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| बिल्कुल सही कह रहा है यह .....आज कल नीट से ज़्यादा बास आ रही है ... |
डाक्टर बनने के लिए दाखिला....जैसे ही मैंने साठ के दशक में होश संभाला, मैंने यही महसूस किया कि इस दुनिया में बनने के लिए एक-दो ही चीज़ें है ...डाक्टर या इंजीनियर या प्रोफैसर। जो यह नहीं बन पाता या बन पाती, उस की ज़िदंगी बरबाद हो जाती है ...हम लोग इसी माहौल में पैदा हुए...
बड़ा भाई मुझ से आठ साल बड़ा था...जब तक मैंने होश संभाला वह दसवीं कक्षा में पहुंच चुका था ...बहुत ज़हीन...उस ज़माने में उसने मैट्रिक की बोर्ड परीक्षा में 75 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे ...1971 का साल...बस, फिर उसने दो साल और पढ़ना था और उस का मेडीकल कॉलेज में दाखिला हो जाना है ...यही प्लानिंग थी...उन दो वर्षों में उसे रोज़ रोज़ अच्छे से पढ़ने के लिए कहा जाता....परेशान हो गया होगा...घर से थोड़ा बाहर अपने दोस्तोें के साथ थोड़ा टहलने भी जाता तो घर में सब परेशान हो जाते कि पढ़ने कम लगा है ...खैर, इस के आगे और क्या लिखूं ?....बस इस सब का रिज़ल्ट यह निकला कि १९७३ में गुरुनानक विश्वविद्यालय की प्री-मैडीकल परीक्षा में (जिसे आजकल प्लस-२ कहते हैं) उस के ६२.५ प्रतिशत अंक आए....उन दिनों मेडीकल कालेज में दाखिला इन्हीं नंबरों के आधार पर होता था ...मुझे अच्छे से याद है ६४ प्रतिशत नंबर हासिल करने वाले का दाखिला हो गया और भाई की गाड़ी छूट गई...
गाड़ी क्या छूट गई ...घर में मातम छा गया...बीडीएस का नाम तक न सुना था किसी ने घर मेें कि वह भी कोई कोर्स होता है ...इसलिए उस का तो क्या पता करते। उन दिनों लुधियाना के सीएमसी और डीएमसी में दस हज़ार रुपए या उस से थोड़ा ज़्यादा डोनेशन (जिसे बाद में कैपीटेशन कहा जाने लगा) देकर दाखिला मिल जाता था ...पिता जी ने भी कोशिश की ...दाखिले की नहीं, इतनी रकम का जुगाड़ करने की ...लेकिन नहीं हो सका।
बीच में एक बात याद आ रही है ....
उन्हीं दिनों एक ५० बरस की उम्र की एक महिला डाक्टर अकसर पारिवारिक समारोहों में दिख जातीं....वह मेरे फूफा जी की बड़ी बहन थीं और आज़ादी के बाद जब लाहौर से बदल कर अमृतसर में सरकारी मेडीकल कालेज शुरु हुआ तो वह पहले या दूसरे बैच की अपने बैच की अकेली एमबीबीएस की छात्रा थीं...अमृतसर के मॉडल टाउन में वह लोग रहते थे और बहुत हंस हंस कर सुनाया करती थीं कि जब वह साईकिल पर मेडीकल कालेज की तरफ़ जा रही होती तो लोग अकसर कह देते .......वह देखो कलयुग जा रहा है। और इस तरह के किस्से सुनाते सुनाते वह खूब हंसती थीं....बड़ी खुशमिज़ाज औरत थीं...अकसर मैंने देखा कि मेरी मां को खाने-पीने के बारे में कुछ बातें समझाया करती थीं ...और बात इतनी साफ़ करती थीं कि एक बार जब मेरे फूफा जी हमारे यहां आए तो जाते वक्त मेरी मां को अलग से कह कर गईं कि उस की चादर और तकिये का कवर अलग से गर्म पानी में ज़रूर धो लेना (फूफा जी को कोई चमड़ी रोग था...) ....
मेरे फूफा जी की बहन की शादी भी एक डाक्टर से हुई थी और उन के ससुर भी अविभाजित पंजाब में एक नामचीन डाक्टर थे ....इस डाक्टर दंपति के शायद पांच-छः बच्चे थे ....सभी डाक्टर ...जो सीधे सीधे अपनी मेरिट के आधार पर बन गए, सो बन गए ...लेकिन जो नहीं बन सके ...उन को डोनेशन के जादू से देश के विभिन्न हिस्सों से एमबीबीएस करवा ली गई....
उन दिनों (साठ-सत्तर के दशक) में इस तरह से डोनेशन देकर मेडीकल दाखिला लेना कोई बड़ी बात नहीं थी...पैसा फैंकों तमाशा देखो वाली बात ....उस के बाद उन सब बच्चों ने अलग अलग स्पैशलिटी में पीजी भी कर ली....पैंचो कान पक गए थे यार यह सुन सुन कि उस घर में ४९ डाक्टर हैं....जब भी रिश्तेदार एक जगह इक्ट्ठे होते (पहले यह इक्ट्ठा होने के मौके भी कुछ ज़्यादा ही होते थे ....अब तो लोग ......चलो, छोड़ो)....तो वही गिनती ....यह डाक्टर दंपति, उन के चार लड़के डाक्टर, उन की बहुएं डाक्टर ....और आगे उन के बच्चे भी डाक्टरी कर रहे थे या कर चुके थे ....पूरी प्लॉनिंग के साथ ...उन के घर में सारी स्पैशलिटी थीं .....कितने कहा मैंने ४९ डाक्टर .....फिर १९८० के दशक के बाद की कोई गिनती मेेरे पास नहीं है, लेकिन उन के अस्पतालों की लिस्ट बहुत बड़ी है ....(अस्पतालों के नाम और शहर मैं नहीं लिखना चाहता...)
चलिए, भाई के बारे में आगे बताता हूं....उसने बीएससी में दाखिला ले लिया ....प्री-मैडीकल के अपने नंबरों के स्कोर को सुधारने का भी एक विकल्प तो होता था ..लेकिन हम लोग इतने चुस्त-दुरुस्त नहीं थे ..खैर, बीेएससी करते करते यह बात सामने आ गई कि अगर बीएससी में फर्स्ट डिवीज़न आ जाए तो उस का चार प्रतिशत का वेटेज मिलेगा ...यानि ६२.५ में चार प्रतिशत जमा हो कर ६६.५ प्रतिशत हो जाएंगे ....फर्स्ट लेना उस के बाएं हाथ का खेल था ..लेकिन इतना तो मुझे भी याद है कि वह घर में आकर बिल्कुल नहीं पढ़ता था ...और वही हुआ जिस का डर था ...कुछ ही अंकों से वह फर्स्ट डिवीज़न न ले पाया........एक बार फिर घर में मातम का माहौल पसर गया ....पैंचो घर में दूसरे लोगों के लिए भी कितना स्ट्रैस होता होगा .....मैं उन दिनों यही पांचवी-छठी में पढ़ता था ...पास ही के डीएवी स्कूल में।
प्री-मैडीकल के अंकों के आधार पर ही सभी दाखिले .....
यह वह दौर था जब प्री-मैडीकल के अंकों के आधार पर ही मैडीकल और इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिले हो जाते थे ....मैं पूरी जिम्मेदारी से यह लिख रहा हूं कि उस वक्त भी ज़हीन से ज़हीन छात्र थे ...जिन का दाखिला मेरिट के आधार पर होता होगा ...ज़रूर होता होगा ...होता होगा क्या? ....होता ही था....लेकिन वह सिस्टम भी निम्नलिखित कारणों से सड़ा हुआ था ....फिर से लिख रहा हूं कि होशियार छात्रों का मेरिट के आधार पर दाखिला होता होगा लेकिन उस बीमार सिस्टम की वजह से जो छात्र मेडीकल या इंजीनियरिंग में दाखिला नहीं भी लेने के योग्य थे, वे भी किसी तरह से घुस जाते थे ....उन के दाखिले के पीछे नीचे लिखे गोरख-धंधे शामिल थे .....
ट्यूशन पढ़ो और आगे बढ़ो.....यह सत्तर का दौर ऐसा था कि जब छात्रों में प्री-मैडीकल की पढ़ाई के दौरान अपने कालेज के फ़िज़िक्स, कैमिस्ट्री वाले प्रोफैसर से ट्यूशन लेने का चलन ज़ोरों पर था ....फिर ये प्रोफैसर इन छात्रों की इंटर्नल एसैसमैंट बढ़िया भिजवाते और प्रैक्टीकल में भी बहुत अच्छे नंबर लगवा देते....
आप देखिए...प्री-मैडीकल की परीक्षा के आधार पर आप का दाखिला आगे होना था ...साठ नंबर की थ्यूरी, ३० नंबर का प्रैक्टीकल और १० नंबर की इंटर्नल एसैसमैंट --- जो भी प्रैक्टीकल एग्ज़ाम के लिए बाहर से प्रोफैसर आता...वह कहने को ही वहां पर होता क्योंकि इन तीस नंबरों में इंटर्नल प्रोफैसर की ही चलती ....(और यह रेसिप्रोकल अरेंजमैंट होता ...जब यह एक्सटर्नल बन कर बाहर जाता, तब यह भी वहां पर किसी सैटिंग को चेंज करने की कोशिश न करता).....इसी चक्कर में ट्यूशन पढ़ने वाले छात्रों के, शहर में किसी भी तरह का रसूख रखने वाले लोगों के बच्चों के, शहर के नामचीन डाक्टरों, प्रोफैसरों आदि के बेटी-बेटों को इन चालीस अंकों में से कितने मिल जाते होंगे......आप कल्पना करिए, मैं आगे चलता हूं....
बाकी रह गए , साठ अंक .....आज अगर दुनिया इतनी शातिर है, तकनीक इतनी उन्नत है, तब भी नीट का यह हाल है तो उस दौर में बाकी साठ अंकों वाले थ्यूरी पेपर की क्वेश्चन पेपर की सेटिंग या पेपर की चेकिंग में सब कुछ ठीक से चलता होगा, इस के बारे में तो हम ने सोचा ही नहीं। चलिए, अगर सब ठीक भी होता हो तो भी जिसे चालीस में से ३८ मिल गए ....उस का तो स्टार्टिंग प्वाईंट ही आगे हो गया....बढ़िया .......
इस तरह की धांधलीयां इस सड़े-गले सिस्टम में थीं ....रसूख वाले, रुतबे वाले अकसर प्री-मैडीकल की परीक्षा में अच्छे नंबर पा लेते थे .....(फिर से लिख रहा हूं कि अपने बलबूते पर अपनी काबिलियत पर अच्छे नंबर पा लेने वाले भी थे ...ज़रुर थे ..बेशक थे ..) लेकिन यह वाली धांधली भी पक्के तौर पर थी .....।
चलिए, बात थोड़ी बोरिंग सी हो गई है .....एक दो डाक्टरों के बारे में और लिखें.....
एक तो डाक्टर साहब से मेरे मां के चाचा जी ..जिन्होंने साठ के दशक में श्रीनगर से एमबीबीएस की डिग्री ली ...फिर उन दिनों कोई स्टेट अपने छात्र बाहर भी पीजी के लिए भेज देती थी, उन को पीजीआई चंड़ीगढ़ में न्यूरोसर्जरी में सीट मिल गई ...कोर्स करने के बाद वह बहुत बड़े न्यूरोसर्जन बन गए, फोरन कैनेडा चले गए....जब भी उन को देखा बहुत संजीदा ही देखा...कम बोलते थे ...और मेडीकल की पढा़ई से डर पैदा करते थे ...एक बार मेरे भाई को भी उन्होंने कहा था जब वह प्री-मैडीकल में पढ़ रहा था ..कि मेडीकल में दाखिला इतना आसान नहीं होता.......बात कितनी भी छोटी क्यों न हो, लेकिन जिस लहज़े में कही जाए, उस का मतलब वैसा ही निकाला जाता है.....। वही बात किसी को मायूस कर देती है और वही बात एक आम सी बात समझ कर आई-गई हो जाती है.....सब अंदाज़-ए-ब्यां का खेल है।
डाक्टर नं...३ ...चलिए अपने रिश्तेदार डाक्टर नं ३ से मिलवाते हैं....१९६० का दशक...पढ़ने में औसत....लेकिन उन के पापा जी के दिल की हसरत कि काके को डाक्टर ही बनाना है । ले दी एडमिशन ...ओस्मानिया यूनिवर्सिटी हैदराबाद में ...कईं सालों की रगड़ाई के बाद ...शायद सात-आठ साल बाद
डाक्टर की डिग्री मिल गई और इस के साथ ही दिल्ली में किसी एम्बैसी के साथ जुड़ गए। जिस देश की वह एम्बैसी थी, वहां पर जिसे भी अगर जाना होता तो उन के मेडीकल की औपचारिकता वह ही करते ....सप्ताह में एक दो दिन तो पूर व्यस्त रहते ....सोमवार और शायद एक दिन और था ...इन दिनों उन के पास हर दिन २० लोग मेडीकल फिटनेस लेने आते ....जो हमने सुना उन दिनों १९७० के दशक में हर व्यक्ति का मेडीकल करने के लिए उन को पांच सौ रुपए मिलते थे ....। इस के आगे अगर कुछ लिखूंगा तो लक्ष्मण रेखा लांघने जैसा होगा....याद सब कुछ है ....ईश्वर की कृपा से ..लेकिन लिखना उतना ही मुनासिब है जितना विषय की ज़रूरत है ....)
यह जो मैंने ऊपर सिस्टम के बारे में लिखा है कि सब कुछ प्री-मैडीकल के अंकों के आधार पर ही चलता था ...और पंजाब की बात करूं तो यह व्यवस्था १९७९ तक चलती रही.......दूसरे प्रांतों का मुझे कुछ पता नहीं ...लेकिन पंजाब में १९७९ के बाद क्या हुआ......इंतज़ार कीजिए अगली पोस्ट में पढ़ने के लिए ....जिस में आप यह भी पढ़ेंगे कि डेंटल कॉलेज में मेरी एंट्री कैसे हुई .....😄..
फिलहाल यह एक बढ़िया सा गीत सुनिए....बेचारा दिल क्या करे...सावन जले, भादों जले.....

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