिन पहले लाता था....और फिर मैंने देखा कि यह किताब वह पेपर में चीटिंग करने के लिए पर्चियां बनाने के लिए इस्तेमाल करता था....पूरा पूरा रात लगा रहता था....दीए की रोशनी में भी उसे मेहनत करते देखा है ....उसे बचपन ही से यह आदत लगी हुई थी...हमारे ज़माने में स्ट्रैचलॉन की निक्करें भी हम लोग स्कूल में कभी कभी पहन जाया करते थे ...वह अपनी जांघों पर भी कुछ कुछ लिख कर ले जाया करता था .. इम्तिहान में कुछ मदद हो जाए, इसलिए....और वह अपनी पर्चीयों को इस्तेमाल भी कर के आता था ....सातवीं आठवीं कक्षा में मैं भी उस की देखा देखी एक दो पर्ची लेकर तो गया लेकिन डर इतना लगा कि खोल न पाया...जब जेब में उन के रखने से अपना याद किया हुआ माल ही कागज़ पर उंडेलने में दिक्कत होने लगी तो जा कर वॉश-रूम में फैंक आया....
यह क्या विषय़ किधर का किधर निकल गया ..दीए की रोशनी में ....
घासलेट को घर में दूसरे कामों के लिए भी लिया जाता था ....कोई ताला नहीं खुल रहा, कहीं जंग लग गया हो....अभी तो यही कुछ याद आ रहा है ....
बातें लिखते लिखते कहां से याद आ जाती हैं, खुद पता नहीं लगता....जैसे मुझे अभी याद आया कि सरकारी डिपो वाला मिट्टी का तेल खत्म होने पर बाज़ार से तीन-चार रूपए की एक बोतल घासलेट की मिलती थी ...इस के लिए कांच की खाली दारू की बोतल अपनी लेकर जानी होती थी .....दारू की बोतल से बड़ी बोतल कोई उन दिनों देखने को न मिलती थी ...कहने को एक लीटर आता था उस बोतल में लेेकिन होती यह शायद 750 मि.लीटर की ही थी....।आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि पहले प्लास्टिक की बोतलें ही न थींं.....और हां, मिट्टी के तेल की बोतलें अपने आस पास से, अड़ोस-पड़ोस से उधार भी ले लिया जाता था ...
फिर एक वक्त आ गया कि घासलेट हार्ड-वेयर की दुकानों में ही बिकने लगा ....मैंने शायद 10-15 साल पहले एक बार घासलेट की एक बोतल 50 रुपए की खरीदी थी ....यही जंग वंग उतारने के लिए ....तालों के, उपकरणों के जंग का तो इलाज है लेकिन जब बैठे बैठे हम लोगों को जंग लग जाता है, काश! उस को भी उतारने का कुछ तो जुगाड़ हो ....
सिगड़ी कहें या अंगीठी.....एक ही बात है ...
हम लोगों ने बचपन में सिगड़ी या अँगीठी पर ही सभी काम होते देखे...कभी कभी जब अंगीठी न जल रही होती और कोई छोटा मोटा चाय बनाने जैसा या दाल-सब्जी गर्म करने जैसा काम करना या दर्द के लिए अचानक पानी गर्म की ज़रूरत पड़ती तो स्टोव कर ही कर लिया जाता .....
लेकिन सिगड़ी की बातें, अंगीठी के किस्से ...ये इतने ज़्यादा हैं कि अब इस वक्त यह सब नहीं लिख पाऊंगा....इस की पूरी प्रक्रिया, इसे जलाने की मशक्कत, कोयला कहां से आता था, कितने तरह का होता था, कहां से मिलता था.....अंगीठी चलाना भी एक आर्ट था, मैंने कब अंगीठी जलाई.....और हां, नानी के उन के बचपन की यादें कि उन दिनों आग जलाने के लिए माचिस भी नहीं हुआ करती थी ..तो फिर आग कैसे जलती थी, जी हां, पड़ोसी के चूल्हे ही से आग लाई जाती थी...जलते हुए उपले से ....(यह सब हमने मां से सुना है ..इसलिेेए प्रामाणिक है)...गुलज़ार साहब ने भी यह सब देखा लगता है जो उसने अपने गीतों में शरारत से पिरो दिया ...वैसे गुलज़ार साहब और मेरी नानी का मायका एक ही शहर में था ....ब्रिटिश भारत के वक्त के पंजाब का ज़िला गुजरात (अब जो पाकिस्तान में है- इसे गुजरात राज्य से कंफ्यूज़ न करें)....अभी ध्यान आया कि वह तो अंगीठी जलाने के लिए नहीं बीड़ी जलाने के लिए पड़ोसी के चूल्हे से आग लेने की बात कर रहे हैं....
खैर, अगली पोस्ट में अंगीठी की बातें ...पूरी पोस्ट इसी पर ....जो कुछ याद है, अपनी डॉयरी में लिख लेना ज़रूरी लगता है .....