दो दिन पहले शाम के वक्त मैं मुंबई के फाउंटेन इलाके में बेवजह टहल रहा था ....फुटपाथ पर किताबें देख कर उस तरफ हो गया....निहारने लगा किताबों को....अचानक नज़रें एक किताब पर जा कर टिक गईं...कुछ किताबें उस बुकसेलर ने डिस्पले की हुई थीं ...पन्नी में अच्छे से लपेट कर ...यह भी उन में से एक थी .....किताब का नाम था ....डालडा कुक बुक....
![]() |
| किताब का कवर जिसने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया ... |
हमने बहुत सी कुकरी की किताबें देखी हैं...तरला दलाल से लेकर कपूर तक ....और भी बहुत सी महंगी महंगी किताबें यहां वहां दिखती रहती हैं. ..नया ओवन लो, नया ओटीजी लेते हैं तो उन के साथ भी आती हैं ...किताबों की भरमार है जैसे ....
ज़ाहिर है मेरे जैसे बंदे का इस तरह की किताब के लिए खिंचाव....मैंने उसे प्लास्टिक की थैली से बाहर निकाला.....उसे देखते ही मज़ा आ गया....अंदर क्या होगा, नहीं होगा, उससे मुझे सरोकार नहीं था ...वह देखने में ही मेरे से भी पुरानी लग रही थी ....उस में जो तस्वीरें थीं वे भी उस की कम से कम 60 बरस से ज़्यादा की उम्र की गवाही दे रही थीं...
कुछ भी खरीदने में मुझे मिनट से भी कम वक्त लगता है ....मैंने पूछा कि क्या दाम है इस किताब का..
सर, आप को पांच सौ रूपए में ....(वही घिसा पिटा डॉयलाग)....
मैंने कहा ....इतना क्यों, कम करो, दो सौ रूपए देता हूं...
उसने मना कर दिया....यह कह कर कि यह एंटीक है, 60-70 बरस पुरानी है ...कहीं नहीं दिखेगी आप को ...
मैं उस की बात से सहमत था, इन को भी पता है जो लोग इस तरह की किताब उठा कर उस के पन्ने उलट-पलट रहे हैं, वे उसे लेने ही वाले हैं....
जी हां, मैं भी ऐसा ही सोचता हूं ...क्योंकि मेरी पीढ़ी जो डालडे पर ही पली है, हमने भी न कभी इस तरह की किताब के बारे में पढ़ा और देखने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता....खैर, मैंने उसे चार सौ रूपए दिए उसने रख लिए....पता मुझे भी वह और उसे तो मुझ से भी कहीं ज़्यादा ज्ञान है कि इस की असल कीमत कितनी होगी....एक रुपए से कम। वह बात अलग है कि एमेज़न पर जब बाद में मैंने देखा तो पता चला कि वहां पर तो यह कईं गुणा ज़्यादा दाम पर बिक रही है .....लेकिन फ़िलहाल ऑउट-ऑफ-स्टॉक दिखा रहा था ....खैर, चलिए किताब खरीदनी थी, सो खरीद ली...
रास्ते में लोकल ट्रेन में बैठा मैं इस के पन्ने उलट-पलट रहा था...मुझे तो सब से पहले परांठा वाला पन्ना देखना था ....आप भी देखिए कि परांठे बनाने में कितना डालडा खप जाया करता था ...मुझे ख्याल आया कि डालडे से जुड़ी अपनी यादों के बारे में तो मैं पहले भी एक पोस्ट लिख चुका हूं ..
वहीं ट्रेन में बैठे बैठे देखा तो एक नहीं, दो पोस्टें दिखीं....एक तो अप्रैल 2022 में लिखी थी और दूसरी शायद मार्च 2023....ऐसे ही जल्दी जल्दी उन पर निगाह भी डाली ....वैसे मैं कुछ भी लिख कर फिर से उसे पढ़ता नहीं हूं....बिल्कुल उस कहावत की ही तरह कि हलवाई अपनी मिठाई नहीं खाता....मैं कभी लिखे हुए को एडिट भी नहीं करता....मैं अपनी उन दोनों पोस्टों के लिंक यहां दे रहा हूं, अगर आप देखना चाहें तो देखिएगा.....मुझे डालडे के बारे में अपनी यादें को लिखने में बड़ा मज़ा आया था ....
एक पोस्ट का लिंक यह रहा ... डालडे दा वी कोई जवाब नहीं
कुछ बातें शायद उन पोस्टों में लिखऩी रह गईं थीं कि यह जो डालड़ा घी था यह दो किलो ओर चार किलो के टिन के डिब्बे में आता था ...बहुत बार हमारे यहां चार किलो वाला डिब्बा ही लाया जाता था ...दो बातें याद हैं बडे़ अच्छे से ...एक तो उस डिब्बे का ढक्कन खोलने के बाद भी टिन की एक शीट सी लगी होती थी उस के ऊपर ...जिसे एक विशेष ओपनर से ही खोलते थे ....शायद हमारे यहां जब कोई उसे चाकू से खोल रहा था तो उस के हाथ में वह नुकीला टिन का पतरा लग गया था ...इसलिए उसे हमेशा हमारे पिता जी ही खोलते थे ....दूसरी बात यह है कि उस में से चमम्च से और कईं बार उंगली टेढ़ी कर के मां का घी निकालना और उसे अंगीठी पर सिक रहे पराठों पर चुपड़ना ऐसे याद है जैसे कल की ही बात हो .... हा हा हा हा ....😎😂😂...बाकी मज़ेदार यादें आप डालडे पर लिखी मेरी पुरानी पोस्टों में देख-पढ़ सकते हैं .....मुझे लगा कि मैंने बहुत सी बातें शायद दूसरी पोस्ट में दोहरा दी हैं लेकिन नहीं, उस में कुछ रेपिटिशन हुई है लेकिन कंटैंट कुछ अलग सा है, आज से 50-60 बरस पुराने इश्तिहार भी उसमें लगाए हैं....
दूसरी पोस्ट का लिंक यह रहा ... डालडे पर पलने वाली पीढ़ी के भी अपने मज़े थे
अभी मुझे लिखते लिखते हंसी आ रही थी कि हम लोग लिपिड प्रोफाईल करवाते हैं ....तरह तरह के फैट का अनुपात देखते हैं ..फिर उस पर मंथन करते हैं, किसी और बढ़ाना है, किसे घटाना है और कैसे, कौन सी दवाई ले कर या कसरत कर के ...क्या खाना है, क्या बंद करना है, इस तरह की रणनीति बनती है ....अगर कोई ऐसा भी टैस्ट बाद में आ जाए जिस से कि जिंदगी के तीस बरस तक डालडा-रथ खाने वाले के खून में कितना डालडा जमा पड़ा है तो मुझे लगता है मेरी पीढ़ी में तो सब डालडा ही डालडा दिखेगा....और कुछ नहीं!!
और हां, उस डालडा कुक बुक का क्या बना ...उसे फ्लोरा-फाउंटेन के फुटपाथ से उठा कर मैंने स्टडी-रूम में डिस्पले कर दिया है ....मुमकिन है यह मेरे लेखन के लिए एक प्रॉप का काम करेगी ...पता नहीं क्या कुछ याद दिलवाएगी सामने पड़ी पड़ी ...बिल्कुल एक नॉस्टेलजिक बुकमार्क की तरह ....
पोस्ट बंद करते करते सोचा कि परांठे की विधि जो इसमें लिखी है, उसे तो साझा कर दें.....





रोचक... डालडा से हमारा वास्ता कम ही पड़ा है... रिफाइन्ड तेल या घी से ही अक्सर घर में बनते थे... लेकिन डालडे के डिब्बे याद हैं और ये भी कि वनस्पति घी के लिए डालडा ही कहते थे लोग बाग हमेशा...
जवाब देंहटाएं