Sunday, January 20, 2008

मरीज़ से ढंग से बात करने की बात...............


अकसर हम सुनते ही हैं न कि यार, उस फलां फलां की बीमारी में तो बड़े से बड़े डाक्टरों ने जवाब दे दिया, लेकिन साथ वाले गांव के हकीम ने उस का मर्ज पकड़ लिया...अब वह भला-चंगा घूम फिर रहा है। दोस्तो, ऐसी बातें क्या हम डाक्टरों को अपने अंदर झांकने के लिए थोड़ा मजबूर नहीं करतीं....करती है न, तो फिर मुझे भी कुछ दिन से कुछ इस तरह के ही विचार आ रहे थे....आज छुट्टी का दिन है, सोचो आप के सामने रख ही दूं। दोस्तो, यह मेरा एक बहुत ही पक्का व्यक्तिगत ( अब देखिए किसी तरह की कंट्रोवरसी से बचने के लिए मैंने इस व्यक्तिगत शब्द की भी ढाल पकड़ ली है, वैसे अभी बात शुरू भी नहीं की है, लेकिन उसे पहले ही से थाम लिया है) .....विश्वास यही है कि इस सुपर-स्पैशियलाइज़ेशन के जमाने में डाक्टर और मरीज़ के बीच की खाई बढ़ सी गई है....कोई होलिस्टिक कंसैप्ट लुप्त होता ही दिख रहा है...बस मरीज़ अपनी आंख की नस के चैक-अप के लिए किसी के पास जा रहा है, नाक के लिए किसी दूसरे के पास और कान के अंदरूनी भाग के आप्रेशन के लिए किसी तीसरे के पास.....इस के फायदे तो खैर हैं ही कि अलग अलग तरह के विशेषज्ञ मौजूद हैं और बीमारियों के ऊपर काफी हद तक विजय पा ली गई है, लेकिन क्या हम मरीज का दिल जीत पाने में कामयाब हुए हैं.......यह जवाब तो आप ही दे सकते हैं, दोस्तो, मैं खुद कुछ कहता ठीक नहीं लगता। डाक्टर मरीज का इंटरएक्शन इस बढ़ती स्पैश्लाइज़ेशन की वजह से कम से और कम होता जा रहा है। वो दोस्त, गाइड वाली बातशायद कुछ कुछ किताबी सी होकर ही रह गई है। जब कभी भी चिकित्सा क्षेत्र की अपने ही लोगों के बीच बात छिड़ती है तो अकसर यही सुनने को मिलता है कि दूसरे क्षेत्रों में देखो वहां क्या हो रहा है.....इन मास्टरों को देखो, वकीलों को देखो..........बस, बात फिर लंबी ही खिंच जाती है......लेकिन दोस्तो बात वही है कि क्या कोई और भी प्रोफैशन है जिस में कोई बंदा किसी प्रोफैशनल पर इतना बड़ा भरोसा कर लेता है कि उस के आगे अपना जीवन ही समर्पित कर देता है....नहीं, नहीं, डाक्टरी के इलावा शायद कोई ऐसा पेशा नहीं है।

यह क्या,यार, आज तो भूमिका ही इतनी बड़ी हो गई है, कि जो बात कहना चाह रहा हूं वह तो पहले कह लूं। तो दोस्तो, मेरी बात ज़रा ध्यान से सुनिएगा।

दोस्तो, एक उदाहरण ले रहा हूं। जब मेरे पास कोई बिलकुल कमज़ोर सी, जिसकी आंखें और गाल बिल्कुल अंदर धंसी हुई हैं, जिस ने एक नंगा-धडंगा रोता हुया 2-3 महीने का बच्चा उठा रखा है....ऐसी औरत आती है तो मेरे अंदर एक साथ बीसियों सवाल उठ जाते हैं जिन के जवाबों से डरते-डरते, भागते हुए मैं उस का इलाज करता हूं, कुछ सवाल जो मुझे हमेशा चिढ़ाते हैं, वे ये हैं......

क्या मैं इस की हालत तुरंत बदल सकता हूं.....नहीं

क्या मैं इस के पति की आमदनी बढ़ा सकता हूं.....नहीं

क्या मैं यह सुनिश्चित कर सकता हूं कि इसे रोज़ पौष्टिक खाना मिले जिस में कम से कम थोड़ा दूध, सब्जी तरकारी और कोई मौसमी फल भी हो........नहीं

क्या मैं यह सुनिश्चित कर सकता हूं कि इस के पति की शराब, तंबाकू और दूसरे तरह के नशे करने की आदत छुड़वा दूं...........शायद थ्यूरैटिकली कभी कभी यैस....लेकिन ज्यादातर नहीं

क्या इस चार लड़कियों की मां की एक अदद बेटे की चाह मैं दबा सकता हूं.....................कभी नहीं

क्या इस को इस के आदमी से रोजाना पिटने से मैं बचा सकता हूं.......................................बिल्कुल नहीं

क्या मैं सुनिश्चित कर सकता हूं कि वह महिला अपनी टीबी की बीमारी का पूरा कोर्स करेगी.....नहीं

क्या मेरे द्वारा दी गई चंद टेबलेट खा लेने मात्र से ही इस की खून की कमी ठीक हो जाएगी......नहीं

क्या मैं सुनिश्चित कर सकता हूं कि यह भी घर के सभी सदस्यों के साथ बैठ कर ही खाना खाया करे, ताकि यह सदियों से खुरचन खा कर ही तृप्त होने की अपनी आदत छोड़ दे.......................नहीं

क्या मै सुनिश्चित कर सकता हूं कि जिस घर में यह काम करने जा रही है वहां इस को शोषण न हो..........................................नहीं

क्या मैं यह सुनिश्चित कर सकता हूं कि इस के आस-पास वाली इस को हेय दृष्टि से न देखें.......नहीं

.............दोस्तो, यह तो एक सैंपल मात्र है जो मैंने आप के सामने रख दिए हैं, सच्चाई तो यह है कि जब कोई मरीज सामने स्टूल पर बैठा होता है न तो उस से संबंधित बीसियों सवाल मन में चोट कर रहे होते हैं।

अब ,आप भी कह रहे होंगे कि सवाल उठते होंगे तो उठते होंगे.....तू पहले हमें ऊपर लिखे सवालों का जवाब तो दे। क्या दूं , जवाब दोस्तो, वह तो मैंने हर सवाल के साथ-साथ ही दे दिया है।

तो फिर क्यों मानेगी, बेवकूफ डाक्टर, वो तेरी कोई भी बात....................जब स्थिति इतनी दर्दनाक है,तो तुम डाक्टरों के पास है ही क्या।

है, दोस्तो, है......भगवान ने हमें जुबान दी, वाणी दी है, दूसरे के दुःख में दुःख दर्शाने वाली दो आंखें दी हैं.....और क्या चाहिए। ऊपर सभी प्रश्नों का जवाब ना में है तो क्या गम है, अगर हम अपनी जुबान और जुबान से कहीं ज्यादा बोलने वाली आँखों का इस्तेमाल उस बीमार महिला से करेंगे तो हम पाएंगे कि उस के सूखे चेहरे पर चमक रही डरावनी सी आँखों में भी अचानक एक आशा की किरण चमकी है....उसे लगा है कि कोई उस की बात सुन रहा है, उस का किसी ने मर्म समझ लिया है....कोई उससे बात कर रहा है, पता नहीं भावावेश में वह अपने गोद उठाये बच्चे का माथा चूम ले...........इस आत्मीयता में दोस्तो इतनी ताकत है कि क्या पता वह उस दिन से फिर से अपनी ज़िंदगी से दोबारा प्यार करने लग पडे...क्या पता वह उस दिन से नियम से अपनी टीबी की दवाई खाने लगे और कुछ ही दिनों में उस के दूध भी उतर आए जिस से कि वह अपनी भूख से बिलखती बच्ची की भूख तो शांत कर सके। वैसे, दोस्तो, हम डाक्टर लोग भी कितनी आसानी से अपने एयरकंडीशनड कमरों में बैठ कर कितनी ही आसानी से माताओं को पहले छः महीने तक बच्चों को केवल स्तनपान की ही सलाह दे देते हैं। लेकिन यकीन मानिए है यह भी किसी करिश्मे से कम नहीं..शरीर तंदरूस्त है , मन तंदरूस्त है, खान-पान ठीक है....तभी तो करवा पाएगी वह स्तनपान............काश, हम सब यह समझ पाएं।

बस, दोस्तो, अब डाक्टर की डायरी को बंद कर के अलमारी में रख रहा हूं......फिर कभी खोलूंगा और खुल कर आप से बातें करूंगा।