शनिवार, 3 अप्रैल 2021

आम, खरबूज़ा, तरबूज फीके हैं...अंगूर खट्टे हैं...

किसी डाक्टर से मरीज़ कहां किसी इलाज की पूरी गारंटी मांगता है ... अगर मांगता भी है तो शायद वह अपना मज़ाक ही बनवाता होगा...है कि नहीं। और भी बाज़ार में बिकने वाली कितनी चीज़ें ऐसी हैं जिन की अगर आप गारंटी की बात ही करेंगे तो दुकानदार ऊपर से नीचे तक आप का मुआयना कर डालेगा...इन सब चीज़ों के बारे में वे लोग बहुत ज़्यादा जानते हैं जो बाज़ार जाते रहते हैं...दूसरे ऑनलाइन वालों को ये बात पल्ले नहीं पड़ेगी...

वो जंक फू़ड (पिज़्ज़ा) 375 रुपये में एक पकी-अधपकी मोटी सी रोटी हमें थमा देते हैं ...हम बिना किसी चूं-चपड़े के उसे खा लेते हैं...(मैं तो लिखने के लिए लिख रहा हूं...मेेरे से तो उस का एक टुकड़ा भी नहीं खाया जाता )....

लेकिन दुनिया भर की सारी गारंटी हमें सड़क किनारे फल-फ्रूट बेचने वाले से चाहिए....तरबूज़ हम लोग उन महंगे मॉल्स से उठा कर ले आते हैं....वहां पर कौन उस कलिंघड़ का पेट पाड़ कर हमें दिखाता है कि वह अँदर से कितना लाल है, कितना सफेद है....और न ही हम वहां पर इस तरह की कोई मांग ही रखते हैं क्योंकि हमें लगता है कि ऐसे ही सिरफिरा कह देगा कोई....

लेकिन मुझे दुःख इस बात का होता है जब भी मैं बाज़ार में कहीं भी तरबूज़ लेने के लिए रूकता हूं...पहले तो आजकल ग्राहक ही कम हो गये हैं...फिर उस से ग्राहक की यह मांग की काट कर दिखाओ...लाल होगा तो लेंगे ..नहीं होगा तो दूसरा देखेंगे...मुझे यह बात बड़ी अजीब लगती है ...मैंने कभी उसे काटने के लिए नहीं कहा...यही 30-40 रूपये में उस की जान थोड़ा ले लेंगे हम। जैसा भी है ..फीका है, मीठा है, लाल है ...या सफेद है ....वह कौन सा मंडी से उस के अंदर देख कर लाया है... क्या इतना कम है कि एक क़ुदरती चीज़ हम तक पहुंच रही है ...फीका है तो भी खा लो ...शायद उस वक्त आप को फीके की ही ज़रूरत होगी ...और अगर मीठे के लिए जी मचल रहा है तो साथ में गुड़ खा लीजिए।

सोचने वाली बात यही है कि दिन भर में अगर वे इसी तरह से अंदर से लाल न दिखने वाले तरबूज को वेस्टेज में जमा करते रहेंगे तो उन का चुल्हा रात को कैसे जलेगा....अगर जल भी जाएगा तो वैसा नहीं तो नहीं जल पाएगी जैसा वे लोग चाह रहे होंगे ...कमी तो रह ही जाएगी.....खरबूज़े का भी यही रोना ...भई, किस बात की गारंटी मांग रहे हैं हम ...उसे भी नहीं पता कि अंदर से कैसा होगा वह ...मुझे ये सब बातें मूर्खता से भरी लगती हैं....हमारे पड़ोस की एक आंटी ने तो बचपन में हमें एक फार्मूला बता दिया था ...फीके खऱबूजे को मूीठा करने का ....वह उसे काट कर चीनी (शक्कर) डाल कर फ्रिज में रख देती थी ...

अंगूर खट्टे हैं ...वह तो कहावत ही है ...लोग अपने हक के लिए अपनी बात तक तो मनवा नहीं पाते ...पॉवर के नशे में धुत्त हुए लोग किसी की जायज़ बात भी कहां सुनते हैं, बात सुनना तो दूर, सीधे मुंह बात तक करने की तहज़ीब इन्होंने किसी से कभी सीखने की कोशिश न की  ...(इन प्राणियों से अपने आप को बचा कर रखिए....ये बड़े खूंखार होते हैं) और लोग फिर कहते हैं कि हमें नहीं चाहिए कुछ भी ..अपना हक़ भी नहीं ...हमें तो मन की शांति चाहिए...वही कहावत लोमड़ी वाली कि अंगूर खट्टे हैं .... इसलिए अगर खाने वाले अंगूर भी खट्टे हैं तो क्या फ़र्क पड़ता है...क्यों हम उस छोटी सी दुकान वाले से उलझने लगते हैं...और अरबपतियों के मॉल पर अपने को बड़ा संभ्रांत शो-ऑफ करते हैं....

कोई भी फल जो हमारे हाथ तक पहुंच रहा है ...सोचने वाली बात यह है कि इस के पीछे क़ुदरत की कितनी मेहनत है ...किसने उस का बीज रोपा, किसने पानी दिया...सींचा, उस पौधे की देखभाल की ...कितनी धूप-बारिश उसने झेली और फिर एक दिन पक कर हमारी प्लेट तक पुहुंच गया...क्या यह अपने आप में किसी क़रिश्मे से कम है ....बिल्कुल नहीं ....फिर हम उस से फीकेपन, खट्टेपन की शिकायत करने लगें तो यह मां प्रकृति का सरासर अनादर है ... जो है उसे परवान करने की आदत डालिए....और यह बड़ा सहज भाव में ....ख़ुशी खुशी करिए ... शायद इससे सहनशीलता ही बढ़ने लगे....

कभी भी नज़र दौडाइए...हम लोग उसी को अपना रूआब दिखाते है जो उसे सहने के लिए मज़बूर है ...जो हमें आंखें दिखाता है, उस से हम आंखें चुराने लगते हैं....ये जो छोटे छोटे दुकानदार हैं सड़क के किनारे पर खड़े ..ये हमें वल्नलेबर लगते हैं...हमारी बात उन्हें सहनी ही हैं ..इसलिए लोग उन्हें आंखें दिखाते हैं...हर तरह से उन का शोषण होता है ....एक तरबूज भी तब बिकेगा उन का जब वह अंदर से लाल-सुर्ख होगा....

ज़रा सोचिए...क्या हम इस के बारे में कुछ कर सकते हैं ...अपने स्तर पर ....अगर आप तरबूज को बिना कटवाए ही घर ले आएं तो यह भी एक नेक काम ही होगा...खरबूजा लेने लगो तो उस की कोशिश होती है कि एक खरबूज काट कर हमें दिखाए...मैं तो उसे मना कर देता हूं....आम और सेब बेचने वाले की भी यही कोशिश होती है ....लेकिन हम किस किस चीज़ की गारंटी लेंगे ...क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम इन सब चीज़ों को मां प्रकृति का प्रसाद समझ कर ही स्वीकार करना शुरू करें ...फीके, मीठे, बकबके को मुद्दा बनने ना ही दें ..


पंजाबी का एक सुपरहिट गीत  है ... सब मालिक दे रंग ने सजना ...सब मालिक दे रंग ने ....सुनिए..आप को ज़रूर समझ में आ जाएगा ...आसान सी पंजाबी में बहुत सुंदर बातें कही गई हैं ..कुदरत की स्तुति में। 


6 टिप्‍पणियां:

  1. सच में प्रवीण जी -- हमें उन आँखों की आस को कभी अनदेखा नहीं करना चाहिए जो प्रकृति के वरदान को बिना मेहनत के कुछ पैसों के बदले में हमें देने को आतुर रहती हैं | हमारी थोड़ी सी सावधानी से खरीदे गये फलों से एक गरीब के घर का चुल्हा जलेगा और उसे अपने श्रम की सार्थकता पर गर्व की अनुभूति होगे | यूँ भी कई हाथों से निकले पिज़्ज़ा से कहीं सुरक्षित हैं सुरक्षा कवच के रूप में छलके का आवरण पहने फल | भावपूर्ण लेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएं सादर

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    1. जी. बिल्कुल रेणु जी, आपने बिल्कुल सही फरमाया...
      बहुत बहुत शुक्रिया आप का पोस्ट देखने के लिए।

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  2. उत्तर
    1. शुक्रिया आप का, गुप्ता जी, पोस्ट देखने के लिए ...

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मेरे लिए आलेख के बारे में आप की फीडबैक बहुत अहम् है...कृपया बिंदास कुछ भी लिख कर जाइए...