जब स्कूल में पढ़ते थे तो सवेरे की सैर से इतना नाता था कि हिंदी में कईं बार निबंध लिखने को दिया जाता था ..सुबह की सैर के लाभ…। हमारे घर के बिल्कुल पास रेलवे का एक अस्पताल था ..यही कोई १९७० के आसपास की बातें हैं ये ….सुबह सुबह आते जाते इक्का-दुक्का लोग फांटे वाले पायजामे में हवाई चप्पल पहने टहलते दिख जाते …उन को देख कर इतनी उदासी क्यों छा जाती थी…बड़ा डिप्रेसिंग मंज़र होता था …पता ही नहीं चलता था कि कौन मरीज़ है और कौन सेहतमंद…क्योंकि उन दिनों रेलवे अस्पताल में भी फांटां वाले (सफेद-नीले स्ट्राइप्स) पायजामे वाली वर्दी मरीज़ों को मिलती थी …और कालोनी में टांवे टांवे लोग जो टहल रहे होते उन को देख कर रेलवे वार्डों में दाखिल मरीज़ों का ध्यान आ जाता ….
हमें नहीं याद कि बचपन में या जवानी में कभी सुबह टहलने का कभी हमारा रुटीन रहा हो ..हां, गर्मी की छुट्टियां शुरु होती थीं तो शुरुआत २-३ दिन सुबह सुबह ज़रूर टहलते थे ..बहुत मज़ा आता था…ठंड़ी ठंडी हवा, कोयल की कू-कू-कू-कू…चिरैया, तोते …सब अपनी मस्त में मस्त…
कट टू …साल 2000-2001….
बस, ऐसे ही चल रहा था ….३०-४० साल की उम्र के दौरान नया नया सुबह टहलने का शौक जागा तो कभी कभी चले जाते थे …लेकिन नियमित कभी नहीं …।
फिर ३५-४० साल की उम्र में पंजाब में रहते हुए एक इंगलिश की किताब हाथ में पड़ गई …व़ॉकिंग के ऊपर थी …बहुत अच्छी थी …उस में यही लिखा था कि आदमी के लिए पैदल चलना एक प्राकृतिक वरदान है….वह बना ही चलने के लिेए है…
बहुत सी बातें थीं उसमें ऐसी ही…अच्छी लगीं, कुछ दिन सुबह सैर के लिए निकलना शुरु हो गया…फिर कुछ ही दिनों बाद बंद भी हो गया…फिर बीच बीच में कभी मन हुआ तो टहल लिया…किसी दिन साईकिल लेकर निकल गए….यह सब चलता रहा …फिर फिश्चूला परेशान करने आ गया….दो तीन साल वह बहाना चल गया कि न तो इस की वजह से चला जाता है और न ही साईकिल की सीट पर बैठ पाता हूं …जी हां, बिल्कुल तीन साल इसी चक्कर में घर बैठे निकल गए …।
२००७ में मैंन यह ब्लॉग लिखना शुरु किया…अलग अलग शहरों में रहे …पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश …हर जगह के अपने निराले अनुभव …सुबह की सैर के भी अनुभव …मैं ये सब अपने ब्ल़ॉग में लिखता रहा ….
आज ख्याल आ रहा था कि ऐसे दर्जनों लेख इस ब्लॉग में पड़े होंगे जिस में सुबह की सैर का भ्रमण है …प्रेरणादायी लेख हैं…९० साल के बुज़ुर्गों को टहलते देखा, वॉकर लेकर बुज़ुर्ग महिलाओं को सुबह सवेरे टहलते देखा…ऐसे बुज़ुर्गों को भी टहलते देखा जो किसी सहायक के साथ आए थे, कुछ तो व्हील-चेयर पर आए थे ….सब मंज़र मैंने इस ब्लॉग में सहेज रखे हैं….
सुबह सैर के न निकलने के अनगिनत बहाने हैं…जो मैंने इस्तेमाल किए …नींद पूरी नहीं हुई, आज थोड़ी जल्दी है, कल से करेंगे, आज मौसम उमस वाला है, सुबह सुबह ही इतनी गर्मी हो गई है, घर बैठे ही इतना पसीना आ रहा है, आज कल सूरज इतनी जल्दी उदय हो जाता है (देखिए, सूरज देवता तक से गिला शिकवा …भई, उस का तो सदियों का पक्का टाईम-टेबल है), फिर गर्मी हो जाती है, सड़कों पर सुबह सुबह ही ट्रैफिक हो जाता है …वातावरण प्रदूषण, बरसात में रास्तों में कीचड़…..कितने बहाने गिनाऊं …लिस्ट तो कभी खत्म न होगी…
लेकिन तीन चार साल पहले एक बार टहलने निकला तो कॉलोनी का कुत्ता पीछे पड़ गया….डर गया भई, कोई भी डरेगा ही …कॉलोनी की सुनसान सड़कें और कुत्ता ऊपर उछलने के लिए तैयार …उस के बाद सुबह सुबह पैदल कॉलोनी से बाहर जाने की हिम्मत न हुई …….कईं बार पास ही के एक पार्क में टू-व्हीलर पर निकला भी …लेकिन स्कूटर पर भी जब एक दो बार कुत्ते पीछे पड़ गए …तो बस, सुबह सवेरे यह टहलना-वहलना लगभग बंद ही है … बस, अपने दैनिक कार्यों में जितना चलना-फिरना हो जाता है , वही है ..उस के लिए भी शुक्रगुज़ार हूं …।
हां, तो मुझे यह पोस्ट लिखने का खयाल आया कैसे ..कुछ दिनों से आ रहा था …मैं जितने भी शहरों में रहा हूं उन सभी में सुबह टहलने के जितने भी प्रेरणादायी मंज़र देखे हैं ..वे सब लिखे हैं…कुछ अलग सा दिखता है तो लिखने की इच्छा होती है …
वैसे तो मुंबई या दिल्ली की हाउसिंग सोसायटी के अंदर ही लोगों को टहलते देखा है …शुरू शुरु में हैरानी भी होती थी कि यह क्या हुआ टहलना ….फिर धीरे धीरे बात पल्ले पड़ गई कि इन को शाबाशी इस बात कि ये लोग घर से बाहर तो निकले हैं…इन का चलने का जज़्बा तो कायम है …चलेंगे तो पहुंच भी जाएंगे, एक बात है …वैसे पहुंचना कहां है, इस सफ़र की ही अहमियत है …।
हां, तो कुछ लोगों से बातचीत से पता चलता था …खासकर के बुजुर्ग औरतों से कि वे अपनी बिल्डिंग की छत पर ही टहल लेती हैं…शारीरिक हालत की वजह से ..बाहर निकल नहीं पातीं और टैरेस पर ही टहल लेती हैं…कईं बार कुछ ऐसे बुज़ुर्गों को देखा भी टहलते हुए…।
लेकिन कुछ दिनों से एक बिल्डिंग के ऊपर टैरेस पर एक स्वस्थ, चुस्त-दुरुस्त दिखने वाले बंदे का टहलना भी कम प्रेरणादायी नहीं है ….टैरेस से समंदर दिखता है, सुबह सुबह की ताज़ा हवा, पंक्षियों का चहकना …इन सब के बीच छोटे से टैरेस के ऊपर तेज़ तेज़ टहलना ….वाह, बहुत बढ़िया …कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन किसी के लिए भी इंस्पिरेशन हो सकती है ….उस बंदे ने कान में बड़े बड़े स्पीकर लगाए होते हैं, और स्पोर्ट्शू भी पहने होते हैं और वह तेज़ तेज़ चल रहा होता है और पूरे ३०-४० मिनट तक टहलता है ….जैसे अपने आस पास की बिल्डिंग में रहने वालों को एक ज़रूरी पाठ भी पढ़ा रहा है ……सुबह की सैर के लिए मौसम नहीं, मन चाहिए।
अगर पोस्ट पढ़ते पढ़ते आप यहां तक पहुंच ही गए हैं तो मेरी सलाह है कि इस गीत को भी सुन लीजिए..(यह रहा इस का लिंक) शायद इसी से प्रेरणा मिल जाए….
मुझे याद है मैं स्कूल में था और यह फिल्म आई थी- शोर ..१९७२ में ..कक्षा तीन या चार में रहा हूंगा.. और मनोज कुमार की देखा-देखी हमारी कॉलोनी में भी इस तरह के आयोजन होने लगे थे कि कोई युवक हमारी कॉलोनी की ग्राउंड में सात दिन लगातार साईकिल चलायेगा…हमारा क्या था, हमारा दिन बढ़िया कट जाता था, हर दिन स्कूल से लौटने पर उसे देखने चले जाते थे ….और साथ में स्पीकर पर गाने बज रहे होते थे …बढ़िया टाइम-पाइस …..हमारे ज़माने में मुफ्त के इस तरह के टाइम-पास बहुत होते थे …और नहीं तो अड़ोस-पड़ोस में कोई शादी-ब्याह, कीर्तन, जागरण से पहले स्पीकर पर गीत बजने लगते थे …बस, हो जाता था अपना उस दिन तीन चार घंटे के लिए मन बहलाने का जुगाड़….किताबें-कापीयां परे रख देते थे …कौन रटता फिरता अपने स्कूल के पाठों को इतने शोर-गुल में …देख लेंगे …पढ़ाई ही करनी है न, कर लेंगे बाद में …अभी तो कटी पतंग, शोले, दाग के गाने सुनें इत्मीनान से ….
गीत तो यह भी बेहतरीन है ..भोर गए पंछी धुन यह सुनाएं ...जागो रे गई रुत फिर नहीं आए...