Tuesday, February 2, 2016

पद्मश्री गुलाबो सपेरा और सुशील दोशी से कल हो गई मुलाकात..

जब भी मैं टीवी ऑन करता हूं तो एनडीटीवी इंडिया, ज़ी क्लासिक, स्टार गोल्ड आदि पर ही आ कर थम जाता हूं...खबरिया चैनलों में से एनडीटीवी इंडिया मेरा फेवरेट चैनल है...कुछ कारण और भी होंगे, लेकिन सब से बड़ा कारण यही है कि यहां पर ख़बरें पढ़ते हुए लोग उछलते नहीं हैं। ..दूसरे कईं चैनल हैं जिन को लगाते ही पांच मिनट में खबरें पढ़ने वालों की उत्तेजना से मेरा सिर भारी हो जाता है ..

कल दोपहर दो बजे जैसे ही टीवी लगाया तो नगमा सहर दिखीं...हम लोग प्रोग्राम में...पता चला कि पद्मश्री गुलाबो के बारे में यह प्रोग्राम है.. इन के बारे में कईं बार सुना था, पढ़ा था और टी वी पर देखा भी था लेकिन सब कुछ धुंधला ही था...नागिन डांस के नाम पर बस दो तीन वे व्हाट्सएप वीडियो ही याद थे जो कुछ युवा शादी ब्याह में कर लेते हैं।
वैसे भी हम कहां पद्मश्री या अन्य अवार्ड पाने वालों को जानते हैं?... मुझे याद है बस अखबारों में इन की लिस्ट और उस के साथ ब्रेकेट में उन के कार्यक्षेत्र के बारे में ही अकसर हम लोग देख कर इत्मीनान कर लिया करते थे...मेरा तो यही अनुभव रहा है ..शायद मेरे से कुछ प्रोग्राम छूट जाते होंगे। 

बहरहाल कर एनडीटीवी इंडिया पर गुलाबो सपेरा के बारे में बहुत सी बातें जानने का मौका मिला ..बहुत अच्छा लगा...उस की बातें शेयर करने की इच्छा हो रही है...

गुलाबो सपेरा उस प्रोग्राम में अपनी बेटी के साथ आई थीं..यह जो सपेरा डांस है इन्होंने ही शुरू किया .. बचपन से ही अपने पिता के साथ साथ ही रहती थीं... वे सपेरे थे..और ऐसे ही सांपों को बीन की मधुर धुन पर मुग्ध होते देख देख कर गुलाबो भी यह नृत्य करने लगीं...छुपटन से ...और फिर तो कभी सांप इन के ऊपर और कभी ये सांपों के ऊपर और सांपों को गले में डाल कर ये नृत्य करने लगीं और जल्द ही इतनी पारंगत हो गईं कि इन्हें बड़े मेलों पर नृत्य करने का मौका मिलने लगा...

इस बात को यहां थोड़ा रोकते हैं.. पहले इन के जन्म के बारे में यह बात बताना चाहूंगा कि इन के जन्म से पहले तीन बहनें और तीन भाई हो चुके थे..इन का जन्म जिस दिन हुआ..पिता बाहर गये हुए थे ..तो घर की और आस पास की महिलाओं ने सोचा कि तीन छोरियां तो पहले से हैं, अब एक और हो गई..चलो, इसे गाड़ देते हैं...उन महिलाओं ने वैसा ही किया.. नवजात बच्ची को कहीं जा कर गाड़ आईं... गुलाबो की मां ने जब होने वाले बच्चे के बारे में पूछा तो उन्होंने कह दिया कि जो भी बच्चा हुआ, मरा हुआ था... लेकिन जैसे तैसे गुलाबो की मां ने अपनी बहन से सच उगलवा ही लिया ..यह कह कर कि तेरे तो पांच बेटे हैं, चाहे तो इस बेटी को तू रख लेना, पर इसे बचा ले....यह बातें तब चल रही थीं जब उस नवजात बच्ची को दफनाए हुए चार पांच घंटे बीत चुके थे. 

गुलाबों की मौसी ने मां को समझाया कि अब तक तो वह मर चुकी होगी..लेकिन मां ने कहा कि मेरा दिल कहता है वह ज़िंदा होगी, चल, ज़रा जा कर देखते हैं। और जब वे दोनों बच्ची को लेने गये तो उस की सांसें चल रही थीं...यह बात सुना कर गुलाबो ने सब को हिला दिया...

हां, गुलाबो जिस नृत्य को करती हैं उसे राजस्थान का कालबेलिया लोकनृत्य कहते हैं ...यह गुलाबो की ही देन है ..अब यह विश्वप्रसिद्ध है। सात साल की उम्र में किसी मेले पर जब यह नृत्य कर रही थीं तो किसी की नज़र इन पर पड़ी और इन्हें स्टेज पर नृत्य करने का मौका मिला .. स्टेज पर नृत्य करना इन्हें इतना अच्छा लगा कि उस के बाद इन्हें पीछे मुड़ के नहीं देखना पड़ा.... देश विदेश में इन के शो होने लगे ...


सब कुछ इन्हें इतनी आसानी से भी नहीं मिल गया... जब यह स्टेज पर नृत्य करने लगीं तो कबीले में बहुत विरोध हुआ.. एक तरह से सामाजिक बहिष्कार हो गया...लेकिन यह धुन की पक्की निकलीं...जैसे जैसे इन की ख्याति बढ़ती गई, यह अमेरिका जैसे देशों में भी शो कर आईं तो इन के कबीले के लोग भी बदलने लगे ...वे इन के पास आने लगे कि हमारी घर की औरतों को भी यह नृत्य सीखना है। इन्होंने उन के सामने यही शर्त रखी कि ज़रूर सिखाएंगी ...लेिकन शर्त एक ही होगी कि तुम लोग बच्चियों को गर्भ में मारना..और उन्हें मार कर दफ़नाना बंद करोगे...धीरे धीरे लोग इन की बात मानने लगे। 


नगमा सहर से इन की बातचीत सुन कर जैसा अनुभव हुआ उस का एक अंश भी मैं इन पंक्तियों के माध्यम से आप तक पहुंचाने में नाकामयाब रहा .. इन की बेटी भी इन के साथ थी, जो बोर्डिंग स्कूल में पढ़ी हैं और अब मां के साथ इस नृत्य को करती हैं.. मैं इसे लिखते सोचा कि काश, इस प्रोग्राम की वीडियो कहीं मिल जाए...एनडीटीवी की साइट पर ढूंढा तो यह मिल गई....इस का लिंक यह है (यहां क्लिक करिए)  ....इस पर क्लिक कर के आप इस प्रोग्राम का आनंद ले सकते हैं....गुलाबो सपेरा की तारीफ़ करने के लिए मेरे पास इस से ज़्यादा शब्द नहीं है.....वैसे ही मेरी हिंदी की वोकेबुलरी मुझे बहुत से मौकों पर फेल कर देती है!

इस के बाद नगमा सहर ने हमें मिलाया हिंदी कमेंटेटर सुशील दोशी जी से ..इन से मिल कर भी बहुत अच्छा लगा.. कितनी तपस्या की इन्होंने क्रिकेट की कमेंटरी हिंदी में देने के लिए..यह इन्हें से जानिए इसी वीडियो से ...पहले पहल लोगों ने मज़ाक उड़ाया कि अंग्रेज़ी खेल की कमेंटरी हिंदी में कैसे कर पाओगे..लेिकन इन के जुनून की जीत हुई...बचपन के बारे में बताते हैं कि १४ साल की उम्र में इंदौर में रहते हुए इन का मन हआ कि बंबई जाकर मैच देखना है...हालांकि इन के पिता को क्रिकेट का बिल्कुल शौक नहीं था लेकिन वे इन्हें लेकर बंबई जा पहुंचे..स्टेडियम में कौन घुसने देता!..टिकट ऐसे कहां िमल पाती... तीन दिन ऐसे ही स्टेडियम के चक्कर काटते रहे, चौथे दिन स्टेडियम के बाहर चाय बेचने वाले ने इन बाप-बेटे को देखा और सारी बात उसने समझी। उस ने जैसे तैसे सुशील को अंदर भिजवा दिया और इन के पिता को बाहर ही इंतज़ार करने को कहा ...सुशील वे पल याद करते हुए भावुक हो गये। 


ये पिछले ५० सालों से हिंदी में कमेंटरी कर रहे हैं...१७-१८ साल की उम्र में इन्होने आकाशवाणी के लिए हिंदी में कमेंटरी करनी शुरू कर दी थी... इन के महान काम को देखते हुए इंदौर के क्रिकेट स्टेडियम के कमेंटरी बॉक्स का नाम इन्हीं के नाम पर रखा गया है ...और ऐसा भारतवर्ष में पहली बार हुआ है..

इसे लिखते लिखते व्हाट्सएप पर एक संदेश दिख गया जिसे यहां शेयर कर रहा हूं....कुछ लोग सच में मुकद्दर के सिकंदर ही होते हैं..



हम जो भी काम करते हैं ..कुछ भी ..हर काम बहुत अहम् है....बस, उसे पूरी ईमानदारी से करते रहना चाहिए..सफलता की ऐसी की तैसी ...वह कहां जाएगी....हम अपने आस पास ऐसे बीसियों किस्से देखते सुनते हैं अकसर...इन पर भी कभी कभी विचार कर लेना चाहिए....होता यह सब कुछ संघर्ष से ही है ...बहुत कम होता है कि किसी नामचीन बाप का बेटा भी वैसा ही जुनून दिखा पाए.......हो सकता है, लेकिन अकसर देखने में आता नहीं ..स्टार पुत्रों के बारे में भी हम यही देखते हैं......होता है,...यह स्वभाविक भी है ... पिता के लिए शायद यह जीने का संघर्ष होता है और फिर बच्चों को सब कुछ पका-पकाया मिल जाता है तो शायद वह स्पार्क पैदा ही नहीं हो पाता....

कल शाम भी लखनऊ महोत्सव में फरहान अख्तर का रॉक-शो देखने का आप्शन था... निमंत्रण पत्र भी था..घर से पांच मिनट की दूरी थी प्रोग्राम स्थल से ..लेकिन तभी यू-ट्यूब पर घूमते हुए अपने मन पसंदीदा कार्यक्रम गुफ्तगू पर संजय मिश्रा से इंटरव्यू का पता चला तो बस वहीं बैठा रह गया...मैं इनका बहुत बड़ा फैन हूं...इन की ईमानदारी का, सच्चाई का... 


....फरहान अख्तर के शो में जाने की इच्छा नहीं हुई... वैसे भी इन रॉक-वॉक शो में मेरी कोई रूचि नहीं है.. बस, उधर तक ही ठीक है ..साडा हक्क ऐत्थे रख.. रॉकस्टार का गीत!!


कल एनडीटीवी के इस प्रोग्राम से लगा कि पद्मश्री पुरस्कारों जैसे अवार्ड के लिए चयन करने वालों का काम भी कितना मुश्किल होता होगा... लेकिन जिन लोगों ने भी अपने काम को पूजा की तरह किया ..उन्हें इन अवार्डों से सुशोभित किया ही जाना चाहिए... पद्मश्री गुलाबो और सुशील दोशी जी को हमारी ढ़ेरों बधाईयां... इन के फन को सलाम...
पद्मश्री अवार्डों की बात चली तो पता चला कि पिछले दिनों मीडिया में यह दिखा कि शायद एक मंत्री ने यह कहा कि एक सुप्रसिद्ध पुराने दौर की सिनेतारिका ने उन से पद्मश्री अवार्ड दिलाने की सिफारिश करने को कहा ...यह पढ़ कर अच्छा नहीं लगा... कारण?...हम उस सिनेतारिका का महान काम बचपन से देख रहे हैं, उम्मीद नहीं कि उसने ऐसा कहा हो, और अगर कहा भी हो तो उस में ऐसा हायतौबा मचाने की बात ही क्या थी, हम सब लोग अकसर कईं बार कमज़ोर लम्हों में कुछ न कुछ कह देते हैं....ऐसे में इस तरह की बात को मीडिया में उछालने से क्या हासिल! मुझे तो यह बात बहुत बुरी लगी।