Friday, October 5, 2018

खाते-पीते लोग एक साथ और कहां मिलेंगे!

कल और आज यहां लखनऊ के एक पार्क में टहलते हुए कुछ तस्वीरें लीं जिन्हें आप से शेयर करने की इच्छा हो रही है ...

कल लखनऊ के इस पार्क के बाहर लोगों का जमावड़ा देख कर दूर से तो ऐसे लगा जैसे लौकी, आंवले का जूस बिक रहा होगा..लेकिन नहीं, यहां पर सेहत की जांच हो रही थी, इस के बारे में आगे बात करते हैं..
पार्क के अंदर घुसते ही रोज़ाना योगाभ्यास करने वालों का यह ग्रुप अपनी साधना में लगा होता है ...अच्छा लगता है इन सब को देख कर 
सब की पूजा एक सी ...अलग अलग हर रीत
यहां भी प्राणायाम् चल रहा था...
पार्क में लखनऊ में इतने बढ़िया हैं कि कई बार तो लगता है जैसे जंगल में टहल रहे हैं....
पार्क के अंदर ही एक अन्य मनोरम स्थल 
अरे वाह! मोर जी आप भी सुबह का आनंद ले रहे हैं...

कहीं प्राणायाम्, योग ...कहीं सूर्य-नमस्कार ..कुछ भी करिए, बस सुबह घर से निकल पड़िए...बाकी, सब ठीक है ...
इस पार्क के साथ लगते पार्क में जाने की मनाही है ..किसी पार्टी के चुनाव चिंह हैं, कहते हैं इस लिए मनाही है....सोच रहा हूं कि इतना खर्च कर के इतना भव्य पार्क बना है, इस का आखिर होगा क्या....दूर से ही देखा है...अँदर जाने की मनाही है ...शायद सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तरह के चुनाव चिंहों के बार में कुछ कहा तो था, कुछ साल पहले, अच्छे से याद नहीं...पार्टी का नाम जानबूझ कर नहीं ले रहा, क्योंकि मैं पालिटिक्स और धर्म के बारे में कुछ नहीं कहता 
मुझे तो सुबह सुबह ऐसे पेड़ दिख जाएं तो समझिए मेरा दिन  बन गया ...मेरे रूह की ख़ुराक 
पार्को में इस तरह के पत्तों और घास-फूस को जो आग लगा  दी जाती है, यह बड़ी गलत बात है ...कल भी एक जगह पर एक ढेर में आग लगी हुई थी और उसी के इर्द-गिर्द लोग टहल रहे थे ..
मुझे यह कौना भी बहुत अच्छा लगता है ...इस के बाहर बट निकुंज लिखा हुआ है ..यहां सारे बट-वृक्ष ही हैं...
साथ के प्रतिबंधित पार्क की एक फोटो दीवार के एक झरोखे से खींच ली ...
इस पार्क में सब के लिए कुछ न कुछ है ...बच्चे भी मस्ती करते अकसर दिख जाते हैं...
मुझे नही पता यह क्या है, ये छोटे स्तंभ या पिंड क्या हैं, ये पीपल के पेड़ के नीचे हैं...अब किस से पूछूं कि इन को तैयार करने के पीछे की क्या स्टोरी है...चलिए, मुझे क्या लेना है, ज़रूरी तो नहीं कि हर बात का जवाब मिल ही जाए...वैसे ही सोशल-मीडिया पर जो जानकारी का ढेर मिलता रहता है, पहले ही से उस से मैं इतना परेशान हूं! 
हम लोग सेहत के श्रेत्र में खूब तरक्की कर रहे हैं, फिर भी कुछ ऐसे अस्पतालों के बारे में जानता हूं जहां पर महीनों तक  उच्च रक्तचाप के मरीज़ों का बी पी नापा ही नहीं जाता....क्योंकि वहां इतनी मशीनें ही नहीं हैं, या खराब पड़ी हैं या उन में सेल नहीं है ...और वज़न चेक करने वाली मशीनों को छिपा कर रखा जाता है....चपरासी मरीज़ों को टरका देते हैं कि मशीन है ही नहीं, उन्हें लगता है भारी-भरकम लोग इन पर चढ़ेंगे तो ये मशीनें खराब हो जाएंगी....ऐसे माहौल में अगर इस तरह से कुछ लोग ऐसा प्रयास कर रह हैं कि लोगों को सेहत के बारे में जागरूक किया जाए तो बहुत अच्छी बात है ...
इस विज्ञापन वाले को फोन किया कि बताइए क्या डिटेल्स हैं, उसने बताया कि हम आप के आर ओ में कुछ यंत्र फिट कर देंगे जिस से पानी एल्केलाइन हो जायेगा ...और उस में मिनरल भी एड कर देंगे....कहा तो है उसे डिटेल्स भिजवा दे..देखते हैं समझते हैं, माजरा क्या है!
अब इस तरह के शूगर-बीपी टैस्टिंग करने वाले लोग हर बड़े पार्क के बाहर दिख जाते हैं...मुझे याद आ रही है  २००९  के दिनों की ...मैं मद्रास गया था...वहां पर मैरीना बीच पर एक व्यक्ति २० रूपये लेकर लोगों की शूगर जांच और बीपी चैक कर रहा था ...यह युवक भी ३० रूपये ले रहा था और बड़े साफ़-सुथरे तरीके से लोगों की शूगर जांच कर रहा था ...साथ में बीपी भी और वजन भी ...अगर किसी ने शूगर जांच नहीं करवानी तो भी फ्री में बीपी और वजन नपवा सकता है ....दरअसल यह युवक किसी लैब से हो, इस का अपना कलेक्शन सेंटर है....जिस की भी शूगर ज़्यादा निकल रही थी, उस का फोन नंबर और शूगर की रिपोर्ट साथ में रजिस्टर में लिख रहा था ..अच्छी बात है, मार्केटिंग का एक बढ़िया तरीका तो है ही ....अब इतने सारे खाते-पीते, सेहत के बारे में थोड़ा डरे-सहमे लोग, शारीरिक श्रम के प्रति सचेत लोग....इतनी भारी संख्या में सुबह सुबह और कहां मिलेंगे....टारगेट आबादी को एड्रैस करने का कितना बेहतरीन नमूना है यह। किसी से कोई जबरदस्ती नहीं, जिसे इस की सेवाओं का लाभ उठाना है, उठाए ....नहीं तो ...कोई बात नहीं !

पार्क भी आज कल मल्टी-एक्टीविटी सेंटर हो चले हैं...यहां पर कुछ पार्क ऐसे हैं शायद हर बड़े शहरों की तरह ....जिन की एक्टीविटी  सुबह आठ बजे के बाद रोज़ाना बदल जाती है ...क्योंकि उस समय यहां पर स्कूल-कालेज के प्रेम-पुजारियों का आवागमन शुरू हो जाता है ....और यह सिलसिला अंधेरा होने तक चलता रहता है....और दूसरी गतिविधियों की बात करें तो बाहर आते ही कभी कभी कोई रिएल-एस्टेट एजैंट अपने हैंड-बिल्स के साथ मिल जाता है ....मेरा एक ही जवाब ...यार, मैं आप का समय बरबाद नहीं करना चाहता, मैं लखनऊ में कुछ भी लेने के लिए इंटरेस्टेड नहीं हूं.....(इतनी बड़ी स्टेटमेंट तो मैं दे देता हूं...बाकी सब अन्न-जल की माया है!)

बातें बहुत हो गई हैं, दो तीन दिन से पता नहीं यह गीत बार बार मुझे याद आ रहा है.......आप भी सुनिए.....


8 comments:

  1. आदरनीय प्रवीन जी-- आज ओंलोने होते ही आपके पोस्ट पर नजर पड़ी | बहुत सुंदर चित्र हैं | सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं | लखनऊ के इस उपवन को आपके कैमरे की नजर से देख बहुत अच्छा लगा | लोगों का ये जमावड़ा उनकी जीवटता को उजागर करता है |सार्थक, सचित्र लेख के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनायें | गाना भी बहुत प्यारा है | मुझे भी पसंद है | आभार |

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  2. धन्यवाद, रेणु जी, आप ने पोस्ट देखी और ऐसी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दी।

    रेणु जी, लखनऊ में ऐसे उपवनों की भरमार है ...यह जिस पार्क के बारे में मैंने लिखा है, इस से सटा हुआ एक भव्य पार्क है जिस की परिक्रमा करने के लिए पूरा आधा घंटा लगता है..

    लेकिन पिछले समय से यह दिक्कत होने लगी है कि इस तरह के सार्वजनिक क्षेत्र किराये पर दिए जाने लगे हैं...किराए पर देना ठीक है, राजस्व भी तो अर्जित होना चाहिए...लेकिन दिक्कत यह है कि जितने दिन भी किराये पर रहते हैं ये स्थल, उतने दिन मार्निंग वॉक और ईवनिंग वॉक करने वालों का प्रवेश वर्जित होता है ....
    कुछ दिन पहले मर्सिडिज़ कार वालों का कोई समारोह था, तब ऐसा ही हुआ...अब ३ दिन से किसी अन्य प्रदर्शनी के कारण फिर से टहलने वालों का प्रवेश वर्जित है ...

    वो अलग बात है कि एक दिन जब मैंने कुछ लोगों को ऐसा ही नोटिस पढ़ते देखा और दो तीन लोग इसे पढ़ कर ऐसा चहके जैसा छोटे बच्चे स्कूल की छुट्टी घोषित होने पर उछलने लगते हैं...शायद उन्हें भी लगा होगा कि चलिए, इसी बहाने टहलने के झंझट से कुछ दिन पिंड तो छूटेगा..

    एक बार फिर से शुक्रिया ....

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    1. प्रवीन जी मैं गूगल प्लस पर आपको फोलो करती हूँ और आपकी हर पोस्ट को पढ़ती हूँ जो मेरे गूगल प्लस पर स्वतः ही आ जाती है | आपके सारगर्भित उत्तर से बहुत ख़ुशी हुई | आपका हल्का फुल्का लेखन भावनाओं की संजीवनी है | रही बात ऐसी जगहों को किराये पर देने की तो लोग किराये पर लेते हिन् ये दोनों पक्षों की जरूरत और मजबूरी होगी पर प्रयोग के साथ जो जगह का सत्यानाश करते हैं वो बहुत दुखद और निंदनीय है |बहुत भाग्यशाली हैं वो लोग जो प्राकृतिक सौन्दर्य से भरे ऐसे प्रांगण के पडोस में रहते है जहाँ से उन्हें शुद्ध पर्याप्त प्राणवायु उपलब्ध हो जाती है | साभार --

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  3. बहुत ही गजब वर्णन किया है सर और उसपर फोटो का तडका | सुबह की खुराक भरपूर मिल गई होगी इस पोस्ट से

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 06/10/2018 की बुलेटिन, फेसबुकिया माँ की ममता - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. आपका पोस्ट पढ़कर फिर से पार्क में जाने की इच्छा लालायित हो गई है। पहले जाता था लेकिन अब जिम से ही गुजारा करना पड़ता है। कल जाने की कोशिश करूँगा। गुरुग्राम में तो पार्क के बाहर नारियल पानी वाले,जूस वाले इत्यादि बैठे रहते हैं। जो पार्क में चलते चलते थक जाता है वो गला तर कर लेता है।
    अगली पोस्ट का इंजतार रहेगा।

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  6. बहुत सुंदर पोस्ट।
    पार्क जाने पर विचार करना पड़ेगा।

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