गुरुवार, 21 मई 2026

भूले-बिसरे किस्से- 1979 में शुरु हुए पंजाब पीएमटी के .....

पिछले कुछ दिनों से मन बहुत उचाट सा है ...नीट के पेपर की खबरें देख-पढ़ कर ....अनपढ़, कम पढ़े लिखे लोग, कल ही रईस बने लोग इस में लिफ्त हैं, कोई बड़ी बात नहीं ...लेकिन अच्छे खासे प्रोफैसर ही इस के मास्टर-माइंड निकले ....यह बहुत दुःखी करने वाली बात है ...अगर इन लोगों ने दलाली ही करनी थी तो कोई दूसरा धंधा ही चुन लेते, दिल्ली बंबई चले जाते ....ज़्यादा कमाई कर लेते ....लेकिन २३ लाख युवाओं से इतना बड़ा धोखा....युवा भी क्या, अभी बच्चे ही हैं वे सभी...१७ साल की कच्ची उम्र वाले सभी बच्चे ही तो होेते हैं, आंखों में कितने ही रंग-बिरंग सपने बसाए रखते हैं.....देखते हैं, क्या होता है इन दलालों का ....लेकिन लोगों की यादाश्त बहुत कमज़ोर है...भूल भुला जाएंगे कुछ वक्त के बाद....दो तीन दिन पहले अखबार में नीट के बारे में एक भी खबर नहीं है ...पहले तो मैंने सोचा कि शायद पहले पेज पर नहीं है, अंदर के पन्नों पर होगी...लेकिन नहीं, कहीं पर कुछ भी न था...।

अच्छा तो मैंने अपनी पिछली पोस्ट में उस सिस्टम की गंदगी की बात लिखी थी जहां पर एमबीबीएस बीडीएस के दाखिले का सारा दारोमदार प्री-मैडीकल की परीक्षा के नंबरों पर ही होता था....और इस में होशियार बच्चे तो बेशक ऊपर आते ही थे लेकिन इस के साथ शहर के रसूख वाले, ऊंचे रुतबे वाले अधिकारियों के बच्चे, कालेजों के प्रोफैसर, मेडीकल कालेज के प्रोफैसरों के भी अपने मां-बाप की पोजीशन के ज़ोर पर अच्छे नंबर पा लेते थे ...इस के पीछे की सारी कहानी मैंने उस पोस्ट में लिखी है ....इन लोगों में से भी शायद कुछ बच्चे होते होंगे होशियार लेकिन जब थोड़ी बहुत होशियारी के साथ मां-बाप की पोजीशन की वजह से प्रेक्टीकल और इंटर्नल एसेसमैंट में पूरे नंबर लग जाएं तो फिर तो वारे-न्यारे होएंगे ही ....

एमबीबीएस-बीडीएस की सीटें....1979 में ....

उस वक्त पंंजाब में तीन मैडीकल कालेज थे...सरकारी मैडीकल कालेज अमृतसर (150 सीटें), सरकारी मैडीकल कालेज पटियाला (150 सीटें), सरकारी मैडीकल कालेज फरीदकोट (60सीटें)...और दो डेंटल कालेज थे....सरकारी डेंटल कालेज अमृतसर (30 सीटें) और सरकारी डेंटल कालेज पटियाला (20 सीटें)....ये सब पंजाब की अलग अलग यूनिवर्सिटियों से सम्बद्ध थे ...गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला और फरीदकोट मेडीकल कालेज पंजाब यूनिवर्सिटी चंड़ीगढ़ से सम्बद्ध था....

1979 में शुरु हुआ पंजाब पीएमटी....

1979 में मैंने प्री-यूनिवर्सिटी (मेडीकल) की परीक्षा पास की ...उन दिनों पंजाब ने यह फैसला किया कि अब मेडीकल-डैंटल दाखिला प्री-मैडीकल के नंबरों के आधार पर न होकर, एक प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर किया जाएगा….जिसे प्री-मैडीकल टेस्ट (पीएमटी) कहा गया। 

पहली बार जब यह टेस्ट 1979 में हुआ तो इस के कुल अंक 60 थे ….और मैंने सुना था कि उन दिनों इस टेस्ट में छः हज़ार के करीब छात्र-छात्राओं ने अपना भाग अजमाया था …शायद एक हफ्ते के बाद रिजल्ट आया और बिना किसी तरह के शोर-शराबे के इस परीक्षा के आधार पर ऊपर बताए गए कालेजों में दाखिले हो गए ….

कुछ कमियां ज़रूर रह गई होंगी….लेकिन कभी किसी को पता नहीं चला …क्योंकि अगले ही साल से 1980 से इस के फार्मेट में बदलाव हुआ …

1980 के पीएमटी की आपबीती …..

आप बीती इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि यह पीएमटी मैंने दिया था …कोई भड़ास नहीं निकाल रहा हूं …बरसों से कुछ सवाल जो दिल में दबे पड़े हैं, उन का लिख देना चाहता हूं….वैसे भी भड़ास क्या निकालनी, मुझे जो मिला…वह उन दिनों भी हज़ारों को न मिल सका…। 

अच्छा, इस से पहले कि इस पेपर के कच्चा-चिट्ठा खोलना शुरु करूं…यह बता दूं कि पंजाब सरकार ने उन दिनों यह फैसला किया था कि हर बरस यह टेस्ट करवाने की जिम्मेदारी पंजाब की किसी एक यूनिवर्सिटी को बारी बारी से दी जाएगी…मुझे यह इस वक्त याद नहीं आ रहा कि 1979 में यह किस यूनिवर्सिटी ने कंडक्ट किया था …(गूगल करने से भी पता नहीं चला…)..खैर, मैंने पता कर के अब करना भी क्या है…मुझे 1980 वाले पीएमटी की बात रखनी है और उस के बारे में मुझे सब अच्छे से याद है। 

1980 में यह पीएमटी टेस्ट करवाने की जिम्मेदारी गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर को दी गई …

1980 में हमारा प्री-मैडीकल एग्ज़ाम हुआ ..(आज कल का प्लस-2) …यह परीक्षा अप्रैल में हुई …मई में रिजल्ट आ गया…69 प्रतिशत नंबर आए …बिना किसी ट्यूशन के,  प्रैक्टीकल में किसी माई-बाप के सहारे के ….। 

इतने में अखबार में पीएमटी का भी इश्तिहार आ गया …इसे वे छात्र दे पाएंगे जिन के प्री-मैडीकल में कम से कम 50 प्रतिशत अंक थे …आरक्षित वर्ग के लिए छात्र-छात्राओं के यह प्रतिशत 45 प्रतिशत था। चलिए, जी फार्म भर दिए….

अभी एक महीने का समय था पीेएमटी होने में ….डीएवी स्कूल ने एक महीने के लिए साठ प्रतिशत से ज़्यादा अंक पाने वालों शायद 60-70 छात्रों के लिए एक महीने के लिेए पीएमटी स्पैशल नाम की क्लासेस शुरु कर दीं …सारे सिलेबस की रिवीज़न के लिए…। भयंकर गर्मी वाले दिन थे …सुबह से दोपहर तक रोज़ कालेज जाते, दोपहर में थक-टूट कर आते और घर में आकर देर शाम तक सोए रहते। 

20 जून का दिन भी आना ही था……आ गया…

बकरे का मां कब तक खैर मनाती….20 जून 1980 का दिन आ गया ….पीएमटी परीक्षा का दिन….अच्छा उस दिन होने वाले पेपर का पैटर्न तो बता दूं पहले आप को …..

कुल अंक ..100 

फिज़िक्स -30, कैमिस्ट्री-30, बॉयोलॉजी-30, अंग्रेजी- 10 अंक…कुल हो गए ….100 अंक…

हां तो फ़िज़िक्स-कैमिस्ट्री का पेपर उस दिन सुबह के वक्त हुआ था …10 से एक वाली शिफ्ट में ….देखिए,जब चीज़ें लिखी नहीं जातीं तो सब कूछ भूल जाता है …अब मुझे यही याद नही्ंं आ रहा कि क्या हमें दस बजे ही दोनों पेपर-फ़िज़िक्स और कैमिस्ट्री के एक साथ दे दिए गए थे या डेढ़ घंटे बाद दूसरा पर्चा दिया गया था …जहां तक मेरी यादाश्त मेरा साथ दे रही है ..दोनों प्रश्न पेपर उत्तर पुस्तिकाओं के साथ हमें थमा दिए गए थे …हमारा सेंटर भी गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी कैंप्स ही बना था …सारे डरे सहमे चेहरे वहां दिखे…मेरे पिता जी मुझे लेकर गए थे …मुझे परीक्षा केंद्र के अंदर जाते कैसा लग रहा था?

कुछ खास नहीं …बस ऐसे लग रहा था जैसे कोई बकरा कसाईवाड़े की तरफ़ कदम बढ़ा रहा हो ….बिल्कुल जीने-मरने जैसी बात लग रही थी …

एक बजे के बाद दो घंटे की ब्रेक थी….इतनी धूप में बाहर कहां भटके कोई।उन दिनों आज से लगभग पचास साल पहले यूनिवर्सिटी नई नई बनी थी …और वहां पर पेड़-पौधे भी इतने नहीं थे …और जो थे भी, इतने बड़े नहीं थे कि छायादार हो चुके हों…(यह भी याद आ रहा है कि गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर की स्थापना 1969 में गुरु साहब की 500 वीं सालगिरह के उपलक्ष्य में की गई थी …)....। 

लंच ब्रेक के बाद ..बॉयोलाजी और अंग्रेज़ी का पेपर था …दोनों पेपर एक साथ दे दिए गए थे ….और समय सीमा थी दो घंटे …तीन से पांच बजे तक। 

चलिए, पांच बजते ही हम तो फ़ारिग हो गए ….

फिर अगले दिन से खबरें आने लगीं कि इस बार रिज़ल्ट एक हफ्ते के बाद निकल जाएगा….लेकिन वह हफ्ता भी ऐसा लग रहा था जैसे कि एक बरस हो ….उत्तर पुस्तिकाएं कहीं बाहर नहीं गईं ….सारे पंजाब से उत्तर-पुस्तिकाएं अमृतसर में ही जमा हो गईं और उन को जांचने वाले प्रोफैसर साहब उन की चैकिंग वहां आकर चलते थे …जहां तक याद आ रहा है, मेरे घर से यूनिवर्सिटी दो तीन किलोमीटर ही दूर थी …एक दिन साईकिल उठा कर ऐसे ही उधर का रुख किया ….रोड-इंस्पैक्टरी करने का भी उन दिनों अपना मज़ा होता है …जेबें खाली लेकिन दिल दुनिया भर के सुनहरे ख्वाबों से लदा हुआ ….

25 जून 1980 का दिन याद आ गया ….

अभी हम लोग अपने रिजल्ट का इंतज़ार कर ही रहे थे कि 25 जून का दिन आ गया ….शाम के वक्त पता चला कि संजय गांधी की एक हवाई-हादसे में मौत हो गई है …बहुत बुरा लगा था ….बहुत ज़्यादा बुरा…। 

आखिर 30 जून, 1980 भी आ गई ….

जी हां, रिजल्ट का दिन भी आ गया ….30 जून ..देर शाम के वक्त चौक पुतलीघर इलाके की एक दुकान में रिजल्ट का गजट आ गया था…छात्रों का हुजूम लगा हुआ था …एक छात्र से पांच रुपए लेे रहा था …और एक पर्ची पर छात्र का रोल नंबर लिख कर उस के आगे उस के प्राप्त किए अंक लिख रहा था और मेरिट लिस्ट में नंबर क्या था….यह सब लिख रहा था ….

मुझे भी जब मेरी चिट मिली …तो अंक थे …44 और मेरिट लिस्ट में नंबर 266…फौरन लगा कि एमबीबीएस की सीटें तो 360 हैं और मेरा नंबर 266 है, इस का मतलब हो गया अपना काम….

वहां पर रुका रहा ..दूसरे लोग भी रिजल्ट देखने आए थे …ऐसा नहीं कि वहां रुक कर अच्छा लग रहा था …बस, ऐसे ही खड़ा रहा …फिर से रिजल्ट भी देखा, दोबारा फीस देकर ….कहीं पहली बार गल्त ही न देख लिया हो …खैर, वही सही था …अंक 44 (रैंक 266)...

फिर वहां खड़े खड़े यह भी देखा कि लोग बातें करने लगे हैं कि 360 सीटों में आरक्षित वर्ग के लिए भी सीटें हैं…शायद उन दिनों आरक्षित सीटें -30-35 प्रतिशत ही थीं…बस, थोड़ी सी दिल की धड़कन बढ़ गई कि यार, यह तो मामला थोड़ा पेचीदा हो गया…। 

वहां खड़े खडे़ यह भी जाना कि इस बार कुल दस हज़ार एक सौ छात्रों ने पीएमटी दिया था ….पिछली बार 1979 में छः हज़ार ने दिया था…और पिछली बार के हारे पछाड़े सभी इस बार भी शामिल थे, फिर से पूरी तैयारी के साथ….(और यह संख्या आने वाले सालों में बढ़ती ही गई….) 

हां, जो मैंने फ़िज़िक्स, कैमिस्ट्री और बायोलाजी, अंग्रेज़ी के पर्चे के बारे में लिखा ऊपर उस का पैटर्न ऐसा था कि उस विषय के तीस अंकों में छ-चार, तीन, दो अंकों वाले डिस्क्रिपटिव सवाल भी थे और एक एक अंक वाले ओब्जैक्टिव सवाल भी थे …मल्टीपल-च्वॉईस….

पीएमटी के रिजल्ट के गजट को देखते हुए यह भी देखा कि यहां तो नंबरिंग प्वाईंट्स में हुई है …कहने का मतलब यह की टॉपर के कुल अंक थे …62 और उस के बाद 61.75, 61.50, 61.25, 61 और आगे भी ऐसे ही ….और 44 तक पहुंचते पहुंचते रैंक हो गया 266…

उस वक्त या उन दिनों तो यही लगा कि वाह, कितनी कड़क मार्किंग हुई है ….प्वाईंट्स में नंबर दिए गये हैं। इससे ज्यादा समझ भी न थी …बात वही है कि अगर समझ होती भी तो क्या ही किसी का उखाड़ पाता….
बहुत सालों बाद, जब यह मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला उजागर हुआ तो ख्याल आया कि पीएमटी जैसी परीक्षा में डिस्क्रिप्टिव सवाल …और वे भी छः नंबर के, चार नंबर के …इन में से न्यूमैरिकल तो दो तीन ही थे…बाकी में तो पेपर चैक करने वाले को पूरी छूट …अपनी मर्ज़ी से छात्रों की किस्मत का फैसला करने की पूरी छूट। 

पूरी ज़िम्मेदारी से लिख रहा हूं…मुझे नहीं पता कि किसी तरह के घोटाले हुए होंगे या नहीं, लेकिन क्या यही कम है कि पीएमटी में डिस्क्रिप्टिव सवाल पूछे गए …एक तो पेपर चैक करने वाले को पूरी छूट …ऊपर से उन दिनों में रुतबे-हैसियत के मुताबिक किसी पेपर-चैकर तक पहुंचना कोई इतना ही मुश्किल काम होता होगा….दुनिया उन दिनों भी बहुत आगे निकल चुकी थी ….। 

मैं बार बार एक ही बात दोहरा रहा हूं कि पंजाब के बुद्दिजीवी, अ्च्छे रुतबे वाले, अफसर, प्रोफैसर, डाक्टर, इंजीनियर …इन के बच्चे अपनी काबिलियत के बलबूते ज़रुर आए होंगे…….लेकिन ऐसा नहीं कि इन सब के सभी बच्चे ही एक ही बार में उस जयपुर के प्रापर्टी डीलर की तरह टैस्ट क्लियर कर लें….असंभव जान पड़ता है ना…..लेकिन उस पीएमटी के पहले 100 रैंक की लिस्ट देख कर यही लगा ….लेेकिन आज से पचास साल पहले ..कौन कहे, किसे कहे ..कब कहे और कैसे…….आज ही देख लीजिए नीट यूजी और पीजी का हम लोगों ने मज़ाक बना रखा है …उन दिनों तो कोई मुंह भी न खोल सकता था …….

लेकिन गंदगी और सड़न तो थी सिस्टम में …..इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मेरा 266 रैंक आया …आया तो आया….वह बात नहीं ……..लेकिन सिस्टम चल कैसे चल रहा था वह सारा मैंने ऊपर लिख दिया कि पीएमटी जैेसे पर्चे में छ-चार, तीन नंबरों के डिस्क्रिपटिव सवाल और ऊपर से कोढ़ में खुजली वाली कहावत को चरितार्थ करती ….नंबरों में प्वाईंट सिस्टम …। ऐसा कौन सा थर्मामीटर, बैरोमीटर मिल गया  उत्तर पुस्तिका जांचने वाले महान मास्टरों को कि ………………ऐसा क्यों किया गया, आप भी कल्पना कर सकते हैं। 

हां, लिखते लिखते बोरियत होने लगती है तो पोस्ट बंद करने का मन होता है …वही कर रहा हूं …इस बात के साथ उस साल आरक्षित वर्ग से जिस छात्र का दाखिला एमबीबीएस में हुआ …उस के अंक छः (6) थे और जिस की बीडीेएम में दाखिला हुआ था उस का स्कोर तीन (3) था…खैर, चलिए, यह बात तो हुई आरक्षित वर्ग की …….खैर, मैंने अपने 44 अंकों के साथ क्या किया….अगली पोस्ट में बताऊंगा…। 

वैसे उस दिन रिजल्ट देखने के बाद जब साईकिल पर घर लौट रहा था तो मन मरा हुआ सा था….बहुत बोझिल महसूस कर रहा था कि पता नहीं 360 सीटों वाले कोर्स में 266 रैंक (ओपन वर्ग) होने पर भी कोर्स में घुस पाऊंगा भी या नहीं …आरक्षित सीटों की गिनती का सही पता नहीं चल रहा था …लेकिन मन उदास ही था….

हां, रिजल्ट के दो दिन पहले आशा फिल्म देखी थी ….बार बार अगले कुछ दिनों तक वह गीत याद आता रहा जैसे मेरे लिए ही आनंद बक्शी ने इसे लिख कर, लता जी ने गा कर , रीना राय पर फिल्माने के लिए दे दिया हो …शीशा हो या दिल हो ….टूट जाता है ….हां, ऐसे लग रहा था टूट रहा है दिल….इश्क विश्क का तो नाम ही न पता था, हां, रिजल्ट की वजह ही से टूट रहा था ….ऐसे लगता रहा अगले कईं दिनों तक …बाद में क्या हुआ, उसे अगली पोस्ट में पोस्ट करता हूं….जुडे़ रहिए….

हां, एक बात और ...मैं अपने इस ब्लॉग में अपने पुराने पीएमटी कार्ड को ढूंढ रहा था कि एक पोस्ट में मुझे मेरा प्राईमरी क्लास का कार्ड मिल गया ...फोटो के साथ ...हा हा हा हा हा ...लगा रहा हूं यहां पर ....

Primary Merit Scholarship - one of biggest events in my life....1973😎

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