गुरुवार, 29 सितंबर 2022

बच्चों के डाक्टर भी सैंटा-क्लॉज़, फरिश्ते, प्रभु रूप...ऑल-इन-वन !

ओपीडी में एक दिन इस हाथ को थामने भर से ही फरिश्ते से रू-ब-रू होने का अहसास हुआ था... 

किसी भी डाक्टर का मूड एकदम अच्छा रहना चाहिए... क्या ऐसा मुमकिन है ...मुझे नहीं पता क्योंकि डाक्टर लोग भी तो हम सब में से ही हैं...लोगों को प्यार है कि वे उन्हें भगवान पुकारते हैं...सच में हैं भी वे सब ...लेकिन यथार्थ के धरातल पर देखा जाए तो हर इंसान की एक व्यक्तिगत ज़िंदगी भी होती है ...इन डाक्टर लोगों की भी होती है ...इसलिए कोई भी डाक्टर जब उदास सा, बुझा हुआ मुझे कभी दिखता है तो मेरा दिल दुःखी होता है ...इसलिए मैं अकसर यही दुआ करता हूं कि सभी डाक्टर प्रसन्नचित रहें...क्योंकि इन की एक हल्की सी मुस्कान मरीज़ों के दिलो-दिमाग पर क्या असर करती है, इसे महसूस किया जा सकता है, लिखने-विखने की चीज़ नहीं है यह...

अस्पताल में काम करने वाले सभी लोग हाउस-कीपर से लेकर अस्पताल के मुखिया तक सभी लोग बड़े स्पैशल होते हैं...लेकिन इस वक्त तो हम बात कर रहे हैं ..डाक्टरों की और विशेषकर शिशु-रोग विशेषज्ञों की ...बस, यूं ही हमें कल रात सोते वक्त अपने ज़माने के कुछ डाक्टर याद आने लगे ..सुबह उठे तो लगा कि लिख लेते हैं उन के बारे में ही अपनी डॉयरी में...

मैं अकसर आते जाते कहीं भी देखता हूं कि छोटे छोटे बच्चों ने हाथ में बिस्कुट, कुरकुरों, चिप्स चटाका, पटाका, और भी पता नहीं क्या क्या, इन का पूरा पैकेट पकड़ा होता है ...और मां-बाप कहते हैं कि इसे भूख नहीं लगती है ...अगर बच्चा इस तरह का इतना जंक फूड खा लेगा तो उस के बाद और क्या खाएगा, राक्षस थोड़े न है वो...जंक फूड की बीमारी भयंकर है ...क्या कहें, किसे कहें, कोई सुन कर राज़ी नही, सब कुछ लोग खुद जानते हैं इसलिए किसी को सुनने को कोई तैयार ही नहीं...यहां तक कि बच्चों की तबीयत थोड़ी सी भी इधर उधर हुई नहीं कि उन को डाक्टर से पूछे बिना स्ट्रांग दवाईयां देना एक आम सी बात हो चली है ....बच्चों के डाक्टर समझा समझा कर थक जाते हैं लेकिन नहीं, असर कम ही दिखता है ..

शिशु रोग विशेषज्ञों की बात करें तो इंसान की ज़िंदगी में उन की अहमियत बच्चे के जन्म के वक्त से ही नुमाया होने लगती है....प्रसव के दौरान जब तक शिशु की रोने की आवाज़ नहीं सुन लेते, इन की खुद की सांसें थमी रहती हैं ...फिर उस के बाद बच्चों के स्तन-पान की बातें, टीकाकरण...वक्त वक्त पर उन के माइल-स्टोन देखना....इतने सारे काम और सभी जिम्मेदारी वाले ...शिशु अपनी तकलीफ़ बताना नहीं जानता, रोना ही जानता है ...लेकिन इन माहिर डाक्टरों की पैनी निगाहें और सधे-हुए हाथ सब कुछ देख कर, टटोल कर जान लेते हैं...

कल हम लोग ऐसे ही अपने वक्त के शिशु रोग विशेषज्ञों को और हमारे बच्चों के ज़माने के बच्चों के डाक्टरों को याद कर रहे थे ...अंबाला के पास एक जगह है जगाधरी ..वहां पर एक एम डी शिशु रोग चिकित्सक थे ..(अब पता नहीं कि कहां हैं...) डा शाम लाल...उन की फीस थी दस रूपये। पास के किसी गांव से साईकिल से आते थे ...ये ज़्यादा पुरानी बातें नहीं हैं...पहले आकर अपने क्लीनिक की साफ सफाई करते थे, फिर काम शुरू करते थे ...सुबह ही से उन के क्लीनिक के बाहर बच्चों और उन के मां-बाप की लंबी कतार लग जाती थी...उन का सिर्फ नाम ही न था, उन का फ़न भी लाजवाब था ...शहर के डाक्टर को भी बच्चों के मामलों में जब कुछ नहीं सूझता था तो वे उन्हें डा शाम लाल के पास भेज देते थे ...

बहुत सी चीज़ें ऐसी भी हैं जिन्हें दुनिया की दौलत भी नहीं खरीद सकती ...

मम्मी, तुम्हें तो बस गाड़ी की चिंता है, मेरी कुल्फी चाहे पिघल जाए...


आज से पचास बरस पहले मुझे लगता है कि यह शिशु रोग विशेषज्ञ का कोई इतना बडा़ मुद्दा था नहीं....डाक्टर लोग सभी अच्छे पढ़े-गुढ़े हुए होते थे ...मुझे अकसर याद आता है कि गला खराब होने पर या बुखार होने पर जब मां घर ही के पास अमृतसर में एक सरकारी अस्पताल में लेकर जाती है ...तो वह डाक्टर मरीज़ों की तरफ देखे बिना ही दवाई की पर्ची पर घसीटे मार देता और हमारे बाहर निकलते निकलते अगले मरीज़ के लिए दवाई की पर्ची थाम लेता ...बालपन भी स्याही-चूस की तरह होता है....सब कुछ सोखता रहता है भीतर ही भीतर ...अच्छा, उस अस्पताल के सभी के सभी डाक्टर ऐसे नहीं थे...डा वनमाला थीं, अकसर मां को अपनी सहेलियों के साथ बैठ कर उस की तारीफ़ों के पुल बांधते देखता था ...और उस की सब से बड़ी खासियत यही थी कि वह डाक्टर खुश-मिज़ाज थीं और सब के साथ अच्छे से बात करती थीं...

वे दिन भी क्या दिन थे ....जब हम भी खुद को छोटा-मोटा रॉक-स्टार समझने की गफ़लत करते थे ...


खैर, मां को पता रहता था कि यह छोटा-मोटा खांसी जुकाम है ...यह तो ठीक हो जाएगा...मुलैठी से, नमक वाले गुनगुने पानी के गरारों से ...लेकिन जैसे ही उन्हें लगता कि बडे़ डाक्टर को ही दिखाना चाहिए...तो रिक्शा में बिठा कर हमें अमृतसर के मशहूर डाक्टर कपूर के क्लीनिक पर ले जाती ...वहां हम एक दो घंटे इंतज़ार करते ..लेकिन डाक्टर को देखते ही मरीज़ आधा ठीक तो वैसे ही हो जाते ...और आधा मर्ज़ उन की दवा से चला जाता ...जो उन का कंपाउंडर किसी शीशी में डाल कर, और कुछ पूडियां बना कर हमें थमा देता ...50 बरस पहले 15-20 रुपये फीस भी काफी होती थी ...हम ने अपने मां-बाप को तो कभी किसी डाक्टर के पास जाते देखा नहीं, लेकिन बच्चों के लिए डाक्टर की फीस-वीस की कभी परवाह न करते थे ... हमारे वक्त में डाक्टर कपूर के आगे कुछ न था, हमारा भरोसा उस फरिश्ते पर ऐसा था कि बस, आप के पास आ गए हैं, अब तो हम तंदरुस्त हो ही जाएंगे....

सुबह सुबह कईं बार लिखने बैठ तो जाता हूं लेकिन दिल बिल्कुल नहीं करता ...जी तो करता है बाहर खली हवाओं में जा कर टहलने का ..देखता हूं अभी थोड़ी बाद ...हां, तो मैं अकसर डा आर के आनंद की बात ज़रूर करता हूं ...यह भी एक शिशु रोग विशेषज्ञ हैं... 1990 के दशक मे ंयाद है इन के पास जाना बहुत बार ...बच्चों की नियमित जांच के लिए ...जांच करने के बाद, वज़न करने के बाद, शिशु के साथ दो बातें उस की जुबान में करने के बाद....नुस्खे पर लिखते थे ...नो-मैडीसन (कोई दवा नहीं..), और एक दो महीने के शिशु के पर्चे पर लिखते थे ...पानी नहीं पिलाना ...शायद तीन-चार महीने तक पानी नहीं पिलाने की सलाह देते थे और सिर्फ और सिर्फ स्तन-पान करवाने की हिदायत देते थे ....

और हां, उन्होंने बच्चों की देखभाल के ऊपर एक बहुत प्रसिद्द किताब भी लिखी है ...याद आ रहा है उन की इसी किताब का विमोचन था शायद 1998 में ..हम लोग भी महालक्ष्मी मंदिर के पास क्रॉस-व्लर्ड में लांच के लिए गए थे ...मशहूर लेखिका फैमिना की एडिटर विमला गुप्ता मुख्य अतिथि थीं...हमारे पास अभी भी उन की साईन्ड कापी कहीं पड़ी हुई है...उस दौर में सब कुछ इंटरनेट पर न था, हम लोग उन की किताब पढ़ कर ही कुछ फैसले कर लिया करते थे ..सब कुछ सरल भाषा में लिखा था उन्होंने .... कुछ भी तो छूटा न था ...और इस किताब का हिंदी और पंजाबी में अनुवाद करना मेरी विश-लिस्ट में तो है लेकिन यह लिस्ट है ही इतनी बड़ी ....😂 
यहां तक कि उन्होंने स्तन-पान विषय पर भी एक किताब लिखी थी, प्रसव के तुरंत बाद माताओं को स्तन-पान में जो तकलीफ़ें आती हैं, उन का ज़िक्र और समाधान ....यह जो डिब्बा बंद दूध बच्चों के लिए बंद हुआ, बच्चों के दूध की बोतलों का बोलबाला बंद हुआ, इस के पीछे इन महान शिशु रोग विशेषज्ञों की तपस्या है ....इतनी बड़ी मिल्क-पॉवडर और सप्लीमैंट्स की लॉबी से जूझने ऐसे ही दिग्गजों के बस की बात थी ...यहां तक कि वह हर बरस स्तन-पान सप्ताह के दौरान महिलाओं के विश्वविद्यालय में कुछ प्रोग्राम करते जिस में वह छोटे शिशुओं को उन की माताओं के साथ निमंत्रित करते जो केवल स्तन-पान पर ही पल रहे होते ...और उस प्रोग्राम में वह उन माताओं को अपने अनुभव बांटने को कहते जब कि उन के सेहतमंद बच्चे की किलकारियों से हाल गूंज रहा होता...अकसर डाक्टर आनंद भी उन बच्चों को उठा कर एक फ़ख़्र का अनुभव करते ... मुझे यह सब कैसे पता है ...क्योंकि हमारी श्रीमति जी को भी एक ऐसे प्रोग्राम में हमारे बेटे के साथ एसएनडीटी यूनिवर्सिटी में उन्होंने बुलाया था ...वे कामकाज़ी महिलाओं को भी बुलाते, जो लोग घर में रहती हैं उन को भी बुलाते और सभी के साथ उन के अनुभव साझा करते ... ज़ाहिर सी बात है महिला विश्वविद्यालय जैसी जगह में इस तरह के प्रोग्राम का कितना प्रभाव पड़ता होगा ...कन्याओं पर, भावी माताओं पर ...

कुछ दिन पहले हमारे एक साथी भी कुछ ऐसी ही बात शेयर कर थे ...बता रहे थे कि जब भी वह अपनी एक-डेढ़ साल की बच्ची को इस शिकायत के साथ शिशु रोग विशेषज्ञ के पास लेकर जाते कि यह अपनी उम्र के मुताबिक खाती नहीं है तो वह बाल-रोग तज्ञ चिकित्सक उस बच्ची का परीक्षण करने के बाद कह देता...इसे कोई दवा नहीं चाहिए...इसे हवा-पानी पर ही पलने दीजिए, एक चींटी को भी पता रहता है कि उसे कितना खाना है। साथ में वह कह रहे थे कि पुराने ज़माने के चिकित्सक कोई भी गैर-ज़रुरी दवाई न लिकते थे ...बस मां-बाप को अच्छे से समझा-बुझा देते थे और हासिल हुई समजाईश पर अमल करने पर बच्चे एकदम भले-चंगे तंदरूस्त हो भी जाते थे ..

अब पोस्ट को बंद करता हूं ...लिखने को तो बहुत कुछ है ... फिर कभी...



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