गुरुवार, 6 अगस्त 2026

“तुम टी सी लगे हो क्या? दिखाओ, अपना वो …आईडी.!!”

 “तुम टी सी लगे हो क्या? दिखाओ, अपना वो …आईडी.!!”

परसों जैसे ही अंधेरी स्टेशन से चर्चगेट फॉस्ट लोकल ट्रेन चली तो एक लगभग २५-३० साल के नवयुवक के मुंह से जब यह डिमांड निकली तो लोकल ट्रेन के फर्स्ट क्लास के उस डिब्बे का माहौल थोड़ा गर्मा गया …


१८-२० साल पुरानी मेरी फोटो जिस के बारे में आप आगे पढ़ेंगे ....

होता है …आज कल कुछ पता चलता नहीं..हम लोग पंगे तो ले लेते हैं ..लेकिन सामने वाले का कुछ पता नहीं….याद होगा कुछ सप्ताह पहले फर्स्ट क्लास डिब्बे के दरवाज़े को बंद करने की ताकीद करने वाले एक २५ साल के जवान लड़के को उस शख्स ने चाकू से गोद दिया…चल बसा बेचारा। महिलाएं भी अब एग्रेसिव होने लगी हैं…कुछ दिन पहले खबर पढ़ी कि सीट के चक्कर में एक महिला ने दूसरी महिलाओं पर पेपर-स्प्रे छोड़ दिया….


हां, तो मैं जिस युवक की बात कर रहा था जो एक शख्स से उस की टी.सी की आई.डी पूछने लगा, वह बात यूं हुई कि जब यह युवक गाड़ी के उस डिब्बे में बांद्रा स्टेशन से सवार हुआ तो ट्रेन खचाखच भरी हुई थी …बहुत से लोग खड़े हुए थे ..। 


मैं जहां पर खड़ा था …वहां पास की एक थ्री-सीटर सीट पर बैठे तीन लोगों की तरफ़ एक हल्का सा इशारा करते हुए उसने उन को थोड़ा थोड़ा सा सरकने के लिए कहा …

सरकना-वरकना तो मुंबईकरों ने क्या होता है, बल्कि उस युवक को ही कह दिया गया ….यह फर्स्ट क्लास है, इसमें एक सीट पर तीन ही बैठते हैं …। (मुझे यह बात किसी को कहना ही बिल्कुल बेवकूफी लगती है…हां, कुछ सिचुएशन हैं जहां मैं अपनी इस जजमैंट का इस्तेमाल करता हूं …उस के बारे में बाद में लिखता हूं …पहले यह बात पूरी कर लूं..)...


यह जो बात कही गई ..कि यह फर्स्ट क्लास है…यह चाहे कही एक बंदे ने ही थी, लेकिन साथ बैठे-खड़े कुछ लोगों का समर्थन था, ऐसा माहौल था…

उसी वक्त वह युवक थोड़ा गुस्से में आ गया …और उस बंदे की से मुख़ातिब होते हुए यही कहने लगा ….क्या तुम टी.सी लगे हो? दिखाओ…अपना वो..आई.डी…

मामला थोड़ा सा गड़बड़ाने ही वाला था….

खामखां टी.सी बना वह बंदा कह उठा ….पहले तुम दिखाओ, अपनी फर्स्ट क्लास की टिकट…

यह देखो, अगले ही पल उस युवक ने अपनी टिकट उस के सामने रख दी….

बस, फिर क्या था, सन्नाटा छा गया….


फिर से किसी इंसान को कम आंकने की गल्ती …जो हम सब लोग रोज़ करते हैं, और दूसरों को भी करते देखते हैं….


हम किसी के चेहरे-मोहरे, उस के रूप-रंग से, कपड़ों से किसी की भी ब्रॉंडिंग करने में खुद को एक्सपर्ट मानते हैं …यही हमारी सब से बड़ी बेवकूफ़ी है …


हमें कबीर जी जैसे महांपुरुष अपनी वाणी के ज़रिए अच्छे से समझाते रहते हैं …..

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान…

मोल करो तलवार का, पड़ी रहने दो म्यान….

अब अगर इतनी सी बात भी हमारे पल्ले नहीं पड़ी तो फिर हम लोग कैसे समझेंगे….


हां, गाड़ी आगे चल रही है…हम भी आगे बढ़ें …


हां, दादर स्टेशन आने वाला था तो उस से पहले ही एक बंदा उठने वाला था, वह सीनियर सिटिज़न था..उसने मुझे इशारा किया कि मैं उस खाली सीट पर बैठ जाऊं…मैंने इशारा किया कि उस युवक को बैठने को कहते हैं…
खैर, जब वह बंदा उठा तो उस युवक ने मुझे कहा …अंकल, आप बैठिए…

मैंने उस का हाथ पकड़ कर कहा …नहीं, नहीं, यार, तुम बैठो, हम तो पास वाले हैं, तुम ने यार टिकट ली है…

लेकिन उसने मेरा हाथ पकड़ कर कहा ..नहीं,नहीं, आप …बैठो…

(बिल्कुल लखनवी बात लगी ..पहले आप ..पहले आप…) 

खैर, उसने जितनी आत्मीयता और दिल से मुझे दो तीन बार बैठने को कहा, मैं बैठ गया …

जैसे ही दादर स्टेशन आया …दो तीन लोग और उतर गए…और उसे भी बैठने की सीट मिल गई …

और वह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर अपना गंतव्य स्टेशन आने पर उतर भी गया....


जब कोई फर्स्ट क्लास में चढ़ जाता है …


जब कोई फर्स्ट क्लास में ऐसा इंसान या समूह चढ़ जाता है जिसे फर्स्ट क्लास के ज्ञानी लोग समझते हैं कि वह तो दूसरे दर्जे की सवारी है, गल्ती से फर्स्ट क्लास में गलती से चढ़ गई है …तो झट से उसे चेतावनी के अंदाज़ में कह देते हैं….यह फर्स्ट क्लास है। ….

अब यहां से बात आगे चलती है ….


मुंबई लोकल के पहले दर्जे में जो लोग भूलवश या अनाधिकृत्त तरीके से चढ़ जाते हैं …वे तीन तरह के होते हैं….


जिनकी गलती सच में मासूम गलती होती है


ऐसे लोगों के बारे में झट से पता चल जाता है …जो मुंबई लोकल में पहली बार चढा़ है …अभी अभी बाराबंकी, गोंढा  की गाड़ी से उतर कर लोकल में चढ़ा है, उस को लोग थोड़ा आगाह कर देते हैं …यह बहुत अच्छी बात है …


यह काम मैं भी अकसर करता हूं लेकिन बहुत सावधानी से ….एहतियात से …एक बाप-बेटा कुछ महीने पहले चढ़े…शायद पहली बार लोकल ट्रेन में चढ़े थे …मैंने उन को आहिस्ता से कहा कि यह फर्स्ट क्लास है …। इसमें चढ़ने से जुर्माना लग जाता है….। मेरी बात सुनते ही वह अधेड़ उम्र का बंदा तो बिल्कुल परेशान हो गया…मैंने उसे समझाया …शांत रहो, आराम से अगले स्टेशन पर उतर कर दूसरे डिब्बे में चढ़ जाना …और उसे महिला डिब्बे में न चढ़ने के बारे में भी बता दिया ….। उसे मेरी बात सुन कर सुकून सा मिल गया ..और वह अगले स्टेशन पर उतर गया ।..


मैंने ऊपर लिखा न कि जो इस तरह के फर्स्ट-टाइम ओफेंडर होते हैं ….उन के बारे में पता चल ही जाता है …और अगर हम जैसे लोगों को पता चल जाता है तो टी.सी- टीटीई को भी तो ज़रूर पता चल ही जाता होगा…अब अगर फर्स्ट क्लास डिब्बे से उतरते वक्त उन के हत्थे चढ़ जाएं तो फिर उन का क्या होता होगा …माफ़ी या जुर्माना…..इस के बारे में मैं ज़्यादा नहीं जानता….


कुछ  यंगस्टर्स मस्ती के मूड में होते हैं …


बहुत बार ऐसे युवकों के झुंड भी फर्स्ट क्लास में चढ़ जाते हैं जिन के पास दूसरे दर्जे का टिकट होता है …अकसर यह त्योहारों के दिनों में तो बहुत बार होता ही है …और छुट्टी के दिन भी और नॉन-पीक ऑवर में भी यह अकसर दिख जाता है ..। इन से कौन पंगा ले, लेकिन हां, अगर ये ट्रेन में टीटाई या स्टेशन पर टीसी के सामने आ जाते हैं तो फिर वह इन को अकसर छोड़ता नहीं है …लेकिन फिर भी मुंबई लोकल में यह समस्या बहुत ज़्यादा है ….कुछ तो चढ़ते ही इस अंदाज़ में कि देखेंगे, अगर पकड़े जाएंगे तो दे देंगे पैनल्टी….


कुछ लोगों को पूरी छूट होती है …


इस श्रेणी में वे सब जो पर्स, मोबाईल कवर बेचने हैं, और महिलाओं के डिब्बे में उन के मेक-्अप समान बेचती हैं, इमीटेशन चेन-झुमके बेचती हैं, हेयर क्लिप बेचती हैं….वे बिना किसी रोकटोक के नॉन-पीक ऑवर में पहले दर्जे में चढ़ते-उतरते रहते हैं ..इन में सूरदास भिक्षक, गवैये, ट्रासजैंडर भी शामिल हैं….जो सिर पर हाथ फेर कर आर्शीवाद देने की फीस वसूलते हैं …उन को पता रहता है कि कहां पर लोहा ज़्यादा गर्म है …उसी हिसाब से अपनी फीस वसूलते हैं….कल ही वह किसी प्रेमी-युगल को आशीर्वाद देकर कह रहा था …चेंज नहीं है तो ऑन-लाइन कर दो …इस बात पर वे दोनों हंसने लगे ….


संदेह के घेरे में ….


हमें पता है कि कोर्ट-कचहरी भी बेनेफिट का डॉउट देती हैं…हम तो कोर्ट-कचहरी भी नहीं है, न ही टीसी, टीटाई हैं…फिर हमें भी थोडी़ ब्रेक तो लगा के रखनी चाहिए….जैेसे हम लोग उन मनचलों को फर्स्ट क्लास में तफ़रीह के लिए, मस्ती करने चढ़ गये हैं, उस वक्त हम खामोश रहते हैं, उसी तरह हमें बाकी सभी डाउटफुल केसों में भी चुप रहने की आदत डालनी चाहिए….


लेकिन हम अकसर कपड़े, बॉडी लेंग्वेज और रुप-रंग देख कर बहुत बड़ी गलती कर ही देते हैं…जिस का नतीजे में मारपीट की नौबत आ सकती है …। 


विडम्बना है कि मुंबई हो या कोई दूसरे बड़े शहर ……बड़े ही क्यों, छोटे शहरों में भी जिस अंदाज़ में लोग फटी से फटी जीन-पतलून पहन कर निकलते हैं, जिस तरह की चीथड़े हो चुकी टी-शर्ट पहनते हैं,….छोटी छोटी निक्करें पहन कर निकलते हैं …और समाज में सम्मान की नज़र से देखे जाते हैं …ऐसे में ठीक ठाक कपड़े पहने इंसान को हम कईं तरह से कम आंक लेते हैं…बेवकूफी न हुई तो क्या हुआ यह…। 


उसे भी सीट मिल गई तो मुझे बहुत अच्छा लगा ...

मैंने ऊपर जिस २५-३० साल के युवक की बात लिखी है …आप इस तस्वीर में देखिए…वह ठीक ठाक कपड़े पहना हुआ है ….लेेकिन मैं बैठा उस दिन ट्रेन में यह सोचता रहा कि क्यों इस युवक को ऐसे बोलने की हिमाकत की गई कि यह फर्स्ट क्लास है ….फिर मुझे यही लगा कि शायद इस के कपड़े जिस रंग के हैं वह बीएमसी की ड्रैस है …लेकिन यह भी कहीं नहीं लिखा कि बीएमसी वाली ड्रैस पहन कर कोई फर्स्ट क्लास का टिकट लेकर उसमें नहीं चढ़ सकता ….


और वह मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतर गया ....

मैंने उस दिन जिन लोगों के साथ इस बात की चर्चा की और उन को यह फोटो दिखाई तो उन को भी यही लगा कि लोगों ने उसे बीएमसी का स्टॉफ, या बीएसटी का ड्राईवर या कंडक्टर या कोई सिक्योरिटी गार्ड समझ लिया होगा …..लेकिन अगर ऐसी बात है तो यह बात बहुत गलत है….यह तो हमारे स्टीरियो टाइप हो गए कि फर्स्ट क्लास में कौन सी वर्दी पहन कर आदमी सफर कर सकता है। बीच बीच में मुझे अफ्रीका में जो महात्मा गांधी के साथ एक ट्रेन में हुआ वह याद आता रहा ….बस, बात इतनी सी है कि हम फैसले सुनाने में इतनी जल्दबाजी न किया करें ….कबीर जी वाली बात ऊपर पढ़ ली है …उस फर्स्ट क्लास के डिब्बे में दूसरे लोगों के कपड़े  जैसे दिख रहे थे उस की फोटो मैं यहां लगा रहा हूं….। 



ऊपर चिपकाई मेरी फोटो का राज़ ….


अच्छा, आप सोच रहे होंगे कि इतना सब कुछ तो लिख दिया मैंने ..लेकिन यह समझ में नहीं आया कि मैंने ऊपर क्यों अपनी फोटो लगा दी है …उस फोटो को लगाने का भी एक मक़सद है ..मेरी यह फोटो १८-२० साल पुरानी है …२००७-०८ के पास के दिन थे …जब मैं पंजाब-हरियाणा का माल खा-पी कर (नॉन-वेज और दारू छोड़ कर)...फूल कर कुप्पा हो चुका था…१०० किलो से भी ऊपर। आप भी यही सोच रहे हैं न कि पंजाब हरियाणा में सूफी लोगों के लिए है ही क्या ..है, बहुत कुछ है…ढेरों मिठाईयां, समोसे, गुलाब जामुन, जलेबियां, भटूरे-छोले …..यह सब कुछ आठ-दस बरस ठूंस ठूंस कर मैं इतना भारी भरकम हो चुका था …और ऊपर से मेरी कपड़ों की पसंद …मुझे इसी तरह के कोट और इन के साथ नीचे रेमंड की काली या नेवी ब्लू पतलून बहुत पसद थी …या काली पैंट और सफेद शर्ट ….टीसी-टीटाई वाली ड्रेस ….इसी चक्कर में पंजाब-हरियाणा के जिन भी शहरों में रहा, यहां तक जब भी दिल्ली जाना हुआ और प्लेटफार्म पर खड़ा होता तो एक-दो लोग मुझे टीटीई समझ कर सीट के बारे में, गा़ड़ी के बारे में पूछते या सीट की कोई गुंजाईश है तो भी पूछ लेते …..खैर, अब अगर यह कपड़े पहनूं भी तो कोई न पूछेगा …यह सोच कर कि यह तो कोई रिटायर्ड 

टीटी ई होगा …


जब मैं यह टीटीई.टीसी लगने वाली बात बच्चों को सुनाता तो वे हंसी से लोटपोट हो जाते और कईं बार कह भी देते कि पापा …कह दिया करो ……हां, हां, जहां मर्जी बैठ जाओ। लेकिन, मुझे पता है कि इतना फ्रेंडली टीटीई-टीसी अगर पब्लिक को मिल जाए जो इतनी आसानी से कहीं भी बैठने के लिए कह दे ….तो उन को भी यह बात पचेगी नहीं….

हां, अभी पोस्ट को बंद करने का समय आ गया है …कुछ बातें रह गई हैं जिन में मैं लिखूंगा उन किस्सों के बारे में जब मुझ से किसी को पहचानने में गलती हुई और जो बोझ आज तक मेरे दिल पर है …शायद जब उन सब के बारे में लिखूंगा तो कुछ हल्कापन महसूस हो जाए….


हां, अगर कबीर जी की वाणी भी मुश्किल लग रही हो तो काका जी की बात ही सुन लीजिए….मक़सद वही है …बात हमारे पल्ले पड़नी चाहिए….वह भी हमें पचास बरस पहले आम आदमी की ज़बान में कितने प्यार से, दिलफरेब अंदाज़ में समझा गए हैं…..दिल को देखो, चेहरा न देखो…चेहरों ने लाखों को लूटा….दिल सच्चा और चेहरा झूटा….(उस गीत का लिंक)...


तो फिर आज के पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है? ....अपनी जजमेंट संभाल के रखिए अपने खीसे में.....लोग बहुत आगे निकल चुके हैं...। 😂😎😀



बुधवार, 5 अगस्त 2026

अगर भोर सुहानी है तो गीत भी उसी मूड वाले हों ..



दो दिन पहले पनवेल के एक बाग में ....सुबह सुहानी कुछ ऐसी दिखी...

आज सुबह हमेशा की तरह मैं उठने में थोड़ा लेट हो गया …विविध भारती के राष्ट्रीय चेनल पर अपने रेडियो पर उन के बढ़िया प्रोग्राम सुन रहा था …जैसे गीत वे बजाते हैं, ये केवल विविध भारती के बस की ही बात है …कईं कईं गीत तो ऐसे होते हैं जिन्हें हम बीस-तीस साल बाद सुनते हैं तो झट से याद आ जाता है वह गीत ….


आज भी सुबह जो गीत बज रहा था …मुझे अच्छा लगता है …लेकिन बहुत लंबे अरसे के बाद रेडियो पर सुना था …उस के बोल बहुत बढ़िया हैं…


बीती हुई रात की सुनाती है कहानी….

यह सुबह सुहानी हो …


कलियों का बचपन…

फूलों की जवानी…

यह सुबह सुहानी हो …


गाने के बोल तो हैं ही,… यशुदास ने गाया है और …और संगीत भी बहुत बढ़िया है …मन को छूने वाला …किल्लर कंबीनेशन ही देखिए….आनंद बक्शी की कलम, रवींद्र जैन का संगीत, यशुदास ने गाया..फिल्म अय्याश (१९८२) का यह गीत …अगर ऐसे गीत दिल को न छुएंगे तो फिर दिल में ही गड़बड़ी है, समझ लीजिए….

इस गीत को आप इस लिंक पर क्लिक कर के सुन सकते हैं ....यह सुबह सुहानी हो ....

रेडियो पर बंद हुआ तो मैंने यह गीत यू-ट्यूब पर मोबाईल पर लगा लिया….अच्छा लगता है जब सुबह सुबह आप को कोई सुकून देने वाला गीत इस तरह से रेडियो पर सुनने को मिलता है ….

अच्छा, अगर मैं बहुत सुबह उठ जाऊं तो सब से पहले मैं कोशिश करता हूं कि आलइंडिया रेडियो की एप पर दिल्ली एफएम गोल्ड लगा लूं…क्योंकि उन का एक प्रोग्राम आता है ..शायद पांच बजे के आस पास इसी नाम से …भोर सुहानी ….उस में कईं बार इसी तरह के गीत सुनने को मिलते हैं …जिनको हम बिसार चुके होते हैं…

अच्छा, मैंने आज विविध भारती पर सुबह सुबह गीत सुन रहा था …यह प्रोग्राम भी कुछ शायद त्रिवेणी नाम से जाना जाता है …एक तो गीत यह बजा जो मैंने ऊपर लिखा, और दो गीत और भी सुंदर बजाए गए उसमें ….

भोर भए पंछी धुन यह सुनाएं …जागो रे गई रुत फिर नहीं आए….(बहुत खूबसूरत गीत..)

और एक बावर्ची फिल्म का वह सुपर डुपर गीत ….

भोर आई…गया अंधियारा …

सारे जग में हुआ उजियारा …

नाचे झूमे यह मन मतवारा ….मतवारा।

….

धरती भी झूमें, बगिया भी झूमे ..

नन्ही किरण मुस्काए…

लागे नीला सागर बड़ा प्यारा, बड़ा न्यारा …

भोर आई …गया अंधियारा ….

तो इस तरह से अपने दिन की शुरुआत हुई आज …इतनी सुंदर शुरूआत ….फिल्म टाईम्स ऑफ इंडिया आया , दस मिनट को उस को देखने लगा …

तभी मेरे एक कज़िन ने वाट्सएप पर एक गीत मुझे भेजा ….

गीत के साथ उसने लिखा कि बहुत बढ़िया गीत …मन प्रफुल्लित हो जाएगा…और यह गीत बहुत बार फार्वाडेड हो चुका था ….आठ मिनट का वीडियो था …मैंने सोचा कि चलो मन को और प्रफुल्लित करने का अगर सुनहरा मौका मिला है तो, इस का भी फायदा उठा लिया जाए….

मैंने उसे बजाना शुरु किया ….

उस गीत के बोल सुनिए…..

यह दुनिया भीड़ का मेला ..

पर अंदर से इंसान अकेला…

हंसता चेहरा..रोती रुह..

किस से कहे मन का झमेला….

चेहरों पर मुस्कान सजी है ..

भीतर से हर दिल टूटा पड़ा है ..


रात अंधेरी जब घिर आती …

मन मंदिर में गूंजे सन्नाटा…

सांस सांस लगे इक झमेला…

कबीर कहे सुन रे बंदे …

झूठा जग का हर इक मेला …

इस गीत को सुनते वक्त मुझे यह देख कर यह बात बहुत अजीब लगी कि इस गीत को रिकार्ड इतने सुदंर मनमोहक दृश्यों की मदद से किया गया है (शायद कृत्रिम बुद्धि से..) …झील के किनारे, पुरातन बट-वृक्ष के नीचे, किसी धार्मिक स्थल में बैठ कर …इतने इतने सुदंर संगीत के यंत्र लेकिन चेहरे सभी रोते हुए ..उदास से… दुनिया के झमेले को सजीव कर रहे हों जैसे…।

(मैंने इस गीत का लिंक यू-ट्यूब पर ढूंढा है और यहां लगा रहा हूं ….हां, यह भी मैने सर्च किया कि यह कबीर जी को इस में क्यों इंवाल्व किया जा रहा है …तो मुझे पता चला कि इस गीत से कबीर जी का कुछ लेना-देना नहीं है, उन का नाम यूं ही लिखा जा रहा  है…)... यह रहा इस गीत का लिंक ....झमेला झमेला झमेला ...

लेकिन प्रफुल्लित तो क्या होना …मेरी तो जितनी बैटरी चार्ज थी, यह सब झमेला, झमेला सुन कर तो मैं तो भई उदास हो गया …सोचने लगा कि क्या सच ज़िंदगी ही इतना बडा़ झमेला है ….?

जी हां, है तो एक झमेला ही …कोई इंसान अंबानी-अडाणी, ट्रम्प …कोई ऐसा नहीं जिसे बीसियों परेशानियां, दुश्वारियां न हों, तो फिर हम आप तो किस खेत की मूली हैं…तो क्या इस का मतलब है कि हम लोग दिन की शुरुआत ही इस तरह के उदास करने वाले गीतों से करें ….

नहीं, मैंने यह कभी नहीं किया…इस से दिन की शुरुआत ही ऐसी की तैसी हो जाती है ….नाश्ता करते वक्त भी पांचो वही झमेला, लफड़ा ….सब कुछ वही चेते आने लगता है ….यह भी सच है कि घर से निकलते ही दुनिया के झमेलों को पार करते, उन का मुकाबला करते, उन को लांघते-फांदते, उन को नज़रअंदाज़ करते आप दिन भर कुछ कर पाते हैं…..लेकिन अगर सुबह सुबह घर से निकलने से पहले शुरूआत भी इस तरह के उदासी भरे गीतों से हो तो फिर इस का क्या नतीजा होगा, इस की आप कल्पना कर सकते हैं….

मैं पहले सुबह के वक्त भी कुछ सत्संगों में जाया करता था …वहां पर भी वही बातें, स्वर्ग-नरक, ८४ लाख योनियां भुगतनी पड़ेगीं, मोक्ष नहीं मिलेगा, अगर ऐसा नहीं करोगेे ..अगर वैसे नहीं करोगे….यह करो, वह करो….सत्संगों के इंचार्ज खुद रेंज-रोवर में, सिक्योरिटी गार्डों के झुंड के साथ निकलते हैं….यह सब देख कर बहुत सालों बाद अपने आप ही समझ से परदा हटा कि ये तो खुद ९९ के गेड़ में उलझे पड़े हैं. ….ये कौन होते हैं मुक्ति दिलाने वाले…और मुक्ति की ऐसी की तैसी…किसे मिली, किसे नहीं, किस ने आ कर बताया….ये सब पब्लिक को पीछे लगाने वाले लोग हैं ….हर बार इन सत्संगों में यह सुन सुन कर कान पक गये वही स्वर्ग-नरक, मोक्ष, चौरासी का चक्कर. …..बस, मैं फिर पीछे हट गया…वैसे भी बहुत से बाबा लोगों ने जो कुछ किया और जो कुछ बाद में उन के साथ हुआ…वह सारी दुनिया के सामने है ….मुझे नहीं पता कि कितने बाबे जेन्यून हैं या नहीं है, लेकिन मेरा मन नहीं मानता ……।

खैर, यह तो ब्लॉग का विषय है भी नहीं ….

हां, मैं अपने दिन की शुरुआत कैसे करता हूं ..ऊपर लिख ही दिया है ..रेडियो सुनते हुए, अखबार पढ़ते हुए ….ज़रूरी नहीं कि भजन ही सुनता हूं..जो रेडियो पर बज रहा हो, मुझे बढ़िया ही लगता है …वैसे भी कुछ फिल्मी गीत ऐसे बन चुके हैं जो भजनों से कम न

नहीं है, कुछ तो पूरे भजन ही हैं….ज़िंदगी के पूरे फ़लसफ़े के उसमें दर्शन होते हैं…

अनेकों अनेक ऐसे फिल्म गीत हैं जिन्हें मैं उच्चकोटि के आध्यात्मिक गीत ही मानता हूं जो किसी गिरते हुए को उठने के लिए बाध्य करने वाले हैं, कुछ मायूस चेहरों पर मुस्कान ले कर आते हैं….लिखने के लिए मुझे अल्फ़ाज़ कम पड़ रहे हैं, लेकिन बहुत कुछ है इन फिल्मी गीतों में …इन का अपना जादू ही अनूठा है …

ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना …यहां कल क्या हो किसने जाना ….

जीवन चलने का नाम….चलते रहो सुबहो शाम …..

आ बता दें तुझे कैसे जिया जाता है ….

तक़दीर से क़लम से कोई बच न पाएगा….पेशानी पे जो लिखा है वो पेश आएगा..(पेशानी-माथा)
 

सोचते जाएं तो इस लिस्ट को जितना भी चाहें लंबा कर दें ….

शिक्षा ….तो इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है कि सुबह सवेरे या दिन में भी कभी किसी को भी उदासी भरे गीत न भेजें….वह पता नहीं अपनी धुन में मस्त कौन से सुनहरी ख़्वाब बुन रहा है, हम उसे वह गीत भेज दें कि ज़िंदगी एक झमेला..एक एक सांस झमेला ..

ठीक है,यार , झमेला तो झमेला सही …..लेकिन इस झमेले को और कंप्लीकेट न करिए…….

वैसे भी मैं एक झमेले वाले गाने के बोल इस में जोड़ ही दूं…..

दुनिया में अगर आए हैं तो जीना ही पड़ेगा ..

यह जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा….

सोचिए, अगर इस तरह के गीत से दिन की शुरुआत होगी तो वह दिन ही कैसा होगा…!!
 
PS...उदासी भरे गीतों या ऐसी शेरोशायरी से मुझे इतनी तकलीफ़ है कि मैं इन्हें अगर कहीं पढ़ भी लूं तो कोशिश यही रहती है कि ये फिर से मेरी नज़रों में न पड़ें। बाकी, पसंद अपनी अपनी है ...फिर भी किसी दूसरे के साथ शेयर करते वक्त हमें थोड़ा सचेत रहने की ज़रूरत है ...





सोमवार, 3 अगस्त 2026

जब फिल्मों का जादू कुछ ऐसा हुआ करता था ...


गुज़रे दौर की फिल्मों के जादू को मैं बड़ा मिस करता हूं…बहाना ढूंढता हूं उन के बारे में बात करने की …उस दिन मेरा एक मरीज़ आया जिस का नाम था ..फ़िरोज़ खां…मैंने पूछा धर्मात्मा वाला …

नहीं, सर, वह तो चला गया…


और हम दोनों हंसने लगे …और उस जानदार हीरो को याद करने लगे …मैंने पूछा वह सुपरहिट गीत तो याद ही होगा….हेमा मालिनी के साथ …उसने फ़ौरन बता दिया ..हां हां, वह कोई कैसे भूल सकता है …तेरे चेहरे में वो जादू है ….


बिल्कुल यही जादू है ..!!!


शायद पचास से ज़्यादा बरस हो गए हैं फिल्म को आए…अभी भी उस को याद को संजो कर रखा हुआ है …और सुपरहिट गीतों की इतनी रिपीट-वेल्यू…. 


आज मैं सुबह सोच रहा था किसी भी फिल्म का जादू उन दिनों (४०-५० साल पहले) उस के थियेटर में लगने से हफ्तों पहले शुरु हो जाता था ..जब हमें स्कूल-कालेज आते जाते रास्ते में हाथी गेट या हाल गेट पर या दीवारों पर चिपके हुए पोस्टरों से पता चलता था कि अगले महीने यह फिल्म आने वाली है …बस, इतने हफ्ते पहले ही प्लानिंग शुरु हो जाती कि हां, यार, यह तो देखनी ही है ….क्या धांसू पोस्टर है इसका…


हर रोज दिन में दो बार स्कूल जाते वक्त और लौटते वक्त उस पोस्टर को अच्छे से निहारना …उस पर लिखी हर नाम को पढ़ना …और थियेटर का नाम भी पढ़ना …कितने शो वाली होगी यह फिल्म और क्या टाईम होगा …बस, यह सब कुछ पढ़ कर ही मज़ा आ जाता था…


अब किसी को इस तरह के थियेटर के बाहर पोस्टर इस तरह से निहारते देखता हूं तो बहुत मज़ा आता है ...अपने अमृतसर के पुराने दिन याद आ जाते हैं....यह पिछले हफ्ते की ही मेरी खींची एक फोटो है ...

चलिए, फिल्म लग गई ..सिनेमा घर में …लेकिन पहले कुछ दिन इतना भीड़-भड़क्का, टिकटों की इतनी काला-बाज़ारी, इतनी धक्का-मुक्की कि उन पहले कुछ दिनों में देखना अपने बस की बात न थी …एक दो फिल्में बड़े भाई के साथ देखीं, जब नौकरी करने लगा तो वह परवाह नहीं करता था…जितनी भी महंगी टिकट मिलती, वह हमें ज़रूर दिखा कर ही मानता ….

पुरानी फिल्मों का जादू ही है कि आज से ४०-५०-५५ साल पुरानी फिल्म की कहानी चाहे याद से थोड़ी इधर उधर सरक गई हो ..लेकिन जब गाना बजता है रेडियो पर तो उस से जुड़ी बहुत सी बातें याद आने लगती हैं….जैसे ….


किस थियेटर में, किस शहर में, कौन सा शो (मैटिनी या ईवनिंग या नाईट शो), अकेला देखा था या किसी के साथ देखा था और हम लोग उस थियेटर तक कैसे गए थे, साल के कौन से दिन थे (गर्मी या सर्दी), उस दिन थियेटर के बाहर कैसा माहौल था, बाहर गीतों की किताबें बिक रही थीं या नहीं….सब कुछ याद है …और अगर यह लिखूं कि हर फिल्म के इंटर्वल के दौरान हर खाई हुई सभी चीज़ें भी याद हैं , यह तो गप्प हांकने जैसा हो जाएगा..लेकिन हमारे पास ऑप्शन लिमेटड ही होते थे …भटूरे-छोले, समोसे, फ्राईड मूंगफली, गोल्ड-स्पॉट की बोतल, और चने की फ्राईड दाल भी …नींबू, शिंबू निचोड़ के ….इस वक्त तो इतना ही याद है …और हां, फ्राईड पापड़ भी होते थे लेकिन वहां पर ये खाने में क्या मज़ा, हां, कैसे भूल गया…मूंगफली, रेवड़ी भी तो मिलती थी ….जब, सारे हाल के अंदर मूंगफली के छिलकों से गंद पड़ जाता था…


कितने मज़ेदार दिन थे ….!!


जब फिल्म देख के घर लौट आते तो भी कम से कम एक हफ्ते तक हमारे सिर से उस फिल्म का नशा नहीं उतरता था …यहां तक कि जो उन दिनों चिट्ठियां भी आती जाती थीं उन में भी लिखा जाता था कि हमने यह फिल्म देखी है , आप भी देखिए…ऐसी बहुत सी चिट्ठियां याद हैं मौसी की कि घरौंदा देखी है, मासूम देखी है ….खिलौना देखी है …और कभी कभी भी देख ली है …


और स्कूल में भी जो छात्र किसी फिल्म को देख लेते तो अगले कुछ दिन उस के बारे में आधी छु्ट्टी के वक्त या किसी पीरियड के पहले दो चार मिनट जब तक मास्टर साहब न पहुंच जाते, उन की स्टोरी-टैलिंग चलती रही ….


और जब रेडियो पर उस फिल्म के गाने बजते तो और भी मज़ा आता कि यह गाना तो अब अपना ही है …गाना सुनते ही फिल्म के वे सभी दृश्य आंखों के सामने आ जाते ….अभी भी मैं यह पोस्ट लिखने इसलिए बैठ गया कि मेरे रेडियो पर विविध भारती पर पुराने गीत बज रहे थे …कल उस महान गायक किशोर कुमार का ९७ वां जन्मदिवस है ..देश के बहुत से शहरों में इस मौके पर प्रोग्राम होते हैं …मुंबई में भी रवींद्र नाट्य मंदिर में भी एक प्रोग्राम है …नेट पर ढूंढ कर टिकट बुक कीजिए….हां, अभी इस वक्त मेरे रेडियो पर जो गीत बज रहा था, वह भी सुनिए….



गुज़रे दौर की फिल्मों का, जिन थियेटरों में वो लगती थीं उन का अपना ही जादू होता था…२५ हफ्ते तक, ५० हफ्तों तक किसी फिल्म का थिेयेटर पर लगे रहना …इस दौर में तो सोच कर ही हैरानी होती है …अब तो फिल्मों के पोस्टर हर छठे दिन ऐसे गायब हो जाते हैं जैसे गधे के सिर से सींग …(कहावत ठीक है न ?...पता नहीं, चलिए, अब लिख दी सो लिख दी…स्वीकार करिए… हा हा हा हा )....कईं बार उस फिल्म के बारे में पता ही तब चलता है जब उस का पोस्टर थियेटर के बाहर लगता है …


पहले इस मामले में हमारा सूचना-तंत्र बड़ा मज़बूत था …अखबारों में भी सूचना छपती थी ….कौन सी फिल्म किस थियेटर में कितने शो कब से शुरु हो रही है ….एक पेज़ पर यही सब कुछ होता था ..हिंदी और इंगलिश दोनों अखबारों में ….और शहर की दीवारों पर पेंटर बाबू भी इस के बारे में लिख कर सूचना पेंट कर दिया करते थे …। 


अब फिल्में देखने का कुछ मज़ा नहीं रहा….अपने दौर वाली फिल्में कईं कईं बार देख चुके हैं…कुछ तो थियेटर में दो दो बार, फिर टीवी-दूरदर्श के दिनों में कईं बार, फिर केबल टीवी के दिनों में या सीडी-डीवीडी के दिनों में भी कईं बार, फिर ये जो ज़ी-टीवी, स्टार गोल्ड …इन सब पर भी बहुत बार देख लिया है अपनी मनपसंद १९६५ से १९९०-९५ तक आई फिल्मों को …ओटीटी पर भी फिल्में देखना न के बराबर है …..। 


अब तो यूट्यूब पर गीत देख कर और अपने रेडियो पर वे गीत सुन कर ही उन लम्हों को फिर से जी लेते हैं …आप का क्या अनुभव है, लिखना चाहें तो लिख दीजिएि…..


अभी अभी याद आया कि ६-७ साल पहले ऐसे ही एक दिन अमृतसर के सभी थियेटरों से जु़डी अपनी यादों को मैंने एक पोस्ट रूपी पोटली में सहेज दिया था ..अभी यहां शेयर कर रहा हूं , अगर देखना चाहें तो ...मुझे नहीं याद उस दिन क्या लिख दिया था...लेकिन अब नहीं पढूंगा ..क्योंकि अगर पढ़ लूंगा तो फिर शेयर नहीं कर पाऊंगा ....(यह रहा उस का लिंक)...


अमृतसर में नहीं बचा अब कोई भी पुराना सिनेमा घर ...


बचपन के दिनों में कानों में बार बार पडे़ कुछ गीत हमें बार बार याद आते हैं...रास्ता दिखाते हैं....और हां, कभी कभी हमारे फैसलों को भी प्रभावित करते हैं ....यह भी ऐसे गीतकारों की कलम का जादू ही है ..


बुधवार, 29 जुलाई 2026

न जाने किस मजबूरी में करती होंगी महिलाएं अपने अंडाणु दान....

कल मुंबई की बोरिवली-स्लो लोकल के दूसरे दर्जे के डिब्बे में मेरे साथ वाली सीट पर एक युवा महिला बैठी हुई बड़ी जल्दबाजी में, हड़बड़ाहट से कुछ सरकारी पन्ने उलट पलट रही थी ….कम उम्र की महिला लिखने को लिख तो दिया है, लेकिन थी वह यही कोई २०-२२ बरस की युवती ही थी ..हम देखते हैं, समझते हैं कि किस तरह से कुछ ज़िंदगीयां वक्त के थपेड़ों से जल्दी बडी़ हो जाती हैं…वह तो मुझे उस के मंगल-सूत्र से पता चला कि वह शादी-शुदा है…

हां, तो मैं मुंबई लोकल के दूसरे दर्जे के डिब्बे में क्या कर रहा था? 


दरअसल मैंने लोअर परेल से लोकल ली …और एक तो मैं कल शाम इतना थक चुका था और दूसरी बात यह कि फर्स्ट क्लास का डिब्बा थोडा़ दूर था…मेरे पास वहां तक पहुंचने का वक्त न था …और अगर गाड़ी छूट जाती तो फिर अगले २-४ मिनट में अगली गाड़ी आ जाती, और उस वक्त मन इस बात के लिए भी तैयार न था…वैसे तो मेरा सफ़र भी कुछ ज़्यादा नहीं था, १०-१५ मिनट का ही मेरा सफ़र था ..इसलिए जो दूसरे दर्जे का डिब्बा मुझे सामने दिखा मैं उसी में चढ़ गया …


सीट मिल गई …बंबई में यह एक छोटी मोटी लॉटरी लगने जैसी बात है…। 


साथ वाली सीट पर वह युवती आई और बार बार कुछ सरकारी कागज़ देखे जा रही थी …जल्दबाजी में थी …बिल्कुल वैसी ही जैसे हम लोगों ने नोटबंदी के दिनों में बैंकों के बाहर देखी थी …लाचार, बेबस इंसान वाली जल्दबाजी …एक बार तो मुझे लगा कि यह जो कागज़ हैं यह इस को SIR के सर्वे के लिए चाहिए होंगे…बहुत से लोग आज कल फोटोकापी की दुकान पर यही कुछ झेराक्स करवाते दिख जाते हैं और दुनिया के मेले में आते-जाते कुछ लोगों द्वारा एफिडेविट तैयार करवाने की बातें भी कान में पड़ती रहती हैं…


खैर, जब वह इतनी जल्दी जल्दी से उन तीन चार पन्नों को बार बार उलट पलट रही थी तो मेरा भी ध्यान उधर जाना स्वभाविक ही थी …मैंने देखा कि वह एक स्टाम्प पेपर पर एक अश्टाम (एफिडेविट) …(एक तो यहां पर इतने इतने बड़े शातिर लोग पैदा हुए हैं कि कितने बरस हो गए हैं जब भी कभी अश्टाम का नाम भी आता है तो मुझे उस तेलगी डाकू की याद ज़रूर आ जाती है …डाकू ही तो कहेंगे तो इस तरह से देश को लूटेंगे)....


हां, फिर वह युवती उन पन्नों की मोबाइल में फोटो लेने लगी ….शायद मोबाईल का माडल कुछ ऐसा होगा कि उसे एक पन्ने के लिए उस की तीन हिस्सों की फोटो खींचनी पड़ रही थी…यह मेरी समझ में नहीं आया , न ही मैंने समझने की कोशिश की …क्योंकि मैंने उस के मोबाईल की तरफ़ भी नहीं देखा…..हां, जब वह बार बार एक पेज़ को ध्यान से पढ़ रही थी या देख रही थी …तो मैंने भी अनायास उस पेज़ की चंद पंक्तियों को पढ़ लिया….


यह एफिडेविट (अश्टाम) ..शपथ-पत्र था जो कि एक २४ साल की लड़की ने अपने अंडाणु दान देने के लिए बनवाया था …


अंडाणु दान के बारे में मैंने कुछ पढ़ा तो था पहले लेकिन फिर भी मुझे आईवीएफ के बारे में कुछ ज़्यादा मालूम है नहीं …हां, पिछले महीने कुछ मुंबई में अंडाणु दान के बारे में फ्रॉड हुए थे …जैसा कि होता है दो चार दिनों तक खबरें आती हैं, फिर उन को सिया वाला कांड मिल गया …फिर वे उसमें व्यस्त हो गए …


हां, तो मेैं महिलाओं द्वारा जिन अंडाणुओं के दान की बात कर रहा हूं …उन न्यूज़-रिपोर्ट में बताया गया था कि बंबई के कुछ आईवीएफ सेंटरों को इस इलाज में हर तरह की धांधली के चलते बंद किया गया है ….और मुझे याद है उन खबरों में वे सब तरह की गड़बड़ियों की खबरें थीं जो अंडाणु दान के बारे में हो सकती हैं….सभी नियम नज़रअंदाज़, कुछ ही लड़कियों का बार बार अंडाणु दान करना, बिचोलिया औरतें किस तरह से ज़रूरतमंद महिलाओं को अपने जाल में फंसाती हैं, और कुछ आईवीएफ सेंटरों की भी इस में मिली-भगत ….इस से भी अलावा बहुत कुछ था उन खबरों में जो उन दिनों पेपर में छपी थीं ….


हां, तो जो मैंने पढ़ा…उस में लिखा था कि मेरी उम्र २४ साल है …मैं अपनी पूर्ण स्वतंत्र इच्छा से यह अंडाणु दान कर रही हूं ….और यह मैं पहली बार कर रही हूं …मेरा आधार कार्ड नंबर यह है ..और मेरी फोटो भी साथ लगी है …मेरे पति, पिता, मां, भाई, बहन …( जो भी लागू हो) ने सहमति दी है कि वे इस काम में मेरे गार्डियन की भूमिका में रहेंगे ….


मैंने पहले ही लिखा है कि मेरा ज्ञान आईवीएफ के बारे में नगन्य है ..फिर भी कुछ चीज़ें मैंने कल नेट पर देखीं और कुछ अन्य शपथ-पत्र (एफीडेविट) जो नेट पर पड़े मिले, उन को पढ़ा तो पता चला कि अंडाणु दान देने के लिए एक अच्छी खासी प्रक्रिया है ….टेस्ट वेस्ट तो चलिए होते ही होंगे…लेकिन दान देने वाली महिला को कुछ हार्मोन के इंजेक्शन भी लगते हैं और फिर उस के अंडाणु निकालने के लिए उसे जनरल एनेस्थीसिया (आम भाषा में कहें तो बेहोश कर के आप्रेशन करने वाली बात ….निश्चेतन कहते हैं उसे कठिन वाली हिंदी में ..जो न मुझे आती है, न ही मैने कभी सीखने की ज़रूरत ही समझी है …)...मैं तो बोलचाल वाली हिंदी में विश्वास रखता हूं …


मेरे दिमाग में कुछ विचार कल से आ रहे थे कि जो महिलाएं अपने अंडाणु दान देती हैं. ..(दान देना ही कहना पड़ता है, क्योंकि कानून के तहत अंडाणु बेचना प्रतिबंधित है…इसलिए मैं भी बार बार दान -दानी ही लिख रहा हूं ..और जो नेट पर मुझे थोड़ी बहुत जानकारी मिली, मैंने सोचा एक कागज़ पर लिख कर ब्लॉग में शेयर करूं….कर रहा हूं …इस पेज को पूरा पढ़ने के लिए इस इमेज पर क्लिक करिए।…



मुझे आज से पहले नहीं पता था कि यह अंडाणु दान देने वाला काम इतना पेचीदा है …पेचीदा क्या, उस दानी की आफ़त है…कितने मर्ज़ी कानून हैं, लेकिन ज़मीना हकीकत हम सब जानते हैं कि कम पढ़े लिखों का, गरीब लोगों का हर तरह को शोषण इस काम में भी होना तय ही है ….ऐसे लोगों की क्या कहीं पर कोई सुनवाई होती है? आप का क्या ख्याल है? 


मैंने जब से पढ़ा है कि ये अंडाणु दान देने वाला काम कितना जटिल है …तो मेरा ध्यान बार बार उन महिलायों की तरफ़ ही जा रहा है जिन्हें मजबूरन यह काम करना पड़ता होगा….कितना मुश्किल काम है, पहले तरह तरह के हार्मोन इस्तेमाल किए जाएं ताकि अंडाणु बनने की प्रक्रिया तेज़ हो सके …कईं बार उस के साईड-इफेक्ट्स ..और बाद में बेहोश (एनसथीसिया - निश्चेतन) कर के अंडाणु निकालने की प्रक्रिया ….


क्या है ३०-४० हज़ार रुपया …अगर किसी महिला को इतना मिल भी जाता होगा …वैसे तो इतना भी नहीं मिलता होगा, क्योंकि बीच में बिचौलिए कैसे चुप बैठे रहेंगे ….कल जो गाड़ी में मुझे महिला दिखी, वह भी कोई बिचौलन ही लग रही थी …


मुझे कैसे पता चला .?


जब मैं अपना स्टेशन आने से पहले अपनी सीट से उठा तो उसने झट से जिस लड़की को आवाज़ देकर बैठने को कहा …वह नाम ही उस एफिडेविट पर लिखा हुआ था….और मैंने आते आते उस लड़की को देखा जो उम्र में उस से भी कम लग रही थी…मुझे बहुत दुःख हुआ …अफ़सोसनाक …


 कोई भी प्रावधान जो कानूनी तौर पर उपलब्ध है, उस का जितना दुरुपयोग या जितना भी उस को तोड़ा मरोड़ा जा सके ताकि उस गरीब, शोषित महिला के अलावा बाकी सभी अपने अपने हिस्से की चांदी कूट सकें ….इस के नियमों से खिलवाड़ होता ही होगा और होता ही है ..मैंने ऊपर लिखा है न कि इस तरह की कईं रिपोर्टें पिछले दिनों अखबारों में बहुत आई थीं….



विक्की डोनर फिल्म में युवकों द्वारा स्पर्म-डोनेशन को एक तरह से मज़ाहिया अंदाज़ में पेश किया गया लेकिन महिलाओं द्वारा अंडाणु दान बहुत बड़ी बात है ….जब से उसने होश संभाली, वह किसी न किसी के कंट्रोल में ही रही, किसी ने उस की कभी मर्ज़ी कम ही पूछी….१२-१३ साल की उम्र से मासिक धर्म की सभी परेशानियों को स्कूल-कालेज में जूझती ...कईं बार वॉश-रुम का ही न होना, (काश…पैडमैन फि्लम की तरह यह सब सब को, सभी जगह उपलब्ध करना इतना आसान होता…)...बाद में, शादी के बाद, बच्चे पर बच्चे, प्रसव पर प्रसव…गर्भपात, अपने आप और कईं बार करवाने का दबाव या मजबूरी ….और हर महीने पांच छः दिन की परेशानी और हर प्रसव से पहले, प्रसव के दौरान और उस के बाद हफ्तों, महीनों तरह तरह की दुश्वारियों को झेलना … क्या यह सब कम था कि उस के ऊपर उसे अगर अंडाणु बेचने (दान) देने के लिेए भी मजबूर होना पड़े….

अंडाणु दानी बनने की मजबूरी ….हां, यह मेरा विश्वास है कि यह अंडाणु दान किसी न किसी मजबूरी में ही होता होगा….किसी न किसी …केवल एक मजबूरी …पैसे की कमी, और क्या कमी हो सकती है …मुझे नहीं पता। और वैसे तो कहते हैं प्राईव्हेसी रखी जाती है, अंडाणु देने वाले को प्राप्त करने वाले का नाम नहीं पता होता और प्राप्त करने वाले को दानी की डिटेल्स नहीं पता होतीं…। (आज कहीं पर पढ़ रहा था कि अंडाणु दान देने के लिए महिला का ३५ वर्ष की उम्र से कम होना ज़रूरी है)....


मुझे ऐसा क्यों लगता है कि यह दान-वान कम पढ़ी लिखी, मजबूर, मजलूम, आश्रित महिलाओं द्वारा ही किया जाता होगा….क्या आप किसी पढ़ी-लिखी और आत्म-निर्भर के बारे में सोच सकते हैं कि वे अंडाणु दान करे ….असंभव। 


एक बात और बहुत अजीब लगी कि सामान्य नयन-नक्श वाली महिला के अंडाणु की कीमत कम और पढ़ी लिखी, स्पैशल प्रोफाईल वाली महिला के अंडाणु की कीमत बहुत ज़्यादा..आप उस ऊपर दी गई लिस्ट में पढ़ ही सकते हैं….। जब प्राईव्हेसी है तो किसे पता कौन सा अंडाणु आईवीऐफ सैंटर ने किस शुक्राणु के हवाले कर दिया ….यह तो खुदा ही जाने या जब ९ महीने बाद रिजल्ट निकले तभी तो पता चले शायद, वरना अगले दो-चार पांच साल बाद ही पता चलेगा…लेकिन कोई कर ही क्या लेगा तब, सब थ्यूरी की बातें हैं  …..। 


सोचने वाली बात है कि एक तरफ तो आईवीएफ करवाने वाले पेरेंट्स इतना भरोसा करते हैं …क्या करें, मजबूरी है …(कुछ आईवीएफ सेंटरों के गोरखधंधे अखबारों में आते हैं …लेकिन कईं बार तो वे मंजूरशुदा प्रामाणिक आईवीएफ सेंटर होते ही नहीं…)...और दूसरी तरफ़ लोग अपने निकट संबंधियों की राख के लिए भी भरोसा नहीं करते आजकल ….हमारे एक मित्र का भाई स्वर्ग सिधार गया…उन के भतीजों ने कहा कि हम तो राख आज ही रात लेकर जाएंगे …क्या पता, परसों लेने आएँ तो राख बदल ही दी हो …और हम किसी और की राख गंगाजी में प्रवाह के आ जाएं?...इसलिए वे दाह-संस्कार के बाद कईं घंटों वहां बैठे रहे ..चिता के ठंडा होने की इंतज़ार में …रात में जब चिता ठंडी हुई तो उन के फूल (राख) लेकर ही अपने घर आए…। 


क्या लगता है कि इस तरह के शोषण का कोई समाधान है ? …..


कानून बहुत हैं, लेकिन उन का पालन होने की ज़रुरत है …कड़ाई से पालन हो ….हर चीज़ के कायदे कानून मौजूद हैं लेकिन लोग इतने शातिर हो चुके हैं कि कैसे सब कुछ तोड़-मरो़ड़ कर के अपना मतलब निकाल लेते हैं, पैसा हड़प लेते हैं ..इसलिए मेरे विचार में तो इस का एक ही समाधान है कि महिलाएं पढ़ी लिखी हों, अपने पैरों पर खड़ी हों और जो बात उन के शरीर से , उन की सेहत से जुड़ी है उस के बारे में सवाल करें….एक बार नहीं, बार बार करें ……फिर देखिए, इन बिचौलियों की तो ऐसी की तैसी …। पहले किराए की कोख (surrogate mother) के नाम पर धांधलियां और अब अंडाणु दान के नाम पर गरीब, बेबस, अनपढ़, कम पढ़ी लिखी महिलाओं का हर तरह को शोषण….यह सब कुछ तो भई युवतियों की पढ़ाई लिखाई से और उन के स्वालंबी होने से ही खत्म होगा …



आज १५ दिन बाद ब्लॉग लिख रहा हूं …क्यों भला?


बहुत बार सोचता हूं कि २० साल हो गए ब्लॉग लिखते लिखते ….अब यह बेकार, फ्री-फंड वाली दुकान बंद करने का वक्त आ गया है …बोरियत होने लगती है लिखते लिखते …फिर यह भी ख्याल आता है कि मैं जो भी आज लिख पा रहा हूं …जैसा भी टूटा-फूटा …सिमटा, बिखरा …..यहां तक भी मैं पहुंच पाया कि मैं पिछले बीस साल से - २००७ से …निरंतर हिंदी ब्लॉगिंग में सक्रिय रहा ….ऐसे कैसे छोड़ दें इसे भी लिखना ….जिस काम को अभी तुच्छ स्तर पर ही टटोल पाया हूं …उसे इतनी आसानी से कैसे छोड़ दें….। अंदर की बातें अंदर ही दबी रहें, क्या लिखने वालों को यह शोभा देता है ? 


खैर अपने आप से ये बातें चलती रहती हैं …इतने दिनों पर चलती हैं…फिर अचानक १०-१५ दिन बाद कोई मिल जाता है …तो अचानक उस से मुंह से बर्बर निकल जाता है कि डाक्टर साहब, आप की वह नाई वाली पोस्ट पढ़ी, बहुत मज़ा आया …मैं तो उस के माध्यम से अपने गांव में ही पहुंच गया …..


फिर अगले दिन कोई किसी दूसरी ब्लाग-पोस्ट में लिखी कुछ बातें हंसते हंसते हु-ब-हू सुनाता है …और खिलखिला कर हंसते हुए सुनाता है …तो बस, लिखने की जो थोडी़ बहुत मेहनत होती है सफल हो जाती है …अगर कुछ लोगों के चेहरों पर खुशी आ गई, हमारे लैपटाप पर उंगलियों को थपथपाने में लगी थोड़ी मेहनत में तो कौन सी बड़ी बात है …। और हां, वह सज्जन कह रहे थे कि मुझे इतनी अच्छी लगी उस में लिखी बातें कि मैंने दो बार उसे इत्मीनान से पढ़ा। 


और यह तो हो गई बातें, उन दोस्तों, जान-पहचान वालों द्वारा कही हुई जो कभी मिलने पर कह देते हैं ..इस के अलावा कभी कभी वाट्सएप पर कभी कोई ऐसा कमैंट लिख भेजता है या उस पोस्ट के नीचे ही कुछ ऐसा लिख देता है या कोई बहुत दूर किसी शहर से फोन कर के कुछ कहता है ….बस, फिर से कलम उठाने के लिए इतना ही उकसाना काफ़ी होता है …। है कि नहीं ? 


अभी पोस्ट को बंद करते वक्त मुझे पता नहीं गीत गाता चल फिल्म का यह एक बहुत बढ़िया गीत याद आ गया ...सोचा, यही लगा देता हूं ....मैं वही, दर्पण वही ...न जाने यह क्या हो गया कि सब कुछ लागे नया नया ....



PS... As i have admitted above, my knowledge on this subject is very poor, so if any enlightened reader has to say anything which would enable me to add/amend the contents of this post, please feel free to write in comments, if you wish or even feel free to email me. Feedback is quite important in such posts. 

रविवार, 12 जुलाई 2026

प्लास्टिक से हुआ नाक में दम ...

जीना हम सब का दूभर हो चुका है …प्लास्टिक की वजह से …लेकिन हरेक को लगता है ..मैंनू की? (मुझे क्या?)....बस, यही सोच हमें खत्म कर देगी…



कल रात जुहू चौपाटी जाने का मौका मिला…लेकिन मज़ा बिल्कुल नहीं आया …मज़ा आना तो बहुत दूर की बात है, ऐसे लग रहा था कि कब यहां से वापिस लौट जाएं…कारण? …कारण यही कि रात के दस-ग्यारह बजे का वक्त था और गंदगी के ढेर लगे हुए थे …हर तरफ़ ….ढेर जो जगह जगह लगे हुए थे वे तो थे ही, इस के इलावा दूर तक जहां तक नज़र जा पा रही थी ..पॉलीथीन की थैलियां ही थैलियां बिखरी पड़ी थीं…और भी तरह तरह का कचरा….ज़्यादातर प्लास्टिक ही था …


बहुत ज़्यादा बुरा लगा ...वैसे तो यह पहली बार नहीं थी …हां, मेरी सब से पहली जुहू चौपाटी की यादें पचास-बावन वर्ष पुरानी हैं..हम लोग बंबई आते तो हमारी चाची जी हमें एक दिन जुहू , एक दिन गिरगांव चौपाटी, एक दिन बांद्रा के ओपन-एयर थियेटर में किसी फिल्म को दिखाने ले जाया करतीं…


तब जुहू चौपाटी पर जाना एक उत्सव, एक मेले में जाने जैसा होता था …सीधा उन की गाड़ी जुहू चौपाटी पर ही रुकती ….वहां पर टहलने वहलने का कोई रिवाज नहीं था..बस, वहां पहुंचते ही एक-आधा घंटा समंदर को खूब अच्छे से निहारना….समंदर को देखते देखते आंखें थक जाया करती थीं, दिल नहीं भरता था उन मस्त लहरों को देख कर…और उस के अंदर दूर तक पानी में जाना ….पैंट वैंट सब कुछ गीला हो जाता था …एक दूसरे के ऊपर पानी फैंकना …और उस ज़माने के फिल्मी गीतों का याद आ जाना और गुनगुनाना... हा हा हा हा हा ....जैसे कि ...आ मुलाक़ातों का मौसम आ गया ...



मुझे नहीं याद कभी कोई गंदगी हम ने वहां देखी हो ….पालीथीन तब था ही कहां।….यह बीमारी तो हमें बाद में लगी है …


फिर जब पानी में खेल कर थक जाते तो फिर वहां पर सेव-पूरी, भेल-पूरी, पानी-पूरी, चाट-पापड़ी, बर्फ के रंग बिरंगे मीठे गोले, पाव भाजी….जो भी मन करता, खाते रहते, थक जाते ….

फिर जब हमें बंबई में रहने लगे तो कोई भी हमारे पास आता तो हम भी उस को जूहू चौपाटी एक दिन शाम को ज़रूर ले कर जाते …यह आज से ३०-३५ साल पुरानी बातें होंगी ..लेकिन तब भी कभी कभी कोई प्लास्टिक की पन्नी आदि पानी के साथ बाहर आ जाती तो सब को बहुत बुरा लगता …लेकिन फिर भी गंदगी न के बराबर थी ….और इसी चक्कर में पानी में आगे तक जाना बंद हो गया …जाते भी तो अनमने से ..क्योंकि थोड़ा बहुत गंद तो दिखने लगा था …


ऐसे कईं ढेर प्लास्टिक के दिखाई दिए कल रात ....

लेकिन अभी कुछ सालों से तो पानी में जाने की हिम्मत नहीं होती …इतनी गंदगी …हर तरफ फैला कचरा ….फिर भी कुछ लोग जो शायद बाहर गांव से आए होते हैं, वे अंदर पानी में भीगने के लिए चले ही जाते …


लेकिन अब तो हर तऱफ़ इन प्लास्टिक की थैलियों के इतने बड़े बड़े पहाड़ देख कर तो यही कोशिश रहती है कि आए हैं तो थोड़ा टहल लेते हैं, लेकिन समंदर का पानी पैरों तक न ही पहुंचे तो ठीक है ….वैसे भी इतनी गंदगी है कि कौन इतना गंद लांघ कर अंदर पानी का तरफ़ उस में भीगने जाए….


कल कुछ महीनों बाद ही जुहू चौपाटी पर जाने का सबब हुआ था …सोचता कईं बार हूं कि चाहूं तो रोज़ सुबह …नहीं तो सप्ताह में एक दिन तो जा ही सकता हूं (पास ही हैं…दो तीन किलोमीटर की तो कोई दूरी नहीं होती ..क्या ख्याल है? ).....लेकिन बस इच्छा ही नहीं होती ….यह सब देख कर …। 



मैंने जुहू चौपाटी के ऊपर कईं पोस्टें लिखी हैं …सुबह सुबह कईं ट्रालीयां और दर्जनों सफाई सेवक वहां पर यह सब बीन रहे होते हैं …यह अंबार भी संभवतः इन्हीं सफाई कर्मियों द्वारा ही इकट्ठा कर के रखा हुआ होगा …सुबह ट्राली आयेगी और उठा ले जाएगी…और कल भी समंदर उसमें हमारा फैंका हुआ कचरा वापिस हमारे ऊपर फैंक कर चला जाएगा…समंदर अपने पास कुछ नहीं रखता….


जूहू पर फोटोग्राफर, चाय वाला और मालशी 


सोचने वाली बात है कि इतना कचरा, कचरे को इतने इतने बड़े पहाड़ रोज़ाना कहां जाते होंगे …धरती पर ही रहते होंगे ….जहां सी फैंके जाते होंगे …ज़मीन को हमेशा के लिए बरबाद कर देते हैं ….आज की अखबार में एक फोटो देख कर मन बहुत विचलित हुआ कि मुंबई में कचरे के इने ढेरों के बीचों बीच लोग रहने लगे हैं….


सरकारें कितना करें?...लगभग हर सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर बैन लगाया….कितनी कितनी लंबी कानूनी प्रक्रिया चलने के बाद यह बैन लगा ….लेकिन इस का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है …..हम यही सोचते हैं कि मेरी चार पांच थैलियों से क्या हो जाएगा….


दो सप्ताह पहले की बात है कि मैं बंबई के जे जे अस्पताल से पांच मिनट की दूरी पर किसी गली से गुज़र रहा था …मैंने दो सफाई सेवकों को देखा ….वह गली से कचरा निकाले जा रहे थे ….आप देखिए इस अंबार को ….इन सफाई सेवकों के काम को सलाम है ….


सफाई सेवक ना हों तो...इसकी कल्पना ही कर के देखिए ....

मेरे पास जब कोई सफाई सेवक आता है तो मैं उसे गुटखा-पानमसाले के लिए ,या तंबाकू चबाने के लिए मना करता हूं तो लगभग हमेशा यही जवाब मिलता है …क्या करें, काम ही इतना गंदा है, बिना इस को चबाए कैसे जी पाएंगे, कैसे काम कर पाएंगे। फिर भी मैं इस के बावजूद भी थोड़ा ज्ञान ज़रूर बांट देता हूं लेकिन उन की बात के सामने मुझे मेरी ही बात, मेरा ज्ञान बिल्कुल थोथा और फोका सा दिखता है….।शायद हम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते …जिन हालात में हमारे ये साथी काम करते हैं….आए दिन गटर की सफाई के दौरान किसी न किसी युवा सफाई सेवक की जान चली जाती है …। कानून हैं, सब कुछ है, लेकिन असल में क्या है, किसी से छुपा नहीं है…। 


Waiting in queue for getting uploaded on  Clean-up Truck 

यात्री कितना भी कचरा फैंकें, गाड़ी में, स्टेशन पर ....रेलवे अपनी जिम्मेदारी तो बखूबी निभा ही रही है....रेलवे के करोड़े रुपए इस कचरा प्रबंधन में खर्च होता है ...अगर यह प्रणाली इतनी दक्ष न हो तो रेल-यूज़र्ज़ का एक दिन में जीना दूभर हो जाए...लेकिन रेल का इस्तेमाल करने वाले यह सब कहां सोचते हैं...यह तस्वीर तो एक स्टेशन की है ...

बंबई के एक स्टेशन के बाहर मैंने कचरा उठाने वाला एक ट्रक देखा ….बहुत बड़ा ट्रक…मैं पांच मिनट तक उस को देखता रहा , इस तरह के लगभग एक सौ के करीब बड़े बड़े बंडल उस में ठूंसे जा रहे थे …मैं देखते देखते थक गया….और वहां से निकल गया …यह एक स्टेशन की बात है ….और दिन में दो बार यह ट्रक आता है ….कचरा उठाने के लिए ….यह बाहर गांव से आने वाली गाड़ियों का कचरा है अधिकतर ….सारा प्लास्टिक, प्लास्टिक..प्लास्टिक …..जोमैटो, स्विगी से मंगवाए खाने के पैकेट, पानी की खाली बोतलें, जंक फूड के खाली पैकेट ….जिस भी प्लास्टिक की आप कल्पना कर सकते हैं, सब कुछ था ….


सोचने वाली बात है कि यह सब यहां से तो उठा लिया जाता है, लेेकिन जाता कहां होगा….


प्लास्टिक के ऊपर पिछले २०-२५ बरसों से इतना लिखा जा चुका है, सरकारों ने इतना काम किया है, इतना हमें समझाया है, इतना डराया है, लेकिन हम नहीं सुधरेंगे …क्योंकि हम ने खतरों से खेलने की ठान रखी है …हर तरफ प्लास्टिक, हर तरफ़ गंदगी….हर तऱफ़ कूड़े का जलाया जाना ….। 


प्लास्टिक पर इतना लिखने के बाद ही मुझे लग रहा है कि यह सब लिखना भी बेवकूफी है ….कोई असर नहीं होगा ….लेेकिन आज तो लिखने का मेरा एक मक़सद है …मेरा अपना एक स्वार्थ है …मैंने कल से यह प्रण किया है कि मैं अब बाज़ार में जाते वक्त हमेशा कपड़े का थैला या थैले ले कर जाया करूंगा ….अगर मेरे पास यह नहीं होगा तो नहीं लाऊंगा बाज़ार से ….। 


पता नहीं हम टमाटर, अंगूर, आलू-बुखारे, आम के दबने से इतने डरते क्यों हैं…..आज से पचास साल पहले हमारी मांएं कैसे लाती थीं सब्जी, एक हाथ में प्लास्टिक की बड़ी सी टोकरी (जिस में टमाटर, अंगूर, धनिये जैसी नाज़ुक चीजें…) और दूसरे हाथ में कपड़े का एक थैला….आलू, प्याज़, पेठा, बैंगन …सब कुछ हार्ड-कोर , रफ-टफ चीज़ें उस थैले में …(हमें मां के साथ बाज़ार जाने का एक ही क्रेज़ होता कि गन्ने का रस पिएंगे या आईसक्रीम दिलवाएगी मां…और वह ज़रूर दिलाती भीं …लेकिन मुझे नहीं याद कभी इतनी अकल भी थी कि मां के हाथ से टोकरी या थैला ही पकड़ लेते …..)....और मज़े की बात …मां को पता रहता था कि कौन सी सब्जी पहले लेनी है, कौन सी बाद में ..ताकि बाद में यह दबने-वबने वाली सिरदर्दी हो ही न। …..और हां, कईं बार अंगूर, या जामुन आदि कागज़ के लिफाफे में डाल कर दुकानदार दे देता था .। और घर पहुंच कर , सारी सब्जियां ज़मीन पर पलट कर फिर भिंडी को अरबी से अलग करना, टींडे को आलू से .....वक्त तो लगता था भई इस में।


सीधी सीधी बात है …जहां चाह वहां राह ….हम में से कोई भी इंसान हो कितना बेवकूफ लगता है सात सब्जियों को, तीन फलों को पालीथीन की थैलियों में डाल कर, अपने दोनों हाथों की उंगलियों की खूंटी पर टांगे, ढिलक रही पतलून को किसी तरह संभालते हुए घर तक पहुंचता है …अगर खुशकिस्मत हुआ तो ….वरना कभी नींबू वाली थैली ने जवाब दे दिया तो कभी पैंचो पपीता नीचे गिर जाता है, कभी एक आम, दो आलू बुखारे …..और कभी कभी ढीली पैंट भी गिरने की कगार पर होती है ...


चलिए, अपने ही से शुरुआत करते हैं….अब भी बहुत देर हो चुकी है…लेकिन फिर भी कहीं पढ़ा था …फिरोज़पुर के एक स्कूल में प्रिंसीपल के दफ्तर के बाहर ….There is never a wrong time to do the right thing!! 


And of course, journey of 3000 miles starts with the single step. What do say? I ban plastic from my life with immediate effect. कुछ दिनों बाद फिर एक पोस्ट लिखूंगा कि अपने इस प्रण पर कायम रहा या बस ऐसे ही यह भी मेरे लफ़ाफे़ेबाजी़ थी …..


सरकारों से जितना हो पा रहा है, कर रही हैं, लेकिन अगर जनता ही न सुधरे तो सरकारें क्या करें...देखिए, जूहू पर इस तरह के डस्टबिन रखे पड़े हैं कईं जगह, लेकिन देखिए, खाली पड़े हैं...इतना कचरा, इतना कबाड़ की इन विशाल कचरा पेटियों में भी यह समा न पाए....।  

एक बार फिर से प्रण दोहरा दूं....आज से मैंने इन पन्नियों आदि का त्याग किया ...न इन को इस्तेमाल करूंगा और दूसरों को भी इस के लिए प्रेरित करूंगा....हम लोगों की ज़िंदगी के लिए यह करना अब इतना ज़रुरी हो गया है कि पानी नाक तक आ गया है....। ऐसे ही ज्ञान पेलने से क्या हासिल, हम भी कुछ शुरूआत तो करें ....। 

हिंदी फिल्मों ने भी हर मौके के लिए गाने हैं....जैसे कचरे की बात चल रही थी तो मुझे महमूद का वह गीत याद आ गया जिसमें वह कबाड़ी का रोल कर रहा है ....इस में देखिए कि पहले कबाड़ भी किस तरह का होता था ...खाली डिब्बा, खाली बोतल .... 😂


आप भी देखिए आज की टाइम्स आफ इंडिया में छपी यह फोटो ....१२ जुलाई २०२६ 

शनिवार, 4 जुलाई 2026

सम्मान जीते जी होता है ...बाद में क्या !

मरणोपरांत तो माईं लफ़्ज़ ही इतना मायूसी से भरा है। जानता हूं जाना सब ने है, कोई बच के नहीं निकल पाएगा। फिर भी मरणोपरांत लफ्‍ज़ सुनते ही माईं उदासी घेर लेती है जैसे … अकसर बड़े बड़े सम्मान देते वक्त इस का इस्तेमाल होता है …अच्छा, एक बात है कि 'मरने के बाद' वाले शब्द से फिर भी बेहतर है मरणोपरांत …क्योंकि हिंदी भी अधिकतर आम आदमी ने इतनी अच्छी से भी नहीं पढ़ी होती कि वह सन्धि-सन्धि विच्छेद तक पहुंच पाए…और जो इस के लिए फिरंगी लफ़्ज़ है…पास्थूमसली …आप पढ़ने वाले ही अनुमान लगाएं कि इस लफ़्ज़ का अर्थ ही कितने लोग समझ पाते होंगे …

कुछ ख्याल लिख लूं ..पहले ….बहुत दिनों से इस विषय पर अपने उद्गार प्रगट करना चाह रहा था …६०० शब्द लिखे भी थे, लेकिन ब्लॉगर ड्राफ्ट में कहीं छिपे पड़े हुए थे…आज फिर से ख्याल आया कि उसे पूरा करना है …मुश्किल ही से मिला ….वरना पूरा लिखने की इस वक्त कोई मंशा नहीं थी …

हां, पंद्रह बीस बरस पहले की बात है …मैं अमृतसर के पुतलीघर इलाके में स्थित पिपली साहिब गुरुदारे के आगे से निकल रहा था …उस के बाहर किसी स्वयं-सेवी संस्था ने कोई सामाजिक संदेश देते हुए एक बड़ा सा बैनर लगा रखा था …मैंने पढ़ा …उन दिनों वाट्सएप नही था, इसलिए सब कुछ बड़े ध्यान से पढा करते थे …यहां तक कि मूंगफली खा कर कागज़ का खाली लिफाफा भी फैंकने से पहले थोड़ा देख लेते थे ….शायद कुछ काम की बात ही मिल जाए।

हां, तो उस पर जो भी लिखा था कि उस की चंद बातें मेरे दिलोदिमाग में घर कर गईं …एक तो था कि जीते जीते तो किसी ने रोटी नहीं पूछी …और मरने के बाद लाश के मुंह में खालिस देसी घी का डिब्बा उंडेल रहे हैं….जीते जीते मैं तरसता रहा कि कोई मेरे पास आ कर बैठे …लेकिन नहीं, किसी को वक्त ही न मिला ..अब बीसियों लोग मेरी लाश को घेर के बैठे हैं….मेरे जीते जी इन में से किसी के पास वक्त नहीं था, मैं अकेलेपन की वजह ही से धीरे धीरे मरता चला गया ..अब मैं क्या करूं इन के घडि़याली आंसूओं का …। 

यह सब हम लोग अपने आस पास देखते हैं, महसूस करते हैं…मध्यम वर्ग की, उच्च मध्यम वर्ग की ही बात नहीं है …अरबोंपति बुड्ढे मारे मारे फिरते हैं…कितनी की खबरें अखबार में आती रही हैं और अभी हाल फिलहाल में जब वे इस जहां से रुख्सत हुए तो वही परिवार वाले उस की चिरशांति और सद्गगति के लिए उसे आग देने आ पहुंचते हैं ..जैसे जीते जी सब कुछ सामान्य रहा हो ….

कुछ दिन पहले मैं किसी वरिष्ठ संपादक के यहां बैठा हुआ था ...उन की लाईब्रेरी देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा ...उन में ६०-७० के दशक के धर्मयुग, इलस्ट्रेटेड वीकली ...और भी बहुत कुछ करीने से सजा रखा था ...अचानक मेरी नज़र जिस किताब पर पड़ी और वहीं टिकी रह गई ....वह थी काका हाथरसी की एक किताब...


पहले काका हाथरसी के बारे में...मेरी उन से पहचान कब हुई? ...पहले स्कूल-कालेज के जब वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह होते थे तो इनाम के रूप में किताबें दी जाती थीं ...और कईं बार तो किताबों का चुनाव करने का भी मौका मिलता था ...आप पहले से चुनाव कर सकते थे अपनी रुचि के मुताबिक ...

हां, तो मैं स्कूल में पढ़ता था और मेरी बड़ी बहन कालेज में थीं ...उन को ऐसे ही कॉलेज के एक समारोह में दो किताबें मिली थीं...एक तो गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि (इंगलिश में) और दूसरी थी काका हाथरसी की फुलझड़ियां ...पहली किताब तो मेरे लिए क्या, सारे घर के लिए काला अक्षर भैंस बराबर थी ...बस अकसर किसी न किसी के हाथ में नज़र आती और साथ में यह बात की टैगोर को इसी के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था ...लेकिन काका हाथरसी की किताब अकसर कोई न कोई पढ़ता दिख जाता ...बिल्कुल पतली सी किताब थी ...लेकिन जो भी उस को पढ़ता वह हंसता और दूसरों को काका के हसगुल्ले सुना कर हंसा देता ....इस का मतलब यही हुआ कि मेरी वाकफ़ियत काका से ५० साल से भी पुरानी है ..है कि नहीं? सीधा सीधा हिसाब है ..। 

हंसने हंसाने वाले लेखक और फिल्मी कलाकार बहुत पसंद किए जाते थे ....क्योंकि खुश रहने का यही एक माध्यम था ...रेडियो में तो आते होंगे ये हास्यकवि ..लेकिन होली इत्यादि पर आते होंगे ...मुझे नहीं याद ऐसा कोई अवसर। 

हां, तो उन संपादक महोदय के घर जब मैंने काका हाथरसी पर लिखी किताब देखी तो मैं दंग रह गया ...मैं कुछ समझ नहीं पाया....मैं जल्दी से उस किताब के पन्ने पलटने लगा ...मेरी व्यग्रता देख कर उन्होंने कहा कि इसे आप ले जाइए ..आराम से पढ़िेए...लेकिन यह बात मुझे नापसंद है कि किसी के घरेलू पुस्तकालय से कोई किताब उठा लाओ...फिर उसे न पढ़ो और न लौटाओ....और बस कुछ वक्त के बाद जब वह ढूंढने पर भी न मिले तो उसे गुम घोषित कर दिया....मुझे इस बात से बहुत नफ़रत है ...

इसलिए मैं वह किताब वहां से पढ़ने के लिए उठा कर लाने की सोच भी नहीं सकता था ..हां, फोटो मैंने बहुत सी ली हैं...शेयर करूंगा ...और देखूंगा कहीं आनलाईन मिली तो ले लूंगा...

इस किताब का शीर्षक था ...काका हाथरसी ..अभिनंदन ग्रंथ ...इस का प्रकाशन वर्ष है ...१९७६ ...आज से पूरे पचास वर्ष पहले छपी थी ..काका जिन का जन्म १९०६ का है, उन्होंने उस वर्ष अपनी आयु के ७० वर्ष पूरे किए थे ...और डा गिरिराजशरण अग्रवाल ने इस ग्रंथ का संपादन किया था ...मैंने जब से यह किताब देखी है, मेरा खयाल है कि इस से बड़ा सम्मान जीते जी किसी का हो ही नहीं सकता...

आखिर क्या देख लिया मैंने इस ग्रंथ में ...पूछिए, क्या नहीं देखा इस में। सब से पहले तो उस ज़माने के समकालीन जाने-माने साहित्यकारों ने काका के बारे में अपने उद्गगार प्रकट किए हैं....पचास के करीब तो होंगे ज़रूर ....और इन में उस दौर के अन्य चोटि के व्यंग्यकार भी शामिल हैं...

तो यह था रुतबा उस दौर में हास्य-व्यंग्य का ..

यह तो जैसे एक ट्रेलर है ...इस ग्र में ४५० पन्ने हैं...

और इस ग्रंथ में है काका की विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के साथ तस्वीरें ..अलग अलग अवसरों पर ...जिन के नीचे लिखा है कि उन्होंने काका को प्रेरित किया कि ऐसे ही हास्य-व्यंग्य से आप देश समाज का मनोरंजन करते रहिए, जन मानस का मार्ग-दर्शन करते रहिेए…

४५० पन्नों के ग्रंथ में इस तरह के पन्नों को तो गिनती में लिया ही नहीं गया ....

इस तरह कि किताब किसी को उस के जीते जी भेंट किये जाना….इस से बड़ा सम्मान हो ही नहीं सकता….उन के बीसियों समकालीन साहित्यकारों ने उन के बारे में अपने विचार लिखे और काका की रचनाएं भी इस में पढ़ने को मिल गईं…जिन को सुन कर हम लोग बचपन में लोट-पोट हो जाया करते थे …वैसे वह हास्य-व्यंग्य का सुनहरा दौर था …फिल्में हों या साहित्य हो या स्टेज हो…आज कल तो हंसने के नाम पर क्या चल रहा है, आप भी तो सब जानते हैं …कोई कुछ ऐसा कह देता है कि जेल की सैर कर आता है, मुकद्मेबाजी शुरु हो जाती है …और वैसे भी टीवी पर जो मशहूर शो आते हैं वे भी कहां देखे जाते हैं…बात बात दूसरों का बेहूदा मज़ाक, फूहड़पना, द्वि-अर्थी संवाद ….कभी यह सब देखने-सुनने को मै आतुर नहीं हुआ ..हां, कभी कभी देख भी लेते हैं …लेकिन ये जो स्टैंड-अप कॉमेडी वाले शो हैं, इन का तो फ्री पास भी मिले तो भी न जा पाऊं….शायद वे अपनी जगह, अपनी उम्र के हिसाब से ठीक ही हैं, हमारे लिए ही उन का सिलेबस अब ऑउट ऑफ सिलेबस हो चुका है …। 

इतने इतने बड़े सम्मान मरने के बाद मिल पाते  हैं. …मुझे खुशी है कि काका का एक ऐसा ही सम्मान पदमश्री उन को १९८५ में मिल गया था …यानि कि इस किताब के छपने के दस बरस बाद और उन के इस दुनिया से जाने से १० साल पहले …(वे १९९५ में स्वर्गलोक सिधार गए)...। 

जीते जीते भी तो लोगों का काम नज़र आ ही जाता होगा….ढूंढ कर उन को तरह तरह के सम्मान मिलने चाहिए….क्योंकि फौजियों को छोड़ कर उन सब लोगों का काम तो जीते जी नज़र आ ही जाता है …ऐसे में उन के मरने के बाद मिलने वाले अवार्ड्स के बारे में मेरे खयाल बहुत अलग हैं…बस मैं इस से आगे कुछ नहीं लिखना चाहता। जीते जी किसी को मिले तो वह उस की गर्मी पा कर चंद बरस और सिर उठा कर जी ले …वरना उस के जाने के बाद ……वही मरणोपरांत वाली उदास कर देने वाली बात ……। लेकिन, हां, फौजियों के लिए …जो अपने देश की रक्षा के लिए या अन्य कारणों से अपने प्राणों की आहूति दे कर वीरगति को प्राप्त करते हैं, उन को तो मरणोपरांत जितना सम्मानित किया जा सके, कम है। वैसे भी जीते जी भी आर्मड-फोर्स के जवानों-अधिकारियों को समय समय पर वीरता पुरस्कारों, विशिष्ठ सेवा पुरस्कारों इत्यादि से नवाज़ा ही जाता है ….उन सब की हौसलाफ़ज़ाई के लिए यह सब क़ाबिलेतारीफ़ है। 

अवार्ड ही नहीं …सभी तरह के सम्मान जैसे किसी रोड़ का नामकरण किसी बडे़ नामे गिरामी कलाकार, नेता, साधु-संयासी  के नाम पर रखना भी उस के जीते जी ही जाना चाहिए …सारा हिसाब किताब एक दम सांसों के चलते चलते चुकता ….वह भी देखे, उसे भी अच्छा लगे……बाद में किस ने देखा …..वैसे भी आज कल तो पुरानी सड़कों के नाम, पुराने शहरों-कसबों तक के नाम बदलने वाला काम भी ट्रेंडिंग है …कम से कम कोई बंदा जीते जी तो फूल कर कुप्पा हो पाए…। 

बस, पोस्ट का यही आशय है कि सारा हिसाब किताब जीते जी हो जाना चाहिए ..वरना पीछे रह जाने वाले अवार्ड लेते हैं और बाद में बड़े अफ़सोस के साथ यह भी कहते हैं कि काश…यह उन के जीते जी उन को मिल गया होता। बहुत सी ऐसी उदाहरणें हैं जिन को जीते जी तो नज़रअंदाज़ किया गया लेकिन मरने के बरसों बाद उन पर तरह तरह के सम्मानों की बौछार की गई ….वैसे तो यह सब भी इतना सीधा सपाट नहीं होता ….क्योकि इस में तरह तरह की राजनीति भी घुस आती है ……

कुछ भी हो दोस्तो, माईं, हमें तो वही बात मुर्दे के मुंह में घी का डिब्बा जबरदस्ती ठूंसने वाली बात बार बार याद आती है …चलिेए, छोड़तेें हैं इस टॉपिक को यहीं पर , पानी को मथने वाली बात है ….काका हाथरसी की लिखी एक बात याद करते हैं…और उस के बाद मेरी एक प्रकाशित कविता……

धार्मिक शिकारी ..

बहुत सुन चुके काव्य अलौकिक, 

कुछ लौकिक आनंद लीजिए। 

छंद छंद कर ‘काका’ कवि से , 

कलियुग के छलछंद सीखिए। 

दलबंदी के पुष्प संजोकर, 

चाटुकारिता का घिस चंदन। 

दंभ-द्वेष का दीप दिखाकर, 

करते रहो प्रभु का बंदन। 

सदाचार की बानी बोलें, 

ऐसे त्यागी तोते पालो।

“रिश्वत लेना महापाप है”

फाटक के ऊपर लिखवा लो। 

(क्रमश:)





ऐसा होता था हास्य-व्यंग्य भी उस दौर की फिल्मों में ....आज भी बार बार देखते हैं, हर बार हंसते हैं....