बुधवार, 13 फ़रवरी 2008

यह फूला हुया गुब्बारा पेट में क्या कर रहा है ?

आप्रेशन के दौरान गलती से पेट में कोई सर्जीकल औजार, छोटा-मोटा तौलिया या कोई गाज़-पीस(पट्टी) की खबरें कभी कभी मीडिया में देखने-सुनने के बाद आप का इस पेट में पड़े हुए गुब्बारे के बारे में इतना उतावलापन भी मुनासिब जान पड़ता है।
                                                


लेकिन यहां पर जिस गुब्बारे की बात की जायेगी वह फूला हुया गुब्बारा तो जान बूझ कर किसी बंदे की भलाई के लिए ही उस के पेट में छोड़ा जाता है......जी हां, बिल्कुल उस के फायदा के लिए ही इसे पेट में पहुंचाया जाता है ताकि उस बंदे का वज़न कम हो सके। अब तो मोटापे को कम करने के लिए गोलियां चल पड़ीं हैं, शरीर के कुछ हिस्सों से वसा को सर्जरी के द्वारा निकाल दिया जाता है (liposuction), और यहां तक कि पेट का आप्रेशन कर के उसे छोटा कर दिया जाता है । शायद अब पेट में बस गुब्बारे छोड़ने की ही कसर बाकी थी।(कहीं वह पेट में चूहे दौड़ने वाली कहावत बदल कर आने वाले समय में बदल कर पेट में गुब्बारे फूट रहे हैं ...ही न हो जाये)... चलिए इस के बारे में थोड़ी जानकारी हासिल करते हैं।
सिलीकॉन के इस पिचके हुए गुब्बारे को मरीज के शरीर में दूरबीन के द्वारा( endoscope) उस के पेट में डाला जाता है, उस के तुरंत बाद इस खाली गुब्बारे में एक कैथीटर( एक तरह की ट्यूब) की मदद से लगभग आधा लिटर नार्मल सेलाइन (जिस में थोड़ी कलर्ड-डाई मैथिलिन ब्लयू मिला दी जाती है) भर दिया जाता है। जब गुब्बारे में वह तरल पदार्थ भर जाता है तो डाक्टर द्वारा उस कैथीटर को बहुत ही आराम से बाहर निकाल लिया जाता है। इस गुब्बारे में एक इस तरह का वॉल्व होता है जो कि स्वयं ही बंद हो जाता है, और यह गुब्बारा पेट में फ्लोट करना शुरू कर देता है। इस सारे काम को करने में 15-20 मिनट का समय लगता है और एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसे चालीस केस बंबई में किए जा चुके हैं जिस पर लगभग सत्तर से नब्बे हज़ार रूपये का खर्च आने की बात कही गई है।
अब प्रश्न जो उठता है वह यही है कि यह पेट में घूम रहा पानी से भरा गुब्बारा आखिर कैसे करेगा बंदे का वज़न कम। दरअसल जब यह गुब्बारा पेट में होता है तो पेट के तीन-चौथाई हिस्से में तो यही चहल-कदमी करता रहता है, ऐसे में मरीज़ पहले से एक-चौथाई खाना खा लेने पर ही संतुष्टि अनुभव कर लेता है। सीधा सा मतलब यही हुया कि यह मरीज को कम खाने में मदद करता है जिस से छःमहीने में उस का वज़न 10-15किलो घट सकता है।
इस गुब्बारे को छःमहीने बाद पेट से दूरबीन की मदद से निकाल दिया जाता है। पेट के अंदर मौजूद एसिड्स इस सिलिकॉन के गुब्बारे को कमज़ोर कर देते हैं जिस के कारण वह कभी भी अंदर लीक हो सकता है। वैसे तो कंपनी की वेब-साइट पर तो यह लिखा है कि ऐसा होने पर यह टायलैट के रास्ते बाहर निकल जाता है लेकिन कईं कईं केस में इस कंडीशन में इस पिचके हुए गुब्बारे को आंतड़ियों से बाहर निकालने के लिए आप्रेशन भी करना पड़ा है।
वैसे तो सामान्य हालात में इस को जब छःमहीने बाद पेट से निकाला जाता है तो दूरबीन की मदद से ही आसानी से निकाल दिया जाता है और इस को बाहर निकालने से पहले इस को पंचर कर दिया जाता है जिस से यह पिचक जाता है और एंडोस्कोप की मदद से आसानी से मुंह के रास्ते बाहर निकाल लिया जाता है।
वैसे तो जब इस गुब्बारे को पेट में छोड़ा जाता है तो मरीज़ को यह अच्छी तरह से समझा दिया जाता है कि अगर आप के पेशाब का रंग कभी भी नीला लगे तो डाक्टर को तुरंत सूचित करें....इस का मतलब यही होता है कि यह गुब्बारा लीक हो गया है और फिर इसे किसी भी समय दूरबीन से निकाल दिया जाता है।
जब इस गुब्बारे को पेट में छोड़ा जाता है तो शुरू शुरू में मरीज़ को एडजस्ट होने में दो-तीन दिन लगते हैं......मरीज़ को शुरू शुरू में थोड़ा उल्टी जैसा लगता है जो कुछ दिन में ठीक हो जाता है। इस के साथ साथ जब तक मरीज़ के पेट में यह गुब्बारा रहता है तब तक पेट में एसिड की मात्रा को कंट्रोल करने के लिए दवाईयां भी लेने पड़ती हैं। और आहार में भी संतुलित के साथ साथ कुछ संयम बरतने को कहा जाता है।
इस विधि द्वारा वज़न कम करने की भी अपनी सीमायें हैं। क्योंकि अगर गुब्बारा पेट से निकालने के बाद अगर खाने-पीने एवं शारीरिक श्रम जैसी महत्त्वपूर्ण बातों की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है तो बंदे का वज़न वापिस बढ़ जाता है। दूसरा यह है कि इस वज़न कम करने वाली विधि का उपयोग कईं बार उन मरीज़ों में किया जाता है जो इतने ही ज्यादा स्थूल हैं कि वे अपनी दिन-चर्या करने में ही असमर्थ हैं और कईं बार तो बहुत ही ज़्यादा वज़न वाले व्यक्तियों को किसी आप्रेशन के लिए तैयार करने से पहले भी इस विधि के द्वारा उनका वज़न कम किया जाता है ताकि उन की सर्जरी सेफ एंड साउंड तरीके से की जा सके---कम से कम उस सर्जरी से संबंधित रिस्क तो कम किये जा सकते हैं।
अब यह तकनीक तो हमारे देश में भी आ ही गई है, लेकिन मैं यही सोचता हूं कि इस गुब्बारे को पेट डलवाने की भी कहीं होड़ सी न लग जाये.....पूरी तरह अच्छी तरह सोच समझ कर , सैकेंड ओपिनियन लेकर ही इस तरह का फैसला लेने में ही समझदारी है। वैसे भी संतुलित आहार, रैगुलर रूटीन एवं नियमित व्यायाम का तो अभी तक कोई विकल्प मिला ही नहीं है।

1 टिप्पणी:

  1. हम तो सोचते थे कि गुब्बारा बच्चों के खेलने की चीज़ है मगर वाह भई वाह ये ते बडे काम की चीज़ निकली ।
    जानकारी के लिये धन्यवाद ।

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