सोमवार, 11 अगस्त 2014

यह भी पर्सनल हाइजिन का ही हिस्सा है..


सैक्स ऐजुकेशन, किशोरावस्था के मुद्दे, स्वपनदोष, शिश्न की रोज़ाना सफ़ाई......शायद आप को लगे कि यह मैंने किन विषयों पर लिखना शुरू कर दिया है। लेकिन यही मुद्दे आज के बच्चों, किशोरों एवं युवाओं के लिए सब से अहम् हैं।

मुझे कईं बार लगता है कि मैं पिछले इतने वर्षों से सेहत के विषयों पर लिख रहा हूं और मैं इन विषयों पर लिखने से क्यों टालता रहा। याद है कि २००८ में एक लेख लिखा था......स्वपनदोष जब कोई दोष है ही नहीं तो.... लिखा क्या था, बस दिल से निकली चंद बातें थीं जो मैं युवाओं के साथ शेयर करना चाहता था.....बस हो गया।

मैंने वह लेख किसी तरह की वाहावाही के लिए नहीं लिखा था.....लेकिन वह लेख हज़ारों युवाओं ने पढ़ा है......मैंने अपने बेटों को भी उसे पढ़ने को कहा......और वह लेख पढ़ने के बाद मुझे बहुत सारी ई-मेल युवाओं से आती हैं कि हमें यह लेख पढ़ कर बड़ी राहत मिली।

मैं जानता हूं कि मैं कोई सैक्स रोग विशेषज्ञ तो हूं नहीं, लेकिन फिर भी जो हमारे पास किसी विषय का ज्ञान है, चाहे वह व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित हो और जो कुछ चिकित्सा क्षेत्र में रहने के कारण उस में जुड़ता गया, अब अगर वह ज्ञान हम जैसी उम्र के लोग शेयर नहीं करेंगे तो कौन आयेगा इस काम के लिए आगे। अच्छा एक बात और भी है कि इंगलिश में तो यह सब जानकारी उपलब्ध है नेट पर लेकिन हिंदी में इस तरह के कंटैंट का बहुत अभाव है।

मैं जानता हूं कि कितना मुश्किल होता है अपने लेख में यह लिखना कि मुझे भी किशोरावस्था के उस दौर में स्वपनदोष (night fall)  होता था....लेकिन क्या करें युवा वर्ग की भलाई के लिए सब कुछ सच सच शेयर करना पड़ता है. वरना मैं हर समय यह लिखता रहूं कि यह एक नार्मल सी बात है उस उम्र के लिए.....तो भी कहीं न कहीं पाठक के मन में यह तो रहेगा कि लगता है कि इसे तो नहीं हुआ कभी स्वपनदोष........ वरना यह लिख देता। यही कारण है कि सब कुछ दिल खोल कर खुलेपन से लिखना पड़ता है। उद्देश्य सिर्फ़ इतना सा ही है कि जिस अज्ञानता में हमारी उम्र के लोग जिए--इस तरह की सामान्य सी बातों को भी बीमारी समझते रहे..... आज के युवा को इस तरह के विषयों के बारे में सटीक जानकारी होनी चाहिए।

आज ध्यान आ रहा था...... शिश्न की रोज़ाना सफ़ाई के मुद्दे का। यह एक ऐसा मुद्दा है कि जिस पर कभी बात की ही नहीं जाती क्योंकि वैसे ही बालावस्था में शिश्न को हाथ लगाने तक को पाप लगेगा कहा जाता है, ऐसे में इस की सफ़ाई की बात कौन करेगा।

अगर इस लेख के पाठक ऐसे हैं जिन के छोटे बच्चे हैं तो वे अपने बच्चे के शिशु रोग विशेषज्ञ से इस मुद्दे पर बात करें। यह एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है...मैं इस के ऊपर जान बूझ कर कोई सिफारिश नहीं करूंगा....लेकिन बस इतना कह कर अपने अनुभव शेयर करने लगा हूं कि इस की रोज़ाना सफाई शिश्न की आगे की चमड़ी आराम से पीछे कर के (जितनी हो उतनी ही, बिना ज़ोर लगाए... यह बहुत ज़रूरी है)...... उस पर थोड़ा साबुन लगा कर रोज़ाना धोना ज़रूरी है।

चाहे अपने बारे में लिखना कितना ही एम्बेरेसिंग लगे ... तो लगे, लेकिन लिखूंगा। हमें पता ही नहीं था कि शिश्न के अगल हिस्से की इस तरह से सफ़ाई करनी होती है, कभी किसी से भी चर्चा हुई नहीं, किसी ने बताया नहीं। इस के कारण १४-१५ वर्ष की उम्र में बड़ा लफड़ा सा होने लगा। जब भी पेशाब जाएं तो जलन होने लगे...... कुछ समय के बाद ठीक हो जाए...ठीक से याद नहीं कि पेशाब करने से पहले हुआ करती थी या बाद में, लेकिन होती तो थी, बीच बीच में अपने आप ही ठीक भी हो जाया करती थी। अपने आप ही थोड़ा पानी ज़्यादा पीने लगता था कि आराम मिलेगा, किसी से बात क्या करें, इसलिए झिझक की वजह से यह सब पांच-छः वर्ष ऐसे ही चलता रहा।

१९-२० की उम्र में एक दिन हिम्मत कर के मैं अपने आप पहुंच ही गया मैडीकल कालेज के मैडीसन विभाग की ओपीडी में .....उस डाक्टर ने अच्छे से बात की, और मेरे से पूछा कि क्या तुम रोज़ाना इस की सफ़ाई नहीं करते.....मैंने तो उस तरह की सफ़ाई के बारे में पहली बार सुना था। आगे की चमड़ी (prepuce) बिल्कुल अगले हिस्से के साथ (glans penis)  चिपकी पड़ी थी।

बहरहाल, सब टैस्ट वेस्ट करवाए गये, उस डाक्टर के समझाए मुताबिक आगे की चमड़ी पीछे करने के पश्चात मैंने उस दिन से ही साफ़ सफाई का ख्याल रखना शुरू किया..... और मैं अब यह लिखने के लिए बिल्कुल असमर्थ हूं कि मुझे वैसा करने से कितना सुकून मिला....होता यूं है कि शिश्न की आगे से सफ़ाई न करने से.....शिश्न के अगले हिस्से के आस पास वाली चमड़ी से निकलने वाला एक सिक्रेशन.... स्मैग्मा--- इक्ट्ठा होने से ---शिश्न की अगले हिस्से वाली चमड़ी अगले हिस्से से ( glans penis) से चिपक जाती है, उस से उस जगह पर इरीटेशन होने लगती है .. और फिर यूटीआई (यूरिनरी ट्रेक्ट इंफैक्शन) भी हो जाती है..... यही हुआ मेरे साथ भी....... यूरिन की टैस्टिंग करवाई-- और उस के अनुसार सात दिन के लिए मुझे दवाई खाने के लिए दी गई........और बस मैं ठीक हो गया बिल्कुल।

पाठकों को यह भी बताना ज़रूरी समझता हूं कि उस अगले हिस्से में चमड़ी पीछे करने के पश्चात ज़्यादा साबुन भी रोज़ रोज़ लगाना ठीक नहीं है, बस केवल यही ध्यान रखना ज़रूरी है कि शरीर के हर हिस्से की सफ़ाई के साथ उस हिस्से की सफ़ाई भी रोज़ाना करनी नितांत आवश्यक है, वरना दिक्कतें हो ही जाती हैं।

 मेरे यह पोस्ट लिखने का उद्देश्य केवल आज के युवावर्ग तक यह संदेश पहुंचाना है, अब यह कैसे पहुंचेगा, मुझे पता नहीं। वैसे भी मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरे इस तरह के लेखों को आप मेरी डायरी के पन्नों की तरह पढ़ कर भूल जाएं या किसी विशेषज्ञ के साथ इस में लिखी बातों की चर्चा कर के ही कोई निर्णय लें, यह आप का अपना निर्णय है। मैं जो संदेश देना चाहता था, मैं आप तक पहुंचा कर हल्का हो जाता हूं। आप अपने चिकित्सक से परामर्श कर के ही कोई भी निर्णय लें, प्लीज़।
Parenting literacy -- Cleanliness. 

किशोर युवतियों में कॉपर-टी लगा देना क्या सही है?

अमेरिका के कोलोरेडो की खबर अभी दिखी कि वहां पर किशोर युवतियों को गर्भ धारण करने से बचाने के लिए इंट्रा-यूटरीन डिवाईस फिट कर दिया जाता है। इसे संक्षेप में आईयूडी कहते हैं। मैंने पाठकों की सुविधा के लिए कॉपर-टी लिख दिया है।

रिपोर्ट में आप देख सकते हैं कि पांच साल से यह प्रोग्राम चल रहा है --किसी व्यक्ति ने इस महान काम के लिए २३ मिलियन डालर का गुप्तदान दिया है कि किशोर युवतियों को इस अवस्था में गर्भावस्था से बचाया जाए। और इस से कहा जाता है कि इस उम्र की किशोरियों में प्रेगनेंसी की दर ४०प्रतिशत कम हो गई है।

अमेरिका जैसे संभ्रांत एवं विकसित देशों में स्कूल जाने वाली किशोरियों में प्रेगनेंसी होना कोई छुपी बात नहीं है। और कहा जा रहा है कि कोलोरेडो में इस तरह की सुविधा मिलने से टीन्ज़ को बड़ी राहत मिल गई है। वैसे तो वहां पर कॉपर-टी जैसे उपकरण फिट करवाने में ५०० डालर के करीब का खर्च आता जो कि ये लड़कियां करने में असमर्थ होती हैं और अपने मां-बाप से इस तरह के खर्च के लिए मांगने से झिझकती हैं।

ऐसा नहीं है कि इस तरह की दान-दक्षिणा वाले काम का कोई विरोध नहीं हो रहा.......वहां पर कुछ संगठन इस तरह की विरोध तो कर ही रहे हैं कि इस तरह से तो आप किशोरियों को एक तरह से फ्री-सैक्स करने का परमिट दे रहे हैं कि बिना किसी झँझट के, बिना किसी फिक्र के वे अब इस अवस्था में ही सैक्स में लिप्त हो सकती हैं। और यह भी चेतावनी दी गई है कि १३-१५ वर्ष की बच्चियों के यौन संबंध बनाने में वैसे ही कितने नुकसान हैं। और इन सब के अलावा यह यौन जनित बीमारियों (STDs--Sexually transmitted diseases) को बढ़ावा देने जैसा है।

दुनिया आगे तो बढ़ रही है, बड़ी एडवांस होती दिख रही है .....भारत ही में देख लें कि अभी तो हम असुरक्षित संभोग के तुंरत बाद या फिर चंद घंटों के बाद उस एक गर्भनिरोधक टेबलेट के लिए जाने के बारे में ही चर्चा कर रहे हैं कि किस तरह से उस टेबलेट का दुरूपयोग हो रहा है।

मैं कोई नैतिक पुलिस के मामू की तरह बात नहीं कर रहा हूं.... लेकिन जो है वही लिख रहा हूं कि कितनी अजीब सी समस्या दिखती है कि स्कूल जाने वाली १३-१५ की बच्चियों में इस तरह के कॉपर-टी जैसे उपकरण फिट कर दिए जाएं ताकि वे गर्भावस्था के झंझट से बच पाएं।

विकसित देशों की अपनी सोच है....हमारी अपनी है.......क्या किशोरावस्था में इस तरह के डिवाईस लगवा कर प्रेगनेंसी से बचना ही सब कुछ है, सोचने वाली बात है, कोई भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव, कोई पढ़ाई-लिखाई में रूकावट, यौन-संक्रमित बीमारीयां जैसे मुद्दे भी तो कोई मुद्दे हैं।

टीनएज प्रेगनेंसी विकसित देशों में (यहां का पता नहंीं, कोई आंकड़े नहीं...)एक विषम समस्या तो है ही, लेिकन उस से झूझने का यह तरीका मेरी समझ में तो आया नहीं। ठीक भी नहीं लगता कि कोई और ढंग का तरीका --उन की सोच बदलने का प्रयास- आजमाने की बजाए यह कॉपर-टी या इंप्लांट ही फिट कर दिए जाएं........न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी.. .......नहीं, नहीं, इस तरह की स्कीमों में दम नहीं है।

भारत में तो विमेन-एक्टिविस्ट एवं महिलारोग विशेषज्ञ अभी उस असुरक्षित संभोग के बाद ली जाने वाले टेबलेट के कुछ युवतियों-महिलाओं के द्वारा किए जाने वाले दुरूपयोग के बारे में ही जन-जागरूकता बढ़ा रही हैं कि इस गोली को नियमित बार बार लेना सुरक्षित नहीं है, हर पक्ष से......... हर पक्ष का मतलब तो आप जानते ही हैं।

Colorado birth control scheme casues drop in teen pregnancy  (BBC Report)