Saturday, January 26, 2008

बचपन के दिन भुला न देना.......!!




दोस्तो, अगर आप को कहीं पीछे छूट चुके बचपन की एक हल्की सी झलक देखने की तड़फ है, तो ही इस बलोग को देखिए.....वरना, आप जो काम कर रहे हैं, प्लीज़ कैरी ऑन।

हुया यों कि दोस्तो, आज अभी कुछ समय पहले जब गणतंत्र दिवस की गतिविधियों से फारिग हो कर रिफ्रैशमैंट ले रहे थे तो मेरा बेटा वहां हाथ में एक गुलेल ले कर अंदर आया जो उस ने बाहर खड़े किसे खिलौने वाले से अभी अभी खरीदी थी। आप को भी याद आ गया न----कुछ कुछ अपना इस गुलेल से रिश्ता। दोस्तो, वह गुलेल क्या अंदर लाया, यार, मैं तो सीधे 30साल पुराने ज़माने में पहुंच गया। वो भी क्या दिन थे......इतनी अच्छी रैडीमेड गुलेलें भी तब कहां मिलती थीं। मेरे साथ बैठे एक साथी भी गुज़रे ज़माने में पहुंच गए.....वो भी याद करने लगे कि हम तो भई किसी साइकिल के टायर की फटी हुई टयूब से ही इसे बना लिया करते थे...और फिर उसी ट्यूब के टुकड़े से ही उस को उस विशेष किस्म की लकड़ी से कस से बांधना भी होता था........और हां, मैंने कहा कि वह Y – शेप की लकड़ी ढूंढना भी कौन सा आसान काम था। साथ में बैठे एक अन्य सज्जन ने भी यह कह कर अपनी सारी यादें ताज़ा कर लीं कि बस इस के साथ साथ कुछ छोटे-छोटे पत्थरों से लैस होकर फिर होती थी अपनी आधे कच्चे-आधे पक्के आम पेड़ों से गिरा कर नमक के साथ खाने वाले अभियान की तैयारी। मुझे तो याद आया कि मैं तो भई इस के साथ इमली के बीजों को ही इस्तेमाल करता था। लेकिन इस गुलेल को हाथ में उठाने का मतलब होता था कि बस घर के हर बंदे से झिड़कियां खाने का सिलसिला शुरू हो जाना।

बात यह भी सोलह आने सच है कि तब इस शेप की लकड़ीयां इतनी तादाद में कहां मिलती थीं...इसलिए अमृतसर में एक जंगली पौधा होता है जिसे हम पंजाबी में अक कहते हैं ( I am very sorry, friends, I don’t know what they say this in Hindi….I am awfully sorry for this !!)…..वह पौधा तो क्या उस की छोटी छोटी झाडियां टाइप ही हुया करतीं थीं जिन के ऊपर कुछ इस तरह के फल भी आते थे जिन से सफेद दूध टाइप का कुछ द्रव्य निकलता था, उस के पत्तों को लोग किसी फोड़े( abcess) को पकाने के लिए भी इस्तेमाल किया करते थे.......मुझे याद है मेरे से दस साल बड़ी बहन की छाती पर भी एक बार कुछ ऐसा ही हुया होगा ...वह दो-तीन दिन रोती रही थी, फिर मेरी मां ने इस पौधे का पत्ता ही गर्म कर के उस पर लगाया था, उस के आगे का कुछ याद नहीं....मैं तब 4-5 साल का रहा हूंगा।

और हां, दोस्तो, मैं भी किधर का किधर निकल गया। अच्छी भली गुलेल की बात हो रही थी। और तो और दोस्तो, जब कभी निशाना साधते हुए उस गुलेल की लकड़ी टूट जाती थी , तो मन बड़ा बेहद दुःखी होता था। कईं शरारती किस्म के लड़के तो छोटे-छोटे बच्चों को उलटी गुलेल सिखाने की हिदायत ही दे डालते थे।

दोस्तो, यह गुलेल तो एक बहाना ही साबित हुई हमें अपने कहीं दूर खो चुके बचपन की एक झलक देखने क्या। क्या यार वो भी क्या दिन थे.....कहां हो बचपन तुम......तुम यार बहुत जल्दी बीत जाते हो......एक तो समस्या यह है कि हमें अब समझ भी जल्दी ही आने लगी है। और मां-बाप को भी जल्दी पड़ी होती है कि जल्दी से जल्दी बच्चे को किसी बड़े से स्कूल में डाल कर अपना एक और स्टेटस सिंबल ऐड कर लें। पहले ऐसी जल्दी भी नहीं हुया करती थी.....बंदा घर में ही अपनी मां, चाची , ताई, दादी ,नानी, .....और ढेर सारा प्यार देने वाली पड़ोस की अपनी मां-जैसी ही लाडली दिखने वाली आंटियों से भी बहुत कुछ सीखता रहता था। अब किस के पास टाइम है......

और हां, बेटे ने गुलेल तो ले ली है, लेकिन अब चलानी कहां है, क्योंकि अपने सारे पेड़ पौधे काट काट कर तो हम अपने बेवकूफ होने के सारे सबूत बरसों से जुटा ही रहे हैं. अब गुलेल अगर महानगरों में इस्तेमाल होगी तो इमली की बजाए झगडे ही तो हाथ लगेंगे। और हां, इमली की बात से याद आ गया कि दो दिन पहले नीरज जी द्वारा अपनी प्यारी पोती मिष्टी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में लिखी पोस्ट बेहतरीन थी....शायद ही किसी दादू ने अपनी पोती को इतना बेहतरीन तोहफा पहले दिया हो...पोस्ट का नाम था.....हसरतों की इमलियां.........अगर अभी तक नहीं पढ़ी है तो जरूर पढ़ना, दोस्तो।

दोस्तो, मैं कुछ ज्यादा ही अपनी बात खींच तो नहीं गया ....कोई बात नहीं दोस्तो बचपन में घूमते हुए कहां हम लोग अपने आप को शब्दों अथवा टाईम के बंधन में बाँध पाते हैं। लेकिन मैंने आप को अगर इस पोस्ट की तरफ बुला कर डिस्टर्ब किया है तो दोस्तो मैं हाथ जोड़ कर आप से माफी मांगता हूं। वैसे दोस्तो मैंने तो इस ब्लाग—मेरी स्लेट—के उदघाटन समारोह में ही यह घोषणा कर दी थी कि इस ब्लोग पर... अपनी स्लेट... पर मैं जम कर मस्ती करूंगा....क्योंकि मुझे कैसे भी किसी भी कीमत पर अपना बचपन दोबारा जीना है......आप क्या सोच रहे हैं, आप भी कुछ सुनाइए.........देखना, आपस में बात करेंगे तो कितना मज़ा आएगा।

बचपन के दिन भूला न देना,.....एक गाना है न ऐसा ही कुछ, अच्छा लगता है।

3 comments:

  1. लीजिये यहां तो गुलेल की बातें हो रही है। अब हमने तो गुलेल कभी चलाई ही नही है। :)

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  2. वहा डाक्टर सहाब...आप की गुलेल से मुझे बचपन
    मे पिता जी से पडी डाट याद आ गई!क्योकि मेरी गुलेल से बडे भाई का सिर फ़ट गया था

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  3. बचपन को याद करने के सबसे सशक्त प्रतीक की याद दिलाने के लिए शुक्रिया। गुलेलें हमने भी खूब बनाई हैं। अंग्रेजी के वाई आकार की टहनियां ढूंढनें में बीतती थी दोपहरियां।

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