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शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

कुछ दवाईयां भी मसूड़ों को फुला देती हैं...

ऐसी कुछ दवाईयां हैं जो मसूड़ों पर बुरा प्रभाव डालती हैं......मुझे आज इस मरीज़ को देख कर इस बात का ध्यान आ गया कि ब्लड-प्रेशर की कुछ दवाईयां भी ऐसा ही प्रभाव डालती हैं।

दो वर्ष पहले की महिला के मसूड़ों की तस्वीर ... 
यह तस्वीर आप जो यहां देख रहे हैं यह ६०-६५ वर्ष की एक महिला की है जो कि मेरे पास ठीक दो वर्ष पहले आई थीं... मैंने तब अपने इंगलिश ब्लॉग पर इस विषय पर एक लेख भी लिखा था..... Blood pressure pill can lead to big gums. 

आप इस लिंक पर जा कर इस पोस्ट को देख सकते हैं। यह महिला इतनी परेशान थी तब ...मसूड़ों पर हाथ लगते ही खून आने लगता था....बहुत ही ज़्यादा परेशानी थी इन्हें।

जब इन की हिस्ट्री ली तो पता चला कि ये निफैडेपीन नामक दवाई लेती हैं, तब मैंने इन्हें फिज़िशियन के पास भेजा... उन्हंोंने दवाई चेंज कर दी......और फिर इन्होंने मसूड़ों का थोड़ा इलाज करवाया.....फिर उस के बाद मेरा तबादला हो गया और उन्हें देख नहीं पाया।

लेकिन आज एक अन्य महिला जिसे मैंने कुछ महीने पहले इसी तकलीफ़ से ग्रस्त पाया था...वह भी   चेकअप के लिए आईं तो अच्छा लगा ... इन के मसूड़े भी काफ़ी फूले हुए थे, काटने-छांटने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई थी और न ही यह उस समय कुछ ज़्यादा करवाने के लिए राज़ी ही हुईं थीं। उच्च रक्तचाप की दवाई बदल दी गई थी। मसूड़े दस-पंद्रह दिनों में ही ठीक होने लगे थे....सूजन घटने लगी थी, रक्त बहना बंद होने लगा था...।

अब इन्हें कोई तकलीफ़ नहीं है, मसूड़ों से रक्त नहीं आता, ब्लड-प्रेशर के लिए जो नईं दवाई लेती हैं..उस से वह भी नियंत्रण में रहता है, किसी बात पर पति को मेरे सामने झिड़क भी दिया कि तुम अपनी सेहत की बहुत टेंशन करते हो.....

इस महिला के मसूड़े भी कुछ महीने पहले ऊपर जैसी महिला जैसे ही थे.
आप इस तस्वीर में भी देख सकते हैं कि मसूड़े लगभग ठीक ही लग रहे हैं.....पूरे के पूरे ठीक तो नहीं है एक डैंटिस्ट की नज़र से.....लेकिन उस में कुछ इन की पुरानी ब्रुश करने की गलत आदतों का भी परिणाम शामिल है... वैसे मैं तो यहां दवाईयों का मसूड़ों पर होने वाले प्रतिकूल प्रभाव को ही रेखांकित करने की कोशिश कर रहा था।

अच्छा, यह क्लास तो खत्म हुई........आप किस सोच में पड़ गये.......कि आप भी यही दवाई लेते हैं...कहीं आप को भी यह तकलीफ़ न हो जाए। ऐसा कुछ नहीं है, वैसे तो मैडीकल फील्‍ड में कुछ भी ज़्यादा निश्चित होता नहीं, लेकिन आप यह मान कर चलें कि अगर आप इस तरह की कोई दवा ले भी रहे हैं अपने डाक्टर की सिफारिश पर.....तो लेते रहिए। ऐसा प्रतिकूल प्रभाव यह दवाई लेने वाले हर इंसान में नहीं होता। निश्चिंत रहें, खुश करें, इसलिए मैं अकसर कहता हूं नेट पर ज़्यादा सेहत संबंधी विषयों को नहीं खंगालना चाहिए।

हां , एक बात है कि अगर आप कोई भी दवा ले रहे हैं और मसूड़ों की इस तरह का हालत है... तो भी आप का कोई अनुभवी दंत चिकित्सक ही यह कह पाएगा कि यह तकलीफ़ आप को फलां फलां दवाई की वजह से है.. और फिर वह आप को फ़िजिशियन के पास भेजेंगे ....और फिजिशिय़न भी पूरा लाभ और रिस्क का आंकलन करने के बाद ही आप की कोई भी दवा चेंज करते हैं.......इस का मतलब यही है कि कईं बार उस दवाई से मरीज़ को जो लाभ हो रहे हैं उस का पलड़ा ज़्यादा भारी रहता है इस से मसूड़ों पर होने वाली प्रभाव की तुलना में ......ऐसे में दवाई चेंज नहीं की जाती, यह सब निर्णय केवल फ़िज़िशियन ही लेने में सक्षम होते हैं............ऐसी और भी कईं दवाईयां हैं जिन में मसूडों में सूजन आ सकती है, मिर्गी रोग के लिए ली जाने वाली कुछ दवाईयां, किडनी (गुर्दा) प्रत्यारोपण के बाद ली जाने वाली कुछ दवाईयां.......आदि ........लेकिन हर व्यक्ति में ये प्रभाव नहीं पाये जाते...................इसलिए दिल पे मत ने ले यार............लिखने के लिख दिया, ज़्यादा सोचा मत करें.........

यार , आप तो सीरियस हो गए....चलिए उस का भी कुछ जुगाड़ करते हैं.......यह सुनिए.... वीडियो को न भी देखें या उस पर ध्यान न भी करें तो भी लिरिक्स तो ठीक ठाक ही हैं......हम सब के लिए एक हेल्दी संदेश लिए हुए...

दांत की क्विकफिक्स रिपेयर

जी हां, दांत की क्विकफिक्स रिपेयर भी होती है.....लेकिन इस में क्विकफिक्स या फेवीक्विक का कोई कमाल नहीं है, यह कमाल तो है आज की तारीख में उपलब्ध बेहतरीन मैटीरियलज़ (materials) का जो एक तो दांतों के साथ बिल्कुल मैच करते हुए विभिन्न शेड में आते हैं और दूसरा इस तरह के मैटिरियल आने लगे हैं जो दांतों के साथ बिल्कुल एकदम एक ही हो जाते हैं......दांतों के साथ इस तरह से बांडिंग कर लेते हैं कि आप कुछ भी खाएं-पिएं यह बंधन नहीं टूटता।

अच्छा, एक उदाहरण के ज़रिये अपनी बात कहता हूं.........यह तस्वीर एक १८-१९ साल के युवक की है, चार पांच रोज़ मेरे पास आया था.....आप उस के अगले दांत की हालत देख रहे हैं ना.....यह दांत दंत-क्षय की वजह से पूरी तरह से सड़ चुका है लेकिन इसे इस में दर्द कभी भी नहीं हुई.....शायद कुछ कह तो रहा था कि पांच छः वर्ष पहले एक बार थोड़ी दर्द हुई थी।

चाहे उसे दर्द हुई या नहीं, लेकिन दांत की अवस्था देखने पर ही पता चलता है कि उस की आरसीटी..रूट कैनाल ट्रीटमैंट---होना ज़रूरी है और उस के बाद उस पर कैप आदि का लगवाना ज़रूरी लगता है। दांत को उखड़वाने की कोई ज़रूरत नहीं। मैंने उसे समझाया तो कहने लगा कि वह तो उसे पता है, वह तो बाद में वह करवा ही लेगा लेकिन इस समय उसे किसी विशेष इंटरव्यू और एक विशेष कार्यक्रम में जाना है, इसलिए वह इस तरह के दांत के साथ जा नहीं सकता, इसलिए इस भद्दे से दांत का कुछ कर दें।

मैं हमेशा हर मरीज़ को पूरा और सही इलाज करवाने के लिए ही प्रेरित करता हूं लेकिन इस लड़के की आवाज़ में इतनी बेबसी सी लगी कि मैंने सोचा चलो इस का कुछ जुगाड़ करते हैं।

आधुनिक डैंटिस्ट्री.... इस दांत को ठीक करने में मेरा कोई विशेष योगदान नहीं है......आज कल डैंटल मैटिरियल ही इतने इतने अच्छे उपलब्ध होने लगे हैं.....हमारे अस्पताल में हम बढ़िया विदेशी किस्म के ही मैटिरियल इस्तेमाल करते हैं.....अब मुझे पता नहीं कि हिंदोस्तान में इस तरह के मैटिरियल क्यों नहीं तैयार हो सकते.....बस, जो भी है, मुझे विदेशी और अच्छी कंपनियों के मैटिरियल पर ही भरोसा है क्योंकि बरसों बरसों तक इन मैटिरियल ने लोगों के मुंह में रहना होता है, हर तरह के तापमान और हर तरह के ऐसिडिक, तीखी, नमकीन ...कुछ भी चीज़ को सहना होता है ...इसलिए मैं हमेशा ही से पिछले ३० वर्षों से सब से बढ़िया मैटिरियल ही इस्तेमाल करता हूं..

प्रमाण इस का तब मिलता है जब मुझे मेरे नेटिव प्लेस में कोई कहता है कि डा साहब, यह फिलिंग जो आपने की थी, पच्चीस साल पहले वह तो वैसी की वैसी है, या जब मैं अपने बड़े भाई के दांतों पर २५ वर्ष पहले की हुई फिलिंग देखता हूं तो अच्छा लगता है...अभी दो दिन पहले जब मुझे एक सहपाठिन ने व्हाटस-एप पर बताया कि उस के पति मुझे १६-१७ वर्ष तक याद करते रहे ...जब तक उन के मुंह में मेरे द्वारा की हुई फिलिंग टिकी रही......यह एक मुश्किल तरह की फिलिंग थी, जो अगर ध्यान से ....या मन लगा के न करो तो कुछ ही महीनों में या तो गिर जाती है या फिर आसपास के मसूड़े में सूजन पैदा कर देती है। लेकिन मैं यहां यह क्यों लिख रहा हूं.......अपनी तारीफ़ करने से बाज़ नहीं आता मैं भी...  Self praise has no recommendation! ... अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाली बात ही तो है यह भी।

एक बात और भी है ना कि आखिर क्यों न करें अपना काम मन लगा के, अच्छे से काम करना चाहिए ...अपना पूरी क्षमता लगा कर। किसी को भी देखें हर वह आदमी जो अपने धंधे को ईमानदारी से करता है, उस के काम में ईश्वर कृपा से निखार आने लगता है।

हां तो बात उस ऊपर वाले युवक की हो रही थी......सरकारी अस्पताल में काम करते हुए मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं था उसे कहना कि नहीं, नहीं, काम तो तुम्हें पूरा ढंग से ही करवाना होगा।

जुगाड़बाजी........लेकिन फिर जब मैंने उस की जगह पर अपने को खड़ा कर के देखा तो मुझे लगा कि इस का जुगाड़ तो कर ही देना चाहिए....ये कुछ दिन के लिए बाहर तो जा ही रहा है, और अगर कुछ करवाए बिना भी गया तो वहां से लौटने के बाद इस के दांत का यह हिस्सा भी नहीं बचेगा......अवश्य टूट जायेगा। वैसे तो यह देश ही सारा जुगाड़बाजी पर चल रहा है ....।

जुगाड़ ठीक ठाक ही तो लग रहा है... 
यही सोच कर मैंने उस के दांत का इस तरह का जुगाड़ कर दिया  ...आईने में देख कर उस की तो बांछें खिल गईं.....मुझे भी खुशी हुई..लेकिन मैंने उसे समझा दिया कि यह केवल जुगाड़ है, तुम्हें लौट कर पूरा इलाज करवाना होगा.....वह समझ गया।

बहरहाल, यह जुगाड़ कितना समय चलेगा, चलेगा तो खूब लेकिन पूरी आरसीटी तो करवानी ही होगी.. वरना कभी भी दर्द तो हो ही सकता है। यह तो केवल उस युवक की फरमाईश पर कर दिया था। अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने तो रिपेयर का अच्छा जुगाड़ कर दिया और अगर यह वापिस ही न आया तो........ नहीं आए तो नहीं आए, सरकारी अस्पताल है, लेकिन ऐसा नहीं, मैं चाहता हूं कि वापिस आए और उस का काम मैं ढंग से पूरा करूं.......इसीलिए शायद आप नोटिस करेंगे कि मैंने इस जुगाड़ को भी इतना परफैक्ट भी नहीं बनाया कि वह सही इलाज करवाने के लिए लौटे ही ना........आप इस जुगाड़ को साथ वाले स्वस्थ दांत से कम्पेयर कर के देखेंगे कि इस की बनावट में बिल्कुल थोड़ी सी कमी इसीलिए रख छोड़ी है।

मैटिरियल कौन से इस्तेमाल किए हैं..........एक तो लाइट-क्यूर कंपोज़िट और दूसरा ग्लॉस-ऑयोनोमर सीमेंट.....मुश्किल नाम हैं ना, मुझे भी पच्चीस साल पहले बहुत मुश्किल जान पड़ते थे, लेकिन इस से आप को क्या, बस मैंने तो ऐसे ही अपने ट्रेड-सीक्रेट आप के सामने खोल दिए.....

क्या आपने अपने दांतों को समय रहते रिपेयर करवा लिया है, अगर नहीं, तो अपने दंत चिकित्सक से शीघ्र ही संपर्क करिएगा।

दांतों और मैटिरियल का इतना बढ़िया जोड़--बंधन देख कर यह गीत याद आ गया....

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

नकली दांत कईं बार सैट नहीं बैठते...

महोदय नमस्कार ,अपनी माता जी ,को मैंने एक अच्छे डॉक्टर से डेन्चर लगवाया था जो आज 8 महीने बाद भी सेट नहीं हो पाया है ,वो जब भी उसे लगाकर कुछ खा ले..  तो कई दिन तक मसूड़ों में जख्म हो जाते है ,डॉक्टर कहते है ऐसे ही मसूड़े पकेंगे ,अब तंग आकर वो उसका इस्तेमाल ही नहीं करती ,क्या वही डेन्चर सेट हो सकता है ?

उस डॉक्टर की काबिलियत पर मुझे शक है ...


यह प्रश्न एक जेंटलमेन ने इस ब्लॉग पर लिखी एक पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में लिखा। जब मैं उन्हें इस का जवाब लिखने लगा तो मुझे लगा कि यह तो एक पोस्ट ही बन गई है जिस से दूसरों का भी फॉयदा हो सकता है, तो जनाब आप भी पढ़िए....

मैंने आप की माता जी की समस्या पढ़ी। कईं बार ऐसा होता है विशेषकर महिलाओं में कि वे या तो खराब-हिलते हुए दांत उखड़वाने में देर करती रहती हैं या फिर निकलवाने के बाद नकली दांत लगवाने में देर कर देती हैं. इस कारण से और वैसे भी  बहुत सी भारतीय महिलाओं में जबड़े की हड्‍डी इतनी अच्छी हालत में बचती नहीं, कहने का मतलब कि वह इतनी अच्छी नहीं रह पातीं कि उस पर नकली दांत टिक पाएं...... 

बहरहाल, यह समस्या महिलाओं में अधिकतर नीचे वाले नकली दांतों के सैट के साथ ज़्यादा आती है.... लिखिएगा कि क्या उन्हें भी नीचे वाले सैट से ही समस्या है। 

एक बात और अगर आप चाहें या मुनासिब समझें तो उन के नकली दांतों की एक फोटू और अगर अपने खींच सकें तो उन के मुंह के अंदरूनी हिस्से की एक फोटो ---बिना दांतों के ..... ऊपर और नीचे वाले मसूड़ों की अलग अलग, मुझे भेज दें। 
वे तस्वीरें देखने से ही काफ़ी अंदाज़ा हो जाएगा। 

चिंता न करें......हर बात का समाधान हो जाता है। मैं उस अनजान दंत चिकित्सक का पक्ष नहीं ले रहा हूं लेकिन अगर हड्डी ही कमजोर होगी तो नकली दांतों को टिकने में दिक्कत तो होती ही है. शायद उस ने पहले बता ही दिया होगा। 

मेरे विचार में बिना मरीज़ को देखे, बिना कोई तस्वीर देखे, इतना ही पढ़ने से आप को काफ़ी अंदाज़ा लग गया होगा। 

और एक बात कि अगर आप की मां जी ने उस सैट को निकाल कर बाहर रख दिया है, तो ठीक ही किया है, इस तरह के सैट से जो बार बार जख्म मुंह में हो जाते हैं ये असहनीय दर्द देते हैं......वैसे उन के मुंह के जख्मों के लिए तीन चार दवाईयां लिख रहा हूं..Dentogel/Dologel/Zytee/Emergel..इन में से कोई भी एक ले कर उन्हें कहें कि हाथ धोने के बाद उस जख्म में लगा दें और पांच मिनट बाद थूक दें। 

ध्यान दें कि हाथ धोने के बाद वे उसे टावल आदि से पोंछें नहीं, बल्कि एक-दो मिनट में अपने आप हाथ सूखने के बाद ही उस दवाई की दो बूंदे उस जख्म पर लगाएं। 

शुभकामनाएं..........और भी कुछ पूछना चाहें तो बेझिझक पूछिए। 

बुधवार, 20 अगस्त 2014

खुरदरे मंजन बिगाड़ देते हैं दांतों का हुलिया

जब हम लोग कालेज में पढ़ते थे और हमें खुरदरे मंजनों के बारे में चंद पंक्तियां पढ़ाई जाती थीं कि इस से दांत नष्ट हो जाते हैं तो हम तरफ़ इतना ज़्यादा ध्यान भी नहीं देते थे क्योंकि उस उम्र में हमें लगता था कि सारा संसार तो बढ़िया पेस्टें ही इस्तेमाल कर रहा है।

लेकिन प्रोफैशन में तीस वर्ष बिताने के बाद अब यह लगने लगा है कि जितना नुकसान तंबाकू-गुटखा-पानमसाला मुंह के अंदर वाले हिस्सों (दांतों का भी)  का कर रहा है, उतना ही नुकसान ये खुरदरे मंजन दांतों का किए जा रहे हैं।

अब प्रोफैशन है, नौकरी है तो बार बार वही बातें महीने में सैंकड़ों मरीज़ों के साथ दोहरानी पड़ती हैं लेकिन अब तो जैसे ऊब सी होने लगी है।

यार इतना भी इन खुरदरे खराब किस्म के मंजनों का क्या प्रेम कि पब्लिक इन्हें छोड़ ही नहीं पाती?......बहुत से मरीज़ तो ऐसे आते हैं जिन के दांतों का हुलिया देख कर मैं उन से दो-तीन मंजनों-पेस्टों के नाम लेता हूं कि क्या आप ये इस्तेमाल कर रहे हैं। अधिकांश केसों में मेरा शक सही निकलता है।

जब हम ने नईं नईं डैंटिस्ट्री पढ़ी तो हमें यह लगता था कि यार ये जो लोग बसों, फुटपाथों में खुली शीशियों में मंजन-वंजन बेचते हैं, केवल यही गड़बड़ हैं, लेकिन जितने भी ये देशी किस्म के मंजन वंजन बेच कर आप को फंसाया जा रहा है, इन में से अधिकांश बेकार ही हैं......until unless proven otherwise!

मुद्दा एक और भी तो है कि अब अगर ये मंजन घर में आते हैं तो छोटे छोटे बच्चे भी इन्हीं मंजनों से दांत कूचने लगते हैं।

खुरदरापन इन मंजनों का ऐसा कि आप अगर अपनी अंगुली से इसे मसलें तो आप को बिल्कुल महीन और बारीक ही लगेगा। लेकिन इन अधिकांश मंजनों में बहुत मात्रा में गेरू-मिट्टी (लाल मिट्टी)  पड़ी रहती है और कुछ में तो तंबाकू भी मिला रहता है और शीशी के ऊपर नहीं लिखा रहता कि इस में तंबाकू भी है।

पब्लिक को गिरफ्त में लेने के लिए इन मंजनों के नाम बड़े भारतीय किस्म के रखे जाते हैं लेकिन ये सब के सब बेकार हैं, यह बात अपने अनुभव के आधार पर लिख रहा हूं। कितने ही मरीज़ रोज़ाना दिखते हैं जिन में इन मंजनों की वजह से दांत घिस जाते हैं और फिर वे दर दर की ठोकरें खाते फिरते हैं उन को रिपेयर करवाने के चक्कर में, नसीब वाले हैं जो यह काम करवा पाते हैं, वरना तो उखड़वाने को ही अधिकतर दांतों का इलाज समझा जाता है।

मुझे अकसर लोग पूछते हैं कि ये मंजन जो किसी बाबा ने या किसी संत ने बनाये हैं, वे कैसे हैं, मैं जब खुरदरे मंजनों की बात कर रहा हूं तो इन सब मंजनों को भी साथ ही में शामिल कर रहा हूं। मेरी माता जी के दांत ठीक ठाक ही थे, लेकिन जब से उन्होंने एक ऐसे ही मंजन और उसी नाम की पेस्ट का इस्तेमाल किया तो लगभग एक-डेढ़ वर्ष के बाद उन के आगे से दांत बुरी तरह से घिस गये और अजीब किस्म के काले-भूरे से दिखने लगे (Dental Staining)....पहले तो मैंने इस तरफ़ ध्यान नहीं दिया, वैसे भी होता है ना......घर का जोगी जोगड़ा.........फिर मुझे उन का यह मंजन और पेस्ट बंद करवाना पड़ा।

देश में बहुत से संत लोग हैं, बाबा हैं, सभी अच्छे  हैं, अच्छा काम कर रहे हैं, इन के बाकी उत्पाद भी ठीक हैं, मैं भी सेवन करता हूं लेकिन टुथपेस्ट या मंजन में इन का क्वालिटी कंट्रोल शून्य के समान है........ऐसा मैं उन लोगों के दांतों की हालत देख कर कह सकता हूं जो इन्हें कुछ ही महीने इस्तेमाल करने पर दांतों की ठंड़ा गर्म  और रंग बिगड़ने आदि जैसी शिकायतों के साथ दंत चिकित्सकों के पास पंक्तियां लगाने लग जाते हैं। दरअसल विभिन्न कारणों की वजह से इन मंजनों-वंजनों की गुणवत्ता पर कोई कंट्रोल रहा ही नहीं है।

तो फिर मेरी सलाह है कि आप किसी भी इंटरनेशनल ब्रांड की बढ़िया किस्म की पेस्ट इस्तेमाल करें......और अपने दांतों की सेहत को सुरक्षित रखें।

अब कोई अगर यह तर्क देना चाहे कि मैं गलत कह रहा हूं.....देशी मंजन ही बढिया हैं, इन से उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई बल्कि उन के दांत बच गए, उन से मैं क्षमा मांगता हूं, मेरे पास इस तर्क का कोई जवाब नहीं है, वैसे भी मैं बहस में कम ही पड़ता हूं। जो मेरा अनुभव रहा हज़ारों दांतों के मरीज़ों के साथ मैंने आप से साझा कर लिया, अगर आप का अनुभव इन मंजनों वंजनों आदि के बारे में कोई अलग है, कोई बढ़िया किस्म का रिजल्ट आपने पाया है तो कमैंट्स में शेयर करिए......... वैसे विशेषज्ञ की बात मान लेनी चाहिए, पते की बात कह रहा हूं।

देश में यह पेस्टों मंजनों का धंधा करोड़ो-अरबों का है, मेरी किसी विशेष पेस्ट के लिए सिफारिश नहीं है।

इन पेस्टों मंजनों के बारे में कुछ साल पहले भी कुछ लिखा था, अभी सर्च करता हूं... अब पता नहीं उस समय क्या लिख दिया था, लेकिन जो भी लिखा होगा---सच ही लिखा होगा, इस की पूरी गारंटी है....... Check this out at the following links......

यह रहा टुथपेस्ट का कोरा सच --भाग एक
यह रहा टुथपेस्ट का कोरा सच - भाग दो 




शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

पायरिया का इलाज

आज मैं नेट पर घूमते हुए एक सेहत से संबंधित साइट पर पहुंच गया....वहां एक लिंक दिखा कि पायरिया का इलाज कैसे करें.....मैंने सोचा देखते हैं क्या लिखा है, उत्सुकता हुई।

मैं उस साइट पर पायरिया के बारे में अजीब अजीब बातें पढ़ कर हैरान-परेशान हो गया। सब कुछ गलत लिखा हुआ था। पहले तो लिखा था कि आप नमक, तेल और हल्दी बस एक दिन के इस्तेमाल कर लें, पायरिया खत्म हो जायेगा। और साफ साफ लिखा था कि अगर यह काम तीन दिन कर लिया तो समझो पायरिया सारी ज़िंदगी के लिए भाग जाएगा।
और भी अजीब अजीब सी बातें....... कि पायरिया ठीक करने के लिए तंबाकू लेकर उसे जलाया जाए, फिर उसे मसूड़ों पर लगाया जाए।

मैं जानबूझ कर उस वेबसाइट का लिंक यहां नहीं दे रहा..... ठीक नहीं लगेगा.......पर केवल यह संदेश देना चाहता हूं कि िजस का काम उसी को साजे।

हिंदी ऑनलाइन लेखन बड़ी संवेदनशील सा विषय है। इसलिए अनुरोध है कि हम जिस क्षेत्र से जुड़ें हैं, जो काम करते करते हमारे बाल पक गये, अगर हम उन्हीं विषयों के बारे में लिखेंगे तो पढ़ने वाले को तो लाभ होगा ही, हमारी विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

यह भी ज़रूरी नहीं कि हम अपने विषय में बिल्कुल परफैक्ट ही हों तभी लिखें, नहीं.......... जो कुछ भी ठीक तरह से जानते हैं, बस उसे ही लिख कर अगली पीढ़ियों के लिए नेट पर सहेज कर रख दें तो बढ़िया है। वैसे तो हम किसी भी विषय पर लिखने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन अगर हम अपने विषय तक ही सीमित रहेंगे तो बेहतर होगा....वैसे नेट से कुछ भी ढूंढ-ढांढ कर कापी-पेस्ट करना कौन सा मुश्किल काम है ...लेकिन ना ही तो यह चलता है और वैसे भी ऐसा करने की क्या मारा-मारी पड़ी है।

कहानीकार हैं तो कहानियों से ही पाठकों को गुदगुदाएं, व्यंग्यकार हमें अपनी रचनाओं से लोटपोट करते हैं, कवि बंधु कविताए, तकनीकी विशेषज्ञ अपने तकनीकी विषयों पर लिखें.........ऐसे ही जो भी लोग जो काम कर रहे हैं या जिस क्षेत्र से जुड़े हैं, जब वे उस विषय के बारे में लिखते हैं तो सहजता से यह काम कर पाते हैं।

वैसे ये मेरे विचार हैं, बिल्कुल फिजूल भी हो सकते हैं, हर बंदा अपनी कलम का राजा है, जो चाहे लिखे........कौन किसे रोक सकता है लेकिन कईं बार गुमराह करने वाली सामग्री दिख जाती है तो बहुत दुःख होता है जैसा कि मैंने पायरिया के इलाज के बारे में आज नेट पर जो देखा। जिस के बारे में अच्छे से पता हो, जिस का पूरा ज्ञान हो, उसी के बारे में लिखा जाए और विशेषकर जब यह मामला लोगों की सेहत का हो तो और भी सचेत रहने की ज़रूरत है.....क्योंकि जिस तरह से मैंने उस पोस्ट पर कमैंट देखे, आठ दस, मुझे और भी दुःख हुआ ...सबने लिखा था...बड़ी उपयोगा पोस्ट.. बड़ी अच्छी जानकारी।

चलिए, इस टापिक को इधर ही विराम दें, और पायरिया के बारे में आप सब को हिंदी के कुछ अच्छे लेखों का लिंक देकर आप से विदा लूं........

मीडिया डाक्टर: मसूड़ों से खून निकलना.....कुछ 
बहुत ही ज़्यादा आम है मसूड़ों से खून आना
मीडिया डाक्टर: पान से भी होता है पायरिया
यह रहा टुथपेस्ट/टुथपावडर का कोरा सच......भाग II

शनिवार, 9 अगस्त 2014

दांत उखड़वाने के लिए हर सप्ताह ५०० बच्चे भर्ती

मुझे अभी तक किसी भी बच्चे का दांत उखड़वाने के लिए उसे अस्पताल में दाखिल करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। जब हम लोग डैंटिस्ट्री पढ़ रहे थे तब भी कभी नहीं सुना-देखा कि इस तरह से बच्चों के दांत उखड़वाने के लिए कभी हमारे प्रोफैसरों ने भी बच्चों के दांत उखाड़ने के लिए उन्हें पहली भर्ती किया हो।

हां, कभी कभी कुछ वर्षों बाद कोई ऐसा बच्चा आ जाता था जो बहुत ही डरा हुआ, भयभीत सा या फिर किसी ऐसी मानसिक अथवा शारीरिक बीमारी से ग्रस्त होता था कि उस के दांत बिना उस को भर्ती किए और बिना अलग तरह का अनेस्थिसिया दिए (जिस के पश्चात उसे कुछ समय के लिए नींद आ जाती है)... नहीं हो पाता था। यह भी मैंने अपनी प्रोफैसर को एक बार करते देखा था।

वैसे तो जो भी चिकित्सक यह इलाज करते होंगे वे सब कुछ जांच कर ही करते होंगे, लेकिन वर्ष में २०-२५ हज़ार बच्चे अगर अस्पतालों में दांत उखड़वाने के लिए दाखिल किए जा रहे हैं तो यह एक चिंताजनक आंकड़ा है।
इस मुद्दे पर अपने विचार लिखना चाहता हूं।

इंग्लैंड जैसे देशों में बच्चों के दांत यहां की अपेक्षा बहुत ज़्यादा खराब होते हैं.......इस के पीछे उन का खानपान बहुत ज़्यादा जिम्मेदार है। वे बच्चें कोला ड्रिंक्स, चाकलेट्स, बर्गर और दूसरे तरह के जंक फूड के किस कद्र दीवाने हैं, हम जानते हैं। दीवानापन इधर भी बढ़ रहा है लेकिन यहां बच्चे के मां बाप दाल-रोटी की जुगाड़बाजी में ही इतने उलझे हुए हैं कि अधिकतर पेरेन्ट्स बच्चों को यह सब कचरे जैसा खाना उपलब्ध नहीं करवा पाते, और यह बच्चों का सौभाग्य नहीं तो और क्या है कि अधिकांश को दाल-रोटी-सब्जी से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

मैं नहीं गया कभी इंगलैंड..लेकिन जो मीडिया से जाना वहां के बारे में कि वहां पर डाक्टरों और मरीज़ों के बीच कुछ ज़्यादा बढ़िया संवाद है नहीं, किसी के पास समय ही नहीं है इस तरह के संवाद में पड़ने का.......लेकिन यहां अभी भी डाक्टर और पेरेन्ट्स के बीच अच्छी बातचीत हो ही जाती है...... पता नहीं आप मेरे से कितना सहमत हों, लेकिन अभी यहां हालात उतने स्तर तक गिरे नहीं है, मुझे तो ऐसे लगता है।

इसी संवाद के अभाव में...शायद डाक्टर मरीज़ के संबंध में विश्वास का हनन भी हुआ है, ऊपर से इतने सारे कोर्ट-केस, मुआवजा ..और सब तरह की पेशियां, झंझट..ऐसे में लगता है कि बच्चों को अस्पताल में भर्ती कर के उन के दांत निकालना ही इंगलैंड के दंत चिकित्सकों को एक सुरक्षित रास्ता जान पड़ता होगा।

वहां पर इंश्योरैंस का भी कुछ चक्कर है, अस्पतालों को भुगतान इंश्योरैंस द्वारा होता है, इसलिए अस्पताल में इस तरह की भर्तीयां करनी ज़रूरी भी होती होंगी।

यहां के बच्चे बात समझ लेते हैं, अकसर मां-बाप उन के साथ ही होते हैं, वहां पर मां-बाप बाहर रोक दिये जाते हैं.....बच्चे मां-बाप की उपस्थिति में बिंदास अनुभव करते हैं, है कि नहीं ?...और इलाज के लिए बच्चे हम जैसों की बातों में भी आसानी से आ जाते हैं कि दांत उखड़वाने के बाद पापा, दो आइसक्रीम दिलाएंगे, कुछ को उन के पापा दस रूपये का नोट थमा देते हैं.........यानि कि कुछ भी जुगाड़बाजी से आसानी से बिना किसी विशेष परेशानी के बच्चे अाराम से दांत उखडवा ही लेते हैं।

हां, कभी कभार दो एक साल में एक बच्चा आ जाता है जो बहुत डरता है, रोता है और डैंटल चेयर पर बैठने ही से मना करता है, अकसर वह भी दूसरी या तीसरी बार प्यार-मनुहार से काम करवा ही लेता है। कोई विशेष दिक्कत नहीं आती, कोई विशेष दवाईयां या विशेष टीके नहीं लगवाने पड़ते। थैंक गॉड--तुसीं ग्रेट हो।

मैं उस इंगलैंड वाली रिपोर्ट में पढ़ रहा था कि कईं बच्चों के सारे के सारे दांत ही उखड़वाने पड़त हैं। इस से पता चलता है कि वहां बच्चों के दांतों की स्थिति कितनी खराब है।

ऐसा मैंने कोई बच्चा नहीं देखा अभी तक यहां जिस के सारे दांत निकलवाने की ज़रूरत पड़ी हो........ वैसे भी हम जैसे लोगों ने अपने प्रोफैसरों की बात तीस साल पहले ही गांठ बांध ली थी कि बिना किसी विशेष कारण के बच्चों के दांतों को उखाडना नहीं चाहिए क्योंकि उन के गिरने का एक नियत समय है, जब वे गिरेंगे और उन की जगह पर पक्के दांत उन का स्थान लेंगे। अब अगर किसी दांत के गिरने वाले टाइम-टेबल से बहुत पहले उसे निकाल दिया जाए या निकालना पड़े तो फिर उस के नीचे विकसित हो रहे पक्के दांत के मुंह में निकलने में गड़बड़ी होने की आशंका बनी रहती है... ऊबड़-खाबड़ दांत होने का एक बहुत बड़ा कारण।

हमें यह सिखाया गया कि अगर बच्चे के दांत में कोई दांत पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है और उस की केवल जड़ या जड़ें ही बाकी रह गई हैं लेकिन बच्चे को इन जड़ों की वजह से कोई परेशानी नहीं है, तो भी इन जड़ों को बिना निकाले ही रहने दिया जाना चाहिए जब तक वे अपने नियत टाइम-टेबल अनुसार या तो स्वयं ही हिल कर न निकल जाएं या फिर जब तक उन में कोई दिक्कत न हो। ये बातें बच्चों के दांतों के बारे में लिख रहा हूं।

लेकिन यह निर्णय कि कौन से बच्चे में कौन से दांत बिना किसी चिंता-परेशानी के पड़े रहें और किन्हें निकालना ज़रूरी है, यह निर्णय दंत चिकित्सक का होता है, आप स्वयं यह निर्णय नहीं कर पाएंगे. मेरे निर्णय को यह बात अकसर प्रभावित करती है कि अगर तो किसी टूटे फूटे दूध के दांत में बार बार पस पड़ने लगी है, ऐब्सेस बन रहा है जिस के लिए बच्चे के बार बार कुछ कुछ समय के बाद ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां खिलानी पड़ रही हैं तो ऐसे टूटे फूटे दूध के दांतों को बाहर का रास्ता दिखाना ही ठीक रहता है।

मैं यह बात एक सामान्य दंत चिकित्सक की हैसियत से रख रहा हूं ..जो दंत रोग विशेषज्ञ बच्चों के स्पैशलिस्ट हैं, उन के अनुभव क्या हैं, जब वे लिखेंगे तो पता चलेगा। बाकी बातें तो सब की सब वही हैं जो मैंने लिखी हैं, लेकिन चूंकि उन के पास जटिल से जटिल केस भी आते होंगे जब वे किसी डैंटल कालेज में काम कर रहे हों, ऐसे में वे किस तरह के दांत उखाड़ते हैं.......क्या उन्हें बच्चे को रिलैक्स करने के लिए, उस का भय भगाने के लिए कोई टीका भी इस्तेमाल करना पड़ता है, यह तो वे ही बता सकते हैं। लेिकन मुझे कभी इस की ज़रूरत महसूस नहीं हुई या मैंने इस्तेमाल नहीं किया...इस का आप जो भी मतलब निकाल लें।

कईं बार किसी पोस्ट में इतनी विश्वसनीयता घुस आती है कि उस के नीचे डिजिटल सिग्नेटर करने की इच्छा होती है।
Warning Over Children's Dental Health 

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

पान से भी होता है पायरिया

इस 26वर्षीय युवक के मुंह की तस्वीर से यह दिख रहा है कि इसे पायरिया रोग है— डाक्टरी भाषा में इसे Chronic gingivitis कहते हैं.. इस की परेशानी यह है कि वह जब भी ब्रुश करता है तो उस के मसूड़ों से रक्त निकलने लगता है। पायरिया रोग का यह एक अहम् लक्षण है, अन्य लक्षण जो इस फोटो में देखे जा सकते हैं ..

सूजे हुये मसूड़े जिन का रंग लाल हो चुका है
दांतों पर टॉरटर जमा हुआ है
नार्मल मसूड़ों में एक फीचर – stippling – इस के मसूड़ों से गायब है, इस का मतलब यह है कि सामान्य मसूड़े को देखने पर उनका टैक्श्चर बिल्कुल संतरे के छिलके जैसा लगता है, जो कि पायरिया में गायब हो जाता है..


यह युवक पहले तो कह रहा था कि वह रोज़ाना एक तंबाकू वाला पान पिछले छःमहीने से खा रहा है ..लेकिन मेरे बार बार पूछने पर फिर कहने लगा कि शायद एक साल ही हो गया होगा। लेकिन मुझे लगता नहीं कि पान केवल एक साल में ही इतनी गड़बड़ कर सकता है, मैं जजमैंटल नहीं हो रहा हूं लेकिन मेरा अनुभव बता रहा है कि यह लंबे समय से यह तंबाकू वाला पान खा रहा होगा।

वैसे उस ने पिछले एक सप्ताह से पान खाना छोड़ दिया है ... मुझे कईं बार लगता है कि जैसे रेल का टी टी दिन में कईं बार सुनता है कि ओह...ओह ...मेरी टिकट कहां गई?  किसी ने पर्स उड़ा लिया है ... टिकट तो मेरे पास ही थी.....उसी तरह हम लोग भी यह तंबाकू, गुटखा, पान, ज़र्दा के बारे में यह सुन सुन कर पक चुके हैं ..पहले खाता था, अब तो छोड़ चुके हैं! 

लेकिन हमारी यही कोशिश होती है कि कोई बात नहीं, आज के बाद तुम्हारे  मन में इन ज़हरीले पदार्थों के प्रति इतनी नफ़रत पैदा हो जाएगी कि तुम इन्हें देखोगे भी नहीं ... और अकसर मैं तो इस मिशन में कामयाब हो ही जाता हूं ..क्योंकि मुझे लगता है कि अगर मेरी हार होगी तो तंबाकू लॉबी की जीत हो जायेगी .....एक इंसान या यूं कह लें कि एक परिवार बरबाद हो जायेगा क्योंकि देर-सवेर कब यह आदत मुंह के कैंसर की खाई में धकेल देगी पता भी नहीं चलेगा और जब पता चलेगा भी तो बहुत देर हो चुकी होगी !!

दूसरी तस्वीर में आप देख सकते हैं कि उस के नीचे के अंदर वाले दांतों के अंदर भी कितना टॉरटर जमा हुआ है। इस का इलाज तो आसान है ही.. लेकिन उस के साथ साथ यह भी बेहद ज़रूरी है कि उस लत को हमेशा के लिये लात मार दी जाए जिस की वजह से यह सब हुआ। कह तो वह युवक भी रहा था कि अब तो पान को हाथ नहीं लगाऊंगा.और कह रहा था कि पिछले चार पांच वर्ष से वह रोज़ाना एक सिगरेट पीता है आज से वह भी छोड़ देगा।

जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि जितनी भयानक यह तकलीफ़ दिखती है उतनी है नहीं, इस उम्र में इस अवस्था का इलाज बिल्कुल आसान है लेकिन आगे से उसे सुधर जाना होगा।

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

फिलिंग पुरानी होने पर क्यों लगता है ठंडा-गर्म ?

अकसर हमारे पास ऐसे मरीज़ आते रहते हैं जो किसी ऐसे दांत में ठंडा-गर्म लगने की शिकायत करते हैं जिस में पहले ही से फिलिंग की जा चुकी होती है और यह फिलिंग अकसर बहुत वर्ष पहले करवाई गई होती है।
वैसे तो किसी दांत में फिलिंग होने के बाद उस में ठंडा-गर्म लगने के बहुत से कारण हैं। और यह कारण फिलिंग करवाने के अगले दिन भी हो सकती है, कुछ दिनों के बाद भी और कुछ वर्षों के बाद भी। इस तरह से ठंडा गर्म लगने के अलग अलग कारण हैं।


                                                                     Credit ...flickr/brillenschlange

आज थोड़ी चर्चा करते हैं किसी फिलिंग किये हुये ऐसे दांत की जिस की फिलिंग कईं वर्षों पहले हो चुकी हो और अब उस दांत में फिर से ठंडा-गर्म लगना शुरू हो गया हो।

कुछ दिन पहले मेरे पास एक महिला आई थी जिस ने एक दाड़ में सिल्वर फिलिंग बहुत साल पहले करवा रखी थी लेकिन अभी उसे बहुत ही ज़्यादा ठंडा-गर्म लगने लगा था। मैंने जब उस के मुंह का निरीक्षण किया तो पता चला कि उस के फिलिंग वाले दांत में फिलिंग और दांत के बीच दो-तीन जगह छोटे छोटे गैप से हो गये हैं।
इस तरह के दांतों में ठंडा-गर्म लगने का यही कारण है ---ये फिलिंग और दांत के बीच में गैप के मुख्यतः दो कारण है --एक तो यह कि कईं बार फिलिंग के मार्जिन पर फिर से थोड़ा दंत-क्षय़( दांतों की सड़न, Dental caries) हो जाता है और दूसरा कारण होता है कि फिलिंग मैटीरियल ( सिल्वर हो या फिर कंपोज़िट हो) में समय के साथ कुछ बदलाव आते हैं जैसे कि सिल्वर में तो टारनिश एवं कोरोज़न (tarnish& corrosion) कुछ वर्षों बाद हो जाती है जिस की वजह से फिलिंग के मार्जिन पर लीकेज (leakage)  हो ही जाती है और कंपोज़िट फिलिंग (वही दांत के कलर के साथ मेल खाती फिलिंग) में कुछ समय के बाद शरिंकेज (shrinkage) हो जाती है जिस के कारण दांत और फिलिंग में गैप आ जाने से ठंडा गर्म लगने लगता है।

हां, तो मैं उस महिला मरीज की बात कर रहा था--- इस केस में बस उस गैप को डैंटल-ड्रिल से थोड़ा सा बड़ा कर उस में वापिस थोड़ी सी फिलिंग कर दी जाती है और मरीज़ को तुरंत आराम आ जाता है जैसे मेरे उस मरीज़ को आया। सामान्यतयः किसी भी केस में फिलिंग निकालने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

बुधवार, 10 जून 2009

दांतों में ठंडा लगने से कहीं आप भी परेशान तो नहीं ?

दांतों में ठंडा पानी आदि लगने से परेशान जब कोई मरीज़ किसी क्वालीफाईड डैंटिस्ट के पास जाता है तो उसे प्रश्नों की बौछार के लिये तैयार रहना चाहिये। और आप के मुंह के अंदर झांकने से पहले ही ये प्रश्न ताबड़तोड़ उछाल दिये जाते हैं ....
क्या यह ठंडा लगने की शिकायत सभी दांतों में है ?
अगर सभी दांतों में तकलीफ़ नहीं है तो फिर मुंह की किस तरफ़ दर्द है, दर्द ऊपर वाले जबाड़े में होता है या नीचे वाले जबाड़े में ?
ऊपर या नीचे वाले जबाड़े में जब दांतों में ठंडा लगता है तो क्या सभी दांतों में लगता है या केवल एक या दो दांतों में ?
अब प्रश्नों का दूसरा दौर शुरू होता है ---
जब ठंडा पानी मुंह में लिया जाता है तो यह दर्द कितने समय तक रहता है ? क्या पानी पी लेने के बाद भी यह होता रहता है ? इस दर्द की अवधि सैकेंडों में है या मिनटों में ?

ये जो मैंने प्रश्न लिखे हैं ये हमें लगभग हर उस मरीज़ से पूछने होते हैं जो इस ठंडे-गर्म की शिकायत से परेशान होता है। अब आप समझ सकते हैं कि इस परेशानी के लिये बस यूं ही किसी भी दवाई वाली पेस्ट को लगा कर दबाने की कोशिश क्यों निर्रथक साबित होती है। जब कारण का पता ही नहीं, डायग्नोसिस हुआ ही नहीं तो फिर ये दवाई वाली पेस्टें क्या कर लेंगी ?

और जो प्रश्नों की लिस्ट आप ऊपर देख रहे हैं ---इन में एक एक प्रश्न का बहुत महत्व है। एक अच्छा डैंटिस्ट चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न हो किसी भी दांतों पर ठंडा लगने से परेशान मरीज़ से ये प्रश्न तो पूछता ही है। हर प्रश्न का उत्तर विभिन्न दांतों की बीमारियों की तरफ़ इशारा करती है। बिना किसी डायग्नोसिस के बस यूं ही महंगी महंगी पेस्टें या मंजन लगाते रहना बिल्कुल उसी प्रकार है जिस तरह कई दिनों से बेहद पेट दर्द से परेशान कोई बंदा केवल दर्द-निवारक टीकिया ले लेकर अपना काम चलाता रहे। इस लिये डैंटिस्ट के पास जाकर ही कारण का पता लग सकता है।

और एक शिकायत मरीज़ बहुत करते हैं कि दांतों में गैप आ गया है, अभी मैं थोड़ा थका हुआ हूं ---आज दोपहर सोने का समय नहीं मिला ---इसलिये इस गैप के बारे में कल अच्छे से लिखूंगा।

शनिवार, 6 जून 2009

कटे एवं घिसे दांत कैसे हों दुरूस्त ?

दांतों का कट जाना एवं बुरी तरह से घिस जाना एक बहुत ही आम समस्या है। आज मैं आप के लिये कुछ तस्वीरें ले कर आया हूं। ये सब तस्वीरें मेरे मरीज़ों की ही हैं ---इन में से किसी का भी विवरण पढ़ने के लिये इस पर क्लिक करें।

इस मोहतरमा ने तो दांतों को छील ही दिया है
इस
महिला के दांतों को आप देखिये---यह किसी चालू से खुरदरे मंजन का इस्तेमाल करती रही हैं और पान खाने की खूब शौकीन रही हैं—देखिये इन दोनों आदतों ने इस के दांतों की क्या हालत कर दी है। इन घिसे हुये दांतों का पूरा इलाज करने के बाद इन पर एक दांतों के कलर से मिलती-जुलती एक फिलिंग ---लाइट-क्योर कंपोज़िट ( light-cure composite) से इन को दुरूस्त किया जायेगा।

वैसे तो इस तरह के दांतों में ठंडा-गर्म अकसर लगने लगता है लेकिन इन्हें इस तरह की कोई शिकायत नहीं है। इन्होंने तो यह भी नहीं कहा कि ये दांत भद्दे दिखते हैं ---शायद यह मानती होंगी कि इन का कोई इलाज ही नहीं है। लेकिन जब मैंने इन पर फिलिंग करवा लेने की बात कही तो तुरंत मान गई हैं।

अब इस मरीज़ का दांत देखिये --- देखिये किस तरह से एक दांत पर कट लगा हुया है और दूसरे पर फिलिंग हुई है। इस घिसे हुये दांत का क्या होगा ?

इस तरह से दांत के कटने का सब से आम कारण है कि टुथब्रुश को जूता पालिश करने वाले ब्रुश की तरह इस्तेमाल किया जाना। अगर कोई व्यक्ति अपनी इस आदत को नहीं सुधारता तो एक दांत में फिलिंग करवा लेने से फिर दूसरे दांत इस कटाई-घिसाई का शिकार हो जाते हैं जैसा कि इस केस में हुआ है। आप देख सकते हैं कि इस कटे हुये दांत के पीछे जो दांत है उस को मैंने लगभग दो-एक साल पहले दांत के कलर से मेल खाती एक फिलिंग ---ग्लॉस-ऑयोनोमर से भरा था और ताकीद तो यह भी की थी कि अब ब्रुश को सही ढंग से इस्तेमाल किया जाये।

और हां, केवल ब्रुश का स्टाईल ही विलेन नहीं है ----बल्कि ब्रुश की हालत भी इस के लिये बहुत हद तक जिम्मेवार है। DSC02955
अब जिस तरह के ब्रुश आप इस बाथरूम में पड़े देख रहे हैं ये दांतों की घिसाई ज़्यादा और सफ़ाई कम करेंगे। ( एक राज़ की बात ---यह फोटो हमारे ही घर के एक बाथरूम की है ----फोटो खींचते मेरे छोटे बेटे ने देख लिया था लेकिन अगर उस को पता चल गया कि इसे पोस्ट पर डाल दिया गया है तो भई मेरी खैर नहीं --- मुझे तो बार बार बेटों से वैसे ही यह धमकी मिलती रहती है कि पापा, देख लेना किसी दिन आप का ब्लॉग ही उड़ा देंगे – इस का कारण यह है कि पीक समय पर नेट पर काम करने के तीन उम्मीदवार होते हैं !!वैसे मेरे घर के ही एक बाथरूम में अगर ब्रुश इस हालत में मौज़ूद हैं तो मैं इस की नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं ।।

DSC03161
इस तस्वीर में भी आप देख रहे हैं कि किस तरह से दांत कट चुके हैं ---इन का इलाज भी वही है कि फिलिंग तो करवा ही ली जाये और साथ ही ब्रुश इस्तेमाल करने का ढंग भी सही किया जाये।

दरअसल , इस तरह के कटाव-घिसाव का इलाज करवाना इसलिये ज़रूरी है क्योंकि यह आगे ही बढ़ता चला जाता है और फिर धीरे धीरे अगर यह दांत की नस ( dental pulp) तक पहुंच जाता है तो बखेड़ा खड़ा हो जाता है---- फिर तो रूट-क्नाल ट्रीटमैंट एवं कैप का लंबा चौड़ा चक्कर पड़ जाता है। इसलिये इलाज का सब से महत्वपूर्ण पहलू है कि कारण को पकड़ा जाये और फिर बाद में फिलिंग कर देने से सब कुछ ठीक ठाक हो जाता है।

अकसर मैं देखता हूं कि लोग इस तरह के कटाव-घिसाव के लिये दंत-चिकित्सक के पास न जाकर ठंडे–गर्म के इलाज के लिये तरह तरह की दवाईयों वाली खूब चर्चित पेस्टें ले लेकर इस्तेमाल करनी शुरू कर देते हैं ----यह किसी भी तरह से इस तकलीफ़ का इलाज नहीं है, इस से केवल आप तकलीफ़ को दबा ही सकते हैं। इसलिये दंत-चिकित्सक के पास जाने से ही बात बन पाती है।

और फिर आप मटका कुल्फी का पूरा लुत्फ़ भी उठा पायेंगे।

बुधवार, 20 मई 2009

बिना किसी बीमारी के भी हो सकता है दांतों में गैप !

उस दिन हम लोग चर्चा कर रहे थे दांतों में गैप आ जाने की और उस लेख में इस के विभिन्न कारणों की चर्चा की गई। लेकिन इतना ध्यान रहे कि ज़रूरी नहीं कि किसी दांतों एवं मसूड़ों की बीमारी की वजह से ही गैप हो सकता है----कईं बार ऐसे मरीज़ भी दिखते हैं जिन में कोई बिना किसी दंत-रोग के भी दांतों के बीच गैप दिख ही जाता है।

मेरी यह मरीज़ की उम्र 49 साल की है। इस के ऊपर वाले दांतों की तस्वीर में आप देख रहे हैं कि बिल्कुल फ्रंट वाले दांतों में अच्छा खासा गैप है। लेकिन आप को यह बताना चाह रहा हूं कि यह मेरे पास इस तकलीफ़ की वजह से नहीं आई हैं।
बिना किसी बीमारी के भी दांतों में गैप हो सकता है ---डायास्टिमा Diastema

दरअसल इस महिला के नीचे वाले अगले दांतों में भी गैप था ----ऊपर वाले दांतों से भी ज़्यादा। लेकिन कभी इस तरफ़ इतना ध्यान दिया नहीं। तो समय के साथ इनके आगे वाले नीचे के दांतों में टारटर की बड़ी सी परत जमने की वजह से ये मसूड़ों के रोग से ग्रस्त हो गये जिस की वजह से ये बुरी तरह से हिलने तो लग ही गये लेकिन इस के साथ ही साथ इन में जो पहले से बड़ा हुया गैप था वह और भी बड़ा हुआ दिखने लगा। यह सब देखने में भी बहुत भद्दा लगने लगा।इसलिये इस महिला ने फैसला किया है कि नीचे के हिलते हुये अगले दांत निकलवा कर बढ़िया से फिक्स दांत लगवा लेंगी। ठीक है, उन का यह फैसला ---लेकिन फिक्स दांत दो की बजाए तीन लगेंगे क्योंकि पहले ही से इतना गैप था।

हां, तो ऊपर वाले अगले दांतों के गैप की बात चल रही थी। इस महिला ने तो बिना किसी परवाह के इतने साल बिता दिये ----लेकिन आज की जैनरेशन इस मामले में काफ़ी सजग है। वैसे, देखा जाये तो जितना गैप इस महिला के इन ऊपर वाले अगले दांतों में है इस के लिये इस 49 साल की उम्र में उसे यही सलाह दी जाती कि इसे तो अब ऐसे ही रहने दें।

सलाह ? लेकिन वह तो तभी दी जाती अगर इन्हें इस तरह के गैप से कोई परेशानी होती ---जब इन्हें इस से कोई गैप है ही नहीं, दोनों दांत स्वस्थ हैं तो इस महिला की खुशी में हम भी खुश हैं।

लेकिन मैं बात कर रहा था कि आज के युवक-युवतियां इस तरह के गैप के प्रति बहुत कांशियस हैं ----ठीक है , हों भी क्यों न ,क्योंकि किसी के चेहरे की सारी सुंदरता अगले दांतों की एलाइनमैंट पर भी तो कितनी निर्भर करती है। अकसर, इन दांतों में जो थोडा़ बहुत गैप होता है ( इस महिला के दांतों के गैप से कम) उसे आसानी से बंद कर दिया जाता है ---यह एक बहुत ही वंडरफुल डैंटल फिलिंग मैटीरियल ( light-cure composite) से संभव है जिसे इस देश में कुछ लोग गल्ती से लेज़र-फिलिंग के नाम से भी पुकारते हैं ----यह कोई लेज़र-वेज़र फिलिंग नहीं है।

यह जो मैं लाइट-क्योर कंपोज़िट फिलिंग की बात कर रहा हूं इस गैप के तरफ़ के दोनों दांतों पर थोड़ा थोड़ा लगा कर इस गैप को बंद कर दिया जाता है। इस मैटीरियर की विशेषता यह भी है कि विभिन्न कलरर्ज़ एवं शेड्स में उपलब्ध रहता है और इसे लगाने के बाद बिलकुल भी पता नहीं चलता कि दांत के ऊपर कुछ लगा भी हुआ है ।

जो भी कहें, दांतों के बीच गैप दिखता तो भद्दा ही है ---सब से पहले जिस से भी बात की जा रही हो उस का पहला ध्यान आप के अगले दांतों की तरफ़ ही जाता है। वैसे, कुछ डैंटिस्ट इस तरह के गैप का इलाज पोरसलीन लैमीनेट्स ( porcelain laminates or veneers) से भी करते हैं----यह महंगा विकल्प तो है ही , इस के साथ ही इसे किसी अनुभवी डैंटिस्ट से ही करवाना चाहिये जो कि पहले इस तरह का काम करते आ रहे हों।

लेकिन, मैंने बहुत से लोग ऐसे भी देखे हैं कि जिन के दांतों में गैप इस महिला के दांतों जितना होता है या इस से ज़्यादा लेकिन वे किसी झोलाछाप दांतों के कारीगर की बातों में आकर बेकार सा फिक्स दांत इस गैप में लगवा तो लेते हैं, लेकिन फिर इस तरह के फिक्स दांत से क्या होता है, वह तो आप कल देख-सुन ही चुके हैं !!

मंगलवार, 19 मई 2009

ब्रेसेज़ से कुछ (या काफी ?) हद तक तो बचा ही जा सकता है ....

कुछ अरसा पहले मैंने एक लेख में इस बात का जवाब देने की एक कोशिश की थी कि क्या ब्रेसेज़ से बचा जा सकता है ?
मुझे हमेशा उसी विषय पर लिखना अच्छा लगता है जिस का सरोकार हज़ारों-लाखों से आम लोगों से हो। ब्रेसेज़ के बारे में मैं जब भी सोचता हूं तो यही लगता है कि होती तो बहुत से बच्चों एवं युवकों-युवतियों को इसकी ज़रूरत है लेकिन मेरे अनुमान के मुताबिक इन में से केवल एक फीसदी ( 1%) या शायद इस से भी बहुत कम इस तरह का इलाज करवा पाते हैं।

मेरे ये आंकड़ें टीवी चैनलों के एग्ज़िट पोल जैसे नहीं है – कोई सनसनीखेज़ हवाई बात नहीं है यह , यहां पर एक एक बात बहुत ही सोच समझ कर कही जा रही है।

लाखों मरीज़ों को मिलने के बाद अब कुछ कुछ समझने लगा हूं कि आखिर क्यों लोग बच्चों के टेढ़े-मेढ़े दांतों का इलाज नहीं करवा पाते। इस का एक कारण है कि यह इलाज अच्छा खासा महंगा होता है ---अकसर अगर फिक्सड़ ब्रेसेज़ से इस तरह के ऊट-पटांग दांतों को सीधा करने का इलाज करवाया जाता है तो लगभग दस-पंद्रह हज़ार का खर्च तो इस में हो ही जाता है। यह महंगा इसलिये है क्योंकि इस में इस्तेमाल होने वाले मैटीरियल बहुत महंगे हैं और इसे आरथोडोंटिस्ट विशेषज्ञ ही बढ़िया ढंग से कर पाते हैं।

अकसर यह भी देखा है कि इतनी रकम खर्च करना बहुत से लोगों की बस की बात नहीं होती क्योंकि उन की अपनी प्राथमिकतायें हैं।

लेकिन मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि जिन बच्चों के दांत टेढ़े-मेढ़े होते हैं उन में थोड़ी बहुत हीन-भावना आ ही जाती है। अब कोई कहे कि नहीं , नहीं, ऐसा नहीं होता, तो मेरी इस के लिये कोई दलील नहीं है।

लेकिन मैंने बहुत गहराई से इन बच्चों , युवकों-युवतियों के चेहरे को पढ़ कर यही पाया है कि टेढ़े-मेढ़े दांतों से ग्रस्त ये बच्चे कईं बार तो हंसना ही भूल जाते हैं। अकसर स्कूल आदि में दूसरे बच्चे जब इन की दांतों की बनावट के बारे में जाने-अनजाने मज़ाक में कभी कोई कमैंट ही मार देते हैं तो ये और भी आहट हो जाते हैं।

यह, क्या ......बात तो कुछ ज़्यादा ही लंबी खिंच रही है। तो, बस इतना ही कह कर आगे चलता हूं कि मेरा अनुभव मुझे यह कहता है कि इस तरह का इलाज करवाना आम बंदे के बस की बात है ही नहीं ---कारण तो बहुत से हैं, अब क्या क्या गिनवायें।

हां, एक बात मैं कहनी भूल गया कि अकसर आम आदमी इन टेढ़े दांतों को सीधा करवाने के चक्कर में भी किसी नकली दंत-चिकित्सक के चक्कर में फंस जाते हैं ----जो केवल हज़ार-डेढ़ हज़ार लेकर दांतों को सीधा करने की गारंटी ले लेते हैं।
यह केवल धोखाधड़ी है ---- इस तरह का इलाज सही ढंग से करना किसी नकली, फुटपाथी डाक्टर के बस की बात है ही नहीं ----- इन को टिश्यूज़ ( oral tissues) के बारे में कुछ भी तो पता होता नहीं -----ये बस धक्के से दांत आगे पीछे करने के लिये कुछ भी फिट कर यह कोशिश छःमहीने तक करते रहते हैं और जब इस के बाद भी कुछ हो नहीं पाता तो मरीज़ खुद ही इन के पास जाना छोड़ देते हैं। और अगर ये जल्दबाजी में दांतों को आगे पीछे सरका ही देते हैं तो भी ये अकसर दांतों को हिला कर ही दम लेते हैं। इसलिये इन के चंगुल फंसने से कहीं ज़्यादा बेहतर है टेढ़े-मेढ़े दांतों का कुछ भी न करवाना, कम से कम स्थिति बद से बदतर तो नहीं होगी।

अब, ज़रूरी बातें ---यह तो सारी भूमिका ही थी ...... तो यह तय है कि ब्रेसेज़ अपने इस देश के आम आदमी की पहुंच के बाहर हैं, तो फिर कम से कम हम लोग इस जनता को इतना तो सचेत कर दें कि वे छोटे छोटे बच्चों का शूरू से ही हर छःमहीने के बाद दंत-निरीक्षण करवा लिया करें।

नियमित निरीक्षण करवाने से यह होता है कि डैंटिस्ट को जहां भी थोड़ी बहुत गड़बड़ होती दिखती है वह तुरंत उसे ठीक ठाक कर के भविष्य में ब्रेसेज़ की ज़रूरत को कम करता जाता है।

अपनी इस बात को समझाने के लिये मैं एक उदाहरण ले रहा हूं। यह 11 वर्ष का लड़का मेरे पास कल आया था। आप देख सकते हैं कि इस के ऊपर वाले सूये ( maxillary canines) कितनी गलत जगह पर निकलने की फ़िराक में हैं। अपने मां-बाप की सजगता से यह बच्चा सही समय पर हमारे पास पहुंच गया।

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आप देख ही रहे हैं कि बच्चे के दाईं तरफ़ वाले पक्के दांत का क्या हाल हो रहा है , इस का मुख्य कारण यह है कि जिस जगह पर इस पक्के दांत ने आना था उस जगह पर तो अभी भी दूध वाला दांत ( milk tooth – deciduous caninc) टिका हुआ है।

वैसे तो आम तौर पर किसी भी पक्के दांत ( permanent tooth) के निकलने से पहले उस की ऊपर टिका हुआ दूध वाला दांत गिर कर नये पक्के दांत का स्वागत करता है लेकिन कुछ केसों में ऐसा भी होता है जो आप इस तस्वीर में देख ही रहे हैं। ज़्यादा जानकारी के लिये इस तस्वीर पर क्लिक करिये जिस से आप जान पायेंगे कि कौन सा दूध का दांत है और कौन सा पक्का दांत है।

हां, तो अगर इस बच्चे के मां-बाप इसे हमारे पास नहीं लेकर आते तो क्या होता ? ---इस की बहुत संभावना थी कि यह जो इस के दाईं तरफ़ पक्का दांत आ रहा है यह गलत जगह पर आ जाता और फिर जब पक्का दांत किसी गलत जगह पर जम चुका होता तो दूध वाला दांत गिरने की सोच लेता -----यानि कि सारा मामला ही गड़बड़ हो जाता। और फिर अगर अभिभावकों की इतनी हैसियत होती तो ब्रेसेज़ के लिये कोई जुगाड़ करना पड़ता।

वैसे जिस अवस्था में यह बच्चा हमारे पास आया है आप यह सुन कर हैरान होंगे कि इस अवस्था में भी कम बच्चे ही हमारे पास आते हैं --- ये अकसर तभी आते हैं जब पक्का दांत किसी गलत जगह पर पूरी तरह सैट हो जाता है, तब तो अकसर ब्रेसेज़ के अलावा कोई विकल्प रहता नहीं है। लेकिन बहुत से केसों में मैंने ऐसा भी देखा है –विशेष कर इसी पक्के सूये ( permanent canine) के संबंध में कि यह बिल्कुल ही अगले दांतों के ऊपर आ बैठता है जिस से बच्चा किसी से बात करने में भी झिझकने लगता है ----- क्योंकि जब ये दांत अपनी जगह पर न होकर किसी अन्य दांत के ऊपर जम जाते हैं तो ये लंबे लंबे दांत बिल्कुल शैतान के दांतों ही जैसे दिखते हैं । और मैंने सैंकड़ों केसों में इस प्रकार के permanent canine( पक्के दांत ) को निकाल दिया ----जिससे कि बच्चे की लुक्स तुरंत बेहतर भी हो गई क्योंकि बाकी के पक्के दांतों में किसी तरह का गैप नहीं था। इस के अलावा इन बच्चों के पास ब्रेसेज़ लगवाने जैसा कोई विकल्प नहीं था ----और इस तरह के केसों में जब कि यह दांत बिलकुल ही किसी दूसरे दांत के बाहर ही जम कर बैठ जाये, तो फिर इसे तो इस की सही जगह दिलवाना तो और भी पेचीदा काम है -----पहले इस के लिये जगह बनाने के लिये किसी दूसरे पक्के दांत को निकालना पड़ता है ---फिर आर्थोडोंटिक्स ट्रीटमैंट के ज़रिये इसे इस की सही जगह पर ला दिया जाता है ---यह इलाज काफ़ी लंबा तो चलता ही है ----स्वाभाविक है कि यह अच्छा खासा महंगा काम भी है क्योंकि इसमें आर्थोडॉंटिस्ट की बहुत मेहनत भी इंवाल्व होती है और जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि उत्तम क्वालिटी के डैंटल-मैटीरियल अच्छे खासे महंगे हैं।

हां, तो मैं अपने 11 साल के मरीज़ पर वापिस आता हूं । इस का इलाज कल ही शुरू कर दिया गया ---कल ही इस का दाईं तरफ़ का दूध वाला केनाइन ( milk canine) निकाल दिया गया है ---- इससे उम्मीद है कि पक्के दांत को अपनी जगह पर आने के लिये एक रास्ता मिलेगा। क्योंकि इस ग्यारह साल की उम्र में इरप्टिव फोर्स ( दांत के जबड़े में अपना स्थान लेनी की प्रक्रिया) बहुत अच्छी होती है , इसलिये दो –एक महीने में हमें रिज़ल्ट दिखने शुरू हो जाते हैं कि पक्का दांत थोड़ा रास्ते पर आ रहा है और अगर इस तरह के केसों में थोड़ी बहुत कसर रह भी जाती है तो अकसर इतनी ऊंच-नीच खुशी खुशी स्वीकार कर ही लेते हैं। लेकिन अगर फिर भी किसी केस में यह ज़रूरत लगती है तो थोडे़ समय के लिये ब्रेसेज़ की सिफारिश भी कर दी जाती है।

और इस बच्चे के मुंह की बाईं तरफ़( फोटो में दाईं तरफ़) का दूध वाला दांत ( deciduous canine) भी एक-दो दिन में निकाल दिया जायेगा।

यह सब कुछ इतना लंबा-चौडा़ केवल इसलिये लिखा कि आप के साथ साथ एक बार मैं भी उस बढ़िया सी अंग्रेज़ी कहावत वाला पाठ दोहरा लूं ----------- a stitch in time saves nine !!
Any comments ?

इस तरह के फिक्स दांतों के भेष में मुसीबत

इस 52 वर्ष के पुरूष ने अपने ऊपर वाला बाईं तरफ़ का दांत निकलवाने के बाद किसी नकली डैंटिस्ट से यह दांत लगवा लिया है। उसे यही कहा गया है कि यह फिक्स दांत है। अब मरीज़ क्या जाने कि फिक्स दांत किस बला का नाम है, उसे तो बस इतना ही बता दिया जाता है कि इस तरह का फिक्स दांत लगवाने से आप इसे उतारने-चढ़ाने के झंझट से बच जाते हैं।
यह फिक्स दांत नहीं होता
(आप इस फोटो पर क्लिक कर के इस के बारे में विस्तृत जानकारी पा सकते हैं)
लेकिन फिक्स दांत के बारे में किसी को बस इतना कह कर ही फुसला लेना ठीक नहीं है। लेकिन वही बात है ना कि यहां ठीक-गलत की परवाह किसे है—कोई इस झंझट में पड़ने को तैयार ही नहीं है। हम लोग ने इतने इतने साल बिता दिये लोगों को सजग करते हुये कि नीम हकीम डाक्टरों के हाथों में मत पड़ा करो, वहां जाने से लेने के देने ही अकसर पड़ते हैं, लेकिन सुनता कौन है। रोज़ाना इस तरह के केस मेरे पास आते रहते हैं।

अब ज़रा यह देखते हैं कि आखिर इस तरह के इलाज से क्या पंगा हो सकता है। एक पंगा हो तो बताएं---इस तरह का फिक्स दांत लगवाना तो बस पंगो का पिटारा ही है। सब से बड़ा पंगा तो यही है कि इस तरह का फिक्स दांत लगवाने से आसपास के स्वस्थ दांतों के भी हिल जाने का पूरा पूरा चांस होता है ।

दरअसल इस तरह के नकली फिक्स दांत को जमाने के लिये यह खुराफ़ाती फुटपाथ मार्का नकली डैंटिस्ट काम ही कुछ इस तरह का कर देते हैं ---- पहले तो यह आसपास के स्वस्थ असली दांतों पर तार लगा देते हैं ---अपने जिस मरीज़ की मैं आप को तस्वीर दिखा हूं उस केस में भी आस पास के स्वस्थ दांतों पर तार तो कसी ही हुई है लेकिन इसे आप देख नहीं पा रहे हैं क्योंकि एक अच्छा खासा कैमरा होते हुये भी मैं फोटोग्राफी के बारे में कुछ भी नहीं जानता हूं ----चलिये, धीरे धीरे सीख ही जाऊंगा -----करत करत अभ्यास के ---!! मरीज़ के दांतों की तस्वीर खींचते वक्त पता नहीं रूम की फ्लोरिंग क्यों ज़्यादा साफ़ दिखती है !! Any tips ?

अच्छा तो आस पास के दांतों पर तार फिक्स करने के बाद फिर इस पर शैल्फ-क्यूरिंग एक्रिलिक ( self-cure acrylic) लगा दिया जाता है जो कि पांच-दस मिनटों में बिल्कुल सख्त हो जाता है -----मरीज़ भी खुश और डाक्टर भी ---- चलो, फिक्स दांत लग गये हैं।

लेकिन यह जो तार मरीज़ के अच्छे खासे सेहतमंद दांतों पर कस दी जाती है यह कुछ ही महीनों में एकदम फिट असली ,दांतों का भी कबाड़ा कर देती है और यह अकसर हिलना शुरू कर देते हैं। और दूसरी बात यह है कि यह जो एक्रिलिक मुंह में लगा कर एक नकली दांत को मुंह में टिका दिया जाता है यह भी बहुत हानिकारक प्रक्रिया है।

आखिर यह मुंह में एक्रिलिक लगा कर नकली दांत को मुंह में सैट करने की प्रक्रिया क्यों ठीक नहीं है, आप शायद सोच रहे होंगे कि नकली दांतों के जो सैट बनते हैं वे भी तो एक्रिलिक के ही होते हैं। बात यह है कि निःसंदेह नकली दांत भी इसी एक्रिलिक से ही बने तो होते हैं लेकिन इस तरह के मैटीरियल को सीधा मुंह में लगाना बहुत हानिकारक होता है और जिस ढंग से इन अनक्वालीफाइड डाक्टरों द्वारा इस एक्रिलिक का सीधा ही मुंह में इस्तेमाल किया जाता है वह बहुत ओरल-कैविटि (मुंह) के टुश्यूज़ के लिये बहुत हानिकारक हो सकता है। इस के पावडर को जिस लिक्विड से मिक्स किया जाता है --- वह अगर सीधा ही मुंह में लगा दिया जाता है तोh उस का मुंह की सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है।
अब इस मरीज़ के इस तरह के फिक्स दांत की बाहरी तस्वीर तो आप देख रहे हैं लेकिन इन के अंदर तालू पर भी यही एक्रिलिक लगा हुआ है----लगा क्या होता है, बुरी तरह से चिपकाया गया होता है।

इस प्रकार के नकली फिक्स दांतों का प्रकोप झेल रहे बहुत से मरीज़ अकसर आते रहते हैं। इस फिक्स दांत के आसपास वाले हिलते दांतों की वजह से तो लोग आते ही हैं । इस के अलावा बहुत से केसों में इस तरह के फिक्स दांत के आसपास के मसूड़े बहुत बुरी तरह फूल जाते हैं और उन में थोड़ा सा ही हाथ लगने से ही रक्त बहने लगता है।

इस तरह के चालू इलाज का सही उपचार करने के लिये पहले तो मरीज़ को तुरंत ही उस फिक्स दांत से निजात दिलाई जाती है जिस की वजह से यह सारा कलेश हुआ। और इसे निकालते ही मरीज़ राहत की सांस लेते हैं और उचित उपचार से अकसर क्षतिग्रस्त मसूड़ों की खोई हुई सेहत लौटने लगती है, लेकिन अकसर इस तरह से हिले हुये दांतों का कुछ कर पाना संभव नहीं होता।

मैं अकसर समझता हूं कि मीडिया के द्वारा ये बातें क्यों आम लोगों तक नहीं पहुंचाई जातीं। इसी वजह से आम बंदा इस तरह के बिल्कुल बेवकूफ़ी से भरे इलाज का शिकार बनता रहता है। लेकिन फिर भी लोग पता नहीं क्यों नहीं समझते।

सोमवार, 18 मई 2009

काले पड़ चुके इस डैड दांत का क्या होगा ?

आप ने अकसर सुना ही होगा कि दांत अकसर डैड भी हो जाते हैं ----दांत का मर जाना !! इस तस्वीर में आप एक 40 वर्षीय महिला की तस्वीर देख रहे हैं जिस का ऊपर वाला आगे का दांत ( maxillary central incisor – मैग्ज़िल्यरी सैंट्रल इन्साईज़र) डैड हो गया है।

डैड दांत ??

यह महिला मेरे पास आज किसी दूसरे दांत के इलाज के संबंध में आई थीं। मैंने ही उन से पूछा कि इस अगले दांत को क्या हो गया, यह काला कब से पड़ गया ?

इस महिला ने बताया कि जब यह 10-12 वर्ष की थी तो वह सीढ़ियों से गिर गई थीं जिस की वजह से अगले दांत पर चोट लगी थी। दांत कुछ दिन दर्द हुआ और बाद में कुछ वर्षों में यह अपने आप काला सा पड़ गया है।
तो आज इस तरह के दांतों के बारे में ही चर्चा कर लेते हैं।

दरअसल बात यूं है कि बचपन की जिस उम्र(7-8 वर्ष) में ऊपर वाला यह दांत आता है वह उम्र बच्चों की फुल मस्ती की उम्र होती है। इसलिये अगले कुछ वर्षों में इस अगले दांत पर चोट लगने की काफी संभावना होती है। चोट लगती है ---दांत में थोडा़ दर्द होता है, बच्चे को कोई भी दर्द की टेबलेट दे दी जाती है।

लेकिन अकसर कुछ वर्षों में वह दांत जिस पर चोट लगी थी काला सा पड़ जाता है जैसा कि आप इस महिला का दांत यहां पर देख रहे हैं। और फिर कईं कईं वर्ष बस यूं ही निकल जाते हैं ----अब इसी महिला का ही केस देखिये—इसे पिछले 30 वर्षों से यह तकलीफ़ है। लेकिन फिर भी बस यूं ही कभी इस के बारे में इस ने किसी से बात ही नहीं की।

यह भी नहीं कि इस दांत में कभी कोई तकलीफ़ न हुई हो, महिला बता रही थीं कि दांत की जड़ के पास से अकसर कभी कभी पस सी निकलनी शुरू हो जाती थी। लेकिन वह बता रही थीं कि अब कुछ समय से उस को इस की कोई परेशानी नहीं है। आप यह नोटिस करें कि 40 वर्ष की महिला हैं, आगे वाले दांत का रंग किस कद्र काला पड़ा हुया है लेकिन इन्हें इस से कोई परेशानी नहीं है।

थोड़ी चर्चा करते हैं इस के इलाज के बारे में। मैडीकल भाषा में ऐसे दांत को कहते हैं कि यह नॉन-वाइटल हो चुका है। इस तरह के दांत को डैड (मरा हुआ ) कहना ठीक नहीं है ----क्योंकि यह ठीक है कि दांत की नस ( Dental pulp) नष्ट हो चुकी है लेकिन फिर भी दांत जीता-जागता जबड़े की हड्डी में अच्छी तरह से सैट है।

हां, तो ऐसे दांत अकसर रूट-क्नॉल ट्रीटमैंट से ठीक हो जाते हैं, पस-वस निकलनी बंद हो जाती है और उस के बाद इस तरह के काले रंग के दांत के ऊपर एक कैप लगा दी जाती है जिसे जैकेट-क्राउन कहते हैं।

जैकेट क्रॉउन

लेकिन जैसा कि मैं बार बार आगाह करता रहता हूं कि यह सारा काम करवाया केवल किसी प्रशिक्षित डैंटिस्ट से ही जाए।

जैकेट क्रॉउन --- अपनी जगह पर

हां, एक बात का जवाब देना तो मैं भूल ही गया कि आखिर यह दांत काला क्यों पड़ गया ---- इस का कारण यह है कि जब दांत पर चोट लगती है तो उस के इम्पैक्ट से दांत के अंदर रक्त-स्राव होने से यह रक्त दांत की डैंटीन परत ( because of impact of trauma, blood enters the dentinal tubules of the dentin ----this causes blackening of teeth with passage of time) में चला जाता है जो कि बाद में फिर हमें काले दांत के रूप में नज़र आता है। ( इस पोस्ट में दी गई किसी भी फोटो के बारे में ज़्यादा जानकारी के लिये उस पर आप को क्लिक करना होगा )

डैड दांत ??

अभी इस महिला का भी डैंटल एक्स-रे हुआ नही है लेकिन लगता है कि यह केवल रूट-क्नॉल-ट्रीटमैंट से ही ठीक हो जायेगी –इस में और कुछ लंबी चौड़ी सर्जरी करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

फिर किसी दिन आगे के दांत की चोट के दूसरे पहलूओं पर भी चर्चा करेंगे। यह तो नहीं कि हर बार चोट लगे और दांत बिल्कुल भी न टूटे। अकसर इस तरह की चोट से दांत टूट जाते हैं और फिर उस का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितना टूटा है और उस का कितना भाग बच गया है। किसी दिन इस के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

शनिवार, 16 मई 2009

दांतों को जब मसूड़े छोड़ देते हैं

ये भी एक बहुत ही आम सी समस्या है। इस का सब से आम कारण है ---मसूड़ों की सूजन । इस मसूड़ों की सूजन का सब से आम कारण है –दांतों पर टारटर का जम जाना ---जिसे अंग्रेज़ी में हम लोग डैंटल कैलकुलस कह देते हैं।

इस तस्वीर में आप देख रहे हैं कि इस लगभग 50 वर्ष की महिला में कितनी बुरी तरह से नीचे के आगे वाले दांतों को मसूड़े ने छोड़ दिया है। और यह सब हुआ इस टारटर ( दांत पर जमा मैल का पत्थर ) की वजह से ---जैसे जैसे यह बढ़ता वैसे वैसे यह मसूड़े में सूजन के साथ साथ उसे दांत से अलग भी करता गया।
अब इस का इलाज क्या है ? यह तो तय है कि इस सारी प्रक्रिया में दांत की नीवं कमज़ोर पड़ जाती है और अकसर यह हिलना भी शुरू कर देता है। इस का इलाज इस बात पर निर्भर है कि दांत से मसूड़ा किस कद्र अलग हो चुका है ---हां, दांतों से मसूड़े के अलग होने की अवस्था को मैडीकल भाषा में कहते हैं ----जिंजिवल रिशैशन ( gingival recession).

वैसे छोटी उम्र में अगर किसी एक-दो दांतों में ही यह समस्या है तो इस टारटर को हटाने के साथ साथ एक सर्जरी जिसे जिंजिवल ग्राफ्टिंग ( gingival graft) कहते हैं इस से इस समस्या का हल निकाला जाता है। लेकिन इस तरह के इलाज को केवल प्रशिक्षित पैरियोडोंटिस्ट ( मसूड़ों के रोग के विशेषज्ञ ---जिन्होंने इस विषय में एमडीएस की होती है) से ही करवाना बेहतर होता है।

कुछ और भी कारण हैं जिस की वजह से मसूड़े दांत से पीछे हट जाते हैं –इन में से एक दो की और चर्चा करते हैं। एक और महत्वपूर्ण कारण है ---- दांतों पर गलत तरीके से ब्रुश अथवा दातुन का इस्तेमाल करना ----और इस साफ़-सफाई को इतने जोशो-खरोश से करते रहना कि आस पास का मसूड़े दांत से पीछे हट जाने में ही अपनी सलामती समझने लगते हैं। इस टॉपिक पर किसी दिन विस्तार से चर्चा करेंगे।

गुरुवार, 14 मई 2009

अब मुंह पूरा न खोल पाने का यह क्या लफड़ा है !

कुछ लोगों का मुंह पूरा नहीं खुल पाता ---लेकिन कईं बार लोगों को इस का आभास ही नहीं होता जब तक कि वे किसी दिन पानी-पूरी (गोलगप्पा) मुंह में डाल नहीं पाते। ऐसे बहुत से मरीज़ आते हैं जो बताते हैं कि पहले तो उन्हें पानी-पूरी खाने में कभी दिक्कत आई ही नहीं, लेकिन अब गोलगप्पा उन के मुंह में जाता ही नहीं।

चलिये, आज आप सब के साथ इसी समस्या से संबंधित अपने अनुभव साझे करते हैं। दरअसल मुझे इस का ख्याल आज सुबह आया जब कि मेरा यह मरीज़ मेरे पास आया --- इस के मुंह की तस्वीर आप यहां देख रहे हैं।
मुंह इतना कम क्यों खुल रहा है ? by Dr Parveen Chopra, on Flickr"><span title=मुंह इतना कम क्यों खुल रहा है ?"

इस तस्वीर में आप देख रहे हैं कि इस का मुंह कितना कम खुल रहा है। इन की उम्र 52 वर्ष की है और यह मुंह पूरा न खुलने की तकलीफ़ इन को पिछले लगभग तीन साल से है । इस का इन्होंने जगह जगह से खूब इलाज करवाया लेकिन इन्हें जब कोई फ़र्क महसूस नहीं हुआ तो ये चुप कर के बैठ गये। आज भी यह मेरे पास इस तकलीफ़ के साथ नहीं आये कि इन का मुंह पूरा नहीं खुल रहा --- मुझे लगता है कि यह अब इस के ठीक होने की उम्मीद छोड़ ही बैठे थे। मेरे पास तो यह केवल यह शिकायत लेकर आये थे कि एक दाढ़ में ठंडा-गर्म लगता है।

अगर आप ने इस ऊपर वाली फोटो में नोटिस किया होगा कि जब यह बंदा मुंह खोलने की कोशिश करता है तो उस का नीचे वाला जबड़ा उस की दाईं तरफ़ सरक जाता है। उसे तकलीफ़ भी दाईं तरफ़ के टैम्पोरोमैंडीबुलर ज्वांइट ( Temporomandibular joint) में ही है ।

अब देखते हैं कि इस का क्या कारण है ? --- अकसर इस तरह की समस्या का सब सेआम कारण होता है ---- जबड़े पर चोट का लगना जिस से कान के ठीक नीचे जो ज्वाईंट होता है उस में सूजन आ जाती है --- और कईं बार इस के आसपास हड्डी भी टूटने से यह समस्या हो जाती है। लेकिन अगर तुरंत स्पैशलिस्ट डैंटिस्ट से इस का इलाज करवा लिया जाये तो यह समस्या का समाधान हो जाता है।

लेकिन इस मरीज़ जिस का तस्वीर आपने ऊपर देखी है उसे इस बात का भी बिल्कुल कोई आभास नहीं है कि उसे कभी कोई चोट भी लगी हो। वह मुंह पर किसी भी तरह की चोट वगैरा लगने की बात से भी इंकार कर रहा है।

और न ही वह किसी तरह के पानमसाला या गुटखे खाने का कोई शौक ही रखता है –उस ने कभी भी इन चीज़ों का सेवन नहीं किया है। दरअसल जैसा कि आप जानते ही होंगे कि जो लोग पान-मसाला गुटखा आदि चबाने का शौक पाले रखते हैं उन में सबम्यूक्सफाईब्रोसिस नामक की एक तकलीफ़ हो जाती है जिस में मुंह के अंदर की चमड़ी बिल्कुल चमड़े जैसी हो जाती है और मुंह धीरे धीरे खुलना बंद हो जाता है। इस अवस्था से जूझ रहे 15 से 20 साल आयुवर्ग के बहुत से युवकों को मैंने पिछले कुछ वर्षों में देखा है जिन का मुंह इतना भी नहीं खुल पाता कि वे किसी तरह के ठोस खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकें ।

वैसे आप इस नीचे वाली तस्वीर में यह देख रहे हैं कि इस बंदे का भी बुरा हाल है –एक अंगुली भी उस के मुंह में नहीं जा रही। आज से लगभग दस साल पहले मैंने लगभग एक हजा़र लोगों के मुंह खोलने के पैटर्न पर एक रिसर्च स्टडी की थी जिसे एक नैशनल कांफ्रैंस में प्रस्तुत किया था।
एक अंगुली तक तो मुंह में जा नहीं रही !

इस मुंह पूरा न खुलने को मैडीकल भाषा में ट्रिस्मिस ( trismus) कहते हैं। और इस के मुख्य कारण तो मैंने गिनवा ही दिये हैं लेकिन कईं बार यह तकलीफ़ मरीज़ों को दांत उखड़वाने के बाद कुछ दिन तक परेशान करती है। इस के लिये कुछ खास करने की ज़रूरत होती नहीं ---- बस, एक-आध यूं ही छोटी मोटी दवाई और गर्म पानी से मुंह की सिकाई और नमक वाले गर्म पानी से कुल्ले करने से यह मामला चंद दिनों में सुलट जाता है। लेकिन इस के लिये लोगों को तसल्ली देने की ज़रूरत होती है कि चिंता की कोई बात नहीं, सब कुछ ठीक है , बस थोड़े दिनों में मुंह पूरा खुल जायेगा। और हां, कईं बार हम कुछ दिनों के लिये मरीज़ को चऊंईंगम चबाने के लिये कह देते हैं जिस से कि जबड़ों की कसरत हो जाती है।

हां, लेकिन जब इस तरह की समस्या जबड़े पर चोट लगने से होती है और यह अगर लंबे अरसे से परेशान कर रही हो तो इस का पूरा उपचार करवाना ज़रूरी होता है। नीच वाले जबाड़े का एक्स-रे, ओपीजी एक्सरे आदि करवा के यह जानने की कोशिश की जाती है इस मुंह पूरा न खुल पाने की तकलीफ़ के पीछे आखिर कारण क्या है और फिर ज़रूरत पड़ने पर सर्जरी के द्वारा इस का इलाज किया जाता है जिस के बाद मरीज़ का मुंह अच्छी तरह से खुलना शुरू हो जाता है।

मैं अपने आज वाले अपने मरीज़ की सहनशीलता से बहुत हैरान होने के साथ ही साथ परेशान भी हूं --- किस तरह से बंदा किसी शारीरिक तकलीफ़ को विधि का विधान मान कर चुपचाप सहने लगता है। उस का मुंह इतना कम खुलता है कि एक अंगुली भी मुंह में जा नहीं पाती । मैंने खाने-पीने के बारे में पूछा तो उस ने बताया की धीरे धीरे से बस जैसे तैसे खा ही लेता है। इस तरह से अगर मुंह कम खुल रहा है तो मुंह के सारे स्वास्थ्य पर ही इस का बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि इस की वजह से दांतों की एवं जुबान की बिल्कुल भी सफ़ाई ही नहीं हो पाती है।

आज जो मेरे पास मरीज़ आया था उस के उपचार की पूरी व्यवस्था कर दी गई है।

शायद इतने भारी-भरकम लेख से आप को भी मुंह कम खुलने वाले विषय का थोड़ा बहुत आइडिया तो हो ही गया होगा।

ये भी लेख देखिएगा... (संबंधित लेख)

चमड़ी को चमड़ा बनने से पहले पानमसाले को तो अभी से थूकना होगा 
मुंह न खोल पाना एक गंभीर समस्या- ऐसे भी और वैसे भी 
पान मसाला न जीने दे न मरने दे 
पान मसाला छोड़ने के १५ वर्ष बाद भी ..

बुधवार, 13 मई 2009

बेहद आसान है मसूड़ों की सूजन का उपचार

मसूड़ों की सूजन एक बहुत ही आम समस्या है जिस का उपचार अगर समय पर हो जाये तो बहुत ही सुगम है। इसलिये कभी भी ब्रुश करते समय अगर रक्त आये या मसूड़ों पर हाथ लगने से भी रक्त निकले तो तुरंत किसी दंत-चिकित्सक से अपना निरीक्षण करवायें।

यह तस्वीर एक 30 साल के युवक की है जिस की समस्या यह है कि ब्रुश करते वक्त इस के मसूड़ों से रक्त निकलता है। इस के नीचे के आगे के दांतों के मसूड़ों की तरफ़ देखिये कि इन में सूजन आई हुई है । देखने में भी ये सामान्य नहीं लगते। इस मसूड़ों की अवस्था को जिंजीवाईटिस (gingivitis) कहते हैं। DSC02692

मसूड़ों की इस अवस्था के लिये सब से महत्वपूर्ण कारण है ---दांतों की ढंग से सफ़ाई न हो पाना। इस से जब दांतों एवं इन के आसपास मैल की परत ( Dental plaque and Dental Calculus) जमा हो जाता है तो यह मसूड़ों की सूजन पैदा कर देता है।

लेकिन खुशी की बात यह है कि यह जो जिंजीवाईटिस की यह वाली अवस्था है ना यह पूरी तरह उपचार से ठीक हो जाती है। इस का उपचार बहुत ही सुगम है। अकसर इस अवस्था के लिये केवल दंत-चिकित्सक से स्केलिंग ( दांतों पर जमे टारटर को उतरवाना) करवानी होती है ---यह या तो अल्ट्रासॉनिक स्केलर से कर दी जाती है या फिर हैंड-इंस्ट्रयूमैंट्स ( scaling hand instruments) से इस ट्रीटमैंट को पूर्ण कर दिया जाता है। और अकसर दो –एक बार डैंटिस्ट के पास जाने से यह तकलीफ़ ठीक हो जाती है और मसूड़ों अपनी सामान्य शेप में एक हफ्ते में आ जाते हैं।

लेकिन ध्यान रहे कि इस तरह का इलाज करवाने के लिये भी लोगों के मन में बहुत सी भ्रांतियां हैं ----बार बार मरीज़ों के मुंह से यह सुनते थक गये हैं कि इस से दांत कमज़ोर तो नहीं हो जायेंगे क्योंकि उन की पड़ोस वाली मौसी ने उन के मन में यह भर दिया है कि इस से दांत ढीले हो जाते हैं। नहीं, यार, ऐसा सोचना बिल्कुल बेबुनियाद है।

अच्छा तो आप इस तस्वीर में देखें कि इसी मरीज़ के ऊपर वाले मसूड़ों में भी सूजन तो है लेकिन नीचे वाले मसूड़ों की अपेक्षा कम है। DSC02695

अगर आप ने नोटिस किया हो कि इस मरीज़ के मसूड़े कुछ काले से हैं। यह तो अच्छा है कि इस मरीज़ को इस से कोई सरोकार नहीं था ---वरना, बहुत से मरीज़ तो इस को भी एक बीमारी ही समझ लेते हैं। लेकिन यह कोई बीमारी-वीमारी नहीं है ---यह केवल मसूड़ों के रंग की बात है ----जैसा हम सब लोगों का रंग अपना अपना है वैसा ही मसूड़ों का रंग भी भिन्न भिन्न हो सकता है और यह सब मैलॉनिन पिगमैंट (melanin pigment) का कमाल है ---किसी में ज़्यादा किसी में कम। लेकिन अगर कोई मसूड़ों के इस काले रंग से भी परेशान है तो इस का भी इलाज है जिस की चर्चा फिर कभी कर लेंगे।

दांतों में स्पेस --- परेशानी का सबब ....

यह फोटो एक 35 वर्षीय महिला की है जो कि आज मेरे पास इस शिकायत के साथ आई थी कि उस के दांत में टीस सी उठती है। यह जो आप इस महिला के ऊपर व नीचे के अगले दांतों के बीच में बढ़ा हुआ स्पेस देख रहे हैं इस के बारे में यह महिला कुछ ज़्यादा जागरूक नहीं है। यह दांतों में गैप कहां से आ गया ? by Dr Parveen Chopra, on Flickr"><span title=यह दांतों में गैप कहां से आ गया ?" width="240" height="180"> इस फोटो के बारे में और जानकारी के लिये इस पर क्लिक करिये।

कुछ मरीज़ अकसर आते ही इस शिकायत के साथ हैं कि उन के दांत पहले तो भले-चंगे थे लेकिन कुछ महीनों से ही उन्होंने नोटिस किया है कि दांतों में गैप आ गया है, उन में स्पेस पैदा हो गया है। अब ज़रा यह देखते हैं कि अकसर यह गैप आ क्यों जाता है ?

इस तरह का गैप जो कि आप इस महिला के दांतों की तस्वीर में देख रहे हैं इस का सब से आम कारण है --- मसूड़ों का पायरिया रोग। दरअसल होता यूं है कि जब पायरिया रोग मसूड़ों के अंदर जबड़े की हड्डी की तरफ़ अपना रूख करता है तो इस के प्रभाव से वह हड्डी धीरे धीरे नष्ट होने लगती है। इस के कारण दांत अपनी जगह से हिल-ढुल जाते हैं और इन में ऐसी स्पेस दिखने लगती है जो कि पहले नहीं थी।

मैंने यह समस्या पुरूषों की बजाये महिलायों में ज़्यादा देखी है और अधिकतर महिलायें जो इस समस्या के कारण डैंटिस्ट के पास आती हैं उन की उम्र 30-40 वर्ष के करीब होती है। मेरा तो यही अनुभव है।( इस के पीछे यही बात हो सकती है कि महिलायें पुरूषों की अपेक्षा अपनी लुक्स के प्रति ज़्यादा सचेत होती हैं ? –क्या आप मेरे से सहमत हैं ?) …… इस का यह मतलब भी नहीं कि इस उम्र के बाद यह गैप-वैप सब अपने आप बंद हो जाता है लेकिन इस उम्र के बाद मैंने देखा है कि देश की औसत महिलायें अपनी शारीरिक तकलीफ़ों के प्रति इतनी ज़्यादा उदासीन सी हो जाती हैं कि उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता। उन्हें बार बार इस तरह की तकलीफ़ों के बारे में आगाह करना पड़ता है कि यह केवल दांतों एवं मसूड़ों की सेहत की ही बात नहीं है, इस का प्रभाव सामान्य स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

तो कैसे हो इस तरह के गैप का इलाज ? ---सब से पहले तो यह देसी फंडा ध्यान में रखिये कि छः महीने के बाद बिना किसी तकलीफ़ के भी डैंटिस्ट को अपने दांत दिखा लिया करें। और यह भी ध्यान रखें कि जैसे ही कोई भी इस तरह का अजीब सा गैप आप को किसी भी दो दांतों के बीच दिखे तो तुरंत डैंटिस्ट से संपर्क करें। जितना जल्दी इस का इलाज हो उतना ही ठीक है।

ज़्यादा गैप हो जाने पर इस गैप को खत्म करना न ही तो डैंटिस्ट के लिये इतना आसान होता है और न ही अकसर मरीज़ ( क्या हुआ अगर एक-दो फीसदी मरीज़ इस का इलाज पूरा करवा पाते हैं ----मैं तो मैजोरिटि की बात कर रहा हूं) के बस में ही होता है कि वह इस तरह के इलाज को विभिन्न कारणों की वजह से किसी मसूड़ों के रोग-विशेषज्ञ से पूरा ही करवा पाये।

अकसर जब पायरिया रोग की वजह से इस तरह की स्पेस कुछ दांतों के बीच बन जाती है तो कुछेक दांत थोड़ा या बहुत हिलना भी शुरू हो जाते हैं। तो, फिर अकसर देखता हूं कि ऐसे मौकों पर झोला-छाप डैंटिस्ट खूब चांदी कूटते हैं। वे कुछ भी कह कर मरीज़ को चक्कर में डाल देते हैं कि यह मसाला, वह सीमेंट पैक करने से दांतों के बीच वाली जगह भर भी जायेगी और इन का हिलना-ढुलना भी बंद हो जायेगा।

लेकिन इस तरह के फुटपाथिया इलाज के कुछ लाभ तो होता नहीं , हां हानि ज़रूर हो जाती है। क्योंकि जिन दांतों पर वे अकसर तार सी लपेट पर उस के ऊपर एक्रीलिक आदि लगा देते हैं, यह मसूड़ों की को धज्जियां उड़ा ही देता है, आसपास वाले दो-चार सेहतमंद दांतों को भी ले डूबता है । लेकिन चार-छः महीने जब तक यह सब प्रकट होता नहीं, ये मरीज़ उस नीम-हकीम डैंटिस्ट के नाम की माला रटते हैं। यकीनन, इस तरह के नीम-हकीम जो कि हर शहर में फैले हुये हैं, लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ ही कर रहे हैं।

वैसे अगर इस तरह के गैप के लिये मसूड़ों का पूरा इलाज करवाने के बाद अगर गैप को एक फिलिंग मैटीरियल – लाइट क्योर कंपोज़िट से दूरूस्त करवा लिया जाता है तो बात बन जाती है।

थोड़ा बहुत तो आप इस फोटो में भी देख ही रहे हैं कि इस महिला के दांतों में स्पेस तो है ही , इस के साथ ही साथ मसूड़ों में सूजन भी है जिस से मैंने पस एवं रक्त आते देखा। लेकिन ध्यान रखने योग्य बात यह है कि कईं बार ऐसे मरीज़ भी आते हैं जिन में न तो मरीज़ को देखने में मसूड़ों की सूजन ही दिखती है और न ही उसे और कोई शिकायत ही होती है, केवल वह हमारे पास यही शिकायत लेकर आती है कि आगे के इन दांतों में पहले तो गैप था नहीं, लेकिन अब इन में जगह बन गई है। हमें उस की एक बात से ही इस तरह की बीमारी का अंदेशा हो जाता है जिसे हम लोग एक्स-रे एवं अन्य परीक्षण से कंफर्म कर लेते हैं।

इस तरह के दांत जिन में स्पेस हो जाता है इन के अंदरूनी हड्ड़ी कईं बार इतनी नष्ट सी हो जाती है कि ये लटक से जाते हैं जैसा कि आप इस तस्वीर से देख रहे हैं।यह आगे वाला दांत कैसे नीचे लटक गया ? by Dr Parveen Chopra, on Flickr"><span title=यह आगे वाला दांत कैसे नीचे लटक गया ? " width="240" height="180"> इस फोटो के बारे में कुछ और जानकारी के लिये इस पर क्लिक करिये।

तो इस सारी बात से हम यही सीख लें कि दांतों के बीच कभी भी स्पेस बनता दिखे तो तुरंत डैंटिस्ट से बात करें ---- क्योंकि यह अकसर पायरिया रोग का एक लक्षण होता है। और बिना डैंटिस्ट से अपना इलाज करवाये यह गैप बढ़ता ही जाता है।

जाते जाते एक भ्रांति पंजाब की ----जितना गैप जिस के दांतों में होता है वह उतना ही धनी होता है ----इतना ही नहीं, यह तो हुआ वह गैप जो कि कुछ लोगों के दांतों में बचपन से ही होता है। लेकिन अकसर यह भी देखता-सुनता रहा हूं कि जब कोई महिला किसी दूसरी से अपने दांतों में पड़ने वाली विरल ( गैप के लिये पंजाबी शब्द) के बारे में बात करती है तो अकसर उसे जवाब मिलता है ----अब तेरे पास हो गया है खूब पैसा, इसलिये दांतों में विरल तो शुभ बात है ---और इस के बात छूटे हंसी के फव्वारों के शोर में असली मुद्दा कुछ समय के लिये दब ज़रूर जाता है।

रविवार, 10 मई 2009

कब लगवायें ब्रेसेज़ बच्चों के ऊबड़-खाबड़ दांतों के लिये ?

अकसर हम से यह प्रश्न बहुत बार पूछा जाता है कि किस उम्र में बच्चे के दांतों पर ब्रेसेज़ लगवाई जायें। इस का सीधा सीधा जवाब है कि सब से पहले तो आप इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे को बिना किसी तकलीफ़ के भी किसी प्रशिक्षित दंत-चिकित्सक के पास छः महीने के बाद अवश्य चैक-अप के लिये ले कर जाने की आदत डाल लें।

इस नियमित चैक-अप का यह फायदा होगा कि शायद इस ब्रेसेज़ की ज़रूरत ही न पडे़ क्योंकि जो भी ज़रूरी इलाज होगा अगर दंत-चिकित्सक ठीक समय पर ही करता रहेगा तो फिर बहुत से केसों में ब्रेसेज़ से बचा जा सकता है और अगर ब्रेसेज़ लगवाने की नौबत आती भी है तो बहुत कम समय में ही यह ऊंचे, ऊबड़-खाबड़ दांतों की समस्या हल सी होने लगती है।

अब इस 12 वर्ष की बच्ची के दांतों की कुछ तस्वीरें देखते हैं जिन ने द्वारा बस आप को यह छोटा सा ट्रेलर सा दिखाने की कोशिश की जा रही है कि बच्चों का नियमित दंत-निरीक्षण करवाना कितना ज़रूरी है। और ज़रूरत पड़ने पर दंत-चिकित्सक एक ओ.पी.जी एक्स-रे की भी सलाह देता है जिस में सभी दांत एक ही एक्स-रे में देख लिये जाते हैं।

ये तस्वीरें मैंने अपनी फ्लिकर फोटोस्ट्रीम से डाली हैं। कृपया नोट करें कि ये जो नीचे तस्वीरें दी गई हैं इन का विवरण पढ़ने के लिये आप को इन पर बारी बारी से क्लिक करना होगा और फिर उस फोटो पर कर्सर लेकर जाने से जो बाक्स दिखेंगे उन पर कर्सर लेकर जाने से आप कुछ विशेष जानकारी (नोट्स) भी देख पायेंगे। बतलाईयेगा, कैसा लगा इस तरह से फोटो एवं उस से संबंधित जानकारी को पढ़ना !

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( इन सभी फोटो पर बारी बारी से क्लिक करना होगा---विस्तृत जानकारी के लिये)

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अगर अभी भी किसी के मन में यही विचार है कि बच्चा 12 वर्ष का होने दें तब ही दंत-चिकित्सक के पास जा कर ब्रेसेज़ का पता कर लेंगे, यह केवल भ्रम मात्र है । इस से बेवजह टेढ़े-मेढ़े दांतों का इलाज पेचीदा हो सकता है।

शनिवार, 9 मई 2009

बच्चों के इन एक्स्ट्रा दांतों का झंझट







कईं बार बच्चों में एक्स्ट्रा दांत आ जाते हैं। आप इस 12 वर्ष की बच्ची के ऊपर वाले दांतों की तस्वीर में देख रहे हैं कि उस के ऊपर के सामने वाले दांतों ( इंसाईज़र्ज़) के पीछे एक प्वाईंटेड सा दांत दिख रहा है ।

ये एक्स्ट्रा दांत मुंह के दो-तीन एरिया में अकसर उग आते हैं --- जब इस तरह के दांत ऊपर वाले आगे के दांतों के बीच में उग आते हैं तो इन्हें मिज़ियोडैंस ( mesiodens) कहा जाता है और जब ये ऊपरी की अकल दाढ़ के पीछे या उस की साइड में आ धमकते हैं तो इन्हें पैरामोलर्ज़ ( Paramolars, Supernumerary molars) कह देते हैं। एक एरिया है नीचे के जबड़े का प्री-मोलर एरिया ( दाढ़ों से पहले जो दो छोटी दाढ़ें होती हैं उन्हें प्री-मोलर्ज़ कहा जाता है) जिस में भी यह एक्स्ट्रा कभी दिख जाते हैं।

इन के बारे में थोड़ी विस्तार से बात करते हैं। जो एक्स्ट्रा दांत ऊपर वाले जबड़े के आगे के दांतों के बीचों बीच उग आते हैं उन्हें तो जितनी जल्दी हो उखड़वा लेना चाहिये। डैंटिस्ट को पता रहता है कि कौन सा दांत एक्स्ट्रा है , इसलिये इस के बारे में आप आश्वस्त रहें। ऊपर के जबड़े में आगे के दांतों के बीचो बीच उग आये एक्स्ट्रा दांत को इसलिये उखड़वाना ज़रूरी होता है क्योंकि एक तो यह इस जगह में पड़ा होने की वजह से देखने में बहुत बुरा सा दिखता है और शायद उस से भी बड़ा कारण उस को उखड़वाने का यह होता है कि अगर यह इस जगह पर जम जाता है तो यह दूसरे दांतों की एलाईनमैंट को खराब कर देता है। जब दांतों के मुंह में उगने के लिये जगह ही पूरी न पडेगी तो वे कहीं भी इधर उधर निकलने लगते हैं। इसलिये भी इस तरह के एक्स्ट्रा दांतों को जैसे ही ये उगे दंत-चिकित्सक के परामर्श अनुसार उखड़वा लेना चाहिये।

12 वर्ष की बच्ची में आप देख रहे हैं कि यह दांत ऊपर के आगे के दांतों के बीचों-बीच न आकर अंदर तालू पर निकल आया है । अब इस का क्या करें ? इस दांत को निकले तो दो-तीन साल हो चुके हैं लेकिन यह बच्ची अपने मां-बाप के साथ मेरे पास कुछ दिन पहले आई थी ---जिसे मैंने इस दांत को उखड़वाने की सलाह दी थी --- क्योंकि इस दांत की वजह से अब उसे बोलने में तकलीफ़ आने लगी है और उसे अजीब सा लगने लगा है। ये तो थे उस बच्ची या उस के मां-बाप के बताये कारण ----लेकिन डैंटिस्ट का इसे उखडवाने की सलाह देने का एक कारण यह भी होता है कि अगर यह एक्स्ट्रा दांत यूं ही मुंह में टिका रहेगा तो इस से आसपास के बाकी नार्मल दांतों की साफ़ सफ़ाई ठीक ढंग से नहीं हो पाती जिस की वजह से उन दांतों में तरह तरह की बीमारियां ---दंत क्षय एवं मसूड़ों की सूजन--- होने की संभावना बढ़ जाती हैं।

सो, आज इस बच्ची का भी दांत निकाल ही दिया गया ---इस की तस्वीर आप यहां देख रहे हैं।
और इस तरह के एक्स्ट्रा दांत जब ये ऊपर वाली दाढ़ के पीछे या साइड में उग आती हैं तो भी इन के वहां पड़े होने की वजह से इन की एवं इन के साथ पड़े सामान्य दांतों की सफ़ाई ढंग से न हो पाने की वजह से दंत-क्षय होने के चांस बहुत ज़्यादा बढ़ जाते हैं जिस की वजह से कई बार इस एक्स्ट्रा दांत के साथ साथ इस के साथ पड़ी अकल की दाढ़ को भी उखड़वाना पड़ता है।

तो इस सारी स्टोरी से यही शिक्षा मिलती है कि जब भी मुंह में एक्स्ट्रा दांत दिखें तो अपने दंत-चिकित्सक से मिल कर उस की सलाह अनुसार अकसर इन्हें उखडवा लेने में ही समझदारी है । अगर इस तरह के दांत को न उखड़वाने का कोई विशेष कारण होगा तो वह आप का डैंटिस्ट आप को बता ही देगा।