आज सुबह मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ...मैं जिस डिब्बे में चढ़ा वह सामान वाला डिब्बा था ...जहां तक लोग भारी सामान लेकर चढ़ते हैं...वहां बैठने की जगह भी थी ..पांच सात मिनट का सफर था, मैं बैठ गया....इतने में एक रंग बिरंगी बड़ी सी टोकरी लेकर एक आदमी चढ़ा...उसे नीचे टिकाने के बाद वह अपने मोबाइल में मसरूफ हो गया...और मेरा दिमाग यह गुत्थी सुलझाने में लग गया कि यार, यह है क्या, ये खिलौने हैं कैसे.....खैर, एक दो मिनट बीत गए...गुत्थी वुत्थी तो सुलझी नहीं, लेकिन पता नहीं मुझे कहां से बरसों पुराना एक गीत याद आ गया ...आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने ले के आया रे ....मुझे क्या, हमारे वक्त में यह गीत सब को बहुत भाता था..खूब बजा करता था हमारे रेडियो पर ...
शनिवार, 31 दिसंबर 2022
आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने ले के आया रे ...
आज सुबह मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ...मैं जिस डिब्बे में चढ़ा वह सामान वाला डिब्बा था ...जहां तक लोग भारी सामान लेकर चढ़ते हैं...वहां बैठने की जगह भी थी ..पांच सात मिनट का सफर था, मैं बैठ गया....इतने में एक रंग बिरंगी बड़ी सी टोकरी लेकर एक आदमी चढ़ा...उसे नीचे टिकाने के बाद वह अपने मोबाइल में मसरूफ हो गया...और मेरा दिमाग यह गुत्थी सुलझाने में लग गया कि यार, यह है क्या, ये खिलौने हैं कैसे.....खैर, एक दो मिनट बीत गए...गुत्थी वुत्थी तो सुलझी नहीं, लेकिन पता नहीं मुझे कहां से बरसों पुराना एक गीत याद आ गया ...आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने ले के आया रे ....मुझे क्या, हमारे वक्त में यह गीत सब को बहुत भाता था..खूब बजा करता था हमारे रेडियो पर ...
गुरुवार, 29 दिसंबर 2022
वो अटैची का कवर खरीदने वाला दौर ...
मुझे अकसर आस पास के लोग पूछते हैं कि तुम्हें लिखने के आइडिया कैसे आते हैं....उन को मैं सिर्फ एक ही जवाब देता हूं कि यह कोई राकेट साईंस नहीं है...मेरा लिखना तो क्या है, कुछ भी नहीं, लिखने वाले ८-८ मिनट में सुपरहिट गीत लिख गए जो ५० साल बाद भी सुपरहिट हैं...इसलिए यह लिखने विखने का कोई सिलेबस नहीं है, न ही कोई सिखा सकता है...बस इशारा कर सकता है ...मैं तो पिछले ३० बरसों से यही सीखा हूं....१९८८ से २००० तक मुझे यही लगता रहा कि बंदा अपने प्रोफैशन से जुड़ें विषयों पर ही लिख सकता है ...ज्ञान बांट सकता है ...लेकिन २०-२२ बरस पहले मुझे यह पता चला कि लिखने के मौज़ू और भी हैं...दो तीन कोर्सों पर उन दिनों बीस-तीस हज़ार खर्च भी किया...लेकिन कुछ बात समझ में आई नहीं ..
बीस बरस पहले यही लगता था कि मेडीकल विषय पर तो लिखने के लिए २५-३० लेख ही तो हैं, उस के बाद क्या करूंगा....लेकिन आहिस्ता आहिस्ता पांच सात बरस में यह समझ आ गया कि लिखने के बहाने तो अनेकों हैं...विषय भी अपने आस पास बिखरे पड़े हैं, जितने चाहिए उठा लीजिए....बस, उस के लिए एक दो शर्तें हैं...लोगों से जुड़ कर रहना और ज़मीन पर रहना। समझने वाले समझ रहे हैं..। बस, वही आप को लिखने की मौका देते हैं....कईं बार स्टेशनों पर, फुटपाथ पर आते जाते कोई ऐसा शख्स दिख जाता है कि लगता है जैसे यादों की आंधी आ गई हो उसे देखते ही ...
| दादर स्टेशन का पुल ... २८ दिसंबर २०२२ |
कल सुबह भी ऐसा ही हुआ...दादर स्टेशन के पुल पर यह शख्स दिखे ...हाथ में कोई ब्रेंडैड अटैची उठाई हुई जिस पर कवर चढ़ा हुआ था, साथ में एक दो थैले ..हां, थैलों का रूप ज़रूर बदल गया है इधर कुछ बरसों से ...सब से पापुलर ये पानमसाले वाले थैले हैं ...एक थैला ८०-१०० रूपये का आ जाता है...जब हमारी बदली होती है तो हमें भी अपनी किताबों-कापियों-रसालों को ढोने के लिए ये चाहिए होते हैं ..एक बार तो ४०-५० के करीब ये थैले हो गए हमारे सामान के साथ ...और हम लोगों ने पैकर-मूवर के आने से पहले इन्हें अपनी बैठक में रख दिया....मुझे उस दिन इतनी हंसी आई और मैंने इन के साथ फोटू भी खिंचवाई ....मुझे यह मज़ाक सूझ रहा था कि ४० बरस हो गए पान मसाले-गुटखे का इस्तेमाल करने वालों को डांटते हुए, उन का इलाज करते हुए..लेकिन कोई पानमसाले के इतने थैले हमारे घर में देख ले तो उसे यही लगे जैसे कि मैं इन कंपनियों का ब्रॉंड अम्बेसेडर हूं......
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| डेंटल सर्जन के घर में पान मसाले के इतने थैले (२०२० -लॉक डाउन से पहले) ...यह घोर कलयुग नहीं तो और क्या है ...😂 |
खैर, उस शख्स की बात हो रही थी जिन को मैंने कल सुबह दादर स्टेशन पर देखा और झट से मोबाइल में सहेज लिया...कहां दिखती हैं अब इस तरह की कवर के साथ अटैचियां ....यह तो कंकरीट के इस जंगल का और पब्लिक के समंदर की वजह से मुकद्दर से कभी कुछ ऐसा दिख जाता है जो हमें यादों की दुनिया में ले जाता है ..हां, मैंने इन अटैचियों पर और यहां तक कि होल्डाल (बैड-रोल) और सुराही लेकर सफ़र करने के दौर पर अपने पंजाबी के ब्लाग में कुछ पोस्टें भी लिखी थीं कुछ बरस पहले ....उन के लिंक लगाता हूं यहां, अगर कोई पढ़ना चाहे तो ...
ਓਏ ਰਬ ਤੁਹਾਡਾ ਭਲਾ ਕਰੇ - ਓਹ ਅਟੈਚੀਆਂ ਸੀ ਕਿ ਵੱਡੇ-ਵੱਡੇ ਅਟੈਚੇ!
जैसा कि उस शख्स की इस तस्वीर में आप देख रहे हैं वह अपने साथ कुछ बेल-बूटे भी लेकर आए हैं या ले कर जा रहे हैं ....किसी सगे-संबंधी के पास आए होंगे ...खैर, यह भी एक चीज़ होती थी जो अकसर हम लोग अपने रिश्तेदारों के पास लेकर जाते थे या वे जब आते थे तो दो चार ऐसी टहनियों हमारे बाग में ज़रूर लेकर आते थे ...अब यह जो महंगे महंगे पौधे हम लोग भेंट में देते हैं, पहले यह सब कुछ नहीं दिखता था, ज़िंदगी बड़ी सीधी-सरल थी ...
कल मैं कुछ लोगों को यह तस्वीर दिखा कर उन से पूछ रहा था कि बताइए इस तस्वीर में किस चीज़ की कमी है ....वे तो बता नहीं पाए, आखिर मुझे ही बताना पड़ा कि पुराने दौर में सामान के साथ जब तक एक पानी की सुराही न होती तो सामान पूरा नहीं होता था...सुराही इसलिए कि गिलास मे पानी आराम से डाला जा सकता है और ट्रेन में अपनी जगह पर टिके रहती थी ...मटके को कोई कहां टिकाए, अपनी गोद में ...नहीं, ऐसा संभव नहीं था, मटका तो नहीं, छोटी सी मटकी लोगों को अपनी गोद में रख कर जाते देखा भी है और खुद हम भी लेकर गये हैं...मटकी में अपनी पापा की अस्थियां जिस पर लाल कपड़ा बंधा हुआ था और हरिद्वार ले जाते समय उस का टिकट भी कटवाया है ...
चलिए, इधर उधर भटकना बंद करें.....वापिस उस अटैची पर आते हैं...इस तरह की अटैचीयों लोग अकसर मिलेट्री कैंटीन से लेने का जुगाड़ कर लेते थे ...कैंटीन की दारू की तरह ...कैंटीन में बहुत सस्ते में मिल जाती थी ...और जुगाड़ भी देखिए कैसे कैसे ...कुछ पैसे बचाने के लिए इतनी मेहनत...खास कर दहेज में बेटियों को इस तरह का सामान देने के लिए लोग मिलेट्री कैंटीन से ही यह सब खरीदने का जुगाड़ कर लेते थे ....हमने भी जुगाड़ से ही ऐसी एक छोटी अटैची वी-आई-पी की खरीदी थी ...हमारे मौसा जी अंबाला में एक बैंक में कुछ मैनेजर टाइप थे ...उन की मिलेट्री कैंटीन में पहचान थी, उन्होंने ही हमें यह खरीदवा कर दी थी ..कम मोल पर ...आम आदमी की खुशियां भी कितनी छोटी छोटी होती हैं...यह १९८० के दशक के शुरूआती बरसों की बात है ...उन्हें बढ़िया बढ़िया दारू भी कैंटीन से लाने का बड़ा क्रेज़ था ...इसलिए रिश्तेदारी में उन्हें लोग बाग मानते थे ...बीस साल की उम्र में परफ्यूम और आफ्टर शेव लगाने का क्रेज़ नया नया होता है ...मुझे भी ओल्ड-स्पाईस की बोतल वहीं से मिली थी ...
हां, यह वह दौर था जब इस तरह के अटैची खरीदने के बाद उन्हें सब से पहले कवर करने का जुगाड़ किया जाता था ...कवर कुछ लोग सिलवाते थे मोटे कपड़े के चैन-वैन लगी होती थी ...और बाद में तो ये कवर जगह जगह अलग अलग क्वालिटी के बिकने भी लगे थे। नहीं, यार, हम लोगों ने कभी खुद को इतना गरीब भी नहीं समझा कि इन अटैचियों पर कवर डालने की नौबत आ गई हो ...हमें तब भी यही लगता और अब भी लगता है कि इन को अगर कवर ही करना है तो इन को खरीदना ही क्यों, वही पहले वाले लोहे के ट्रंक ही चलाते रहिए.......खैर, यह तो एक खामखां की बात है ..हरेक की अपने मन की मौज है ...पता नहीं कोई कितनी तंगहाली या खुशहाली में इस तरह की अटैची का जुगाड़ कर पाता है ..खैर, मुझे स्टेशनों पर और गाड़ी पर किसी को इस तरह की अटैची से कुछ निकालते डालते देख कर बड़ी हंसी सूझती ...कवर की चैन पर लगा हुआ ताला खोल, फिर अटैची का लॉक खोलना, फिर उसमें से बाबू की ऊनी टोपी निकालनी या मुन्ने के बापू का मफलर या मौजे, या बबलू के पापा की चप्पलें या वह फांटावाला पायजामा जो उन्हें सफर में लगेगा ही लगेगा, वरना नींद ही नहीं आएगी .....कितनी मेहनत का काम लगता था यह सब देखना भी ....
मेरे मामा अजमेर से जब हमारे पास पंजाब मे ंआते तो उन्हें दिल्ली में गाड़ी बदलनी होती थी ...पुल पुल थे सीढ़ियों वाले...उन्होंने पास एक ऐसा भारी भरकम अटैची होता था..उम्र हो चली थी उन की भी ...वह हमें हंसते हंसते जब सफ़र के किस्से सुनाते तो हर बार कहते उस अटैची को एक भारी भरकम गाली निकाल कर कि जब इसे लेकर सीढ़ियां चढ़ जाता हूं जैसे तैसे तो पहुंच कर इच्छा होती है कि इसे ज़ोर से ठोकर मार दूं (ठुड्ढा मारां ऐहनूं उत्तों ही ते थल्ले सुट दिआं) ...और वहीं से इसे नीचे गिरा दूं....हम उन की इस बात पर बहुत हंसा करते ...
हां, गाड़ी में उन दिनों इस तरह की महंगी अटैचीयां कईं बार चोरी भी हो जाती थीं...इसलिए लोगों ने इसे सीट के नीचे चैन से बांध कर रखना शुरू कर दिया...मुझे तो उस चैन और ताले से यह बड़ा डर लगता है कि अगर स्टेशन आ जाए और हम लोग उस चेन की चाबी गंवा बैठें तो....खैर, लोगों को गाड़ी के अंदर आकर इस तरह की अटैची को ताले से बांध कर उस की चोरी से निश्चिंत होते देखना भी कम रोचक न था...हम भी कईं बार यह सब करते थे, हम भी तो इसी हिंदोस्तानी मिट्टी में पले-बढ़े हैं... हा हा हा हा हा ...
फिर धीरे धीरे पहियों वाले अटैची आने लगे ....लेकिन अब भी देखता हूं कि चाहे पहियों वाले अटैची बैग आने लगे हैं लेकिन लोग ....लोग क्या, हम सब लोग उन को ऐसे ठूंस देते हैं सामान के साथ कि उन को पहिये के साथ लेकर चलना भी मुश्किल होने लगता है ...और खास कर के अगर सीढ़ीयां चढ़नी पड़ जाएं तो नानी तो क्या, उस की नानी भी याद आ जाए...
मैं गोपाल दास नीरज जी के गीतों का बहुत बड़ा फैन हूं .....वही, शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब ..गीत के रचयिता ...अभी मैं कुछ देख रहा था तो उन की एक वीडियो दिख गई ..लखनऊ रहते हुए उन को कईं बार पास से देखने का मौका मिला...एक बार बात भी हुई ...वह अकसर कहा करते थे ...
उतना सफर आसान रहेगा...
शनिवार, 24 दिसंबर 2022
हिंदी नावलों की दुनिया ...
कल मेरा एक दोस्त दुकान पर जाकर टेलीफोन करने वाले दिनों को याद कर रहा था ...किस तरह से बात करते करते जब तीन मिनट हो जाते थे तो उस बूथ वाले को इशारा करना होता था कि हां, और बढ़ा दे, अभी हमें और बातें करनी हैं..और वे बातें भी याद आने लगीं जब बाहर गांव फोन करने के लिए उसे पहले बुक करवाना पड़ता है ...
क्या है यह पुरानी बातों को याद करने का जुनून..कुछ लोगों को लगता होगा कि यह क्या, हर वक्त पुराने दौर की यादें, बातें.....और कुछ नहीं है करने को .....जो मैं समझा हूं कि अगर कोई पुराना किस्सा सुनाता है, लिखता है या याद करता है तो इस का मतलब यह है कि उसने ज़िदगी को बूंद बूंद नहीं, भरपूर जिया है। अब हमारी उम्र के लोगों को ही देखिए...(६० बरस के आस पास वाले लोग) ...हम लोगों ने इन ६० सालों में क्या नहीं देखा....व्यक्तिगत तौर पर हम लोग, टैक्नोलॉजी के हिसाब से, देश-समाज के हालात कहां से कहां पहुंच गए...और हम ने यह सब जिया...अच्छे से महसूस किया....ऐसा कुछ नहीं है कि पहले सब अच्छा था या बुरा था और अब सब कुछ बुरा ही है, या सब अच्छा ही है....यह फ़ैसला बहुत ही बातों पर टिका होता है ...
पुरानी यादें गुदगुदाती हैं अकसर ....अगर कोई पुरानी बातें नहीं लिखेगा या सुनाएगा तो मौजूदा पीड़ी या आने वाली पीड़ी को कैसे पता चलेगा...दादी नानी के पास भी कोई गुलशन नंदा जैसा लिखने का हुनर थोड़े न था, लेकिन हम लोग मां से, दादी नानी से बार बार वही किस्से बार बार सुन कर कितने खुश और मस्त हो जाया करते थे ....बीच बीच में सवाल में पूछते थे, हमें लोरी जैसी लगती थीं उन की बातें ..बहुत बार तो सुनते सुनते कब ख्वाबों ख़्यालों की दुनिया में घूमते घूमते कब निंदिया रानी के पास पहुंच गए हैं, पता ही नहीं चलता था ...था कि नहीं ऐसा ही!!
तीन चार दिन पहले मैं एक ६०-७० साल बरस पुरानी दुकान पर रखे पुराने नावल देख रहा था ....अब यह दुकान जनरल स्टोर में बदल चुकी है ..लेकिन उसने सैंकड़ों नावलों को बड़े करीने से बुक शेल्फों पर दीवार के ऊपरी हिस्से में टिका रखा है, झांक रहे थे वे सब टकटकी लगाए मेरी तरफ़ ...लेकिन मैं तो उन को पहचान ही न पा रहा था क्योंकि मुझे नावल पढ़ने का कोई शौक न था, एक आधा नावल पढ़ा था तो कैसा लगा था, बाद में उस की भी बात करूंगा...मैं अकसर राजन-इकबाल सीरीज़ के बाल उपन्यास खूब पढ़ता था ...दिन में दो दो भी पढ़ लेता था...किराये पर मिलते थे ...२५ पैसे एक नावल के एक दिन के लिेए...हमें तब पता ही न था कि इंगलिश के नावल भी होते हैं...न स्कूल ऐसा था, न ही कोई ऐसा सर्कल या न ही आसपास ऐसी कोई किताब की दुकानें जिन से हमें यह पता चल पाता .....लेकिन सोचने वाली बात यह है कि पता कर के करना ही क्या था, हमें अपनी पढ़ाई ही से फ़ुर्सत न थी ...वैसे भी मुझे याद है ५०-६० बरस पुराने दिनों की बातें जो मैंने आज छेड़ ली हैं, उन दिनों नावल पढ़ना भी किसी ऐब से कम न था...मैंने अपनी मां से भी बचपन में कईं बार सुना था कि यह नावल पढ़ने की आदत ऐसी है कि इस की लत लग जाती है ..
वही बात है कि हर बात को हमारे दौर में कहना ज़रूरी न होता था ..हम लोग अपने आस पास के लोगों को चेहरे के भाव पढ़ कर ही कुछ बातें समझ जाते थे ...मां को गुलशन नंदा के नावल बहुत पसंद थे ...वह अकसर बताया करती थीं कि उस के कुछ नावलों पर तो हिंदी फिल्में भी बन चुकी हैं....लेकिन घर के काम काज में हर वक्त लगे रहते हुए मैंने उन्हें शायद ही कभी एक आधा गुलशन नंदा का नावल पढ़ते देखा था ..हां, हमारे पड़ोस की कपूर आंटी को नावल पढ़ने का बड़ा चस्का था ...मुझे अच्छे से याद है उन के आउट हाउस में रहने वाला ओंकार उन के लिए तीन चार नावल इक्ट्ठे किराये पर ले कर आता था ...वह खुद कभी नहीं जाती थीं ..लेकिन पढ़ने का बहुत शौक था ..हां, हमारी मौसी सुवर्षा को भी ये नावल बहुत भाते थे ...
हमारे घर में नावल पढ़ना-वढ़ना एक बड़ी खराब बात मानी जाती थी ...बड़ी बहन ने तो कभी नहीं लेकिन बड़े भाई ने शायद एक दो बार नावल पढ़ा था ...मुझे भी मिडल स्टैंडर्ड के आस पास की एक बात याद है जब घर में एक दो नावल थे ..ऐसे ही किसी कोने में पड़े हुए ..मुझे उस के कुछ पन्ने पर लिखी कुछ बातें बार बार पढ़ने की ललक लग गई ऐसे ही ....क्यों? ---आप को नहीं पता क्या, वो बात अलग है कुछ लोग खुल्लम खुल्ला कह देते हैं, कुछ दिल में रख छोड़ते हैं........बस मुझे उसे पढ़ कर आनंद आने लगा, मस्त लगने लगा ...और मैंने यह पढ़ने वाला काम अपनी रज़ाई में बैठ कर, अपनी कापी में उस नावल को छुपा कर भी किया ....जब कोई उस तरफ़ आ जाए तो मैं उस को छुपा देता.....यह बात कुछ दिनों तक ही चली क्योंकि मुझे इस से बेहद अपराध बोध होने लगा कि ये लोग तो सोच रहे हैं कि मैं पढ़ रहा हूं और मैं इस नावल की दुनिया में खोया हुआ हूं......उस के बाद फिर कभी नावल वावल की तरफ़ न तो जाने की तमन्ना हुई .....न ही अपने पास वक्त होता था ..पढ़ाई लिखाई में ही ऐसे रमे रहते थे कि सिर खुजाने की फ़ुर्सत ही न होती थी तो ऐसे में इन नावलों का क्या करें...मास्टरों का खौफ, मां-बाप का हम पर भरोसा, आने वाले सुनहरे भविष्य के सपनों ने हमें इस तरह के लिटरेचर से दूर ही रखा .....
लेकिन फिर भी नवीं क्लास में एक दो छात्र क्लास में ऐसी किताबें सारी क्लास को दिखाने के लिए ले आते थे कभी कभी जिन पर हम भी कभी निगाह मार लेते तो हमारा दिमाग ही घूम जाता ...इसलिए बीस तीस बरस बाद जब सी.डी वाले दिन आ गए और इस बात की चर्चा होने लगी कि स्कूलों में बच्चे मोबाइल ले जाते हैं, सी.डी तक ले जाते हैं ......तो हम भी अपने स्कूल के दिन याद आ जाते थे ....हमारे दिनों में एक लेखक था, मस्त राम ......अब था कि नहीं लेकिन उस की किताबें फुटपाथ पर खूब बिकती थीं ....अपने अडल्ट कंटैंट की वजह से ...जहां पर मुझे याद है नवीं दसवीं कक्षा में एक ऐसी किताब भी एक सहपाठी ले कर आया था ...वैसे तो किताब की दुकान से भी मस्त राम की किताब किराये पर लेकर पढ़ी हो होगी .....लेकिन यह हो नहीं पाता था, दुकानदार से उस तरह की किताब को मांगने भर की हिम्मत जुटाने में ही जान निकल जाता थी, सांस फूलने लगती थी कि अगर किसी ने देख लिया....ये सब किताबें भी किराए पर मिलती थीं लेकिन बहुत ज़्यादा किराया लगता था .....शायद रोज़ का एक रूपया या इस से थोड़ा कम....चलिए, अब आगे चलें....जिस रास्ते पर ज़्यादा चले ही नहीं, उस का और कितना ज़िक्र करें...
| गुज़रे दौर का सब से खतरनाक डॉयलाग ...."मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं."...बस, यह सुनते ही पाठकों के और फिल्म में दर्शकों के कान खड़े हो जाते थे ... |
हां, पहले घरों में किताबें या नावल ज़्यादा न होते थे ..स्कूल कालेज की किताबों के अलावा ले-देकर चार पांच किताबें हुआ करती थीं, एक तो मां की रामायण, एक उस की पाठ पूजा करने वाली किताब, दो चार किताबें जो हमें स्कूल के पारितोषिक वितरण के दौरान मिला करती थीं और एक दो किताबें जो किसी सगे संबधी ने भेंट स्वरूप दी होती थी ......याद आ गया हम लोग ऐसी किताबों की बड़ी कद्र भी करते थे ..याद आ गया मेरे जीजा जी ने मुझे एक किताब भेजी थी जब मैं १३ बरस का था, यह किताब उन चंद किताबों से है जो मुझे ज़िंदगी में सब से पहले पढ़ने का मौका मिला और जिसे पढ़ना अच्छा लगता था और यह भरोसा भी हुआ था कि हम भी ज़िंदगी में कुछ कर सकते हैं...
खैर, बहुत सी किताबों के बीच ही ज़िंदगी कट रही है ...हर तरह की किताबों के सान्निध्य में ...कोई टॉपिक न हो, जिस के ऊपर किताब न खऱीदी हो .....नावल भी बहुत से.....और मज़े की बात इंगलिश के नावल भी ...लेकिन इंगलिश नावल इतने बड़े बड़े पढ़ने के लिए बड़ा सब्र चाहिए..वह अपने में है नहीं, इसलिए हिंदी का भी कभी कोई नावल पूरा पढ़ा हो, याद नहीं.......याद ख़ाक नहीं, पढा़ ही नहीं ...अगर पढ़ा होता तो याद क्यों न रहता, नवीं कक्षा में रज़ाई में बैठ कर छुप छुप कर नावल के कुछ पन्नों के कुछ खास पैरा पढ़ने तो अभी तक नहीं भूला तो फिर नावलों को पढ़ना कैसे भूल सकता था .......नहीं पढ़े नावल जनाब हम ने .....लेकिन दो तीन बरस पहले जब एक बहुत बड़े नावलकार सुरेंद्र मोहन पाठक की आत्मकथा छपी तो वह मैंने बिना सोए , बिना कुछ काम किए जैसे एक ही ढीक में पढ़ गया...(ढीक का मतलब होता है बिना सांस लिए जैसे हम लोग पंजाब में लस्सी के गिलास को मुंह से लगा कर उसे पूरा पी कर ही नीचे रखते हैं...😂)....और जब उस महान नावलकार को दो तीन बरस पहले दिल्ली में एक लिटरेचर फेस्टिवल में मिलने का मौका मिला तो मैंने उन्हें यह बात बताई भी ...और उन की आत्मकथा जो अपने साथ लेकर गया था, उस पर उन के आटोग्राफ भी लिए ....हा हा हा हा ....
सोमवार, 19 दिसंबर 2022
पापा कहते हैं बड़ा काम करेगा.....उदित नारायण लाइव शो
१९९० का दशक आ गया ...बहुत से सुपरहिट गाने जनमानस के दिल के तारों को झंकृत करने लगे ....उदित नारायण, मो. अज़ीज, सुरेश वाडेकर, अभिजीत और कुमार शानू का दौर ....उदित नारायण के गीत भी फिल्मी दुनिया में क्या, लोगों की दुनिया में छाने लगे ...हम लोग कैसेटें खरीद कर इक्ट्ठा करने लगे...और बहुत बार अपने पसंदीदा गीत उस में भरवा कर तैयार करवाने लगे ....करते थे यह सब भी अकसर ..लेकिन काम यह थोड़ा भारी लगता था ...पैसे भी काफी लगते थे ...ऐसा लगता ही न था, सच में लगते थे ...३५-४० रूपये की टीडीके की कैसेट और उसमें अपने पसंद के गीत भरवाने के कुछ २०-२५ रूपये ....लेकिन मज़ा तो अपने पसंद की कैसेट सुनने में ही आता था...वरना एक कैसेट में एक दो गीत बार बार सुनने के लिए हम लोग अपने टू-इन-वन का हैड घिस मारते थे, उस खराब हैड को दुरुस्त करवाना भी एक पेचीदा काम था ....पैसों के साथ साथ रिपेयर की दुकान पर चक्कर भी खूब लगते थे ....और हां, एक बात तो बतानी भूल ही गया कि पहले यह कैसेट भरने या बेचने का काम अकसर धोबी की दुकान पर जहां थोड़ी बहुत ड्राई-क्लीनिंग भी हुआ करती थी, वहीं पर होता था ..फिर धीरे धीरे उन दुकानदारों के युवा बेटे आधी दुकान को कपड़े इस्त्री करने के लिए और आधी को इस कैसेट के बिजनेस के लिए इस्तेमाल करने लगे ...टी-सीरीज़ का बिजनेस शिखऱ पर था ...१९८० के दशक की बाते हैं ...फिर देखते ही देखते वे कपड़े इस्त्री करने वाले बंदे और उन का सामान गायब हो गया और दुकानें कैसेटों से ठुंसी दिखने लगीं...
| एक दौर वह भी था जब इसे खरीदना भी किसी रईसी शौक से कम न था... 😂 |
किसी भी बात को मैं भी कितना खींचने लगा हूं....यह बात अच्छी नहीं है, मुझे लगता है कभी कभी ...यह पाठकों के सब्र का इम्तिहान लेने जैसी बात लगती है ...खैर, उदित नारायण की बात करते हैं जिन के लाइव -कंसर्ट में जाने का मौका मिला...मुझे याद है जब १९९० के दशक में जब यह केबल टीवी आया तो हमें ये सब गीत विभिन्न चैनलों पर भी दिखने लगे ...बार बार दिखते थे अच्छा तो लगता ही था .....लेकिन १९९४ में जब एफ.एम आ गया तो फिर उस पर भी फिल्मी गीत सुनने का अपना मज़ा है ..एक दम साफ, स्पष्ट साउंड ..बिना किसी खि्च खिच के ..बिना किसी किट किट के .. फिर भी मुझे याद है सुबह शाम सैर के वक्त एक वॉकमैन जब उठाते तो दो एक कैसेटें भी दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता है ..राजा हिंदोस्तान, अकेले हम अकेले तुम .....उठा कर रख लेते ....बार बार साइड ए-बी को बदल बदल कर सुनते रहते ..साथ साथ सैल खत्म होने की फिक्र भी करते रहते ...
ऐसे ही किसी चैनल पर उदित नारायण की इंटरव्यू देखी पहली बार ....बंदा दिल की बातें कर रहा था ..इन इंटरव्यूज़ को देखना भी एक अच्छा एक्सपिरिएंस रहा ...बहुत अच्छा...अपनी बात रखने की सच्चाई ....
फिर धीरे धीरे तकनीक ने ऐसी तरक्की कर ली कि हम लोगों को बीस-तीस रूपये में एक एमपी थ्री मिलने लगी ..जिस में १००-१५० गीत ठूंसे होते थे ...बस उस के लिए हमें एक एमपी थ्री प्लेयर लेना होता था ...और अकसर उन को हम सफर में भी ले जाते ...बस, और कुछ नहीं, सैल का लफड़ा होता था, ये सैल से चलते नहीं थे, कमबख्त सैल को खा जाते थे ...खैर, एक सीडी में दर्जनों गाने और वह भी या तो एक ही गायक के या फिर अलग अलग फिल्मों के गाने - एक सीडी में पंद्रह बीस फिल्मों के गाने भरे होते थे ..फिर कुछ समय बाद ऐसी एम-पी थ्री भी आने लगीं...रोमांटिक गीत, sad songs, शादी के गीत, पंजाबी लोकगीत.....बस, फिर क्या था, सी.डीओं का घरों में अंबार लगने लगा ....लेकिन फिर भी एफ.एम का जादू हम लोगों के दिलो-दिमाग पर बरकरार ही था....
ऐसे तो मैं उदित नारायण के गीतों तक पहुंचते पहुंचते कईं दिन लगा दूंगा...चलिए, उदित नारायण के लाइव कंसर्ट में चलते हैं ...कल शाम मुंबई के षण्मुखानंद हाल में यह लाइव प्रोग्राम देखने का मौका मिला .......आइए कुछ झलकियां देखते हैं ...
पापा कहते हैं बड़ा काम करेगा....बेटा हमारा ऐसा काम करेगा ..
Medley by Udit Narayan
शनिवार, 17 दिसंबर 2022
मेरे चेम्बर में रखे इंडोर प्लांट का दर्द ....
| मेरी टेबल पर पडा़ यह प्लांट मुझे मेरी खुदगर्ज़ी का अहसास दिलाता है ...हर रोज़ |
कुछ महीने पहले मैंने एक छोटे से गमले में रखा हुआ एक इंडोर प्लांट अपने चेंबर में रख लिया...यह सोच कर कि यहां रखने से चल जाएगा...कभी कभी पानी दे देता हूं ...मेरी साइड टेबल पर ही सजा हुआ है ...चल तो निकला है, कद भी लंबा हो गया है, पत्ते भी खूब नए आ गये हैं ..हरे भरे ...मुझे कुछ अरसा पहले यह ख्याल आ रहा था कि कुछ और इंडोर प्लांट यहां रखअ लूंगा ...लेकिन अब कुछ ऐसा हो गया है कि लगने लगा है कि इसे भी जल्दी ही दूसरे पेड़ों के झुरमुट में सजा दूं...
मुझे इसे देखना अच्छा तो लगता है लेकिन सिर्फ एक मेरे अच्छा लगने की बात ही नहीं है, और किसी ने कभी इस की तारीफ़ नहीं की कभी ...कुछ दिनों से मुझे इसे देख कर अजीब सा अपराध बोध लग रहा था ...सोच रहा था कि शायद इस की तारीफ़ नहीं हो रही, इस लिए कुछ नाराज़ होगा...लेकिन यह क्या उस के पास तो गिले-शिकवों का पिटारा था, मेरे से पूछने वाले सवालों का अंबार था उस के पास...
मुझे लगता है कि वह मुझ से ये सवाल पूछ रहा हो ....
अगर तुम्हें किसी आलीशान कमरे में ऐसे ही अकेले छोड़ दिया जाए तो तुम्हें कैसा लगेगा...उस कमरे में बोलने-बतियाने के लिए और कुछ न हो ...
तुम बताओ कि तुम्हें तो दिन भर मरीज़ों के दुखडे़ सुनने के पैसे मिलते हैं, मुझे क्या मिलता है, मुझे क्यों इस कैद में डाल कर रखे हो, आज़ाद करो मुझे भी ..
क्या तुम कभी ऐसे कमरे में रहे हो जहां धूप ही न आती हो ...यह जो तुम मेरे नए पत्ते देख कर इतराते हो न यह भी मुझे पता है मैं सिर्फ तुम्हारी खुशी के लिए कैसे जुटाता हूं ...ट्यूब की रोशनी जब तुम्हें ही इतनी डिप्रेसिंग लगती है तो मेरी सोचो....
तुम भी कितने मतलब परस्त हो बस अपनी खुशी के लिए मुझे अपनी मेज़ पर सजा लिया...मेरे बारे में कुछ सोचने की कोशिश ही नहीं की ...ऐसा ही है न...
जो किसी शै से मोहब्बत करते हैं वे लोग उसे खुले में सांस लेने के लिए आज़ाद रखना भी जानते हैं ...ऐसे नहीं कि बिना धूप के, बिना हवा के बस उसे बढ़ने के लिए पानी ठेल देते हैं कभी कभी ...जब तुम शाम को छुट्टी कर के चले जाते हैं तब तो कमरे में हवा भी नहीं होती, दम घुट जाता है ..और तो और जब तुम दो चार दिन की छुट्टी पर बाहर कहीं धक्के खाने निकल जाते हो, चुप चुपीते ....तो मुझे तो दो बूंद पानी के लिए भी तरस जाना पड़ता है ...कौन देगा मुझे पानी उन दिनों में कभी सोचने की तुम्हें फुर्सत ही कहां है...बड़े आए पेड़ों से प्यार करने वाले...तुम्हारा यह प्यार छलावा है, स्वार्थ है, और कुछ नहीं ...ढोंगी हो तुम एक नंबर के ...
ये जो मेरे पत्ते पीले पड़ के झड़ने लगे हैं अभी, तुम यह ज़ुबान समझते हो क्या, यह मेरी नाराज़गी ही तो है जिसे मैं इस तरह से ब्यां करता हूं, और क्या करूं...और मैं तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता हूं....मेरी तो छोड़ो बीसियों साल पुराने दरख्त तुम्हारे आसपास कत्ल कर दिए जाते हैं, तुम उस वक्त मुंह पर पट्टी बांधे रखते हो, मेरी फ़िक्र कोई क्या करेगा...चलो, हटो, यहां से ....बडे़ आए मेरा हित चाहने वाले ...
तुम्हें हर रोज़ नई जगहें, नये लोग देखने भाते हैं, उन से बात करना बहुत भाता है और मुझे हाउस-अरेस्ट कर के रख छोड़ा है तुम ने ...हाउस अरेस्ट का मतलब समझते भी हो क्या, तुम क्या समझोगे, तुम एक आज़ाद परिंदे की मानिंद हो ...खुदा तुम्हें ऐसे ही बनाए रखे ...बस, मेरी भी अर्ज़ सुन लो एक ...मुझे खुली हवा में रख दो, मेरे दोस्तों के साथ ...
तुम लोगों की एक बात और है ...तुम लोग सड़क पर जाते हुए किसी बिल्ली-डॉगी के छोटे छोटे प्यारे बच्चे देखते हो तो उसे फौरन उठा कर अपने स्कूटर पर या कार में रख कर अपने बाप का माल समझ कर उठा लाते हो....कभी उन के भाई बहनों का सोचा, उन की मां का सोचा.....क्या यह अपहरण नहीं है, तुम लोगों के बच्चों को दस मिनट घर लौटने में देर हो जाए तो तुम दुनिया सिर पर उठा लेते हैं...कभी सोचा तुम ने इस के बारे में .....
बस, अब तुम मेरा और मुंह मत खुलवाओ....तुम तो बस मेरे ऊपर एक दया करो...मुझे जहां से लेकर आए थे वहीं पर वापिस छोड़ आओ....मुझे न चाहिए ये बढ़िया चेंबर ...मुझे तो मिट्टी में रख के आओ...मेरे साथियो के साथ ....तुम्हें यह भी तो पता है कि पेड़ भी तुम लोगों की तरह आपस में बातें करते हैं ...एक दूसरे को देख कर झूमते हैं...उत्सव मनाते हैं ...फिर मुझे क्यों कैद में डाल रखा है ....वैसे तो तुम रोना रोते रहते हो कि तुम्हें डाक्टरी वाक्टरी नहीं करनी थी, तुम्हें तो बॉटनी ही पढ़नी थी ...क्योंकि तुम्हें बॉटनी ही पसंद थी ...फिर तुम्हारे पल्ले मेरी ये बातें क्यों नहीं पड़ रहीं .....
दोस्तो, इस इंडोर प्लांट के इतने सारे सवालों का मेरे पास कोई जवाब नहीं है, मुझे एक अजीब से अपराध बोध का आभास हो रहा है, कुछ दिन पहले मैं दो चार बहुत अच्छे अच्छे सिरेमिक के पाट्स भी खरीद लाया कि इन में बढ़िया बढ़िया इंडोर प्लांटस लगवा कर चेंबर में रखूंगा .......लेकिन नहीं, ऐसा कुछ नहीं, इसे इस की जगह पर एक दो दिन में पहुंचा दूंगा...अपनी बालकनी से उठा कर लाया था ..वहीं रख दूंगा इसे ले जाकर ...
आज शाम एक इंडोर प्लांट की एगज़िबिशन में हो कर आया....एक से एक सुंदर इंडोर पौधे बिक रहे थे....लेकिन रह रह कर मेेरे एक इंडोर प्लांट ने जो सवाल मेरे आगे रख छोड़े थे, उन का ख्याल आता रहा .....और एक भी इंडोर प्लांट वहां से उठाने का मन ही न हुआ...बिल्कुल मन न हुआ....बस एक फोटो खिंचवा के बाहर आ गया ...
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| कभी पेड़ का साया पेड़ के काम न आया...सेवा में सभी की उसने जन्म बिताया.... चलती है लहरा के पवन के सांस सभी की चलती रहे ...लोगों ने त्याग दिए जीवन के प्रीत दिलों में पलती रहे .... |
बुधवार, 30 नवंबर 2022
दादी नानी के टोटके याद आने लगे हैं हमें भी ...
कल रात कभी मेरे एक घुटने में दर्द हो जाए, कभी दूसरे में ...जब करवट लेता हूं तो घुटने भी चूं-चूं करने लगे हैं...कभी एक करवट लेकर लेटे रहो तो कूल्हे में दर्द शुरू हो जाता है...फिर पासा बदलना पड़ता है....ये छोटी मोटी दर्दें वर्दें तो बढ़ती उम्र के साथ चलती ही रहती हैं...कभी मां को इस तरह की तकलीफ होती तो हम चिंता करते तो वह झट से कह देती...यह कोई बात नहीं, यह तो चलता ही है, अब ७०-८० बरस से इन को हम वाह रहे हैं (इन से काम ले रहे हैं)....इन की भी एक हद है...बस, काम चल रहा है न...और इतना कहते हुए वह ईश्वर का शुक्रिया अदा करने लगती...
यह तो हुई मां की बात ...नानी दादी की बातें भी कभी कभी याद आ जाती हैं तो बड़ी हैरानी होती है ...नानी को टांगों में अकसर दर्द रहता था ..कभी मूड होता तो हम उन की टांगें दबा देते लेकिन बच्चे कहां काबू में आते थे तब भी ...इसलिए मैंने कईं बार देखा कि नानी ने दो-तीन नाड़े जोड़ के एक बड़ा सा नाड़ा बनाया हुआ था ..एक नहीं दो ...और दोनों टांगों पर नानी उसे अपने आप कस से बांध लेती थीं...और फिर कुछ घंटों के बाद खोल देती थी...हमें भी इतनी समझ कहां थी कि नानी को मना करें कि इस से खून का दौरा बंद हो सकता है ...इतना कसना ठीक नहीं है ...और हम देखा करते कि जब वह उस नाड़े को अपनी टांगों से खोलती तो उन की पिंडलियों पर गहरे निशान पड़े होते ...
खैर, यह तो थी टांगों में दर्द खत्म करने का नानी दादी का जुगाड़....और हां, घर में कुछ आयोडैक्स जैसा (आयोडैक्स नहीं) भी पड़ा रहता था ...जिसे कहीं भी दर्द होने पर थोड़ा लगाया जाता, थोड़ा रगड़ दिया जाता ..खास कर के सिर दर्द और गर्दन वर्दन में दर्द होने पर या मोच-वोच पड़ जाने पर ...। अगर कहीं बात कोई गोली खाने तक पहुंच भी जाती तो सेरीडोन की एक गोली बीस-पच्चीस पैसे की भाग कर जा के ले आते ..
और हां, जब कभी हमें चमूने काटने लगते (लखनऊ में रहा हूं ...कुछ बरस ..वहां इसे चुन्ना काटना कहते हैं) तो पहले तो यह खिंचाई होती कि और खाओ मीठा, और खाओ चीनी के परांठे (जो कि मुझे बहुत पसंद थे बचपन में)...फिर इलाज के तौर पर प्लास्टिक की एक शीशी से सरसों का थोड़ा तेल हमारी हथेली पर रख दिया जाता कि जाओ, लगा लो, अभी ठंड पड़ जाएगी....अरे वाह, सच में तुरंत ठंड पड़ जाती थी ...और एक बात, यह चमूने काटने वाला पंगा है क्या, अगर पता है तो ठीक है, वरना, इस बात पर यहीं मिट्टी डालिए और मेरे साथ आगे बढ़िए...
अब, क्या तकलीफ रह गई..हां, बदपरहेजी हो जाना, पानी ज़्यादा पी कर अगर पेट आफर जाना तो उस का इलाज था ...मिट्ठा सोडा एक या आधा चम्मच पानी के साथ ले लेना...वह भी काम कर ही जाता था ...बाद में पता चला कि इस तरह से उसे इस्तेमाल करना भी ठीक नहीं है, नुकसान हो सकता है ...और पेट के दर्द का एक ही इलाज था, अजवायन और नमक की फक्की मारो पानी के साथ और आराम करो..
एक बार मां को पेट में भयकंर दर्द उठा रात के वक्त ..हम उस दिन नानी के पास थे ..हमें कुछ नही पता था कि डाक्टर भी होते हैं इन कामों के लिए ...नानी ने पानी गर्म किया, यही अजवायन-नमक दिया....मां भी कराहती वराहती कब सो गई ...और हम भी। बहुत बरसों बाद पता चला कि पित्ते में पथरियों की वजह से भी उस तरह का दर्द उठ सकता है ...खैर, बाद में पित्ता ही निकलवाना पड़ा पत्थरीयों से भरा हुआ ...गर्म पानी से याद आया कि यह भी एक घरेलू इलाज जबरदस्त था ...था क्या, मेरे जैसे तो अभी भी करते हैं, सिर विर दर्द होने पर गर्म सिकाई करता ही हूं...हां, पहले कांच की बोतल में करते थे, अब वे डकबैक की बोतलें आ गई हैं...जिन में गर्म पानी डाल कर सिकाई करते हैं ...हमारे ताऊ और ताई जी तो सर्दी के दिनों में एक एक दो दो बोतलें ऐसे ही बिस्तर में बिना दर्द के भी रख लेते थे ..गर्माइश के लिए ...। बोतलें के बाद अब हमारे पास हीटिंग पैड आ गए हैं......शक्ल ही बदली है, फंडे वही दादी-नानी वाले ही हैं...
दादी जी को पकौडे़ बहुत पसंद थे ...और जब भी पकौडे़ बनते, दादी इतने ज़्यादा खा लेतीं कि अगले तीन चार दिन रोटी-पानी की छुट्टी...उन्हें गैस सिर पर चढ़ जाती और वह सिर पर दुपट्टा बांध कर, और मीठा सोढ़ा खा खा कर दो तीन दिन के बाद कहीं कायम हो पातीं...दुपट्टे बांधने से याद आया कि वह प्रथा भी मां-पिता जी, दादी -नानी के ज़माने से चली ही आ रही है...सिर दुखने पर मुझे भी सिर पर कोई कपड़ा आज भी बांधना ही पड़ता है ...बचपन में हम देखा करते थे कि महिलाओं को सिर दर्द वर्द की वजह से भी कहां घर के काम काज से छुट्टी मिलती थी ...मां का सिर दुख रहा होता, उसने सिर पर दुपट्टा बांधा होता और अंगीठी पर हमारे परांठे सेंक रही होती, वहां से फारिग होती तो डंडे (थापी) से कपड़ों को पीट पीट कर साफ करना शुरू हो जाती .....हमारा क्या था, हम तो अपनी मस्ती में मस्त थे ...बस, हमें परांठे मिल रहे थे, कपड़े साफ धुले हुए मिल रहे थे ....शायद हमें वहां तक ही मां से मतलब था...
गला खराब होने पर, जुकाम होने पर ...भट्ठी से चने भुनवाए जाते और उन्हें खाया जाता, अदरक वाली चाय पी जाती बार बार, पतला सीरा (हम तो उसे लसबी कहते हैं...बेसन से बनती है) पिया जाता और दो तीन दिन मुलैठी चूसी जाती ....और हम ठीक भी हो जाते ..और मुलैठी चूसने और गरारे करने की बात पर हम आज भी अमल करते हैं ...और जब ठंडी-जुकाम हो तो चाय में नमक डाल कर पीना भी याद आता है कभी कभी ...
कोई कितना लिखे, इस की भी अपनी सीमा है ...लेेकिन जब तक कोई अपने दिल की बातें लिखे नहीं तो दूसरों को पता कैसे चले कि पहला दौर क्या था .....
अब पोस्ट बंद करने लगा तो याद आ गया आंख का भी इलाज...जिसे इंगलिश में कंजकटिवाईटिस कहते हैं...उसे पंजाबी में कहते हैं कि आंखें आ गई हैं...और उस का इलाज यही होता था कि कहीं से वह एक लहसून की एक तुरी की शक्ल वाला एक आई-एप्लीकैप ले आते थे ...पांच पैसे में मिलता था कैमिस्ट के यहां से ...उसे दो चार बार डाल देते थे ..कहीं जा कर दिखाने का रिवाज था नहीं .....और हां, आंख में जो बाकी कष्ट होते थे, खारिश होना, आंखों का लाल हो जाना.....उस के लिए नानी के पास एक सुरमचू था (जिस से आंखों में सुरमा डालते थे) उसे वह एक लहसून (असली लहसून, वह आई-एप्लीकैप नहीं) की फांक में घोंप कर आंखें में उस सुरमुचे को फिरा देती ...जैसे सुरमा डालते हैं उसी अंदाज़ में ...और बस, दो मिनट के बाद नानी कहने लगती और नानी के बाद मां भी यही कहतीं कि बस, ठंड पड़ गई है ....इतनी खारिश हो रही थी आँखों में ....।
अब इस पोस्ट को बंद करने का वक्त है ....क्योंकि मैं लिखते लिखते ही ऊब गया हूं ...आप पढ़ते पढ़ते भी कहीं ऊब गये तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी....
नोट ...इस में लिखे किसी भी दादी नानी के टोटके को अपने जोखिम पर इस्तेमाल करें....मैंने तो एक तरह से अपने अनुभव ब्यां किए हैं कि हम लोग ऐसा करते रहे हैं, मैंने यह नहीं कहा कि यह ठीक है, गलत है....सेहत से जुड़े सभी फैसले अपने डाक्टर से परामर्श करने पर ही करें ..........बस, जाते जाते एक मशविरा है कि चीनी के परांठें मत खाया करिए क्योंकि चमूने लड़ने की वह एक खास वजह है ...लीजिए, जाते जाते एक बात और याद आ गई ...जब पेट से बड़े बड़े कीड़े निकलते थे तो हम तो डर जाते ...लेकिन हमें कीड़ों की दवा दिला दी जाती ...पीठ पर घमौरियां होने पर लगाया जाने वाला नायसिल पावडर तो बहुत बाद आया...पहले तो बनियान उतार कर नवारी चारपाई पर लेट कर या किसी कंघी की मदद से खारिश से मुक्ति पा ली जाती थी और अगर बात आगे बढ़ जाती तो फिर कईं बार उन बड़ी बड़ी घमौरियों पर मुल्तानी मिट्टी भी लगाने की नौबत आ जाती ...
और साइडें अगर लग जाती पसीने की वजह से ....तो भी इलाज वही सरसों का तेल लगाओ ....और बाद में उस पर पावड़र छिड़क लो ...इन दोनों चीज़ों को एक साथ इस्तेमाल करने से एक अजीब सी परत बन जाती थी साइडों पर ....हां, खुजली से तो बच जाते थे ..और करते भी तो क्या करते, न तो हमें पता था कि यह फंगल है, और न ही कैंडिड का कुछ अता-पता-ठिकाना था, और न ही अमूमन लोगों को डाक्टर तक पहुंच ही थी ......और अगर हम जैसों की थी भी तो उसे क्या कहें कि जांघ के अंदर खुजली से परेशान हैं, साइडें लग गई हैं....इसलिए हम लोगों ने अपने मन को भी कुछ ऐसे समझा लिया था कि चुपचाप सरसों का तेल लगाओ और प्रभु के गान गाओ.....राम जी भली करेंगे ...😂
अब मैं उषा उथुप को सुनूंगा ...कुछ दिन पहले उन्हें देखा था तो यह रिकार्डिंग की थी ....मुझे इन के गीत सुनना बहुत अच्छा लगता है ...जब मैं १७ बरस का था तो उन दिनों उन का वह गीत खूब बजा करता था ...रम्बा हो ..रम्बा हो .....और हां, मुझे उस दिन इन को लाइव सुनते हुए यह पता चला कि हरे रामा हरे कृष्णा का वह सुपर डुपर गीत ...दम मारो दम ...भी इन्हीं का ही गाया हुआ है ...
पोस्ट बंद करने पर ध्यान आया कि कान में दर्द में भी क्या बेवकूफी किया करते थे ...सरसों के तेल में लहसून डाल कर उसे गर्म किया जाता और उस की एक दो बूंद कानों में डाल दी जातीं....हमारे पास ही ईएनटी का एक बहुत बड़ा विशेषज्ञ है, अगर उसे यह पता चल गया तो बड़ी बात नहीं वह मेरी पिटाई ही कर दे ....😂
मंगलवार, 29 नवंबर 2022
ग्रूमिंग-शूमिंग ...
दो चार दिन पहले टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर खबर थी कि एयर-इंडिया ने अपने क्र्यू को ग्रूमिंग के बारे में कुछ हिदायत दी है ...जिन के बाल बहुत कम हैं, उन्हें सिर के सारे बाल मुंडवाने होंगे ...जिन के बाल सफेद हो रहे हैं, उन्हें नियमित नेचुरल हेयर कलर का इस्तेमाल करना होगा...और जिन के बाल वाल कायम हैं, उन्हें हेयर-जेल से उन्हें कायदे से बिठा कर रखना होगा...
कोई हैरानी की बात नहीं है...नौकरी क्या और नखरा क्या, मालिक जैसा भी चाहेगा, करना होगा अगर नौकरी करनी है तो ...मुझे इस में कुछ भी अजीब न लगा। इतनी बड़ी कंपनी है, सोच समझ कर ही ऐसे फ़ैसले लिए जाते हैं....सभी देशों से इन के ग्राहक होते हैं, इन सब चीज़ों की तरफ इन्हें ध्यान देना ही होता है...मुझे यह सोच कर हंसी आ रही थी कि अगर मेरे जैसा सफेद बालों वाला कोई क्रयू मैंबर हो तो ग्राहक मुझे तो बुलाए ही न, कि इसे तकलीफ क्यों दें, अगर प्यास भी लगी है तो भी घंटी न बजाएं कि जाने दो, यार, बाहर जा कर पी लेंगे ...इसे क्यों इतनी ज़हमत दें...
जो लिख रहा हूं ...उस के बारे में मेरे खुद के ख्याल ये हैं कि बाल होना या कम होना, सफेद होना, या और भी नयन-नक्ष ये सब कुदरत की दी हुई चीज़ें हैं, हम लोग इन सब चीज़ों पर ध्यान लगा कर किसी का मज़ाक उड़ाने का तस्सवुर भी नहीं कर सकते ...लेकिन मेरे जैसों का क्या, जो खुद अपने आप पर भी हंसने से नहीं चूकते ...इसलिए मेरे जैसों को तो थोड़ी बहुत छूट दी भी जा सकती है...
आज शाम भी हुआ यह कि लोकल ट्रेन में मेरे सामने की सीट पर एक शख्स बैठा हुआ था...यही ५५-६० साल के करीब का होगा...सरसरी निगाह से जैसे हम किसी को देखते हैं, देखा....लेकिन फिर दूसरी बार मैंने उस के घने बालों को देखा...और तीसरी बार बडे़ बालों से बने एक बडे़ पफ को देखा ..पफ को वो लोग जानते हैं जो अब ५०-६० साल के हैं क्योंकि आज से चालीस साल बरस पहले बालों पर तेल (अकसर सरसों का ही) लगा कर एक बड़ा सा पफ बनाने का एक रिवाज था...मुझे नहीं पता कि तेल से चुपड़े बालों को पफ बनाना कूल समझा जाता था या हॉट, हमें तो ये अल्फ़ाज़ ५०-५५ बरस की उम्र में ही पता चले...खैर, १६-१७ बरस वाले दिनों में हम ने कोशिश तो कईं बार थी पफ बनाने की ....लेकिन बाल हैं ही इतने पतले की एक जगह जब ये टिक ही नहीं पाते तो पफ के लिए क्या उठेंगे ...
खैर, हमारे स्कूल में एक मास्टर था जो बहुत बड़ा पफ बनाया करता था और पिटाई भी बड़ी करता था ...इसलिए हमें तो पफ से उनी दिनों से बड़ी नफ़रत है ...दूसरा एक प्रोफैसर था मेडीकल कालेज में जो हमें पहले फ़िज़ियोलॉजी पढ़ाता था, वह भी पफ का पक्का शौकीन ....इतना बड़ा पफ बना के आता था कि हम दोस्त लोग उस के पफ को याद कर के हंसते हंसते लोटपोट हो जाया करते थे ..लेकिन एक बात है, वह पढ़ाता भी बहुत अच्छा था ...सब कुछ झट से समझ में आ जाता था...
लेकिन मैं तो आज गाड़ी में मिले शख्स के पफ की बात कर रहा था ...मैंने बताया न कि तीन बार तो मैंने देख लिया...फिर उस के बाद मेरा स्टेशन आने में दस मिनट थे..फिर मेरे मन में हलचल चलती रही कि यार इतनी उम्र में इतने घने बाल और इतने करीने से सैट हुए हुए ....मेरे मन में शक का बीज पड़ चुका था कि हो न हो यार यह तो विग ही होगी ...मैंने उस की तरफ देखा, वह सो रहा था, मैंने उस के बालों की तरफ देखना शुरू ही किया था कि वह जाग गया...अब यह कोई ऐसी एमरजैंसी भी न थी कि मुझे यह पता लगाना है ..खैर, मैंने मौका मिलते ही दो तीन बार सरसरी निगाहों से उस के पफ को देखा और यह फैसला हो गया कि बंदे ने विग ही लगाई हुई है ...
और बेशक यह विग बहुत महंगी होगी ....मुझे मेरे एक दोस्त ने कुछ महीने पहले बताया था कि विग भी हज़ारों रूपयों की भी मिलती हैं..इस की विग तो पकड़ में इसलिए आ गई क्योंकि इसने कुछ ओवर हो गया विग खरीदते वक्त ....अगर सीधी सादी विग होती तो किसी को भी पता नहीं चल पाता ..पर मैं होता कौन हूं किसी के पर्सनल मामले में दखल देने वाला ...जो उस के मन की मौज थी, उसने लगा ली ...मैं क्या खामखां अपने दिमाग पर लोड ले रहा हूं....अभी यह सोचा ही था कि मेरा स्टेशन आ गया और मैंने नीचे उतरते उतरते उस खूबसूरत विग को अपने कैमरे में कैद करने की एक कोशिश भी कर डाली ....
अब इतनी बात लिख देने के बाद यह सोच रहा हूं को हो सकता है कि उस के बाल अपने ही हों....हम भी कैसे कितनी आसानी से फैसले कर लेते हैं...कुछ भी, कहीं से, किसी के भी, कैसे भी, कभी भी ...कितनी जल्दबाजी में ....कितनी फुर्ती से, कितने उतावलेपन से ...कितनी अंधाधुंध स्पीड से ...
हां, जाते जाते इन की भी बात पर गौर करिएगा....ये बाल- काले, सफेद, कम ज़्यादा, विग, काला-गोरा रंग .....इससे कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता...फ़र्क बस इस बात से पड़ता है कि आप दूसरों के साथ, अनजान लोगों के साथ भी, किस तरह से पेश आते हैं ....सीधे मुंह बात कर भी पाते हैं या नहीं... यह गीत भी कुछ कुछ तो ऐसा ही समझा रहा है ... गोरों की न कालों की, दुनिया है दिल वालों की ...
सोमवार, 24 अक्टूबर 2022
दूसरों के कोट्स भी बेगाने ही होते हैं....
किसी इंसान पर जो बीती, ज़िंदगी ने ज़माने ने जैसा उस के साथ बर्ताव किया, उस का क्या तजुर्बा रहा, उसने इन बातों को कोट्स की शक्ल में लिख दिया...किस ज़माने में लिखा, किन हालात में लिखा, उस बंदे की ख़ुद की कितनी जद्दोजहद से भरी थी, हमें कुछ भी तो नहीं पता...लेकिन फिर भी मेरे जैसे लोग यहाँ वहाँ से कोट्स की किताबें इकट्ठा करने में लगे रहते हैं और जब इस तरह की पूरा एक ज़ख़ीरा जमा हो जाता है, इन सब को थोड़ा उलट-पलट कर देख भी लेते हैं कभी कभी ......फिर यह ख़्याल आता है कि यार, ये तो इन के अनुभव थे..शायद इन्हें पढ़ना तो ठीक है, लेकिन ये कोट्स दूसरों की क्या मदद कर पाएँगे....
जी हाँ, मेरा यही ख़्याल है कि इस कायनात में हर इंसान के अपने कोट्स होते हैं ...उस के अनुभवों से, उस ने जो सीखा ज़िंदगी से (अक्ल बादाम खाने से नहीं, ठोकरें खाने से आती है....) वह उन्हें काग़ज़ पर पहले तो उकेरता ही नहीं, शायद वह लिखना नहीं जानता और अगर जानता भी है तो उसे अपने ख़्याल इतने घटिया क़िस्म के लगते हैं कि उन्हें लिख कर सहेज लेने की उसे नहीं पड़ी। ऊपर से हम जैसे ज़रूरत से ज़्यादा पढ़े-लिखे लोग ...हमें अपने से ऊपर कोई दिखता ही नहीं....इसलिए हमें कोट्स भी वही सही लगते हैं जो महँगी किताबों में फ़िरंगियों ने लिखे होते हैं ...कुछ समझ में आते हैं, कुछ नहीं भी आते ...चलिए, दफ़ा करो जो समझ नहीं आते, न आएँ. हम ने कौन सा इन को पेपर देना है....
पहले कोट्स हमें बहुत कम ही दिखते थे ..फुटपाथ पर जो ५-१०-१५ रूपये में जो पोस्टर मिलते थे ...उन्हें हम ऐसे ही अपने कमरों की दीवारों पर चिपका लेते थे और कईं बार दिल बड़ा कर के फ़्रेम भी करवा लेते थे ...ऐसा ही एक फ़्रेम लेकर मैं ३५-३६ बरस पहले मैं अपने होस्टल के गेट से अंदर आ रहा था तो हमारे होस्टल के सुपरिन्टेंडेंट डा चोपड़ा साहब (वह हमारे प्रोफैसर भी थे) मिले...बात हुई ...उन्हें पोस्टर दिखाया....देख कर खुश हुए...उसमें एक बहुत सुंदर घाटी की तस्वीर थी और साथ में बड़े बड़े हरियाली से ढके हुए पहाड़ ...और उस पर लिखा हुआ था ...Prayers Go up, Blessings Come Down! Seek the Will of God, Nothing more, nothing less, nothing else. मैंने उसे अपने रूम में टांग रखा था, जब भी उस तरफ़ देखता तो मज़ा आ जाता था ...और अभी भी कहीं तो अपने घर की किसी भी शहर की किसी ब्रांच में ज़रूर पड़ा ही होगा...ऐसे ही मैंने यही कोई बीस साल पहले एक फूल को फ्रेम करवा के उस पर कुछ तो लिखवाया था ...वह भी घर की दिल्ली ब्रांच में टंगा हुआ है ...लेकिन देखिए मुझे इस वक्त यही याद नहीं आ रहा कि उस पर लिखवाया क्या था...उस फूल को देखते ही किसी भी बंदे में उसी की तरह खिलने की तमन्ना पैदा हो जाए।
खैर, कोट्स पढ़ना. ढूँढना मुझे बहुत अच्छा लगता है ..तभी तो मैंने ढेरों किताबें जमा कर रखी हैं.....लेकिन उन सब को देखने- या महसूस करने के बाद मैंने नतीजा यही निकाला है कि हर इंसान की ज़िंदगी अलग है, उसके कोट्स भी अलग होने चाहिए...ठीक है, पढ़ लेते हैं, लेकिन दूसरों पर आश्रित रहने का कोई फ़ायदा नहीं है ...अपने अलग कोट्स बनाइए.....जो कुछ ज़िंदगी से मिला है, जो रह गया, उस की पेस्ट बना कर ....अपनी नोटबुक को कलर कीजिए....
कोट्स ज़रूरी नहीं कि भारी भरकम फ़्रेमों में ही मिलते हैं...ख़ुद भी अगर कोई तस्वीर आप के दिल के बहुत क़रीब है ...तो उस के नीचे कहीं पढ़ी हुई बात लिख सकते हैं....मैंने भी २० बरस पहले ऐसा किया था....जब लगभग ५० साल पुरानी एक तस्वीर दिखी जिसमें घर के सभी लोग थे...एक बहुत ही क़ीमती फ़ोटो....उस के नीचे मैंने लिख दिया....Enjoy the little things in life, someday you will realise those were the big things!! बहुत अच्छा लगा था, और सब को वह फोटो की एक कापी भिजवा दी थी...बड़ी बहन ने तो अभी भी शेल्फ पर उसे सजा रखा है ..
हमारी दिक़्क़त यही है कि हम अपने से ऊपर वाले किसी बंदे की सुन लेते हैं और कम से कम अपने लेवल के बंदे की ही सुनते हैं...दूसरों को हम समझते हैं कि इन्हें कुछ नहीं पता ...यही सब से बड़ी भूल है ...अगर हम सब के साथ अच्छे से बात करते हैं....यह नक़ली तरह से नहीं हो पाता, नकलीपन नक़ली हंसी की तरह दो मिनट में उजागर हो जाता है ...हाँ, अगर सब के साथ खुल कर बात करने से मुझे यही एहसास हुआ कि सभी लोगों की ज़िंदगी कम से कम एक नावल जैसी है ...कम से कम....सच में, वैसे तो कईं नावल लिखे जा सकते हैं..लेकिन नहीं, हम किसी की सुनते नहीं और अगर किसी की बात बुरी लगे तो उस के सिर पर सवार हो जाते हैं.....कल रात की ही बात है ....यही कोई रात दस-साढ़े दस बजे का वक़्त होगा...महालक्ष्मी स्टेशन ...मैं लोकल ट्रेन से नीचे उतरा ...और चिप्स लेकर खाने लगा ...इतने में ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें आ रही थीं एक स्टाल से ...एक लंबा-चौड़ा ४०-४५ बरस का आदमी रेलवे स्टाल के एक कर्मचारी के पीछे पड़ा हुआ था ..उसे गालीयाँ निकाल रहा था कि ऐ ......, तूने मेरी औक़ात निकालने की कोशिश की ......यह ले १०० रूपया रख, यह ले एक और १०० रूपया रख......। बात इतनी हुई कि वह बंदा अपने किसी दोस्त के साथ था, उन्होंने एक समोसा आर्डर किया...उस वर्कर के मुँह से निकल गया कि क्या, आप दोनों एक ही समोसा लेंगे? .....बस, यही सुन कर वह बंदा पागल की तरह उस वर्कर से पेश आने लगा ..गालीयाँ ...उँगली दिखाना....वह वर्कर उस से माफ़ी माँग चुका था....कोई भी अगर बीच बचाव करने लगे तो कह रहा था कि तुम को वकील बनने की ज़रूरत नहीं ......मैंने भी इतना ही कहना चाहा कि उसने माफ़ी तो माँग ली है, माफ़ करो उसे अब ......लेकिन बीच में ही उस पागल ने मुझे भी रोक दिया.....अं...क...ल....., तुम्हें कुछ नहीं पता ...बीच में मत पड़ो।.....मेरी गाड़ी आई और मैं चढ़ गया .....यही सोचते सोचते की अंकल को तो क्या तेरे जैसे समझदार के तो बाप को भी कुछ पता न होगा..............बस, अगर हम लोग इस तरह से दूसरों के साथ पेश आते हैं तो हम कहां किसी की भी बात सुन कर राज़ी हैं......किसी से सीख लेना तो बहुत दूर की बात हो गई।
हाँ, पहले मैं एक बात जल्दी से दर्ज कर दूँ .....मुझे घमंडी लोगों से बेइंतहा नफ़रत है ....हमारा इतना बड़ा ख़ानदान है, लेकिन घमंड किसी में भी नहीं है ...मैं बड़ा साफ़ साफ़ लिखने वाला हूँ...अगर होता तो लिख देता...सब लोग बडे़ अच्छे से दूसरों के साथ बात करने वाले ..दो एक लोगों में था, मेरे एक कज़िन की पत्नी थी, वह बहुत घमंडी थी यार.....वह दूसरों की तरफ़ ऐसी हिक़ारत भरी निगाहों से देखती थी कि क्या कहें .......और अपनी शेखी बघारने वाली बात भी नहीं है लेकिन जो है, वह है .....मैं भी बिल्कुल भी घमंडी नहीं हूँ ...क्योंकि घमंडी लोग मुझे पता नहीं क्यों पागल जैसे लगने लगते हैं....मेरी बनती भी उन लोगों से ही है जिन में इस पागलपन का कोई अंश न हो.... यह बात पत्थर पर लकीर की तरह है कि हम लोग जिस भी इंसान से मिलते हैं वह हमें कुछ ऐसा सिखाने की क़ाबिलियत रखता है जो हम पहले से नहीं जानते ....लेकिन उस के लिए उसे सुनना तो पडे़गा..
कल मैं एक किताब पढ़ रहा था जिस की फ़ोटो अभी आप को दिखाऊँगा.....दुनिया भर के १०९ लोगों की प्रेरणादायी बातें उस में संकलित हैं.....दो चार पन्ने उलटने के बाद मुझे ख़्याल आया कि यार, देखूँ तो इसमें हिंदोस्तानी कितने हैं...एक ही था....मुझे बहुत अजीब सा लगा ...मैं किताब पीछे हटाई, और चुपचाप सो गया .........सुबह उठा हूँ अभी तो लगा कि जो विचार रात में आ रहे थे उन्हें लिख कर छुट्टी करूँ...
एक बात और ...कोट्स लिखने वाले या कुछ लेखक बडे़ सुपरफिशियल से लगते हैं ....बहुत से इंगलिश लेखक भी या मोटीवेशनल लेखक, मैनेजमेंट गुरू भी बंदे को बाहर बाहर से बदलने की बातें ंकरते हैं......लेकिन मेरा इस में एक प्रतिशत भी भरोसा नहीं है ....मेरा विश्वास है कि किसी को भी मैनेजमेंट तकनीकें रटा कर, कुछ थ्यूरी रटा कर आप नहीं बदल सकते, उसे एक प्रभावशाली मैनेजर में ज़रूर बदल सकते हैं...लेकिन किसी भी बंदे को अंदर से बदलने के लिए कुछ अलग लगता है .....सूफ़ी, संतों की वाणी लगती है, उन की कही बातें लगती हैं जिन्होंने सारी कायनात के भले की बात की...सरबत के भले की बात की ... इसलिए मुझे इन सूफ़ी-संतों की बातें बहुत भाती हैं......
आप के मन में उभर रहा एक सवाल.......इस का मतलब मैं तो अंदर से बदल चुका हूँगा ........उस का मेरा जवाब है ......सवाह से मिट्टी (पंजाबी में हम राख और मिट्टी को ऐसे ही कहते हैं...)
कोट्स हैं क्या, हमारे तजुर्बे ....किसी से बाँटने हैं तो भी ठीक है, नहीं भी शेयर करने तो अपने लिए ही लिखते रहना चाहिए....मैंने भी ८-१० साल पहले लिखने शुरू किए थे, ५०-१०० लिखे भी थे, फिर उसमें मज़ा आना बंद हो गया...छोड़ दिया....और हाँ, जीवन की कुछ सीख अपनी डॉयरी में अपने लिए भी लिखनी होती हैं और कुछ सीख ऐसी भी होती है जिसे लूज़ पर लिख कर तुरंत अच्छे से फाड़ कर नाली में बहाना होता है .........हा हा हा हा .....
मुझे एक बात और याद आ रही है कि मुझे भी कोट्स-वोट्स यहाँ वहाँ से देखने अच्छे तो लगते हैं.....लेकिन हज़ारों में से एक ही कहीं ऐसा दिखता है जिसे अपनी डॉयरी में कहीं लिख कर सहेज लेता हूँ ...इस का मतलब यह नहीं कि मैं अपनी औक़ात भूल गया हूँ.....नहीं, बिल्कुल नहीं, वह कैसे हो सकता है .....उस हिसाब से मेरे पाँव बिल्कुल ज़मीं पर ही हैं.....लेकिन फिर भी अपने तजुर्बों को कोट्स में लिखते रहना चाहता हूँ .....किसी के लिए नहीं, कोई पढ़े न पढ़े, सीख ले या न ले, लेकिन मेरे ख़ुद के लिए मैं लिखते रहना चाहता हूँ....😀
दीवाली मुबारक ....
गुरुवार, 29 सितंबर 2022
बच्चों के डाक्टर भी सैंटा-क्लॉज़, फरिश्ते, प्रभु रूप...ऑल-इन-वन !
| ओपीडी में एक दिन इस हाथ को थामने भर से ही फरिश्ते से रू-ब-रू होने का अहसास हुआ था... |
किसी भी डाक्टर का मूड एकदम अच्छा रहना चाहिए... क्या ऐसा मुमकिन है ...मुझे नहीं पता क्योंकि डाक्टर लोग भी तो हम सब में से ही हैं...लोगों को प्यार है कि वे उन्हें भगवान पुकारते हैं...सच में हैं भी वे सब ...लेकिन यथार्थ के धरातल पर देखा जाए तो हर इंसान की एक व्यक्तिगत ज़िंदगी भी होती है ...इन डाक्टर लोगों की भी होती है ...इसलिए कोई भी डाक्टर जब उदास सा, बुझा हुआ मुझे कभी दिखता है तो मेरा दिल दुःखी होता है ...इसलिए मैं अकसर यही दुआ करता हूं कि सभी डाक्टर प्रसन्नचित रहें...क्योंकि इन की एक हल्की सी मुस्कान मरीज़ों के दिलो-दिमाग पर क्या असर करती है, इसे महसूस किया जा सकता है, लिखने-विखने की चीज़ नहीं है यह...
| बहुत सी चीज़ें ऐसी भी हैं जिन्हें दुनिया की दौलत भी नहीं खरीद सकती ... |
| मम्मी, तुम्हें तो बस गाड़ी की चिंता है, मेरी कुल्फी चाहे पिघल जाए... |
| वे दिन भी क्या दिन थे ....जब हम भी खुद को छोटा-मोटा रॉक-स्टार समझने की गफ़लत करते थे ... |



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