Tuesday, March 4, 2008

इसे दुनिया का आठवां अजूबा न कहूं तो और क्या कहूं?

बहुत दिनों से सोच रहा हूं कि दुनिया के सातों अजूबों के बारे में तो बहुत कुछ जानते हैं .....और हां , इन हिंदी ब्लोगर महिलाओं को अब यदा-कदा प्रिंट मीडिया में जगह दी जा रही है.....देख कर, पढ़ कर अच्छा लगता है। आप को भी लग रहा होगा कि ये आठवें अजूबे में महिला ब्लोगरज़ को कहां ले आया तूं..............आप ठीक कह रहे हैं ...लेकिन मैंने आज इस देश की अरबों ऐसी महिलाओं की बात करने का निश्चय किया है, जो इस देश के तमाम पुरूषों को इस लायक बनाती हैं कि वे अपने अपने क्षेत्र में जीत के परचम फहरा कर अपनी उपलब्धियों की शेखी बघेर सकें....और जिसके बारे में शायद बड़ी ही लापरवाही से बिना सोचे-समझे यह कह दिया जाता है या ज़्यादातर वह अपने आप को कुछ इस तरह से इंट्रोड्यूस करने में ही विश्वास करती है......हमारा क्या है, सारा दिल्ला चुल्हे-चौके में ही निकल जाता है और वह इतनी भी तो नहीं जानती कि आज कल उसे हम होम-मेकर कह कर पंप देने लगे हैं......................और सब से महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ये अरबों महिलायें वे हैं जो सब अपने हाथों से अपने सारे कुनबे का भरन-पोषण करती हैं( इस से भी मेरा मतलब यह तो बिल्कुल नहीं है कि महिला बलोगर्स स्वयं खाना नहीं बनाती होंगी !)……….और हां ,इसे खाने वाली बात की ही तो बात आज मैंने करनी है।

एक एक्सपेरीमैंट( प्रयोग) की तरफ़ मेरा ध्यान जा रहा है.......क्या है ना, कि अगर हम एक किसी दिन दाल या सब्जी की एक सी मात्रा अपने किसी नज़दीकी रिशतेदार महिला( मां, नानी-दादी, पत्नी, बहन, भाभी, मौसी.....) को दें और साथ एक जैसे मसाले एक ही मात्रा में दे दें, उसे पकाने के बर्तन भी एक जैसे ही उपलब्ध करवा दें, किस प्रकार की आंच सभी प्रतिभागियों द्वारा उस दाल-सब्जी को बनाने में इस्तेमाल होगी, लगे हाथों इस को भी स्टैंडर्डाइज़ड कर दिया जाये.........................इतना सब करने के बावजूद क्या आपको लगता है कि उन सब के द्वारा बनाये हुये खाने का ज़ायका एक सा ही होगा। नहीं ना, कभी हो ही नहीं सकता, आप भी मेरी तरह यही सोच रहे हैं ना..........बिल्कुल सही सोच रहे हैं। अपनी नानी के हाथ के पकवान आखिर क्यों हम सब उस कागज की किश्ती और बाऱिश के पानी की तरह हमेशा अपनी यादों की पिटारी में कैद कर लेते हैं..........आखिर यार कुछ तो बात होगी। क्यों हमारी माताओं द्वारा हमें बेहद प्यार से बना कर खिलाये गये पकवान अगली पीढ़ी के लिए बिल्कुल एक स्टैंडर्ड का काम करते हैं......यार, मां तो ऐसा बनाती है या बनाती थीं........इस में अगर मां के बनाये पकवान की तरह यह होता तो क्या कहने......। बस, ऐसी ही बहुत ही बातें , जो इस देश के घर-घर में नित्य-प्रतिदिन होती रहती हैं।

सोचता हूं कि यह तो थी ...रोटी, दाल, सब्जी की बात......लेकिन अगर इसी प्रयोग को चाय के ऊपर भी किया जाये तो भी इस के परिणाम हैरतअंगेज़ ही निकलेंगे.....आप एक घूंट भर कर ही बतला दोगो कि आज चाय बीवी ने बनाई है या यह मां के हाथ की है.............................सोचता हूं कि ऐसा कैसे संभव है, घर की सभी महिलायें इन में एक जैसा चीज़ें डालती हैं, .....आंच भी एक जैसा , समय भी लगभग एक ही जैसा, लेकिन आखिर यह सब संभव कैसे हो पाता है कि हम झट से ताड़ लेते हैं कि आज की दाल तो पानी जैसी पतली बनी है , सो यह करिश्मा तो सुवर्षा मौसी ही कर सकती है ...................केवल फिज़िकल अपियरैंस ही क्यों, इस की महक, इस का स्वाद सब कुछ एक दम बदल सा जाता है। मेरी लिये तो भई यह ही इस दुनिया का आठवां अजूबा है.......क्या आप को यह किसी भी तरह के अजूबे से कम लगता है। लेकिन इस का जवाब देने से पहले अपने नानी –दादी के प्यार से बनाये गये और उस से दोगुने लाड से परोसे गये पकवानों की तरफ़ ध्यान कर लेना और तब अपने दिल पर हाथ रख कर इस बात का जवाब देना।

चलते चलते ज़रा इस की तरफ़ भी तो थोड़ा झांके कि आखिर ऐसा क्यों है......ऐसा इसलिये है क्योकि चाहे एक जैसे मसाले यूज़ हो रहे हैं, एक ही प्रकार का आंच यूज़ हो रहा है( बार –बार मैं इस आंच के एक ही तरह के होने की बात जो किये जा रहा हूं ...वह केवल इसलिए ही है कि इस हिंदी ब्लोगिंग कम्यूनिटि में कुछ युवा लोग ऐसे भी तो होंगे जिन्होंने कभी चुल्हे पर पकाई गई दाल खा कर उंगलीयां न चाटी हों......etc.) …….तो आखिर फिर यह अंतर कैसे पड़ जाता है ....................मेरा विचार है यह जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है ना....इसे आप प्यार कहिए, दुलार कहिए, इसे आप भावना कहिये, इसे आप श्रद्धा कहिये.......................मेरा क्या है, मैं तो लिखता हूं जाऊंगा.........सारा अंतर इस की वजह ही से होता है............हमें वह बात तो पहले ही से पता है...जाकी रही भावना जैसी.....................। बाकी इस पर ज़्यादा प्रकाश तो निशा मधुलिका जी डाल सकती हैं जो कि अपने हिदी बलोग के माध्यम से नाना प्रकार के व्यंजनों से तारूफ करवाती रहती हैं।

और हां, एक बात और भी याद आ रही है कि पहले तो इन मसालों वगैरह के नाप-तोल के लिए ये चम्मच तक भी इसेतमाल नहीं होते थे........................मेरी नानी के के चौके में भी एक लकड़ी की नमकदानी( पंजाबी में इसे लूनकी और आज कल रैसिपि बुक के एक एक लाइन पढ़ कर खाना बनाने वाले कुछ लोग इसे masala-box भी कह देते हैं---क्या है ना कम से कम नाम तो ट्रेंडी हो.....ऐसा भी ना हो कि लूनकी कह दो और किसी की भूख ही मर जाये) .....................हुया करती थी, और मुझे अच्छी तरह से याद है कि चुस्तीलेपन से, बेपरवाह लहजे से, पूरे आत्मविश्वास के साथ बस झट से कुछ चुटकियां भर भर कर वह सब्जी बनाते समय पतीले में या कडाही में उंडेल दिया करती थीं..............और लीजिए तैयार है खाना –खजाना शो-वालों को ओपन-चैलेंज देता हुया एक डिश............ओह नो, सारी, डिश नहीं भई, तब तो सीदी सादी दाल, रोटी , सब्जी ही हुया करती थी.........जिसे खाने के बाद एकदम खूब नशा हो जाया करता था।

लेकिन इन फाइव-स्टारों के खाने में मज़ा क्यों नहीं आता......................क्योंकि मेरा दृढ़ विश्वास है कि इस खाने में टैक्नीकली सब कुछ ठीक ठाक होता है, शायद शुद्धता भी पूरी, परोसने का सलीका भी रजवाड़ो जैसे, ...........लेकिन आखिर इस में फिर कमी क्या रह जाती है...........................बस वही भावना की कमी होती है, और क्या । इस भावना से एक बात और भी याद आने लगी है कि पहले जब रसोई-घर में सब एक साथ बैठ कर खाना खाते थे तो ज़ायका अच्छा हुया करता था....या अब ड्रैसिंग-टेबुल पर सज कर जो खाया जाता है......................ओ.के......ओ.के..........मैं भी थोड़े अनकम्फर्टेबल से प्रश्न पूछने लगा हूं.....ठीक है, हमारा मन तो सच्चाई जानता है, बस इतना ही काफी है, लेकिन भई आखिर क्या करें, इस संसार में रहना भी तो है, थोड़ा दिखावा भी तो ज़रूरी है।

मेरा ख्याल है अब बस करूं........इसे चाहे तो आप मेरे द्वारा इस महान देश की हर मां, हर बहन, हर बीवी, हर भाभी , हर नानी, हर दादी ....................के मानवता की अलख जगाये रखने के लिए उस के द्वारा दिये गये अभूतपूर्व योगदानों के लिए उसे थोड़ा याद कर लेने का एक तुच्छ प्रयास ही समझें , चाहे कुछ और समझें......लेकिन मेरे लिए तो यही दुनिया का आठवां अजूबा है.........................
अफसोस, इन्हें कभी किसी समारोह में लाइफ-टाइम अचीवमैंट अवार्ड से सम्मानित नहीं किया.... वैसे पता है क्यों., क्योंकि इस देवी को किसी भी बाहरी सम्मान की न तो कभी भूख थी, न ही कभी भूख रहेगी। इस ने तो बस केवल अपने आप को इस मेहनत-मशक्तत की भट्ठी में जलाना ही सीखा है...................लेकिन वह इस में भी खुश है.................। पता नहीं, कईं बार सोचता हूं कि इस देश की नारी के ऊपर , उस के द्वारा दिये जा रहे योगदानों के ऊपर यथार्थ-पूर्ण किताबैं लिखी जानी चाहिये।

और एक तरफ हम हैं............हमारी नीचता देखिए ...कितने सहज भाव से बिना कुछ सोचे-समझे कितने बिनदास मोड में कईं बार कह देते हैं , कह चुके हैं और शायद कहते रहेंगे.....................कि यार, अपनी नानी भी थी बिल्कुल अनपढ़ लेकिन खाना बनाने में तो बस उस का कोई जवाब भी नहीं था। सोचने की बात है कि इस तरह के वाक्य बोल कर हम इन महान देवियों के योगदान को कितनी आसानी से नज़र-अंदाज़ करने का प्रयत्न कर लेते हैं। तो, फिर अब आप कब अपनी नानी-दादी की बातें हम सब को सुना रहे हैं।

पोस्ट लंबी ज़रूर है , लेकिन मुझे तो बस इतना ही लग रहा था कि मेरी स्वर्गीय नानी मेरे पास ही बैठी हुई थीं जिस से मैं बातें कर रहा था.......................अब बारी आप की है !!!!

2 comments:

  1. डाग्दर साब बहुत सारा प्यार का छौंका डाल कर टिप्पणी लिख रहे है, चुटकी से ही नाप लिए है, इस लिए थोड़े को ही बहुत समझ लेना…।इक थी मेरी भी नानी, उनके हाथ के परांठों का तो कोई जवाब ही नहीं था आज भी नहीं है, और एक थी मेरे बेटे की नानी…हाय, क्या खाना बनाती थीं,मेरा बेटा ही क्युं, सारा घर ही कायल था उनके खाने का। और हां लूनकी को मेरी नानी के घर धूड़दानी कहा जाता था, आखिर मसाले चुटकी में लेकर धूड़े ही तो जाते थे जिसे अब स्प्रींकल कहा जाता है॥और अब एक नौंवा अजूबा मैं बताती हूँ आप को…मिलिए डाक्टर प्रवीन चोपड़ा जी से, जहां आज स्त्री को ले कर ब्लोगजगत में इतना गाली गलौच हो रहा है, वहां ऐसी पोस्ट दिल विच ठंडक पा गयी…:)

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