रविवार, 10 मई 2026

दांतों से काले-पीले धब्बे दूर करने के ख़तरनाक जुगाड़...


कल लोकल ट्रेन में मेरे साथ बैठा एक शख्स इंस्ट्राग्राम पर एक व्हीडियो देख रहा था ...हैरान सा भी हो रहा था ...मेरा भी ध्यान उस तरफ़ गया तो मेरी भी आंखे खुली की खुली रह गईं...पत्थर-टाईलें लगाने वाला एक मिस्त्री अपने किसी साथी के दांतों की रगड़ाई कर रहा था ...यह देख कर तो मैं डर गया कि यह काम पत्थर-टाईलें काटने वाली मशीन से किया जा रहा था ....

जब मैंने उस व्हीडियो को अपने मोबाईल पर दो चार बार देखा ..तो अहसास हुआ कि मिस्त्री यह दांतों की डाक्टरी खड़े खड़े ही कर रहा था और एक बात कि मशीन उसने अपने बाएं हाथ में पकड़ी हुई थी...दाएं हाथ से उसने मरीज का सिर थामा हुआ था ....


इस व्हीडियो को देख कर कोई भी कांप जाए ....क्योंकि यह कल्पना डाक्टर ही कर सकते हैं कि यह काम कितना जोखिम भरा रहा होगा....मरीज़ ज़रा सी भी सिर हिला दे, या डाक्टर-मिस्त्री का ही थोड़ा सा भी हाथ हिल जाए तो उससे मुंह का क्या क्या कट-फट जाए, इस का हिसाब लगाना भी मुश्किल है ....दांतों की तो उस ने ऐसी की तैसी कर ही दी ...वह बात बाद में करते हैं...लेकिन दांतों पर जिस तरह से यह कारीगरी की जा रही है अगर यह मशीन होंठ को छू जाए तो होंठ और नाक को छू जाए तो नाक....उड़ के कहां चला जाए पता ही न चले, चीथड़े उड़ जाएं, आंख कौन सा दूर थी....

ईश्वर सब को ऐसी बुद्धि दे कि इस तरह के खतरनाक खेल न खेलें.....। 

और भी क्या क्या हैं जुगाड़ .....

बहुत से जुगाड़ हैं जो लोग दांतों पर लगे काले-पीले धब्बे मिटाने के लिए इस्तेमाल करते आ रहे हैं....लेकिन यह जो टाइल कटर से धब्बे उतरवाने वाला जुगाड़ मैंने कल पहली बार देखा...। 

टुथ स्टेन-रिमूवर ....आज से चालीस-पैंतालीस बरस पहले जब हम लोगों ने डैंटल कॉलेज में दाखिला लिया तो हमें दूसरे साल से अपने इंस्ट्रयूमेंट भी खरीदने होते हैं...उस को प्री-क्लिनिकल ट्रेनिंग कहते हैं ...जब हम लोग फैंटम-हैड पर एक साल काम करने की प्रैक्टिस करते हैं....फैंटम-हैड पर जबाड़े भी लगे होते थे और दांत भी ...हम उन दांतों में अलग अलग तरह के प्रोसिजर करते थे ....

हां, जब हम इंस्ट्रयूमैंट खरीदने जाते तो अकसर देखते कि उस सर्जीकल-स्टोर पर कांच की छोटी छोटी बोतलें रखी होतीं जिन पर लिखा होता ...टुथ स्टेन रिमूवर। हमें तब डैंटिस्ट्री की ए-बी-सी न आती थी ...लेकिन वक्त के साथ अगले एक दो सालों में हमें हमारे सीनियर्स से पता चला कि जो नीम-हकीम, झोला-छाप, फुटपाथ पर बैठे या बिना किसी डिग्री विग्री के दांतों का काम करने वाले दांतों के ऊपर से दाग-धब्बे उतारने के लिए इस लिक्विड का उपयोग करते हैं ...और जो अहम् बात पता चली कि इस तरह का काम भयंकर है ...क्योंकि इस में एसिड मिला होता है ...जो दांतों का दाग तो क्या, उस की बाहरी परत इनैमल भी खरोंच डालता है ....

मरीज़ का हाल? - मरीज़ का हाल यह कि वह उस वक्त तो खुश लेकिन इनैमल उतर जाने से उस को ठंडा-गर्म लगने लगता है और कुछ ही दिनों में वे दाग पहले से भी बदतर रूप में फिर से लौट आते हैं...बाकी रही बात मरीज़ को बातों में उलझाने में, वह झोला-छाप से बढ़िया कौन जानता है। वैसे तो कोई वापिस आएगा ही नहीं शिकायत लेकर ...क्या क्या नहीं चल रहा फुटपाथों पर या फर्जी डाक्टरों के अड्डों पर ....। मुझे यकीं है अभी भी ये टुथ-स्नेर रिमूवर ज़रूर मिलते होंगे ....। 

रेती से घिस देना....

इन सभी बरसों में कभी कभी ऐसे मरीज़ भी आए कि जिन्होंने अपने आगे के दांतों से दाग-धब्बे दूर करने के लिए रेती का इस्तेमाल कर लिया....हमें पता तब चलता जब दांतों पर गहरे गड्ढे दिखते और पूछने पर पता चलता कि यह तो दांतों को रेती से घिसने से हुआ है ....इस में भी वही, दांत की बाहरी परत घिस जाती है और वही ठंडा-गर्मी और दाग-धब्बे बद से बदतर हो जाते हैं। 

दाग-धब्बे मिटाने वाले पावडर....

अकसर बाज़ारों में देखते रहे हैं कि चूहे, खटमल मारने वाली दवाई, मच्छर भगाने वाली दवाई बेचने वाले यह दांतों के इलाज की सेवा भी करते हैं, एक पैकेट तीस-चालीस रुपए का बेचते हैं ...साथ में लाउड-स्पीकर पर एनाउंसमैंट कि अब पान-गुटखे के धब्बों को खुद ही साफ करें। एक पैकेट इन्होंने खोल रखा होता है ...अगर कोई ट्राई करना चाहे तो खुशी से करे ....उस का कोई पैसा नहीं....

यहां भी वही लफड़ा है कि इस पावडर में भी वही एसिड होता है जो दांतों पर कहर बरपा देता है जैसा मैंने ऊपर लिखा है ...यह काम तो हम लोगों ने बस-अड्डों पर भी और बसों में भी होते देखा है ...। 

दाग-धब्बे दूर करने वाली मोबाईल ट्राली.....

पता नहीं आपने देखा है कि नहीं, मैंने तो आज से लगभग १०-१५ बरस पहले लखनऊ की एक मार्कीट में कुछ युवक एक ट्राली लेकर चलते देखे ...जो दांतों से दाग धब्बे उतारने का काम कर रहे थे ...उस के बाद तो मैंने बहुत जगह ये कारीगर देखे हैं....आखिरी बार जब इन को देखा था तो ये दाग-धब्बे दूर करने के चालीस रुपए लेते थे...अब पता नहीं....और हां, इन का भी मोडस-ओप्रेन्‍डाई वही ....वही कोई स्टेन-रिमूवर लिक्विड लेकर अपने पास रखे औज़ारों से दांतों पर लगा देते हैं....यहां स्नेर-रिमूवर के लिक्विड में एसिड के रोने के साथ साथ दूषित औज़ारों से होने वाली भयंकर बीमारियों का भी भरपूर जोखिम ...। 

लेेकिन यह दाग होते क्यों हैं दांतों पर .....

दो तरह के दाग होते हैं दांतों पर ....

बाहरी और अंदरूनी ...

बाहरी दाग धब्बे ....

ये होते हैं ब्रुश ठीक से न करने पर ...या कुछ खाने-पीने की चीज़ों की वजह से होते हैं और गुटखा, पानमसाला तंबाकू की वजह से भी ये  बाहरी दाग धब्बे - बाहरी इसलिए कहते हैं क्योंकि ये दांत की सतह की ऊपर होते हैं....और सामान्य तौर पर ये आसानी से छूट भी जाते हैं ...किसी डेंटल क्लीनिक पर जा कर आप को स्केलिंग करवानी होगी ....और वह खाने-पीने की आदत छोड़नी होगी ताकि फिर से न हो यह सब कुछ .....लेकिन आदतें तो कम ही छूटती दिखी हैं मुझे ....वारिस शाह न आदतां जांदीयां ने, चाहे कट्टो पोरियां पोरियां जी ......

देखने में चाहे जितने भी खराब लग रहे हैं, लेकिन ये भी बाहरी दाग ही हैं....जो तंबाकू, पान वान की वजह से हैं.. ७० बरस का यह मरीज़ दो चार दिन पहले आया था ...मैंने कहा कि ये आदतें छोड़ दें, हम यह सब कालिख हटा देंगे, कहने लगा कि पान इस उम्र में कहां छूट पाएगा, क्या फर्क पड़ता है ...!!


अंदरूनी दाग-धब्बे ....

इस का सब से बड़ा कारण है ....फ्लोरोसिस....जिन इलाकों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा रहती है उस इलाकेे में रहने वालों की हड्डियों में भी कुछ जटिलताएं आ जाती हैं और दांतों पर भी पीले-भूरे दाग हो जाते हेैं....जैसे ही ये पक्के दांत मुंह में आते हैं उन पर इस तरह के पीले-भूरे दाग नज़र आते हैं...और यह अकसर बहुत से दांतों में देखे जाते हैं....चूंकि ये दांत के अंदर होते हैं, इसलिए ये स्केलिंग से नहीं जाते ....और इन के लिए भी रेती, और स्टेन-रिमूवर जैसे तरह तरह के जुगाड़ इस्तेमाल किए जाते हैं ....लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता ...पड़ सकता भी नहीं...

इसके लिए भी प्रशिक्षित दंत चिकित्सक को दिखाना चाहिए ....वह अपने अनुभव से यह फैसला करता है कि क्या ये ब्लीचिंग से ठीक हो जाएंगे, या इन के ऊपर कोई दांतों के कलर की कोई फिलिंग (जैसे कंपोज़िट) कर दी जाए...दाग को छिपाने के लिए.....(उसे थोड़ा सा घिसने के बाद)....या फिर अगर पोर्सिलेन-लैमीनेट की ज़रूरत हो तो मरीज़ को बता दिया जाता है ...

सरकारी अस्पतालों में ज़्यादा से ज़्यादा कंपोज़िट फिलिंग या कंपोज़िट-लेमीनेट तक ही इलाज हो पाता है ...और वह भी कितने लोगों को मिल पाता है या कितने लोग इतने बड़े अस्पतालों तक पहुंच कर यह काम करवा पाते हैं ....यह भी एक मुद्दा है .....। इसलिए लोग फिर जुगाड़ की तरफ हो लेते हैं....। 

टाइल कटर वाली घिसाई और दंत चिकित्सक द्वारा की जाने वाली घिसाई ....

टाइल कटर वाली घिसाई के तो जोखिम की बात ही क्या करें....लेकिन दंत चिकित्सक भी जो इस तरह के दांत की फिलिंग से पहले थोडी़ बहुत घिसाई करता है, वह हर तरह की सावधानी बरतता है ....सब से पहला लक्ष्य उस का यही होता है कि कुछ भी हो, मरीज़ का कुछ परेशानी नहीं होनी चाहिए, उस की तकलीफ नहीं बढ़नी चाहिए, इसीलिए जब हम लोग एयर-रोटर (हाई-स्पीड टर्बाइन) को  दांतो पर चलाते हैं तो हम पूरी तरह से सचेत रहते हैं....लगातार पानी का जेट चलता रहता है, और मरीज़ को यह पहले हिदायत दी जाती है कि जब यह मशीन चल रही हो तो हिलना-ढुलना नहीं है, अगर मशीन रुकवानी है तो हाथ से इशारा कर देना, हम रुक जाएंगे.....और एक ज़रूरी बात , दंत चिकित्सक को कालेज ही से इतना पक्का कर दिया जाता है कि दांत के ऊपर रखने के बाद ही उस मशीन को चालू करना है और दांत पर ही बंद करने के बाद उसे बाहर निकालना है ....।इतनी सावधानी के बावजूद भी कभी कभी जब कोई ज़्यादा हिल-ढुल करने वाला बंदा सिर हिला देता है और अगर वह ड्रिल थोडा़ सा होंठ को भी छू जाए तो रक्त बहने लगता है ..उस जगह को दबाने भऱ ही से रुक जाता है, दो मिनट में....कोई परेशानी नहीं होती और हां, कईं बार दंत-चिकित्सक के हाथ में वह चुभ जाती है ....। मतलब यही कि बेहद सचेत रह कर काम करना पड़ता है ...इसीलिए जब से वह टाइल-कटर को अपनी बड़ी सी मशीन से दांतों की रगडाई करते देखा तो बहुत बेचैनी महसूस हुई ....इसलिए यह बात लिख दी ...........अब कौन यह सब पढ़ेगा ....इंस्टा वाली उस की पोस्टों तो लाखों-करोडो़ं ने देखी होगी ....लेकिन इस लेख को कौन पढ़ेगा, कौन शेयर करेगा....चलिए, जो मुझे मुनासिब लगा मैंने लिख दिया.......आग बुझाने वालों में नाम तो शामिल हो जाएगा मेरा ......

कोई सवाल हो तो नीचे कमैंट में लिखिए....जवाब ज़रूर दूंगा....

लिखते लिखते मो रफी साहब का पंजाबी गीत याद आ गया....१९५९ की पंजाबी फिल्म थी ...सफेद दांत हंसने से बाज़ नहीं आते ...और लोग बेकार में शक करने लग जाते हैं... जब हम स्कूल में पढ़ते थे तो जालंधर रेडियो स्टेशन से यह गीत शाम को बहुत बार बजा करता था ...


1 टिप्पणी:

  1. ज्ञानवर्धक जानकारी। आजकल तो अमेजन इत्यादि में भी टीथ वाइटनर मिलते हैं। वह कितने कारगर होते हैं ये तो नहीं पता लेकिन बिक्री उनकी भी खूब होती है।

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