शनिवार, 31 दिसंबर 2022

आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने ले के आया रे ...

मुंबई के लोकल स्टेशन पर जब आप सीढ़ी से नीचे उतरें और सामने ट्रेन खड़ी हो तो ज़्यादा कुछ सोचने-समझने की गुंजाईश होती नहीं सिवाए इस के कि जो भी डिब्बा सामने दिखे जिसमें चढ़ने भर की जगह हो, बस उस में सवार होने की करो, बाकी ढोने का काम तो भारतीय रेल बखूबी कर ही देगी...


आज सुबह मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ...मैं जिस डिब्बे में चढ़ा वह सामान वाला डिब्बा था ...जहां तक लोग भारी सामान लेकर चढ़ते हैं...वहां बैठने की जगह भी थी ..पांच सात मिनट का सफर था, मैं बैठ गया....इतने में एक रंग बिरंगी बड़ी सी टोकरी लेकर एक आदमी चढ़ा...उसे नीचे टिकाने के बाद वह अपने मोबाइल में मसरूफ हो गया...और मेरा दिमाग यह गुत्थी सुलझाने में लग गया कि यार, यह है क्या, ये खिलौने हैं कैसे.....खैर, एक दो मिनट बीत गए...गुत्थी वुत्थी तो सुलझी नहीं, लेकिन पता नहीं मुझे कहां से बरसों पुराना एक गीत याद आ गया ...आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने ले के आया रे ....मुझे क्या, हमारे वक्त में यह गीत सब को बहुत भाता था..खूब बजा करता था हमारे रेडियो पर ...

लेकिन मेरे से रहा नहीं गया, मेरा स्टेशन आने वाला था और मुझे अभी तक यही पता न चल सका कि इस टोकरे में है क्या...आखिर, मैंने उस टोकरे वाले पर एक सवाल दाग ही दिया...क्या ये खिलौने हैं?..सवाल तो उसने सुन लिया, हल्का सा उसने मेरी तरफ़ देखा भी लेकिन जवाब देनी की ज़रूरत न समझी...शायद, बंबईया तौर तरीके सीख चुका था या कुछ और कारण होगा....मुझे भी बिल्कुल बुरा नहीं लगा...सवाल उछालना अगर मेरा काम है तो उसे पलट कर जवाब के साथ मेरी तरफ़ फैंकने में किसी की क्या विवशता हो सकती है .....बिल्कुल नहीं...

मुझे यह याद नहीं कि मैंने अपने पास बैठे एक युवक से भी वही सवाल पूछा या उसने खुद ही मुझे बता दिया कि यह तो बुढ़िया के बाल हैं। उसने कहा कि जिसे कैंड़ी-फ्लास भी कहते हैं...मैं तुरंत समझ गया कि अच्छा यह तो वही अपने बचपन वाली 'बुड्ढी दा झाता' (बुढ़िया के बालों का गुच्छा है), हमें कैंड़ी-फ्लास का नाम तब कहां आता था, हमने करना भी क्या था नाम वाम पता करके, बस, हमें उस ठंडे-ठंडे, मीठे मीठे झाटे को खाते हुए मज़ा बहुत आता था ..

मुझे भी थोड़ा याद तो आया कि इस तरह से कैंडी-फ्लास बिकते मैंने कुछ अरसा पहले भी दुर्गा पूजा के किसी पंडाल के बाहर देखे थे ...बड़े बड़े लिफाफों में ५०-५० रूपये में बिक रहे थे ...वह युवक कहने लगा कि अब पैकिंग ऐसी होने लगी है कि ज़्यादा से ज़्यादा सेल हो सके...सही कह रहा था वह.....अब मुझे एक और जिज्ञासा हुई कि यह गिलास इतने रंगों के हैं या कैंडी-फ्लास के इतने कलर हैं....वह भी पता चल गया कि ये अलग अलग फ्लेवर हैं, अलग अलग रंग में...


आज तो वह कैंडी-फ्लास बेचने वाला तो कहीं पीछे छूट गया....मैंने चार पांच बार आनंद बख्शी साहब का वह गीत सुन लिया....आया रे खिलौने वाला खेल खिलौने ले के आया रे ...बख्शी साहब के गीतों की कोई क्या तारीफ़ क्या करें, हर गीत जैसे हमारे जज़्बात की अक्काशी करने वाला ...अच्छा, मज़े की बात यह भी रही कि जैसे ही मुझे उस गीत का ख्याल आया, मैंने यू-ट्यूब पर उसे लगा लिया....मुझे एक मिनट सुनने के बाद यही लगा कि इतने सादे, मीठे, दिल से निकले बोल भी बख्शी साहब की कलम ही से निकले होंगे ...जी हां, जब चेक किया तो मेरा अंदाज़ा बिल्कुल सही निकला.... ज़िंदगी की हर सिचुएशन के लिए फिल्मी गीत हम जैसे लोगों ने दिलो-दिमाग में ऐसे सहेज रखे हैं जैसे लोग मैमोरी-ड्राईव में हज़ारों गीत संजो कर रखते हैं...शायद हम लोगों के दिमाग में भी एक ड्राइव ही अलग से बन चुकी है ...बरसों से इन गीतों को सुनते सुनते, इन का लुत्फ़ उठाते उठाते और इन के बजने पर किसी सपनों की दुनिया में खोते खोते... 

कैंडी़-फ्लास की बात पर लौटते हैं ...इतनी तरह की रंग बिरंगी कैंडी-फ्लास जिस में पता नहीं कौन कौन से कलर और फ्लेवर पड़े हुए  होंगे ...वैसे तो आज कल जो भी बाज़ार में बिक रहा है सब में कलर, फ्लेवर, प्रिज़र्वेटिव तो ठूंसे ही होते हैं ...लेकिन फिर भी हम सब कुछ खाए जा रहे हैं बिना अंजाम की परवाह किए....वैसे, बहुत बार ज्ञान भी खामखां छोटी छोटी खुशियों के आड़े आ जाता है ...शुक्र है जब हम लोग बर्फ के गोले बार बार मीठा रंग डलवा कर खाते थे, उस वक्त इन सब के बारे में कुछ पता न था, वरना ज़िंदगी की उन यादों से भी महरूम ही रह जाते ....

अभी सोचा कि दो महीने पहले दुर्गा पूजा के मेले की कुछ तस्वीरें भी लगा देता हूं...कैंडी-फ्लॉस की 😎.....कैंडी-फ्लास से याद आया कि कहीं बार बार पढ़ता हूं कि कैंडी-क्रश नाम की कोई मोबाईल गेम भी है...उस से दूर रहने को कहते हैं लोग....मैंने भी अभी तक उसे खोल कर नहीं देखा...बस, यूं ही बैठे बैठे कैंडी-फ्लॉस का नाम लेते हुए कैंडी-क्रश का ख्याल आ गया....




सोचने वाली बात है कि ये लोग दरअसल बच्चो की ज़िदंगी में खुशियां घोलने आते हैं ...हमें जब अपना या अपने बच्चों का वक्त याद आता है तो एक अजीब सी खुशी मन में होती है ...जब उस बुज़ुर्ग औरत का ख्याल आता है जो सुबह सवेरे रोज़ बाजा बजाते हुए बेटे को फिरोज़पुर में एक गुबारा देने आती थी.....उसे देखते ही बेटा झूमने लगता था ....और उसे देख कर हम ....ऐसे ही खुशियां बढ़ती हैं....

छोटी छोटी खुशियां थीं....छोटे छोटे खिलौने थे...मां अकसर मंदिर से मेरे लिए एक मिट्टी का तोता लेकर आती थी....मुझे वह सचमुच में एक तोता ही लगता था ...हरा चमकीला रंग, लाल चोंच ...यादों का क्या है, आती हैं तो इन की एक आंधी सी चल पड़ती है ...और खिलौने वाले भी हमें याद आते हैं ...एक तो वह जो हमें बाइस्कोप से सारी दुनिया की सैर करवा जाया करता था ..और इतने सस्ते में ..पांच दस पैसे में ....उस की डुगडुगी की आवाज़ सुनते ही हम लोग भाग कर उस के बाइस्कोप को घेर लेते ... 


हां, बाइस्कोप की बातों से याद आया कि अगर आप न पता हो तो बता दें कि इतवार के दिन दोपहर में २ से ३ बजे तक विविध भारती पर एक प्रोग्राम आता है ..बाइस्कोप की बातें ...जिस में एक फिल्म को लेकर उस की पूरी स्टोरी, डायलाग, गीत सुनाए जाते हैं...बिल्कुल फिल्म देखने जैसा लगता है ...मैं उस प्रोग्राम को कभी मिस नहीं करता ...सब काम छोड़ कर उसे सुनता हूं ...वैसे तो अगले दिन सोमवार सुबह भी वह रिपीट होता है .....क्यों क्या परेशानी है, रेडियो नहीं है ? - उस की कोई ज़रूरत नहीं, मोबाइल पर ही आल इंडिया रेडियो की न्यूज़ ऑन एयर डाउनलोड कर आप दिन भर उस पर विविध भारती के बढ़िया कार्यक्रमों का आनंद ले सकते हैं...पिछले इतवार के दिन मेरा साया फिल्म की स्टोरी सुनी...बहुत बढ़िया ...कल आप भी सुनिएगा... 

3 टिप्‍पणियां:

  1. अतीत की यादों को वर्तमान से जोड़ने की शब्दों की जादूगरी अद्भुत है।सरल शब्दों मे रोचकता बनाये रखना आपकी लेखन शक्ति का कमाल है 🙏

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  2. डॉक्टर साहब बहुत अच्छी सोच है आपकी।
    जिससे इन्सान अपने बचपन में चला जाता
    है,और वखती तौर पर अपना बचपन महशूश
    करता है।ऐसे लोग अपनी ज़िंदगी का लुत्फ
    उठाते हैं और हमेशा अपने को जवान महशूश
    करते हैं।

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