Monday, October 6, 2014

कुर्बानी पर कुर्बान




बकरीद के बारे में मेरे मन में बहुत प्रश्न उमड़ आते हैं ..इन्हीं दिनों में पिछले कुछ वर्षों से....फिर जिस तरह का मैं इंसान हूं ... जब दूसरे प्रश्न तैयार हो जाते हैं तो पिछलों को तो हटना ही पड़ता है।.....इस बार भी ऐसा ही हुआ कि कुछ दिनों से मैं फिर ऐसे ही प्रश्नों से घिर गया।

यह लिख रहा हूं ...इसलिए नहीं कि मैं किसी एक धर्म से संबंधित हूं...मैं किसी भी धर्म के साथ अपने आप को आइडैंटीफाई करना ही नहीं चाहता, मुझे अपना धर्म कहीं पर लिखते हुए भी बड़ा अजीब लगता है ......बस मेरा दृढ़ विश्वास यही है कि हम सब इंसान बना कर भेजे गये हैं, बस इंसानों जैसा किरदार हो जाए......इतना ही काफ़ी है। मेरा यही धर्म है, यही इबादत है।

हां,  यार, यह जो प्रश्नों की बात हो रही है इन के बारे में कोई पूछे तो पूछे कैसे। बड़ी जिज्ञासा होती है। लखनऊ की एक मस्जिद के बाहर मैंने एक इश्तहार टंगा देखा कि कुर्बानी का हिस्सा १२०० रूपये में।  मैंने सोचा इस का क्या मतलब है, किस से पूछूं। दो चार दिन पहले जब मेरे पास एक बुज़ुर्ग महिला मरीज़ आईं तो मैंने उन से पूछ ही लिया...इस हिस्से के बारे में। उस नेक रूह ने अच्छे से हिस्सों के बारे में बता दिया और कहा कि बड़े सस्ते में हो रहा है। इस के आगे कोई बात नहीं हुई।

हां, अभी अभी लेटा हुआ था...सिर थोड़ा भारी हो रहा था ..तो मैंने आज की हिन्दुस्तान उठा ली.....उस के संपादकीय पन्ने पर एक लेख पर मेरी नज़र गई.......इस समाचार पत्र के संपादकीय पन्ने पर एक स्तंभ आता है...मनसा वाचा कर्मणा........इस में आज सूर्यकांत द्विवेदी जी का लेख ....कुर्बानी पर कुर्बान....दिख गया। इसे पढ़ कर मेरे बहुत से प्रश्न --सारे नहीं........घुल गये।

मैं चाहता था कि इसे आप भी पढ़े अगर कुछ प्रश्न आप के मन में भी उमड़ रहे हैं......... इसलिए उस सारे लेख को हु-ब-हू नकल कर के इस पोस्ट में लिखने के लिए उठा ही था......कि गूगल बाबा का ध्यान आ गया.......बस कुर्बानी पर कुर्बान लिखने भर की देर थी कि सर्च रिजल्ट के पहले नंबर पर यही लेख दिख गया..... अच्छा लगा.......मेरी गुज़ारिश है कि आप भी इसे पढ़िए........मैं भी इसे फिर से दो-तीन बार तो पढूंगा ही ..........यह रहा इस का लिंक ...
कुर्बानी पर कुर्बान ....(हिन्दुस्तान... ०६अक्टूबर २०१४) 

मैं पिछले लगभग ३५ वर्षों से कुर्बानी के इस गीत को सुन रहा हूं ...कभी बोलों पर ध्यान नहीं दिया, अब इस के बोलों पर भी ध्यान देने की, किसी विद्वान के पास बैठ कर इन बातों को समझने की चाहत सी होने लगी है.......



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