बिल्कुल दिल की बात लिख रहा हूं कि पुराने दौर की मसालेदानी के दर्शन किए हुए भी ज़माना गुज़र गया है लेकिन अभी भी गुज़रे दौर की रसोई के फर्श पर रखी वह बाबा आदम ज़माने की लूनकी बिल्कुल अपनी सी लगती है....मसालेदानी कोई बेगानी शै लगती है ....खैर, हैं ये दोनों चीज़ें एक ही ...मसालेदानी को ही पंजाबी में हम लोग लूनकी कहते रहे हैं...अब भी होती होंगी जहां होती होंगी, लेेकिन मुझे कहीं नहीं दिखीं..यहां तक की गांव से भी जो खाने-पकाने के व्हीडियो अपलोड किए जाते हैं उन में भी लूनकी के दीदार नहीं हो पाते ....
| गूगल पर मिली आज की मसालेदानी ..... |
शायद लूनकी फैशन से बाहर हो चुकी है ...अभी यहां फोटो लगाने के लिए गूगल इमेज सर्च भी किया...लेकिन वह बाबा आदम के ज़माने की लकड़ी की लूनकी नहीं दिखी...चलिए, कोई बात नहीं, आज मैं इस के बारे में लिख कर इसे भविष्य के लिए संजो के रख रहा हूं ...यही काफी है...क्योंकि यह लूनकी-वूनकी इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी तो गई अब ...बस इस का नाम याद जिन को रहा, वही बचे हैं...इसलिए यह सब लिख कर रखना ज़रूरी है....
कल रात मैं हिंदी की एक मशहूर लेखिका ममता कालिया की एक इंटरव्यू देख रहा था ...वह बहुत अच्छे संस्मरण भी लिखती हैं...एक बात के जवाब में उन्होंने कहा ...जीवन को याद करने के बहुत से मौके आते हैं....उस पुराने समय को बताने वाला और कोई नहीं रहेगा...संस्मरण इसलिए एक बहुत ही मूल्यवान विधा है ...क्योंकि जो आपने जिया जीवन वो कोई और नहीं जी पाएगा....और उस जीवन को जैसा हमने देखा अपनी निगाहों से उस जीवन को कोई और नहीं देख पाएगा...
चलिए, इसी बात पर मैं भी अपने संस्मरण को आगे बढ़ाता हूं....ममता कालिया से भी हल्ला-शेरी मिल गई है कि संस्मरण लिखना कितना ज़रूरी है ... हा हा हा हा हा ....😁
जब मैं छोटा बच्चा था...बडी़ शरारत करता था ..(किसी विज्ञापन की टैग-लाइन थी न ...याद है..) ...मुझे भी याद है जब मैं छोटा था और किसी खोखे से टॉफी या मीठी गोली लेना जाता तो अकसर वहां पर किसी मज़दूर या उस के परिवार के किसी सदस्य को खाने का सामान रोज़ का रोज़ खरीदते देखता...उस खोखे पर सब कुछ बिकता था ...आलू-प्याज़,टमाटर ...इस के साथ वह थोड़े चावल, आटा भी लेते...और साथ में 25-50 पैसे की लाल मिर्ची, हल्दी, एक रुपए का सरसों का तेल (जिस के लिए वह एक छोटी सी कांच की बोतल लेकर आते थे ...)...नमक तो ये अपने घर हमेशा रखते ही होंगे ....रोज़ का रोज़ कमाना खाना क्या होता है, यह देख कर मैंने जाना ....और बाद में बच्चे के लिए मीठी गोली या कोई चूरन भी लेना....
खैर, वह खोखे वाला टूंडा (इसी नाम से वह जाना जाता था ...)...दिव्यांग कहने का कोई कंसेप्ट नहीं था...अगर मैंने लिखते हुए बेइमानी कर दी और पालिटिकली करैक्ट लिखने के चक्कर में सच्चाई जस की तस न लिखी तो फिर मैं लिख ही क्यों रहा हूं...इसलिए यहां भी लिख रहा हूं कि उस दुकानदार की एक बाजू नहीं थी, इस लिए उस की दुकान को टूंडे की दुकान कहते थे ...वह इतना सीधा नहीं था....इस तरह का परचून का सामान लेने वालों को भी वह नहीं बख्शता था ....कम सामान देना, पैसे पूरे लेना....उस का यही काम था...अब इतनी कम मात्रा में सामान लेने वाले के पास पॉवर ही क्या होती होगी ...उस ज़माने में....
खैर, अपने घरों में ...अपनी दादी, नानी, मां और अपने आस-पडो़स में भी देखा करते थे कि बहुत कम मसालों का चलन था....मैंने ऊपर जिस मसालेदानी के बारे में लिखा है...पंजाबी में हम उसे हमेशा लूनकी ही कहते रहे ...हम क्या, सारे पंजाबी उसे लूनकी ही कहते रहे हैं.... (अब उसे मसाला बॉक्स कहते हैं, जिन रसोईयों में वह दिखती है..लेकिन अपने बिल्कुल आधुनिक और महंगे रूप-स्वरूप में....) मैं दादी, नानी, मां के जिस ज़माने की बाबा आदम के ज़माने की लूनकी की बात कर रहा हूं ...वह एक बिल्कुल खस्ता हालत सस्ती सी लकड़ी की (शायद आम की लकड़ी) बनी होती थी ...जिस में छः से लेकर आठ खाने (कंपार्टमैंट) होते थे ....जिन का साईज़ (एक खाने का) स्टील की एक छोटी कटोरी जितना होता होगा...और उस खानों के ऊपर एक स्लाईडिंग ढक्कन होता था ...जो घिस घिस कर अच्छी तरह से खोचला (लूज़) हो चुका होता था, खुद लूनकी की हालत भी खस्ता ही हुआ करती थी...क्या करती बेचारी, बरसों बरसों तक लाल मिर्ची, नमक, हल्दी को हर वक्त झेलना....शरीर उस लूनकी का छलनी न हो तो क्या हो.... !!
वह दौर था जहां भी जाएं....किसी के भी घर ...चूल्हे-चौके में एक लूनकी ज़रूर दिख जाती थी ...लूनकी के उन खानों में नमक, मिर्ची, हल्दी, गर्म मसाला, मोटी इलायची, तेजपत्तर (कहते तो यही हैं, क्या लिखते इसे ऐसे ही हैं, मुझे पक्का पता नहीं..), दालचीनी, लौंग ....बस यही कुछ ....लौंग, दालचीनी भी मैं लिखने के लिए लिख गया ...लेकिन होती उस मसालेदानी में बिल्कुल बेसिक से तीन-चार चीज़ें ही थीं....और जब उन में से कोई चीज़ खत्म हो जाती थी तो उसे बाज़ार से एक कागज़ के लिफाफे में ले आकर उस खाने में भर दिया जाता था ....
और इस पोस्ट का जो मेन हाईलाइट यह है कि जिस फुर्ती से बिना देखे चुटकियों से दादी, नानी, मां का उस लूनकी से अलग अलग खानों से वही दो चार नून-मसाले चुटकियों में भर कर उठाना और पूरी फुर्ती से कड़ाही या पतीले (भगोने) में डालना .....बिना किसी मापतोल के ....न कोई चम्मच या न कोई वज़न करने का कोई और साधन....बस, चुटकी ही से सब काम चुटकी में हो जाता था ...और इतने कम नमक-मसाले से तैयार दाल-सब्जी का ज़ायका ऐसा कि हम में कौन है जिसने उन दिनों कचोरी या खाने के बाद कभी न कभी उंगलीयां न चाटी हो ....अगर ऐसा नहीं है तो इस का मतलब है कि आप झूठ बोल रहे हैं (बिना कारण) ...और वे सभी ज़ायके हम लोगों को आज भी याद हैं....याद हैं सिर्फ़? - हमारे दिलोदिमाग में बसे हुए हैं....।
जितना मैं कुकिंग को समझा हूं या जितना कर के सीखा हूं वह यही है कि जितने कम मसाले किसी व्यंजन में इस्तेमाल किए होते हैं उतना ही उस का ज़ायका बरकरार रहता है ....वरना किसी महंगे रेस्टरां या ढाबे की तरह हर चीज़ में मक्खन, घी और मिर्ची का ही स्वाद आता है ....दाल-सब्जी का अपना ओरिजिनल फ्लेवर तो खत्म ही कर दिया जाता है ....आप का क्या ख्याल है? - यही होगा, और क्या।
मैं अकसर कहता हूं कि बाज़ार वाद के चलते जैसे आज के मानस ने अपने बॉथ-रूम में गंद डाल कर रखा हुआ है ...जब से ये गुसलखाने से वॉश-रुम हो गए.....बीसियों तरह की बोतलें, शैंपू, तेल, स्क्रब....पता नहीं क्या क्या, पहले तो काम दो तरह के साबुन -देसी और अंग्रेज़ी, एक सरसों के तेल की कुप्पी और झावें (स्क्रब) से चल जाता था, उसी काम के लिए अब बीसीयों नहीं शायद तीसीयों किस्म के प्रोडक्ट्स सजे होते हैं घरों के वॉशरुम में ..जितने पहले शायद किसी दुकान में भी न होते थे ....। विचार करने वाली बात यह है कि क्या इतनी तरह के प्राडक्ट्स इस्तेमाल करने से आज लोग ज़्यादा सुंदर हो गए हैं........जवाब आप जानते हैं...।
ठीक उसी तरह ही बीसियों मसाले, गैजेट्स, इंडक्शन इस्तेमाल करने के बाद क्या खाना ज़्यादा लज़ीज़ बनने लगा है, इस का जवाब भी आप जानते हैं....(अगर घर में पक रहा है तो !!) ....
और एक विचार यह भी है कि खाना पकाना, परोसना, और चूल्हे चौके की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ़ घर की महिला की नहीं होती....यह सब की साझा जिम्मेदारी है...और घर में लड़का है या आदमी....हर इंसान को अपना पेट भरना आना चाहिए....यह वक्त की मांग है ...अगर दकियानूसी खाई से बाहर निकलना ही नहीं चाहते तो आने वाले वक्त में समाज की दिक्क्तें बढ़ने लगी हैं......वैसे तो अब इस से ज़्यादा क्या ही बढेंगी..........इसलिए अपने घर में बेटियों के साथ साथ बेटों को भी अपना पेट भरने की स्किल्स सिखाईए..........अब वह पहले वाला ज़माना लद गया है.....
और अगर घर में पुरुष लोग कुछ खाना-पकाना शुरु करें तो वह मसालेदानी काफी मददगार साबित हो सकती है....हां, वह बात अलग है अब वह दो चार पांच दस रुपए की बजाए सैंकडों में डिज़ाईनर अवतार में बिकती है ऑनलाइन ...लेेकिन सब कुछ एक ही जगह मिलने की सहूलियत भी तो है कि नहीं?
| हमारे रसोई घर में इस्तेमाल होने वाली लूनकी ...हर बॉक्स ज़्यादा से ज़्यादा इतना ही खुले, इस लिए पीछे एक रोक (स्टॉपर) लगी हुई हैं |
| सारा फ्रेम और बॉडी लकड़ी की है ..लेकिन सभी बॉक्स सिरेमिक के हैं...एक खाली बॉक्स की फोटो ऊपर. लगाई है... |
हमारी रसोई में पड़ी लूनकी ...नहीं भई इसे लूनकी नहीं कह सकता ...इसे तो मसाला बॉक्स ही कहूंगा...
लूनकी का पता नहीं कहां से खयाल आ रहा था कुछ दिनों से ...जब से थोड़ा थोडा़ कुकिंग सीख रहा हूं ....और आज उस पर एक पोस्ट ही लिखी गई...चलिए, इसी बहाने मां, नानी, दादी की रसोई को भी याद कर लिया....
मुझे नहीं पता कि पंजाबी मे मसालेदानी को लूनकी क्यों कहते हैं....क्योंकि पंजाबी में नमक को लून कहते हैं...इस तरह से लूनकी तो हुई नमकदानी ......लेकिन हम मसालेदानी को लूनकी कहते हैं.....चलो, यार, छोड़ो, मिट्टी पाओ...बात बिल्कुल पक्की है कि लूनकी हम लोग मसालेदानी को ही कहते आए हैं...अब तो आप में से बहुत से लोगों ने भी यह लफ़ज़ अरसे बाद सुना होगा ...
हां, डाइनिंग टेबल पर सजी हुई नमक की डिब्बी को पंजाबी में भी नमकदानी ही कहते हैं .....लेकिन अकसर यही मशविरा दिया जाता है कि नमक कम खाना चाहिए ..हर चीज़ में नमक डाल कर खाना और दाल और सब्जी में ऊपर से नमक डाल कर तेज़ नमक खाना एक नुकसानदायक आदत है.....इसीलिए डाईनिंग टेबल पर नमकदानी न रखने को कहा जाता है ....सामने रहती है तो हर कोई पकड़ कर नमक छिड़कने लगता है......दाल,सब्जी,सलाद, दही,फल,छाछ ...इतना नमक इस्तेमाल होगा तो बीपी की दवाईयां क्या कर लेंगी.....इसीलिए डाक्टर लोग नमक कम खाने की सलाह देते हैं....
| स्टील की मसालेदानी भी दिखी नेट पर ... |
अच्छा एक बात और ...जब मैंने इस पोस्ट में डालने के लिए किसी पुरानी लूनकी की फोटो गूगल से उठानी चाहिए तो वैसी पुरानी लूनकी जैसी कोई फोटो तो न दिखी....लेकिन काफी स्क्रॉल करने पर एक स्टील की मसालेदानी मिल गई ...जो एक गोलाकार स्टील का बड़ा डिब्बा होता था ...जिस में आठ-दस मसाले की छोटी छोटी स्टील की डिब्बीयां रखी होती थीं...और उस स्टील के डिब्बे का ऊपरी ढक्कन कईं बार पारदर्शी यानि कांच का होता था ...मुझे देखते ही याद आ गया कि हां, यह भी तो किसी ज़माने में उस लकड़ी की लूनकी के बाद मां इसे इस्तेमाल किया करती थी ...लेेकिन उस का ऊपर का ढक्कन पूरा स्टील का ही हुआ करता था ...
रोटी-दाल, रसोई, लूनकी के बारे बारे में इतनी यादें दर्ज करते करते करते ऐसा कैसे हो सकता है कि आज से 51 साल पुरानी फिल्म रोटी फिल्म और उस के बेहतरीन गाने न याद आएं....एक तो यही रहा .....यार हमारी बात सुनो....ऐसा इक इंसान चुनो....ज़िंदगी की हक़ीकत के कितना पास, आनंद बक्शी की कलम का जादू इतनी बड़ा फलसफा इतनी सरल सुगम भाषा में पिरो दिया ....किसी दूसरे पर उंगली उठाने से पहले हर किसी को आत्मवलोकन करने पर मजबूत करता हुआ एक सुपर-डुपर गीत ....यह रहा इस का लिंक ...
Leaving this food for thought for this Sunday....
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