शनिवार, 28 मार्च 2026

अंगीठी, भट्ठी, चूल्हा, कांगड़ी.....गुज़रे दौर की मीठी यादें, बातें ...

26.3.26 - रात 10 बजे 

मैं आज सुबह सोच ही रहा था कि मुझे आज अंगीठी से जुड़ी यादें इस वेब-लॉग पर लिखनी हैं...मैं रिक्शा में था, इतने में मुझे एक चाय की दुकान दिख गई ...अंगीठी पर चाय बन रही थी....यह फोटो आज सुबह की ही है ...यह सबूत ही काफ़ी है कि गैस सिलेंडर की किल्लत तो है ही ...बहुत अरसे बाद किसी अंगीठी पर चाय खौलती देखी....इच्छा हुई कि यही उतर जाऊं और अपने मनपसंद चाय पी लूं, फिर आगे चलूं....


मुंबई -बांद्रा की एक नुक्कड़ की यह तस्वीर ...दिनांक 26 मार्च, 2026

अंगीठी पर लिख रहा हूं....मेरी पीढ़ी के लगभग सभी लोगों की यादें इस के साथ जुड़ी हैं....मुझे अच्छा लगता है कि जब लोग मुझे मैसेज करते है्ं कि हमारी यादें भी तु्म्हारे जैसी ही हैं....क्या लिखा आज एक पाठक ने ...."मेरा मानना है. हम अपनी परछाईयों से ही भागते रहे जब कि आप की दौलत उन्हीं फ्लैशबैक में निहित है.." ...ठीक है, हर किसी को लिखना चाहिए...बात के साथ बात जुड़ती है, बात से बात निकलती है तो ही बात आगे बढ़ती है ....खैर, मैं तो हर किसी को प्रेरित करता हूं कि अपनी डॉयरी लिखने से शुरुआत कीजिए...

हां, तो अंगीठी की बात शुरु हुई थी .....

एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस टॉपिक पर मैं जो अनुभव लिख रहा हूं ...वे सभी पंजाब के अमृतसर शहर की एक मध्यमवर्गीय कॉलोनी से जुड़े हुए हैं...न मैं कभी किसी गांव में रहा और न ही मेरा अमृतसर के किसी बड़े पॉश इलाके में कभी आना जाना हुआ...इसलिए ये सारी यादें एक मध्यमवर्गीय इलाके से जुड़ी हुई हैं....

1960 के दशक का मेरा जन्म है --अमृतसर में ही मेरा अवतार हुआ ...वहां की रेलवे कॉलोनी में ही आंखें खोली, और अगले लगभग 25-26 बरस उसी का ही पानी पिया...हां, तो जहां तक बचपन की याद है कि हर घर के बाहर सुबह और शाम के वक्त एक अंगीठी तैयार कर के रखी जाती थी ... किस लिए ? -- अंगीठी भखन लई ....यानि अंगीठी को भखने के लिए रख दिया जाता था ....मेरे पास अब अंगीठी के भखने के लिए कोई हिंदी लफ़्ज नहीं है, हां, समझा सकता हूं कि अंगीठी को जब आग लगा के घर के बाहर दरवाजे के पास रखा जाता था तो शुरुआत में लगभग 10-15 मिनट उस में से धुआं निकलता रहता था ....फिर अचानक धुआं खत्म हो जाता और उसमें से आग की लपटें निकलने लगती....

मुझे याद है जब अंगीठी अच्छे से भख जाती ...उसमें से आग की ऊंची ऊंची लपटें निकलने लगती तो मां की खुशी देखने लायक होती ....सच में उसे ऐसे लगता जैसे की कोई लाटरी लग गई हो ....क्या गजब का वक्त था, छोटी छोटी बातों में भी कितनी बड़ी बड़ी खुशियां छुपी रहती थीं.....वैसे अंगीठी का अच्छे से लट-लट कर के जलना छोटी बात नहीं थी, घर की गृहिणी को ही पता होता अगर अंगीठी की आग कभी मद्द्म रह जाती तो उस पर खाना तैयार करना और दुनिया भर के आग पर किए जाने वाले काम कितने दुश्वार हो जाते .....

27.3.26 प्रातः 4.30 बजे 

अच्छा, एक बात और ….अंगीठी जब जला के घर के बाहर रख दी जाती थी, उस में से धुआँ छटने के बाद आग की लपटें निकलने के इंतज़ार में तो बीच बीच में उसे एक दो बार बाहर जा के देखने भी होता था…यह इसलिए कि कईं बार कुछ छोटी मोटी माइनर एडजस्टमैंट करनी पड़ती थी ….लोहे की किसी पतली सीख (डंडी) से कोयलों को थोड़ा हिलाना ढुलाना पड़ता था ..और कईं बार उसे किसी मोटे कार्डबोर्ड से ( जो कि हमेशा ही अपनी किसी नोटबुक  या पुरानी किताब की जिल्द होती थी, और उसे भी ढूंढना पड़ता था.. …अफसोस, उस वक्त स्विग्गी या ज़ोमेटो न था, न ही फ्लिपकार्ट, इसलिए अब रोज़ाना इक्ट्ठे होने वाले कार्डबोर्ड के डिब्बे नहीं होते थे ….) थोड़ी हवा खिलानी पड़ती थी ….और देखते ही देखते
आग धधक पड़ती थी …और फ़ौरन अंगीठी को अंदर ले आ कर उस पर बढ़िया, मस्त चाय के लिए पानी चढ़ाया जाता था …सब कुछ इलायची, सौंफ, अदरक-वदरक कूट पर उस में डाल के ….

अच्छा, एक बात और याद आ गई….जब मां घर के गेट के बाहर अपनी अंगीठी उठा कर अंदर लेकर आने के लिए जाती तो आस पास कपूर, सोढ़ी, रामलाल और विद्या की मां और टीटू के घर के आगे पड़ी अंगीठीयों की तरफ़ भी नज़र डाल लेती ….किस की अंगीठी कहां तक पहुंची….हां, कईं बार अगर किसी ने अंगीठी जलाते वक्त उपले या लकड़ीयां थोड़ी गीली इस्तेमाल की होतीं तो फिर अडो़स-पड़ोस वाले बहुत ज़्यादा धुएं से परेशान हो जाते ….लेकिन कोई किसी को कहता कुछ नहीं था, बेहद सब्र था सभी में ….चुपचाप उस धुएं की वजह से हुई अपनी गीली आंखों को हाथों से पोंछ देते थे….बस!

कईं बार अंगीठी को बाहर रखे रखे लंबा अरसा हो जाता …न उसमें से धुआं निकलता, न ही आग की लपटें…सीधा सीधा मतलब होता कि प्रोजेक्ट फेल हो गया है ….जुगाड़ लगाए जाते, कईं बार चल भी जाते…जैसे उस के ऊपर मिट्टी के तेल का छिड़काव किया जाता ताकि उसके प्रजवलन में चु्स्ती आ सके….कईं बार यह काम कर जाता, वरना फिर से दोबारा अंगीठी जलाने की मशक करनी पड़ती….

अधिकतर अंगीठी तैयार करने का काम मां के सुपुर्द ही होता….उसे कोई छुट्टी नहीं, सर दुःख रहा होता तो सिर पर दुपट्टा कस के या दांत दुःख रहा होता तो दांतों पर नसवार लगा कर भी अंगीठी तैयार तो करनी ही होती …कईं बार मैंने पिता जी को भी यह काम करते देखा और मैने भी दो चार बार यह काम किया है ….याद नहीं, ऐसी कौन सी एमरजैंसी आ गई होगी …शायद मां 1-2 दिन के लिए बाहर गई होगी ….

मैंने कल जो फोटो खींची सिगड़ी पर चाय बनती देख कर ….यह उन दिनों एक आम बात थी…हर तरफ़ अंगीठी पर ही चाय बनती थी ….चाय के ठेलों पर, चाय की दुकान पर, हलवाई के यहां, किसी ढाबे पर ….सारा काम बड़ी बड़ी अंगीठीयों पर ही होता था….जिसे हम लोग भट्ठी कहते हैं ….बड़े से मिट्टी के तंदूर टाइप बने होते थे …फिक्स किए होते थे ….जिन में कोयलों से अंगारे निकलते रहते थे …और उन्हीं पर दाल मक्खनी, जलेबियां, समोसे, पूरी-छोले, भटूरे-छोले बना करते थे ….

बचपन की यादों की अलमारी की एक बहुत पुरानी, दीमक की मार से खस्ताहाल हो चुकी एक शेल्फ पर एक कोने में अभी एक ईमानदार सा हलवाई भी रखा पड़ा है ….जो कईं कईं घंटों तक भट्ठी पर खौलते दूध को हिलाता करता और शाम को एक दो ट्रे बर्फी तैयार करता था …देखते ही देखते वो खाली हो जाती थी ….वैसे बर्फी न तो कभी खाई और न ही खाने का कोई स्कोप ही है ….जब भी उधर से गुज़रते पिता जी मुझे छोटे लिफाफे में वह ज़रूर दिलाया करते ….यही कोई एक रूपए के आसपास मिल जाती थी …या इससे भी कम …वाह, क्या महक होती थी …सीधी ज़ुबान पर रखते ही घुल जाती थी …उस हलवाई के पास एक नाई की दुकान थी….जो एक बड़ी सख्त सी मशीन से कटिंग किया करता था, कटिंग क्या, नोचता हो जैसे बालों को ….और फिर उस्तरे को बेल्ट पर घिस कर मेरे सर पर रगड़ दिया करता था…कईं कट लग जाते थे …और जले पर नमक छिड़कने के लिए उन पर फिटकड़ी घिसा देता…बस, मेरा रोना चालू….पिता जी बाहर आते ही मुझे जैेसे ही उस बर्फी की दुकान पर ले कर जाते, मेरा दर्द-वर्द कहां भाग जाता, पता नहीं….50-60 बाद भी जब मुझे इस हलवाई का ख्याल आता है तो मुझे हंंसी आती है …..क्या कमा लेता होगा …इतनी मेहनत मशक्कत के बाद …फिर भी इतना सब्र….इतनी मोहब्बत, खुलूस रखता था सब के लिए….अच्छा, लेते सब इतनी ही थे ….50 ग्राम, 100 ग्राम….एक पाव (250ग्राम) तो किसी मेहमान के घर आने पर ही चाय के वक्त लाई जाती थी…समोसों के साथ….या तो समोसे-जलेबी, वरना …समोसे, बर्फी ….यही मेन्यू था, यही स्कोप और यही दायरा था उस वक्त की मेहमान-नवाज़ी का ….

दिनांक ...28 मार्च 2026

अंगीठी में कोयले कौन से इस्तेमाल होते थे ...

अंगीठी में सामान्यतः हार्ड-कोक ही इस्तेमाल होता था...यह ज़्यादातर कोयले के डिपो से ही लाना होता था...वज़न के हिसाब से बिकता था...बीस-तीस किलो या पूरी एक बोरी लाई जाती थी ..साईकिल रिक्शा पर रख कर ....अगर 10-20 किलो ही होते तो साईकिल के पीछे कैरियर पर ढो लिए जाते।

अंगीठी जलाना भी एक कला है....बहुत इत्मीनान, बहुत फोकस चाहिए....जैसे मैंने ऊपर लिखा कि कुछ बार मैंने भी अंगीठी जलाई..कईं बार जल गई, कईं बार फुस हो कर मुझे मुंह चिढ़ाने लगती।ऐसे ही नहीं कहते ..करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान.....गृहिणियों के पास यह महारत बहुत थी। 

(अंगीठी जलाने का आर्ट एंड क्राफ्ट- डॉयग्रैमैटिक )....काश! इस तरह के डायग्राम बनाने में स्कूल-कालेज में इतनी मेहनत की होती....न ही मास्टरों के हाथों पिटना पड़ता और मैं भी कहां से कहां पहुंच चुका होता ....😎

अंगीठी को जलाने के लिेए तैयार करने से पहले सब से नीचे सूखे दो चार गोबर के उपलों के दो चार टुकडे़ रखे जाते जिन पर थोड़ा सा मिटटी का तेल छिड़क दिया जाता ...फिर उन के ऊपर बिल्कुल पतली सी लकड़ीयों के दा चार पांच टुकड़े रखे जाते और फिर उन के ऊपर कोयले सजा दिए जाते ...बहुत ज़्यादा ठंड के दिनों में या बरसात के दिनों में अंगीठी जलाना मुश्किल काम होता..लाटरी लगने जैसा ...लगी तो लगी, नहीं तो ठनठन गोपाल.....खैर, इसी चक्कर में बाहर ओस या बरसात होने की वजह से कईं बार अंगीठी जलाने के लिए उसे घर के बाहर या घर के आंगन में रखने की बजाए, बरामदे में ही रखना पड़ता...

कईं बार यह भी होता कि मिट्टी का तेल (केरोसीन) ही नहीं है....तो फिर गोबर के उपलों के नीचे कुछ बेकार कागज़ भी रख दिए जाते जो जल्दी से आग पकड़ लेते....और फिर यह ऊपर तक अंगीठी से आग की लपटें रुपी न्यूक्लियर रिएक्शन चल निकलता...

रेलवे के फॉयरमैन और उन के थैले में  रखा सूत....

आज की पीढ़ी तो रेलवे के फॉयरमैन के नाम से ही वाकिफ़ न होगी...लेकिन डीज़ल, इलेक्ट्रिक इंजन आने से पहले जब स्टीम इंजन ही चलते थे ...मैं 1960-1970 के दशक की बात कर रहा हूं...बाद में तो फिर डीजल ईंजन भी आ गए....स्टीम इंजन की कार्यप्रणाली को समझने के लिए आप को कोई पुरानी फिल्म जैसे शोले (वो ट्रेन डकैती वाला सीन) या विधाता (जिसमें शम्मी कपूर और दिलीप कुमार पर ट्रेन के इंजन में एक गीत फिल्म गया है ...)....हां, तो फॉयरमैन का काम होता था, स्टीम इंजन के अंदर कोयले झोंकते रहना ...सभी फॉयरमैन एक ही से दिखते थे ..क्योंकि सारा दिन काम आग के सामने ही होता था....

जैसा कि मैं ऊपर लिख ही चुका हूं ...मेरी तो भई आंखे ही खुली रेलवे कॉलोनी में ....इसलिए बचपन ही से रेलवे के हर तरह के मुलाजिम को देखते देखते मैं रेलवे के बारे में बहुत कुछ समझ गया....फॉयरमैन, ड्राईवर, खलासी, वर्कशाप के मकेनिक, गार्ड, टीटी, टिकट बाबू, बुकिंग क्लर्क, गैगमैन  (एक्टिव गैंगमेन और पैसिव गैंगमैन - जो रसोईये, माली, चपरासी, बाबू के काम में लगे रहना अपना सौभाग्य समझते थे)........मैं क्या, कोई भी इन सब रेल मुलाजिमों को देखते ही पहचान लेता ...बिना वर्दी के भी ....अकसर भाप ईजन के दौर में यह माना जाता था कि फॉयरमैन और ड्राईवर बहुत गुस्से वाले होते हैं....खैर, हर काम की अपनी चुनौतियां हैं....क्या कहें इस बारे में ज़्यादा!

हां, तो बात अटक गई थी फॉयरमैन के ऊपर ....दरअसल भाप ईंजन के पूरे रख-रखाव की जिम्मेदारी इस फॉयरमैन की होती थी ...गाड़ी चलती थी तो कोयले से लेकिन उस के पुर्ज़ों को तो डीज़ल या मोबिल-ऑयल से रवां रखना पड़ता था....मुझे नहीं पता कि यह डीज़ल आयल से होता या मोबिल-ऑयल से ...लेकिन जो भी था, इस को जिस कपड़े से (सूत) से साफ किया जाता, उसे गैंगमैन फैंंकता नहीं था, वह उसे अपने घर ले आता ...चूंकि वह डीज़ल या ऑयल से कुछ भीगा हुआ होता, इसलिए वह आग बहुत जल्दी पकड़ लेता और अंगीठी जलाने के लिए वह बहुत काम की चीज़ साबित होता ...मुझे याद है फ़ायरमैन इस को अपने आस पास के घरों में भी बांट देता....बांटने से भी पहले, शायद लोग उस के घर पर ही इस की डिमांड रखने चले जाते ....

मैंने लिखा न कि मैंने भी कईं बार अंगीठी जलाई है ...मेरे से सब्र शुरु ही से कुछ कम था....उतावला पन ज़्यादा (हिसाब के पेपर में सब कुछ आते हुए भी जब दो चार मूर्खता से भरी गल्तीयां कर आता तो मेरे पिता जी मुझे कह दिया करते ...तू, यार, फुर्ती के चक्कर में गल्ती करता है ...., इस के आगे उन्होंने कभी न डांटा न डपटा, न धमकाया....)...हां, कम सब्र के रहते मैं उस जल रही अंगीठी में ऊपर से तेल फैंक देता ....जिस से चंद लम्हों के लिए तो लपटें दिख जातीं लेकिन लकड़ीयों और उपलों को और उस के बाद कोयलों तक आग पहुंचने में 10-15 मिनट का वक्त तो लगना ही होता था....

सर्दी के दिनों में अंगीठी की डिमांड ---

अमृतसर की कड़ाके की सर्दी (3-4डिग्री तक) के दौरान अंगीठी की डिमांड अचानक बहुत बढ़ जाती ...हर कोई अंगीठी के पास ही बैठना चाहता ...आग तापने के लिए....और साथ में मूंगफली, रेवड़ी खाना और गर्मागर्म खौलती हुई चाय की सुस्कियों का लुत्फ़ उठाते हुए वहां से कोई उठना ही न चाहता....वही परम सुख था...इसी चक्कर में काम लेट हो जाते, सोना लेट हो जाता ...लेकिन जब अंगीठी के पास इस तरह जश्न चल रहा हो ....डालडे में तैर रहे नमक-अजवायन के या फिर आलू के परांठे या देसी घी से चुपड़ी मिस्सी रोटी एक के बाद एक बन रही हो तो भला वहां से उठने को दिल किस का चाहेगा....और अकसर अंगीठी के पास बैठने के लिए किसी बोरी का टुकड़ा (टाट) या फिर लकड़ी की चौकी इस्तेमाल होती ....लेकिन पैर तो भी हमारे ठंड़े पड़े होते ...क्योंकि उस दौर में घर में जुराबें पहनने का चलन नहीं था, हां, जब ठंड की वजह से उंगलियां सुन्न पड़ जाती या नीली होने लगतीं तो मां कीस डांट डपट से ऊन की जुराबें चढ़ानी ही पड़ती.....और फौरन आराम भी आ जाता ....

रेलवे से भी कोयला मिलता था .....

हां, तो रेलवे से भी कोयला मिलता था ...स्टीम ईजन कोयले से चलता था ..हार्ड-कोक से ...जगह जगह जैसे नया कोयला ईंजन में झोंका जाता था, पुराना थोड़ा इस्तेमाल किया कोयला नीचे गिर जाता था ...जिसे गिराना फॉयरमैन का काम होता था ..इतनी गाडि़यां तब भी चलती थीं....जहां तक मेरी धुंधली याद है इस बारे में फिर यह  इस्तेमाल किया हुआ कोयला रेल के कर्मचारी खरीद सकते थे ...यही कोई तीन चार रूपए की पर्ची कटवानी होती थी ...फिर वहां से रिक्शा में रखवा कर यह कोयला घर आता था ..हमारे यहां भी एक दो बार आया था, मुझे याद है ....यह अंगीठी में जलाने के लिए बहुत बढ़िया होता था ...और इस की बड़ी डिमांड रहती थी ....और भी कुछ कुछ बातें हैं..धुंधली यादें हैं... फॉयरमैन के द्वारा कोयला नीचे गिराने के बारे में .......लेकिन सब कुछ क्या लिखने बैठें...हमारे लिए इतना ही काफी है कि स्टीम ईजन, उस में काम करने वाला ड्राईवर और फ़ॉयरमैन हमारी बचपनों की यादों का बेशकीमती हुिस्सा हैं.....हम पैदल स्कूल आते जाते वक्त जब भी रेल की लाइनों के पास, किसी माल-गोदाम, किसी लोको-शैड़ के पास ईंजन देखते ही रुक जाते ...10-15 मिनट उस ईंजन को और उस से निकलने वाली भाप को निहारते रहते ....वेहले कम.....वक्त बरबाद करने वाले शौक....

लकड़ी वाला कोयला....
एक कोयला जो लकड़ी से बनता है ...वह भी बिकता था ...लेकिन उसे उन दिनों सिर्फ़ कपड़े प्रैस करने वाली इस्तरी में इस्तेमाल के लिए ही खरीदा जाता था...महंगा होता था... कॉलोनी में जो प्रैस वाले यूपी से आए भाई लोग 
यह काम करते थे, उन के पास बहुत भारी भरकम प्रैस होती थी जिन में यही कोयला इस्तेमाल होता था...जिस की वजह से कईं बार टैरीकॉट, टैरीलीन या दुपट्टे आदि में कभी कभी एक दो  सुऱाख भी हो जाते थे (कईं बार सिगरेट से भी पिता जी की कमीज़ पर छेद हो जाते थे) ...फिर लोगों की उस प्रेस वाले के साथ थोड़ी कहा-सुनी हो जाती थी ....मुझे तो यह काम बढ़िया लगता था ...मैं तो कईं बार उस के पास जा कर खड़ा हो जाता था ...पान चबाते चबाते जिस स्वैग से वह भारी भरकम प्रैस को  उठाता, फिर बार बार उसमें राख को नीचे गिराता ..सब कुछ यादों में कैद है ....

बाद में कुछ बरसों बाद जब गैस वैस आ गई तो भी, बिजली की प्रैस इस्तेमाल होने लगी तो भी यह कोयला तो लोग घर में आग तापने के लिए लाते थे ... और हां, यह कैसे भूल गया कि उन दिनों भुट्टा (छल्ली) भूनने के लिए भी यही कोयला इस्तेमाल करते थे ...इस काम में भी यू-पी बिहार से आए लोगों का वर्चस्व था ...एक दम बढ़िया भुट्टे खाए जो उन दिनों फिर कभी न नसीब हुए....न वो भुट्टे ही रहे (अब तो जी.एम क्रॉप वाले हैं शायद ...कोई स्वाद नहीं, कोई बात नहीं ...फीके फाके ......कौन खाए, इन को ....इसलिए कभी मैं तो नहीं खाता यह सब ...) ....
हां, हमारे घर में भी एक छोटी सी लोहे की प्रैस होती थी जिसे मेरी बहन ही इस्तेमाल करती थीं अपने कपड़ों के लिए....उसमें भी यही लकड़ी वाले कोयले (हां, लिखते लिखते याद आया....इन को कच्चे कोयले कहते थे ) डाले जाते थे ...मुझे यह सब होते देखना बहुत भाता था....कल की बातें लगती हैं....। बहन 10 साल बड़ी हैं, कभी आलस नहीं करती थीं ये सब काम करने में ...।

भट्ठी ....

भट्ठी के बारे में तो मैंने ऊपर भी लिखा है कि वह भी उन दिनों हार्ड-कोक से ही चलती थी ..हलवाई हो, ढाबे हों....लेकिन हां जो भुजवा की भट्ठी होती थी, वह लकड़ीयों के साथ जलती थीं....

लिखते लिखते अब मैं हो गया हूं बोर ....

कईं बार कुछ लिखने लगो तो वह बहुत खिंच जाता है जैसे गीली लकड़ी से आग जलाने के चक्कर में कईं बार हम उलझ जाते हैं....धुआं ही धुआं हर तरफ़ लेकिन आग का नामो-निशान नहीं ....इस पोस्ट को शुरु किए तीन दिन हो गए...मुझे मेरे स्वभाव का पता है मैं अगर इस वक्त जिस भी हालत में यह है , अगर इसे बंद नहीं करूंगा तो फिर यह कभी पूरी ही न करूंगा या ऐसे ही पड़ी रहेगी, पोस्ट नहीं करुंगा ...क्योंकि दो चार दिन बाद लगने लगेगा कि इस में पोस्ट करने जेैसा है ही नहीं......बस, ऐसा ही करता हूं मैं.....वैेसे भी अपने लिखा तो मैं पढ़ता नहीं....क्योंकि अपनी ही लिखी कुछ बातों को लिखते थोड़ा अन्कम्फर्टेबल सा लगता है (लगना बिल्कुल नहीं चाहिए, अगर लिखने वालों को यह लगेगा तो कैसे चलेगा) ...दरअसल बात पूरी सच्चाई पर टिकी होती है ....99 प्रतिशत ....लेकिन कुछ बातें यही कोई एक प्रतिशत भी झूठी नहीं होती, लेकिन उन 1-2 फीसदी को मैं लिखते वक्त दबा जाता हूं ...उन को भी लिखूंगा ज़रूर  लेकिन नौकरी से जब रिटायर हो जाऊंगा ...प्रभु कृपा रखें ...सेहतमंद रखें...। 

इस पोस्ट का दूसरा पार्ट भी लिखना होगा ..जिस में उपले, चूल्हे, कांगड़ी की बातें साझा करनी है....और उस के बाद किसी पोस्ट में तंदूर के किस्से भी तो ब्यां करने हैं .....यह सब गैस की किल्लत की वजह से हो पाया....ये यादें कुरेद कुरेद कर हरी करनी पड़ रही हैं ...अच्छा है इसी बहाने सहेजी जा रही हैं....। 

लिखते लिखते यह मेरे संस्मरण कम और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतो का एक निबंध सा ही लगने लगा है ...खैर, जो भी है, सब कुछ सच है ....सच के सिवा कुछ नहीं....कुछ दिखावा नहीं, प्रपंच नहीं ...हां, आटे में नमक बराबर ...1-2 प्रतिशत तथ्य दबा ज़रुर लिए हैं....इतना खोट भी ज़रूरी है ...24 कैरेट सोने के तो गहने ही नहीं बन पाते ...😃
 




गुरुवार, 26 मार्च 2026

सिगड़ी, तंदूर, चूल्हा, हीटर, स्टोव.....इतनी तरकीबें, इतने जुगाड़


आज मैं बरसों बाद सुबह उठ कर लिखने बैठा हूं...जब मैंने ठीक 20 बरस पहले ब्लॉग लिखना शुरु किया था ...तो मैं अगले आठ-दस बरस तड़के चार पांच बजे यह डॉयरी लिखने बैठ जाता था...ठिठुरने भरी सर्दी होती या फिर सुबह सुबह पसीने छुटाने वाली गर्मी..मैं एक दो घंटे लिख ही लेता था...अब तो बरसों से सुबह उठ कर लिखना तो दूर, उठने की इच्छा ही नहीं होती...बहुत बार सोचता हूं कि ऐसा क्या था, गुज़रे दौर में...फिर ख्याल आया कि तब मां थी, वह सुबह सुबह उठ जाती और अपने लिखने, पढ़ने, सिलने, पूजा-पाठ, योग ...के काम में लग जाती और उन को देखते देखते हम भी जल्दी उठने लगे...खैर, 10 साल होने को हैं मां को उड़ारी मारे हुए...इसलिए उन के बाद हम भी घोर आलसी हो गए...

यह जो मैं पोस्ट लिख रहा हूं इस वक्त....इसे लिखने के लिए मैं पिछले 8-10 दिन से उतावला हूं....लेकिन हर रोज़ आज शाम में लिखूंगा, नहीं ..कल सुबह लिखूंगा...ब्लॉग का मामला ऐसा है कि एक बार अगर कोई ख़याल आ जाता है तो जब तक वो अपने आप को लिखवा नहीं लेता, चैन से बैठने नहीं देता....

पिछली पोस्ट में मैंने लिखा था कि जिस तरह से दुनिया पर पागलपन तारी है इस वक्त, कुकिंग गैस की किल्लत की तो बात ही क्या करें, हम लोगों को घासलेट पर ही न लौट आना पड़े कहीं....सामान्य ज्ञान भी कितना असामान्य है ....गूगल से तो पता कर ही लेंगे...मैंने ठीक ठाक साईंस की पढ़ाई की है लेकिन इस वक्त (बिना गूगल से पूछे) मुझे यह भी पता नहीं है कि घासलेट कहां से आता है .....लेकिन इस से जुड़ी यादें हैं बहुत सी ....मेरी उम्र 60 साल से ऊपर है ....इसलिए यही पीढ़ी है अगर जो चाहे जितना चाहे अपनी जाने से पहले बातों को समेट के चली जाए....वरना मेरे से पिछली पीढ़ी जो अब 80-90 के चक्कर में ज़िदगी की सीढ़ी के आखिरी पायदान को पकड़े खड़ी है, उन में से कितने हैं अपनी यादें लिख पाने की इच्छा ही रखते हैं....

जब हमारे मां-बाप हमारे आसपास होते हैं तो हमें लगता है कि इन से जो बातें पूछनी हैं, बाद में पूछ लेंगे ....लेकिन वक्त फुर्र कर के उड़ जाता है और हमारे सवाल अंदर ही दबे रह जाते हैं....यहां तक कि हमें अपने दादा से पिछली पीढ़ी से जुड़े किसी शख्स का नाम या किरदार ही नहीं पता होता ....यह सच है बिल्कुल....

इसलिए मैं सोचता हूं कि अपनी यादों को अपने अनुभवों को संजोते रहना चाहिए....बिना किसी तरह की अपेक्षा किए हुए...यह भी एक धर्म ही है, साधना है, तपस्या ही है ...लिखने के लिए बैठना.....

सुबह सुबह राहत इंदौरी की बात याद आ गई ....

आंख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो....

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो....

इस पो्स्ट का शीर्षक ही बहुत कुछ ब्यां कर देता है ...जब मेरी पीढ़ी के लोग 1960 के दशक की पैदावार ..जब वे अपने दिनों की बातें करेंगे को घासलेट की ही नहीं, सिगड़ी, तंदूर, चूल्हे, हीटर, स्टोव की बातें भी अनायास उमड़ने लगती हैं...वे हमें अच्छी लगें या न लगें, असहज करें या खुश, भूलना चाहें भी अगर ....लेकिन ये बार बार उछल-कूद करती ही रहती हैं....लिखने वालों के पास एक साधन है, लिख कर फ़ारिग हो जाते हैं....मैं भी वही काम करने बैठा हूं ....यह पोस्ट में लिखने से इसलिए भी गुरेज़ करता रहा क्योंकि बातें इतनी सारी हैं....बहुत लिखना पडे़गा...फिर सोचा कि शुरु तो करूं...एक नहीं तो दो तीन पोस्टों में लिख लूंगा....मुझे कौन रोक रहा है?


घासलेट की बात करते वक्त कुछ छूट गया था लगता है .....

घासलेट की मैं कुछ यादें लिखीं...अधिकतर तो सरकारी डिपो से मिलने वाले मिट्टी के तेल की ही थीं....जो अकसर पांच लिटर की पीपी में किसी महीने मिला तो मिला, नहीं तो डिपो के चक्कर काट काट के शांत बैठ जाते थे ....और उसी डिपो वाले की किसी दुकान से उसे बाज़ार के रेट पर खरीदना पड़ता था ....जहां तक मुझे याद पड़ता है ....राशनिंग के उस दौर में सामान्य घर में यही कोई पांच लिटर घासलेट लग ही जाता था ....

मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के अलावा, इसे लालटेन और दीयों में भी इस्तेमाल किया जाता था ....क्योंकि बत्ती बार बार गुल हो जाना आम सी बात थी ....बहुत ही आम....लालटेन के अलावा हर घर में तीन चार दीये भी होते थे ....अधिकांश किसी दारु की बोतल के ढक्कन में छेद कर के कपड़े की बत्ती डाल कर बनाए हुए....उन दिनों भी कहीं भी पौवों की कमी कभी महसूस नहीं होती थी ...अधिकतर इस काम के लिए पव्वे की कांच की बोतल ही काम में ली जाती थी ...अधिये की खाली बोतल से तैयार दीए भी दिख तो जाते थे, बहुत कम.....क्योंकि इतना मिट्टी का तेल होता ही क्हां था....

शादी-ब्याह में जब बैंड वाले चलते थे ...बड़ी बड़ी लाइटों के साथ तो उन में भी मिट्टी के तेल का इस्तेमाल होता था और ट्रेनों के परिचालन में भी स्टेशनों पर सिगनेल के लिए जो लाईटें जलाई जाती थीं उन में भी यही मिट्टी का तेल इस्तेमाल होता था। और इतिहास गवाह है कि मिट्टी के तेल ने अनगिनत बहु-बेटियों की जान भी ली है...यह भी उस दौर का काला सच है ....स्टोव जब भी फटा, उसने बहु-बेटी को ही अकसर चपेट में लिया ....बड़ा पक्षपात करता था स्टोव भी ........और सुनवाई? - कौन सुनाएगा, किसी की सुनवाई....जो हालात आज हैं इसी से अंदाज़ा लगा लीजिए कि आज से 50-60 बरस पहले हालात कितने भयावह होंगे ...

बत्ती गुल होने पर मिट्टी के दीए की मदद से खाना पकाया  जाता, पढ़ाई लिखाई का काम निपटाया  जाता (दिन की रोशनी में या बत्ती के रहते समय बरबाद करना और दीए की रोशनी में बैठ कर हिसाब की किताब पकड़ लेना, यह दिखावा, टाईम-पास भी अकसर देखने को मिल जाता ...अकसर)....हां, पेपरों के दिनों में रात में बत्ती गुल होना एक गंभीर मुद्दा हो जाता ....दीए वीए में क्या कोई पढ़ता, क्या याद रहता ...सारा साल पढ़े नहीं ...और सारी मशक्कत एक रात पहले ही करने से जैसे ...। यह लिखते लिखते मुझे मेरा एक कज़िन याद आ गया....वह अकसर किताब ही पेपर होने के एक -दो दिन पहले लाता था....और फिर मैंने देखा कि यह किताब वह पेपर में चीटिंग करने के लिए पर्चियां बनाने के लिए इस्तेमाल करता था....पूरा पूरा रात लगा रहता था....दीए की रोशनी में भी उसे मेहनत करते देखा है ....उसे बचपन ही से यह आदत लगी हुई थी...हमारे ज़माने में स्ट्रैचलॉन की निक्करें भी हम लोग स्कूल में कभी कभी पहन जाया करते थे ...वह अपनी जांघों पर भी कुछ कुछ लिख कर ले जाया करता था .. इम्तिहान में कुछ मदद हो जाए, इसलिए....और वह अपनी पर्चीयों को इस्तेमाल भी कर के आता था ....सातवीं आठवीं कक्षा में मैं भी उस की देखा देखी एक दो पर्ची लेकर तो गया लेकिन डर इतना लगा कि खोल न पाया...जब जेब में उन के रखने से अपना याद किया हुआ माल ही कागज़ पर उंडेलने में दिक्कत होने लगी तो जा कर वॉश-रूम में फैंक आया....

यह क्या विषय़ किधर का किधर निकल गया ..दीए की रोशनी में ....

घासलेट को घर में दूसरे कामों के लिए भी लिया जाता था ....कोई ताला नहीं खुल रहा, कहीं जंग लग गया हो....अभी तो यही कुछ याद आ रहा है ....

बातें लिखते लिखते कहां से याद आ जाती हैं, खुद पता नहीं लगता....जैसे मुझे अभी याद आया कि सरकारी डिपो वाला मिट्टी का तेल खत्म होने पर बाज़ार से तीन-चार रूपए की एक बोतल घासलेट की मिलती थी ...इस के लिए कांच की खाली दारू की बोतल अपनी लेकर जानी होती थी .....दारू की बोतल से बड़ी बोतल कोई उन दिनों देखने को न मिलती थी ...कहने को एक लीटर आता था उस बोतल में लेेकिन होती यह शायद 750 मि.लीटर की ही थी....।आज की पीढ़ी के लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल होगा कि पहले प्लास्टिक की बोतलें ही न थींं.....और हां,  मिट्टी के तेल की बोतलें अपने आस पास से, अड़ोस-पड़ोस से उधार भी ले लिया जाता था ...

फिर एक वक्त आ गया कि घासलेट हार्ड-वेयर की दुकानों में ही बिकने लगा ....मैंने शायद 10-15 साल पहले एक बार घासलेट की एक बोतल 50 रुपए की खरीदी थी ....यही जंग वंग उतारने के लिए ....तालों के, उपकरणों के जंग का तो इलाज है लेकिन जब बैठे बैठे हम लोगों को जंग लग जाता है, काश! उस को भी उतारने का कुछ तो जुगाड़ हो ....

सिगड़ी कहें या अंगीठी.....एक ही बात है ...

हम लोगों ने बचपन में सिगड़ी या अँगीठी पर ही सभी काम होते देखे...कभी कभी जब अंगीठी न जल रही होती और कोई छोटा मोटा चाय बनाने जैसा या दाल-सब्जी गर्म करने जैसा काम करना या दर्द के लिए अचानक पानी गर्म की ज़रूरत पड़ती तो स्टोव कर ही कर लिया जाता .....

लेकिन सिगड़ी की बातें, अंगीठी के किस्से ...ये इतने ज़्यादा हैं कि अब इस वक्त यह सब नहीं लिख पाऊंगा....इस की पूरी प्रक्रिया, इसे जलाने की मशक्कत, कोयला कहां से आता था, कितने तरह का होता था, कहां से मिलता था.....अंगीठी चलाना भी एक आर्ट था, मैंने कब अंगीठी जलाई.....और हां, नानी के उन के बचपन की यादें कि उन दिनों आग जलाने के लिए माचिस भी नहीं हुआ करती थी ..तो फिर आग कैसे जलती थी, जी हां, पड़ोसी के चूल्हे ही से आग लाई जाती थी...जलते हुए उपले से ....(यह सब हमने मां से सुना है ..इसलिेेए प्रामाणिक है)...गुलज़ार साहब ने भी यह सब देखा लगता है जो उसने अपने गीतों में शरारत से पिरो दिया ...वैसे गुलज़ार साहब और मेरी नानी का मायका एक ही शहर में था ....ब्रिटिश भारत के वक्त के पंजाब का ज़िला गुजरात (अब जो पाकिस्तान में है- इसे गुजरात राज्य से कंफ्यूज़ न करें)....अभी ध्यान आया कि वह तो अंगीठी जलाने के लिए नहीं  बीड़ी जलाने के लिए पड़ोसी के चूल्हे से आग लेने की बात कर रहे हैं....

खैर, अगली पोस्ट में अंगीठी की बातें ...पूरी पोस्ट इसी पर ....जो कुछ याद है, अपनी डॉयरी में लिख लेना ज़रूरी लगता है .....

सोमवार, 16 मार्च 2026

घासलेट पर ही न लौटना पड़े कहीं!


घासलेट भी मैंने ज़्यादा लिख दिया है ...कहीं गोबर के उपले इस्तेमाल करने वाले दिन ही न लौट आएं...क्योंकि अगर उस महान् वैज्ञानिक आइंन्सटाईन की बात याद करें तो कुछ भी हो सकता है ...वह कह कर गए हैं कि मुझे यह तो पता नहीं कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा लेकिन इतना तय है कि भविष्य में अगर चौथी वर्ल्ड वॉर की नौबत आई तो यह डंडों और पत्थरों से लड़ी जाएगी...

हालात जिस तरह से बिगड़ रहे हैं ...कुछ यू-ट्यूब चैनलों पर न्यूक्लियर-वॉर के दौरान होने वाले कहर और उस से थोड़ा-बहुत बचने के उपाय बताने शुरु कर दिेए हैं। कल दो तीन ऐसी व्हीडियो देखी मैंने। सब से अच्छी व्हीडियो तो किसी मैडीकल कॉलेज के प्रिंसीपल रह चुके एक डाक्टर साहब की थी ...

खैर, यह तो अभी कयास ही हैं ..लेकिन कुछ भी मुमकिन है आने वाले वक्त में ....पड़ोस में कहीं आग लगे तो देर-सवेर उस की आंच में हमारा घर भी आता ही है....अभी भी जिस तरह से कुकिंग गैस आदि कि किल्लत होने लगी है ...आप सब जानते ही हैं....उस रेस्ट्रां में यह बनना बंद हो गया, वहां यह अब नहीं बनेगा...गैस किसे मिलेगी, किसे नहीं मिलेगी....किसे पहल दी जाएगी किसे नहीं। कालाबाज़ारी नहीं होगी, आप को यकीं है? - नहीं, मुझे बिल्कुल यकीं नहीं है क्योंकि मैंने 50-55 साल पहले मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) वाले दिन देखे हैं, अनुभव किेेए हैं....उसे ब्लैक में मिलता देखा है, फिर सत्तर-अस्सी के दशक में कुकिंग गैस के सिलेंडर भी ब्लैक में मिलते देखे हैं...बहुत कुछ देखा है, इसलिए इसे यहां इस ब्लॉग में लिखने बैठ गया...

कुछ महीने पहले मैंने किसी एक एंटीक शाप में पीतल का एक चमचमाता स्टोव देखा ....पीतल का, चमचमाता हुआ...1500 रुपए में मिल रहा था ....मेरे पूछने पर उस दुकानदार ने बताया कि यह सब फिल्म शूटिंग पर ले कर जाते हैं....अच्छा, मैं यह लिखने बैठा हूं तो मुझे सुबह सुबह याद आ गया कि मैंने भी तो केरोसिन या घासलेट, स्टोव के बारे में कुछ बरस पहले लिखा था ....झट से ब्लॉगर खोला और मिल गया .....यह रहा मेरी उस पोस्ट का लिंक ....यह मैंने दो-तीन बरस पहले लिखी थी ....मुंबई के भायखला स्टेशन के पास रानी बाग है ...बिल्कुल उस के पास ही मैंने एक दिन किसी बंदे को स्टोव उठा कर जाते देखा था.....मैंने कोशिश की थी कि उसमें सब कुछ लिख दूं ...लिखा भी था अपनी तरफ़ से ...अगर हो सके तो उसे ज़रूर देखिए.....आज स्टोव याद आ गया....(पोस्ट का लिंक)...

मैंने आज सरसरी देखी है वह पोस्ट ....लेकिन पूरा पढ़ा नहीं...जो कि मैं अकसर करता भी नहीं ...लेकिन मैं अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट को कभी भी एडिट नहीं करता ...न कुछ उस में जोड़ता हूं, न काटता हूं ...उस घड़ी में जो कलम से निकला, सो निकल गया....लेकिन मैं उसे पढ़ता इसलिए नहीं क्योंकि मैं बाद में कुछ बरसों बाद पढ़ता हूं तो खामखां लगने लगता है कि ऐसा मैंने क्यों लिख दिया, कैसे यह लिख दिया.....असहजता तो न कहूं, ऐसे ही कुछ अलग सा लगता है, इसी से बचने के लिए अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ता नहीं हूं, उसी हलवाई की तरह जो अपनी दुकान में तैयार की हुई मिठाईयां नहीं खाता.....मतलब आप समझ ही गए हैं....

मेरे ख्याल है कि मैंने अपनी उस पुरानी पोस्ट में यह कहीं नहीं लिखा था कि पीतल के स्टोव के दिनों में एक स्टोव और भी आ गया था ..प्रभात का स्टोव ....इस को जलाने में ज़्यादा मशक्कत न लगती थी ...शांति से चुपचाप चालू हो जाता था और जब तक जलता था बिल्कुल भी आवाज़ भी नहीं करता था .....

केरोसिन पर कल मैंने एक पोस्ट देखी, पहले भी देखी थी,,,, 1940-50 के दशक में मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) का विज्ञापन मोहम्मद रफी की आवाज़ में रेडियो पर बजता था ...चूंकि गोबर के उपले वाला ईंधन घासलेट से सस्ता पड़ता था, इसलिए इस का विज्ञापन खूब ज़ोरों-शोरों से चलता था ...यह बात तो मैंंने विविध भारती रेडियो पर भी कुछ बरस पहले सुनी थी .....सोचने वाली बात है कि हम भी कहां से कहां आ गए हैं और अभी विश्व फिर से अपने फितूर की वजह से, सिरफिरेपन की वजह से कहीं वापिस हमें पुराने दिनों की तरफ़ ही न ले जाए.........अगर आईंन्स्टीन की मानें कि चौथा विश्व युद्ध लाठियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा........तो फिर उस के बाद  खाना भी (अगर कुछ बचा तो) लकड़ी के टुकड़ों (अगर तब तक जंग ने या हमारे लालच ने पेड़ भी बचे रहने दिए) पर चलने वाले चूल्हों पर ही पकाना होगा ....


लिखा ही होगा मैंने अपनी दो तीन बरस पुरानी उस पोस्ट में कि घासलेट लेकर आना भी पहाड़ पर चढ़ने जैसा मुश्किल काम था ......लेकिन फिल्मी गाने तब भी आम आदमी को उस की तकलीफ़ को ज़्यादा तकलीफ़ नहीं लगने देते थे ....किशोर के ऐसे गीत रेडियो बजते थे और आम आदमी सोचता था कि वह भी इस में शामिल है, वही है राजेश खन्ना,.(1970 का दशक).....


वैसे आप को पता ही होगा कि शायद एमरजैंसी के दिनों में किशोर कुमार के गीतों को आल इंडिया रेडियो पर बजाने पर प्रतिबंध लग गया था .......पाठक बस यह कल्पना ही करें कि हिंदोस्तानियों ने भी कैसे कैसे दिन देखे हैं....लेकिन फिर भी पुरानी पीढ़ियों में ठहराव था, सब्र था, संतोख था.....अब अगर किसी ने राशन की दुकान से केरोसिन लेना है तो उसे सब्र तो रखना ही पड़ता था ....

अच्छा लगा, सुबह सुबह केरोसिन की बातें अपने पाठकों से साझा करने को मौका मिल गया .....फिर से याद दिला दूं ... मेरी यह पुरानी पोस्ट भी देखिए....पूरी बात उस में लिखी है...आज अचानक स्टोव याद आ गया...,अभी कोयले और लकड़ी-चूल्हों वाले दिनों का बोझा भी किसी दिन अपने दिल से उतारना है ....बहुत सी बातें साझा करनी हैं...देखते हैं फिर कभी!


काश इत्ती सी छोटी बात ही किसी के पल्ले पड़ जाए....

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
टैंक आगे बढ़़ें कि पीछे हटें...
कोख धरती की बांझ होती है ...
फ़तह का जश्न हो के हार का सोग,,,
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है...
- साहिर लुधियानवी 


रविवार, 8 मार्च 2026

आज महिला दिवस पर ब्लॉगिंग का बिल्कुल ख़याल न था ...लेकिन..

इन के लिए महिला दिवस के क्या मायने!! -वही बोझा, उस के तले वैसे ही दबे रहना, वही पिसना...फिर भी इन की जिजीविषा को सलाम 


लेकिन क्या? 

हां, सच में यह ब्लॉग लिखने का कोई इरादा न था ...लेकिन बात ही कुछ ऐसी हो गई कि फिर मैंने ज़िद्द ही कर ली कि अब तो मन की बात वॉट्सएप पर न सही तो क्या, अपने ब्लॉग में दर्ज कर के रहूंगा...

तो हुआ यूं कि आज सुबह जैसे ही मेरा सब से फेवरेट पेपर टाईम्स ऑफ इंडिया बंबई एडिशन हाथ में पकड़ा ....उस के पन्ने उलट पलट रहा था कि महिलाओं से संबंधित कंटैंट इस में भरा हुआ था ....इच्छा हुई कि इस में उन सब पन्नों की फोटो लूं और वाट्सएप पर तस्वीरों की शक्ल में उन को शेयर कर दूं.....चाहे, पढ़ा मैंने उन में से पूरा किसी को भी नहीं, बस हैडिंग ही देखे या तस्वीरों के साथ उन के कैप्शन देखे हैं...



हां, तो जब मैं उन सब तस्वीरों को शेयर करने लगा तो मुझे महसूस हुआ कि जो इस वक्त मन में उद्गार उठ रहे हैं उन को भी लिख कर राहत पा लूं ...जी हां, लिखने वालों के लिए लिखना मानचिक हलचल से निजात पा लेने का एक ज़रिया भी होता है ...मैंने भी उन तस्वीरों के साथ वाट्सएप पर मैसेज लिखते लिखते 12-15 मिनट बिता दिए....लिख रहा था तो सामने पड़ी फीकी चाय की भी परवाह न की ....खैर, मन की पूरी बात लिखने के बाद जैसे ही बटन दबाया.....अचानक सब कुछ गायब। टेक्स्ट मैसेज तो क्या तस्वीरें भी न आगे जा सकीं...

अफ़सोस हुआ ...लेकिन उन बातों को फिर से हु-ब-हू लिखना ...न तो यह हो पाता और न ही इतना सब्र है मेरे में....खैर, मैंने यह सोचा कि ठीक है, जो बातें लिखी हैं उन को अपने ब्लॉग में लिख कर महिला दिवस की बात कर लूंगा....

टाइम्स आफ इंडिया को देखने के बाद जब इंगलिश का मिड-डे देखा तो उस में अधिकतर कंटैंट महिलाओं से ही जुड़ा हुआ था ...बहुत से बोल्ड मुद्दे भी थे ....हैडिंग ही देखे...अब कोई लिख ले या पढ़ ले, एक ही काम हो सकता है ...लेकिन उस के आखिरी पन्ने पर एक इश्तिहार दिख गया ...आप भी देखिए......

इस इश्तिहार में क्या कुछ कमी लगी? अगर हां, तो लिखिए नीचे कमेंट में ...अगर नहीं लगी तो भी सब से नीचे मैंने कुछ लिखा है, पढ़िए ज़रूर ....यह मेरा ख़याल है ...


पूरा पेपर आज महिला दिन के बारे में था ....शायद उन महिलाओं के लिए जो इंगलिश पढ़ना लिखना जानती हैं, बोलती भी हैं और अपने हक-हकूक के बारे में सचेत हैं....मुझे तो अधिकतर यह सब पेज-थ्री कंटेंट ही लगा....कहीं पर आस पास की आम महिलाओं की उपलब्धियों के बारे में मुझे कुछ नहीं लिखा दिखा......वह महिला जिससे जब पूछा जाता है कि आप क्या करती हैं.......और वह लगभग झेंपते हुए कहती हैं........कुछ नहीं, बस हाउस वाईफ....

यही सुन कर सब से ज़्यादा बुरा लगता है कि जो काम ज़िंदगी में सब से ज़रूरी है ...जिस की ड्यूटी तड़के 4-5 शुरू होती है और रात में सब के सो जाने के बाद, चूल्हा-चौका समेटने के बाद चाहे 11 बजे या 12...कोई परवाह नहीं ...वह कह रही है ...कुछ नहीं, बस घर पर ही ...। 

महिला दिवस के सही मायने तभी होंगे जब सारी महिलाओं की तस्वीर बदलेगी....सिर्फ़ अच्छी फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाली महिलाओं की ही नहीं....इसलिए जब भी महिलाओं के इस तरह के आयोजन होते हैं, उन में सब की भागीदारी ज़रूरी है....कतार में सब से पीछे खड़ी महिला के भी दिन बदलने चाहिए...जिसे अपने हक का कुछ पता नहीं, हर तरफ़ उस का शोषण है, कुछ दिख जाता है, कुछ दिखता है,  सब कुछ सह जाती हैं...दुनिया भर की कमेटियां हैं, लेकिन फिर भी जो ज़मीनी हालात हैं, यह जग जाहिर है....शोषण सिर्फ़ दैहिक या मानसिक ही नहीं होता, इस के अनेकों रूप हैं, बहाने हैं....जिन आंखों से कोई किसी महिला को तकता है ...बहुत बार वह भी शोषण की श्रेणी ही में आता है ......

सरकार या एनजीओ बहुत कुछ कर रही है लेकिन सब कुछ सरकार ही कर देगी, यह असंभव है....मानसिकता बदलनी होगी...और यह बदलाव तो एक परिवार से एक पुरूष ही से शुरु होगा.... इतना पुरुष प्रधान समाज कि जैसे कन्या का जन्म न हो गया हो, कोई ज़ुर्म हो गया हो....मुझे अच्छे से याद है कि पहले तो किसी घर में स्वस्थ बेटी के जन्म होने पर बधाई देने का रिवाज़ भी न था ....बधाई की तो बात ही क्या करें, अभी परसों मैं देश के एक चोटी के उद्योगपति की (कितना चोटी का है, अगर लिखूंगा तो आप समझ जाएंगे) इस लिए नहीं लिख रहा हूं...वह अपनी जीवनी में लिखता है कि जब उस की बड़ी बहन का जन्म हुआ तो मेरी परदादी ऐसे हो गई कि उसने अपने आप को तीन दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया....। (बिल्कुल उसने यही लिखा है) -

चलिए, इतना भी सुस्पेंस ठीक नहीं,  नाम भी लिखने में क्या हर्ज़ है....यह बिरला खानदान की बात है....जब यह बात किताब ही में आ गई है तो मुझे लिखने मेंं क्या दिकक्त है..

सरकार ने कोख में बच्चियों को मारने की भयानक कुरीति को दूर करने के लिए बहुत काम किया है .....बच्चियों की पढ़ाई लिखाई ब्याह शादी के लिए भी सरकार अपना काम कर रही है....अभी हाल ही में महिलाओं को बच्चेदानी के कैंसर से बचाने के लिए युवतियों के तरुणावस्था में एचवीव्ही टीकाकरण की स्कीम आई है ...इस स्कीम का बहुत स्वागत हुआ है .....सफल तो तभी कोई स्कीम मानी जाए अगर अनपढ़, कम पढ़ी-लिखी, श्रमिक.....सभी वर्गों की महिलाएँ इतनी सचेत हो जाएं कि इस तरह की सरकारी स्कीमों का फ़ायदा उठाने के लिए खुद आगे आएं....
और तो और, अभी हाल ही में महिलाओं के सैनेटरी पैड पर खुल कर बात होने लगी है ...कुछ ऐसी जागरुकता बढ़ाने वाली फिल्में भी बनीं....इस तरह की फिल्में बनाने वाले साधुवाद के पात्र हैं....क्या था फिल्म का नाम...पैडमैन....बेहतरीन फिल्म....यह गीत भी आप को याद होगा....देखो देखो तितली बदल रही रंग...होते होते होते होते हो रही पतंग..


महिलाओं से जुड़ी फिल्मों की बात करें तो मुझे अभी पिछले हफ्ते दो एक फिल्में देखी याद आ रही हैं....एक तो थी "जाइए आप कहां जाएंगे"....यह प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफार्म वेव पर मैंने देखी थी ...अकसर मैं विविध भारती पर इस के बारे में सुनता तो था लेकिन पता नहीं था कैसे करना होगा....कुछ दिन पहले बेटे की मदद से टीवी पर शुरु कर लिया ...मुफ्त है....हां तो फिल्म की बात ....इस तरह की फिल्में बनाने वाले ऐसे अहम् मुद्दों की बात करते हैं जिन से परेशान सभी महिलाएं हैं लेकिन बात नहीं करतीं, बस सहती रहती हैं, परेशान रहती हैं इस व्यवस्था के अभाव में .....इस से आगे मैं नहीं लिखूंगा....क्योंकि फिल्म देखने से पहले मुझे भी इस के फिल्म की स्टोरी नहीं मालूम थी....इसलिए मैं पूरे वक्त एलसीडी के सामने डटा रहा .....ऐसे लगा ही नहीं फिल्म देख रहे हैं....या कोई एक्टिंग कर रहा है ...सब कुछ इतना यथार्थ और सजीव कि जैसे आंखों के समने ही घट रहा है ....सभी पात्रों की एक्टिंग सर्वश्रेष्ठ....देखिएगा...कभी इसे ज़रूर .....वेव ओटीटी पर देख पाएं तो ठीक , वरना मुझे अभी इस का यू-ट्यूब लिंक भी मिल गया ...यह है इस का लिंक (क्लिक करिए) ....

महिला दिवस है ...दूसरी फिल्म है ..सदाबहार ....यह भी एक बेहतरीन फिल्म है ....जया भादुड़ी की फिल्म है ....उन का अपने पुराने रेडियो से किस कद्र लगाव है, यह देख कर आप दंग रह जाएंग....अकेली रहती हैं, रेडियो के सहारे....इसे भी ज़रूर देखिए...वेव ओटीटी पर तो है ही...यू-ट्यूब लिंक इस फिल्म का यह है ....सदाबहार...आप को यह फिल्म देखनी ही चाहिए....मैं भी एक बार इस तरह की फिल्म देखने बैठता हूं तो फिर उठ ही नहीं पाता ....जया भादुड़ी के फ़न के तो हम लोग (हमारी पीढ़ी) बचपन से दीवाने हैं....10 बरस की उम्र थी शायद मेरी जब गुड्डी आई ...फिर ज़ंजीर और फिर नमक-हराम ...फिर कोशिश ....क्या क्या याद दिलाएं.....याद क्या दिलाएं, जब भूले ही नहीं तो ...

हां, एक बात बहुत ज़रूरी अभी लिखनी है कि हाउस-वाईफ की तो बात कर ली ...लेकिन कामकाजी महिलाओं के जज़्बे को भी सलाम.....इन में से भी अधिकतर ...अधिकतर क्या, होंगी 99 फ़ीसदी तक जो बाहर काम के साथ साथ घर में भी पिसती हैं ....डबल-पिसाई कहें तो ....ये वो हैं जो काम से घर आते वक्त लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे में  सब्जी काटती दिख जाती हैं ताकि घर पहुंचने पर वक्त पर खाना तैयार हो पाए.....

और कितना लिखें....लिखें तो लिखते ही चले जाएं...यह टॉपिक ही ऐसा है ....हालात बदले हैं, बदल रहे हैं..बदलने चाहिए और बदल कर रहेंगे ही .......लेकिन इस के लिए महिलाओं की किसी भी तरह की दया, सहानुभूति, मापदंडों में किसी तरह की रियायत, किसी तरह के ग्रेस-मार्क्स की कतई ज़रूरत नहीं है ........बस,समाज अगर उन्हें अपनी धुन में लगे रह कर काम करने दे तो यह समाज का बड़ा योगदान होगा....वह अपना रस्ता चुनने में, उस पर आगे चलने में, चोटी तक पहुंचने में सक्षम है....हमेशा से थी .....बस, पुरुष-प्रधान समाज में आदमी को अपनी नज़रों को संभालना होगा....अच्छी बात है स्कूल ही से बच्चे-बच्चियों को आज कल गुड-टच, बैड-टच के बारे में समझाया जा रहा है.....लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है....पुरुषों की निगाहें भी ठीक होनी ज़रूरी हैं.....एक दम ठीक, न आढ़ी-न तिरछी..... मैंने कईं बार देखा है कि पॉवर में बैठा पुरुष सब से पहले तो जिस तरह से किसी महिला को देखता है वही उस को असहज कर देती है .......और यह जो बात है, यह जो सही गल्त नज़र परखने की दिव्य शक्ति हर महिला में मौजूद होती है ....अनपढ़ में भी उतनी ही जितनी किसी डाक्ट्रेट तक पढ़ी महिला में ......

बातें छोटी छोटी हैं, कहीं दर्ज भी नहीं होती, लेकिन हैं बहुत ज़रुरूी .....आज के वातावरण में महिलाओं की एम्पावरमैंट का एक पहलू यह भी है कि शादी से पहले वह भावी पति से उस की मैडीकल जांच रिपोर्ट की मांग करे ....और हां, उसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.....वरना, बाद में एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है ....

बस, अब करें इस पोस्ट को बंद ....इस इल्तिजा के साथ कि जैसे हम लोग अपनी मां-बहन-बेटी से ज़माने से अच्छे व्यवहार की कामना करते हैं .....तो यह काम हमें भी करना होगा...शुरुआत हम से ही होगी....अगर हम दूसरों की मां-बहु, बहू-बेटी से भी आदर से पेश आएंगे........और नज़रों पर लगाम लगाना ज़रूरी है, इधर उधर आंखों को भटकाने से कुछ होता हवाता नहीं है, आदमी की छवि खराब हो जाती है.....अगर इस से भी अपने आप को बचाए रखें तो भी महिला दिवस पर महिलाओं के लिए यह भी उन के सम्मान का एक संकेत ही होगा.....

अब मुझे वे अखबार में दिखने वाली तस्वीरें भी लगानी चाहिए....जिन की वजह से यह पोस्ट मुझे लिखनी पड़ी.....




















हां, तो ्अब  आते हैं ऊपर इश्तिहार वाली फोटो पर ....मैंने कोई त्रुटि पूछी थी....मुझे यह लगा कि यह शो-रूम पुरुषों को आमंत्रित कर रहा है कि अपनी मित्रों, माताओं, बहनों, बेटियों को ले कर आएं ....लेकिन पत्नी का ज़िक्र करना भूल गया शायद.....खैर, बंबई में रहने वालों को यह भी बताना ज़रूरी होगा कि चर्चगेट स्टेशन के बाहर जहां एशिऑटिक स्टोर होता था, अब वह बंद हो चुका है और थोड़े दिन पहले वहां पर कला निकेतन साड़ी शोरूम खुल गया है......हां, जाइए आप भी वहां लेकिन बीवी को मत भूलिए....। 😃