मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025

क्यों निकल आईयां हड़बां....

 हड़बां 


पंजाबी भाषा दा इक पुट्ठा लफ़्ज़ हड़ब, 

पुट्ठा ही तो हुआ अगर यह किसी को परेशान कर दे, 

जबड़े की कहें या गाल की हड़्डी उसे कहते हैं हड़ब…

दोनों तरफ़ की जब हो बात तो हड़ब से बन गया हड़बां…

किसी के गाल जब जाएं पिचक 

ज़ाहिर है चेहरे पर जैसे नज़र पड़ती है सिर्फ़ दिखती हैं…

जबड़े की हड्डीयां …

और इसे पंजाबी अपने शटल्ली अंदाज़ में फरमाते हैं..

हड़बां निकल आईयां ने उस दीयां…..


युवावस्था की दहलीज़ पर अकसर लड़कों की निकली ही दिखती थीं हड़बें

फिर सुनना पड़ता जने-खने से, सवालों से भरी उन की आंखों से, 

मां-बापू, दादी, नानी, बुआ से …

क्यों निकल गई हैं हड़बें तुम्हारी…..कुछ करो…। 


शारीरिक बदलाव, मानसिक उथल-पुथल, 

अपने ही में सिमटे, सकुचाते, सुनहरी सपने उधड़ने-बुनने की कच्ची उम्र  

हारमोन लोचे से, काल्पनिक बीमारियों से जूझता…

क्या ही कर लेता इस का लेकिन 

बार बार ये हड़बां-हड़बां सुन 

काका और भी रहने लगता परेशान ….

कुदरत का प्यारा निज़ाम देखिए….

अगले दो चार बरसों में गालें भी भर जातीं और शरीर भी ….


खैर, हर पिचके हुए गालों की दास्तां जुदा है …

स्कूल-कॉलेज वाले लड़कों की बात हो गई ….

फिर हम लगे देखने …बड़े बड़े खिलाड़ीयों को भी, 

टॉप माडल, हॉलीवुड स्टार भी …

हड़बें उन की भी निकली दिखतीं…


ज़िंदगी के सफ़र में फिर आगे देखा 

डाईटिंग, फैशन, स्टाईल के दीवाने 

जब चाहते हड़बां निकाल लेते 

जब चाहते भर लेते उन पिचके गालों को …

ज़रूरत पड़ने पर भरवा भी लेते फिल्लर से ….

पैसे वालों के लिए दिखा यह एक खेल….


दांत निकल जाने से गाल जाते ही हैं पिचक 

हड़बां आती हैं निकल …

नकली दांतों तक हर किसी की नहीं होती पहुंच 

पूरी उम्र गुज़ार देते है पिचके गालों के साथ अमूमन 

पोपले बने हुए, हड़बां निकली हुईं …

दांत नहीं हैं तो क्या जीना छोड़ दें….

गजब की बात यह कि सब कुछ खा-चबा लेते हैं…

मौज करते है,  खुल कर बेपरवाह हंसते भी दिखते हैं…

किसी से कोई शिकायत नहीं….

जिंदगी से राज़ी दिखते हैं, समझौता कर लेते हैं…

इन की बेपरवाह रुह से निकली हंसी सब को लेती है मोह ….

चिढ़ाती हो जैसे उन लोगों को 

जिन्होंने लाखों लगा दिए दांतों के इंप्लांट पर, 

चेहरे पर बोटॉक्स लगवाने में, 

गालों का ज़रा भी अंदर धँसना रोकने के लिए, 

हरेक मसल को पूरा एकदम टनाटन टाईट रखने के वास्ते, 

किसी मसल की क्या मजाल की चेहरे पर ज़रा ढिलका दिख जाए…

इन सब जुगाड़ के बावजूद….

कुछ लोगों की हंसी इतनी कैलकुलेटेड, डरावनी, बनावटी और मज़ाक उड़ाती ही दिखीं….

दूसरों की खिल्ली उड़ाती....😂


दास्तां जुदा हैे हर पिचके गालों की….

नशा-पत्ता करने वालों की भी उभर आती हैं हड़बें…

कल शाम एक एक अधेड़ उम्र की बहन दिखी ट्रेन में चढ़ती…

एक दम पिचके गाल, हड़बां ही हड़बां दिखतीं, 

इस तरह की हड़बें निकली हुईं देखने वाले को कर देती हैं फ़िक्रमंद…

इन हड़बों के साथ बीमार शरीर भी दिखता है इक मुट्ठी हड्डियों जैसा, 

अंदर धंसी आंखे, उम्मीद की मंद किरणों से रोशन, 

इस तरह की हड़बों को चाहिए …

दवा के साथ दुआ….बढ़िया खाना, मुकद्दर भी चाहिए अच्छा….

यह सब हरेक को कहां हो पाता है मयस्सर,

इसीलिए टावां टावां ही ….🙏



प्रवीण चोपड़ा 

28.10.25 


पुट्ठा (पंजाबी लफ्ज़)- उल्टा, 

टावां-टावां (पंजाबी) ….कोई कोई 


अभी मैं जब इस पोस्ट को बंद कर रहा हूं, विविध भारती पर यह गीत बज रहा है …. सुपर-डुपर हिट गीत …हमारे कॉलेज के दिनों की यादों का एक अहम् हिस्सा …


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

वाट्सएपिया बधाईयां (व्यंग्य)


वाट्सएपिया बधाईयां


आती थीं खुशियां कभी

ख़तों पे सवार हो कर दीवाली की बधाईयां….

पहुंचा तो दिया करती थीं ख़ुशियां 

साढ़े तीन रुपए की फिक्स रेट बधाई की तार भी लेकिन 

तार वाले की पुकार सुन कर थोड़ा डर जाते थे उन दिनों…

बधाई वाली तार का फूल-पत्ती वाला रंग बिरंगा लिफाफा देख लेकिन 

चल पड़ती थी अटकी सॉंस फ़ौरन….


फिर पड़ गया ग्रीटिंग्स कार्ड का रुल

रुपए एक में रेहड़ीयां पर लगे थोक में बिकने

लोग खरीद लेते थोक में, भेजते परचून में लेकिन 

रख लेते संभाल अगले साल के वास्ते….


कार्ड जब जाते अपने ठिकाने पहुंच, फिर शुरू होता मुआयना उनका, 

किस कंपनी का है, कितने का है, टिकट कितने की लगी है …

कार्ड अगर होते बैंक, इंश्योरेंस, या बिजनेस की मशहूरी वाले, 

पता लगते ही उन की रेटिंग हो जाती एकदम डाउन ….

फुटपाथ से खरीदे, चालू किस्म के कार्ड भी 

भिजवाने वाले की हैसियत की खोल देते पोल …

वक्त ही था ऐसा ….आर्ची़ज़ है तो बात है, वरना बेकार है …

(आशिक लोग इस बाबत रहते थे एकदम सचेत…नो कंप्रोमाईज़ विद स्टाईल…

इन्हीं पट्ठों की वजह से आर्चीज़ स्टोर चल क्या निकले, लगे भागने…)


जवाब में कार्ड भिजवाना या थैंक-यू कार्ड भिजवाना…

यह देखा बहुत ही कम…

ठानते बहुत बार लोग दिखे लेकिन 

कि अगली बार हम भिजवाएँगे कार्ड उधर से आने से पहले…

लेकिन अगली बार न आई कभी…

क्योंकि अगली बार तक तो ..

ज़िंदगी में लैंड कर गया लैंड-लाइन…

आईएसडी, एसटीडी, लोकल दरों पर 

बूथ पर लगे मीटर पर नज़रें गढ़ाए गढ़ाए

आने जाने लगीं दनादन बधाईयां…


फेसबुक, मोबाइल ने यह काम कर दिया बेहद आसां 

बात करने की इच्छा है तो ठीक, बधाई चिपका कर वरना, 

फेसबुक वॉल पर निपट गया यह काम….

इंस्टा भी तो है, फेंको स्टोरी बधाई वाली

इक पंथ कईं काज हुए सम्पन्न…

वकेशन लोकेशन दिखा दी, बधाई भी हो गई सेंड, 

और जो खून बढ़ गया फील गुड फील से….

वह बोनस अलग…..यह तो होना ही था….


वाट्सएप पर अब बधाईयों के लगे हैं अंबार मगर 

न रस है, न स्वाद…

शादी-ब्याह में मिलने वाले कपड़ों की तरह, 

यहां वहां से आए बेतहाशा, बहुत बार पढ़े बिना….

फारवर्ड किए हुए बधाई संदेश….


सच कहूं तो इस पल पल के अपडेट्स..

हर पल ऑनलाईन टंगे रहने की फ़िराक ने 

हाल ऐसा कर रखा है बेहाल,

अब उंगली के एक पोर को थोड़ी ज़ेहमत दे कर 

मैसेज भिजवाने की इच्छा भी हुई खत्म….

चलिए, खुद नहीं भेजते एक बात ….

दूसरों से पहुंचे बधाई संदेश भी 

नहीं लगते हैं अब किसी भारी बोझ से कम, 

यह सोच कर कि निजात पाने के लिए इस भार से…

वही घिसे-पिटे मकैनिकल से भेजने होंगे जवाब ..

बिना किसी फील और इमोशन वाले…


सुबह उठ कर इसलिए हर दिन 

सच्चे दिल से यह अरदास ही कर दें एक बार .. …

“सरबत दा भला….”

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया:

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुख भाग्भवेत्।


प्रवीण चोपड़ा 

23.10.25




शनिवार, 16 अगस्त 2025

बस एक निवाले की ख़ातिर...

आज सुबह से झमाझम बरसात हो रही थी …बाज़ार में पहुंच कर, बाद दोपहर एक चौराहे पर मैं जैसे ही गाड़ी से बाहर निकला…मुझे एक फड़फड़ाहट जैसी कुछ तेज़ आवाज़ सुनी…आवाज़ कुछ अजीब सी थी …इधर उधर देखा …

और पास ही एक मुर्गा बेचने वाले का स्टॉल था …उस के काउंटर के पीछे एक प्लास्टिक का ड्रम पड़ा हुआ था…ड्रम मीडियम साइज़ का ही था…एक लम्हे के लिए एक मुर्गा ऊपर तक उछला….मैंने समझा यह गलती से गिर गया है ….लेकिन तभी अगले ही पल बिल्कुल सन्नाटा…


मैं उधर पास ही खड़ा हो कर देखता रहा ….प्लास्टिक के नीले ड्रम से आप समझ गए होंगे जिन के ऊपर ढक्कन लगा रहता था और अकसर हम आते जाते देखते हैं लोग उन में पानी जमा कर के रखते हैं ….और वैसे छुट्टियों के भीड़-भड़क्के में जब लोग उन में सामान भर कर ठसाठस भरी गाडि़यों में अपना सामान लेकर चलते हैं और किसी तरह भी धक्कम-पेल कर के उन को गाड़ी में ठूंस देना चाहते हैं तो इस तरह की हरकतों से कैसे भगदड़ में मौतें भी हो जाती हैं…..दिल्ली स्टेशन का हादसा याद आ गया होगा आप को ….


ये ड्रम ही मनहूस हैं ….अभी लिखते लिखते यह ख्याल आया ….हादसे हुए इन की वजह से….पहले से इन में कैमीकल होते हैं और फिर लोग इस में पीने का पानी भी स्टोर करने लगते हैं….खतरा तो है ही ….लेकिन आज दोपहर देखा कि बेचारे मुर्गों की तो इन की वजह से आफ़त है …खैर, मुर्गे तो इन ड्रमों के बिना भी कत्ल होते रहे हैं ….इन बदनसीबों का नसीब ही ऐसा हुआ…..


कहीं पढ़ा था ….

जिसने भी दुनिया को जगाने की कोशिश की, उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया…

मुर्गा बांग देता है दुनिया को जगाने का काम करता है और मारा जाता है ….


बात सटीक है बिल्कुल ….इस की अनेक उदाहरणें हमारे इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं….चाटुकार लोग रस मलाई खाते दिखते हैं …और ……..(और क्या, सब जानते ही हैं….) 


हां, तो उस ड्रम से आवाज़ आनी बंद हो गई….उस स्टाल पर एक ग्राहक खड़ा हुआ था ….मैं भी थोड़ी दूर एक मिनट के लिए खड़ा हो गया…इतना तो मैं समझ चुका था कि इन मुर्गों की अब खैर नहीं… अब उस ड्रम से निकाल कर इन की चमड़ी उधेड़ कर, काट कर ग्राहक के हवाले कर दिया जाएगा…..जा, बना ले सेहत, कर ले हासिल जबरदस्त ताकत और फिर ….। 


इतने में पास ही की एक गली से वह दुकानदार आता दिखा….उस के हाथ में चार-पांच मुर्गे थे, टांगों से पकड़ कर उसने उन को उलटा किया हुआ था …आते ही उसने उन को काउंटर के नीचे पटक दिया….वे बंधे नहीं हुए थे …लेकिन अधमरे से लग रहे थे जैसे इतने बीमार हों कि जद्दोजहद करने की ताकत ही खो चुके हों….


अब तक तीन-चार ग्राहक और आ चुके थे …बरसात का मौसम हो ..झमाझम बरसात, ज़्यादा ठंडी पड़ रही है तो नॉन-वेज और दारू की दुकानों पर तो खरीदारों का तांता लग जाता है …अब उस दुकानदार ने पहले एक मुर्गा उठाया, चाकू से एक झटके से उस के गले पर वार किया…और उसे ड्रम के अंदर पटक दिया….वह एक बार छटपटाया। फिर एक और मुर्गे का भी यही हश्र हुआ…उस के बाद उसने एक मिनट से भी कम के लिए उस ड्रम के ऊपर ढक्कन रखा और उस के ऊपर बैठ गया….जैसे ही उसने ढक्कन खोला, माल बिकने के लिए पूरी तरह से तैयार ….


यह सब देख कर मन बहुत विचलित हुआ….बहुत ज़्यादा ….


वैसे जिस तरह से बड़े बड़े ट्रकों में सैंकडे मुर्गों-मुर्गियों को ट्रांसपोर्ट किया जाता है ….एक दूसरे से सटे हुए, डरे सहमे हुए …और शायद स्टीरॉयड दवाईयों के टीकों से त्रस्त….अपनी जान छूटने का इंतज़ार करते ये परिंदे ….


फिर ये ट्रक अलग अलग बाज़ारों में मीट-मुर्गे की दुकानों के सामने रुकते हैं …माल उतारने के लिए….और फिर जिस तरह से इन को बेरहमी से बाहर निकाल कर, तराज़ू के ऊपर तोलने के लिए फैंका जाता है, वह मंज़र भी देखते नहीं बनता….


और कईं बार मैंने दस-बीस मुर्गों को उन की टांगों से बांध कर किसी मजदूर के कंधों पर एक लंबी रस्सी की मदद से टंगे देखा है जो इन को इन की मंज़िल तक पहुंचाने का काम करता है। कईं बार साईकिल के कैरियर पर भी दोनों तरफ़ उल्टे टंगे मुर्गे आपने भी ज़रुर देखे होंगे और बहुत बार मैंने स्कूटर की पिछली सीट पर भी इसी तरह से मुर्गे ढोए जाते देखे हैं…उन की टांगें बंधी हुईं और उल्टे लटकाए हुए….


अब जब इन की ढुलाई देखता हूं …इस तरह से उल्टे लटके हुए और टांगों से बंधे हुए तो मैं क्या कर सकता हूं….?


मैं कुछ नहीं कर सकता …..न ही कुछ कह सकता हूं ….पता लगे मैं ही कहीं उल्टा लटका पड़ा हुआ …पर एक काम तो मैं हर बार तबीयत से करता हूं ….मेरे पास जो भी पंजाबी गालियों का एक अच्छा-खासा खज़ाना है ….उन में से दो चार पांच निकाल कर इस्तेमाल कर लेता हूं ….दिल ही दिल में और अगर अभी अकेला हूं तो बहुत धीमी आवाज़ में ….


मैं जानता हूं ये लोग भी अपनी रोज़ी-रोटी के लिए यह काम कर रहे हैं….लेकिन कुछ बातें ऐसी होती हैं जो तर्क-वितर्क से परे होती हैं …


यह सब लिख रहा हूं ….इस की कोई धार्मिक वजह नहीं है ….मुझे पता है सभी धर्म-मज़हब के लोग ये सब खाते हैं …..और वैसे भी दुनिया में जो भी वैज-नॉन वैज चीज़ें उपलब्ध हैं, सारी दुनिया में वे सब खाई जाती हैं….दुनिया में लोगों का खान-पान, पहरावा, बोली …..सब कुछ अलग थलग है ….यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है ….इस तरह के खानपान के आधार पर किसी तरह का भेदभाव करना बिल्कुल हिमाकत है ….मैं यह भी सोचता हूं ….जो किसी को पसंद है, खा रहा है …..


मैं नहीं खाता नॉन-वेज पिछले 30-32 बरसों से तो यह मेरा व्यक्तिगत मामला है …. इस से न तो मैं कोई बहुत बड़ा धर्म का ठेकेदार हो गया ….न ही मैं इस से आदरणीय फौजा सिंह की तरह 100 साल तक जीने की उम्मीद कर सकता हूं ….हर इंसान के कुछ खाने या न खाने की अपनी वजह है ….बस, इतनी सी बात है ….


मेरी वजह जानना चाहते हैं आप ….!!

तो सुनिए, 1994 में इन्हीं दिनों की बात है …हम लोग पूणा गये हुए थे …एक होटल में गए, वहां पर और कुछ समझ नहीं आया तो नॉन-वेज मंगवा लिया ….

लेकिन यह क्या, यह कमबख्त कैसा नॉन-वेज था, चबाया ही नहीं जा रहा था ….

हम लोग बिना खाए, बिल चुकता कर बाहर आ गए…

जब हम लोगों ने बंबई में आ कर कुछ दोस्तों से बात की तो उन से हमें पता चला कि हमें क्या परोसा गया होगा…….बस, उस दिन से कभी मटन-मुर्गा खाया नहीं, छूआ नहीं …और ताउम्र छूने की कोई मंशा नहीं है ….


बात धर्म-मज़हब की नहीं है …..वैज्ञानिक तौर पर भी हमारे दांतों की, हमारी आंतों की संरचना इस तरह की है कि उस परवरदिगार ने हमें शाकाहारी ही बना कर भेजा है ….और संसार में आकर हमारा मन यह सब खाने को मचलने लगा ….


बहुत सुनता हूं कुछ लोगों की मजबूरी है यह सब खाना….भई, मैं किसी को मना नहीं कर रहा हूं….जो किसी को पसंद होगा वह वही खाएगा….लेकिन क्या कोई मुझे मेरी बात कहने से रोक सकता है…..मेरे मन की जो बात है वह तो मैं ढंके की चोट कर कह कर ही रहता हूं ….यह तो हम सब का हक है। 


अपनी बात ही नहीं हांकते रहना चाहिए….दूसरों की भी करनी चाहिए…..कल मेरा बेटा बता रहा था कि उसने किसी अच्छी जगह से कोई वेज-सैंडविच आर्डर किए….

आ गया सैंडविच …..

लेकिन उसने जैसे ही एक बाइट ली ….उसे पता चल गया कि यह तो नॉन-वैज है …

उसने शिकायत की, पैसे वापिस हो गए …यह तो कोई मुद्दा ही नहीं है, और इन कंपनियों के लिए कितनी सामान्य सी बात होती होगी….जब उसने बताया कि उन का जो फीडबैक फार्म था, उस पर एक कॉलम ही था कि क्या आप को वैज मील की जगह नॉन-वैज मील भेजा गया……लेकिन जो भी है, अगर किसी ने बरसों से यह सब खाना छोड़ रखा है और गलती से वह इस का एक निवाला भी खा ले तो उस के लिए कितना ट्रामैटिक हो सकता है ….जान दीजिए….हां, निवाले से मुन्नवर राणा की लिखी बात याद आ गई ….

एक निवाले के लिए मैंने जिेसे मार दिया,

वह परिंदा भी कईं दिन का भूखा निकला ….


( जी हां, भूखे ही होते होंगे ये परिदें कईं दिनों से …..अकसर खबरें दिखती रहती हैं कि इन को तरह तरह के स्टीरॉय़ इंजैक्ट किए जाते हैं, और फीड भी एनाबॉलिक स्टीरायड से लैस होती हैं ….ये सब मीडिया में दिख जाता है ..लेकिन इस से इन का वज़न तो बढ़ जाता होगा, भूख इन की कहां मिटती होगी…!!


मौके-बेमौका देख कर मैं शाकाहारी खाने की हिमायत करता हूं और साथ में कह देता हूं कि इस बात में बिना वजह धर्म-मज़हब न घुसाएं….सुन है तो सुुनिए, अगर एक कान से सुन कर दूसरे कान से बाहर निकाल फैंकनी है, यह भी उन का अधिकार है …और जो खाना चाहते हैं, खा रहे हैं ….उस का फैसला करना उन का अधिकार है, अगर हम किसी रास्ते पर चल रहे हैं कुछ अरसे से तो जो उस रास्ते पर चलने की कोशिश करना चाहते हैं उन को एक इशारा करना तो अपना फ़र्ज़ बनता है, दोस्तो. …..



और ये इशारे भी सोच समझ कर करने होते हैं ….अब जैसे मैंने कुछ महीनों से मिल्क-और मिल्क प्रोडक्ट्स को लगभग त्याग रखा है ….लगभग न के बराबर ….सिर्फ चाय में बिल्कुल जो थोड़ा दूध जाता है, उस के बिना मैं नहीं रह सकता….और दूध से बनी कोई चीज़ नहीं लेता….कभी कभी जब कहीं पर बेसन के लड्ड़ू पड़े दिख जाते हैं तो यह नियम भी टूट जाता है ….जैसे आज शाम भी टूट गया ….जब चाय के साथ तीन बेसन के लडडू खा लिए ….क्या करें, कुछ आदतें छूटती नहीं …..लेेकिन देसी घी, मक्खन, दही….आईसक्रीम, रबड़ी, लस्सी….. पिछले चार महीनों से इच्छा ही नहीं …..


क्या कारण था यह सब छोड़ने का?


कोई खास नहीं, बस वितृष्णा सी ही हो गई इन सब चीज़ों से ….क्योंकि मिलावट की, नकलीपन की इतनी खबरें देख लीं कि इन सब से किनारा ही कर लिया…..


लेकिन हां, इस तरह के फैसले का जो भी अंजाम होगा, देखा जाएगा…..एक प्रयोग ही सही….लेकिन अभी तो इन सब चीज़ों की तरफ़ लौटने का कोई इरादा नहीं है ….बाकी, मुझे भी नहीं पता कि इस के कितने नुकसान होंगे, कोई एक फायदा होगा भी या नहीं….जो होगा, देखा जाएगा…..शायद इसीलिए मैंने किसी दूसरे को मिल्क या मिल्क प्रोडक्ट्स का त्याग करने की सलाह कभी न दी है और न ही दूंगा…..वैसे यह मेरा अधिकार क्षेत्र भी नहीं है, हां मैं अनुभव ज़रूर साझा कर सकता हूं….


PS....1. पोस्ट में जितने भी मंज़र (आज वाला भी) मैंने ब्यां किए हैं, उन सब से जुड़ी तस्वीरें मेरी फोटो गैलरी में हैं, लेकिन मैंने जानबूझ कर नहीं चस्पा कीं क्योंकि बेकार में ये किसी को भी विचलित कर देंगी...




मैं इस पोस्ट में कहीं यह भी लिखा है कि मैंने इतने बेसन के लड्डू एक साथ खा लिए चाय के साथ और मैं अपराध बोध से ग्रस्त हूं…वह इसलिए कि मुझे लगा कि ये भी देशी घी से तैयार हुए हैं…लेकिन पोस्ट पब्लिश करने के बाद यूं ही इस डिब्बे को (जिस की फोटो ऊपर है) उठा कर इधर उधर कर के देखने लगा तो यह अपराध बोध भी कुछ तो कम हुआ….इसलिए कि इस को तैयार करने में वनस्पति तेल ही इस्तेमाल किया गया है। जो भी हो, इतने लड्डू एक साथ खाने, और वे भी शक्कर, तेल से भरपूर….यह भी तो इस उम्र में एक बेवकूफ़ी ही कही जा सकती है, समझता हूं ….लेकिन कभी कभी निदा फ़ाज़ली की बात याद आ जाती है ….


दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है….

सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला ….