सोमवार, 16 मार्च 2026

घासलेट पर ही न लौटना पड़े कहीं!


घासलेट भी मैंने ज़्यादा लिख दिया है ...कहीं गोबर के उपले इस्तेमाल करने वाले दिन ही न लौट आएं...क्योंकि अगर उस महान् वैज्ञानिक आइंन्सटाईन की बात याद करें तो कुछ भी हो सकता है ...वह कह कर गए हैं कि मुझे यह तो पता नहीं कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा लेकिन इतना तय है कि भविष्य में अगर चौथी वर्ल्ड वॉर की नौबत आई तो यह डंडों और पत्थरों से लड़ी जाएगी...

हालात जिस तरह से बिगड़ रहे हैं ...कुछ यू-ट्यूब चैनलों पर न्यूक्लियर-वॉर के दौरान होने वाले कहर और उस से थोड़ा-बहुत बचने के उपाय बताने शुरु कर दिेए हैं। कल दो तीन ऐसी व्हीडियो देखी मैंने। सब से अच्छी व्हीडियो तो किसी मैडीकल कॉलेज के प्रिंसीपल रह चुके एक डाक्टर साहब की थी ...

खैर, यह तो अभी कयास ही हैं ..लेकिन कुछ भी मुमकिन है आने वाले वक्त में ....पड़ोस में कहीं आग लगे तो देर-सवेर उस की आंच में हमारा घर भी आता ही है....अभी भी जिस तरह से कुकिंग गैस आदि कि किल्लत होने लगी है ...आप सब जानते ही हैं....उस रेस्ट्रां में यह बनना बंद हो गया, वहां यह अब नहीं बनेगा...गैस किसे मिलेगी, किसे नहीं मिलेगी....किसे पहल दी जाएगी किसे नहीं। कालाबाज़ारी नहीं होगी, आप को यकीं है? - नहीं, मुझे बिल्कुल यकीं नहीं है क्योंकि मैंने 50-55 साल पहले मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) वाले दिन देखे हैं, अनुभव किेेए हैं....उसे ब्लैक में मिलता देखा है, फिर सत्तर-अस्सी के दशक में कुकिंग गैस के सिलेंडर भी ब्लैक में मिलते देखे हैं...बहुत कुछ देखा है, इसलिए इसे यहां इस ब्लॉग में लिखने बैठ गया...

कुछ महीने पहले मैंने किसी एक एंटीक शाप में पीतल का एक चमचमाता स्टोव देखा ....पीतल का, चमचमाता हुआ...1500 रुपए में मिल रहा था ....मेरे पूछने पर उस दुकानदार ने बताया कि यह सब फिल्म शूटिंग पर ले कर जाते हैं....अच्छा, मैं यह लिखने बैठा हूं तो मुझे सुबह सुबह याद आ गया कि मैंने भी तो केरोसिन या घासलेट, स्टोव के बारे में कुछ बरस पहले लिखा था ....झट से ब्लॉगर खोला और मिल गया .....यह रहा मेरी उस पोस्ट का लिंक ....यह मैंने दो-तीन बरस पहले लिखी थी ....मुंबई के भायखला स्टेशन के पास रानी बाग है ...बिल्कुल उस के पास ही मैंने एक दिन किसी बंदे को स्टोव उठा कर जाते देखा था.....मैंने कोशिश की थी कि उसमें सब कुछ लिख दूं ...लिखा भी था अपनी तरफ़ से ...अगर हो सके तो उसे ज़रूर देखिए.....आज स्टोव याद आ गया....(पोस्ट का लिंक)...

मैंने आज सरसरी देखी है वह पोस्ट ....लेकिन पूरा पढ़ा नहीं...जो कि मैं अकसर करता भी नहीं ...लेकिन मैं अपनी किसी भी पुरानी पोस्ट को कभी भी एडिट नहीं करता ...न कुछ उस में जोड़ता हूं, न काटता हूं ...उस घड़ी में जो कलम से निकला, सो निकल गया....लेकिन मैं उसे पढ़ता इसलिए नहीं क्योंकि मैं बाद में कुछ बरसों बाद पढ़ता हूं तो खामखां लगने लगता है कि ऐसा मैंने क्यों लिख दिया, कैसे यह लिख दिया.....असहजता तो न कहूं, ऐसे ही कुछ अलग सा लगता है, इसी से बचने के लिए अपनी पुरानी पोस्टों को पढ़ता नहीं हूं, उसी हलवाई की तरह जो अपनी दुकान में तैयार की हुई मिठाईयां नहीं खाता.....मतलब आप समझ ही गए हैं....

मेरे ख्याल है कि मैंने अपनी उस पुरानी पोस्ट में यह कहीं नहीं लिखा था कि पीतल के स्टोव के दिनों में एक स्टोव और भी आ गया था ..प्रभात का स्टोव ....इस को जलाने में ज़्यादा मशक्कत न लगती थी ...शांति से चुपचाप चालू हो जाता था और जब तक जलता था बिल्कुल भी आवाज़ भी नहीं करता था .....

केरोसिन पर कल मैंने एक पोस्ट देखी, पहले भी देखी थी,,,, 1940-50 के दशक में मिट्टी के तेल (घासलेट, केरोसिन) का विज्ञापन मोहम्मद रफी की आवाज़ में रेडियो पर बजता था ...चूंकि गोबर के उपले वाला ईंधन घासलेट से सस्ता पड़ता था, इसलिए इस का विज्ञापन खूब ज़ोरों-शोरों से चलता था ...यह बात तो मैंंने विविध भारती रेडियो पर भी कुछ बरस पहले सुनी थी .....सोचने वाली बात है कि हम भी कहां से कहां आ गए हैं और अभी विश्व फिर से अपने फितूर की वजह से, सिरफिरेपन की वजह से कहीं वापिस हमें पुराने दिनों की तरफ़ ही न ले जाए.........अगर आईंन्स्टीन की मानें कि चौथा विश्व युद्ध लाठियों और पत्थरों से लड़ा जाएगा........तो फिर उस के बाद  खाना भी (अगर कुछ बचा तो) लकड़ी के टुकड़ों (अगर तब तक जंग ने या हमारे लालच ने पेड़ भी बचे रहने दिए) पर चलने वाले चूल्हों पर ही पकाना होगा ....


लिखा ही होगा मैंने अपनी दो तीन बरस पुरानी उस पोस्ट में कि घासलेट लेकर आना भी पहाड़ पर चढ़ने जैसा मुश्किल काम था ......लेकिन फिल्मी गाने तब भी आम आदमी को उस की तकलीफ़ को ज़्यादा तकलीफ़ नहीं लगने देते थे ....किशोर के ऐसे गीत रेडियो बजते थे और आम आदमी सोचता था कि वह भी इस में शामिल है, वही है राजेश खन्ना,.(1970 का दशक).....


वैसे आप को पता ही होगा कि शायद एमरजैंसी के दिनों में किशोर कुमार के गीतों को आल इंडिया रेडियो पर बजाने पर प्रतिबंध लग गया था .......पाठक बस यह कल्पना ही करें कि हिंदोस्तानियों ने भी कैसे कैसे दिन देखे हैं....लेकिन फिर भी पुरानी पीढ़ियों में ठहराव था, सब्र था, संतोख था.....अब अगर किसी ने राशन की दुकान से केरोसिन लेना है तो उसे सब्र तो रखना ही पड़ता था ....

अच्छा लगा, सुबह सुबह केरोसिन की बातें अपने पाठकों से साझा करने को मौका मिल गया .....फिर से याद दिला दूं ... मेरी यह पुरानी पोस्ट भी देखिए....पूरी बात उस में लिखी है...आज अचानक स्टोव याद आ गया...,अभी कोयले और लकड़ी-चूल्हों वाले दिनों का बोझा भी किसी दिन अपने दिल से उतारना है ....बहुत सी बातें साझा करनी हैं...देखते हैं फिर कभी!


काश इत्ती सी छोटी बात ही किसी के पल्ले पड़ जाए....

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
टैंक आगे बढ़़ें कि पीछे हटें...
कोख धरती की बांझ होती है ...
फ़तह का जश्न हो के हार का सोग,,,
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है...
- साहिर लुधियानवी 


रविवार, 8 मार्च 2026

आज महिला दिवस पर ब्लॉगिंग का बिल्कुल ख़याल न था ...लेकिन..

इन के लिए महिला दिवस के क्या मायने!! -वही बोझा, उस के तले वैसे ही दबे रहना, वही पिसना...फिर भी इन की जिजीविषा को सलाम 


लेकिन क्या? 

हां, सच में यह ब्लॉग लिखने का कोई इरादा न था ...लेकिन बात ही कुछ ऐसी हो गई कि फिर मैंने ज़िद्द ही कर ली कि अब तो मन की बात वॉट्सएप पर न सही तो क्या, अपने ब्लॉग में दर्ज कर के रहूंगा...

तो हुआ यूं कि आज सुबह जैसे ही मेरा सब से फेवरेट पेपर टाईम्स ऑफ इंडिया बंबई एडिशन हाथ में पकड़ा ....उस के पन्ने उलट पलट रहा था कि महिलाओं से संबंधित कंटैंट इस में भरा हुआ था ....इच्छा हुई कि इस में उन सब पन्नों की फोटो लूं और वाट्सएप पर तस्वीरों की शक्ल में उन को शेयर कर दूं.....चाहे, पढ़ा मैंने उन में से पूरा किसी को भी नहीं, बस हैडिंग ही देखे या तस्वीरों के साथ उन के कैप्शन देखे हैं...



हां, तो जब मैं उन सब तस्वीरों को शेयर करने लगा तो मुझे महसूस हुआ कि जो इस वक्त मन में उद्गार उठ रहे हैं उन को भी लिख कर राहत पा लूं ...जी हां, लिखने वालों के लिए लिखना मानचिक हलचल से निजात पा लेने का एक ज़रिया भी होता है ...मैंने भी उन तस्वीरों के साथ वाट्सएप पर मैसेज लिखते लिखते 12-15 मिनट बिता दिए....लिख रहा था तो सामने पड़ी फीकी चाय की भी परवाह न की ....खैर, मन की पूरी बात लिखने के बाद जैसे ही बटन दबाया.....अचानक सब कुछ गायब। टेक्स्ट मैसेज तो क्या तस्वीरें भी न आगे जा सकीं...

अफ़सोस हुआ ...लेकिन उन बातों को फिर से हु-ब-हू लिखना ...न तो यह हो पाता और न ही इतना सब्र है मेरे में....खैर, मैंने यह सोचा कि ठीक है, जो बातें लिखी हैं उन को अपने ब्लॉग में लिख कर महिला दिवस की बात कर लूंगा....

टाइम्स आफ इंडिया को देखने के बाद जब इंगलिश का मिड-डे देखा तो उस में अधिकतर कंटैंट महिलाओं से ही जुड़ा हुआ था ...बहुत से बोल्ड मुद्दे भी थे ....हैडिंग ही देखे...अब कोई लिख ले या पढ़ ले, एक ही काम हो सकता है ...लेकिन उस के आखिरी पन्ने पर एक इश्तिहार दिख गया ...आप भी देखिए......

इस इश्तिहार में क्या कुछ कमी लगी? अगर हां, तो लिखिए नीचे कमेंट में ...अगर नहीं लगी तो भी सब से नीचे मैंने कुछ लिखा है, पढ़िए ज़रूर ....यह मेरा ख़याल है ...


पूरा पेपर आज महिला दिन के बारे में था ....शायद उन महिलाओं के लिए जो इंगलिश पढ़ना लिखना जानती हैं, बोलती भी हैं और अपने हक-हकूक के बारे में सचेत हैं....मुझे तो अधिकतर यह सब पेज-थ्री कंटेंट ही लगा....कहीं पर आस पास की आम महिलाओं की उपलब्धियों के बारे में मुझे कुछ नहीं लिखा दिखा......वह महिला जिससे जब पूछा जाता है कि आप क्या करती हैं.......और वह लगभग झेंपते हुए कहती हैं........कुछ नहीं, बस हाउस वाईफ....

यही सुन कर सब से ज़्यादा बुरा लगता है कि जो काम ज़िंदगी में सब से ज़रूरी है ...जिस की ड्यूटी तड़के 4-5 शुरू होती है और रात में सब के सो जाने के बाद, चूल्हा-चौका समेटने के बाद चाहे 11 बजे या 12...कोई परवाह नहीं ...वह कह रही है ...कुछ नहीं, बस घर पर ही ...। 

महिला दिवस के सही मायने तभी होंगे जब सारी महिलाओं की तस्वीर बदलेगी....सिर्फ़ अच्छी फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाली महिलाओं की ही नहीं....इसलिए जब भी महिलाओं के इस तरह के आयोजन होते हैं, उन में सब की भागीदारी ज़रूरी है....कतार में सब से पीछे खड़ी महिला के भी दिन बदलने चाहिए...जिसे अपने हक का कुछ पता नहीं, हर तरफ़ उस का शोषण है, कुछ दिख जाता है, कुछ दिखता है,  सब कुछ सह जाती हैं...दुनिया भर की कमेटियां हैं, लेकिन फिर भी जो ज़मीनी हालात हैं, यह जग जाहिर है....शोषण सिर्फ़ दैहिक या मानसिक ही नहीं होता, इस के अनेकों रूप हैं, बहाने हैं....जिन आंखों से कोई किसी महिला को तकता है ...बहुत बार वह भी शोषण की श्रेणी ही में आता है ......

सरकार या एनजीओ बहुत कुछ कर रही है लेकिन सब कुछ सरकार ही कर देगी, यह असंभव है....मानसिकता बदलनी होगी...और यह बदलाव तो एक परिवार से एक पुरूष ही से शुरु होगा.... इतना पुरुष प्रधान समाज कि जैसे कन्या का जन्म न हो गया हो, कोई ज़ुर्म हो गया हो....मुझे अच्छे से याद है कि पहले तो किसी घर में स्वस्थ बेटी के जन्म होने पर बधाई देने का रिवाज़ भी न था ....बधाई की तो बात ही क्या करें, अभी परसों मैं देश के एक चोटी के उद्योगपति की (कितना चोटी का है, अगर लिखूंगा तो आप समझ जाएंगे) इस लिए नहीं लिख रहा हूं...वह अपनी जीवनी में लिखता है कि जब उस की बड़ी बहन का जन्म हुआ तो मेरी परदादी ऐसे हो गई कि उसने अपने आप को तीन दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया....। (बिल्कुल उसने यही लिखा है) -

चलिए, इतना भी सुस्पेंस ठीक नहीं,  नाम भी लिखने में क्या हर्ज़ है....यह बिरला खानदान की बात है....जब यह बात किताब ही में आ गई है तो मुझे लिखने मेंं क्या दिकक्त है..

सरकार ने कोख में बच्चियों को मारने की भयानक कुरीति को दूर करने के लिए बहुत काम किया है .....बच्चियों की पढ़ाई लिखाई ब्याह शादी के लिए भी सरकार अपना काम कर रही है....अभी हाल ही में महिलाओं को बच्चेदानी के कैंसर से बचाने के लिए युवतियों के तरुणावस्था में एचवीव्ही टीकाकरण की स्कीम आई है ...इस स्कीम का बहुत स्वागत हुआ है .....सफल तो तभी कोई स्कीम मानी जाए अगर अनपढ़, कम पढ़ी-लिखी, श्रमिक.....सभी वर्गों की महिलाएँ इतनी सचेत हो जाएं कि इस तरह की सरकारी स्कीमों का फ़ायदा उठाने के लिए खुद आगे आएं....
और तो और, अभी हाल ही में महिलाओं के सैनेटरी पैड पर खुल कर बात होने लगी है ...कुछ ऐसी जागरुकता बढ़ाने वाली फिल्में भी बनीं....इस तरह की फिल्में बनाने वाले साधुवाद के पात्र हैं....क्या था फिल्म का नाम...पैडमैन....बेहतरीन फिल्म....यह गीत भी आप को याद होगा....देखो देखो तितली बदल रही रंग...होते होते होते होते हो रही पतंग..


महिलाओं से जुड़ी फिल्मों की बात करें तो मुझे अभी पिछले हफ्ते दो एक फिल्में देखी याद आ रही हैं....एक तो थी "जाइए आप कहां जाएंगे"....यह प्रसार भारती के ओटीटी प्लेटफार्म वेव पर मैंने देखी थी ...अकसर मैं विविध भारती पर इस के बारे में सुनता तो था लेकिन पता नहीं था कैसे करना होगा....कुछ दिन पहले बेटे की मदद से टीवी पर शुरु कर लिया ...मुफ्त है....हां तो फिल्म की बात ....इस तरह की फिल्में बनाने वाले ऐसे अहम् मुद्दों की बात करते हैं जिन से परेशान सभी महिलाएं हैं लेकिन बात नहीं करतीं, बस सहती रहती हैं, परेशान रहती हैं इस व्यवस्था के अभाव में .....इस से आगे मैं नहीं लिखूंगा....क्योंकि फिल्म देखने से पहले मुझे भी इस के फिल्म की स्टोरी नहीं मालूम थी....इसलिए मैं पूरे वक्त एलसीडी के सामने डटा रहा .....ऐसे लगा ही नहीं फिल्म देख रहे हैं....या कोई एक्टिंग कर रहा है ...सब कुछ इतना यथार्थ और सजीव कि जैसे आंखों के समने ही घट रहा है ....सभी पात्रों की एक्टिंग सर्वश्रेष्ठ....देखिएगा...कभी इसे ज़रूर .....वेव ओटीटी पर देख पाएं तो ठीक , वरना मुझे अभी इस का यू-ट्यूब लिंक भी मिल गया ...यह है इस का लिंक (क्लिक करिए) ....

महिला दिवस है ...दूसरी फिल्म है ..सदाबहार ....यह भी एक बेहतरीन फिल्म है ....जया भादुड़ी की फिल्म है ....उन का अपने पुराने रेडियो से किस कद्र लगाव है, यह देख कर आप दंग रह जाएंग....अकेली रहती हैं, रेडियो के सहारे....इसे भी ज़रूर देखिए...वेव ओटीटी पर तो है ही...यू-ट्यूब लिंक इस फिल्म का यह है ....सदाबहार...आप को यह फिल्म देखनी ही चाहिए....मैं भी एक बार इस तरह की फिल्म देखने बैठता हूं तो फिर उठ ही नहीं पाता ....जया भादुड़ी के फ़न के तो हम लोग (हमारी पीढ़ी) बचपन से दीवाने हैं....10 बरस की उम्र थी शायद मेरी जब गुड्डी आई ...फिर ज़ंजीर और फिर नमक-हराम ...फिर कोशिश ....क्या क्या याद दिलाएं.....याद क्या दिलाएं, जब भूले ही नहीं तो ...

हां, एक बात बहुत ज़रूरी अभी लिखनी है कि हाउस-वाईफ की तो बात कर ली ...लेकिन कामकाजी महिलाओं के जज़्बे को भी सलाम.....इन में से भी अधिकतर ...अधिकतर क्या, होंगी 99 फ़ीसदी तक जो बाहर काम के साथ साथ घर में भी पिसती हैं ....डबल-पिसाई कहें तो ....ये वो हैं जो काम से घर आते वक्त लोकल ट्रेन के महिला डिब्बे में  सब्जी काटती दिख जाती हैं ताकि घर पहुंचने पर वक्त पर खाना तैयार हो पाए.....

और कितना लिखें....लिखें तो लिखते ही चले जाएं...यह टॉपिक ही ऐसा है ....हालात बदले हैं, बदल रहे हैं..बदलने चाहिए और बदल कर रहेंगे ही .......लेकिन इस के लिए महिलाओं की किसी भी तरह की दया, सहानुभूति, मापदंडों में किसी तरह की रियायत, किसी तरह के ग्रेस-मार्क्स की कतई ज़रूरत नहीं है ........बस,समाज अगर उन्हें अपनी धुन में लगे रह कर काम करने दे तो यह समाज का बड़ा योगदान होगा....वह अपना रस्ता चुनने में, उस पर आगे चलने में, चोटी तक पहुंचने में सक्षम है....हमेशा से थी .....बस, पुरुष-प्रधान समाज में आदमी को अपनी नज़रों को संभालना होगा....अच्छी बात है स्कूल ही से बच्चे-बच्चियों को आज कल गुड-टच, बैड-टच के बारे में समझाया जा रहा है.....लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है....पुरुषों की निगाहें भी ठीक होनी ज़रूरी हैं.....एक दम ठीक, न आढ़ी-न तिरछी..... मैंने कईं बार देखा है कि पॉवर में बैठा पुरुष सब से पहले तो जिस तरह से किसी महिला को देखता है वही उस को असहज कर देती है .......और यह जो बात है, यह जो सही गल्त नज़र परखने की दिव्य शक्ति हर महिला में मौजूद होती है ....अनपढ़ में भी उतनी ही जितनी किसी डाक्ट्रेट तक पढ़ी महिला में ......

बातें छोटी छोटी हैं, कहीं दर्ज भी नहीं होती, लेकिन हैं बहुत ज़रुरूी .....आज के वातावरण में महिलाओं की एम्पावरमैंट का एक पहलू यह भी है कि शादी से पहले वह भावी पति से उस की मैडीकल जांच रिपोर्ट की मांग करे ....और हां, उसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए.....वरना, बाद में एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल पड़ता है ....

बस, अब करें इस पोस्ट को बंद ....इस इल्तिजा के साथ कि जैसे हम लोग अपनी मां-बहन-बेटी से ज़माने से अच्छे व्यवहार की कामना करते हैं .....तो यह काम हमें भी करना होगा...शुरुआत हम से ही होगी....अगर हम दूसरों की मां-बहु, बहू-बेटी से भी आदर से पेश आएंगे........और नज़रों पर लगाम लगाना ज़रूरी है, इधर उधर आंखों को भटकाने से कुछ होता हवाता नहीं है, आदमी की छवि खराब हो जाती है.....अगर इस से भी अपने आप को बचाए रखें तो भी महिला दिवस पर महिलाओं के लिए यह भी उन के सम्मान का एक संकेत ही होगा.....

अब मुझे वे अखबार में दिखने वाली तस्वीरें भी लगानी चाहिए....जिन की वजह से यह पोस्ट मुझे लिखनी पड़ी.....




















हां, तो ्अब  आते हैं ऊपर इश्तिहार वाली फोटो पर ....मैंने कोई त्रुटि पूछी थी....मुझे यह लगा कि यह शो-रूम पुरुषों को आमंत्रित कर रहा है कि अपनी मित्रों, माताओं, बहनों, बेटियों को ले कर आएं ....लेकिन पत्नी का ज़िक्र करना भूल गया शायद.....खैर, बंबई में रहने वालों को यह भी बताना ज़रूरी होगा कि चर्चगेट स्टेशन के बाहर जहां एशिऑटिक स्टोर होता था, अब वह बंद हो चुका है और थोड़े दिन पहले वहां पर कला निकेतन साड़ी शोरूम खुल गया है......हां, जाइए आप भी वहां लेकिन बीवी को मत भूलिए....। 😃

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

डिस्को किंग भप्पी लहरी नाईट के कुछ मंज़र.....

म्यूज़िक कंसर्ट तो यहां बंबई में आए दिन होते ही रहते हैंं....बहुत से देखे भी हैं ...और लगभग सभी मुंबई के सब से बढ़िया षणमुखानंद हाल में....अब किसी म्यूज़िक कंसर्ट में जाने से पहले थोड़ा सोचना पड़ता है ....क्योंकि बार बार एक ही तरह के प्रोग्राम नहीं देखे जाते ....बोरियत होने लगती है ...

फिर भी इसी हाल में आशा भोंसले, कुमार सानू, उदित नारायण, हेमलता.....और किसी दूसरी जगह पर शैलेंद्र सिंह...उषा मंगेशकर, सुखविंदर सिंह ...और भी होंगे, नाम याद नहीं आ रहे ...उसी तरह से प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत प्यारे लाल की जोड़ी वाले ) और आनंद जी (कल्याण जी आनंद जी जोड़ी)  को लाईव आर्केस्ट्रा कंडक्ट करते भी कुछ अरसा पहले इसी हाल में देखा ....तो फिर इस से आगे देखने को रह ही क्या जाता है ...


हां, देखने में रह जाते हैं कुछ लोग ...जिन को हम लोग पिछले 50 बरसों से सुन रहे हैं ...जैसे कि इस प्रोग्राम ...बप्पी लहरी नाईट के इश्तिहार तो कुछ महीनों से आ रहे थे....लेकिन इतना पहले से कैसे टिकट खरीद लें...कहीं आने जाने का भी पता नहीं होता...लेकिन इस में उषा उत्थुप भी आने वाली थीं, इसलिए कुछ दिन पहले टिकट ले लिया....उषा उत्थुप को मैंने दो तीन बरस पहले यहां मुंबई के लिट-फेस्ट में देखा था और थोड़ा सुना भी था ....महान् गायिका तो हैं ही ...इन की एनर्जी और इन की आवाज़ की बुलंदी के क्या कहने....

आज से 45 बरस पहले के दिनों की बात याद आती है ...1981 के दिन....मैं तो डे-स्कॉलर था लेकिन जब दोपहर के वक्त मेडीकल कॉलेज अमृतसर के होस्टल के पास से निकलने का मौका मिलता....उन कमरों से तेज़ आवाज़ में रंभा हो, रंभा हो ....गीत की आवाज़ हमेशा आया करती थी, यह क्रेज़ था उन दिनों इस गीत .......उन दिनों क्या ....अभी भी इस गीत की शोहरत आसमां पर है ...चलिए, पहले उसे सुन ही लेते हैं ....कल जैसा उस प्रोग्राम में पेश किया गया ....

ज़ाहिर है, यह 1981 का दौर न केबल का था और न ही दूसरे चैनलों का ....रेडियो ही चला करता था ज़्यादातर और होस्टल से जो आवाज़ आया करती थी वह टेप-रिकार्डर पर बजते इस गीत से आया करती थी ....यह जो ऊपर गीत का मैंने लिंक लगाया है उसे पूरा सुनिए... क्योंकि उस गीत के बाद उषा उत्थुप उस गीत से जु़ड़ी कुछ यादें भी साझा कर रही हैं....सुनिएगा...

अच्छा, एक बात और ...प्रोग्राम में मैं चला तो गया ...वहां पर कंपियर ने जब यह कहा कि बप्पी दा ने वैसे तो बहुत से मधुर संगीत वाले गीत भी गाए हैं ..लेकिन इस प्रोग्राम में तो डिस्को गीत ही पेश किए जाएंगे....उस वक्त मुझे लगा कि आज तो मैं ऐसे ही आ गया ...क्योंकि चंद डिस्को सांग्स के अलावा मुझे इन गीतों में कोई रुचि है नहीं .....लेकिन वही सुपर-डुपर गीत जब उषा उत्थुप ने पेश किए और विजय बेनेडिक्ट ने जिसने वह गीत गाया था उस फिल्म में ...ऑए एम ए डिस्को डांसर....कल उन से फिर से गीत सुनने को मिला ...और उन्होंने बताया कि सुबह 8 बजे से लेकर शाम पांच बजे तक इस गीत की रिकार्डिंग चली ....और शर्त यही थी कि अगर मेरा गाया गीत पसंद आ गया तो ठीक है ...वरना इस गीत तो किशोर दा से गवाया जाएगा....खैर, गीत इन की ही गाया हुआ फिट हो गया फिल्म में....फिट क्या, ऐसा सुपर हिट बन गया कि हमारे ज़माने में लोग इस के दीवाने हो गए....मुझे भी याद है 1982 के दिन थे ...इतनी गर्मी थी उस दिन जब मैंने यह फिल्म डिस्को-डांसर देखी थी.....कल विजय बेनेडिक्ट ने यह गीत गाया, उस को आप मेरे इस यू-ट्यूब लिंक पर जा कर देख सकते हैं...यह रहा उस का लिंक ....ऑए एम ए डिस्को डांसर....

उषा उत्थुप के गायन में बेहद कशिश है...एनर्जी है, बुलंदी है ......जो श्रोताओं और दर्शकों को जैसे बांधे रखती है ....बेहतरीन पेशकश....दो एक और वीडियो कल के प्रोग्राम के मैं यहां शेयर कर रहा हूं....


इस प्रोग्राम में बप्पी दा की बेटी रेमा और उन की बेटी का बेटा भी आया हुआ था....रीगो....वह भी म्यूज़िक में ही अपना कैरियर शुरु कर रहा है ...बहुत कांफिडेंस के साथ गाता है ...बता रहा था कि उसने अपने दादू के साथ यहां इसी हाल में बहुत से शो किए है ं...जब वह गा रहा था तो उस के साथ साथ उस के दादू के साथ तस्वीरें भी स्क्रीन पर दिखाई दे रही थीं.....जैसे उस जवान की पेशकश थी उस से लगता है कि उसने भी बहुत मेहनत की है ....इस कला को साधने के लिए ...आप उस की आवाज़ भी सुनिए...वह बप्पी दा का नाती हुआ ....लेकिन वह बार बार दादू लफ्ज़ का इस्तेमाल कर रहा था ....पता नहीं, कुछ समझ में नहीं आया......वैसे इतना दिमाग पर लोड लेने की ज़रुरत भी क्या है, आप भी उस की बेहतरीन आवाज़ सुनिए....बुलंदी आवाज़ की, जोश और बप्पी दा जैसा ब्रैंड....बढ़िया चमकदार पोशाक, सोने के ज़ेवर और वही वाले तेवर .............उम्मीद है यह जवान भी आने वाले वक्त का चमकता सितारा होगा....शुभकामनाएं उस के सुनहरे भविष्य के लिए ....

अभी देखा तो कल के प्रोग्राम की एक और रिकार्डिंग मेरे फोन में थी, उसे भी शेयर कर रहा हूं.....इस में उषा उत्थुप अपनी भप्पी दा से जुडी यादों को साझा कर रही हैं ...देखिए इसे भी .....


आज सुबह बप्पी दा का विकी पेज देखा तो सब कुछ याद आ गया कि डिस्को सांग्स के अलावा भी उन्होंने कितने बेहतरीन फिल्मी गीतों से हमारा मनोरंजन किया है ...पिछले इतने दशकों से ....लिस्ट बहुत लंबी है ...मैं तो हैरान रह गया..क्योंकि उस लिस्ट में बहुत से गीत मेरे फेवरेट हैं ...जिन्हें मैं अकसर सुनता रहता हूं .... उन में से एक यह  भी है ...



मेरी पीढ़ी जो फिल्मों, फिल्मी गीतों के साथ बड़ी हुई है ...उस का इन सब से भावनात्मक जुड़ाव है ...याद दिला दूं कि हमारे दिनों में (ज़्यादा नहीं, यही कोई पचास बरस पहले)..फिल्म देखने जब जाते थे तो सिनेमा हाल के बाहर 10-20पैसे में उस फिल्म के गीतों की एक छोटी सी किताब मिलती थी ...मुझे भी यह बहुत महंगी कंसाईनमैंट दो तीन दिन पहले ही प्राप्त हुई है ...बहुत ज़्यादा महंगी मिली है, बेशक...लेकिन जितनी यादें इन से बावस्ता हैं उस के आगे वह कीमत कुछ नहीं ....पचास, बरस पहले जो काम दस, बीस पैसे में हो जाता था ....वह बीस तीस साल पहले तीन चार रुपए में  होने लगा जब अलग अलग गीतकारों की, अलग अलग फिल्मों की किताबें मिल जाती थीं और अब .......जाते जाते नीचे भी एक नज़र मार लीजिए.....




आज के लिए इतना ही .....सुबह सुबह दिल्ली एफएम गोल्ड पर एक शे'र सुना था  ...जो आज सारे दिन के लिए मेरे पास ही रह गया.....

"कांटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बां..

ये भी गुलो के साथ पले हैं बहार में..."

(बहादुर शाह ज़फ़र) 

PS.....लिखना भी शारीरिक कसरत जैसा ही है ...कुछ नहीं न करो तो इच्छा ही नहीं होती.....पूरे तीन महीने के बाद मैंने आज कुछ लिखा है, लिखने का मन नहीं हो रहा था...लेकिन ढीठ बन कर बैठ ही गया....क्योंकि पिछले दिनों मैं कुछ विषयों पर लिखना चाह रहा था, लेकिन बस ऐसे ही आलस की लोई ओढ़े पडा रहा....कुछ बेहतरीन प्रोग्रामों में भी गया...लेकिन ब्लॉग के पन्नों पर कुछ सहेज कर नहीं रखा....मुझ में यह बहुत बड़ी कमी है...