दो चार दिन पहले मेैं यू-ट्यूब पर पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के किसी गांव में किसी हलवाई द्वारा बर्फी बनाने की व्हीडियो देख रहा था ....एक बहुत बड़ी लोहे की कड़ाही में दूध के उबालने से सुबह शुरु हुई कईं घंटे चलने के बाद यह तपस्या शाम होते होते खत्म हुई...वह बता रहा था कि खालिस बर्फी इसी तरह से बनती है ...और अगर चालू किस्म की बर्फी बनानी है, वह तो दिन में तीन बार भी बन रही है।
मुझे उस हलवाई की बात पर पूरा यकीन है ...क्योंकि हम भी बचपन में आज से 50-55 साल पहले इस तरह के बर्फी तैयार होने के मंज़र के चश्मदीद गवाह रहे हैं...1970 के कुछ वर्ष इधर और कुछ उधर ....उन दिनों मुझे ऐसा ही एक हलवाई याद आता है ...अमृतसर के हरीपुरे में उस की दुकान थी ....उस के साथ ही एक नाई की दुकान थी ...जहां पर मैं अकसर शाम के वक्त अपने पिता जी के साथ अपनी हजामत करवाने जाता था ....उस्तरा और मशीन उस की ऐसी थी जैसे की बाल काट न रहा हो, नोंच रहा हो .....कईं जगह से चमड़ी कट जाती थी और उस के ऊपर उन के ऊपर उसने फिटकड़ी भी ज़रुर लगानी होती थी ...कटे पर नमक छिड़कने वाली बात बिल्कुल ....मैं ज़ोर ज़ोर से रोने लगता....पचास पैसे में हजामत हो जाती थी ...यह भी मुझे याद है ...
मुझे शांत करने के लिए उसी वक्त मेरे पिता जी मुझे उस हलवाई की दुकान पर ले जाते ...उस वक्त उस की बनाई हुई ताज़ी ताज़ी बर्फी ट्रे में पड़ी होती। मुझे भी एक लिफाफे में बर्फी दिलवा दी जाती ....छोटे छोटे हाथों में 50-100 ग्राम बर्फी का लिफाफा भी बहुत बड़ा जान पड़ता है ....बस, उस बर्फी के एक टुकड़े को मुंह में डालते ही मैं रोना-धोना भूल जाता ....और यह बर्फी 75 पैसे की या 1 रुपए की हुआ करती थी....
हां, तो मैं अमृतसर के उस हलवाई की बात कर रहा हूं ....वह कईं घंटों तक कोयले की भट्ठी पर एक बहुत बड़़ी कड़ाही में दूध डाल कर उस को उबालते वक्त एक लंबा सा कड़छा लगातार चलाता रहता....यह ज़रूरी थी, वरना दूध जल सकता है। आज सोचता हूं कि उस वक्त लोगों में सब्र कितना होता था ...वह एक बुज़ुर्ग था जिसने सफेद धोती, कमीज़ पहनी होती और सिर पर एक ढीली-ढाली पगड़ी रखी होती थी....लेकिन जब भी वह दिखा, मुस्कुराता ही दिखा ....हर तरफ़ के नज़ारे देखता हुआ....
हां, मैं जब यह 55-60 साल पुरानी बातें लिख रहा हूं तो पूरे विश्वास से यह भी लिख रहा हूं कि उन दिनों सभी हलवाई की दुकानों पर ही बर्फी इस तरह से बनती थी ...कोई शार्ट-कट नहीं था, मिलावट का नामोनिशां न था...लोगों में सब्र था ...
वाली जिस बर्फी की मैं बात लिख रहा हूं वह ऐसी थी कि जैसे मुंह में रखते ही घुल जाती थी और उस का ज़ायका ...उस से निकलने वाली खुशबू...और बड़ी इलायची की महक ..वाह, क्या खूब....वैसे बचपन वाली बर्फी कभी फिर नहीं मिली ....न ही कभी मिल सकती है और न ही कभी मिलेगी....वे दिन ही लद गए...और उन के साथ वे लोग भी ...
शादी ब्याह में हलवाई बर्फी तैयार करते थे ....
मुझे याद है मेरे ताऊ जी की बेटी की शादी थी हरियाणा में ...जब हम लोग वहां पहुंचे तो हलवाई तरह तरह की मिठाईयां बना रहे थे ..यह भी 1970 के आस पास की बात है ....क्या बना रहे थे हलवाई...मठ्ठीयां, शक्कर पारे, गुड़पारे, बूंदी, बूंदी के लड़्डू और बर्फी ....और हमने देखा कि तीन चार चारपाईयों पर साफ सुथरा कोई कपड़ा डाल कर ये ताज़ी ताज़ी तैयार हुई मिठाईयां पड़ी हैं....हमें सिर्फ लड्डूओं और बर्फी में रूचि थी ...और हम जितने भी बच्चे थे खेलते खेलते उन चारपाईयों से जितनी बर्फी और लड़्डू लपेट सकते थे, लपेटते रहे ....न किसी ने कभी रोका, न टोका...। और वह बर्फी भी बहुत लज़ीज....रंग बिरंगी ...चाकलेट का हमने तो नाम नहीं सुना था ..लेकिन कोई कोई बर्फी का टुकड़ा भूरे रंग का भी होता था .....इस बर्फी-लड्डू के चक्कर में भी उन दिनों शादी ब्याह में जाने का इंतज़ार रहता था ...
जहां तक मुझे याद है कुछ ही बरसों बाद शादीयों में यह बर्फी तैयार होना बंद हो गई ...शायद उस के बाद जिन शादियों में मेरा जाना हुआ, वहीं पर बंद हुआ होगा ...लेकिन फिर भी शादी के घरों में हलवाई आ कर बर्फी के इलावा बाकी सब चीज़ें जैसे मठ्ठीयां, बूंदी, लड्डू और शक्कर पारे तो तैयार करते ही थे ...बस,बर्फी नहीं तो न सही, क्या करते ...हम बूंदी, लड्डू पर ही मौज करते रहते ....
बर्फी के दाम ....
मैं जिस पाकिस्तानी व्हीडियो की बात कर रहा था ...जिस में बर्फी तैयार हो रही थी ....मैंने वह पूरी देखी तो समझ में आया कि बीस किलो बढ़िया दूध से चार किलो खोया तैयार होता है ..और उसमें चार किलो चीनी पड़ती है ...इस का मतलब यह कि बीस किलो दूध से आठ किलो बर्फी तैयार हो जाती है ....
पहले भी मैंने लिखा है कि आज से 50-60 साल पहले तक बर्फी इसी तरह से तैयार होती थी ....जैसे कि इस व्हीडियो में दिखाया गया है ....किसी मेहमान के आने पर भी समोसे-जलेबी,बर्फी ले कर आते ही थे ...कितनी? ...यही कोई एक पाव किलो ...लेकिन मज़ा आ जाता था उन दिनों एक दो टुकड़ी बर्फी खाने के बाद भी ....
बर्फी मैं अभी भी कभी कभी खा लेता हू्ं....मुझे विश्वास होते हुए भी अब वह पहले जैसी शुद्ध बर्फी नहीं है, फिर भी खा लेता हूं....ढीठ हूं ...अब मैंने बर्फी के ऊपर यह सब आज क्यों लिख दिया ....क्योंकि असल बात तो अभी लिखनी है ....
पता नहीं आप क्या सोचते होंगे आज कल जो बर्फी मिल रही है ...ब्रांडेड हो या किसी खानदानी हलवाई की दुकान से मिल रही हो ....दूध से और पुरानी प्रक्रिया से होकर तो बनने से रही .........
इसलिए मैंने वह व्हीडियो देख कर गूगल से पूछा कि एक किलो बर्फी तैयार करने के लिए कितना दूध लगता है? ...बिल्कुल सही बताया उसने कि चार-पांच किलो दूध से एक किलो खोया तैयार होता है....
लेकिन मज़े की बात यह कि उस सर्च के नतीजों में नीचे यह भी लिखा हुआ था ......
शार्ट-कट्स ....
हम आज कल जो भी बर्फी खा रहे हैं वह इन शार्ट-कट्स से तैयार हो रही है ....क्योंकि दूध को उबालने के चक्कर में कईं घंटे लग जाते हैं...आज की आधुनिक रैसिपी यही है कि ७५० ग्राम खोया लेकर उस में शक्कर मिलाओ, कुछ खुशबू मिलाओ और एक किलो बर्फी तैयार.....(खोये की मिलावट और नकलीपन की कितनी खबरों से अखबारें भरी रहती हैं...., बस इस का ज़रा ख्याल कर लें...)...
मिल्क पावडर से तैयार होने वाली बर्फी ....यह तो इंस्टैंट बर्फी की रेसिपी है ....ढाई कप फुल क्रीम मिल्क पावडर में एक कप लिक्विड मिल्क डालने से १०-१५ मिनट में एक किलो बर्फी तैयार हो जाती है.....मैं ऐसा समझता हूं कि आज कल जितनी भी बर्फी ज़्यादातर बाज़ार में बिक रही है ...ब्रांडेड हो या किसी पुराने हलवाई की दुकान पर ....सब इतनी ही आसानी से बन रही है .....अगर मेरा अंदाज़ा गलत है तो नीचे कमैंट में लिखिए...........और हां, अगर मिल्क पावडर से ही तैयार हुई बर्फी हम खा रहे हैं तो क्या हम उस की शुद्धता के बारे में आश्वस्त हैं? ....मैं तो कभी नहीं होता .....यह पावडर भी तो दूध ही से बनता है ......कहां से आता है इतना दूध ...कहां से कहां पर तैयार होता है इतना मिल्क पावडर की यह अन-ब्रांडेड भी खुले आम बिक रहा है ......
अपनी अपनी राय है ....मैं तो दूध और दूध से तैयार हुई चीज़ों की शुद्धता को संदेह की निगाह से ही देखता हूं और देखता रहूंगा.....इसलिए जितना कम हो, मिल्क और उस से तैयार चीज़ों को बहुत कम ही खाता हूं ....सिर्फ़ नाम-मात्र के लिए ही कभी खा लेता हूं , लेकिन वह भी खाना नहीं चाहता..........लेकिन इस अहसास के साथ कि यह सब कितना शुद्ध , कितना अशुद्ध है, कितना मिलावटी कितना नकली है .....और हां, किसी को यह सलाह नहीं देता कि तुम लोग भी न खाओ....खुद ही पता करो और अपने खाने-पीने के फैसले भी खुद करो....
बर्फी वर्फी की तो बातें हो गई जितने मन में थी, अब वक्त है बर्फी फिल्म के इस बढ़िया से गीत को सुनने का ....इत्ती सी खुशी ....इत्ती सी हंसी....

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