गुरुवार, 5 मार्च 2009

क्यों हूं मैं खुली बिकने वाली दवाईयों का घोर विरोधी ?

आज सुबह ही बैंक में मेरी मुलाकात एक परिचित से हुई ---अच्छा खासा पढ़ा लिखा , अप-टू-डेट है और बीस-पच्चीस हज़ार का मासिक वेतन लेता है। बताने लगा कि डाक्टर साहब कल शाम को जब मेरे गला खराब हुआ तो मैं फलां फलां डाक्टर से कुछ दवाईयां लेकर आया , तो सुबह तक अच्छा लगने लगा। इस के साथ ही उस ने एक अखबार के कागज़ के छोटे से टुकड़े में लपेटी तीन चार दवाईंयां ---दो कैप्सूल, एक बड़ी गोली, एक छोटी गोली –दिखाईं। पूछने लगा कि क्या यह दवाई ठीक है ?

सब से पहले तो मैंने उसे यही समझाना चाहा कि यार, ठीक गलत का पता तो तभी चलेगा ना जब यह पता लगे कि आप जो दवाईयां ले रहो हो उन में आखिर है क्या !! वह मेरी बात समझ रहा था, आगे कहने लगा कि डाक्टर साहब, लेकिन मेरे को तो इस से आराम लग रहा है। मैंने यह भी कहा कि यार, देखो बात आराम आने की शायद इतनी नहीं है, बात सब से ज़्यादा ज़रूरी यह है कि आप जैसे पढ़े-लिखे इंसान को यह तो पता होना ही चाहिये कि आप दवाईयां खा कौन सी रहे हैं। फिर वह मेरे से पूछने लगा कि अब आप बताओ कि यह बाकी पड़ी खुराकें खाऊं कि नहीं --- तब मुझे उसे कहना ही पड़ा कि मत खाओ आगे से यह दवाईयां।

आज कल यह बड़ी विकट समस्या है कि नीम हकीम, झोला-छाप डाक्टर और कईं बार तरह तरह के गैर-प्रशिक्षित डाक्टर लोग इस तरह की खुली दवाईयां मरीज़ों को बहुत बांटने लगे हैं। मैं इन से इतना चिढ़ा हुआ हूं कि जब मुझे कोई दिखाता है कि इन खुली दवाईयों की खुराकें ले रहे हैं तो मुझे उन मरीज़ों को इतना सचेत करना पड़ता है कि वे खुद ही मेरी ओपीडी में पडें डस्ट-बिन में उन बची खुराकों को फैंक देते हैं।

इन खुली दवाईयों से आखिर क्यों है मुझे इतनी नाराज़गी ? –इस का सब से बड़ा कारण यह है कि इन दवाईयों के इस्तेमाल करने वाले मरीज़ों के अधिकारों की रक्षा शून्य के बराबर होती है। उन्हें पूरी तरह अंधेरे में रखा जाता है --- न दवाई का पता, न कंपनी का पता ---- यह तो भई बस में बिक रही दर्द-निवारक गोलियों की स्ट्रिप जैसी बात ही लगती है। उन्हें अगर किसी दवाई से रिएक्शन हो भी जाता है तो उन्हें यह भी नहीं पता होता कि आखिर उन्हें किस दवा के कारण यह सब सहना पड़ा। इसलिये संभावना रहती है कि भविष्य में भी वे दोबारा उसी तरह की दवाईयों के चंगुल में फंसे।

दूसरा कारण है कि आज कल वैसे ही नकली दवाईयों का बाज़ार इतना गर्म है कि हम लोग इतने इतने साल प्रोफैशन में बिताने के वाबजूद कईं बार चकमा खा जाते हैं। अकसर ये नीम हकीमों द्वारा बांटी जाने वाली दवाईयां बहुत ही सस्ते किस्म की, घटिया सी होती हैं ------इनका जितना विरोध किया जाये उतना ही कम है। तीसरा कारण है कि मुझे पूरा विश्वास है कि इन तीन-चार गोलियों-कैप्सूलों में से जो सब से छोटी सी गोली होती है वह किसी खतरनाक स्टिरायड की होती है ----steroid ----खतरनाक शब्द केवल इस लिये लिख रहा हूं कि ये लोग इन बहुत ही महत्वपूर्ण दवाईयों का इतना ज़्यादा गलत- उपयोग करते हैं कि बिना वजह भोले-भाले मरीज़ों को भयानक शारीरिक बीमारियों की खाई में धकेल देते हैं, इस लिये मैं इन का घोर विरोधी हूं और हमेशा यह विरोध करता ही रहूंगा।

नकली, घटिया किस्स की दवाईयों से ध्यान आ रहा है ---पंद्रह-बीस साल पहले की बात है कि हमारा एक दोस्त बता रहा था कि रोहतक शहर में उस के पड़ोस में एक नीम-हकीम अपने बेटे के साथ मिल कर रात के समय खाली कैप्सूल में मीठा सोडा और बूरा चीनी भरते रहते थे और सुबह मरीज़ों का इस से कल्याण किया करते थे। लालच की भी हद है !!--- यहां यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि यह खाली कैप्सूलों के कवर बाज़ार में पैकेटों में बिकते हैं –और बस केवल चालीस-पचास रूपये में एक हज़ार रंग-बिरंगे कवर उपलब्ध हो जाते हैं। अब आप ही सोचें कि खुली दवाईयों को खाना कितना खतरनाक काम है ------अब कौन इन खाली कवर में क्या डाले, यह तो या तो डालने वाला जाने या ईश्वर ही जाने !!

मुझे अकसर लगता है कि मेरी जो यह खुली दवाईयों के बारे में राय है शायद इस के विरोध में किसी के मन में यह विचार भी आता हो कि यह तो हाई-फाई बातें कर रहा है , अब अगर किसी मरीज़ को बीस रूपये में दो-तीन दिन की दवाई मिल रही है तो इस में बुराई ही क्या है !! देश में निर्धनता इतनी है कि मेरे को भी इस बात का सही समाधान सूझ नहीं रहा ---- अगर जनसंचार के विभिन्न माध्यम इस तरह की बातों के प्रचार के लिये बढ़-चढ़ कर आगे आयें तो शायद कुछ हो सकता है।

ऐसा मैंने सुना है कि कुछ क्वालीफाईड डाक्टर भी कुछ तरह की दवाईयां ज़्यादा मात्रा में खरीद कर मरीज़ों को अपने पास से ही देते हैं, अब ऐसे केसों में यह निर्णय आप लें कि आप क्या उन्हें यह कहने के लिये तत्पर हैं कि डाक्टर साहब, कृपया आप नुस्खा लिख दें, हम लोग बाज़ार से खरीद लेंगे। यह बहुत नाज़ुक मामला है, आप देखिये कि इसे आप कैस हैंडल कर सकते हैं। मेरे विचार में अगर आप किसी क्वालीफाइड डाक्टर से इस तरह की खुली दवाईयां लेते हैं तो भी आप के पास ली जाने वाली दवाईयों का नुस्खा तो होना ही चाहिये।

कईं बार हास्पीटल में दाखिल मरीज़ों को नर्स के द्वारा खुली दवाईयां दी जाती हैं --- वो बात और है, दोस्तो, क्योंकि उस वक्त हम लोगों ने पूरी तरह से अपने आप को उस अस्पताल के हाथों में सौंपा होता है। बहुत बार तो नर्स आप की सुविधा के लिये गोलियों एवं कैप्सूलों का कवर उतार कर ही देती हैं , मेरे विचार में इस के बारे में कोई खास सोचने की ज़रूरत नहीं होती, यह एक अलग परिस्थिति है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही बात कही आप ने जब मै भारत मै था तो एस्परीन ओर अन्य सिर दर्द की दवा पनवाडी से मिल जाती थी, उस समय तो य सब बाते मुझे पता नही थी, लेकिन यहां आने के बाद इन सब बातो का पता चला कि वो सारी दवाईया नकली होती थी.
    लेकिन वहां लोग नही समझते, मेने बहुत से लोगो से बात की, लेकिन कोई नही यह बात मानता, नीम हकीम के पास भी जाते देखा प॑ढे लिखे लोगो को तंत्र मंत्र करावाते भी देखा बहुत पढे लिखे लोगो को, तो अनपढॊ का क्या कहना.
    धन्यवाद

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  2. आपने सही मुद्दा उठाया। अक्सर आरऍमपी डॉक्टर अपने पास इस तरह की दवाइयाँ डिब्बों में भरकर रखते हैं और मरीजों को देते हैं। एक बार मुहाँसों से परेशान होने पर यमुनानगर आइटीआइ रोड स्थित एक कथित चर्म रोग विशेषज्ञ से मैं दो-तीन महीने दवाई लेता रहा, वे ऐसी ही खुली दवाइयाँ देते थे। कोई असर न हुआ, तंग आकर दूसरे डॉक्टर से दवाई ली तो सिर्फ दो-तीन दिन मे सुधार होने लगा। ये खुली दवाइयाँ देने वाले डॉक्टर मुनाफे के चक्कर में मरीजों की सेहत से खिलवाड़ करते हैं।

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  3. कुछ दिनों पहले मेरे चाचाजी के दाँत में दर्द हो रहा था, वे डेन्टिस्ट के पास जाने की सोच रहे थे कि उनके एक मित्र मिलने आए और चाचाजी को कहने लगे.. रुक मैं तुझे एक अच्छी दवाई लिख कर देता हूँ। इससे मेरे दाँत एकदम ठीक हो गए थे। मैं वहीं खड़ा हुआ था मुझे जोरदा हंसी आ गई दवाई का सुझाव देने वाले मित्र के मुँह में कुल पन्दर दाँत थे और वे भी इतने गन्दे की उबकाईयां आने लगें.. लेकिन फिर भी दूसरों को सुझाव दे रहे थे।

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