Saturday, August 23, 2014

रेलवे पुल के नीचे से गुज़रते वक्त क्या आपने कभी यह सोचा?

प्रश्न ही कितना अटपटा सा लगता है कि क्या रेलवे पुल के नीचे से गुज़रते वक्त आपने कभी कुछ सोचा?... इस में सोचने लायक बात ही क्या है, आप यही सोच रहे हैं...मैं भी आप की तरह ही सोचा करता था... लेिकन पिछले रविवार के दिन से मैं भी सोचने लगा हूं।

चारबाग स्टेशन के पास वाला पुल 
हुआ यूं कि पिछले रविवार के दिन मैं एक कार्यक्रम में जा रहा था, जिस जगह पर कार्यक्रम होना था --लखनऊ के हज़रतगंज-- यहां पर चारबाग एरिया से होकर जाना होता है। रास्ते में यह पुल पड़ता है जिस की तस्वीर आप यहां देख रहे हैं... इस पुल के नीचे से मैं सैंकड़ों बार गुजर चुका हूं, लेकिन उस दिन मैंने क्या देखा कि कुछ साईकिल, स्कूटर, मोटरसाईकिल सवार इस पुल के दोनों किनारों पर चुपचाप खड़े थे। ज़ाहिर सी बात है कि मैंने भी अपने स्कूटर को ब्रेक लगा दी। 

इस तरह से लखनऊ शहर के लोगों को रूकते देखना मुझे हैरान कर गया क्योंकि ये तो रूकते ही नहीं हैं....बस जब व्हीआईपी मूवमैंट होती है तो ट्रैफिक पुलिस वाले १०-१५ मिनट सारा यातायात रोके रखते हैं, और तो कहीं मैंने इतना सिरियसली ट्रैफिक रूकता देखा नहीं। 

हां, जिस समय इस पुल के दोनों तरफ़ दो पहिया वाहनों वाले रूके हुए थे, उस समय इस पुल के ऊपर से एक ट्रेन सरक रही थी। मुझे यही अंदेशा हुआ कि यह पुल बहुत पुराना लगता है ......ये लोग भी शहर के पुराने जानकार है, शायद कोई चेतावनी होगी कि जब पुल से गाड़ी निकलने तो रूक जाना ज़रूरी है, क्योंकि पुल पुराना है। 

अभी मैं यह सोच ही रहा था कि गाड़ी पूरी आगे निकल गई और झट से सारे दुपहिया वाहन चल पड़े......मैं भी चल पड़ा......सस्पैंस मेरे मन में ही रह गया कि ये बीस के करीब लोग रूके क्यों रहे............मेरे से रहा नहीं गया तो मैंने अपनी बाईं तरफ़ जा रहे एक साईकिल सवार स्कूली छात्र से पूछ ही लिया.......यार, ये लोग रूक क्यों गये थे?

अंकल, गाड़ी से हृमन वेस्ट मेटीरियल (human waste material) नीचे गिरता है ना, बस उसी से बचने के लिए रूकना पड़ता है, उस ने कितनी सहजता से मेरी जिज्ञासा को शांत कर दिया।

रेल की पटड़ियों के बीच वाली खाली जगह 
तभी मेरा ध्यान इस पुल के ऊपर गया......धत तेरे की.......वह स्कूल का बच्चा सच कह गया........ऊपर से यह इस तरह से खुला था जिस तरह के आप इस तस्वीर में देख रहे हैं। 

यह पुल लखनऊ के चारबाग मेन स्टेशन से लगभग कुछ दो-तीन सौ मीटर की दूरी पर ही है और यात्रियों को वैसे ही कहा जाता है कि स्टेशन पर आप लोग ट्रेन की टॉयलेट का इस्तेमाल न करें....ताकि स्टेशनों को साफ़ सुथरा रखने में मदद मिल सके........लेकिन जैसे ही ट्रेन छूटती होगी और फिर इस तरह के पुल से सब तरह के वेस्ट मेटिरियल की बरसात होती होगी.........इसीलिए लोगों ने इस से बचने का जुगाड़ भी ढूंढ लिया कि चंद मिनट रूकने में ही बेहतरी है...

काश, लखनऊ के कुछ लोग जो हर जगह पान-पानमसाला-तंबाकू-गुटखा थूकते रहते हैं वे जब सड़कों पर वाहनों पर चलते हुए थूकते हैं तो दूसरे के साफ़-सुथरे कपड़ों के बारे में भी थोड़ा संवेदनशील रहा करें, यहां तो यह बहुत ही आम समस्या है.......पहली बार यही देखा कि महंगी कारें चलाने वाले भी कईं बार रोड़ के किनारे गाड़ी रोकते हैं, झटके से दरवाजा खोलते हैं और पाव-भर थूक-पीक-पान से व्हीआईपी रोड़ को रक्त रंजित कर के आगे सरक जाते हैं........

आप को लग रहा होगा कि वे इतने संवेदनशील हैं कि सड़क पर दूसरे लोगों पर पीक न पड़े, इस का ध्यान रखते हुए यह करते होंगे, लेिकन मुझे लगता है अपनी महंगी कार को पीक के रंग से बचाने के लिए वे यह ईनायत करते होंगे हैं..

हां, तो अपने शहर में भी इस तरह के पुलों के नीचे से गुज़रते वक्त ध्यान रखिएगा......फिर मत कहिएगा कि किसी ने पहले सावधान नहीं किया। 

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