मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

डॉयबीटीज़ की दवा अब हफ्ते में एक बार....बस?


आज बाद दोपहर उत्तर रेलवे डिवीजिनल अस्पताल, लखनऊ में एक क्लीनिक मीटिंग के दौरान डॉयबीटीज़ रोग के लिए उपलब्ध नईं दवाईयों के बारे में चर्चा हुई...चीफ़  फ़िज़िशियन डा अमरेन्द्र कुमार द्वारा इस विषय पर एक वार्त्ता  प्रस्तुत की गई...यह प्रोग्राम सभी मैडीकल ऑफीसर्ज़ के लिए रखा गया था..इस तरह की क्लीनिकल मीटिंग यहां नियमित होती रहती हैं।

डा अमरेन्द्र ने इस बीमारी के चौकाने वाले आंकड़े रखते हुए इस के लिए उपलब्ध विभिन्न दवाईयों के बारे में चिकित्सकों की जानकारी को रिफ्रेश किया..

कुछ नईं दवाईयों के इतिहास के बारे में बताते हुए यह बताया गया कि २००५ में किस तरह से अफ्रीकी छिपकली की लार से कुछ एन्ज़ाईम्स अलग कर, बहुत सी जटिल रासायनिक प्रकियाओं के बाद एक तरह की दवाई ब्लड-शूगर के लिए तैयार की जाने लगी... उस के बाद इसी तरह की दवाई को मानव से प्राप्त किया जाने लगा..

लेकिन अब यह ड्यूलाग्यूटाईड (Dulagutide) के रूप में उपलब्ध है ..यूरोपियन मार्कीट में २०१५ से यह उपलब्ध है..अमेरिका में यह दवाई २०१४ से उपलब्ध है और अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से एप्रूवड है।

इस तरह की दवाईयां -इन से थोड़ा मिलती जुलती पहले ही से उपलब्ध तो हैं...लेिकन इन्हें इंजेक्शन के रूप में हर रोज़ लेना पड़ता है...जब कि ड्यूलाग्यूटाईड का एक इंजेक्शन हफ्ते में एक बार ही लेना पड़ता है। 



ड्यूलाग्यूटाईड साल्ट ने किस तरह से शूगर रोगियों के लिए दवा लेना आसान कर दिया है ...इंसुलिन दो बार, तीन या चार बार तक भी लेनी पड़ती है ..लेकिन Dulagutide का एक इंजेक्शन एक सप्ताह तक अपना काम करता रहता है। यह इंजेक्शन ०.७५ मिलीग्राम और १.५ मिलीग्राम के सिंगल-यूज़ इस्तेमाल होने वाले पेन के रूप में आता है...इस इंजेक्शन को लेने का खाने के समय से कोई संबंध नहीं है...यानि के इसी कोई खाने से पहले लगाए या बाद में कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

यह जो नईं दवाई है यह शूगर के रोगी का वज़न कम करने के लिए भी बहुत उपयोगी है ...अपने आप में यह वज़न कम करने की कोई दवाई नहीं है ...इस से अभिप्रायः यह है कि अगर कोई चाहे कि इसे वज़न कम करने के लिए लिया जाने लगे, ऐसा नहीं है...इस का वज़न कम करने वाला एक्शन इसलिए है कि यह मस्तिष्क के Satiety Centre पर काम करती है ...अब इसे कैसे समझाया जाए...अच्छा, आप यह जान लें कि जब हम खाते हैं तो कुछ समय बाद मस्तिष्क में एक भूख को कंट्रोल करने वाला केन्द्र एक संकेत भेजता है कि और नहीं चाहिए, बस....इस से Calorie intake कम होती है और यह दवाई लेने वालों का वज़न कम होने लगता है।

 Dulagutide से पहले Liragutide इंजेक्शन का इस्तेमाल हुआ करता था ..लेकिन इसे रोज़ाना लेना पड़ता था.. और इस के साथ साथ नये साल्ट की निम्नलिखित विशेषताएं बताई जा रही हैं..
  • इस से HbA1C के स्तर में बेहतर कमी आती है ...इस टेस्ट को ग्लाईकोसेटेड हीमोग्लोबिन कहते हैं..
  • जैसा कि ऊपर चर्चा की गई कि इस से वज़न भी घटता है..
  • मधुमेह की इस दवाई से ब्लड-प्रेशर भी घटता है..
  • इस दवाई का हृदय की मांसपेशियों पर एक सुरक्षात्मक प्रभाव बताया जा रहा है..
  • हाईपोग्लाईसिमिया नामक तकलीफ़ ड्यूलाग्यूटाईड ले रहे मरीज़ों में ओरल ड्रग्स (OHD--oral hypoglycemic drugs) एवं इंसुलिन ले रहे मरीज़ों के मुकाबले बहुत ही कम होती है ..और मधुमेह के जिन मरीज़ों को जिन दवाईयों के साथ हाईपोग्लाईसिमिया हुआ है ये वे ही जानते हैं कि यह कितनी परेशान करने वाली अवस्था है ...जिसमें अचानक रक्त में शर्करा का स्तर बहुत कम होने से मरीज़ की हातल बहुत पतली हो जाती है। 
इस दवाई को एक इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है ...कहने को ही इंजेक्शन है ..यह एक तरह से पेन ही है..और इस में Painless technology का इस्तेमाल होता है और मरीज़ को बिल्कुल भी तकलीफ़ नहीं होती.. और एक बार इस्तेमाल करने के बाद इसे डिस्पोज़ ऑफ कर दिया जाता है .. इस की वीडियो आप इस लिंक पर देख सकते हैं..

साईड इफेक्ट्स ...

साईड इफेक्ट्स हो सकते हैं किसी किसी को .. लेिकन वे कुछ भयंकर किस्म के नहीं है..बस, यही मितली, उल्टी, पेट में दर्द, अपचन आदि हो सकते हैं इस को लेने के बाद शुरूआती हफ्तों में.. मरीज़ को इस के बारे में आगाह कर दिया जाना ज़रूरी है .. दो तीन हफ्तों के इस्तेमाल के बाद इस तरह के इफेक्ट्स कम होने लगते हैं।

एक बात इस के बारे में ध्यान देने योग्य यह भी है कि कोशिश करें कि भर पेट खाना खाने के तुरंत बाद इसे न ले लें, थोड़ा कम खाना खाएं...३० मिनट तक इंतज़ार कर लें, सेटाईटी सेंटर को थोड़ा काम कर लेने दें, फिर थोड़ा खा लें... वही बात कि एक दम ठूंस कर पेट भरने के तुरंत बाद इसे न लें...ताकि मतली, उल्टी जैसी तकलीफ़ से बचा जा सके।

 शूगर के रोगियों में माईक्रोएल्ब्यूमनयूरिया होने के चांस भी यह दवाई कम करती है...माईक्रोएल्ब्यूमनयूरिया को गुर्दे की तकलीफ़ का शुरूआती संकेत माना जाता है।

जब इस दवा को लेना शुरू किया जाता है ...सप्ताह में एक बार इंजेक्शन के रूप में...तो दो हफ्ते में इस का असर होना शुरू हो जाता है .. रेगुलर ब्लड-शूगर मानीटरिंग तो इस केस में भी ज़रूरी है।

शूगर के कौन से रोगी इसे ले सकते हैं...

हर शूगर के मरीज़ के लिए इस तरह की दवाईयां नहीं है..मधुमेह दो तरह का होता है ..एक तो जो बचपन या युवावस्था में ही हो जाता है और दूसरा है जो बड़ी उम्र में तीस-चालीस साल की उम्र में या इस के बाद होता है ..पहले वाली को टाईप वन और दूसरे वाली को टाइप टू कहते हैं... इस दवाई को टाइप टू के मरीज़ ही ले सकते हैं ..वे भी निम्नलिखित क्राईटीरिया पूरा होने पर ...
  • ऐसे मरीज़ जो दो, तीन या चार ओरल ड्रग्स एवं इंसुलिन भी शूगर के कंट्रोल के लिए इस्तेमाल करते हैं लेिकन फिर भी इन का ब्लड-शूगर स्तर कंट्रोल नहीं हो रहा, इन में इस तरह की दवाई फिजिशियन शुरू कर सकते हैं...या तो अकेले या फिर किसी अन्य दवाई के साथ मिला कर ..जैसा भी वे मरीज़ की भलाई के लिए उचित समझते हैं। 
  • जो मरीज़ स्थूल काया वाले हैं और विभिन्न दवाईयों के बावजूद जिन का ग्लाईकोसेटेड हिमोग्लोबिन 8-9 से ऊपर ही रहता है ..

एक बार विशेष यह भी है कि इस दवाई को ज़रूरत पड़ने पर अन्य दवाईयों के साथ भी दिया जा सकता है।

इस की कीमत क्या है..

हफ्ते में इस्तेमाल होने वाले एक पेन की कीमत लगभग दो से अढ़ाई हज़ार है ...इस का मतलब इस को इस्तेमाल करने का खर्च महीने भर के लिए दस हज़ार के पास बैठता है ... यह पेन-टेक्नोलाजी वाला इंजेक्शन बहुत ही कम पीड़ादायक है, वह तो है ही, इस के साथ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि चूंकि यह दवा नई नई लांच हुई है इसलिए थोड़ा महंगी तो है लेकिन जिस तरह से मधुमेह की वजह से उत्पन्न होने वाले अन्य रोगों से यह दवा बचा कर रखती है, दिल की सुरक्षा, ब्लड-प्रेशर का बेहतर कंट्रोल, गुर्दे का बचाव करती है ...उस हिसाब से उन तकलीफ़ों पर होने वाले खर्च से भी एक तरह से बचा लेती है..

जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है इसे टाइप १ डायबीटीज़ में नहीं दिया जा सकता .. और न ही इसे डायबीटिक किटोएसीडोसिस में ही दिया जा सकता है।

इस के बारे में एक बार और याद आ गई कि अगर आप इसे आप एक हफ्ते के बाद दो तीन दिन तक लेना भूल भी जाते हैं तो भी कोई बात नहीं....कोई बात नहीं का मतलब यह नहीं कि ऐसा करने के लिए हमेशा के लिए क्लीन चिट मिल गई है ..ऐसा नहीं है, बहुत बार इस की वजह से इसे फिर से रि-शेड्यूल भी करना पड़ सकता है ..

Disclaimer.. . It is just a medical communication, please consult your physician for taking any health-related decision.

1970 के दशक में पहली बार सुना था कि डॉयबीटीज़ नाम का भी कोई रोग होता है..यह फिल्म यही है ज़िंदगी देखने के बाद...इस फिल्म में संजीव कुमार को डॉयबीटीज़ हो जाती है..