Friday, April 21, 2017

सुनो रे भाई...ध्यान से सुनो!

आज मेरे पास एक ५६ वर्ष का एक मरीज़ आया था दांत की किसी तकलीफ़ के लिए... साथ में उस की बीवी थी जिसने मुझे शुरू में ही बता दिया कि इनको बिल्कुल भी सुनता नहीं है ..

बात करने पर पता चला कि पहले तो ठीक ठाक सुनता था लेकिन एक साल से जब से टीबी की डाट्स की दवाईयां चल रही हैं, इन को सुनना धीरे धीरे कम होने लगा ..और फिर पूरी तरह से ही सुनना बंद हो गया..

टीबी के इलाज के  लिए दी जाने वाली कुछ दवाईयों का यह साइड-इफैक्ट होता है कि श्रवण-शक्ति खत्म हो जाती है ... मैंने शायद ऐसा कोई मरीज़ पहली बार देखा था आज...वही बात है कि जिस के साथ कोई घटना घट जाती है उस की तो ज़िंदगी ही बदल जाती है ..

बीवी उस की बड़ी हिम्मत वाली लग रही थी, मैंने पूछा कि क्या कहते हैं विशेषज्ञ ..बताने लगीं कि कोई कुछ कहता है, कोई कुछ ..कोई कहता है कि सुनने लगेंगे ..कोई कहता है नहीं..

मैंने उसी समय नेट पर चैक किया तो पाया कि इन दवाईयों से जो श्रवण-शक्ति का ह्रास होता है वह स्थायी होता है ...मुझे दुःख हुआ...लेकिन मैंने उस महिला को यह नहीं बताया ...कोई आस लगाये बैठा है तो उसे कैसे यह सब बता दिया जाए।
नेट पर तो लिखा था कि जब इस तरह की दवाईयां चल रही हों और सुनने में थोड़ी सी भी दिक्कत होने लगे तो अपने चिकित्सक से तुरंत संपर्क करें, और बहुत बार उन की कुछ दवाईयां बदल दी जाती हैं...

छोटे बच्चों में ऐसा कईं बार देखा जाता है कि जब बचपन में उन्हें बहुत सी दवाईयां दी जाती हैं ..उन में से कुछ ऐसी होती हैं जिन की वजह से उन में बहरेपन की शिकायत हो जाती है...इसलिए शिक्षित लोग इस के बारे में थोड़ा सचेत रहने लगे हैं...

हमारे पड़ोस की एक बुज़ुर्ग महिला को एक दिन सुबह अचानक सुनना बंद हो गया ...पता तब चला जब वह सुबह उठी और उन्होंने अपने बेटे से कोई बात की ...उसने जवाब दिया तो वह कहने लगीं कि क्या बात है इतना धीमा क्यों बोल रहा है...बेटे ने कहा कि ऐसा तो नहीं है, मैं तो ठीक ही बोल रहा हूं....अगले दो मिनट में यह पता चल गया कि उस अम्मा को सुनाई नहीं दे रहा बिल्कुल ..एक कान से तो पहले ही सुनाई नहीं देता था ..छेद की वजह से ...लेकिन दूसरे कान से अचानक इस तरह से सुनना बंद हो जाना चिंता का कारण तो था ही ..

हमारा पड़ोसी अपनी अम्मा को ईएनटी विशेषज्ञ के पास ले गया ..वहां पर आडियोमिट्री जांच हुई ...पता चला कि श्रवण-शक्ति न के बराबर ही है ...

हां, बीच में एक बात बतानी तो भूल ही गया कि जब उस महिला को सुनाई देना बंद हुआ तो वह इतना घबरा गई कि उसे लगने लगा कि उस के गले में ही उस की आवाज़ दब रही है और बाहर आ ही नहीं रही है....लेेकिन ऐसा नहीं था, घर के दूसरे लोग उन की बातें सुन रहे थे ...लेकिन अब यह बात उन तक कैसे पहुंचाई जाए....उन के बेटे ने झट से एक कागज़ पर लिखा कि आप चिंता मत करिए, सब ठीक हो जाएगा....आप की आवाज़ हमें अच्छे से आ रही है, और हम अपनी बात आपसे लिख कर कर लेंगे .. तब कहीं जा कर उस अम्मा की जान में जान आई...

उस दिन शाम को अम्मा का बेटा जब मेरे साथ बात कर रहा था तो यही बात कह रहा था कि आदमी के लिए पढ़ा लिखा होना भी कितना ज़रूरी है ..यही शेयर करने लगा कि शुक्र है कि अम्मा पढ़ना-लिखना जानती है ...वरना उस तक इतनी बात भी हम लोग कैसे पहुंचा पाते कि उस की आवाज़ गले में दबी हुई नहीं है, हम अच्छे से सब कुछ सुन रहे हैं ...

मुझे भी याद आया उस समय हम लोग अपने ननिहाल में गये हुए थे ...ऐसे ही किसी बुजुर्ग औरत के साथ हुआ होगा ... अब वह पढ़ना लिखना जानती नहीं थी, उस तक घर वाले लोग कैसे अपनी बात पहुंचा पाते .......बात बहुत लंबी है....उस में ज़्यादा नहीं घुसेंगे .....बस, इतना ही बताना चाहूंगा कि धीरे धीरे उस महिला को गली-मोहल्ले वाले पागल ही समझने लग पड़े ....

हां, तो हमारी इस पड़ोसिन की दवाईयां चलीं....विशेषज्ञ ने पूछा कि मधुमेह रोग तो नहीं है.......इन की जांच दो साल पहले ही हुई थी तब तो नहीं थी, लेकिन इस बार जब जांच करवाई गई तो उसमें मधुमेह रोग होेेने की पुष्टि हुई ..उस की भी दवाई शुरू हो गई... और कान के लिए भी कुछ दवाईयां एक महीने तक चलीं....उम्मीद तो कोई नहीं थी कि श्रवण-शक्ति लौट आएगी, विशेषज्ञों को भी नहीं थी कोई खास उम्मीद ..लेकिन ईश्वरीय अनुकंपा.....उन की श्रवण-शक्ति उन के गुज़ारे लायक वापिस लौट आई है ...अब यह एक रहस्य ही रहेगा कि यह कैसे हुआ अचानक, मधुमेह की वजह से हुआ या उम्र की वजह से हुआ जैसा की विशेषज्ञ लोगों ने उन्हें बताया था.....लेकिन चलिए ... जो भी है ... बहुत अच्छा हुआ...दो चार दिन जब यह प्राबलम उन्हें हुई तो उन के घर से ज़ोर ज़ोर से भजनों की आवाज़ आती थी ...बहुत ही तेज़...क्योंकि वे स्वयं तो सुन नहीं पा रही थीं..

मेरे एक साथी डाक्टर हैं जिन की २५ साल की बेटी हर समय कान में एयरफोन लगाए रखती थी और सारा दिन मोबाईल फोन पर बातें....हो गया उस के भी एक कान का कबाड़ा ...थोड़ा बहुत ठीक तो हो गया है ..लेकिन एक कान में जो गड़बड़ी हुई है वह स्थायी है ...अब वे एयरफोन का इस्तेमाल ही नहीं करती ........अच्छा करती हैं!

यह एक तरह की सिरदर्दी हो गई है समाज में कि लोग हर समय कान में एयरफोन घुसाए रखते हैंं.... कान तो खराब हो ही रहे हैं...और कितनी बार आप भी पेपर में देखते होंगे कि कितने बड़े बड़े हादसे ...यहां तक कि कईं युवक इसी शौक की वजह से ट्रेन से कट गये क्योंकि ट्रेन की आवाज सुनाई ही नहीं दी ...

कल मैं सड़क के किनारे यह लखनऊ में एक जगह खड़ा था...मैंने देखा कि एक मशहूर बिरयानी की दुकान में पांच सात लोग काम कर रहे थे और सभी ने कानों में एयरफोन ठूंस रखे थे ...गड़बड़ तो है ही ... यह सब कानों की तकलीफ़ों को निमंत्रण देने वाली बातें हैं....और अकसर ये सब बड़ी तेज़ आवाज़ में म्यूजिक सुनते हैं...

रेडियो-टीवी तो मैं भी बहुत तेज़ सुनता था...और वॉक-मैन के ज़माने में टहलते वक्त ऊंची आवाज़ में बॉलीवुड गीतों को सुनना मेरी आदत थी ...फिर मुझे भी ऐसा लगने लगा कि मुझे ऊंचा सुनने लगा है...कोई पांच सात साल पहले की बात है .. उन्हीं दिनों मैंने एक लेख पढ़ा नेट पर और फिर मैंने उस पर लिखा भी ...उसमें यही बताया गया था कि किस तरह से ये एम-पी थ्री प्लेयर्ज़ हमें कानों की तकलीफ़ें दे रहे हैं.. पता नहीं उस दिन के बाद कभी इच्छा ही नहीं हुई एयरफोन्स का इस्तेमाल करने की .. अब कभी कभी लेपटाप पर पांच दस मिनट के लिए किसी पसंदीदा गीत को सुनने के लिए हैड-फोन लगा लेता हूं ...लेकिन वह भी बहुत कम ...

इतनी सारी बातें करने का मकसद?.....हम कुदरत की सभी नेमतों को बिल्कुल टेकन-फॉर-ग्रांटेड ले लेते हैं ...सब कुछ ठीक चल रहा है तो बहुत बढ़िया बात है ..जब कभी कुछ गड़बड़ हो जाती है तो नानी और नानी का पड़ोस याद आ जाता है ..इसलिए जो चेतावनी इन एयरफोन्स के बारे में और मोबाईल फोन पर लंबे लंबे समय तक बातें न करने की हिदायत दी जाती है ....उस के बारे में भी ध्यान दिया जाना चाहिए....क्या है ना, हम कह ही सकते हैं.....

मैं अभी बैठा यह सोच रहा था कि हमें ईश्वर ने आंखें, नाक, मुंह जैसे अनमोल अंग दिए हैं ... अच्छा बोलने, सुनने और देखने के लिेए.....लेकिन हम इतने ठंडे कैसे पड़ गये कि हमारे सामने कोई किसी की जान ले ले..हम देख रहे हैं ...लेकिन कोई भी हिल-जुल ही न हो ....आज दोपहर जब से मैंने टीवी पर जींद के एक मर्डर की तस्वीरें देखी हैं ना, मुझे बहुत बुरा लगा है ....


इतने सारे लोगों के सामने मर्डर हो गया सरेआम....किसी ने बीच बचाव करने की कोशिश भी नहीं की .......और सब से दुःखद बात यह कि इस मर्डर के दौरान सामने ही गोल-गप्पे बेचने वाला दुकानदार अपने गोल-गप्पे में पानी भरता रहा ....Shocking!

आने वाले समय की सूचक होती हैं इस तरह की घटनाएं.....थोड़ी कल्पना कीजिए कि अगर एक आदमी के साथ इस तरह की दरिंदगी हो सकती है और लोग देेखते रह गये .....ऐसे में महिलाएं के साथ इन रास्तों के बीच क्या नहीं हो सकता! .....
Bloody we all are hypocrites....

पाश ठीक ही कहता है ......

सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
ना होना तड़प का
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौट कर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना......

    "सबसे खतरनाक वो आँखें होती है
जो सब कुछ देखती हुई भी जमी बर्फ होती है.."



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