गुरुवार, 26 मार्च 2026

सिगड़ी, तंदूर, चूल्हा, हीटर, स्टोव.....इतनी तरकीबें, इतने जुगाड़


आज मैं बरसों बाद सुबह उठ कर लिखने बैठा हूं...जब मैंने ठीक 20 बरस पहले ब्लॉग लिखना शुरु किया था ...तो मैं अगले आठ-दस बरस तड़के चार पांच बजे यह डॉयरी लिखने बैठ जाता था...ठिठुरने भरी सर्दी होती या फिर सुबह सुबह पसीने छुटाने वाली गर्मी..मैं एक दो घंटे लिख ही लेता था...अब तो बरसों से सुबह उठ कर लिखना तो दूर, उठने की इच्छा ही नहीं होती...बहुत बार सोचता हूं कि ऐसा क्या था, गुज़रे दौर में...फिर ख्याल आया कि तब मां थी, वह सुबह सुबह उठ जाती और अपने लिखने, पढ़ने, सिलने, पूजा-पाठ, योग ...के काम में लग जाती और उन को देखते देखते हम भी जल्दी उठने लगे...खैर, 10 साल होने को हैं मां को उड़ारी मारे हुए...इसलिए उन के बाद हम भी घोर आलसी हो गए...

यह जो मैं पोस्ट लिख रहा हूं इस वक्त....इसे लिखने के लिए मैं पिछले 8-10 दिन से उतावला हूं....लेकिन हर रोज़ आज शाम में लिखूंगा, नहीं ..कल सुबह लिखूंगा...ब्लॉग का मामला ऐसा है कि एक बार अगर कोई ख़याल आ जाता है तो जब तक वो अपने आप को लिखवा नहीं लेता, चैन से बैठने नहीं देता....

पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि जिस तरह से दुनिया पर पागलपन तारी है इस वक्त, कुकिंग गैस की किल्लत की तो बात ही क्या करें, हम लोगों को घासलेट पर ही न लौट आना पड़े कहीं....सामान्य ज्ञान भी कितना असामान्य है ....गूगल से तो पता कर ही लेंगे...मैंने ठीक ठाक साईंस की पढ़ाई की है लेकिन इस वक्त (बिना गूगल से पूछे) मुझे यह भी पता नहीं है कि घासलेट कहां से आता है .....लेकिन इस से जुड़ी यादें हैं बहुत सी ....मेरी उम्र 60 साल से ऊपर है ....इसलिए यही पीढ़ी है अगर जो चाहे जितना चाहे अपनी जाने से पहले बातों को समेट के चली जाए....वरना मेरे से पिछली पीढ़ी जो अब 80-90 के चक्कर में ज़िदगी की सीढ़ी के आखिरी पायदान को पकड़े खड़ी है, उन में से कितने हैं अपनी यादें लिख पाने की इच्छा ही रखते हैं....

जब हमारे मां-बाप हमारे आसपास होते हैं तो हमें लगता है कि इन से जो बातें पूछनी हैं, बाद में पूछ लेंगे ....लेकिन वक्त फुर्र कर के उड़ जाता है और हमारे सवाल अंदर ही दबे रह जाते हैं....यहां तक कि हमें अपने दादा से पिछली पीढ़ी से जुड़े किसी शख्स का नाम या किरदार ही नहीं पता होता ....यह सच है बिल्कुल....

इसलिए मैं सोचता हूं कि अपनी यादों को अपने अनुभवों को संजोते रहना चाहिए....बिना किसी तरह की अपेक्षा किए हुए...यह भी एक धर्म ही है, साधना है, तपस्या ही है ...लिखने के लिए बैठना.....

सुबह सुबह राहत इंदौरी की बात याद आ गई ....

आंख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो....

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो....

इस पो्स्ट का शीर्षक ही बहुत कुछ ब्यां कर देता है ...जब मेरी पीढ़ी के लोग 1960 के दशक की पैदावार ..जब वे अपने दिनों की बातें करेंगे को घासलेट की ही नहीं, सिगड़ी, तंदूर, चूल्हे, हीटर, स्टोव की बातें भी अनायास उमड़ने लगती हैं...वे हमें अच्छी लगें या न लगें, असहज करें या खुश, भूलना चाहें भी अगर ....लेकिन ये बार बार उछल-कूद करती ही रहती हैं....लिखने वालों के पास एक साधन है, लिख कर फ़ारिग हो जाते हैं....मैं भी वही काम करने बैठा हूं ....यह पोस्ट में लिखने से इसलिए भी गुरेज़ करता रहा क्योंकि बातें इतनी सारी हैं....बहुत लिखना पडे़गा...फिर सोचा कि शुरु तो करूं...एक नहीं तो दो तीन पोस्टों में लिख लूंगा....मुझे कौन रोक रहा है?


घासलेट की बात करते वक्त कुछ छूट गया था लगता है .....

घासलेट की मैं कुछ यादें लिखीं...अधिकतर तो सरकारी डिपो से मिलने वाले मिट्टी के तेल की ही थीं....जो अकसर पांच लिटर की पीपी में किसी महीने मिला तो मिला, नहीं तो डिपो के चक्कर काट काट के शांत बैठ जाते थे ....और उसी डिपो वाले की किसी दुकान से उसे बाज़ार के रेट पर खरीदना पड़ता था ....जहां तक मुझे याद पड़ता है ....राशनिंग के उस दौर में सामान्य घर में यही कोई पांच लिटर घासलेट लग ही जाता था ....

मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के अलावा, इसे लालटेन और दीयों में भी इस्तेमाल किया जाता था ....क्योंकि बत्ती बार बार गुल हो जाना आम सी बात थी ....बहुत ही आम....लालटेन के अलावा हर घर में तीन चार दीये भी होते थे ....अधिकांश किसी दारु की बोतल के ढक्कन में छेद कर के कपड़े की बत्ती डाल कर बनाए हुए....उन दिनों भी कहीं भी पौवों की कमी कभी महसूस नहीं होती थी ...अधिकतर इस काम के लिए पव्वे की कांच की बोतल ही काम में ली जाती थी ...अधिये की खाली बोतल से तैयार दीए भी दिख तो जाते थे, बहुत कम.....क्योंकि इतना मिट्टी का तेल होता ही क्हां था....

शादी-ब्याह में जब बैंड वाले चलते थे ...बड़ी बड़ी लाइटों के साथ तो उन में भी मिट्टी के तेल का इस्तेमाल होता था और ट्रेनों के परिचालन में भी स्टेशनों पर सिगनेल के लिए जो लाईटें जलाई जाती थीं उन में भी यही मिट्टी का तेल इस्तेमाल होता था। और इतिहास गवाह है कि मिट्टी के तेल ने अनगिनत बहु-बेटियों की जान भी ली है...यह भी उस दौर का काला सच है ....स्टोव जब भी फटा, उसने बहु-बेटी को ही अकसर चपेट में लिया ....बड़ा पक्षपात करता था स्टोव भी ........और सुनवाई? - कौन सुनाएगा, किसी की सुनवाई....जो हालात आज हैं इसी से अंदाज़ा लगा लीजिए कि आज से 50-60 बरस पहले हालात कितने भयावह होंगे ...

बत्ती गुल होने पर मिट्टी के दीए की मदद से खाना पकाया  जाता, पढ़ाई लिखाई का काम निपटाया  जाता (दिन की रोशनी में या बत्ती के रहते समय बरबाद करना और दीए की रोशनी में बैठ कर हिसाब की किताब पकड़ लेना, यह दिखावा, टाईम-पास भी अकसर देखने को मिल जाता ...अकसर)....हां, पेपरों के दिनों में रात में बत्ती गुल होना एक गंभीर मुद्दा हो जाता ....दीए वीए में क्या कोई पढ़ता, क्या याद रहता ...सारा साल पढ़े नहीं ...और सारी मशक्कत एक रात पहले ही करने से जैसे ...। यह लिखते लिखते मुझे मेरा एक कज़िन याद आ गया....वह अकसर किताब ही पेपर होने के एक -दो दिन पहले लाता था....और फिर मैंने देखा कि यह किताब वह पेपर में चीटिंग करने के लिए पर्चियां बनाने के लिए इस्तेमाल करता था....पूरा पूरा रात लगा रहता था....दीए की रोशनी में भी उसे मेहनत करते देखा है ....उसे बचपन ही से यह आदत लगी हुई थी...हमारे ज़माने में स्ट्रैचलॉन की निक्करें भी हम लोग स्कूल में कभी कभी पहन जाया करते थे ...वह अपनी जांघों पर भी कुछ कुछ लिख कर ले जाया करता था .. इम्तिहान में कुछ मदद हो जाए, इसलिए....और वह अपनी पर्चीयों को इस्तेमाल भी कर के आता था ....सातवीं आठवीं कक्षा में मैं भी उस की देखा देखी एक दो पर्ची लेकर तो गया लेकिन डर इतना लगा कि खोल न पाया...जब जेब में उन के रखने से अपना याद किया हुआ माल ही कागज़ पर उंडेलने में दिक्कत होने लगी तो जा कर वॉश-रूम में फैंक आया....

यह क्या विषय़ किधर का किधर निकल गया ..दीए की रोशनी में ....

घासलेट को घर में दूसरे कामों के लिए भी लिया जाता था ....कोई ताला नहीं खुल रहा, कहीं जंग लग गया हो....अभी तो यही कुछ याद आ रहा है ....

बातें लिखते लिखते कहां से याद आ जाती हैं, खुद पता नहीं लगता....जैसे मुझे अभी याद आया कि सरकारी डिपो वाला मिट्टी का तेल खत्म होने पर बाज़ार से तीन-चार रूपए की एक बोतल घासलेट की मिलती थी ...इस के लिए कांच की खाली दारू की बोतल अपनी लेकर जानी होती थी .....दारू की बोतल से बड़ी बोतल कोई उन दिनों देखने को न मिलती थी ...कहने को एक लीटर आता था उस बोतल में लेेकिन होती यह शायद 750 मि.लीटर की ही थी....।आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि पहले प्लास्टिक की बोतलें ही न थींं.....और हां,  मिट्टी के तेल की बोतलें अपने आस पास से, अड़ोस-पड़ोस से उधार भी ले लिया जाता था ...

फिर एक वक्त आ गया कि घासलेट हार्ड-वेयर की दुकानों में ही बिकने लगा ....मैंने शायद 10-15 साल पहले एक बार घासलेट की एक बोतल 50 रुपए की खरीदी थी ....यही जंग वंग उतारने के लिए ....तालों के, उपकरणों के जंग का तो इलाज है लेकिन जब बैठे बैठे हम लोगों को जंग लग जाता है, काश! उस को भी उतारने का कुछ तो जुगाड़ हो ....

सिगड़ी कहें या अंगीठी.....एक ही बात है ...

हम लोगों ने बचपन में सिगड़ी या अँगीठी पर ही सभी काम होते देखे...कभी कभी जब अंगीठी न जल रही होती और कोई छोटा मोटा चाय बनाने जैसा या दाल-सब्जी गर्म करने जैसा काम करना या दर्द के लिए अचानक पानी गर्म की ज़रूरत पड़ती तो स्टोव कर ही कर लिया जाता .....

लेकिन सिगड़ी की बातें, अंगीठी के किस्से ...ये इतने ज़्यादा हैं कि अब इस वक्त यह सब नहीं लिख पाऊंगा....इस की पूरी प्रक्रिया, इसे जलाने की मशक्कत, कोयला कहां से आता था, कितने तरह का होता था, कहां से मिलता था.....अंगीठी चलाना भी एक आर्ट था, मैंने कब अंगीठी जलाई.....और हां, नानी के उन के बचपन की यादें कि उन दिनों आग जलाने के लिए माचिस भी नहीं हुआ करती थी ..तो फिर आग कैसे जलती थी, जी हां, पड़ोसी के चूल्हे ही से आग लाई जाती थी...जलते हुए उपले से ....(यह सब हमने मां से सुना है ..इसलिेेए प्रामाणिक है)...गुलज़ार साहब ने भी यह सब देखा लगता है जो उसने अपने गीतों में शरारत से पिरो दिया ...वैसे गुलज़ार साहब और मेरी नानी का मायका एक ही शहर में था ....ब्रिटिश भारत के वक्त के पंजाब का ज़िला गुजरात (अब जो पाकिस्तान में है- इसे गुजरात राज्य से कंफ्यूज़ न करें)....अभी ध्यान आया कि वह तो अंगीठी जलाने के लिए नहीं  बीड़ी जलाने के लिए पड़ोसी के चूल्हे से आग लेने की बात कर रहे हैं....

खैर, अगली पोस्ट में अंगीठी की बातें ...पूरी पोस्ट इसी पर ....जो कुछ याद है, अपनी डॉयरी में लिख लेना ज़रूरी लगता है .....

सोमवार, 16 मार्च 2026

घासलेट पर ही न लौटना पड़े कहीं!


घासलेट भी मैंने ज़्यादा लिख दिया है ...कहीं गोबर के उपले इस्तेमाल करने वाले दिन ही न लौट आएं...क्योंकि अगर उस महान् वैज्ञानिक आइंन्सटाईन की बात याद करें तो कुछ भी हो सकता है ...वह कह कर गए हैं कि मुझे यह तो पता नहीं कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा लेकिन इतना तय है कि भविष्य में अगर चौथी वर्ल्ड वॉर की नौबत आई तो यह डंडों और पत्थरों से लड़ी जाएगी...

हालात जिस तरह से बिगड़ रहे हैं ...कुछ यू-ट्यूब चैनलों पर न्यूक्लियर-वॉर के दौरान होने वाले कहर और उस से थोड़ा-बहुत बचने के उपाय बताने शुरु कर दिेए हैं। कल दो तीन ऐसी व्हीडियो देखी मैंने। सब से अच्छी व्हीडियो तो किसी मैडीकल कॉलेज के प्रिंसीपल रह चुके एक डाक्टर साहब की थी ...

खैर, यह तो अभी कयास ही हैं ..लेकिन कुछ भी मुमकिन है आने वाले वक्त में ....पड़ोस में कहीं आग लगे तो देर-सवेर उस की आंच में हमारा घर भी आता ही है....अभी भी जिस तरह से कुकिंग गैस आदि कि किल्लत होने लगी है ...आप सब जानते ही हैं....उस रेस्ट्रां में यह बनना बंद हो गया, वहां यह अब नहीं बनेगा...गैस किसे मिलेगी, किसे नहीं मिलेगी....किसे पहल दी जाएगी किसे नहीं। कालाबाज़ारी नहीं होगी, आप को यकीं है? - नहीं, मुझे बिल्कुल यकीं नहीं है क्योंकि मैंने 50-55 साल पहले मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) वाले दिन देखे हैं, अनुभव किेेए हैं....उसे ब्लैक में मिलता देखा है, फिर सत्तर-अस्सी के दशक में कुकिंग गैस के सिलेंडर भी ब्लैक में मिलते देखे हैं...बहुत कुछ देखा है, इसलिए इसे यहां इस ब्लॉग में लिखने बैठ गया...

कुछ महीने पहले मैंने किसी एक एंटीक शाप में पीतल का एक चमचमाता स्टोव देखा ....पीतल का, चमचमाता हुआ...1500 रुपए में मिल रहा था ....मेरे पूछने पर उस दुकानदार ने बताया कि यह सब फिल्म शूटिंग पर ले कर जाते हैं....अच्छा, मैं यह लिखने बैठा हूं तो मुझे सुबह सुबह याद आ गया कि मैंने भी तो केरोसिन या घासलेट, स्टोव के बारे में कुछ बरस पहले लिखा था ....झट से ब्लॉगर खोला और मिल गया .....यह रहा मेरी उस पोस्ट का लिंक ....यह मैंने दो-तीन बरस पहले लिखी थी ....मुंबई के भायखला स्टेशन के पास रानी बाग है ...बिल्कुल उस के पास ही मैंने एक दिन किसी बंदे को स्टोव उठा कर जाते देखा था.....मैंने कोशिश की थी कि उसमें सब कुछ लिख दूं ...लिखा भी था अपनी तरफ़ से ...अगर हो सके तो उसे ज़रूर देखिए.....आज स्टोव याद आ गया....(पोस्ट का लिंक)...

मैंने आज सरसरी देखी है वह पोस्ट ....लेकिन पूरा पढ़ा नहीं...जो कि मैं अकसर करता भी नहीं ...लेकिन मैं अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट को कभी भी एडिट नहीं करता ...न कुछ उस में जोड़ता हूं, न काटता हूं ...उस घड़ी में जो कलम से निकला, सो निकल गया....लेकिन मैं उसे पढ़ता इसलिए नहीं क्योंकि मैं बाद में कुछ बरसों बाद पढ़ता हूं तो खामखां लगने लगता है कि ऐसा मैंने क्यों लिख दिया, कैसे यह लिख दिया.....असहजता तो न कहूं, ऐसे ही कुछ अलग सा लगता है, इसी से बचने के लिए अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ता नहीं हूं, उसी हलवाई की तरह जो अपनी दुकान में तैयार की हुई मिठाईयां नहीं खाता.....मतलब आप समझ ही गए हैं....

मेरे ख्याल है कि मैंने अपनी उस पुरानी पोस्ट में यह कहीं नहीं लिखा था कि पीतल के स्टोव के दिनों में एक स्टोव और भी आ गया था ..प्रभात का स्टोव ....इस को जलाने में ज़्यादा मशक्कत न लगती थी ...शांति से चुपचाप चालू हो जाता था और जब तक जलता था बिल्कुल भी आवाज़ भी नहीं करता था .....

केरोसिन पर कल मैंने एक पोस्ट देखी, पहले भी देखी थी,,,, 1940-50 के दशक में मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) का विज्ञापन मोहम्मद रफी की आवाज़ में रेडियो पर बजता था ...चूंकि गोबर के उपले वाला ईंधन घासलेट से सस्ता पड़ता था, इसलिए इस का विज्ञापन खूब ज़ोरों-शोरों से चलता था ...यह बात तो मैंंने विविध भारती रेडियो पर भी कुछ बरस पहले सुनी थी .....सोचने वाली बात है कि हम भी कहां से कहां आ गए हैं और अभी विश्व फिर से अपने फितूर की वजह से, सिरफिरेपन की वजह से कहीं वापिस हमें पुराने दिनों की तरफ़ ही न ले जाए.........अगर आईंन्स्टीन की मानें कि चौथा विश्व युद्ध लाठियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा........तो फिर उस के बाद  खाना भी (अगर कुछ बचा तो) लकड़ी के टुकड़ों (अगर तब तक जंग ने या हमारे लालच ने पेड़ भी बचे रहने दिए) पर चलने वाले चूल्हों पर ही पकाना होगा ....


लिखा ही होगा मैंने अपनी दो तीन बरस पुरानी उस पोस्ट में कि घासलेट लेकर आना भी पहाड़ पर चढ़ने जैसा मुश्किल काम था ......लेकिन फिल्मी गाने तब भी आम आदमी को उस की तकलीफ़ को ज़्यादा तकलीफ़ नहीं लगने देते थे ....किशोर के ऐसे गीत रेडियो बजते थे और आम आदमी सोचता था कि वह भी इस में शामिल है, वही है राजेश खन्ना,.(1970 का दशक).....


वैसे आप को पता ही होगा कि शायद एमरजैंसी के दिनों में किशोर कुमार के गीतों को आल इंडिया रेडियो पर बजाने पर प्रतिबंध लग गया था .......पाठक बस यह कल्पना ही करें कि हिंदोस्तानियों ने भी कैसे कैसे दिन देखे हैं....लेकिन फिर भी पुरानी पीढ़ियों में ठहराव था, सब्र था, संतोख था.....अब अगर किसी ने राशन की दुकान से केरोसिन लेना है तो उसे सब्र तो रखना ही पड़ता था ....

अच्छा लगा, सुबह सुबह केरोसिन की बातें अपने पाठकों से साझा करने को मौका मिल गया .....फिर से याद दिला दूं ... मेरी यह पुरानी पोस्ट भी देखिए....पूरी बात उस में लिखी है...आज अचानक स्टोव याद आ गया...,अभी कोयले और लकड़ी-चूल्हों वाले दिनों का बोझा भी किसी दिन अपने दिल से उतारना है ....बहुत सी बातें साझा करनी हैं...देखते हैं फिर कभी!


काश इत्ती सी छोटी बात ही किसी के पल्ले पड़ जाए....

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
टैंक आगे बढ़़ें कि पीछे हटें...
कोख धरती की बांझ होती है ...
फ़तह का जश्न हो के हार का सोग,,,
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है...
- साहिर लुधियानवी 


रविवार, 8 मार्च 2026

आज महिला दिवस पर ब्लॉगिंग का बिल्कुल ख़याल न था ...लेकिन..

इन के लिए महिला दिवस के क्या मायने!! -वही बोझा, उस के तले वैसे ही दबे रहना, वही पिसना...फिर भी इन की जिजीविषा को सलाम 


लेकिन क्या? 

हां, सच में यह ब्लॉग लिखने का कोई इरादा न था ...लेकिन बात ही कुछ ऐसी हो गई कि फिर मैंने ज़िद्द ही कर ली कि अब तो मन की बात वॉट्सएप पर न सही तो क्या, अपने ब्लॉग में दर्ज कर के रहूंगा...

तो हुआ यूं कि आज सुबह जैसे ही मेरा सब से फेवरेट पेपर टाईम्स ऑफ इंडिया बंबई एडिशन हाथ में पकड़ा ....उस के पन्ने उलट पलट रहा था कि महिलाओं से संबंधित कंटैंट इस में भरा हुआ था ....इच्छा हुई कि इस में उन सब पन्नों की फोटो लूं और वाट्सएप पर तस्वीरों की शक्ल में उन को शेयर कर दूं.....चाहे, पढ़ा मैंने उन में से पूरा किसी को भी नहीं, बस हैडिंग ही देखे या तस्वीरों के साथ उन के कैप्शन देखे हैं...



हां, तो जब मैं उन सब तस्वीरों को शेयर करने लगा तो मुझे महसूस हुआ कि जो इस वक्त मन में उद्गार उठ रहे हैं उन को भी लिख कर राहत पा लूं ...जी हां, लिखने वालों के लिए लिखना मानचिक हलचल से निजात पा लेने का एक ज़रिया भी होता है ...मैंने भी उन तस्वीरों के साथ वाट्सएप पर मैसेज लिखते लिखते 12-15 मिनट बिता दिए....लिख रहा था तो सामने पड़ी फीकी चाय की भी परवाह न की ....खैर, मन की पूरी बात लिखने के बाद जैसे ही बटन दबाया.....अचानक सब कुछ गायब। टेक्स्ट मैसेज तो क्या तस्वीरें भी न आगे जा सकीं...

अफ़सोस हुआ ...लेकिन उन बातों को फिर से हु-ब-हू लिखना ...न तो यह हो पाता और न ही इतना सब्र है मेरे में....खैर, मैंने यह सोचा कि ठीक है, जो बातें लिखी हैं उन को अपने ब्लॉग में लिख कर महिला दिवस की बात कर लूंगा....

टाइम्स आफ इंडिया को देखने के बाद जब इंगलिश का मिड-डे देखा तो उस में अधिकतर कंटैंट महिलाओं से ही जुड़ा हुआ था ...बहुत से बोल्ड मुद्दे भी थे ....हैडिंग ही देखे...अब कोई लिख ले या पढ़ ले, एक ही काम हो सकता है ...लेकिन उस के आखिरी पन्ने पर एक इश्तिहार दिख गया ...आप भी देखिए......

इस इश्तिहार में क्या कुछ कमी लगी? अगर हां, तो लिखिए नीचे कमेंट में ...अगर नहीं लगी तो भी सब से नीचे मैंने कुछ लिखा है, पढ़िए ज़रूर ....यह मेरा ख़याल है ...


पूरा पेपर आज महिला दिन के बारे में था ....शायद उन महिलाओं के लिए जो इंगलिश पढ़ना लिखना जानती हैं, बोलती भी हैं और अपने हक-हकूक के बारे में सचेत हैं....मुझे तो अधिकतर यह सब पेज-थ्री कंटेंट ही लगा....कहीं पर आस पास की आम महिलाओं की उपलब्धियों के बारे में मुझे कुछ नहीं लिखा दिखा......वह महिला जिससे जब पूछा जाता है कि आप क्या करती हैं.......और वह लगभग झेंपते हुए कहती हैं........कुछ नहीं, बस हाउस वाईफ....

यही सुन कर सब से ज़्यादा बुरा लगता है कि जो काम ज़िंदगी में सब से ज़रूरी है ...जिस की ड्यूटी तड़के 4-5 शुरू होती है और रात में सब के सो जाने के बाद, चूल्हा-चौका समेटने के बाद चाहे 11 बजे या 12...कोई परवाह नहीं ...वह कह रही है ...कुछ नहीं, बस घर पर ही ...। 

महिला दिवस के सही मायने तभी होंगे जब सारी महिलाओं की तस्वीर बदलेगी....सिर्फ़ अच्छी फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाली महिलाओं की ही नहीं....इसलिए जब भी महिलाओं के इस तरह के आयोजन होते हैं, उन में सब की भागीदारी ज़रूरी है....कतार में सब से पीछे खड़ी महिला के भी दिन बदलने चाहिए...जिसे अपने हक का कुछ पता नहीं, हर तरफ़ उस का शोषण है, कुछ दिख जाता है, कुछ दिखता है,  सब कुछ सह जाती हैं...दुनिया भर की कमेटियां हैं, लेकिन फिर भी जो ज़मीनी हालात हैं, यह जग जाहिर है....शोषण सिर्फ़ दैहिक या मानसिक ही नहीं होता, इस के अनेकों रूप हैं, बहाने हैं....जिन आंखों से कोई किसी महिला को तकता है ...बहुत बार वह भी शोषण की श्रेणी ही में आता है ......

सरकार या एनजीओ बहुत कुछ कर रही है लेकिन सब कुछ सरकार ही कर देगी, यह असंभव है....मानसिकता बदलनी होगी...और यह बदलाव तो एक परिवार से एक पुरूष ही से शुरु होगा.... इतना पुरुष प्रधान समाज कि जैसे कन्या का जन्म न हो गया हो, कोई ज़ुर्म हो गया हो....मुझे अच्छे से याद है कि पहले तो किसी घर में स्वस्थ बेटी के जन्म होने पर बधाई देने का रिवाज़ भी न था ....बधाई की तो बात ही क्या करें, अभी परसों मैं देश के एक चोटी के उद्योगपति की (कितना चोटी का है, अगर लिखूंगा तो आप समझ जाएंगे) इस लिए नहीं लिख रहा हूं...वह अपनी जीवनी में लिखता है कि जब उस की बड़ी बहन का जन्म हुआ तो मेरी परदादी ऐसे हो गई कि उसने अपने आप को तीन दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया....। (बिल्कुल उसने यही लिखा है) -

चलिए, इतना भी सुस्पेंस ठीक नहीं,  नाम भी लिखने में क्या हर्ज़ है....यह बिरला खानदान की बात है....जब यह बात किताब ही में आ गई है तो मुझे लिखने मेंं क्या दिकक्त है..

सरकार ने कोख में बच्चियों को मारने की भयानक कुरीति को दूर करने के लिए बहुत काम किया है .....बच्चियों की पढ़ाई लिखाई ब्याह शादी के लिए भी सरकार अपना काम कर रही है....अभी हाल ही में महिलाओं को बच्चेदानी के कैंसर से बचाने के लिए युवतियों के तरुणावस्था में एचवीव्ही टीकाकरण की स्कीम आई है ...इस स्कीम का बहुत स्वागत हुआ है .....सफल तो तभी कोई स्कीम मानी जाए अगर अनपढ़, कम पढ़ी-लिखी, श्रमिक.....सभी वर्गों की महिलाएँ इतनी सचेत हो जाएं कि इस तरह की सरकारी स्कीमों का फ़ायदा उठाने के लिए खुद आगे आएं....
और तो और, अभी हाल ही में महिलाओं के सैनेटरी पैड पर खुल कर बात होने लगी है ...कुछ ऐसी जागरुकता बढ़ाने वाली फिल्में भी बनीं....इस तरह की फिल्में बनाने वाले साधुवाद के पात्र हैं....क्या था फिल्म का नाम...पैडमैन....बेहतरीन फिल्म....यह गीत भी आप को याद होगा....देखो देखो तितली बदल रही रंग...होते होते होते होते हो रही पतंग..


महिलाओं से जुड़ी फिल्मों की बात करें तो मुझे अभी पिछले हफ्ते दो एक फिल्में देखी याद आ रही हैं....एक तो थी "जाइए आप कहां जाएंगे"....यह प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफार्म वेव पर मैंने देखी थी ...अकसर मैं विविध भारती पर इस के बारे में सुनता तो था लेकिन पता नहीं था कैसे करना होगा....कुछ दिन पहले बेटे की मदद से टीवी पर शुरु कर लिया ...मुफ्त है....हां तो फिल्म की बात ....इस तरह की फिल्में बनाने वाले ऐसे अहम् मुद्दों की बात करते हैं जिन से परेशान सभी महिलाएं हैं लेकिन बात नहीं करतीं, बस सहती रहती हैं, परेशान रहती हैं इस व्यवस्था के अभाव में .....इस से आगे मैं नहीं लिखूंगा....क्योंकि फिल्म देखने से पहले मुझे भी इस के फिल्म की स्टोरी नहीं मालूम थी....इसलिए मैं पूरे वक्त एलसीडी के सामने डटा रहा .....ऐसे लगा ही नहीं फिल्म देख रहे हैं....या कोई एक्टिंग कर रहा है ...सब कुछ इतना यथार्थ और सजीव कि जैसे आंखों के समने ही घट रहा है ....सभी पात्रों की एक्टिंग सर्वश्रेष्ठ....देखिएगा...कभी इसे ज़रूर .....वेव ओटीटी पर देख पाएं तो ठीक , वरना मुझे अभी इस का यू-ट्यूब लिंक भी मिल गया ...यह है इस का लिंक (क्लिक करिए) ....

महिला दिवस है ...दूसरी फिल्म है ..सदाबहार ....यह भी एक बेहतरीन फिल्म है ....जया भादुड़ी की फिल्म है ....उन का अपने पुराने रेडियो से किस कद्र लगाव है, यह देख कर आप दंग रह जाएंग....अकेली रहती हैं, रेडियो के सहारे....इसे भी ज़रूर देखिए...वेव ओटीटी पर तो है ही...यू-ट्यूब लिंक इस फिल्म का यह है ....सदाबहार...आप को यह फिल्म देखनी ही चाहिए....मैं भी एक बार इस तरह की फिल्म देखने बैठता हूं तो फिर उठ ही नहीं पाता ....जया भादुड़ी के फ़न के तो हम लोग (हमारी पीढ़ी) बचपन से दीवाने हैं....10 बरस की उम्र थी शायद मेरी जब गुड्डी आई ...फिर ज़ंजीर और फिर नमक-हराम ...फिर कोशिश ....क्या क्या याद दिलाएं.....याद क्या दिलाएं, जब भूले ही नहीं तो ...

हां, एक बात बहुत ज़रूरी अभी लिखनी है कि हाउस-वाईफ की तो बात कर ली ...लेकिन कामकाजी महिलाओं के जज़्बे को भी सलाम.....इन में से भी अधिकतर ...अधिकतर क्या, होंगी 99 फ़ीसदी तक जो बाहर काम के साथ साथ घर में भी पिसती हैं ....डबल-पिसाई कहें तो ....ये वो हैं जो काम से घर आते वक्त लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे में  सब्जी काटती दिख जाती हैं ताकि घर पहुंचने पर वक्त पर खाना तैयार हो पाए.....

और कितना लिखें....लिखें तो लिखते ही चले जाएं...यह टॉपिक ही ऐसा है ....हालात बदले हैं, बदल रहे हैं..बदलने चाहिए और बदल कर रहेंगे ही .......लेकिन इस के लिए महिलाओं की किसी भी तरह की दया, सहानुभूति, मापदंडों में किसी तरह की रियायत, किसी तरह के ग्रेस-मार्क्स की कतई ज़रूरत नहीं है ........बस,समाज अगर उन्हें अपनी धुन में लगे रह कर काम करने दे तो यह समाज का बड़ा योगदान होगा....वह अपना रस्ता चुनने में, उस पर आगे चलने में, चोटी तक पहुंचने में सक्षम है....हमेशा से थी .....बस, पुरुष-प्रधान समाज में आदमी को अपनी नज़रों को संभालना होगा....अच्छी बात है स्कूल ही से बच्चे-बच्चियों को आज कल गुड-टच, बैड-टच के बारे में समझाया जा रहा है.....लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है....पुरुषों की निगाहें भी ठीक होनी ज़रूरी हैं.....एक दम ठीक, न आढ़ी-न तिरछी..... मैंने कईं बार देखा है कि पॉवर में बैठा पुरुष सब से पहले तो जिस तरह से किसी महिला को देखता है वही उस को असहज कर देती है .......और यह जो बात है, यह जो सही गल्त नज़र परखने की दिव्य शक्ति हर महिला में मौजूद होती है ....अनपढ़ में भी उतनी ही जितनी किसी डाक्ट्रेट तक पढ़ी महिला में ......

बातें छोटी छोटी हैं, कहीं दर्ज भी नहीं होती, लेकिन हैं बहुत ज़रुरूी .....आज के वातावरण में महिलाओं की एम्पावरमैंट का एक पहलू यह भी है कि शादी से पहले वह भावी पति से उस की मैडीकल जांच रिपोर्ट की मांग करे ....और हां, उसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.....वरना, बाद में एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है ....

बस, अब करें इस पोस्ट को बंद ....इस इल्तिजा के साथ कि जैसे हम लोग अपनी मां-बहन-बेटी से ज़माने से अच्छे व्यवहार की कामना करते हैं .....तो यह काम हमें भी करना होगा...शुरुआत हम से ही होगी....अगर हम दूसरों की मां-बहु, बहू-बेटी से भी आदर से पेश आएंगे........और नज़रों पर लगाम लगाना ज़रूरी है, इधर उधर आंखों को भटकाने से कुछ होता हवाता नहीं है, आदमी की छवि खराब हो जाती है.....अगर इस से भी अपने आप को बचाए रखें तो भी महिला दिवस पर महिलाओं के लिए यह भी उन के सम्मान का एक संकेत ही होगा.....

अब मुझे वे अखबार में दिखने वाली तस्वीरें भी लगानी चाहिए....जिन की वजह से यह पोस्ट मुझे लिखनी पड़ी.....




















हां, तो ्अब  आते हैं ऊपर इश्तिहार वाली फोटो पर ....मैंने कोई त्रुटि पूछी थी....मुझे यह लगा कि यह शो-रूम पुरुषों को आमंत्रित कर रहा है कि अपनी मित्रों, माताओं, बहनों, बेटियों को ले कर आएं ....लेकिन पत्नी का ज़िक्र करना भूल गया शायद.....खैर, बंबई में रहने वालों को यह भी बताना ज़रूरी होगा कि चर्चगेट स्टेशन के बाहर जहां एशिऑटिक स्टोर होता था, अब वह बंद हो चुका है और थोड़े दिन पहले वहां पर कला निकेतन साड़ी शोरूम खुल गया है......हां, जाइए आप भी वहां लेकिन बीवी को मत भूलिए....। 😃

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

डिस्को किंग भप्पी लहरी नाईट के कुछ मंज़र.....

म्यूज़िक कंसर्ट तो यहां बंबई में आए दिन होते ही रहते हैंं....बहुत से देखे भी हैं ...और लगभग सभी मुंबई के सब से बढ़िया षणमुखानंद हाल में....अब किसी म्यूज़िक कंसर्ट में जाने से पहले थोड़ा सोचना पड़ता है ....क्योंकि बार बार एक ही तरह के प्रोग्राम नहीं देखे जाते ....बोरियत होने लगती है ...

फिर भी इसी हाल में आशा भोंसले, कुमार सानू, उदित नारायण, हेमलता.....और किसी दूसरी जगह पर शैलेंद्र सिंह...उषा मंगेशकर, सुखविंदर सिंह ...और भी होंगे, नाम याद नहीं आ रहे ...उसी तरह से प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत प्यारे लाल की जोड़ी वाले ) और आनंद जी (कल्याण जी आनंद जी जोड़ी)  को लाईव आर्केस्ट्रा कंडक्ट करते भी कुछ अरसा पहले इसी हाल में देखा ....तो फिर इस से आगे देखने को रह ही क्या जाता है ...


हां, देखने में रह जाते हैं कुछ लोग ...जिन को हम लोग पिछले 50 बरसों से सुन रहे हैं ...जैसे कि इस प्रोग्राम ...बप्पी लहरी नाईट के इश्तिहार तो कुछ महीनों से आ रहे थे....लेकिन इतना पहले से कैसे टिकट खरीद लें...कहीं आने जाने का भी पता नहीं होता...लेकिन इस में उषा उत्थुप भी आने वाली थीं, इसलिए कुछ दिन पहले टिकट ले लिया....उषा उत्थुप को मैंने दो तीन बरस पहले यहां मुंबई के लिट-फेस्ट में देखा था और थोड़ा सुना भी था ....महान् गायिका तो हैं ही ...इन की एनर्जी और इन की आवाज़ की बुलंदी के क्या कहने....

आज से 45 बरस पहले के दिनों की बात याद आती है ...1981 के दिन....मैं तो डे-स्कॉलर था लेकिन जब दोपहर के वक्त मेडीकल कॉलेज अमृतसर के होस्टल के पास से निकलने का मौका मिलता....उन कमरों से तेज़ आवाज़ में रंभा हो, रंभा हो ....गीत की आवाज़ हमेशा आया करती थी, यह क्रेज़ था उन दिनों इस गीत .......उन दिनों क्या ....अभी भी इस गीत की शोहरत आसमां पर है ...चलिए, पहले उसे सुन ही लेते हैं ....कल जैसा उस प्रोग्राम में पेश किया गया ....

ज़ाहिर है, यह 1981 का दौर न केबल का था और न ही दूसरे चैनलों का ....रेडियो ही चला करता था ज़्यादातर और होस्टल से जो आवाज़ आया करती थी वह टेप-रिकार्डर पर बजते इस गीत से आया करती थी ....यह जो ऊपर गीत का मैंने लिंक लगाया है उसे पूरा सुनिए... क्योंकि उस गीत के बाद उषा उत्थुप उस गीत से जु़ड़ी कुछ यादें भी साझा कर रही हैं....सुनिएगा...

अच्छा, एक बात और ...प्रोग्राम में मैं चला तो गया ...वहां पर कंपियर ने जब यह कहा कि बप्पी दा ने वैसे तो बहुत से मधुर संगीत वाले गीत भी गाए हैं ..लेकिन इस प्रोग्राम में तो डिस्को गीत ही पेश किए जाएंगे....उस वक्त मुझे लगा कि आज तो मैं ऐसे ही आ गया ...क्योंकि चंद डिस्को सांग्स के अलावा मुझे इन गीतों में कोई रुचि है नहीं .....लेकिन वही सुपर-डुपर गीत जब उषा उत्थुप ने पेश किए और विजय बेनेडिक्ट ने जिसने वह गीत गाया था उस फिल्म में ...ऑए एम ए डिस्को डांसर....कल उन से फिर से गीत सुनने को मिला ...और उन्होंने बताया कि सुबह 8 बजे से लेकर शाम पांच बजे तक इस गीत की रिकार्डिंग चली ....और शर्त यही थी कि अगर मेरा गाया गीत पसंद आ गया तो ठीक है ...वरना इस गीत तो किशोर दा से गवाया जाएगा....खैर, गीत इन की ही गाया हुआ फिट हो गया फिल्म में....फिट क्या, ऐसा सुपर हिट बन गया कि हमारे ज़माने में लोग इस के दीवाने हो गए....मुझे भी याद है 1982 के दिन थे ...इतनी गर्मी थी उस दिन जब मैंने यह फिल्म डिस्को-डांसर देखी थी.....कल विजय बेनेडिक्ट ने यह गीत गाया, उस को आप मेरे इस यू-ट्यूब लिंक पर जा कर देख सकते हैं...यह रहा उस का लिंक ....ऑए एम ए डिस्को डांसर....

उषा उत्थुप के गायन में बेहद कशिश है...एनर्जी है, बुलंदी है ......जो श्रोताओं और दर्शकों को जैसे बांधे रखती है ....बेहतरीन पेशकश....दो एक और वीडियो कल के प्रोग्राम के मैं यहां शेयर कर रहा हूं....


इस प्रोग्राम में बप्पी दा की बेटी रेमा और उन की बेटी का बेटा भी आया हुआ था....रीगो....वह भी म्यूज़िक में ही अपना कैरियर शुरु कर रहा है ...बहुत कांफिडेंस के साथ गाता है ...बता रहा था कि उसने अपने दादू के साथ यहां इसी हाल में बहुत से शो किए है ं...जब वह गा रहा था तो उस के साथ साथ उस के दादू के साथ तस्वीरें भी स्क्रीन पर दिखाई दे रही थीं.....जैसे उस जवान की पेशकश थी उस से लगता है कि उसने भी बहुत मेहनत की है ....इस कला को साधने के लिए ...आप उस की आवाज़ भी सुनिए...वह बप्पी दा का नाती हुआ ....लेकिन वह बार बार दादू लफ्ज़ का इस्तेमाल कर रहा था ....पता नहीं, कुछ समझ में नहीं आया......वैसे इतना दिमाग पर लोड लेने की ज़रुरत भी क्या है, आप भी उस की बेहतरीन आवाज़ सुनिए....बुलंदी आवाज़ की, जोश और बप्पी दा जैसा ब्रैंड....बढ़िया चमकदार पोशाक, सोने के ज़ेवर और वही वाले तेवर .............उम्मीद है यह जवान भी आने वाले वक्त का चमकता सितारा होगा....शुभकामनाएं उस के सुनहरे भविष्य के लिए ....

अभी देखा तो कल के प्रोग्राम की एक और रिकार्डिंग मेरे फोन में थी, उसे भी शेयर कर रहा हूं.....इस में उषा उत्थुप अपनी भप्पी दा से जुडी यादों को साझा कर रही हैं ...देखिए इसे भी .....


आज सुबह बप्पी दा का विकी पेज देखा तो सब कुछ याद आ गया कि डिस्को सांग्स के अलावा भी उन्होंने कितने बेहतरीन फिल्मी गीतों से हमारा मनोरंजन किया है ...पिछले इतने दशकों से ....लिस्ट बहुत लंबी है ...मैं तो हैरान रह गया..क्योंकि उस लिस्ट में बहुत से गीत मेरे फेवरेट हैं ...जिन्हें मैं अकसर सुनता रहता हूं .... उन में से एक यह  भी है ...



मेरी पीढ़ी जो फिल्मों, फिल्मी गीतों के साथ बड़ी हुई है ...उस का इन सब से भावनात्मक जुड़ाव है ...याद दिला दूं कि हमारे दिनों में (ज़्यादा नहीं, यही कोई पचास बरस पहले)..फिल्म देखने जब जाते थे तो सिनेमा हाल के बाहर 10-20पैसे में उस फिल्म के गीतों की एक छोटी सी किताब मिलती थी ...मुझे भी यह बहुत महंगी कंसाईनमैंट दो तीन दिन पहले ही प्राप्त हुई है ...बहुत ज़्यादा महंगी मिली है, बेशक...लेकिन जितनी यादें इन से बावस्ता हैं उस के आगे वह कीमत कुछ नहीं ....पचास, बरस पहले जो काम दस, बीस पैसे में हो जाता था ....वह बीस तीस साल पहले तीन चार रुपए में  होने लगा जब अलग अलग गीतकारों की, अलग अलग फिल्मों की किताबें मिल जाती थीं और अब .......जाते जाते नीचे भी एक नज़र मार लीजिए.....




आज के लिए इतना ही .....सुबह सुबह दिल्ली एफएम गोल्ड पर एक शे'र सुना था  ...जो आज सारे दिन के लिए मेरे पास ही रह गया.....

"कांटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बां..

ये भी गुलो के साथ पले हैं बहार में..."

(बहादुर शाह ज़फ़र) 

PS.....लिखना भी शारीरिक कसरत जैसा ही है ...कुछ नहीं न करो तो इच्छा ही नहीं होती.....पूरे तीन महीने के बाद मैंने आज कुछ लिखा है, लिखने का मन नहीं हो रहा था...लेकिन ढीठ बन कर बैठ ही गया....क्योंकि पिछले दिनों मैं कुछ विषयों पर लिखना चाह रहा था, लेकिन बस ऐसे ही आलस की लोई ओढ़े पडा रहा....कुछ बेहतरीन प्रोग्रामों में भी गया...लेकिन ब्लॉग के पन्नों पर कुछ सहेज कर नहीं रखा....मुझ में यह बहुत बड़ी कमी है...


बुधवार, 3 दिसंबर 2025

लिखने के लिए आईडिया कहां से आते हैं....

कल ए.सी लोकल के जिस कोच में मैं बैठा हुआ था ...सामने तीन-चार 20-22 साल के लड़कों की एक मंडली भी थी...इंगलिश में खूब हंसी-मज़ाक चल रहा था, खुल के हंस रहे थे ...हंसते हुए लोगों के साथ बैठना किसे अच्छा नहीं लगता.....

मैं ट्रेन में बैठ कर अकसर किसी अखबार के पन्ने उलट पलट लेता हूं...कल भी मैं यही कर रहा था कि अचानक मैंने सुना उन की गुफ्तगू का टॉपिक कुछ संजीदा सा हो गया है ....बात तो इंगलिश में हो रही थी..लेकिन मैं उसे हिंदी में लिख रहा हूं...

"इसलिए कहता हूं कि हर किसी इंसान के साथ बिल्कुल बात नहीं करनी चाहिए"....एक ने कहा ...

"तू सही बोलता है, ऐसे ही पक जाता है आदमी हर किसी से बात करने लगा तो" ...दूसरे ने हामी भरी 

"हां,यह बात तो है और एक और भी बड़ी बात यह है कि हर एक इंसान से अगर बात करने लगे कोई तो वह टॉप पर नहीं पहुंच सकता"....किसी और ने अपनी बात रखी...

"इसलिए जो किसी भी काम में टॉप पर है, उसी से बात करनी चाहिए....तभी तुम भी टॉप पर पहुंच पाओगे"....एक तर्क यह आया...

"सही बोला तू ...यह नहीं होता कि पहले तुम टॉप पर पहुंचोगे, फिर टॉप के लोगोंं से बात करोगे"....दूसरे साथी ने उसकी बात पर मोहर लगा दी...

इस मुद्दे पर उन की बात अभी चल ही रही थी कि मेरा स्टेशन आ गया ...और मैं उतर गया ....उन की इस गुफ्तगू का सारांश मेरे पास है ....और सुन कर मैंने करना भी क्या था....

खैर, आज मुझे इन युवाओं की बातों का ख़याल बार बार आता रहा ...हर पीढ़ी का अपना व्यू-प्वाईंट..अपना नज़रिया...ज़िंदगी को देखने का अपना नज़रिया....वैसे मुझे उन की ये बातें सुन कर ज़्यादा हैरानी भी नहीं हुई...क्योंकि महानगरों में विचरते हुए यही सब देखा भी है कि लोग अकसर हर किसी के साथ बात नहीं करते...अगर किसी मतलब की वजह से करनी भी पड़ती है तो बड़ी घुटी घुटी सी बात ....

अब इस के बारे में क्या लिखूं....किस तरह से हम लोग अनजान के साथ पेश आते हैं....और तो और वैसे भी बातचीत सामने वाली की हैसियत, कपडे़, हुलिया आदि देख कर ही की जाती है ....

चलिए, ज़माने का चलन जो है सो है ...किसी से छुपा नहीं है..लेकिन सच्चाई यह है कि अगर हम लोग हर किसी के साथ बात नहीं कर सकते या करना नहीं चाहते तो हम बहुत कुछ मिस कर जाते हैं.....

मुझे अकसर मेरे आस पास के लोग या मेरे ब्लॉग को विज़िट करने वाले पूछते हैं कि लिखने के लिए आईडिया कहां से आते हैं...कोई पूछता है कि इंस्पिरेशन कहीं से मिल जाती है....

उस का दो टूक जवाब है ...सब कुछ इस दुनिया के मेला देखते-घूमते ही मिल जाता है ....

हर किसी से बात करना है निहायत ज़रूरी ....

सिर्फ़ पहचान वालों से ही नहीं, जो नहीं भी पहचानते उन से भी अगर बात करनी पड़े तो ढंग से बात की जाए....डरिए मत, कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा... न ही कोई फायदा उठा लेगा,....ये सब बेकार की बातें हैं....

जो हम लोग कहते तो हैं कि दो इंसानों के बीच सब कम से कम दूरी है क्या है.....एक मुस्कान। बेशक, इस की एक यूनिवर्सल भाषा है...। 

जब हर किसी से बात की जाती है ..तो बातों से बात निकलती है तो कुछ नया पता चलता है ...एक कहावत और भी है कि इस कायनात में हर इंसान के पास ऐसा कुछ ज्ञान या सीख है जो आप को नहीं पता....आप उस से सीख सकते हैं। बस, बातों बातों में लिखने के आईडिया निकलते हैं। 

अख़बार, किताबें, मैगज़ीन को पढ़ने से भी बत्ती जग जाती है ....

अखबार हो या किताबें ...आईडिया इन को पढ़ते अकसर आते हैं...बहुत से आईडिया ...लेकिन अखबार किसी अच्छे स्तर की होनी चाहिए। बहुत बार उस में छपे किसी इश्तिहार, किसी तस्वीर से भी बत्ती जग जाती है....और बत्ती तो जल जाती है, फिर भी वह आईडिया कईं दिनों तक ज़ेहन की आंच में सुलगता रहता है ...जब अंगारे संभलते नहीं संभलते तो काग़ज़ पर गिर जाते हैं....

रेडियो, टीवी, सोशल मीडिया ...

इन से भी आईडिया आ जाते हैं...कोई गीत बज रहा है रेडियो पर तो गुज़रा दौर याद आ जाता है ...इसी तरह से टीवी और सोशल मीडिया पर चल रही किसी बात से भी आईडिया मिल जाते हैं...

दुनिया के मेले से बड़ी इंस्पिरेशन क्या होगी....

जी हां, इस से बड़ी इंस्पिरेशन कोई नहीं है। इस दुनिया के मेले को देखते, महसूस करते बहुत कुछ मिल जाता है ...सफर करते वक्त, बाज़ार में, सिनेमा घर में, स्कूल, कालेज, अस्पताल, ट्रेन, बस, टैंपो....क्या क्या लिखूं....जिधर देखिए आईडिया ही हैं....रास्ते पर आते जाते जो मंज़र दिख जाते हैं....मेरे लिए शायद यह भी एक बहुत बड़ी इंस्पिरेशन होती है ....किसी स्टेशन पर किसी दिव्यांग को अपने छोटे से बच्चे के साथ मस्ती करते देख कर...अगर उस की एक फोटो लेनी की गुस्ताखी कर ही ली तो फिर दिल में उठा वह उफान एक पोस्ट में ढल जाने के बाद ही शांत होता है ......ऐसी ही एक दो साल पुरानी मेरी पोस्ट यहां देखिए....मुकद्दर तो उन का भी होता है जिन के हाथ नहीं होते ... (नवंबर 2023) ...यह मुंबई के सीएसटी स्टेशन की बात है ....(लिंक तो मैंने उस पोस्ट का ढूंढ लिया है लेकिन मुझे एक दो बातों के अलावा कुछ नहीं पता कि मैंने उस में क्या लिखा हुआ है....क्योंकि मैं अपनी लिखी हुई किसी पुरानी पोस्ट को नहीं पढता, मुझे अजीब सा लगता है ....कईं बार असहजता भी होती है, इसलिए नहीं पढ़ता...बिल्कुल वैसे जैसे अकसर हलवाई अपनी मिठाई नहीं खाता...यह तो पता ही है आपको ...क्यों? )

दुनिया के मेेले में...सब की सलामती की दुआ करते चलें.....कईं बार यह जानना भी मुमकिन नहीं होता (और शायद गैरज़रुरी भी) कि सहारा किस ने किस को दे रखा है...🙏


मैंने भी आज कौन सा टॉपिक ले लिया....इतना विशाल ....कि आईडिया कहां से मिलते हैं लिखने के लिए....बस ये थोड़ा सा लिखने से बात पूरी तो क्या, शुरु भी नहीं हुई है ....क्योंकि आर्ईडिया हमारे हर तरफ़ हैं...उस के लिए किसी से बात करनी होगी, इधर-उधर-हर तरफ़ देखना होगा, अनजान इंसान को भी एक मुस्कान देने से डऱना न होगा.....

फिर से कालेज के लड़कों की बात याद आ रही है....पहले कंप्यूटर आने से युवा पीढ़ी लिखने से भागने लगी....अब बोलचाल भी कम ही है...यह सिर्फ उन कालेज के युवाओं की बात नहीं है, आज की पीढ़ी के पास बातें ही नहीं हैं, सिर्फ हॉय-बॉय....कूल, थम्स-अप के ईशारे और हर मौके के लिए बीसियों ई-मोजी.....क्या इतना ही काफ़ी है...

मैंने ऊपर एक शीर्षक लिखा है ...दुनिया का मेला...लीजिए, उस से मुझे मेरे बचपन के ज़माने का एक सुपर हिट गीत याद आ गया...दुनिया का मेला मेले में लड़की ....1972 की फिल्म राजा जानी, धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी पर फिल्माया गया...इस गीत के हमारे लिए ये मायने हैं कि इसे हम लोगों ने रेडियो-ट्रांजिस्टर पर, और किसी शादी, त्योहार, समारोह कै दौरान घरों की छतों पर बड़े ब़ड़े स्पीकरों पर बजते खूब सुना.....अच्छा लगता था इसे सुनना, अभी भी लगता है...कितनी रौनक है इस गीत में ....सच में दुनिया का मेला ही लगा हुआ लगता है ....


रविवार, 30 नवंबर 2025

मसालेदानी से कहीं ज़्यादा अपनापन है लूनकी में ....

बिल्कुल दिल की बात लिख रहा हूं कि पुराने दौर की मसालेदानी के दर्शन किए हुए भी ज़माना गुज़र गया है लेकिन अभी भी  गुज़रे दौर की रसोई के फर्श पर रखी वह बाबा आदम ज़माने की लूनकी बिल्कुल अपनी सी लगती है....मसालेदानी कोई बेगानी शै लगती है ....खैर, हैं ये दोनों चीज़ें एक ही ...मसालेदानी को ही पंजाबी में हम लोग लूनकी कहते रहे हैं...अब भी होती होंगी जहां होती होंगी, लेेकिन मुझे कहीं नहीं दिखीं..यहां तक की गांव से भी जो खाने-पकाने के व्हीडियो अपलोड किए जाते हैं उन में भी लूनकी के दीदार नहीं हो पाते ....

गूगल पर मिली आज की मसालेदानी .....

शायद लूनकी फैशन से बाहर हो चुकी है ...अभी यहां फोटो लगाने के लिए गूगल इमेज सर्च भी किया...लेकिन वह बाबा आदम के ज़माने की लकड़ी की लूनकी नहीं दिखी...चलिए, कोई बात नहीं, आज मैं इस के बारे में लिख कर इसे भविष्य के लिए संजो के रख रहा हूं ...यही काफी है...क्योंकि यह लूनकी-वूनकी इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी तो गई अब ...बस इस का नाम याद जिन को रहा, वही बचे हैं...इसलिए यह सब लिख कर रखना ज़रूरी है....

कल रात मैं हिंदी की एक मशहूर लेखिका ममता कालिया की एक इंटरव्यू देख रहा था ...वह बहुत अच्छे संस्मरण भी लिखती हैं...एक बात के जवाब में उन्होंने कहा ...जीवन को याद करने के बहुत से मौके आते हैं....उस पुराने समय को बताने वाला और कोई नहीं रहेगा...संस्मरण इसलिए एक बहुत ही मूल्यवान विधा है ...क्योंकि जो आपने जिया जीवन वो कोई और नहीं जी पाएगा....और उस जीवन को जैसा हमने देखा अपनी निगाहों से उस जीवन को कोई और नहीं देख पाएगा...

चलिए, इसी बात पर मैं भी अपने संस्मरण को आगे बढ़ाता हूं....ममता कालिया से भी हल्ला-शेरी मिल गई है कि संस्मरण लिखना कितना ज़रूरी है ... हा हा हा हा हा ....😁

जब मैं छोटा बच्चा था...बडी़ शरारत करता था ..(किसी विज्ञापन की टैग-लाइन थी न ...याद है..) ...मुझे भी याद है जब मैं छोटा था और किसी खोखे से टॉफी या मीठी गोली लेना जाता तो अकसर वहां पर किसी मज़दूर या उस के परिवार के किसी सदस्य को खाने का सामान रोज़ का रोज़ खरीदते देखता...उस खोखे पर सब कुछ बिकता था ...आलू-प्याज़,टमाटर ...इस के साथ वह थोड़े चावल, आटा भी लेते...और साथ में 25-50 पैसे की लाल मिर्ची, हल्दी, एक रुपए का सरसों का तेल (जिस के लिए वह एक छोटी सी कांच की बोतल लेकर आते थे ...)...नमक तो ये अपने घर हमेशा रखते ही होंगे ....रोज़ का रोज़ कमाना खाना क्या होता है, यह देख कर मैंने जाना ....और बाद में बच्चे के लिए मीठी गोली या कोई चूरन भी लेना....

खैर, वह खोखे वाला टूंडा (इसी नाम से वह जाना जाता था ...)...दिव्यांग कहने का कोई कंसेप्ट नहीं था...अगर मैंने लिखते हुए बेइमानी कर दी और पालिटिकली करैक्ट लिखने के चक्कर में सच्चाई जस की तस न लिखी तो फिर मैं लिख ही क्यों रहा हूं...इसलिए यहां भी लिख रहा हूं कि उस दुकानदार की एक बाजू नहीं थी, इस लिए उस की दुकान को टूंडे की दुकान कहते थे ...वह इतना सीधा नहीं था....इस तरह का परचून का सामान लेने वालों को भी वह नहीं बख्शता था ....कम सामान देना, पैसे पूरे लेना....उस का यही काम था...अब इतनी कम मात्रा में सामान लेने वाले के पास पॉवर ही क्या होती होगी ...उस ज़माने में....

खैर, अपने घरों में ...अपनी दादी, नानी, मां और अपने आस-पडो़स में भी देखा करते थे कि बहुत कम मसालों का चलन था....मैंने ऊपर जिस मसालेदानी के बारे में लिखा है...पंजाबी में हम उसे हमेशा लूनकी ही कहते रहे ...हम क्या, सारे पंजाबी उसे लूनकी ही कहते रहे हैं.... (अब उसे मसाला बॉक्स कहते हैं, जिन रसोईयों में वह दिखती है..लेकिन अपने बिल्कुल आधुनिक और महंगे रूप-स्वरूप में....) मैं दादी, नानी, मां के जिस ज़माने की बाबा आदम के ज़माने की लूनकी की बात कर रहा हूं ...वह एक बिल्कुल खस्ता हालत सस्ती सी लकड़ी की (शायद आम की लकड़ी) बनी होती थी ...जिस में छः से लेकर आठ खाने (कंपार्टमैंट)  होते थे ....जिन का साईज़ (एक खाने का) स्टील की एक छोटी कटोरी जितना होता होगा...और उस खानों के ऊपर एक स्लाईडिंग ढक्कन होता था ...जो घिस घिस कर अच्छी तरह से खोचला (लूज़) हो चुका होता था, खुद लूनकी की हालत भी खस्ता ही हुआ करती थी...क्या करती बेचारी, बरसों बरसों तक लाल मिर्ची, नमक, हल्दी को हर वक्त झेलना....शरीर उस लूनकी का छलनी न हो तो क्या हो.... !!

वह दौर था जहां भी जाएं....किसी के भी घर ...चूल्हे-चौके में एक लूनकी ज़रूर दिख जाती थी ...लूनकी के उन खानों में नमक, मिर्ची, हल्दी, गर्म मसाला, मोटी इलायची, तेजपत्तर (कहते तो यही हैं, क्या लिखते इसे ऐसे ही हैं, मुझे पक्का पता नहीं..), दालचीनी, लौंग ....बस यही कुछ ....लौंग, दालचीनी भी मैं लिखने के लिए लिख गया ...लेकिन होती उस मसालेदानी में बिल्कुल बेसिक से तीन-चार चीज़ें ही थीं....और जब उन में से कोई चीज़ खत्म हो जाती थी तो उसे बाज़ार से एक कागज़ के लिफाफे में ले आकर उस खाने में भर दिया जाता था ....

और इस पोस्ट का जो मेन हाईलाइट यह है कि जिस फुर्ती से बिना देखे चुटकियों से दादी, नानी, मां का उस लूनकी से अलग अलग खानों से वही दो चार नून-मसाले चुटकियों में भर कर उठाना और पूरी फुर्ती से कड़ाही या पतीले (भगोने) में डालना .....बिना किसी मापतोल के ....न कोई चम्मच या न कोई वज़न करने का कोई और साधन....बस, चुटकी ही से सब काम चुटकी में हो जाता था ...और इतने कम नमक-मसाले से तैयार दाल-सब्जी का ज़ायका ऐसा कि हम में कौन है जिसने उन दिनों कटोरी को या खाने के बाद कभी न कभी उंगलीयां न चाटी हो ....अगर ऐसा नहीं है तो इस का मतलब है कि आप झूठ बोल रहे हैं (बिना कारण) ...और वे सभी ज़ायके हम लोगों को आज भी याद हैं....याद हैं सिर्फ़? - हमारे दिलोदिमाग में बसे हुए हैं....। 

जितना मैं कुकिंग को समझा हूं या जितना कर के सीखा हूं वह यही है कि जितने कम मसाले किसी व्यंजन में इस्तेमाल किए होते हैं उतना ही उस का ज़ायका बरकरार रहता है ....वरना किसी महंगे रेस्टरां या ढाबे की तरह हर चीज़ में मक्खन, घी और मिर्ची का ही स्वाद आता है ....दाल-सब्जी का अपना ओरिजिनल फ्लेवर तो खत्म ही कर दिया जाता है ....आप का क्या ख्याल है? - यही होगा, और क्या। 

मैं अकसर कहता हूं कि बाज़ारवाद के चलते जैसे आज के मानस ने अपने बॉथ-रूम में गंद डाल कर रखा हुआ है ...जब से ये गुसलखाने से वॉश-रुम हो गए.....बीसियों तरह की बोतलें, शैंपू, तेल, स्क्रब....पता नहीं क्या क्या, पहले तो काम दो तरह के साबुन -देसी और अंग्रेज़ी, एक सरसों के तेल की कुप्पी और झावें (स्क्रब) से चल जाता था, उसी काम के लिए अब बीसीयों नहीं शायद तीसीयों किस्म के प्रोडक्ट्स सजे होते हैं घरों के वॉशरुम में ..जितने पहले शायद किसी दुकान में भी न होते थे ....। विचार करने वाली बात यह है कि क्या इतनी तरह के प्राडक्ट्स इस्तेमाल करने से आज लोग ज़्यादा सुंदर हो गए हैं........जवाब आप जानते हैं...। 

ठीक उसी तरह ही बीसियों मसाले, गैजेट्स, इंडक्शन इस्तेमाल करने के बाद क्या खाना ज़्यादा लज़ीज़ बनने लगा है, इस का जवाब भी आप जानते हैं....(अगर घर में पक रहा है तो !!) ....

और एक विचार यह भी है कि खाना पकाना, परोसना, और चूल्हे चौके की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ़ घर की महिला की नहीं होती....यह सब की साझा जिम्मेदारी है...और घर में लड़का है या आदमी....हर इंसान को अपना पेट भरना आना चाहिए....यह वक्त की मांग है ...अगर दकियानूसी खाई से बाहर निकलना ही नहीं चाहते तो आने वाले वक्त में समाज की दिक्क्तें बढ़ने लगी हैं......वैसे तो अब इस से ज़्यादा क्या ही बढेंगी..........इसलिए अपने घर में बेटियों के साथ साथ बेटों को भी अपना पेट भरने की स्किल्स सिखाईए..........अब वह पहले वाला ज़माना लद गया है.....

और अगर घर में पुरुष लोग कुछ खाना-पकाना शुरु करें तो वह मसालेदानी काफी मददगार साबित हो सकती है....हां, वह बात अलग है अब वह दो चार पांच दस रुपए की बजाए सैंकडों में डिज़ाईनर अवतार में बिकती है ऑनलाइन ...लेेकिन सब कुछ एक ही जगह मिलने की सहूलियत भी तो है कि नहीं?

हमारे रसोई घर में इस्तेमाल होने वाली लूनकी ...हर बॉक्स ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही खुले, इस लिए पीछे एक रोक (स्टॉपर) लगी  हुई हैं

सारा फ्रेम और बॉडी लकड़ी की है ..लेकिन सभी बॉक्स सिरेमिक के हैं...एक खाली बॉक्स की फोटो ऊपर.  लगाई है...

हमारी रसोई में पड़ी लूनकी ...नहीं भई इसे लूनकी नहीं कह सकता ...इसे तो मसाला बॉक्स ही कहूंगा... 

लूनकी का पता नहीं कहां से खयाल आ रहा था कुछ दिनों से ...जब से थोड़ा थोडा़ कुकिंग सीख रहा हूं ....और आज उस पर एक पोस्ट ही लिखी गई...चलिए, इसी बहाने मां, नानी, दादी की रसोई को भी याद कर लिया.... 

मुझे नहीं पता कि पंजाबी मे मसालेदानी को लूनकी क्यों कहते हैं....क्योंकि पंजाबी में नमक को लून कहते हैं...इस तरह से लूनकी तो हुई नमकदानी ......लेकिन हम मसालेदानी को लूनकी कहते हैं.....चलो, यार, छोड़ो, मिट्टी पाओ...बात बिल्कुल पक्की है कि लूनकी हम लोग मसालेदानी को ही कहते आए हैं...अब तो आप में से बहुत से लोगों ने भी यह लफ़ज़ अरसे बाद सुना होगा ...

हां, डाइनिंग टेबल पर सजी हुई नमक की डिब्बी को पंजाबी में भी नमकदानी ही कहते हैं .....लेकिन अकसर यही मशविरा दिया जाता है कि नमक कम खाना चाहिए ..हर चीज़ में नमक डाल कर खाना और दाल और सब्जी में ऊपर से नमक डाल कर तेज़ नमक खाना एक नुकसानदायक आदत है.....इसीलिए डाईनिंग टेबल पर नमकदानी न रखने को कहा जाता है ....सामने रहती है तो हर कोई पकड़ कर नमक छिड़कने लगता है......दाल,सब्जी,सलाद, दही,फल,छाछ ...इतना नमक इस्तेमाल होगा तो बीपी की दवाईयां क्या कर लेंगी.....इसीलिए डाक्टर लोग नमक कम खाने की सलाह देते हैं....

 स्टील की मसालेदानी भी दिखी नेट पर ...

अच्छा एक बात और ...जब मैंने इस पोस्ट में डालने के लिए किसी पुरानी लूनकी की फोटो गूगल से उठानी चाहिए तो वैसी पुरानी लूनकी जैसी कोई फोटो तो न दिखी....लेकिन काफी स्क्रॉल करने पर एक स्टील की मसालेदानी  मिल गई ...जो एक गोलाकार स्टील का बड़ा डिब्बा होता था ...जिस में आठ-दस मसाले की छोटी छोटी स्टील की डिब्बीयां रखी होती थीं...और उस स्टील के डिब्बे का ऊपरी ढक्कन कईं बार पारदर्शी यानि कांच का होता था ...मुझे देखते ही याद आ गया कि हां, यह भी तो किसी ज़माने में उस लकड़ी की लूनकी के बाद मां इसे इस्तेमाल किया करती थी ...लेेकिन उस का ऊपर का ढक्कन पूरा स्टील का ही हुआ करता था ... 

रोटी-दाल, रसोई, लूनकी के बारे बारे में इतनी यादें दर्ज करते करते करते ऐसा कैसे हो सकता है कि आज से 51 साल पुरानी फिल्म रोटी फिल्म और उस के बेहतरीन गाने न याद आएं....एक तो यही रहा .....यार हमारी बात सुनो....ऐसा इक इंसान चुनो....ज़िंदगी की हक़ीकत के कितना पास, आनंद बक्शी की कलम का जादू इतनी बड़ा फलसफा इतनी सरल सुगम भाषा में पिरो दिया ....किसी दूसरे पर उंगली उठाने से पहले हर किसी को आत्मवलोकन करने पर मजबूत करता हुआ एक सुपर-डुपर गीत ....यह रहा इस का लिंक ...


यह बीबा भी बड़ी नेक सलाह दे रही है कि जितनी मर्ज़ी ठग्गी-ठोरी कर ले बंदा, सोने की दीवारें बना ले चाहे, लेकिन खानी तो उसे दो ही रोटीयां हैं.....
Leaving this food for thought for this Sunday....

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

सपने में देखा इक सपना....!!

बड़े बुज़ुर्गों एक सीख दिया करते थे ...सीख क्या दिया करते थे, वे इस बात पर अमल किया करते थे कि रात में हल्का खाना चाहिए....और कईं लोग तो सूर्यास्त होने से पहले ही जो भी खाना हो खा लेते हैं, उस के बाद नहीं....हम ने देखा है जब भी इस बात क नज़रअंदाज़ किया ...घर में, किसी पार्टी या किसी रेस्टरां में रात के वक्त कुछ भारी खा लेते हैं तो फिर रहिए करवटें बदलते...उठिए फिर देर रात ईनो पीने के लिए....

अब रात में अगर मक्की की रोटी के साथ राजमाह छक लिए जाएंगे तो बड़ी उम्र में कैसे पचा पाएंगे....(बाल काले करने से जवां नहीं हो जाते, उम्र तो अपने रंग दिखलाती ही है...) ...कल यही हुआ...यह सब खा लिया, उस के बाद नींद ही उड़ गई...यह बहुत कम होता है मेरे साथ...एलसीडी पर यू-ट्यूब पर पाकिस्तानी पंजाबी के कॉमेटी सीरियल  भी देख लिए....बाद में किसी लाइव शो पर गाने भी सुन लिए...और कुछ इस तरह के व्हीडियो भी देख लिए जिन में कुछ नौजवान लड़के 100 किलो दूध से देशी घी, मावा, पनीर, और रसगुल्ले बना रहे थे...इस तरह के व्हीडियो कईं बार ऑटोसुजेशन से ही दिख जाते हैं....बस, देखने लगा तो उन में ऐसा रम गया कि दो व्हीडियो देख कर ही दम लिया...बाद में लिखता हूं कि उन में क्या देखा...नीचे लिंक भी लगा दूंगा......

उस के बाद भी नींद के आने का नामोनिशान नहीं, कल अखबार नहीं पढ़ी थी, वह पढ़ने लग गया ....अखबार खत्म हो गई और पौन तीन बज गए....सोचा कि अगर अब भी जबरदस्ती नींद को काबू न किया तो कल छुट्टी ही करनी पडे़गी...खैर, जैसे तैसे आंख लगी लेकिन एक घंटे बाद उठना पड़ा...क्योंकि सपना ही ऐसा था ....

सपने की सेटिंग थी ...1974 की...हम सब लोग अपने घर के बरामदे में बैठे हुए हैं...असार्टेड फर्नीचर पर ...मैं चारपाई पर, पिता जी डाईनिंग टेबल की चेयर पर, और घर के दूसरे सदस्य भी कोई दीवान पर, कोई स्टूल पर.....मैं अपनी किताब के पन्ने उलट-पलट रहा हूं क्योंकि अगले दिन मेरा इम्तिहान है ....मैं बहुत परेशान हूं ...साईंस की किताब खोल रखी है ..कुछ भी मेरे पल्ले नहीं पड़ रहा ...और साथ में यह खयाल भी आ रहा है कि मेरा तो हाल गणित में भी ऐसा ही है ....

मैं हाथ में पकड़ी उस किताब के पन्ने उलटते पलटते इतना परेशान हूं कि मुझे लगा कि आत्म-समर्पण ही करने में भलाई है ...

"पता नहीं इस बार पढ़ाई हुई नहींं, न तो साईंस में कुछ समझ आया है और न ही गणित में ....डर लग रहा है, इम्तिहान में क्या होगा."..मैने उस बरामदे में बैठे सभी लोगों की तरफ़ देखते हुए यह डिक्लेयर कर दिया...

अकसर इस तरह का ब्यान मैं किसी भी पेपर से पहले दिया करता था कि पेपर है, डर लग रहा है तो मेरे माता-पिता का हमेशा यही जवाब होता था कि इस में डरने की क्या बात है, जो आता होगा, लिख आना....बेडर हो कर जाओ...लो ये दही चीनी खा के जाओ....सब ठीक होगा....बस, बाकी काम दही चीनी ही कर देती होगी...कुछ बरसों बाद जब मैंने यह कहना नहीं छोडा़ तो मेरे पिता जी ने यह कहना शुरु कर दिया कि यार, तुम हमेशा कहते यही है और नंबर तुम इतने बढ़िया ले कर आते हो .... 

खैर, कल रात के सपने पर वापिस लौटता हूं...मैंने जब यह डिक्लेयर किया कि डर लग रहा है ...पता नहीं क्या होगा..कुछ नहीं आता-जाता, कुछ पढ़ाई हुई ही नहीं इस बार...तो मैं भी अपने माता-पिता के फ़िक्रमंद चेहरे देख कर परेशान सा हो गया....इतना परेशान कि नींद ही खुल गई...

ज़ाहिर है सपना भी टुूट गया ...शुक्र है ....वरना पता नहीं आगे क्या हो जाता ....

नहीं, नहीं, ऐसा वैसा कुछ नहीं, पिटाई विटाई का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, हमें हमारे पेरेन्ट्स ने ज़िंदगी में कभी पिटाई करना तो दूर, कभी सख्ती से कुछ कहा भी नहीं.....यही मधुर यादें होती हैं, दोस्तो....मैं अकसर सोचता हूं कि जैसे किसी के साथ घर में, दुनिया में  बर्ताव हुआ होता है, वह बाद में वही वापिस लौटाता है ....खैर, यह तो फलसफे की बात हो गई....

सपना टूट गया...नींद लगी थी मुश्किल से पौने तीन बजे और पौने चार बजे ...सपने के टूटने से जाग गया....फिर से सोना ही था, और  उठ गया पौने छः बजे....सात आठ घंटे की नींद की जगह तीन घंटे की नींद लेने से जितना तरोताज़ा कोई महसूस कर सकता है, उतना ही मैं भी कर रहा हूं .... 

मैट्रिक में इतने अच्छे स्कोर से मनोबल इतना बढ़ गया कि .....चक ते फट्टे
....48 साल पहले का ज़माना था यह ...😂

सपने भी क्या चीज़ हैं....ऐसे लगता है जैसे सब कुछ असल में ही चल रहा है ....बाद में बहुत से सपने याद भी नहीं रहते ...मुझे एक सपना अकसर अभी भी यही आता है कि मेरी दसवीं की परीक्षा चल रही है और मेरे से कोई भी सवाल हल ही नहीं हो रहा ..(जब कि मैं सभी सवाल ठीक कर के आया था ..लेकिन खौफ़ ही इतना था दसवीं की परीक्षा का....)....अभी प्रूफ के तौर पर अपनी मैट्रिक की मार्क-शीट भी दिखाऊंगा आप को ...मेरिट होल्डर था, नेशनल मैरिट स्कालरशिप भी ....आज से पचास साल पहले इतने नंबर कम ही देखने को मिलते थे .....

खैर, एक सपना और अकसर आता है कि किसी रेलवे स्टेशन पर गाड़ी रुकी है ....और मैं पानी पीने के लिए नीचे उतरता हूं और ट्रेन चल पड़ती है ....बस, तभी अचानक मेरी नींद खुल जाती है और मेरी जान में जान आती है ... बचपन में ऐसी एक घटना हुई थी लुधियाना स्टेशन पर ....ठीक है, मैं भाग के जैसे तैसे किसी डिब्बे में चढ़ तो गया लेकिन वही नाईट-मेयर के रूप में मन के किसी कोने में अभी भी छिपा बैठा है ....

वैसे तो जो मुझे कल रात में सपना आया ...वैसी बात मेरी असल ज़िंदगी में भी हुई थी....

सन 1974 ..छठी कक्षा में पढ़ता था उन दिनों...एक दिन मैंने घर आकर रोते रोते अपने पिता जी को बताया कि मुझे हिसाब की कक्षा में कुछ भी समझ में नहीं आता....उन्होंने दिलासा दिया कि कोई बात नहीं, सब ठीक होगा। मैंने उन को यह भी बताया कि मास्टर जी स्कूल के बाद हिसाब की ट्यूशन भी लेते हैं....अगले दिन स्कूल जाते वक्त पिता जी ने मेरे मास्टर जी के लिए एक चिट्ठी लिख कर दी ....और मैं उसे मास्साब को दे दिया। उस दिन छुट्टी के बाद मास्टर जी ने मुझे भी ट्यूशन के लिए रुकने के लिए कहा ....बस, फिर क्या था, मैं कुछ ही दिनों में गणित में चल पड़ा....

बस, चल पड़ा? नहीं, भई, मैं तो लगा भागने ...फिर कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा....

उस से जुड़ी एक बात और याद आई..हर महीने मेरे पिता जी टुयूशन के पैसे एक सफेद एन्वेल्प में डाल कर मुझे देते थे ...मास्टर जी को देने के लिए....वह मेरे लिए पहला सबक था कि किसी को पैसे देने का क्या तरीका होता है, क्या सलीका होता है .....। सारी क्लास में मैं ही फीस इस तरह से देता था, मास्साब उसे लेकर अपने ब्रॉउन कोट की जेब में रख लेते थे ....बिना गिने....

खैर, सपनों की बातें चल रही है....मैं अकसर सपने देखता हूं और अगर मुझे सुबह तक याद रह जाते हैं तो मैं उन के ऊपर एक पोस्ट तो ठेल ही देता हूं ..जैसा कि इस वक्त कर रहा हूं....लेकिन ज़्यादातर सपने सुबह तक याद नहीं रहते ...या धुंधले से याद रह जाते हैं....जैसे सपने में अपनी दिवंगत माता जी के साथ बाज़ार में, अनजान जगहों पर खूब घूमता हूं ..सुबह याद नहीं रहता कुछ याद ...सिवाए इस के कि कल हम दोनों खूब घूमे....

बस, अपनी बड़ी बहन को इतना ज़रूर बता देता हूं कि कल बीजी सपने में आए और मैं उन के साथ खूब रहा ...इतना सुनने पर वह बीजी से गिला करने लगती हैं कि देखो, प्रवीण, बीजी को गए आठ बरस हो गए....लेकिन मेरे सपने में एक बार भी नहीं आए....

खैर, सपने भी अजीब होते हैं...मेरी मां को अपनी मां के बहुत सपने आते थे ...और एक बात भी लिखूं कि जब बड़ी उम्र में बड़े-बुज़ुर्गों को दिवंगत लोगों के सपने बार बार आने लगें तो वे थोड़ा डर सा जाते हैं और अकसर कहने लगते हैं कि वे तो जैसे उन को बुला रहे हैं.....यह सच्चाई है ....

सच्चाई ेेसे मतलब? - मतलब भई इतना ही कि यह एक धारणा है, सच्चाई है या नहीं, यह मैं नहीं जानता....ये मनोवैज्ञानिकों का काम है, मेरा नहीं...हां, इतना मैंने ज़रूर देखा है आसपास जब किसी बुज़ुर्ग को बार बार उस का साथी सपने में आने लगे तो वह थोडा़ सा ही सही, डर तो जाते ही हैं....हां, वह न भी डरें, घर के दूसरे लोग तो डर ही  जाते हैं कि कहीं लाडली मां भी पिता जी के पास जाने के लिए न चल पड़े....

हर उम्र के सपने अलग होते हैं....

मुझे कलाम साहब की वह बात अकसर याद आती है कि सपने वे नहीं जो आप सोते हुए देखते हैं, सपने वे होते हैं जो आप जागते हुए देखते हैं और जिन को पूरा करने के लिए आप की नींद उड़ जाती है....

हर उम्र के सपने ...

जवानी के सपने अलग, बुढापे के अलग ....इस में किसी को शक नहीं होना चाहिए, जवानी में किस तरह के सपने आते हैं, हर कोई जानता है ...बताना नहीं चाहते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन जानते सब हैं, सभी देखते हैं....

हां, कईं सपने बार बार आते हैं...मां अकसर एक सपना बताया करती थीं....कि वह अकेली कहीं पर जा रही हैं,जाते जाते आगे बहुत बडे़ पहाड़ हैं, खाईयां है, कोहरा है, वह रास्ता भूल गई हैं। वह डर के उठ जाती थीं....और एक मज़ेदार बात ...जब दूर नज़दीक के रिश्तेदार जिन को गए ज़माना गुज़र चुका था, वे भी मां के सपनों में बार बार आते ....तो मैं परेशान  तो हो जाती होगी....लेेकिन मज़ाकिया उस की इतनी तबीयत कि हमें सपने सुनाती वक्त यह अकसर कहती .....हुन ओ मरे-खपे खेहड़ा ही नहीं छड़दे....पिच्छे ही पए होए ने। (अब वे मर-खप चुके लोग पीछा ही नहीं छोड़ रहे, पीछे ही पड़ गए हैं....) ...कहीं न कहीं यह सुन कर हम भी परेशान हो जाया करते ....क्योंकि सुन तो हमने भी रखा था कि इस तरह के बार बार दिवंगत लोगों को सपने में आना अच्छा नहीं होता..........कितनी विडंबना है!!

हां, मैं उस विडियो की बात बता रहा था जो 100 किलो शुद्ध घी से देशी घी निकाल रहे हैं, अगर देखना चाहें तो इस लिंक कर क्लिक करिए....कुल आठ किलो घी निकला और कह रहें कि फायदे का सौदा है ....इतने लोग लगे रहे घी को निकालने में ...इतनी मेहनत, गैस इस्तेमाल हुई....और इतना बखेड़ा करने के बाद भी इतना ही घी निकला....और कुछ तो हुआ या नहीं, लेकिन मेरा विश्वास यह तो और भी पक्का हो गया कि अगर शुद्धता के लिए इतनी मेहनत लगती है तो पता नहीं जो हम तक पहुंच रहा है, वह क्या होगा....क्या नहीं....

अगर आप सपनों के सौदागर से मिलना चाहेंगे तो इस लिंक पर क्लिक करिए....सपनों का सौदागर आया ...वैसे तो मैं नीचे एम्बेड भी कर रहा हूं लेकिन कईं बार एम्बेडिंग अपने आप डिसेबल हो जाती है...गीत गायब हो जाता है ...

सोमवार, 24 नवंबर 2025

जब कोई स्कूल का साथी मिलता है ...पचास बरस बाद ..

50 बरस तो नहीं ...दो तीन बरस कम ही हैं...1978 में दसवीं की पढ़ाई के बाद हमारे रास्ते अलग हो गए....राकेश अपने रास्ते पर चल निकला और मैं अपने.... हायर सैकंडरी करने के बाद भारतीय नेव्ही में इंजीनियरिंग डिग्री के उस का सलेक्शन हो गया ...और नेव्ही में सर्विस के दौरान वह अलग अलग जगहों पर तैनात रहा। नेव्ही की सर्विस के बाद उसने मर्चेंट नेव्ही ज्वाईन कर ली.....

हां, तो मैं यह सोच रहा हूं कि अभी ब्लॉग पोस्ट को मैंने लिखना शुरू तो कर दिया है लेकिन इस टॉपिक पर लिखने के लिए कुछ ख़ास है ही नहीं....चलिए, देखते हैं...राकेश को मिलने के बाद पांच छः घंटे का वक्त ऐसे उड़ गया जैसे दस मिनट बीत जाते हैं...

वैसे तो दस बीस बिताने भी किसी अनजान इंसान के साथ बिताने बहुत कठिन हो जाते हैं....क्या बात करनी है, कितनी करनी है, किस बात का जवाब देना है, किस के जवाब में चुप रहना है ....बस, यही सोच विचार करने में ही वक्त बीत जाता है ..और इतने सोचने से भी कुछ हासिल होता नहीं ....हां, सिर ज़रूर भारी हो जाता है ....अपने काम से जुड़ी किसी मीटिंग में भी तो यही सब कुछ होता है ....

अचानक हमें खयाल आया कि हमनें कोई सेल्फी तो ली नहीं....लेखक (बाएं) के साथ राकेश (दाएं) 

लेकिन इस तरह से स्कूल के साथी को जब 50 बरस बाद मिलते हैं तो बस फिर से उसे देखने की जो खुशी होती है, उसे कैसे अल्फ़ाज़ में ढाले कोई......कोई टॉपिक नहीं , कोई मु्द्दा नहीं, कोई राजनीति की चर्चा नहीं, कोई धर्म-कर्म  की नहीं, कोई मौसम की बात नहीं ...फिर भी पांच छः घंटे कैसे बीत गए पता ही नहीं चलता ...और हां, किसी की भी कोई बुराई नहीं की ....बस, एक दो मास्टर जो बड़े खूंख्वार किस्म के थे, उन की याद की ...और खूब हंसे। 

इन पांच छः घंटों में हम लोग इतना हंसे कि मज़ा आ गया...हर बात पर हंसी, बात शुरू करने से पहले हंसी, बात के दौरान हंसी और बात पूरी होने के बाद ठहाके.... हा हा हा हा ....यह सब इतने पुराने संगी-साथियों के साथ ही मुमकिन होता है ....इतने वक्त मिलने के बाद मुझे एक दो बार खयाल नहीं रहा और मैंने उसे तुसीं (आप) कह दिया....और फिर मैंने तुरंत स्पष्ट भी किया कि मैं तुम्हें तू की बजाए तुसीं कह गया....गलती हो गई....और हम लोग ठहाके लगाने लगे ....

 न हमने किसी की कोई बुराई की ...क्योंकि स्कूल के दिनों में कोई बुरा लगता ही नहीं...और होता भी नहीं, न हमने किसी नेता-अभिनेता की बात की. न ही धर्म, जात-बिरादरी की कोई बात और न ही किसी दंगे-फसाद की बात ....सोचने वाली बात यह है अगर इन सब पर बात नहीं की तो आखिर फिर किस बात पर चर्चा की .....

चर्चा तो हुई पर कोई टॉपिक न था....

न उसके पास ...न मेरे पास......

बस बात से बात निकलती गई ...और कब उस के जाने का वक्त आ गया पता ही नहीं चला...और हां, हमारी सारी बातें अमृतसर शहर की थीं, सारी की सारी गुफ्तगू जैसे दो चार किलोमीटर के दायरे में सिमट गई हों.....उस दो चार किलोमीटर के दायरे में आने वाले बाज़ार, कूचे, स्कूल, पोलिस-स्टेशन, कुएं, सब्जी वाले, मटन वाले.....और हां, बढ़िया ढाबे (फुलके के साथ दाल फ्री वाले भी 😂) ...डाकखाने, रेलवे के फाटक, कुएं.....इन सब के ऊपर चर्चा हुई ....न कोई बात कहने और पुछने में कोई झिझक और जवाब देने में भी तो कोई झिझक का मतलब ही नहीं....

हम लोग उस वक्त बुहत हंसे जब मैंने उसे बताया कि अपने प्राईमरी स्कूल में कक्षा चार तक कैसे मैं पैदल स्कूल जाते वक्त रास्ते में पड़ने वाले पानी से भरे हुए एक भयंकर से कुएं में झांकना नहीं भूलता था ...और यह कितनी बेवकूफ़ी वाला काम था....और मैं यह काम रोज़ करता था ....यह कुआं उस के घर के पास ही था, उसने उस इलाके में दो दूसरे कुओं के बारे में भी मुझे याद दिलाने की कोशिश तो की ...लेकिन मैंने शायद उन में कभी झांका नहीं था, मुझे याद नहीं आए...

कुएं याद नहीं आए तो क्या, और सब कुछ ठहाकों के बीच इतना अच्छे से याद आ गया....हमारा वह मास्टर जो चाचा नेहरू का कोई फैन रहा होगा ...वैसे ही अचकन, पायजामी और टोपी और शेरवानी पर गुलाब का फूल भी वैसे ही ....लेकिन था वह मास्टर बड़ा सख्त  ...कविताएं भी लिखता था, लेकिन बात बात पर गर्म हो जाता था ...एक बार छठी कक्षा की वार्षिक परीक्षा में उस की परीक्षा-केंद्र पर ड्यूटी थी....मुझे नकल मारने की न कोई मजबूरी थी और न ही इतनी हिम्मत .....

तो फिर हुआ क्या, क्यों पड़ा था एक ज़ोरदार तमाचा....

मेरे आगे पीछे की सुीटों पर कुछ पर्चियों का लेन देन चल रहा था और एक पर्ची मेरे बेंच के पास गिर गई ...बस, कमरे में टहलते हुए जैसे ही उन्होंने देखा, मुझे खड़े कर के मुझे ज़ोर से तमाचा जड़ दिया और मेरी उत्तर-पुस्तिका मुझ से छीन कर मुझे बाहर कर दिया, उस वक्त मेरा पेपर लगभग पूरा हो चुका था....लेकिन फिर भी डर था कि यार, कहीं फेल ही न कर दें....बैठे बिठाए पंगा हो जाएगा...

मैं बड़ा परेशान...शाम तक मुझे बुखार हो गया....पिता जी को सारी बात बताई ....अमृतसर शहर के जिस इलाके में उन का घर था, वह हमारे घर से थोडी़ दूर ही था....मेरे पिता जी मुझे साईकिल पर बिठा कर उन के घर ले गए....लेकिन मैं उन के घर पहुंच कर अपने पिता जी की हलीमी (विनम्रता) देख कर दंग रह गया....उन्होंने उन को एकदम आहिस्ता से इतना ही कहा कि मास्टर जी, इसे तो पूरा पेपर आता है, आप चाहें तो फिर से लिखवा कर देख लें, वह पर्ची तो किसी दूसरे की फैंकी हुई थी...मास्टर जी का भी जितना नर्म रवैया मैंने उस दिन देखा, पहले कभी दिखने का सवाल ही न था, कहां दिखता, स्कूल में!!😀.... पिता जी ने उसे कहा कि आपने इस का पेपर ले लिया है, यह उस से डरा सहमा हुआ है ....उसने मेरे पिता जी को आश्वासन दिया कि फ़िक्र न करें, ऐसी कोई बात नहीं है....आप इत्मीनान रखें...। और हम लोग घर लौट आए...।  

हम दोनों ने क्लास के लड़कों के नाम याद किए....कुछ के नाम तो बीसियों बरसों बाद याद आए....जो पिछले बैंचों पर बैठते थे ...लेकिन एक बात और हमने ज़रूर याद की...हमें किसी के भी दूसरे नाम से कोई सरोकार नहीं होता था...हमारे लिए पहला नाम ही काम का हुआ करता था....आप देखिए मैंने इस पोस्ट में कहीं भी राकेश का दूसरा नाम (क्या कहते हैं सरनेम) नहीं लिखा ....उसी रिवायत को निभाते हुए तो है ही .........लेकिन कहीं न कहीं मेरे मन में यह भी है कि पूरा नाम लिखने से लोग गूगल करने लगते हैं ....ढूंढ़ने लगते हैं किसी बंदे को ....वह मैं बिल्कुल नहीं चाहता किसी की भी प्राईव्हेसी पर कोई आंच आए....

और हां, राकेश 70 देशों में घूम चुका है....मैंने कहा कि लिखा कर अपनी यात्राओं के बारे में ...तो हंसने लगा ....नहीं लिखेगा वह कभी, पता होता है हमें अपने स्कूल के साथियों का ....क्योंकि अब न मास्टरों की मार का डर कि होम-वर्क न किया तो अगले दिन होने वाली कुटाई की चिंता .....अब वह आज़ाद पंछी है ..समंदर में लगातार कईं कईं हफ्ते रहता है ...बिना किसी पोर्ट पर रुके...। 

 उस की शिप की दिनचर्या सुन कर मुझे अच्छा लगा ..एक दम अनुशासन से हर काम करना...और अपने काम के बारे में अभी भी स्टडी करते रहना। 

यह पोस्ट मैंने यहां तक तो आज सुबह लिखी थी ...फिर मेरा काम पर जाने का वक्त हो गया और मैं अभी इस वक्त इस को पूरा करने के लिए बैठा हूं....मेरे आलस की इंतहा देखिए कि मैंने ऊपर जो लिखा है सुबह...मेरे को उसे पढ़ने तक में आलस आ रहा है ...यही लग रहा है ठीक है, जो दिल से निकला, लिख दिया....अब क्या उसे पढ़ना....और क्या लिखा हुआ कुछ बदलना....जो लिखा गया, ठीक है ..

हम लोगों ने इतनी बातें कर डाली उन पांच छः घंटों में कि क्या कूहूं...फिर भी बहुत कुछ अभी रहता है ....उसने हैंडराईटिंग अच्छी करने के लिए उस चाचा नेहरू जैसे दिखने वाले मास्साब की बात बताई कि वह उस की उंगलियों में पैंसिल फंसा देते थे अगर साफ नहीं लिखा होता था ....50-60 पुराने ज़माने की यह एक आम सी बात थी....मानो मास्टरों को लगता होगा कि उंगलियों की बनावट ही बदल डालें तो लिखावट अपने आप सुंदर हो जाएगी....

बात लिखावट की चली तो तखती लिखने की बात होनी ही थी ...किस तरह से कक्षा चार तक हम लोग तखती लिखते थे...मैंने उसे बताया कि मैंने 8-9 साल पहले तख्ती के ऊपर एक व्हीडियो बनाई थी जिसे बहुत देखा जा रहा है और अब तो लोग उस के क्लिप्स लेकर अपनी पोस्ट में डालते हैं....मैंने कहा कि गूगल सर्च में नंबर वन है ..अगर कोई  इंगलिश में भी takhti लिख कर भी गूगल करेगा तो पहला रिज़ल्ट मेरी व्हीडियो का ही आता है ... वह बहुत खुश हुआ और उसने गूगल कर के यह कंफर्म भी किया ....

 

हम दोनों ने अपनी दो तीन किलोमीटर की अपनी हद में रहते हुए किसी हलवाई को बिना याद किए नहीं छोड़ा, किसी बेकरी को नहीं, किसी भुजवा-भुजवाइन को नहीं छोड़ा .... लोहगढ़ के रामू हलवाई का नाम मुझे याद नहीं था, उसने याद दिलाया....बाकी उस के ज़ायके मुझे सभी याद थे ....अमृतसर के रास्तों की, अटारियों की, चौंकों की....खूब बातें याद की ....और एक दूसरे को याद दिलाई....

दो तीन लोगों की बात न लिखी तो कुछ छूट जाएगा....अमृतसर के उस डाकखाने के डाकबाबू तक को हमने याद कर डाला ..वह इसलिए कि वह सरदार जी बहुत ही ज़्यादा भारी शरीर वाले थे (आज यह आम बात है...) लेकिन उन दिनों भारी शरीर वाले लोग बहुत टांवे टांवे ही हुआ करते थे ..इसलिए वह याद रह गया...उस का स्वभाव बहुत अच्छा था ...बाहर डिब्बे से अगर डाक निकल भी गई होती तो हम से चिट्ठी पकड़ कर अंदर स्टाफ को दे देता कि इसे डाल दो थैेले मेें। वैसे भी जब कभी अकेले डाकखाने मेरे जैसे बच्चे जाते तो उन को बडे़ प्यार से फार्म भरना भी सिखला देते .....राकेश को तो अपनी गली के डाकिये का नाम तक पता था और किस तरह से उस के पिता जी उस डाकिये को दूर से बुला कर अपने साथ चाय पिलाया करते थे ...ये सब दर्ज करना भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ जैसा ही है कि कैसे हम लोग दूसरे लोगों से व्यवहार करते थे ....

बात वही है कि राकेश से जितनी भी बातें हुईं हंसी से शुरु हुई ...बीच में भी हंसी और बात खत्म होने पर ज़ोर के ठहाके....मुझे नहीं लगता कि हम लोग एक मिनट के लिए भी कहीं रुके हों...निरंतर बात से बात निकालने का सिलसिला ऐसा चला कि क्या कहूं...😄

मैंने जब उसे याद दिलाया कि राकेश तेरे घर के बाहर जो पुलिस थाना था उस के सिपाही बड़े ज़ालिम किस्म के, जल्लाद किस्म के लगते थे तो उसने भी मेरी बात में हामी भर दी। दरअसल होता यह था कि स्कूल जाते वक्त हमारा उस थाने से निकलना होता था ...और बहुत बार ऐसा होता था कि उन्होंने किसी संदिग्ध बंदे को पकड़ पर उस को अच्छे से फैंटने का इंतजाम किया होता था ...यह लगभग सामने ही होता था....लॉक-अप हमें सड़क से ही दिखता था ...उस की बड़ी बड़ी सलाखें....और किसी एक सिपाही के हाथ में मोटे चमड़े का एक टुकडा़ हुआ करता था जिस से वह पकड़े हुए किसी शख्स की खातिर किया करते थे ....एक बात को मुझे पता नहीं था, राकेश पास ही में रहता था ..उसने बताया कि उस चमड़े के टुकडे़ पर वे लोग अकसर तेल भी लगा कर धूप में रखा करते थे ...ताकि सेवा करने का निशान भी तो पडे़ ......वैसे देखा जाए तो लगता है कि पहले क्या ज़माना था ...सोच रहा हूं कि क्या इस लिहाज से मुजरिमों या संदिग्धों के दिन बदल गए हैं......अगर आप को लगे तो ऐसा कुछ है, इस का मतलब आप कोई अच्छी अखबार नहीं पढ़ते .....

चलिए, एक आखिरी बात कर के इस पोस्ट को बंद करूं....बुहत सी बातें हैं अभी, लेकिन अब मैं थक गया हूं लिखते लिखते ...ठठेरा की  बात चली ...ठठेरा उस को कहते हैं जो बर्तन बनाता है और जो बर्तनों आदि की मुरम्मत किया करता है ...वह ठठेरा भी हम दोनों को अच्छी तरह से याद था...एक छोटी कद काठी वाला सरदार था वह ठठेरा...लेकिन अपने काम में एकदम परफेक्ट....नखरा इतना कि डी.सी भी आ जाए तो उसे भी इंतज़ार करने के कह दे...मैं उस की दुकान पर अपनी मां के साथ कभी कभी जाया करता था...किसलिए?- मेरी उम्र के लोग ही इस बात से रिलेट कर पाएंगे कि पहले घरों में लोहे की बाल्टियां होती थी, लोहे के टब होते थे जिनमें पानी भरा जाता था .....और जब उन का थल्ला (बेस) या नीचे वाला हिस्सा कभी टूट भी जाता था जाते थे और वे लीक करने लगती थीं या उन की वजह से चोट लगने का अंदेशा होता था तो उसे ठठेरा साहब के पास इलाज के लिए ले जाया जाता था जो उस थल्ले को रिपेयर करते थे या बदल दिया करते थे.....एक दम परफेक्ट काम...और हां, लिखते लिखते कितना कुछ याद आ जाता है...पहले सब आटे को भी लोहे की छोेटे से ड्रम या छोटी पेटी में रखते थे, कईं बार उन की भी रिपेयर करवाते लोग दिख जाते थे ....मुझे नहीं याद कभी हमें यह सब करवाने की ज़रूरत पड़ी हो .....एक बात और ....ठठेरा साहब किसी भी घी के बड़े डिब्बे को या किसी दूसरे बडे़ से लोहे के डिब्बे को अंगीठी, तंदूर या पीपे की शक्ल दे दिया करते थे ...(पीपे बनाने के लिए घी के बड़े डिब्बे पर ढक्कन लग जाता था).....यह ठठेरा वाला काम मुझे इतना बढ़िया लगता था ...और उस ठठेरे का निरंतर हाथ में एक लकड़ी की हथौडी लिए रहना ....मुझे यह देख कर इतना मज़ा आता था कि मेरा भी यही काम सीख कर वैसा ही ठठेरा बनने के लिए मन मचल जाता था ...लेकिन यह हसरत भी 😎 मेरे दिल ही में रह गई....

राकेश और मैं ऐसै ही कल थोड़ा टहलने निकल गए ....और मैं रास्ते में एक दो फोटो खींची तो वह हंसने लगा कि अब तुम इन पर ब्लॉग लिखोगे....मैं भी हंसने लगा कि हां, राकेश, अब ये तस्वीरें मेरे अंदर कईं दिनों तक कुलबुलाहट पैदा करेंगी...धीमे आंच पर चढ़ी रहेंगी ...और फिर अगर कुछ पकवान अगर बन पाया तो वह ब्लॉग में परोसा जाएगा....
अभी तो पकवान तो नहीं बना, लेकिन मैं दोनों तस्वीरें शेयर कर रहा हूं ....
 ये टेलीफोन के खाली डिब्बे दिख गए ...कभी इन के इर्द-गिर्द हमारी दुनीया घूमा करती थी ....लेकिन अब इन की हालत यह हो चुकी है ....Change is the law of Nature!!

एक बहुत बडे़ शो-रूम में बहुत भीड़ देख कर अंदर चले गए...खरीदना तो कुछ न था, बस यूं ही ...अंदर जब ये बैल-बाटम देखा तो फिर वही 50-60 पुराने दिनों की याद ताज़ा हो गईं कि कैसे उस दौर में भी शौकीन लोग अपनी बैल-बॉटम पर यह टाकी (पीस) लगवा लेते थे ..आज यह एक फैशन स्टेटमैंट बन कर हमारे सामने है ....


फिर जब हम बाहर आए तो हम एक बात पर बहुत ज़्यादा हंसे - यह याद कर के कि पहले हमें अपने माप के कपड़े पहनने को मिलते ही न थे....जब भी दर्जी के पास लाइन-हाज़िर किया जाता तो बडा़ बहन, बडी बहन,  पेरेन्ट्स उसे यह हिदायत ज़रूर देते कि लूज़ बनाना और इसे आगे खुलवाने के लिए गुंजाईश भी रखना.....इसी चक्कर में इतने अजीब अजीब किस्म के खुले खुले ढीले ढाले कपड़े पहनते रहे कि. .................कि क्या? सब कुछ लिखा नहीं जाता ....फिर हम लोग अमृतसर स्टेशन के बिल्कुल सामने ही एक बाज़ार - जिसे लंडा बाज़ार कहते हैं... उस को याद कर के इतना हंसे कि क्या बताएं....

बस, ऐसे ही वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला...पिछले 60 साल का भी पता नहीं चला ...और कल के छः घंटे भी हंसते-खिलखिलाते कैसे बीत गए ..पता ही नहीं चला...राकेश बिल्कुल सही कह रहा था कि बचपन की ये सारी बातें कल ही की बातें लगती हैं...बातों बातों में बिलासपुर का ज़िक्र जब चला और मैंने उसे बताया कि मैं बिलासपुर भी हो आया हूं ...तो हम दोनों को यह याद था कि हमें नहीं पता था बिलासपुर कहां है, यह कौन सी जगह है ..हम ने तो बचपन से देखा कि शाम के वक्त एक गाडी़ छत्तीसगढ़ एक्सप्रैस चला करती थी जो अमृतसर से बिलासपुर के चलती थी ..और हम उस पर लिखे बोर्ड देख कर हैरान हुआ करते थे कि कहां होगा यह शहर .....हिस्ट्री-ज्योग्राफी में हम लोग एक दम कमज़ोर ही रहे ..और अभी भी कोरे ही हैं....

बातें तो बुहत सी हुईं...लेेकिन जब इस तरह के स्पैशल पुराने यारों-दोस्तों के साथ हों तो कितना लिखना है, क्या लिखना है और मुट्ठी कितनी बंद रखनी है ....यह सब उम्र सिखा देती है ....क्या कहते हैं उम्र का तकाज़ा है....

चलिए बंद करते वक्त बार बार खयाल धर्मेंद्र जी की तरफ़ जा रहा है ....उन को भावभीनी श्रद्धांजलि....बहुत अच्छे इंसान थे ...1984 में एक फिल्म आई थी. ..राजतिलक ....उसमें एक गाना था देवता से मेेरा प्यार पुकारे ....उस की शूटिंग मैंने उसी साल या 1983 में आर के स्टूडियो में देखी थी जहां पर धर्मेंद्र और हेमा मालिनी के दर्शन हुए थे ... धर्मेंद्र इसी तरह ज़ंजीरों में बंधे हुए हैं और हेमा मालिनी नृत्य कर रही है.....काफी समय मैं वहां रुका रहा ....मैं उन दिनों बंबई घूमने गया हुआ था और बडे भाई के साथ वहां गया था ...राज कपूर और मेरे चाचा की गहरी दोस्ती थी ...पड़ोसी भी थे ...इसलिए आर के स्टूडियो में आने जाने में कोई दिक्कत न थी....

चलिए, वह गीत सुनते हैं....मुझे वह दिन आज बार बार याद आ रहा है ....