रविवार, 31 जुलाई 2011

गुमराह करने वाली हैल्थ किताबों पर रोक लगाने से होगा क्या !

अभी अभी एक खबर दिख गई कि चीन ने सेहत से संबंधित 104 ऐसी किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया है जिन में बेबुनियाद, झूठे दायवे किये गये हैं, गलत एवं गुमराह करने वाली जानकारी लोगों को मुहैया करवाई जा रही है। वैसे काम तो चीन ने अच्छा किया है।

लेकिन यह खबर का पहला पैरा पढ़ते ही मुझे एक बात का ध्यान आ गया ---कहीं पढ़ी थी... दुनिया में कांटों से बचना चाहते हैं? –तो फिर आप सारी दुनिया की ज़मीन पर कॉलीन बिछा दें ......लेकिन इस से कहीं बेहतर है कि आप स्वयं ही जूते पहन लें।

बात कितनी सही है!!

व्यक्तिगत तौर पर मुझे लग रहा है कि इस तरह के प्रतिबंध लगाने से शायद सरकारी आंकड़ों का पेट तो भर जाता हो ...उन का पेट भी तो भरा रहना ज़रूरी है ताकि सब को समय पर पदोन्नति मिलती रहे, कुछ तो प्रोजैक्ट करने के लिये चाहिए।

कुछ कुछ किताबों के बारे में सोच रहा हूं जिन पर प्रतिबंध लगाया गया ... लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह से तो शायद इन को ज़्यादा पब्लिसिटि मिलती होगी... आज के दौर में किताबों की कापियां खरीदना कौन सा मुश्किल काम है। फिर भी, जो भी हो, चीन को इस बात की बधाई कि उस ने इस के बारे में सोच कर पहल तो की।

दूसरी बात यह भी है कि इंटरनेट के दौर में इस तरह के कदम कितने समुचित हैं, पता नहीं। सब कुछ नेट पर बिखरा-सिमटा पड़ा है, बस एक क्लिक की दूरी पऱ। ठीक है, आम आदमी इस से अभी दूर ही है लेकिन उसे भ्रमों में उलझाए रखने के और भी बहुत से साधन हैं।

भारत की ही बात करें तो टीवी पर तरह तरह के बाबाओं का जमावड़ा लगा रहता है जिनमें से बहुत से इतनी अंधश्रद्धा को बढ़ावा दिये जा रहे हैं कि क्या कहें ....अभी चंद मिनट पहले ही देख रहा था कि एक बाबा अपने सिंहासन पर बैठा बैठा अजीबोगरीब समाधान बताए जा रहा था ...और आज ध्यान से देखा कि पब्लिक में उस के बाउंसर भी खड़े हुये थे।

आज के ही हिंदी अखबार से एक हैंड-बिल निकला है .......जिस का शीर्षक है ...दवा से मुक्ति..इस में एक डाक्टर का नाम बताया गया है कि उस ने एक ऐसी चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है जिसमें दवा खाने या लगाने की आवश्यकता बिल्कुल ही नहीं होती है। अच्छा, इस में लिखी बातें हु-ब-हू यहां लिख रहा हूं ...

इस पद्धति के माध्यम से किसी भी प्रकार के असाध्य एवं साध्य कहे जाने वाले रोग जैसे सांस की बीमारी, हृदय रोग, मूत्र रोग, लकवा, गुर्दे फेल, मानसिक रोग, गुप्त रोग, कैंसर, गठिया, वात्, एड्स, मिरगी, चर्म रोग, डायबिटिज, उच्च रक्तचाप, बांझपन, हार्मोन संबंधित विकारों का निदान सफलता पूर्वक किया जा रहा है। इस पद्धति में मरीज़ के शरीर से एक बाल लिया जाता है, और रोगी के बाल के माध्यम से दवा का प्रसारण किया जाता है।.....

बस, यार, अब और नहीं मेरे से इस के बारे में लिखा जायेगा।

हां, तो बात चल रही थी बेबुनियाद दावों की, झूठी उम्मीद दिलाने की .... कुछ ऐसे रोग हैं जिन के उपचार से संबंधित कुछ चिकित्सकों ने अपनी साइट बनाई हुई है ... बस, फलां फलां असाध्य रोग का इलाज तो बस उन के ही पास है, बहुत बहुत आकर्षक वेबसाइटें ....और एक मित्र बता रहा था कि एक एक विज़िट के लिये इन के यहां डेढ़ हज़ार के करीब खर्च आ जाता है।

एक वैज्ञानिक सोच यह कहती है कि आज की तारीख में अगर हम सोचें कि कुछ असाध्य बीमारियों का उपचार केवल गिने चुने चंद हकीमों-चिकित्सकों के पास ही है, तो हम बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। हर तरफ़ भोली भाली जनता को - - या बनाने की होड़ सी लगी दिखती है। बेचारा किसी न किसी कांटे में तो फंस ही जाता है, कोफ़त होती है ऐसे लोगों से जो चंद सिक्कों के लिये बीमारी से पहले ही से परेशान पब्लिक को सब्ज-बाग दिखाते हैं....पैसे ऐंठते हैं... विदेशी गाड़ियों में घूमते हैं, विदेश यात्राएं करते हैं... there is just one word to describe them ….Dubious souls!

अगर किसी बीमारी के लिये कोई इलाज आता है तो विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं उस की जांच करती हैं.....बहुत बड़ी व्यवस्था है यह सब.....इसलिये किसी को यूं ही - - या बनाने से ये हाई-फाई ड्रामेबाज गुरेज ही करें तो ठीक होगा ... वरना अगर कल मैं भी यह घोषणा कर दूं कि मैंने दांतों की सड़न से बचने के लिए एक चोपड़ा मंजन तैयार कर लिया है, जब ऐसी कोई बात है ही नहीं, अगर कुछ किया होता तो मेरे कुछ कहने से पहले पूरा विश्व इस के बारे में कहने लगेगा ....लेकिन सब तरह के परीक्षण होने के बाद, ऐसे दायवों की पूरी सुरक्षा जांच होने के बाद ................फिलहाल, वैसे मेरा कोई ऐसा अभिलाषा है भी नहीं... न ही इतनी समझ है, न ही टाइम है, बहुत सा समय तो आप के साथ बातें करने में ही निकल जाता है, मंजन कब तैयार करूंगा, रिटायर होने के बाद जब कहीं खोखा-वोखा खोलूंगा तो देखूंगा .......

बहरहाल, बात को यही कह कर विराम दे रहा हूं कि कितने भी झूठे क्लेम आने लगें, कितनी भी भ्रामक सामग्री प्रिंट होने लगे, कितने भी लोग मीडिया में लोगों को - - या बनाने में लगे रहें, बस अगर हम एक आम आदमी को थोड़ा सा सचेत कर सकें उस की सेहत के बारे में ...उस के सरोकारों के बारे में ....तो बस हो गया अपना काम.................इतना ही काफ़ी है, बाकी सब तो ईश्वर कर ही रहा है।

पोलियो की दो बूंदों से चूकना खिला सकता है जेल की हवा

नाईजीरिया में विभिन्न भ्रांतियों के चलते कुछ गरीब इलाकों में रहने वाले मुस्लिम समाज से संबंध रखने वाले लोग पोलियो कीLinkLink दो बूंदें अपने बच्चों को पिलाने के हक में नहीं है। इस के लिये वे अजीबोगरीब बहाने बनाते हैं... जो लोग पोलियो की खुराक पिलाने उन के घर में आते हैं, उन्हें कह देते हैं कि यहां कोई छोटा बच्चा रहता ही नहीं, और कुछ जगहों पर तो इन चिकित्सा कर्मियों को घर में घुसने ही नहीं देते..... कईं बार कह देते हैं कि वे रिश्तेदार के यहां किसी दूसरे शहर में गये हुये हैं। सोचने वाली बात यह है कि क्या यह सब केवल नाईज़ीरिया में ही हो रहा है ?

लेकिन दक्षिणी अफ्रीका ने भी इस का समाधान लगता है निकाल ही लिया है... अब जो मां-बाप अपने बच्चों को ज़िंदगी की ये दो बूंदे पिलाने से आना कानी करेंगे उन्हें हवालात की हवा भी खानी पड़ सकती है।

यह रिपोर्ट पढ़ते ध्यान आ रहा था कि देशों की सरकारें इस तरह के अभियानों पर करोडो-अरबों रूपये-डालर-पाउंड खर्च करती हैं लेकिन इतने वर्ष बीतने के बाद भी अभी तक लोगों के दिलों-दिमाग पर भ्रांतियां इतनी ज़्यादा हावी हैं जिन के चलते इस तरह के अभियानों को झटका तो लगता ही है।

अचानक ध्यान आ गया 1990 के दशक का ही ... जिन दिनों यह अभियान शुरू हुआ ... उन दिनों अखबारों में यह भी छपता था कि कुछ लोगों ने यह वहम पाल लिया था कि कहीं ये बूंदे बिना वजह बार बार पिला कर उन के बच्चों को खस्सी करने की तो साजिश नहीं चल रही ... खस्सी करने का मतलब तो समझते ही होंगे ... बस, इतना ही समझना काफ़ी है कि पंजाबी में खस्सी उसे कहते हैं जो अपनी प्रजनन-क्षमता खो दे ....और इसे अनेकों बार मजाक के दौरान इस्तेमाल भी किया जाता है। तो, इस मुहिम को शुरू शुरू में अपने यहां भी कुछ लोगों द्वारा एक तरह की नसबंदी के तौर पर ही देखा जाता था। सच में भ्रांतियों का कुचक्र तोड़ना कितना मुश्किल है!!


Full marks for this compaign

पल्स-पोलियो का यह अभियान 1990 के दशक में शुरू होने के बाद लगातार जारी है .... कितने वर्षों से रविवार के दिन कुछ कुछ महीनों बाद यह मुहिम चलाई जा रही है .....वर्ष 2002 के आसपास मेरे कुछ लेख इस समस्या पर समाचार पत्रों में छपे थे।

पोलियो को जड़ से खत्म करने के लिये यह हम सब का साझा दायित्व बनता है कि हम अपने स्तर पर इस अभियान को कामयाब बनाने हेतु बढ़ चढ़ कर सहयोग दें....यह सारे विश्व की भलाई के लिये है।

रोबोटिक सर्जरी से आप्रेशन किए जाना कितना फायदेमंद है?

एक वेबसाइट है .. www.healthnewsreview.org ...यहां पर प्रिंट,इलैक्ट्रोनिक एवं न्यू मीडिया पर अंग्रेज़ी में छपी मैडीकल न्यूज़-रिपोर्ट की खबर ली जाती है....इनके कुछ बढ़िया से मापदंड हैं जिन के द्वारा यह तय करते हैं कि जो मैडीकल न्यूज़ छपी है ...यह कहीं गुमराह करने वाली तो नहीं है....हां, ये मैडीकल विषय पर छपी ख़बरों को उन की श्रेष्ठता के अनुसार स्टार दिये जाते हैं ..जिस स्टोरी की कवरेज बिल्कुल संतुलित एवं इमानदारी से की गई होती है उसे पांच स्टार दिये जाते हैं ..इस वेबसाइट पर अभी तक की सभी पांच सितारा स्टोरियों के लिंक भी पड़े हुये हैं।

अभी देख रहा था कि इन्होंने एक बहुत अनुभवी सर्जन के ब्लॉग के ऊपर टिप्पणी की थी ... ब्लॉग में उस सर्जन ने रोबोटिक सर्जरी के बारे में अपना दिल खोला था ... उस ने लिखा है कि यह किसी भी तरह से पारंपरिक लैपरोस्कोपिक सर्जरी से उत्तम विकल्प नहीं है.... ब्लॉग का नाम ही बहुत बढ़िया लगा ... Skeptical scalpel.

यह जानकारी बहुत ज्ञानवर्धक है ... इसे आप को भी देखना चाहिए ....पहले तो आप हैल्थ-न्यूज़ रिव्यू के प्रकाशक का लेख देखें और फिर उस में दिये एक लिंक पर जा कर उस सर्जन के तथ्यों पर आधारित अनुभव पढ़िए --- केवल यह जानने के लिये कि ज़रूरी नहीं कि कोई तकनीक अति आधुनिक है तो उस के उतने फायदे भी होंगे।

आज वैसे भी चिकित्सा अनुसंधान मार्कीट शक्तियों के हाथों की कठपुतली सा बनता जा रहा है ..ऐसे में किसी की सच्ची एवं इमानदार बातें इस तपिश में हवा के ठंडे झोंके सा काम करती हैं।

शनिवार, 30 जुलाई 2011

एक्सपॉयर दवाईयों को आप कैसे फैंकते हैं?

कुछ दिन पहले की बात है मेरे बेटे ने मेरे से अचानक पूछा कि पापा, आप इस्तेमाल किये हुये ब्लेडों का क्या करते हो, उस का कारण का मतलब था कि उन को आप फैंकते कहां हो? …मैं समझ गया... मैं उस को कोई सटीक सा जवाब दे नहीं पाया....लेकिन मुझे इतना पता है कि वह भी इन्हें घर के कचरेदान में कभी फैकना नहीं चाहेगा।

एक कारण तो यही है कि उस ने कभी मेरे को ऐसा करते देखा नहीं... क्यो? आप को भी उत्सुकता हो रही होगी कि आखिर मैं इस्तेमाल किये गये ब्लेडों का करता क्या हूं। वैसे आजकल तो मैं इलैक्ट्रिक शेवर ही इस्तेमाल करता हूं ... लेकिन आजकल ह्यूमिडिटि बढ़ जाने से यह ढंग से काम नहीं करता ... इसलिये वही ट्विन ब्लेड इस्तेमाल कर लेता हूं ...जिसे कहीं भी फैंकने में सोचना नहीं पड़ता।

लेकिन बहुत वर्षों तक आम ब्लेड़ों से ही दाढ़ी बनाता रहा हूं लेकिन कभी भी याद नहीं पुराने ब्लेडों को कूडेदान में फैंका हो ... कारण? कारण तो लंबा चौड़ा नहीं... बस इतना सा ही है कि यार, हमारी वजह से किसी को कोई चोट क्यों पहुंचे...पहले तो जो घर में जो आप के डोमैस्टिक हैल्प है उसे चोट लगने का डर, फिर घर के बाहर कचरेदान से किसी जानवर आदि के चोट लगने का अंदेशा, फिर उन वर्करों को चोट लगने का चांस जो आज भी बिल्कुल थोड़े थोड़े पैसों में ट्राली में कूडा भरने का काम करते हैं, और आगे से आगे वे रैग-पिकर उन गार्बेज ग्राउंड से कूड़ा बीनेंगे....................कमबख्त इतने लोगों को घायल करने से अच्छा है दाढ़ी से न बनाई जाए।

मैं इस्तेमाल किये ब्लेड़ों को ऐसे ही कहीं अपनी स्टडी रूम की खिड़की आदि में रख दिया करता था .. जहां पर उसे पड़े पड़े इतना जंग लग जाया करता था ..... पता नहीं, ऐसी वस्तुओं ..ब्लेड, सूईंयों, कांच के टुकड़ों को कचरेदान में फैंकते डर लगता है । मुझे याद है एक बार मैं इन सब ब्लेडों को इक्ट्ठे कर के अस्पताल ले गया था क्योंकि वहां पर sharp objects को डिस्पोज ऑफ करना का अपना सलीका होता है क्योंकि Pollution Control Board की आजकल निगाहें अस्पतालों पर तो खासकर टिकी रहती हैं....अच्छा भी है, इस में सब की भलाई निहित है।

हां, तो इस बात का ध्यान आज ऐसे आया कि नेट पर एक शीर्षक दिख गया कि इस्तेमाल करने के बाद बची हुई दवाईयों (इस का मतलब एक्सपॉयर लें) को कैसे फैंकें? मैं जिस लेख की बात कर रहा हूं उस में लिखा था कि बची हुई दवाईयों को सिंक में या टायलेट में न गिराएं ...इस से जल प्रदूषण तो होता ही है जिस की वजह से साथ में जानवर एवं अन्य लोग बीमार पड़ सकते हैं। और साथ में यह सिफारिश की गई थी ...

Remove the label from the bottle, then place the bottle inside a sealed plastic bag.
Throw the sealed bag in the garbage, and keep pets and children away from this trash.
If you need to dispose of pills, grind them up first. Mix the crushed pills into used coffee grounds, sand or cat litter.

हां, बोतल से लेबल हटाने की बात ठीक है, लेकिन फिर उसे किसी प्लास्टिक बैग में सील कर के कूड़ेदान में फैंकने के लिये कहा गया है और साथ में कहा गया है कि पालतू जानवरों को और बच्चों को इस क्लेश से दूर रखिए .....चलिए, इतनी ज़हमत उठा भी ली, लेकिन क्या बाहर घूमने वाले पशु इस प्लास्टिक को नहीं खा जाएंगे, आए दिन अखबारों में देखते हैं किस तरह से इन जानवरों की प्लास्टिक खाने से मौत हो जाती है। अगर ये पालतू नहीं हैं तो फालतू भी नहीं हैं .... इसलिये हम लोग इस तरह की दवाईयों से कैसे निजात पाया करें, इस के लिये आप भी कुछ सोचें और सुझाव लिखिए ...

और गोलियों (टैबलेट) को फैंकने से पहले कहा गया है कि पहले उन्हें पीस लें, फिर उन्हें इस्तेमाल की गई कॉफ़ी से या रेत आदि से मिला कर फैंक दें ...................थोड़ा मुश्किल सा नहीं लगा काम, या मुझे ही ऐसा लगा ...लेकिन हम लोग एक्सपॉयरी आदि वाली टैबलेट्स को उन की स्ट्रिप से निकाल कर ---बहुत बार हाथ ही से तोड़ कर कचरेदान में फैक देते हैं ... आप के क्या सुझाव हैं ? ..मैं आप के सुझावों का इंतज़ार कर रहा हूं।

सुझाव देना मत भूलिये ....

नहाने वाले पावडर (Bath salts) पर क्यों हो रहा है हंगामा

Bath Salts का अगर हिंदी में अनुवाद करना हो तो यही तो कहेंगे--- नहाने वाले पावडर या फिर बिल्कुल देसी भाषा में नहाने वाले मसाले। सुना तो मैंने इन के बारे में बहुत बार था ...लेकिन कभी विस्त्तृत से इन के बारे में जानने की कोई कोशिश नहीं की। याद आ रहा है कि जहां पर भी इन के बारे में पढ़ा बड़ा नैगेटिव सा पढ़ा जैसे कोई इन्हें इस्तेमाल कर के बहुत बुरा काम कर रहा है। जो भी हो, मेरी सोच यही थी कि ये bath salts कुछ पावडर-वाउडर होंगे जो बाहर देशों में नहाने के समय पानी में डाल लेते होंगे। लेकिन मेरा अनुमान केवल आंशिक रूप तक ही सही था, इस की थोड़ी चर्चा करते हैं।

आज सुबह भी जब मैं न्यू-यार्क टाइम्स देख रहा था तो फिर एक बार कुछ ऐसी खबर दिखी कि बॉथ-साल्ट के ऊपर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। सुबह समय मेरे पास कम था लेकिन मैंने सोचा कि आज तो इन के बारे में जानना ही होगा कि इन के इस्तेमाल का आखिर लफड़ा है क्या। मैंने तभी गूगल बंधु की सहायता से इस के बारे में जानना चाहा।

मैं बहुत खुश हुआ कि मेरा अनुमान सही निकला कि यह तो बस कुछ साल्ट हैं जिन्हें नहाते समय पानी में मिला कर ताज़गी का अहसास हो जाता है, स्फूर्ति सी महसूस होने लगती है। इस के बारे में और पढ़ कर पता चला कि ये समुद्र से प्राप्त होने वाले साल्ट हैं (‌sea salts) हैं....और अगर ये शुद्ध रूप में मिलते हैं तो ताज़गी का अहसास होता है, नहाने वाला हल्कापन महसूस करता है...नहाने समय इस पावडर की केवल एक चुटकी ही काफ़ी है.....और बताया गया था कि अगर इस को किसी तरह से मार्कीट में मॉडीफाई किया जाता है तो इस के बहुत से गुण नष्ट हो जाते हैं।

लेकिन मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी ....भला ऐसी छोटी मोटी चीज़ को प्रतिबंधित किये जाने का क्या फितूर है? लेकिन एक दो पन्ने देखने पर सारी बात समझ में आ गई।

हां, तो bath salts (बॉथ-साल्ट) जिन पर प्रतिबंध लगाने की बात की जा रही है उस का इन नहाने वाले बाथ-साल्ट (जो कि समुद्री साल्ट है) से कोई संबंध नहीं है।

बाथ-साल्ट के नाम से दरअसल कुछ नशे मिलते हैं ... और ये पावडर एवं क्रिस्टल रूप में बिकने वाले नशे समुद्री साल्ट (बाथ साल्ट) की तरह दिखते हैं इसीलिये इन्हें बॉथ-साल्ट कह दिया जाता है .....एक बहुत ही भयानक तरह की नशा है..इस नशे को अधिकतर ऑन-लाइन खरीदा जाता है –इस का इंजैक्शन लगाया जाता है, या तो इसे किसी सिगरेट आदि में डाल के पी लिया जाता है(smoking) ..या फिर इसे नसवार की तरह सूंघ कर ही काम चला लिया जाता है।

बाथ-साल्ट नामक नशे में भयानक साल्ट – Mephedrone एवं methylenedioxypyrovalerone (MDPV) होते हैं और इन के इस्तेमाल से नशा इतना गहरा होता है कि आदमी बिल्कुल अजीबो-गरीब हरकतें करना लगता है, उसे यह लगने लगता है कि कोई उसे मार देगा या बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा देगा (paranoid symptoms) ....बिल्कुल अजीबो गरीब हरकतें ....और इन की वजह से इन्हें एमरजैंसी विभागों में लेकर जाना पड़ता है।

तो एक बात अब समझ में आ गई कि यह जो बाथ-साल्ट हैं इन में आदमी के बनाए हुये कैमीकल(रासायन) मौजूद रहते हैं -- Mephedrone एवं methylenedioxypyrovalerone (MDPV) जिन का प्रभाव बिल्कुल ख़त के पत्तों जैसा होता है ...अब यह ख़त के पत्ते किस बला का नाम है, इसे जानने के लिये मेरे इस लेख पर चटका लगाएं।

यह बाथ-साल्ट बहुत महंगे मिलते हैं ... 50 मिलीग्राम (एक ग्राम का बीसवां हिस्सा) 25 से 50 यूएस डालर में मिलता है... पहले यह नशा ब्रिटेन में खूब चलता था लेकिन वहां पर इस पर प्रतिबंध 2010 में लगा दिया गया था .... बस ज़रा ठहरिये ... किसी ऐसी वैसी बात में हम कैसे पीछे रह जाएं ... विशेषज्ञों का कहना है कि इन बाथ-साल्टों की अधिकतर सप्लाई चीन एवं भारत से आती है क्योंकि वहां पर कैमीकल बनाने वाली फैक्टरियों के ऊपर सरकारी निगरानी इतनी पुख्ता नहीं है ... यह मेरी स्टेटमैंट नहीं है ...न्यू-यार्क टाइम्स के इस लेख में ऐसा ही कुछ लिखा है।

बात एक और भी है, अधिकतर सप्लाई चीन और भारत से जाए और यहां के बशिंदे इस से महरूम रह जाएं ....लगता नहीं ना ऐसा हो सकता है ....तो फिर का मतलब यह कि ये सब नशे इस देश में भी इस्तेमाल तो ज़रूर होते होंगे ....किसी दूसरे नाम से .... कभी यह बाथ-साल्ट नाम पहले नहीं सुना.....लेकिन नशा करने वालों को नाम से क्या लेना देना, नाम में रखा ही क्या है। खैर, मेरा काम था आगाह करना और इस बाथ-साल्ट की मिस्ट्री को हल करना..................ये नशीले बाथ-साल्ट नहाने वाले बेकसूर बाथ-साल्ट से बिलकुल अलग हैं, दूर दूर से भी कुछ भी लेना देना नहीं।

सेहत खराब करने वाली दवाईयां आखिर बिकती ही क्यों हैं?

परसों मेरा एक मित्र मुझ से पूछने लगा कि वज़न बढ़ाने के लिये ये जो फूड-सप्लीमैंट्स आते हैं इन्हें खा लेने में आखिर दिक्तत है क्या। मैंने कहा कि लगभग इन सब में कुछ ऐसे प्रतिबंधित दवाईयां –स्टीरॉयड आदि – होते हैं जो कि सेहत के लिये बहुत नुकसानदायक हैं। अच्छा, आगे उस ने कहा कि यह जो जिम-विम वाले हैं वे तो कहते हैं कि जो डिब्बे वो बेच रहे हैं, वे बिल्कुल ठीक हैं। बात वही है कि अगर उन्होंने इन डिब्बों को आठ-नौ सौ रूपये में बेचना है तो इतना सा आश्वासन देने में उन का क्या जाता है, कौन सा ग्राहक इन की टैस्टिंग करवाने लगा है, और सच बात तो यह है कि किसी को पता भी तो नहीं कि यह टैस्टिंग हो कहां पर सकती है।

पिछले सप्ताह अस्पताल में एक युवक मेरे से कोई दवाई लेने आया ...अच्छा, अब पता झट चल जाता है कि सेहत का राज़ क्या है, शारीरिक व्यायाम, पौष्टिक आहार या फिर वही डिब्बे वाला सप्लीमेंट से डोले-शोले बना रखे हैं ....मुझे लगा कि यह डिब्बों वाला केस है ...मेरे पूछने पर उस ने बताया कि सर, दो महीने डिब्बे खाये हैं, पहले महीने तो मुझे अपने आप में लगा कि मुझ में नई स्फूर्ति का संचार हो रहा है तो दूसरे महीने मुझे देख कर लोगों ने कहना शुरू कर दिया। आगे पूछने लगा कि सर, क्या आप अपने बेटे को ये सप्लीमैंट्स खिलाने के लिये पूछ रहे हैं.....उस के बाद मुझे इन सप्लीमैंट्स की सारी पोल खोलनी पड़ी।

हां, तो मैं उस मित्र की बात कर रहा था जो कह रहा था कि जिम संचालक तो कहते हैं कुछ नहीं इन में सिवाए बॉडी को फिट रखने वाले तत्वों के ......लेकिन जो बात उस ने आगे की, मुझे वह सुन कर बहुत शर्म आई क्योंकि मेरे पास उस की बात का कोई जवाब नहीं था।

हां, जानिए उस मित्र ने क्या पूछा....उस ने कहा ..डाक्टर साहब, मैं आप के पास आया हूं, आप ने बता दिया और मैंने मान लिया ...लेकिन उन हज़ारों युवकों का क्या होगा जो ये सप्लीमैंट्स खाए जा रहे हैं.... उस ने यह भी कहा कि इन डिब्बों पर तो स्टीरायड नामक प्रतिबंधित दवाईयों के उस पावडर में डाले जाने की बात कही नहीं होती।

अब इस का मैं क्या जवाब देता ? – बस, यूं ही यह कह कर कि कोई कुछ भी कहें, इन में कुछ प्रतिबंधित दवाईयां तो होती ही हैं जो शरीर के लिये नुकसानदायक होती हैं। लेकिन उस का प्रश्न अपनी जगह टिका था कि अगर ये नुकसानदायक हैं तो फिर ये सरे-आम बिकती क्यों हैं, अब इस का जवाब मैं जानते हुए भी उसे क्या देता!! बस, किसी तरह यह बात कह कर इस विषय को चटाई के नीच सरका दिया कि लोगों की अवेयरनेस से ही सारी उम्मीद है। लेकिन उस बंदे के सारे प्रश्न बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करने वाले हैं।

परसों उस मित्र से होने वाली इस बातचीत का यकायक ध्यान इसलिए आ गया क्योंकि कल मैंने अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की साइट पर एक पब्लिक के लिये नोटिस देखा जिस में उन्होंने जनता को आगाह किया था एक गर्भनिरोधक दवाई न लें क्योंकि वह नकली हो सकती है, इस से नुकसान हो सकता है.....यह उस तरह की दवाई थी जो एमरजैंसी गर्भनिरोधक के तौर पर महिलाओं द्वारा खाई जाती है.....असुरक्षित संभोग के बाद (unprotected sex) ….. वैसे तो अब इस तरह की दवाईयों के विज्ञापन भारतीय मीडिया में भी खूब दिखने लगे हैं....इन की गुणवत्ता पर मैं की प्रश्नचिंह नहीं लगा रहा हूं लेकिन फिर भी कुछ मुद्दे अब महिला रोग विशेषज्ञ संगठनों ने इन के इस्तेमाल से संबंधित उठाने शुरू कर दिये हैं।

सौजन्य .. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन
पहला तो यह कि कुछ महिलाओं ने इसे रूटीन के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है ... दंपति यह समझने लगे हैं कि यह भी गर्भनिरोध का एक दूसरा उपाय है....लेकिन नहीं, यह एमरजैंसी शब्द जो इन के साथ लगा है यह बहुत ज़रूरी शब्द है. वरना रूटीन इस्तेमाल के लिये अगर इसे गर्भनिरोधक गोलियों (माला आदि) की जगह इसे इस्तेमाल किया जाने लगेगा तो अनर्थ हो जाएगा, महिलाओं की सेहत के ऊपर बुरा असर – after all, these are hormonal preparations-- और दूसरी बात यह कि लोगों को यह गलतफहमी है कि इस तरह का एमरजैंसी गर्भनिरोधक लेने से यौन-संचारित रोगों की चिंता से भी मुक्ति मिलती है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है।

हम भी कहां के कहां निकल गये ....वापिस लौटते हैं उस अमेरिकी एफडीआई की चेतावनी की तरह जिस में उन्होंने एक ऐसे ही प्रोडक्ट की फोटो अपनी वेबसाइट पर डाल दी है ताकि समझने वाले समझ सकें, लेकिन मेरी भी तमन्ना है कि जो किसी भी नागरिक के लिये खराब है ...पहली बात है वो कैमिस्टों की दुकानों पर बिके ही क्यों और दूसरी यह कि क्यों न अखबारों में, चैनलों पर इन के बारे में जनता को निरंतर सूचित किया जाए ..........आखिर चैनल हमें प्रवचनों की हैवी डोज़ या फिर सास-बहू के षड़यंत्र दिखाने-सिखाने के लिए ही तो नहीं बने....सामाजिक सरोकार तो भी कोई चीज़ है। कोई मेरी बात सुन रहा है या मैं यूं ही चीखे जा रहा हूं?

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सप्लीमैंट्स से सावधान

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

तंबाकु धुएं वाला नहीं तो भी कोई बात कैसे नहीं....

एक तंबाकू जिसे चबाया जाता है, चूसा जाता है, गाल के अंदर-होठों के अंदर दबा कर रख दिया जाता है, गुटखा चबाया जाता है, खैनी खाई जाती है, मशेरी (powdered tobacco) जिसे दांतों पर घिसा जाता है, नसवार (Snuff) जो नाक से सूंघी जाती है, मसूड़ों पर लगाई जाती है... अकसर तंबाकू के ये वे रूप हैं जिन के साथ धुआं नहीं दिखता.......लेकिन कोई बात नहीं धुआं चाहे उस वक्त न दिखे लेकिन बाद में कभी न कभी तो ये सब वस्तुएं बंदे का धुआं निकाल के ही दम लेती हैं।

इस देश में हथेली में तंबाकू-चूना मसल के, और फिर उस को दाएं हाथ से छांट के जब आपस में थोड़ा थोड़ा बांटा जाता है तो राष्ट्रीय एकता का नज़ारा देखते बनता है ...लेकिन उस एकता का आचार डालें जिस में ज़हर ही बंटे।
हां, तो मुझे भी कईं बार मरीज़ पूछते पूछते झिझक से जाते हैं कि ना ना कोई बीड़ी सिगरेट नहीं, बस थोडा सा तंबाकू दिन में दो-एक बार और वह भी बस थोड़ा पेट की सफ़ाई के लिए।

अब मीडिया में इस धुएं-रहित तंबाकू के मुद्दे भी उछलते रहते हैं इसलिये लोग थोड़ा सा समझने तो लगे हैं कि इस से कैंसर –विशेषकर मुंह का कैंसर – होता है। और लगभग यह भी लोग जानते तो हैं कि इस से दांतों में सड़न होती है, मसूड़ों की बीमारी होती है और मसूड़े दांतों को छोड़ने लगते हैं। लेकिन तीन चीज़ें इस के अलावा जो लोग नहीं जानते उन्हें यहां रेखांकित किया जाना ज़रूरी है ..

1. अगर गर्भवती महिला इस तरह के तंबाकू का सेवन कर रही है तो उस में गर्भवस्था में होने वाली जटिलताओं जैसे कि शरीर में सूजन आ जाना (preeclampsia) , नवजात् शिशु का जन्म के समय वजन कम होना और समय से पहले ही बच्चा पैदा हो जाना(premature babies)

2. ऐसा भी नहीं है कि महिलाओं में तंबाकू अपने बुरे असर दिखाता है... पुरूषों में भी फर्टिलिटि से संबंधित इश्यू हो जाते हैं जैसे कि शुक्राणु का असामान्य हो जाना और शुक्राणुओं की संख्य़ा कम हो जाना।

3. और एक बहुत बड़ा पंगा यह है कि शौक शौक में चबाया जाने वाला तंबाकू वाला पान, खैनी, गुटखा, नसवार (creamy snuff) ...धीरे धीरे फिर यह बंदे को सिगरेट-बीड़ी की तरफ़ ले ही जाता है क्योंकि अगर कोई बिना धुएं वाला तंबाकू ही इस्तेमाल कर रहा है फिर भी उस में निकोटीन होने की वजह से इस की लत लगना तो लाजमी है ही।

हमारे देश में इस धुएंरहित तंबाकू की समस्या बहुत विकराल है। महिलाएं भी गांवों में बिंदास तंबाकू चबाती हैं ...किसी भी रूप में ...चाहे पान में डाल कर, चाहे पावडर-तंबाकू को दांतों पर घिस कर ..या फिर तंबाकू वाली पेस्टें मसूड़ों एवं दांतों पर घिस घिस कर मुंह के कैंसर को बुलावा दे बैठती हैं।

इस हैल्थ-टिप --- Smokeless Tobacco Isn’t a Safe Alternative…जो आप तक अमेरिका की सरकारी संस्था –सैंटर फॉर डिसीज़ कंट्रोल के सौजन्य से प्राप्त हो रही है, इस में लिखा एक एक शब्द आप कह सकते हैं पूर्णतया तथ्यों एवं सत्य पर आधारित होता है.... नो तीर, नो तुक्का, प्लेन सच।

आज कल अमेरिका जैसे देशों में भी स्मोकलैस तंबाकू काफी चलने लगा है... विशेषकर युवा वर्ग और खिलाड़ी इस स्मोक-लैस (धुएं रहित तंबाकू) तंबाकू का सेवन नसवार के रूप में करते हैं......इसलिये वहां पर किसी भी हालत में इस व्यसन को आगे नहीं बढ़ने के लिये सरकार कृत्त-संकल्प है ..........बिल्कुल जैसे हमारे यहां है.....क्या कहा? ..मुझे सुना नहीं .... नहीं, नहीं, आप यह कैसे कह सकते हैं कि हम लोग इस लत को जड़ से उखाड़ फैंकने के लिये कृत्त-संकल्प नहीं हैं, अरे यार, हम लोग कितने कितने वर्ष इन के पैकेटों पर दी जाने वाली डरावनी तस्वीरों पर राजनीति करते हैं !!

तंबाकू से संबंधित लेखों का पिटारा यह है .....तंबाकू का कोहराम

डिप्रेशन से उभरने के लिए क्या करते हैं हिंदोस्तानी?

आज जो मैंने एक खबर देखी कि अमीर देशों में लोग डिप्रेशन के ज़्यादा शिकार होते हैं .. अमेरिका में ही कहा जा रहा है कि 30 प्रतिशत से भी ज़्यादा जनसंख्या अवसाद में डूबी हुई है लेकिन साथ ही भारत का भी नाम लिखा हुआ है कि यहां भी अवसाद के बहुत से केस हैं। मैडलाइन पर यह खबर दिखी .. Depression higher in wealthier nations.

भारत में अवसाद के अधिकतर रोगियों की समस्या यह है कि वे कभी किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास गये ही नहीं... अब इन के किसी विशेषज्ञ के पास न जाने के दो पहलू हैं...इसी हम सीधा यह नहीं कह सकते कि ये किसी विशेषज्ञ से परामर्श न लेकर ठीक नहीं कर रहे।

कभी कभी मीडिया में बताया जाता है कि अवसाद जैसे रोगियों की संख्या भारत में बहुत ज़्यादा हैं लेकिन अकसर लोग सोचते हैं कि इस के बारे में किसी विशेषज्ञ के पास जाने से उन की लेबलिंग कहीं यह न हो जाए कि इस का दिमाग खिसका हुआ है, चाहे है यह भ्रांति लेकिन है तो !

मैडीकल नज़रिये से नहीं कह रहा हूं और न ही कह सकता हूं ...लेकिन व्यक्तिगत विचार लिख रहा हूं कि बहुत कम लोग हैं जो डिप्रेशन के लिये अंग्रेज़ी दवाईयां लेकर ठीक होते मैंने देखा है। हां, अगर अवसाद इस तरह का है कि दैनिक दिनचर्या में ही रूकावट पैदा होने लगी है... तो समझा जा सकता है कि एमरजैंसी उपाय के रूप में थोड़ी अवधि के लिये अंग्रेज़ी दवाईयां लेना उचित सा लगता है। एक बार फिर से लिख रहा हूं कि यह मेरी अनुभूति हो सकती है ...क्योंकि मैंने अकसर देखा है कि इस तरह की दवाईयां लेने वाले सुस्त से रहते हैं ....वो चुस्ती वाली कोई बात देखी नहीं। और भी एक बात है कि लोगों के मन में यह भी डर रहता है कि कहीं इन दवाईयों की लत ही न लग जाए ....अब काफ़ी हद तक लोगों का यह सोचना ठीक भी है।

अच्छा, अवसाद के लिये श्रेष्ठ चिकित्सक है आप का फैमिली डाक्टर जो आप के सारे परिवार को, स्रारी पारिवारिक परिस्थितियों को जानता है ... अकसर मनोरोग चिकित्सक के पास आम लोग जा ही नहीं पाते ... उन के पास भी काउंसिलिंग तकनीक द्वारा मरीज को अवसाद से बाहर निकालने की क्षमता होती है लेकिन मैंने यह देखा है लोग अकसर इस चक्कर में पड़ते नहीं... बस, यूं ही कुछ भी जुगाड़ कर के अपने आप इस अवसाद की खाई से बाहर निकलते रहते हैं, फिर फिसलने लगते हैं, फिर किसी सहारे की मदद मिल जाती है।

चाहे हम कुछ भी कहें अभी भी भारत में ऐसी परिस्थितियों के लिये सोशल-बैकअप भी काफ़ी हद तक कायम ही है ....थोड़ा बहुत अवसाद घेरने लगता है तो किसी के यहां मिलने चले जाते हैं, कोई इन्हें मिलने आ जाता है, हंसी ठठ्ठा हो जाता है, बस मजाक मजाक में इन्हें अच्छा लगने लगता है।

और एक खूबसूरत बात देश में यह है ...अधिकांश लोग अपनी आस्था के अनुसार किसी मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे या किसी अन्य धर्म-स्थल में जा बैठते हैं ...कीर्तन –पूजा-पाठ , भजन, प्रवचन करते हैं, सुनते हैं और इन्हें अच्छा लगने लगता है। कहने का मतलब यही है कि यहां बैक-अप है, लोग अभी भी आपस में बात करते हैं, त्योहार एक साथ मनाते हैं, हर्षोल्लास में भाग लेते हैं ..............यही ज़िंदगी है ... बाकी तो जितना किसी मैडीकल विषय की पेचीदगीयों में पड़ेंगे, कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है।

और ये जो बातें मैंने लिखी हैं अवसाद से निकलने के लिये ये कोई अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने वाली नहीं हैं....मैं ऐसे अध्ययन देख चुका हूं जिनमें विकसित देशों के वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि जो लोग आध्यात्मिक बैठकों आदि से जुडे रहते हैं वे अकसर ऐसी तकलीफ़ों से दूर रहते हैं......अच्छा, आप एक बात बताईए, आप जिस भी सत्संग में जाते हैं वहां आप को कभी कोई उदास सा, बिल्कुल हारा हुआ, बिल्कुल चुपचाप, गुमसुम बंदा दिखा है....................कोई जल्दी नहीं, आराम से सोच विचार करना कि आंकड़ें चाहे जो भी कहें कि इतने ज़्यादा भारतीय अवसाद के शिकार हैं, लेकिन फिर भी ये सीमित संसाधनों के बावजूद भी, बहुत सी दैनिक समस्याओं को झेलते हुए ..बस किसी तरह खुश से दिखते हैं।

इसीलिए मुझे कोई उदास सा प्राणी दिखता है तो मैं उसे किसी मनोरोग विशेषज्ञ का रूख करने की बजाए किसी सत्संग में जाने की सलाह दिया करता हूं ... मनोरोग विशेषज्ञ चाहे कहें कि मैं ठीक नहीं करता ....लेकिन मैं तो ऐसा ही ठीक समझता हूं और ऐसा ही करता हूं।

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अस्पताल जाने से ज़्यादा सुरक्षित है हवाई यात्रा—ऐसा क्या?

दो-तीन दिन पहले जब मैंने भी ऐसी बात पढ़ी तो मैं भी सकता में आ गया कि अब यह क्या नया लफड़ा है लेकिन जब पूरी बात पता चला तो समझ में आ गया कि कुछ लोग हवाई-यात्रा का यूं ही डर पाले बैठे हैं, अस्पताल में इलाज करवाने से आगे तो यह रिस्क कुछ भी नहीं!

वैसे यह ऊपर दिया गया व्यक्तव्य मेरा नहीं है, यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के सौजन्य से मैडलाइन में पढ़ने को मिला है कि विश्व भर में लाखों लोग चिकित्सा से संबंधी गल्तियों एवं हेल्थ-केयर व अस्पताल से ग्रहण किये गये संक्रमणों (infections) का शिकार हो जाते हैं।
"If you were admitted to hospital tomorrow in any country... your chances of being subjected to an error in your care would be something like 1 in 10. Your chances of dying due to an error in health care would be 1 in 300," Liam Donaldson, the WHO's newly appointed envoy for patient safety, told a news briefing.
This compared with a risk of dying in an air crash of about 1 in 10 million passengers, according to Donaldson, formerly England's chief medical officer.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े हैं कि अमेरिका में हर वर्ष इस तरह के अस्पताल से मिलने वाले संक्रमणों के 17 लाख केस होते हैं जिन में से एक लाख अल्ला को प्यारे हो जाते हैं। और यूरोप में यह वार्षिक आंकड़े 45 लाख बताये जा रहे हैं जिन में से 37 हज़ार लोग इस अस्पताल संक्रमण का शिकार हो जाते हैं।

यह पढ़ते पढ़ते आप को भी शायद ध्यान आ रहा होगा कि यार, हमें तो भारत के आंकड़े बताओ। अफ़सोस ऐसे आंकड़े मैंने तो कहीं देखे नहीं ... और शायद यह कभी दिखेंगे भी नहीं। मुझे ध्यान है इस संबंध में कुछ आंकड़े आज से बीस साल पहले टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ हैल्थ साईंसस में हास्पीटल एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ते हुये कुछ हमें बताया करते थे कि अस्पताल से होने वाले संक्रमणों की तादात 35-40 प्रतिशत है ... लेकिन मैंने कभी अपने यहां के आंकड़ें देखे ही नहीं.... भरोसेमंद या गैर-भरोसेमंद आंकड़ों की बहस तो तब शुरू हो अगर ये कहीं दिखे...तभी तो।

तो हमारे देश की समस्या इन अस्पताल संक्रमणों के संदर्भ में तो और भी गंभीर है। कारण? –हर जगह लीपा-पोती वाली अप्रोच ...कैसे भी जुगाड़बाजी कर के अस्पताल की बात बाहर न निकलने पाए ..वरना मार्केट में जो दूसरे अस्पताल हैं, उन को बात उछालने का मौका मिल जाएगा।

और यह जो मैडीकल ऑडिट की बात है, यह भी अपने देश में तो बस जुबानी जमा-खर्ची तक ही सीमित है ...मैडीकल ऑडिट का मतलब है ऐसी व्यवस्था जिस के अंतर्गत मैडीकल जगत को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर मिलता है ....अच्छे अच्छे अस्पतालों में जब कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है तो छोटे मोटे अस्पतालों की तो बात ही क्या करें।

जब मैं एक आलेख पढ़ रहा था जिसमें लिखा था कि मरीज़ों को प्रश्न पूछने की आदत डालनी चाहिए और अपने इलाज के लिये जाने वाले निर्णय में उन की भागीदारी होनी चाहिए ....यह पढ़ कर मुझे यही लगा कि कहने को तो गालिब यह ख्याल अच्छा है ....बस, अगली पंक्ति नहीं पाती।

इसी रिपोर्ट में मैं एक जगह पढ़ रहा ता कि आज कल चिकित्सा व्यवस्था बड़ी आधुनिक हो गई है ..उदाहरण दी जा रही थी कि हृदय-रोग के लिये आप्रेशन के लिये लगभग 60 लोगों की टीम काम करती है और इतनी ही टीम एक जंबो-जैट को चलाने के लिये चाहिए होती है। कहने का भाव, आज हर चिकित्सा कर्मी तनाव में काम कर रहा है, और ऊपर से यह चिकित्सा ढांचा की अपना-बचाव-कर-लो वाली प्रवृत्ति भी इस तनाव को बढ़ाने का काम कर रही है। लेकिन कहीं न कहीं ऐसा करने में उन की भी अपनी मजबूरी है।

कुछ बातें जो नोट की जा सकती हैं... अगर सभी चिकित्सक मरीज़ों का इलाज करने से पहले अच्छी तरह से साबुन से अपने हाथ धोने लगें तो यह समस्या पचास फ़ीसदी तक कम हो सकती है और इस के साथ साथ अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा बनाई सर्जरी चैक-लिस्ट की तरफ़ पूरा ध्यान दिया जाए तो मैडीकल गल्तियां काफ़ी हद तक टल सकती हैं।

जितना ज़्यादा किसी मरीज़ को आईसीयू (गहन चिकित्सा केंद्रों) में रखा जाता है.. उस में अस्पताल से ग्रहण करने वाले संक्रमणों का खतरा उतना ही बढ़ जाता है, यही हाल है...कैथीटर डले हुये मरीज़ों का जितना लंबे समय तक कैथीटर (पेशाब की थैली) किसी को लगा रहता है उतना ही रिस्क तरह तरह के इंफैक्शन का बढ़ जाता है। उसी तरह से नवजात शिशुओं को जब गहन चिकित्सा के लिये रखा जाता है..... तो उन का भी स्टे ज़्यादा होने पर अस्पताल संक्रमण जैसी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

लिखने को हम कितना भी लिख लें ....लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि यह बिल्कुल ग्रे-एरिया है... न तो कोई मरीज़ और न ही उस के अभिभावक ऐसे निर्णय ले पाने में सक्षम होते हैं .... और एक बात, ये जो झोलाछाप हैं, गांवों कसबों में जो नीम-हकीम बैठे हैं, बंदे बंदे को ग्लुकोज़ की बोतलें चढ़ा देते हैं, दूषित सिरिंजों एवं सूईंयों से इंजैक्शन लगाते रहते हैं, सर्जीकल औज़ार –जिन से पट्टी वट्टी करते हैं उन्हें जीवाणुरहित करते नहीं ...........सब कुछ अनाप-शनाप चलाते जा रहे हैं, ऐसे में तो ये अमेरिका और यूरोप के अस्पताल इंफैक्शन के आँकड़े पढ़ के आप को कहीं डर तो नहीं लग रहा कि अच्छा है, हमें अपने यहां के आंकड़ें पता नहीं हैं.....................लेकिन क्या कबूतर की आंखें बंद कर लेने से बिल्ली उस पर झपटने से गुरेज कर लेगी? …. नहीं ना !!

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गुरुवार, 28 जुलाई 2011

पीलिया के उचित इलाज में क्यों आती हैं इतनी दिक्कतें

आज पहला विश्व हैपेटाइटिस दिवस है ...विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 28 जुलाई को हर वर्ष विश्व हैपेटाइटिस दिवस मनाना निश्चित किया गया है ताकि विश्व का ध्यान इस बीमारी की तरफ़ खींचा जा सके।

भारत में अभी भी ज्यादातर लोग पीलिया का मतलब ठीक से नहीं समझते ...इस के बहुत से कारण हैं ..जितने भी कारण हैं उस लिस्ट में सब से ऊपर है तरह तरह की भ्रांतियां जिस की वजह से बहुत बार तो वे किसी चिकित्सक तक पहुंच ही नहीं पाते। बस झाड़-फूंक, टोने-टोटके.. तरह तरह के गुमराह करने वाले तत्व।

हैपेटाइटिस अर्थात् लिवर की सूजन और ये विभिन्न कारणों से हो सकती है ...जब यह सूजन वॉयरस की वजह से होती है तो इसे वॉयरस हैपेटाइटिस कहते हैं...और इन वायरसों की अलग अलग किस्में हैं –ए, बी, सी, डी एवं ई...और फिर इसी अनुसार कहा जाता है हैपेटाइटिस ए, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी आदि।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े हैं कि हर वर्ष लगभग 10लाख मौतें वॉयरल हैपेटाइटिस की वजह से हो जाती हैं। और विश्व भर में हैपेटाइटिस बी और सी वायरस से इंफैक्शन लिवर(यकृत) के कैंसर का एक प्रमुख कारण है... लगभग 75 प्रतिशत केसों में इन वॉयरसों का संक्रमण लिवर कैंसर के लिये दोषी पाया जाता है।

हैपेटाइटिस ए एवं ई खाने आदि की वस्तुओं से एवं पानी से होता है और अकसर विश्व में विभिन्न जगहों पर यह बीमारी फूट पड़ती है।

यह लेख लिखते लिखते ध्यान आ गया कि मैंने पहले भी हैपेटाइटिस विषय एवं इस से संबंधित विषयों पर कुछ लेख लिखे थे ...चलिये इन में से कुछ के लिंक यहां लगाता हूं ...

हैपेटाइटिस सी लाइलाज तो नहीं है लेकिन
हैपेटाइटिस सी के बारे में सब को जानना क्यों ज़रूरी है
टैटू गुदवाने से हो सकती हैं भयंकर बीमारियां
जब चिकित्सा कर्मी ही बीमारी परोसने लगें
दूषित सिरिंजों से हमला करने वालों की पागलपंथी
वो टैटू तो जब आयेगा, तब देखेंगे
चमत्कारी दवाईयां --लेकिन लेने से पहले ज़रा सोच लें..
और जहां तक हैपेटाइटिस के इलाज में आने वाली दिक्कतों की बात है, उन्हें शाम को एक दूसरी पोस्ट में करते हैं... क्रमश:.................

कहीं आप भी बस कैलोरियां गिनने के चक्कर में तो नहीं पड़े हुए

अमेरिका में एक विशाल अध्ययन हुआ.. एक लाख बीस-हजार पढ़े लिखे लोगों पर और यह स्टडी 12 से 20 वर्ष की लंबी अवधि तक चली। यह अध्ययन यह जानने के लिये था कि आखिर लोगों का उम्र के साथ वज़न कैसे बढ़ने लगता है।

यह रिपोर्ट पढ़ कर यही लग रहा था कि खाने-पीने की भ्रांतियां शायद सारे संसार में लगभग एक जैसी ही हैं। अपने यहां भी ऐसे लोगों से अकसर मुलाकात हो जाती है जो सोचते हैं कि वज़न कम करना है या भविष्य में बढ़ने नहीं देना है तो बस खाना-पीना कम कर दें तो सब ठीक हो जायेगा। यह एक बड़ी गलतफहमी है। और दूसरी गलतफहमी कि जितनी खुराक हमें दिन में खानी है, अर्थात् जितनी कैलोरियां हमें दिन में चाहिएं, वह कैसे हम पूरी करते हैं उस के बारे में ज़्यादा कुछ सोचना ज़रूरी नहीं ....बस, यहां तो यही फंडा है कि सब कुछ थोड़ा थोड़ा खाते-पीते रहना चाहिए ....कुछ नहीं होता, लेकिन हमारी इसी मानसिकता से ही सब कुछ होता है। संतुलित आहार के साथ साथ शारीरिक व्यायाम ही बहुत आवश्यक है।

ध्यान दें कि इतनी वैज्ञानिक स्टडी एक लाख बीस लाख पढ़े लिखे लोगों ने 12 से 20 वर्ष तक इस स्टडी में हिस्सा लिया। जिन दस चीज़ों को इस स्टडी में विलेन माना गया अर्थात् जो लोग इन चीज़ों का सेवन करते रहे उन्हें मोटापे ने घेरे में ले लिया। इन चीज़ों की यहां थोड़ी चर्चा करते हैं......

1. फ्रैंच फराई – अगर हम सोचें कि फ्रैंच फराई किसी महंगे माल ही में मिलते हैं तो हम गलत हैं। जो हम लोग आए दिन आलू लंबे काट कर उन्हें तलने के बाद नमक आदि लगा कर खाते रहते हैं ये रिश्ते में फ्रैंच-फ्राई के भी बाप हुआ करते हैं। आपने भी देखा होगा इन में से कैसे तेल रिसता रहता है। कईं बार इन्हें वेसन में तला जाता है.. लेकिन ये आलू ही क्यों यहां तो जगह जगह पकौड़ें(भजिया), ब्रेड पकौडे आदि जगह जगह दिखते हैं,....दफ्तरों में तो ये रोज़ाना ऐसे खाए जाते हैं जैसे कि वर्कर किसी दावत में आए हों.............क्यों न हम इन चीज़ों से बच कर रहें।

2. आलू के चिप्स ---- उस आर्टीकल में पैटेटो चिप्स लिखा हुआ था ...हिंदोस्तान के बच्चे जो इन आलू के चिप्स को खा रहे हैं वे तो अपनी सेहत खराब कर ही रहे हैं, लेकिन यहां पर इन का भी देशी ( या ओरिजिनल स्वरूप) रूप भी मिलता है ... आलू के चिप्स बिना तले मिलते हैं बाज़ार में जिन्हें लोग घर में तलते हैं और सोचते हैं कि केवल पैकेटे में आने वाले आलू चिप्स ही विलेन हैं।

3. शूगर-वाले पेय (sugar-sweetened drinks) – हम जानते हैं कि इस तरह की बोतलों वोतलों का बाहर काफ़ी चलन है...यहां पर भी इस तरह की कोल्ड -ड्रिंक्स नईं जैनरेशन में बहुत पापुलर हो रही हैं। बात ऐसी है कि अगर इन ड्रिंक्स को लेने का एक मिजाज सा बन जाता है तो यह सेहत के साथ खिलवाड़ तो है ही ....और वजन बढ़ने से कैसे रह सकता है। ये कोल्ड-ड्रिंक्स तो हैं ही, लेकिन इन के साथ ही साथ देश में यह बड़ी बुरी आदत है हर पेय में मीठा डालने की बात ...लस्सी मीठी, शिकंजवी मीठी.....सब कुछ मीठे से लैस होना चाहिए.....चलिये, शिकंजवी में थोडा बहुत मीठा हो भी जाए तो फिर भी यह जो सुबह से लेकर रात को चादर तानने तक आठ-दस बास मीठी, शर्बत जैसी चाय के दौर दनादन चलते रहते हैं, क्या इन के बावजूद वज़न नियंत्रण में रह सकता है।

4. रैडमीट एवं प्रोसैस्ड-मीट (Red Meat & Processed Meat) – मीट तो शायद इतनी समस्या है नहीं ...कमबख्त महंगा ही इतना है कि आम आदमी की पहुंच स दूर होता जा रहा है और शुक्र है कि एक आम देशवासी अपने धार्मिक विश्वासों की वजह से भी इन से अकसर दूर ही भागता है। लेकिन यहां समस्या है, खऱाब मीट मिलने की ... जिन की कईं बार ठीक से चैकिंग भी नहीं होती... मुझे नहीं लगता अभी प्रोसैस्ड मीट की यहां इतनी समस्या है, लेकिन कोई बात नहीं जिस तरह से हम दूसरी सारी बातें वेस्ट की अपनाने में लगे हैं, बड़े बडे माल खुल रहे हैं, तो यह सब भी आ ही जाएगा, शायद आ ही गया हो....मैंने ही शायद कभी इन शेल्फ़ों को न देखा हो।

5. आलू के अन्य रूप – (Other forms of potatoes) .. अब इन चीज़ों को हमारे हिसाब से देखें तो ये समोसे, आलू की टिक्की, चाट पापड़ी में आलू, आलू भजिया,..... यह क्या, मुझे आलू के अन्य रूप ही ध्यान में नहीं आ रहे ....यहां तो भाई हर जगह आलू ही आलू है .... यहां तक की बालीवुड के गीतों में ...जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहूंगा तेरा ओ मेरी शालू...............हा हा हा ...........ध्यान आ गया कुछ ही दिन पहले एक हृदय-रोग विशेषज्ञ से एक महिला ने पूछ लिया –डाक्टर साहब,मैं आलू ले लिया करूं ? --- उस ने हल्के फुल्के अंदाज़ में उसे समझा दिया ...ऐसा है कभी कभार सब्जी में डले हुये जैसे आलू मेथी, आलू गोभी आदि में खाने से कोई परहेज़ नहीं लेकिन अगर आप दम आलू का बड़ा कटोरा लेंगी तो गड़बड़ है।
कुछ भी हो, यहां आलू की बहुत भरमार है...और ये जो समोसे, टिक्की वाले यह पिछले दिन (या दिनों) वाले आलू अकसर इस्तेमाल करते हैं ...जिस से खाने वाले को दूसरी बीमारियां तुरत घेर लेती हैं।

6. कुछ मीठा हो जाए .... (sweets & desserts) --- इस के बारे में तो क्या कहें, सभी जानते हैं कि हम लोग कुछ मीठा हो जाए के कितने बडे दीवाने हैं लेकिन यह भी ध्यान रहे कि यह तो एक बडा विलेन है ही हमारी तोंद एवं कमर का हिसाब-किताब बिगाड़ने के लिए।

7. रिफाईंड ग्रेन्स --- ( पतले अनाज) --- यह जो आज कर पतला आटा, मैदा जैसा खाने का एक ट्रेंड है, इस को भी एक विलेन का एक दर्जा दिया गया है .... इस के बारे में भी इस ब्लॉग में पहले ही से कईं लेख पड़े हैं, थोड़ा देख लीजिएगा। और ऊपर से यह जो मैदा, सूजी एवं पालिश राईस ....ये सब रिफाईंड ग्रेन्स में ही आते हैं।

8. दूसरे तले हुये खाध्य पदार्थ – (Other fried foods) -- अब अमेरिका में तो इन फास्ट-फूड ज्वाईंटों के अलावा कैसे कैसे तले माल मिलते हैं .. मैं नहीं जानता लेकिन यहां के ऐसे माल हमें हर गली नुक्कड़ पर दिखते हैं ...खोमचे वालों के पास, दुकानों पर .... जलेबी, अमरती, बालूशाही ...तरह तरहकी मिठाईयां, कचौड़ी, समोसे, गुलाब-जामुन, गंदे तेल में हर नुक्कड़ पर तैयार होते नूडल, बर्गर, चोमीन.............अब क्या क्या गिनाएं ......यहां तो भाई हर दिन दीवाली है ...भूख हो न हो, बस रेहड़ी दिखनी चाहिए। लेकिन अगर वज़न बढ़ाना ही है तो कोई इन चीज़ों से कैसे करे इंकार।

9. 100% फ्रूट-जूस (100-percent fruit juice) ---मुझे यह लगता नहीं कि यह हमारी समस्या है .. मुझे पता चला है कि कुछ लोग अमेरिका जैसे देशों में केवल यह 100%फ्रूट-जूस ही लेते हैं.. शायद यह बात उन के लिये होगी... लेकिन एक बात और भी है कि अमेरिका में अधिकतर इस तरह के जूस कैन में मिलते हैं (canned fruit juices) ..जो कि जूस के साथ साथ एडेड शुगर आदि से भी लैस होते हैं ...यह समस्या ऐसी है जो मुझे लगता है हमारे यहां किसी दूसरे रूप में है ...क्योंकि हमारे यहां तो 100% जूस वैसे ही नहीं मिलता ... जूस वाला वैसे ही इतनी मिठास उस में घोल देता है कि उसे पीना हरेक के बश की बात ही नहीं होती....वैसे इस के बारे में विस्तार से कभी चर्चा करेंगे कि इसे उस अध्ययन में क्यों विलेन बताया गया है। वैसे इतना तो हम जानते ही हैं कि अगर संभव हो तो फलों को खा लेना ज़्यादा लाभदायक होता है।

10. मक्खन – मक्खन नहीं तो कुछ नहीं, सारा देश इस चिंता में घुला जाता है कि दूध से मक्खन कितना निकलता है। और तो और साथ में यह घुटन की पड़ोसी के दूध से मक्खन कैसे हमारे दूध से ज़्यादा आ रहा है .... है कि नहीं, गृहणियों की दक्षता का एक मापदंड सा बन के रह गया है ... मैंने भी देखा सुना है कि अकसर चुगली शैशन में यह मक्खन की मात्रा ज़रूर कहीं न कहीं से आ ही जाती है। हमारे यहां भी एक अजीब सी समस्या हो गई ... भैंस के दूध से इतना मक्खन निकलने लगा कि हम परेशान हो गए ... अब हम सब लोग मक्खन से वैसे ही दूर भागते हैं ...और ऊपर से इतनी मात्रा, हर समय यही लगता रहता था कि यार, यह तो ज़रूर दूध में कई कैमीकल लफड़ा है, इतना मक्खन .... फिर एक साल से हम लोग वापिस गाय के दूध पर लौट आए। यह तो थी हमारी बात, लेकिन सच यह है कि मक्खन आज भी भारतवासियों के दिलों पर राज़ करता है.... दाल मक्खनी, बटर चिकन, नॉन मक्खनी.........जहां मक्खन शब्द का इस्तेमाल हो गया, स्टेट्स बढ गया ..खिलाने वाला का भी और खाने वाले का भी। लेकिन इस से वजन बढ़ता है। लेकिन एक बात तो है कि मक्खन चाहे कितना भी बड़ा विलेन क्यों न हो, जो लोग यहां पर मक्खन लगाने के मंजे खिलाड़ी होते हैं, उन का तो रूतबा भी इस से बढ़ता है ....कोई ज़रूरत नहीं काम-वाम की, बस बिना वजह "बटरिंग "करने वाले देखते ही देखते दूसरों के कंधों पर चड़कर कहां के कहां पहुंच जाते हैं...मक्खनबाजी की करामात !!

मैंने जिस आर्टीकल की बात शुरू में की थी उस में आगे जाकर यह भी लिखा है कि यह जो मूंगफली से मक्खन तैयार होता है इतना बुरा नहीं है, आप भी डिटेल में पढने के लिये इस न्यू-यार्क टाइम्स में छपे इस आर्टीकल को तो एक बार देख ही लें-- Still counting calories? ... Your weight-loss plan may be out-dated!

देखो यार, ये सब बातें मेरी दिमाग से उड़ते पाप-कान (cerebral pop-corn) तो हैं नहीं, अमेरिका में अगर उन्होंने बीस साल तक सवा लाख लोगों के साथ माथापच्ची कर के कुछ अनुभव बांटें हैं तो बिना किसी टकराव के हमें मानने में क्या दिक्कत है। वैसे मैं इस स्टडी से पूर्णतया सहमत हूं और आज से मीठा और फ्राईड खाते समय इस की तरफ़ जरूर ध्यान कर लिया करूंगा। और आप सुनाईए, आप ने इतना लंबा लेख पढ़ कर के क्या फैसला किया है ? मेरा फैसला तो यह गाना ब्यां कर रहा है .....

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

रहिमन निज मन की बिथा....

मैं आज कोई बात कर रहा था कि कोई बात मैंने फलां फलां को बताई.... पता नहीं कैसे ठीक उसी समय महान कवि रहीम जी के दोहों को रट रहा था ...अचानक उसने शायद एक दोहा मेरे को समझाना ज़रूरी समझा .. जो कि मैं भी तुरंत ही समझ गया। और मैंने उस से यह वायदा किया कि अब आगे से रहीम जी की बात को ध्यान में रखा जाएगा ...ध्यान में क्या, उस पर अमल किया जायेगा।
आदमी जिस परिवेश में जिस क्षेत्र में पलता बढ़ता है उस एरिया के सभी गुण सहज ही उस में आ ही जाते हैं, मैं इस बात पर पूर्ण विश्वास करने लगा हूं।
हरेक को अपनी जन्मभूमि से प्यार होता है ... मुझे भी है अमृतसर से ...जहां मेरा जन्म हुआ और सारी पढ़ाई-लिखाई वहीं पर हुई... वहां के लोगों की विशेषता है कि बड़े खुले विचारों के हैं, यह नहीं कि हर बात छुपा छुपा कर के रखना-करना.... सब कुछ एकदम खुल्लम खुल्ला.... छिपाने का कोई चक्कर ही नहीं।
लेकिन धीरे धीरे अब समझ आने लगी है कि रहीम बाबा ठीक ही कहते हैं ...कोशिश करूंगा कि अब इस पर पूर्ण अमल करूं ... वरना लोगों का क्या है, बस जैसे अमृतसर में अकसर हम यार-दोस्त कह दिया करते थे कि बस, यार, कुछ नहीं .....बस सुक्के स्वाद...... सच में किसी की परेशानियों से किसी को कोई लेना-देना नहीं होता, हम हरेक के आगे बंद मुट्ठी खोलने की भूल करते रहते हैं।
हां, हां, लिख रहा हूं वह दोहा जो बेटा मेरे को सुना कर उस पर अमल करने के लिये कह रहा था ......
रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय ।।
बेटे की नोट बुक में उस ने इस का अर्थ यह लिखा हुआ है – रहीम मनुष्य को सलाह देते हुए कहते हैं कि हमें अपने मन की पीड़ा, तकलीफ़, दुःख, दर्द को छिपा कर रखना चाहिए अर्थात् उन्हें हर किसी के सामने नहीं प्रकट करना चाहिए क्योंकि हमारी तकलीफ़ को सुन कर उनको कोई बांट तो लेगा नहीं बल्कि हमारी हंसी और उड़ायेगा अर्थात् हमारी तकलीफ़ से वह मज़े ज़रूर करेगा।
ठीक ए, राघव, अज तो तेरी गल मन लई यार, गल तो एह मैंनूं वी बड़े कम दी लग्गी ऐ......ऐस्से ही तरां यार वधीया वधीया गल्लां दसदा रिहा कर .... ताकि पापा भी अपनी कमियां दूर करता रहे।
चलो, गुज़रा जमाना ही याद कर लेते हैं ....

सोमवार, 25 जुलाई 2011

जाको राखे साईंयां मार सके न कोई ....

अखबार में छपी कुछ कुछ खबरें ऐसी होती हैं जिन पर नज़र ऐसी टिक जाती हैं कि वहां से उठने का नाम ही नहीं लेतीं.... आज भी एक ऐसी खबर ही दिख गई। सात साल के बच्चे की बाएं हाथ की बाजू लिफ्ट में आने से कोहनी (टखना) तक कट जाती है, वह छठी मंजिल पर इस कटी हुई बाजू को उठा कर अपनी दादी के पास जाता है और सारा किस्सा सुनाता है।

तब तक अड़ोसी-पड़ोसियों का भी लांता लग जाता है और एक पड़ोसी उस कटी हुई बाजू को कूड़ेदान में फैंक देता है ...लेकिन बच्चा झट से उसे वहां से उठा लेता है। उसे पास ही के एक अस्पताल में लेकर जाया जाता है जहां बच्चा डाक्टर से उस बाजू को जोड़ने की बात कहता है। लो जी, बच्चे की बात में कैसा जादू, यह कैसे पूरी न हो .......उस बाजू को माइक्रो-सर्जरी के द्वारा चिकित्सकों ने वापिस जोड़ दिया।

हिम्मत देनी पड़ेगी इस सात साल के बच्चे की जिस ने इतनी हिम्मत दिखाई जो हम जैसे बड़ों को भी सबक सिखा दे ...हम कैसे छोटी मोटी तकलीफ़ में ही अपना धैर्य खोने से लगते हैं कि हाय, मर गये,लुट गये, तबाह हो गये, अब क्या होगा...............क्या होगा, जो होगा, अच्छा ही होगा, होनी को भी कोई रोक पाया है क्या!

अब इस बच्चे की हिम्मत की दाद दें तो उस चार साल को भूलने की हिमाकत कैसे कर दें जो चार घंटे तक एक नदी की लहरों से झूझता रहा ... उस माई के लाल ने हिम्मत नहीं हारी ... आखिर उसे बचा ही लिया गया। हिम्मते मरदां, मददे खुदा .....कोई शक ?


बच्चों को हर साल वीरता पुरस्कार मिलते हैं, क्या हम यह आशा कर सकते हैं कि ऐसा ज़ज़्बा रखने वाले बच्चों का नाम भी उस सूची में इस बार शामिल होगा, हम तो दुआ ही कर सकते हैं!

जब इन हादसों का ध्यान आता है तो इंदोर के निकट पातालपानी वाला वह दिल दहला देने वाला हादसा याद आ जाता है ...कुछ दिन पहले एक ही परिवार के पांच सदस्य किस तरह से एक झरने में कुछ ही लम्हों में सब के देखते ही देखते बह गये .... बस उन के किनारे तक पहुंचने में चंद लम्हों की ही दूरी थी... काश!!!!!
Source : Child carries severed hand to doctor

नसबंदी कॉलोनी में ही बच्चों की भरमार की कैसे घपलेबाजी!

अभी अभी अखबार खोली तो देख कर पता चला कि दिल्ली के पास ही लोनी नामक जगह में एक नसबंदी कॉलोनी है जिस में बच्चों का तांता लगा हुआ है। बात पचती नहीं है ना, लेकिन हुआ यूं कि 1986 में डिस्ट्रिक्ट कलैक्टर ने एक स्कीम चलाई कि नसबंदी करवाओ और 50गज का एक घर पाओ। इसी दौर में 5000 लोगों ने नसबंदी तो करवा ली।

रिज़्लट तो इस नसबंदी का यह होना चाहिए था कि वह नसबंदी कॉलोनी का एरिया एक बिल्कुल शांत सा एरिया बन जाना चाहिए था .... लेकिन इस के विपरीत वहां तो कहते हैं बच्चों का तांता लगा रहता है... नंगे-धड़ंगे बच्चे कॉलोनी की गंदगी में खेलते कूदते जैसे कि इस स्कीम शुरु करने वालों को मुंह चिड़ा रहे हों।

कहते हैं कि जिन लोगों को यह घर मिले नसबंदी करवाने के बाद ...उन में से तो कुछ तो इन को बेच कर पतली गली से निकल गये...लेकिन जो अधिकांश लोग इस मुस्लिम बहुल कॉलोनी में हैं, उन में से अधिकतर ने इस स्कीम के तहत् अपनी बीवी की नसबंदी करवा दी और स्वयं फिर से शादी कर ली ...और एक बार फिर से यह सिलसिला चल निकला।

नसबंदी कॉलोनी ---नाम ही में कुछ गड़बड़ सी लगती है ... ऐसे नाम नहीं रखने चाहिए... किसी को कोई अपना पता क्या बताए ? – हो न हो, ऐसी कॉलोनी में रहना ही एक उपहास का कारण बन सकता है। नसबंदी कॉलोनी और एमरजैंसी के दौरान नसंबदी कार्यक्रम के दौरान नसबंदी के किस्से सुनते सुनते एक और किस्से का ध्यान आ गया .... हमारा एक सहकर्मी बता रहा था कि उसे दस नसबंदी करवाने को लक्ष्य दिया गया ... यानि कि उस ने दस लोगों (पुरूष अथवा महिला) को नसबंदी के लिये प्रेरित करना था एक वर्ष में --- कह रहा था कि वह यह टारगेट पूरा नहीं कर पाया और उस के बॉस ने उस की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में यह दर्ज कर दिया कि यह परिवार कल्याण कार्य में रूचि ही नहीं लेता.... उस चिकित्सक को जब रिपोर्ट मिली तो उस ने प्रशासन को इस के विरूद्ध अपील की और निर्णय उस के हक में हो गया और बता रहा था कि बॉस की वह टिप्पणी उस की ए.सी.आर से हटा दी गई।

हैरानगी यह है कि मैं दिल्ली को अच्छी तरह से जानता हूं ... आज से बीस साल पहले बसों में भी खूब घूमा हूं लेकिन किसी बस पर यह लिखा नहीं पड़ा ... नसबंदी कॉलोनी..........चलो, जो भी है, लेकिन इस कालोनी में दुनिया के आगे कम से कम एक उदाहरण तो पेश की किस तरह के परिवार नियोजन कार्यक्रम फेल हो जाते है।
Source : 'Vasectomy Colony' faces population explosion (Times of India, July25' 2011)

शनिवार, 23 जुलाई 2011

अब तंबाकू की साधारण पैकिंग करेंगी जादू






आस्ट्रेलिया को इस बात की बधाई देनी होगी कि वह पहला ऐसा देश बन गया है जिस ने ऐसा कानून बना दिया है कि सभी तंबाकू प्रोडक्ट्स को बिल्कुल प्लेन पैकिंग (plain packaging) कर के ही बेचा जाए.... कोई ट्रेडमार्क नहीं, मार्केटिंग की और कोई चालाकी भी नहीं होगी अब इन पैकेटों पर।

इस में कोई दो राय हो ही नही सकती कि अगर तंबाकू प्रोड्क्ट्स की पैकेजिंग बिल्कुल प्लेन –साधारण, बिना तड़क-भड़क वाली कर दी जायेगी तो बेशक यह जनता के हित में ही होगा। और अगर पैकिंग ही बिल्कुल सीधी सादी होगी तो उस पैकिंग पर दी जाने वाली सेहत संबंधी चेतावनियों का असर भी ज़्यादा पड़ेगा ...और पैकेट पर ट्रेड-वेड मार्क न होने से यह जो Surrogate Advertising का गंदा खेल चल निकला है उस पर भी काबू पाया जा सकेगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस बात को जोर से कहना शुरू कर दिया है कि तंबाकू के विरूद्ध छिड़ी जंग में इस की पैकिंग का बहुत महत्व है। और जैसे विभिन्न देश तंबाकू के ऊपर तरह तरह का शिकंजा कस रहे हैं, परचून में बिकने वाले तंबाकू की पैकिंग (retail package) प्रोडक्ट्स और प्रोफिट के बीच एक अहम् लिंक बन चुकी है। इसलिये अन्य देशों से यही गुज़ारिश की जा रही है कि वे भी अपने लोगों की सेहत के लिये प्लेन-पैकेजिंग को ही शुरू करें।

अनुमान है कि भारत में 35 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। तंबाकू के उत्पादों पर ऩईं ग्राफिकल चेतावनियों का मामला दिसंबर 2011 तक तो ठंडे बस्ते में ही पड़ा हुआ है। काश, इस के साथ कुछ ऐसा पैकिंग को बिल्कुल फीका, नीरस करने का भी कुछ आदेश आ जाए.... कोई बात नहीं, दुआ करने में क्या बुराई है!

बहुत बार ऐसा भी होता है कि पैकिंग जिस रंग में होगी, उस से ही लोग अनुमान लगा लेते हैं कि यह उन की सेहत के लिये कैसा है, जैसे कि सिगरेट पैकेट के ऊपर हल्के रंग होने से उपभोक्ता समझने लग जाते हैं कि यह प्रोडक्ट भी हल्का-फुल्का ही होगा, इसलिए सेहत के लिये भी कुछ खास खराब नहीं होगा।

लेकिन आस्ट्रेलिया ने ऐसा शिकंजा कसा है इन शातिर मार्केटिंग शक्तियों पर कि वहां पर उन्होंने यह भी तय कर दिया है कि कौन से कलर पैकेट की सभी साइड़ों के लिये इस्तेमाल किये जाएंगे और उन की फिनिश कैसी रहेगी। ...... Great job, Australia! … an example that world should follow!! …

भारत में भी इस तरह के पैकिंग नियम बनाये जाने की सख्त ज़रूरत है लेकिन यह ध्यान रहे कि कहीं चबाने वाला तंबाकू इन नियमों की गिरफ्त से न बच पाए क्योंकि वह भी इस देश में एक खतरनाक हत्यारा है।

पैकिंग से दो बातों का ध्यान आ रहा है ... अमृतसर में डीएवी स्कूल हाथी गेट के पास ही एक तंबाकू वाली दुकान थी .. हम लोग पांचवी छठी कक्षा में उस के सामने से गुज़रते थे तो हमारी हालत खराब हो जाय़ा करती थी ... हमें यह भी नहीं पता होता था कि यहां बिकता क्या है, बस बड़े बड़े गोल गोल काले धेले (यह पंजाबी शब्द है, मुझे पता नहीं हिंदी में इसे क्या कहते हैं) दिखा करते थे ..और हमें वहां से गुज़रते वक्त अपने नाक पर रूमाल रखना पड़ता था। बाद में चार पांच साल बाद पता चला कि यहां तो तंबाकू बिकता है ..हम लोग उस दुकान के आगे से ऐसे बच के निकलते थे जैसे वह अफीम बेच रहा हो ....बस, ऐसे ही तंबाकू की जात से ही नफ़रत हो गई। आज सोचता हूं तो समझ में आता है वह तंबाकू हुक्का पीने वाले खरीद कर ले जाते होंगे।

और दूसरी बात, लगभग दस साल पहले जोरहाट आसाम में एक नवलेखक शिविर में शिरकत करने गया .. वहां पर गुटखे के पैकेट सड़कों पर ऐसे बिछे देखे जैसे किसे ने चमकीली चटाई बिछा दी हो ...और पैकिंग बहुत आकर्षक ...मैंने वहां बिकने वाले लगभग 40-50 ब्रांड के गुटखे खरीदे ...उन की पैकिंग पर एक स्टडी की ... प्रकाशित भी हुई थी .... पैकिंग इतनी शातिर, इतनी चमकीली की गुटखे पर लिखी चेतावनी की तरफ़ पहले तो किसी का ध्यान जाए ही नहीं और अगर चला भी जाए तो कोई उसे पढ़ ही न पाए.... किसी किनारे में छुपा कर लिखा हुआ.... और अधिकांश पैकेटों पर इंगलिश में। काश, कोई इनको भी पैकिंग की सही राह दिखाए ......चलिये, आज आस्ट्रेलिया ने पहल तो की है, देखते हैं आगे आगे होता है क्या !!
कभी इधर भी नज़र मारिए ...
तंबाकू का कोहराम

बिना डाक्टर की पर्ची के दवाईयां न बेचने पर इतना बवाल!

कुछ दिन पहले मैं एक खबर की चर्चा कर रहा था जिस से पता चला था कि इंदौर में डाक्टर दो पर्चीयां बनाया करेंगे –एक मरीज़ के पास रहेगी और दूसरी कैमिस्ट अपने पास रख लिया करेगा। लेकिन आज सुबह पता चला कि दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही होने जा रहा है जिस की वजह से वहां कैमिस्टों ने खासा बवाल मचा रखा है।

कैमिस्टों का कहना है कि दिल्ली में यह जो ओटीसी दवाईयों के ऊपर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है, यह उन के लिए बहुत कठिन काम है। ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों के बारे में उन का कहना है कि उन की जितनी कुल दवाईयां बिकती हैं उन का 60 प्रतिशत तो ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां ही तो होती हैं...ऐसे में कैमिस्ट का एक वर्ष तक उन सभी डाक्टरी नुस्खों को संभाल के रखना संभव नहीं है।

न्यूज़ में यह भी लिखा है कि कुछ 16 ऐसी दवाईयां जिन्हें बेहद आपातकालीन परिस्थितियों (life-threatening conditions) में ही इस्तेमाल किया जाता है जैसे कि कैंसर एवं दिल के रोग से संबंधित किसी एमरजैंसी के लिये – इन को भी केवल अस्पताल में स्थित दवाई की दुकानों में ही बेचे जाने का प्रस्ताव है। पढ़ तो मैंने यह लिया लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आया कि अगर ऐसा कुछ सरकार कर रही है तो इस में आखिर बुराई क्या है!

हां, कैमिस्ट एसोशिएशन का यह भी मानना है कि इस तरह की व्यवस्था हो जाएगी तो ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों की कालाबाज़ारी शुरू हो जाएगी।

चलिए खबर में लिखी बातों की बात तो हो गई...अब ज़रा मैं भी आपसे दो बातें कर लूं।

ऐसा है कि जितना स्वास्थ्य दुनिया में लोगों को इन ऐंटीबॉयोटिक दवाईयों ने खराब किया है, शायद ही किसी अन्य दवाई ने किया है। बस नाम पता होना चाहिए...जिस की जो मर्जी होती है कोई भी सख्त से सख्त ऐंटीबॉयोटिक कैमिस्ट से खरीद कर लेना शुरू कर देता है ....बीमारी का पता नहीं, आम मौसमी खांसी जुकाम के लिये भी ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां लेना आम सी बात है। ऐसी दवाईयों का पूरा डाक्टर की सलाह से न करना भी आज विश्व के लिये एक बहुत बड़ी चुनौती है। घटिया, नकली दवाईयां, तरह तरह की हर जगह होने वाली सैटिंग ... खुले ऐंटीबॉयोटिक के नाम पर अजीबो गरीब साल्ट बेचे जाना एक आम सी बात हो गई है... ऊपर से यह जैनरिक और एथिकल दवाईयों का पंगा ... जैनरिक दवाईयां ---जिन के उदाहरणतयः प्रिंट तो रहेगा 60 रूपये की दस कैप्सूल की स्ट्रिप –लेकिन आप के कैमिस्ट से संबंधों के अनुसार वह 30 की मिले, 18 की मिले या आठ रूपये की ही मिल जाए.....................यह एक ऐसा एरिया है जिसे मैंने पिछले 10 वर्षों से जानना चाहिए लेकिन हार कर जब कुछ भी कोई ढंग से बता ही नहीं पाता (या बताना चाहता ही नहीं?) तो मैंने भी घुटने टेक देने में ही समझदारी समझी।

आलम यह है कि मुझे 25 साल इस व्यव्साय में बिताने के बाद आज तक यह पता नहीं है कि जैनरिक दवाई को एथिकल दवाई से कैसे पहचान सकते हैं। एथिकल दवाईयों जैसे ही नाम में आती हैं जैनरिक दवाईयां --- अब पता नहीं इस राज़ को कौन खोलेगा!

अच्छा, यह जो इन कैमिस्ट ऐसोसिएशनों का कहना है कि इस से ऐंटीबॉय़ोटिक दवाईयों की कालाबाज़ारी शूरू हो जाएगी ... मुझे ऐसा बिलकुल नहीं लगता .. जिन्हें सही में इस तरह की दवाईयां चाहिए होंगी उन को तो कभी भी इन को प्राप्त करने में कोई कठिनाई आयेगी नहीं और जिन्हें केवल काल्पनिक, रोगों के लिये, अपनी मरजी से ही इस तरह की दवाईयां चाहिए उन के लिये ऐसी कालाबाज़ारी कल की बजाए आज शुरू हो जाए तो बेहतर होगा..... कम से कम इस तरह की दवाईयां कम ही तो खरीद पाएंगे ...इसलिये इन्हें खाया भी कम ही जाएगा जिस से वे सारी दुनिया का भला ही करेंगे।

यह जो मैं बार बार लिख रहा हूं कि बिना कारण इस तरह की ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां न खा कर भला कैसे कोई सारे विश्व का भला कर सकता है? ¬¬¬ ---दरअसल समस्या यह है कि ऐसी महत्वपूर्ण दवाईयों के अंधाधुंध उपयोग से बहुत सी महत्वपूर्ण दवाईयां जीवाणु मारने की क्षमता खोने लगी हैं --- जीवाणुओं पर अब इन का असर ही नहीं होता --- (Drug Resistance) … जिस की वजह से बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु ढीठ होते जा रहे हैं .. यह एक भयंकर समस्या है .... सोचिए जब पैनसिलिन नहीं था तो किस तरह से मौतें हुया करती थीं . किस तरह से टीबी की दवाईयां आने से पहले टीबी होने का मतलब मौत ही समझा जाता था।

जो भी सरकार इस तरह के नियम बना रही है बहुत अच्छी कर रही है.... इस तरह के फैसले बड़ी सोच विचार करने के बाद, विशेषज्ञों की सहमति से लिये जाते हैं... इसलिये इन पर कोई भी प्रश्नचिंह लगा ही नहीं सकता। सरकार का दायित्व है कि उस ने सारी जनता के हितों की रक्षा करनी है ---अब अगर कुछ लोग अनाप शनाप दवाईयां खाकर कुछ इस तरह के बैक्टीरिया उत्पन्न करने में मदद कर रहे हैं जिन के ऊपर दवाईयां असर ही नहीं करेंगी तो फिर कैसे चलेगा, सरकारों ने तो यह सब कुछ देखना है।

जितना लिख दिया था लिख दिया मैंने ---लेकिन इतना तो तय है कि जितने मरजी नियम आ जाएं ... यह जो लोग अपनी मरजी से दवाई खरीद कर खाने के आदि हो चुके हैं, ये बाज नहीं आने वाले, ये कैसे भी जुगाड़बाजी कर के मनचाही दवाईयां खरीद ही लेते हैं ....इस के अनेकों कारण हैं।

इससे दुःखद बात क्या हो सकती है कि अधिकांश अस्पतालों में कोई ऐंटीबॉयोटिक पालिसी ही नहीं है ....और अगर कहीं कहीं है भी तो डाक्टरों को ही उस का नहीं पता .....क्या कहा, पता होगा! --- मुझे तो कभी नहीं लगा ...जिस तरह से सादे खांसी जुकाम के लिये धड़ाधड़ महंगे से महंगे, सख्त से सख्त ऐंटीबॉयोटिक दवाईयां लिखी जा रही हैं, उस के बाद भी कैसे मान लूं कि कहीं पर भी कोई ऐंटीबॉयोटिक पालिसी है।

Source : Chemists plan to protest OTC ban

एम्स ने खरीदा 28 करोड़ का चाकू

इस चाकू का नाम का ...गामा चाकू (Gamma Knife)… कहने को तो चाकू है लेकिन न ही तो इस में कोई ब्लेड है और न ही इस से कुछ कट लगाया जाता है। एम्स में यह चाकू 14 वर्षों के बाद आया है और इस की कीमत 28 करोड़ रूपये है ..वहां पर पहले एक गामा नाईफ़ 1997 में खरीदा गया था। आखिर इस चाकू से होता क्या है....इस चाकू का इस्तेमाल मस्तिष्क के आपरेशन करने के लिये किया जाता है लेकिन कोई कट नहीं, कोई चीरा नहीं ...फिर कैसे हो पाता है फिर यह आप्रेशन।

दरअसल इस गामा नाईफ से एक ही बार में, हाई-डोज़ विकिरणें (high-dose radiation) मस्तिष्क के बीमार भाग पर डाली जाती हैं ताकि उस का सफाया किया जा सके---यह बिल्कुल एक आटोमैटिक प्रक्रिया होती है और बस एक बटन दबाने से ही सारा काम हो जाता है। समय की बचत तो होती ही है और इस से बहुत से मरीज़ों का इलाज किया जा सकता है।

सर्जरी से संबंधित सभी कंप्लीकेशन से तो मरीज़ बच ही जाता है, साथ ही जल्द ही अस्पताल से उसे छुट्टी भी मिल जाती है और शीघ्र ही अपने काम पर भी लौट जाता है। एक मरीज़ के लिये एम्स में इस का खर्च 75000 हज़ार रूपये आता है .. यह उस खर्च का एक तिहाई है जो किसी मरीज़ को इस इलाज के लिये प्राइव्हेट अस्पताल में खर्च करना पड़ता है।
Source : Quick surgeries at AIIMS