मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

दो रंग दुनिया के ...और जीने के दो रास्ते

श्री लाल शुक्ल का एक मशहूर नावल राग दरबारी पढ़ रहा था ..कुछ कुछ रचनाएं जब पढ़ते हैं तो कुछ बातें जैसे दिल में बस जाती हैं...उस नावल में एक वाक्या है पुलिस अधिकारी और उन के चपरासी किसी सड़क पर नाके बंदी किए हुए हैं...ट्रक रोक रहे हैं..और ड्राईवरों के साथ पूछताछ के सिलसिले में श्रीलाल शुक्ल लिखते हैं ...अफसरनुमा चपरासी, और चपरासी नुमा अफसर....बड़ा मज़ा आया उसे पढ़ कर ...मैं उस को इतने अच्छे से लिख कर ब्यां नही ंकर पाया...देखता हूं अगर यह नावल कहीं सामने ही रखा होगा तो उस पेज की एक फोटो शेयर करूंगा...चपरासी जिस रूआब से बात कर रहे थे, अफसरान उतनी ही दबी आवाज़ में पूछताछ कर रहे थे ...खैर, यह बात मैंने इसलिए कही कि हम कुछ हैं, कोई भी तीसमार खां हैं या नहीं हैं, यह सब पता भी तो लगना चाहिए...लेकिन बहुत बार पता लग ही नहीं पाता...

जिस तरह से पढ़े-लिखे और अनपढ़ में भी कईं बार फ़र्क करना भारी गिरता है.....आप को किस ने कहा कि जाहिल लगने के लिए अनपढ़ होना भी ज़रुरी है ..हम बिना किसी मेहनत-मशक्कत के पढ़े लिखे होते हुए भी अपने जाहिल होने का प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं ...बस, कुछ खास करना नहीं है, बस खांसते और छींकते वक्त पास खड़े और बैठे किसी बंदे का ख्याल नहीं करना है, जितनी ज़ोर से छींक या खांस सकते हैं उस से भी ज़्यादा ज़ोर लगाइए ताकि फेफड़ों की गहराई तक बिल्कुल अंदर तक कुछ बचा न रह जाए....बस, इतना भर कर लेने से ही हमारे आसपास के लोग हमारे बारे में बिना कुछ कहे ही जान लेते हैं....और अगर कहीं नाक में अंगुली घुसा तो फिर तो कहने ही क्या....जाहिलता का पक्का ठोस प्रमाण, आधार कार्ड से भी ज़्यादा पुख्ता, आस पास खड़े-बैठे लोगों में बंट गया...


दुविधा अब यह है मेरे लिए कि सार्वजनिक जगहों पर मैं मॉस्क पहनूं या न पहनूं....क्योंकि मेरे साथ लगभग हर बार ऐसा होता ही है कि जब भी मैंने मॉस्क नहीं पहना होता तो सामने से कोई न कोई मेरे मुंह के ऊपर छींक देता है या खांस देता है ...सच बताऊं, इस कोरोना वरोना ने इतना डरा दिया है कि उस की छींक या खांसी की बौछार किसी ए.के-47 से निकली बौछार से कम नहीं लगती। एक बात और भी तो है कि हर खांसी या छींक की बौछार जो हमारे मुंह तक पहुंच रही है वह हरेक तो कोरोना या टीबी के कीटाणुओं से लैस नहीं है, लेकिन फिर भी डर तो लगता ही है ...मैडीकल साईंटिस्ट कहां सब कुछ जान गए हैं ...कितने रहस्य तो अभी तो प्रकृति ने अभी भी छिपा कर ही रखे हुए हैं ...नहीं तो क्या आप को लगता है हम चुप बैठे रहते, हम कुदरत से और पंग करने लगते ....रब से छेड़खानी करने लगते ...सिर्फ छेड़खानी ही होती तो भी रब सब्र कर लेता लेकिन हम तो रब के साथ वह करने लगते जैसे पंजाबी में लोग एक बात कहते हैं जो लिखने लायक है नहीं ..अगर तो आप ख़ालिस पंजाबी हैं तो समझ जाएंगे, वरना आप को इसे समझने की ज़रूरत ही क्या है, क्यों बेकार के पचड़े में पढ़ रहे है...

हां, आज कल इतनी उमस है कि अगर मॉस्क पहने रहते हैं तो दम घुटने लगता है ..सच में, पसीना, घुटन और पता नहीं क्या क्या। और बिना मॉस्क पहन कर निकलने का हाल तो मैंने ऊपर लिख ही दिया है ... जब पास ही कोई छींक-खांस देता है तो मेरा तो सिर फटने लगता है ...यह तो है अपने सब्र का थैशहोल्ड 😎....इसलिए अभी तक यही असमंजस में हूं कि बाहर निकलते वक्त मॉस्क पहन लिया करूं या अब इसे दूर कहीं फैंक के छुट्टी करूं...

वैसे भी मैं सोच रहा था कि हमारी ज़िंदगी दुविधाओ से भरी होती है ..हर दिन हम कितनी बार दुविधा में होते है, हमें एक रास्ता चुनना होता है ...दुविधा लफ़्ज़ से अच्छा शब्द है दो रास्ते ...हमें दिन में कईं बार एक रास्ता चुनना ही होता है ...अब वह रास्ता हमने सही चुना या गलत...घटिया या बढ़िया...ये सब अपनी अपनी राय है ...लेकिन यह हकीकत तो है कि दिन भर के ये छोटे छोटे फैसले ही हमारी तकदीर बनाते हैं या बिगाड़ते हैं....वैसे यह बात इतनी सीरियस्ली भी लेने वाली है नहीं ..कभी ऐसा नहीं देखा कि अच्छे, बडे़ तर्कसंगत फैसले लेने वाला 150 साल तक जी लिया और घटिया फ़ैसले लेने वाले जवानी ही में लुढक गया...बस, इसे आप तक़दीर कहिए या तदबीर ...लेकिन दिन में हमें रास्ते तो दो दिखते ही हैं हर मोड़ पर ...यही है ज़िंदगी। 

कल मैं हजामत करवाने निकला...रात का वक्त था...जिस भी शहर में रहते हैं वहां एक नाई चुन लेते हैं और उस का भी कोई एक कारीगर ...हजामत करवानी है तो उसी से ..अगर वह नहीं होता तो वापिस लौट आते हैं ...कल भी ऐसा ही हुआ, नाई की दुकान बंद ...ये जो मैं लिख रहा हूं न हजामत, नाई, नाई की दुकान ...इन सब अल्फ़ाज़ में बाल कटवाने की पूरी रस्म है ....इन्हें पढ़ने ही से लग रहा है कि हां, हजामत करवाना भी कुछ अच्छी बात है ...बचपन में हम हजामत ही कहते थे, फिर थोड़ा पढ़ गए और अंग्रेज़ी सीख गए तो कटिंग कहने लगे ..फिर हेयर-ड्रेसर के पास जा रहे हैं, यह कह कर निकलने लगे ....

अच्छा, नाई की दुकान बंद थी...तो मैंने सोचा इतनी दूर आया हं यहां पर एक सर्कुलेटिंग लाईब्रेरी है ...बहुत पुरानी दुकान है, चलिए वहां ही जाया जाए। पूछता, ढूंढता मैं पहुंच गया जी उस दुकान पर...बहुत ही अच्छा लगा...जो बंदा वहां बैठा हुआ था, यह उन के पिता जी के वक्त की दुकान है ...65 साल पुरानी ...बता रहे थे कि दुकान अपनी है, इसलिए बैठे हुए हैं ...वरना तो घर का खर्च निकालना ही मुश्किल हो जाए...हज़ारों किताबें ठूंसी पड़ी हैं, और हज़ारों ही सीडी, डीवीडी ...किताबों से इतनी ठसाठस भरी दुकान देख कर मेरा तो सिर भारी हो गया...लेकिन मेरा वहां से बाहर आने का मन ही नहीं कर रहा था ..दस-पंद्रह मिनट वहां बिताए...और आते वक्त बिना किसी ज़रूरत के भी 200 रूपये की किताबें खरीद लीं...वह बंदा बता रहा था कि उन की मैंबरशिप है ..300 रूपये महीना ...जितनी मर्ज़ी किताबें कोई ले जाए रोज़ और महीने में जितनी चाहे किताबें पढ़ ले...हिंदी की किताबें तो सौ-पचास ही थीं, मराठी और गुजराती की किताबें तो फिर भी थीं ....और अधिकतर 90 फीसदी किताबें इंगलिश की थीं...मैं उस से 50-60साल पुुराना इल्सट्रेटेड वीकली, धर्मयुग और फिल्मफेयर मांग रहा था, उसने नंबर ले लिया है, फोन करेगा...वैसे इन की एक एक कापी तो मैंने खरीदी हुई है ...


हां, इस बंदे के सामने भी दो रास्ते हैं...कह रहा था कि सोच रहे हैं कि उसे थोड़ी मॉड लुक दे कर ..अब सी.डी निकाल दें, और यहां पर स्नेक्स के साथ किताबें पढ़ने के लिए जगह बना दें...जैसा कि आज कल ट्रेंड चल रहा है ..फिर कहने लगा कि वहां पर भी खाने-पीने पर ज़्यादा फोकस रहता है ...उस के मन में भी दुविधा ही चल रही है, ऐसा मुझे लगा ..इस काम को कैसे आगे ले जाएं....वैसे बंदा कुछ इमोशनल सा ही था जिसे पिता जी धरोहर से भी मोहब्बत तो बहुत थी लेकिन आगे ज़माने के साथ चलने की मजबूरी थी ...बता रहा था कि दूसरे शहरों से भी लोग, बडे़ बड़े अधिकारी उन के बच्चे, दूसरे देशों के भी लोग आते हैं ..उन के लिए लाइब्रेरी के नियम अलग हैं, वे एक महीने तक भी किताबें रख सकते हैं....

वहां खड़े खड़े मुझे अच्छा तो लग रहा था ...लेकिन किताबों की इतनी भीड़ में मेरा सिर दुख गया...जो घर पहुंचने के बाद भी...सोने तक दुखता ही रहा ...हर इंसान के सामने दो रास्ते हैं ...उसे अपनी समझ, अपनी तजुर्बे, अपनी ज़रूरत, अपनी तकदीर के मुताबिक एक रास्ता तो सुनना ही होता है...


आज सुबह मैं सैर करने निकला तो मुझे दो रास्ते फिल्म याद आ गई...स्टोरी तो पुरी याद नहीं लेकिन फि्लम बहुत अच्छी थी...अभी मैं मोबाईल पर इस फिल्म का गीत सुन ही रहा था कि सामने वह जगह दिख गई जहां इस फिल्म के हीरो राजेन खन्ना का बंगला आर्शीवाद हुआ करता था ...अब तो वहां पर आलीशान बिल्डींग बन चुकी है ...



यह दिल है मेरा या है इक यादों की अल्मारी ....😎


1 टिप्पणी:

  1. रोचक। वाकई किताब वाले की दुविधा सोचने वाली है। ऑनलाइन डिलिवरी होने के कारण अब ऑफलाइन मार्केट खत्म सा होता जा रहा है। उम्मीद है वो आधुनिकरण करेंगे जगह का।

    जवाब देंहटाएं

इस पोस्ट पर आप के विचार जानने का बेसब्री से इंतज़ार है ...