घासलेट भी मैंने ज़्यादा लिख दिया है ...कहीं गोबर के उपले इस्तेमाल करने वाले दिन ही न लौट आएं...क्योंकि अगर उस महान् वैज्ञानिक आइंन्सटाईन की बात याद करें तो कुछ भी हो सकता है ...वह कह कर गए हैं कि मुझे यह तो पता नहीं कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा लेकिन इतना तय है कि भविष्य में अगर चौथी वर्ल्ड वॉर की नौबत आई तो यह डंडों और पत्थरों से लड़ी जाएगी...
सोमवार, 16 मार्च 2026
घासलेट पर ही न लौटना पड़े कहीं!
घासलेट भी मैंने ज़्यादा लिख दिया है ...कहीं गोबर के उपले इस्तेमाल करने वाले दिन ही न लौट आएं...क्योंकि अगर उस महान् वैज्ञानिक आइंन्सटाईन की बात याद करें तो कुछ भी हो सकता है ...वह कह कर गए हैं कि मुझे यह तो पता नहीं कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा लेकिन इतना तय है कि भविष्य में अगर चौथी वर्ल्ड वॉर की नौबत आई तो यह डंडों और पत्थरों से लड़ी जाएगी...
रविवार, 8 मार्च 2026
आज महिला दिवस पर ब्लॉगिंग का बिल्कुल ख़याल न था ...लेकिन..
| इन के लिए महिला दिवस के क्या मायने!! -वही बोझा, उस के तले वैसे ही दबे रहना, वही पिसना...फिर भी इन की जिजीविषा को सलाम |
लेकिन क्या?
हां, सच में यह ब्लॉग लिखने का कोई इरादा न था ...लेकिन बात ही कुछ ऐसी हो गई कि फिर मैंने ज़िद्द ही कर ली कि अब तो मन की बात वॉट्सएप पर न सही तो क्या, अपने ब्लॉग में दर्ज कर के रहूंगा...
तो हुआ यूं कि आज सुबह जैसे ही मेरा सब से फेवरेट पेपर टाईम्स ऑफ इंडिया बंबई एडिशन हाथ में पकड़ा ....उस के पन्ने उलट पलट रहा था कि महिलाओं से संबंधित कंटैंट इस में भरा हुआ था ....इच्छा हुई कि इस में उन सब पन्नों की फोटो लूं और वाट्सएप पर तस्वीरों की शक्ल में उन को शेयर कर दूं.....चाहे, पढ़ा मैंने उन में से पूरा किसी को भी नहीं, बस हैडिंग ही देखे या तस्वीरों के साथ उन के कैप्शन देखे हैं...
हां, तो जब मैं उन सब तस्वीरों को शेयर करने लगा तो मुझे महसूस हुआ कि जो इस वक्त मन में उद्गार उठ रहे हैं उन को भी लिख कर राहत पा लूं ...जी हां, लिखने वालों के लिए लिखना मानचिक हलचल से निजात पा लेने का एक ज़रिया भी होता है ...मैंने भी उन तस्वीरों के साथ वाट्सएप पर मैसेज लिखते लिखते 12-15 मिनट बिता दिए....लिख रहा था तो सामने पड़ी फीकी चाय की भी परवाह न की ....खैर, मन की पूरी बात लिखने के बाद जैसे ही बटन दबाया.....अचानक सब कुछ गायब। टेक्स्ट मैसेज तो क्या तस्वीरें भी न आगे जा सकीं...
अफ़सोस हुआ ...लेकिन उन बातों को फिर से हु-ब-हू लिखना ...न तो यह हो पाता और न ही इतना सब्र है मेरे में....खैर, मैंने यह सोचा कि ठीक है, जो बातें लिखी हैं उन को अपने ब्लॉग में लिख कर महिला दिवस की बात कर लूंगा....
टाइम्स आफ इंडिया को देखने के बाद जब इंगलिश का मिड-डे देखा तो उस में अधिकतर कंटैंट महिलाओं से ही जुड़ा हुआ था ...बहुत से बोल्ड मुद्दे भी थे ....हैडिंग ही देखे...अब कोई लिख ले या पढ़ ले, एक ही काम हो सकता है ...लेकिन उस के आखिरी पन्ने पर एक इश्तिहार दिख गया ...आप भी देखिए......
| इस इश्तिहार में क्या कुछ कमी लगी? अगर हां, तो लिखिए नीचे कमेंट में ...अगर नहीं लगी तो भी सब से नीचे मैंने कुछ लिखा है, पढ़िए ज़रूर ....यह मेरा ख़याल है ... |
पूरा पेपर आज महिला दिन के बारे में था ....शायद उन महिलाओं के लिए जो इंगलिश पढ़ना लिखना जानती हैं, बोलती भी हैं और अपने हक-हकूक के बारे में सचेत हैं....मुझे तो अधिकतर यह सब पेज-थ्री कंटेंट ही लगा....कहीं पर आस पास की आम महिलाओं की उपलब्धियों के बारे में मुझे कुछ नहीं लिखा दिखा......वह महिला जिससे जब पूछा जाता है कि आप क्या करती हैं.......और वह लगभग झेंपते हुए कहती हैं........कुछ नहीं, बस हाउस वाईफ....
यही सुन कर सब से ज़्यादा बुरा लगता है कि जो काम ज़िंदगी में सब से ज़रूरी है ...जिस की ड्यूटी तड़के 4-5 शुरू होती है और रात में सब के सो जाने के बाद, चूल्हा-चौका समेटने के बाद चाहे 11 बजे या 12...कोई परवाह नहीं ...वह कह रही है ...कुछ नहीं, बस घर पर ही ...।
महिला दिवस के सही मायने तभी होंगे जब सारी महिलाओं की तस्वीर बदलेगी....सिर्फ़ अच्छी फर्राटेदार इंगलिश बोलने वाली महिलाओं की ही नहीं....इसलिए जब भी महिलाओं के इस तरह के आयोजन होते हैं, उन में सब की भागीदारी ज़रूरी है....कतार में सब से पीछे खड़ी महिला के भी दिन बदलने चाहिए...जिसे अपने हक का कुछ पता नहीं, हर तरफ़ उस का शोषण है, कुछ दिख जाता है, कुछ दिखता है, सब कुछ सह जाती हैं...दुनिया भर की कमेटियां हैं, लेकिन फिर भी जो ज़मीनी हालात हैं, यह जग जाहिर है....शोषण सिर्फ़ दैहिक या मानसिक ही नहीं होता, इस के अनेकों रूप हैं, बहाने हैं....जिन आंखों से कोई किसी महिला को तकता है ...बहुत बार वह भी शोषण की श्रेणी ही में आता है ......
सरकार या एनजीओ बहुत कुछ कर रही है लेकिन सब कुछ सरकार ही कर देगी, यह असंभव है....मानसिकता बदलनी होगी...और यह बदलाव तो एक परिवार से एक पुरूष ही से शुरु होगा.... इतना पुरुष प्रधान समाज कि जैसे कन्या का जन्म न हो गया हो, कोई ज़ुर्म हो गया हो....मुझे अच्छे से याद है कि पहले तो किसी घर में स्वस्थ बेटी के जन्म होने पर बधाई देने का रिवाज़ भी न था ....बधाई की तो बात ही क्या करें, अभी परसों मैं देश के एक चोटी के उद्योगपति की (कितना चोटी का है, अगर लिखूंगा तो आप समझ जाएंगे) इस लिए नहीं लिख रहा हूं...वह अपनी जीवनी में लिखता है कि जब उस की बड़ी बहन का जन्म हुआ तो मेरी परदादी ऐसे हो गई कि उसने अपने आप को तीन दिन के लिए कमरे में बंद कर लिया....। (बिल्कुल उसने यही लिखा है) -शनिवार, 28 फ़रवरी 2026
डिस्को किंग भप्पी लहरी नाईट के कुछ मंज़र.....
म्यूज़िक कंसर्ट तो यहां बंबई में आए दिन होते ही रहते हैंं....बहुत से देखे भी हैं ...और लगभग सभी मुंबई के सब से बढ़िया षणमुखानंद हाल में....अब किसी म्यूज़िक कंसर्ट में जाने से पहले थोड़ा सोचना पड़ता है ....क्योंकि बार बार एक ही तरह के प्रोग्राम नहीं देखे जाते ....बोरियत होने लगती है ...
फिर भी इसी हाल में आशा भोंसले, कुमार सानू, उदित नारायण, हेमलता.....और किसी दूसरी जगह पर शैलेंद्र सिंह...उषा मंगेशकर, सुखविंदर सिंह ...और भी होंगे, नाम याद नहीं आ रहे ...उसी तरह से प्यारेलाल (लक्ष्मीकांत प्यारे लाल की जोड़ी वाले ) और आनंद जी (कल्याण जी आनंद जी जोड़ी) को लाईव आर्केस्ट्रा कंडक्ट करते भी कुछ अरसा पहले इसी हाल में देखा ....तो फिर इस से आगे देखने को रह ही क्या जाता है ...
हां, देखने में रह जाते हैं कुछ लोग ...जिन को हम लोग पिछले 50 बरसों से सुन रहे हैं ...जैसे कि इस प्रोग्राम ...बप्पी लहरी नाईट के इश्तिहार तो कुछ महीनों से आ रहे थे....लेकिन इतना पहले से कैसे टिकट खरीद लें...कहीं आने जाने का भी पता नहीं होता...लेकिन इस में उषा उत्थुप भी आने वाली थीं, इसलिए कुछ दिन पहले टिकट ले लिया....उषा उत्थुप को मैंने दो तीन बरस पहले यहां मुंबई के लिट-फेस्ट में देखा था और थोड़ा सुना भी था ....महान् गायिका तो हैं ही ...इन की एनर्जी और इन की आवाज़ की बुलंदी के क्या कहने....
आज से 45 बरस पहले के दिनों की बात याद आती है ...1981 के दिन....मैं तो डे-स्कॉलर था लेकिन जब दोपहर के वक्त मेडीकल कॉलेज अमृतसर के होस्टल के पास से निकलने का मौका मिलता....उन कमरों से तेज़ आवाज़ में रंभा हो, रंभा हो ....गीत की आवाज़ हमेशा आया करती थी, यह क्रेज़ था उन दिनों इस गीत .......उन दिनों क्या ....अभी भी इस गीत की शोहरत आसमां पर है ...चलिए, पहले उसे सुन ही लेते हैं ....कल जैसा उस प्रोग्राम में पेश किया गया ....
ज़ाहिर है, यह 1981 का दौर न केबल का था और न ही दूसरे चैनलों का ....रेडियो ही चला करता था ज़्यादातर और होस्टल से जो आवाज़ आया करती थी वह टेप-रिकार्डर पर बजते इस गीत से आया करती थी ....यह जो ऊपर गीत का मैंने लिंक लगाया है उसे पूरा सुनिए... क्योंकि उस गीत के बाद उषा उत्थुप उस गीत से जु़ड़ी कुछ यादें भी साझा कर रही हैं....सुनिएगा...
अच्छा, एक बात और ...प्रोग्राम में मैं चला तो गया ...वहां पर कंपियर ने जब यह कहा कि बप्पी दा ने वैसे तो बहुत से मधुर संगीत वाले गीत भी गाए हैं ..लेकिन इस प्रोग्राम में तो डिस्को गीत ही पेश किए जाएंगे....उस वक्त मुझे लगा कि आज तो मैं ऐसे ही आ गया ...क्योंकि चंद डिस्को सांग्स के अलावा मुझे इन गीतों में कोई रुचि है नहीं .....लेकिन वही सुपर-डुपर गीत जब उषा उत्थुप ने पेश किए और विजय बेनेडिक्ट ने जिसने वह गीत गाया था उस फिल्म में ...ऑए एम ए डिस्को डांसर....कल उन से फिर से गीत सुनने को मिला ...और उन्होंने बताया कि सुबह 8 बजे से लेकर शाम पांच बजे तक इस गीत की रिकार्डिंग चली ....और शर्त यही थी कि अगर मेरा गाया गीत पसंद आ गया तो ठीक है ...वरना इस गीत तो किशोर दा से गवाया जाएगा....खैर, गीत इन की ही गाया हुआ फिट हो गया फिल्म में....फिट क्या, ऐसा सुपर हिट बन गया कि हमारे ज़माने में लोग इस के दीवाने हो गए....मुझे भी याद है 1982 के दिन थे ...इतनी गर्मी थी उस दिन जब मैंने यह फिल्म डिस्को-डांसर देखी थी.....कल विजय बेनेडिक्ट ने यह गीत गाया, उस को आप मेरे इस यू-ट्यूब लिंक पर जा कर देख सकते हैं...यह रहा उस का लिंक ....ऑए एम ए डिस्को डांसर....
उषा उत्थुप के गायन में बेहद कशिश है...एनर्जी है, बुलंदी है ......जो श्रोताओं और दर्शकों को जैसे बांधे रखती है ....बेहतरीन पेशकश....दो एक और वीडियो कल के प्रोग्राम के मैं यहां शेयर कर रहा हूं....
इस प्रोग्राम में बप्पी दा की बेटी रेमा और उन की बेटी का बेटा भी आया हुआ था....रीगो....वह भी म्यूज़िक में ही अपना कैरियर शुरु कर रहा है ...बहुत कांफिडेंस के साथ गाता है ...बता रहा था कि उसने अपने दादू के साथ यहां इसी हाल में बहुत से शो किए है ं...जब वह गा रहा था तो उस के साथ साथ उस के दादू के साथ तस्वीरें भी स्क्रीन पर दिखाई दे रही थीं.....जैसे उस जवान की पेशकश थी उस से लगता है कि उसने भी बहुत मेहनत की है ....इस कला को साधने के लिए ...आप उस की आवाज़ भी सुनिए...वह बप्पी दा का नाती हुआ ....लेकिन वह बार बार दादू लफ्ज़ का इस्तेमाल कर रहा था ....पता नहीं, कुछ समझ में नहीं आया......वैसे इतना दिमाग पर लोड लेने की ज़रुरत भी क्या है, आप भी उस की बेहतरीन आवाज़ सुनिए....बुलंदी आवाज़ की, जोश और बप्पी दा जैसा ब्रैंड....बढ़िया चमकदार पोशाक, सोने के ज़ेवर और वही वाले तेवर .............उम्मीद है यह जवान भी आने वाले वक्त का चमकता सितारा होगा....शुभकामनाएं उस के सुनहरे भविष्य के लिए ....
अभी देखा तो कल के प्रोग्राम की एक और रिकार्डिंग मेरे फोन में थी, उसे भी शेयर कर रहा हूं.....इस में उषा उत्थुप अपनी भप्पी दा से जुडी यादों को साझा कर रही हैं ...देखिए इसे भी .....
आज सुबह बप्पी दा का विकी पेज देखा तो सब कुछ याद आ गया कि डिस्को सांग्स के अलावा भी उन्होंने कितने बेहतरीन फिल्मी गीतों से हमारा मनोरंजन किया है ...पिछले इतने दशकों से ....लिस्ट बहुत लंबी है ...मैं तो हैरान रह गया..क्योंकि उस लिस्ट में बहुत से गीत मेरे फेवरेट हैं ...जिन्हें मैं अकसर सुनता रहता हूं .... उन में से एक यह भी है ...
मेरी पीढ़ी जो फिल्मों, फिल्मी गीतों के साथ बड़ी हुई है ...उस का इन सब से भावनात्मक जुड़ाव है ...याद दिला दूं कि हमारे दिनों में (ज़्यादा नहीं, यही कोई पचास बरस पहले)..फिल्म देखने जब जाते थे तो सिनेमा हाल के बाहर 10-20पैसे में उस फिल्म के गीतों की एक छोटी सी किताब मिलती थी ...मुझे भी यह बहुत महंगी कंसाईनमैंट दो तीन दिन पहले ही प्राप्त हुई है ...बहुत ज़्यादा महंगी मिली है, बेशक...लेकिन जितनी यादें इन से बावस्ता हैं उस के आगे वह कीमत कुछ नहीं ....पचास, बरस पहले जो काम दस, बीस पैसे में हो जाता था ....वह बीस तीस साल पहले तीन चार रुपए में होने लगा जब अलग अलग गीतकारों की, अलग अलग फिल्मों की किताबें मिल जाती थीं और अब .......जाते जाते नीचे भी एक नज़र मार लीजिए.....
आज के लिए इतना ही .....सुबह सुबह दिल्ली एफएम गोल्ड पर एक शे'र सुना था ...जो आज सारे दिन के लिए मेरे पास ही रह गया.....
"कांटों को मत निकाल चमन से ओ बाग़बां..
ये भी गुलो के साथ पले हैं बहार में..."
(बहादुर शाह ज़फ़र)
PS.....लिखना भी शारीरिक कसरत जैसा ही है ...कुछ नहीं न करो तो इच्छा ही नहीं होती.....पूरे तीन महीने के बाद मैंने आज कुछ लिखा है, लिखने का मन नहीं हो रहा था...लेकिन ढीठ बन कर बैठ ही गया....क्योंकि पिछले दिनों मैं कुछ विषयों पर लिखना चाह रहा था, लेकिन बस ऐसे ही आलस की लोई ओढ़े पडा रहा....कुछ बेहतरीन प्रोग्रामों में भी गया...लेकिन ब्लॉग के पन्नों पर कुछ सहेज कर नहीं रखा....मुझ में यह बहुत बड़ी कमी है...