रविवार, 9 जनवरी 2022

जब कभी मोबाइल घर पर रह जाता है ....

जब कभी मोबाइल घर पर रह जाता है ...तो मुझे किसी के भी फोन-मैसेज का इतना ज़्यादा मलाल कभी होता नहीं ...क्योंकि मैं वैसे भी कोई इतना सोशल-बर्ड हूं नहीं...शायद ही मैं किसी के साथ फोन पर कुछ सैकेंड से बात कर पाता हूं ...बस, बोरियत सी होने लगती हैत ...हां, कोई स्कूल-कालेज का साथी हो तो फिर पता ही नहीं हम ठहाके ठहाके मार मार के एक घंटे तक बतियाते रहते हैं, अपनी बेवकूफियों पर हंसते, दूसरों की बेवकूफियों पर खिलखिलाते ...वक्त का पता ही नहीं चलता, ऐसे लगता है कि हंसते हंसते पेट में बल पड़ जाएंगे ...जी हां, मुझे बहुत ही हंसमुख किस्म के लोग ही पसंद हैं....अब जो है, सो है ...जो हंसने का बहाना ढूंढते रहें ...

और रही बात किसी के ऊपर हंसने की ....उस का भी मुझ जैसे बंदे को पूरा हक है ...क्योंकि मैं अपनी बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी बेवकूफियां ब्यां करता रहता हूं और खूब हंसता हूं....मुझे कईं बार लगता है कि यह हमारी खानदानी खासियत है। कुछ दिन पहले मेरा बड़ा भाई अपनी ज़िंदगी में की गई गल्तियों को याद करके ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगा रहा था और साथ में अपने मुंह पर खुद ही चपेड़ें मार रहा था...मैं और वह ही थे कमरे थे ...हंस हंस कर मेरा बुरा हाल हो रहा था ...अब जो भी है, हम ऐसे ही हैं, हम बाहर किसी के भी साथ उतना ही खुलते हैं जितना ज़रूरी होता है लेकिन पर्सनल लाइफ में हम बिल्कुल अलग हैं...

आज थोड़ा यह सब कुछ लिखने का ख्याल इसलिए आया है क्योंकि मेरे बहुत से साथी इस वक्त कोरोना से जूझ रहे हैं ...आसपास बहुत सन्नाटा है, सोच रहा हूं कि इस वक्त माहौल को थोड़ा हल्का फुल्का बनाए रखने के लिए हम से जो भी बन पाए करना चाहिए..और मेरे जैसे बंदे के पास ऐसे ही कुछ भी बकवास बातें लिखने के अलावा और है ही क्या....

हां, तो आज जब मैं सुबह स्कूटर पर बांद्रा की सड़कों को मापने निकला तो मोबाइल घर पर ही छोड गया....मुझे मोबाइल ढोना बहुत बड़ी सिरदर्दी लगती है ....हर वक्त यही लगता है कि जितना यह महंगा है, अगर यह कभी इधर उधर हो गया तो कहीं शॉक की वजह से मुझे अपनी जान से ही हाथ न धोना पड़ जाए। इसलिए मैं बच्चों को कहता हूं कि मुझे पांच सौ हज़ार का एक मोबाइल खरीदवा दो ...जिस से कि मैं दुनिया से बस टच में रह सकूं...इस से ज़्यादा मुझे किसी बात की तमन्ना भी नहीं है। कह देते हैं, हां, बापू, दिलाते हैं, दिलाते हैं....पर बस हर कोई अपनी अपनी दुनिया में खोया हुआ है ....

एक बात बताऊं कभी घर में या काम पर मेरा मोबाइल कुछ सैकेंडों के लिए भी मेरी आंखों से ओझिल हो जाता है न तो सच में बिलकुल पागलों जैसी हालत हो जाती है...१० सैकेंड में प्राण फूलने लगते हैं जैसे मेरा गोद में उठाया हुआ शिशु लोकल गाडी़ की गर्दी में गाड़ी में ही रह गया हो ....सच, मैं इतने महंगे फोन से बहुत परेशान हूं ....लेकिन मजबूरी यह भी है कि मुझे बाज़ारों की, गलियों की, आम आदमी की, आते जाते रास्तों की बहुत सी तस्वीरें खींचनी होती हैं, फिर मैं पोस्टर बनाता हूं ....कैलीग्राफी की मदद से ....मुझे यही काम पसंद है....किसी का भी मज़ाक उड़ाना मेरा कभी भी मक़सद नहीं होता और न ही कभी भी होगा....बस, ज़िंदगी के हसीन लम्हों को कैद करना ही मकसद होता है...जो तस्वीरें मुझे गुदगुदाती हैं मैं चाहता हूं वह दूसरों को भी खूब हंसाएं....और मैं उस पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी लेता हूं उन के पोस्टर बनाने से पहले ....

इसीलिए मुझे पैदल चलना, भीड़ भाड़ वाली जगहों से गुज़र कर निकलना बहुत भाता है ...सारी की सारी ज़िंदगी वहीं है ...मेरे घुटने में दर्द होता है, मैं परवाह नहीं करता, जब ज़्यादा दुखते हैं तो एक दिन बैठ जाता हूं चुपचाप लेकिन ज़िंदगी का भीड़ भड़क्का मेरी ऑक्सीजन है....मुझे मेरे सारे किरदार वहीं बैठे, हंसते-खेलते दिखते हैं ....

अस्पताल वाले तो कह रहे हैं, कोरोना के बादल छंट जाएं तो आना...चल, यार, तू ही कुछ मेरी मदद कर दे ...

दो दिन पहले हास्पीटल से निकला...थोड़ी दूर पर एक पीपल के नीचे ....एक बुज़ुर्ग टांग पर टांग रख कर बड़े इत्मीनान से किसी फुटपाथिया कान रोग विशेषज्ञ से अपने कानों का इलाज करवा रहा था....ऐसी तस्वीरें देख कर बड़ी हंसी आती है ....लेकिन हमें उन में भी व्यंग्य ढूंढना होता है ... ताकि लोगों तक संदेश भी पहुंचे और हल्के फुल्के ढंग से वे बात को समझ भी जाएं। उस फोटो में सब से बात जो नोटिस करने वाली थी वह यही थी कि उस फुटपाथी विशेषज्ञ ने अपना ड्रेस कोड बिल्कुल परफैक्ट रखा हुआ था ...यह बात मेरे भाई ने भी नोटिस की कि इस की ड्रेस तो देख और साथ में भाई ने अपनी टिप्पणी भी जोड़ दी ...पंजाबी भाषा का सहारा लेकर ..क्या करे कोई पंजाबी भाषा का सहारा लिए बिना बात मज़ेदार बनती नहीं ....भाई ने पंजाबी में एक भारी भरकम गाली निकाली और साथ में कहने लगा कि, इस मरीज़ को देख .....इतने इत्मीनान से, बेफ़िक्री से कान से छेड़खानी करवा रहा है जैसे अंबेडकर अस्पताल के ईएटी के एचओडी के रूम में बैठा हो ....😂😂😂

जब भी मैं फोन घर पर रख गया हूं या रह गया है, मेरे से कोई न कोई तस्वीर लेना ज़रूर छूट जाता है जिस का मुझे बहुत मलाल होता है ...आज भी मैंने बीच बाज़ार में एक बंदे को देखा ...उसने तन पर सिर्फ़ एक कोट पहना हुआ था, बिना बनियान, बिना शर्ट के ...और गले में एक चमकती हुई मटरमाला और जिस तरह से हाथ में भजिया रख कर उन का लुत्फ़ उठा रहा था ...वह नज़ारा देखते ही बन रहा था ....मेरी भी उसी वक्त भजिया खाने की हसरत हुई ....कुछ मिनटों के बाद वह पूरी भी हुई जब गर्मागर्म परांठों के साथ आलू, प्याज़ के बढ़िया पकौड़े, आम का आचार और खूब मीठी चाय का नाश्ता किया ...श्रीमति जी का बहुत बहुत शुक्रिया ...हां, तो मैं जैसे ही उस बंदे के पास से गुज़रा मुझे यही अहसास हुआ कि मनवा बेपरवाह की यही तस्वीर है ...मैंने वह सुकून, वह तृप्ति, वह अहसास कब किसी के चेहरे पर देखा था, मुझे तो याद भी नहीं...

हां, मटर माला से अपनी मौसी सुवर्षा याद आ गई ...उन्हें खूब सारा सोना खरीदने और उसे दिखाने का बड़ा ज़्यादा शौक था ..उन के पास एक बहुत बड़ी सोने की मटरमाला थी ...खूब लंबी ...जिसे वह दो-तीन बार फोल्ड कर के गले में पहनती और बढ़िया बढ़िया सिल्क की साड़ी के साथ पहनती तो बिल्कुल महारानी लगतीं ....मैं अपनी मौसी को अकसर वह मटरमाला और उस का महारानी लगना ज़रूर याद दिलाया करता ....वह खूब हंसती..खूब हंसती ....और मैं बात को कोई बढ़ा-चढ़ा के भी न कर रहा होता....वह मौसी हमें बड़ा प्यार करतीं...बचपन में हमें कहा करती कि ये नंदन, चंदन, चंदामामा, लोटपोट खूब पढ़ा करो ....

बस, हो गया आज की सुबह के लिए इतना ही काफी है ...नीचे एक पसंदीदा गीत चिपका दूं, बस हो गया....बात इतनी सी है कि दूसरों पर हंसने की बजाए अपने पर हंसने की आदत डालिए....मुझे ऐसे लोगों से बहुत डर लगता है जो दूसरों पर ही हंसना जानते हैं...मैं कोसों दूर से ऐसे लोगों को भांप लेता हूं ....मुझे सभी हंसते-मुस्कुराते चेहरे बहुत भाते हैं ....मैं इन की तलाश करता रहता हूं ....हम लोग जहां काम करते हैं वहां भी दो चार चेहरे तो ऐसे होते हैं जो बिना किसी रस्म के, बिना किसी ख़ास कारण के, बिना किसी मतलब के हंसना-मुस्कुराना जानते हैं ....ऐसे चेहरों को तलाशिए....ये वो रब्बी लोग होते हैं जिन के दीदार के लिए कुछ भी बहाना ढूंढा करिए.....क्योंकि इन को देखते ही, इन से एक मिनट बात करते ही आप को इतना हल्कापन महसूस होने लगता है कि क्या कहें ....मैंने भी यह टीम ढूंढ रखी है ..लेकिन उसे उजागर करना ठीक नहीं, दुनिया की अच्छी-बुरी नज़र से बचा कर रखना होता है, संभाल कर रखना होता है , आप अपने लिए यह एक्सरसाईज़ खुद करिए... हा हा हा हा हा ...वक्त लगता है इसमें...😎😎😂😂😃😃

1 टिप्पणी:

  1. सही कहा...हँसमुख लोगों के साथ रहना जीवन के स्ट्रेस को काफी हल्का कर देता है।

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