डेढ़ महीने के बाद लिख रहा हूं ...रोज़ लिखना चाहिए....लेकिन बिना किसी कारण विशेष के यह नहीं हो पाता....पिछली पोस्ट 1 दिसंबर को लिखी थी...रोज़ लिखने के लिए इतना कुछ होता है लेकिन बस, यूं ही ....
खैर, आज 13 जनवरी का दिन है ...लोहड़ी है ...30-40 बरसों तक पंजाब-हरियाणा में बिताई लोहड़ी की मीठी यादों में बह जाने का एक बहाना....कड़ाके की ठंडी के दिन, स्कूल में, कॉलेज में, घर में लोहड़ी के त्योहार की बेहद मीठी यादें....याद है, जब बहुत छोटे थे तो लोहड़ी के दिन या तो स्कूल जाते नहीं थे या छुट्टी होती होगी...बदली सी छायी रहती थी मौसम में ....अमृतसर में लगभग तीस बरस, फिरोज़पुर में पांच....लोहड़ी पंजाब का एक बहुत बड़ा पर्व है, जश्न है...त्योहार है ....
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| अमृतसर की यादें ..... 37 साल पुरानी ... |
पहले कैमरे न थे, अच्छा ही था, फिर जब हम 20-25 की उम्र तक पहुंचे तो कैमरे आ गए...अभी याद आया कि कोई कालेज के ज़माने की फोटो यहां लगा दूं ....तो यह 37 साल पुरानी अमृतसर में कॉलेज के दौर की फोटो मिल गईं....उन दिनों मैं एमडीएस कर रहा था ...इस में हम लोग लोहड़ी के दिन दोपहर में जश्न मना रहे हैं....फोटो भी आधी अधूरी हैं, कईं प्रोफैसर दुनिया से चले गए, उन के कुछ शागिर्द - कुछ क्या बहुत से, प्रिंसीपल हो गए, हिंदोस्तान के नामचीन डेंटिस्ट बन गए....वक्त वक्त की बात है ...
खैर, जितनी बढ़िया यादें है इस त्योहार की हमारे बचपन की, युवावस्था की ...उन को लिखने बैठे तो फिर वह नहीं लिख पाऊंगा जो मैं आज लिखना चाहता हूं ...
हां तो दोस्तो, जब हम बच्चे थे तो हमारा फोक्स सारे का सारा लोहड़ी के जश्न पर होता था, आग सेंकना, बढ़िया बढ़िया चीज़े खाना, लाउडस्पीकर पर ऊंची आवाज़ में गीत सुनना, उन पर झूमना .....और बस सब के साथ जश्न मनाना.....फिर जब टीवी महाराज आ गए घर में 1980 के आस पास तो फिर कहीं न कहीं हड़बड़ाहट सी रहने लगी कि जल्दी से मनाएं होली, होलिका दहन में कुछ अनाज डाल कर रस्म अदायगी से करें और लपकें टीवी की तरफ़ ......और फिर धीरे धीरे दुनिया के पास जश्न के इतने साधन हो गए कि त्योहार भी एक दूसरे दिनों की तरह ही लगने लगे हैं अब तो ....वहां भी शायद....
फिर जब पंजाब से बाहर रहने लगे तो कईं बरस तक यही मलाल करते रहे कि अब त्योहारों में पहले जैसा जोश नहीं है....और बहुत बार ऐसा होता कि बड़े बड़े त्योहारों का आधा बीत जाता तो कोई याद दिलाता कि आज लोहड़ी है, आज बैसाखी है .....
लेकिन आज मुझे अचानक यह लगा कि हमारे त्योहार भी हमारे इलाकों की तरह विशेष हैं....लोहड़ी का जश्न मनाने के लिए वैसी कड़ाके की ठंड़ी, सारा दिन छाई रहने वाली बदली की चादर, त्योहार के दिनों में उन इलाकों की खुशनुमा हवा जो हर त्योहार पर अलग होती है (यह वही जानते हैं जिन्होंने इस को अनुभव किया है, दूसरों के लिए मेरी यह पोस्ट भी एक पीस ऑफ फिक्शन होगी.....खैर, जो भी हो, लोहड़ी का ऐसा माहौल हो और फिर वहीं पर इस मौसम की सभी नियामतें खाने की इच्छा भी होगी....तिल, गुड़ ...गज्जक....और अमृतसर का भुग्गा और वो वाली तली हुई खजूरें .....क्या क्या गिनाएं...
आज मुबई में मैंने अपने रूम में पांच मिनट के लिए पंखा बंद किया तो पसीना आने लगा, मैं बाज़ार गया दस मिनट तो इतनी धूप थी कि लौटते लौटते पसीना पसीना हो गया, तुंरत पंखा चलाया...फिर अपने आप को याद दिलाया कि यार, आज तो लोहड़ी है, सुबह से लोहड़ी के मेसेज आ रहे हैं ....जो आज कल किसी त्योहार को मनाने का शायद सब से ज़्यादा ज़रूरी हिस्सा हो गया है ....लेकिन फिर मुझे यही लगा कि जो भी लोग अपने मूल इलाकों से दूर हो जाते हैं, अगर कह सकूं कि अपनी जड़ों से दूर ....वे लोग बस इन त्योहारों पर रस्म-अदायगी भर कर लेते हैं ....इसलिए जहां हैं वहीं के त्योहारों में खुशियां ढूंढनी शुरू करनी चाहिएं.....बहुत कुछ है ऐसा जो दिखता है ...बाज़ार में आज कुछ चीज़ें ऐसी बिक रही थीं कि किसी से पूछा तो पता चला कि संक्राति की पूजा की तैयारी है ....
और हां, पंजाब या उत्तरी भारत में जो लोहड़ी के मौसम में गुड़-रेवड़ी-गज्जक खाने का एक लुत्फ़ होता है वह दूसरी जगहों पर जहां वैसा मौसम नहीं है, वैसी कड़ाके की ठंडी नहीं है, वह हो ही नहीं पाता ...मूंगफली खाते हैं रोज़ यहां भी लेकिन प्रोटीन की ज़रूरत को पूरा करने के लिए 😂😂😂😂
इसी तरह से बैसाखी के त्योहार की बात है .....वह पंजाब की हवाओं में जो बैसाखी के दिनों में जो खुशनुमा शोखी होती है , खुली फिज़ाओं में जश्न की महक, खुशियां, खेड़े, फसलों की कटाई की खुशियां, भंगडा, गिद्दा ....किसान को हासिल हुआ उस की खून-पसीने की मेहनत का फल ....वह दूसरे इलाकों में कैसे क्रिएट किया जा सकता है...हो सकता है और ऐसा होगा भी ज़रूर कि दूसरे इलाकों के अपने त्योहार होते हैं ...उन के ऩाम अलग होते हैं, लेकिन जश्न तो जश्न है ...जहां भी रह रहे हैं, वहां के जश्न में शामिल होना ही समझदारी है....लकीर की फ़कीरी में कुछ नहीं रखा ....और लकीर को पीटने से भी कुछ हासिल नहीं .....
रस्स अदायगी से हम भी दूर ही भागते हैं और दूसरों को भी इस के लिए नहीं उकसाते ......प्रूफ? क्या यह कम है कि मैं रोज़ मूंगफली-गुड़ खाता हूं लेकिन आज ही भूल गया..... पता नहीं कैसे भूल गया..
| जहां भी रह रहे हैं, वहीं की खुशियों में खुश रहें, वहां के जश्न में शामिल हो जाइए...आज बाज़ार में जाने पर संक्रांति के आने की दस्तक महसूस हुई..... |


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