मंगलवार, 27 जनवरी 2015

टेबलेट के साइज का उस के प्रभाव से क्या संबंध है?

आज मुझे सुबह अचानक ध्यान आ गया...एक आम भ्रांति जो लोगों में मौजूद है ..टेबलेट के साइज से उस के प्रभाव का और उस की "गर्मी" का अनुमान लगाया जाता है।

अकसर अनुभव किया है जब लोग कहते हैं कि बड़े बड़े कैप्सूल आप ने तो पूरे दिन में तीन बार खाने को कहे थे...लेकिन वे तो बड़े ही इतने थे कि हम ने तो दो ही लिये।

कईं बार ऐसा भी सुनने को आया कि टेबलेट इतना बड़ी थी कि हम ने आधी ही खाई...

यह अलग अलग तरह की भ्रांतियां हैं....जो दवाई जिस ढंग से इस्तेमाल करने के लिए बनी है, जिस समय खाने के लिए कहा गया है, खाली पेट, या खाने के बाद, इन सब के पीछे एक साईंस है, शुद्ध साईंस है..


आज मुझे इस विषय का ध्यान सुबह आया जब मेरे सामने तीन शीशियां आईं....एक दवा की..... आप देखिए कि इन तीनों शीशियों में एक ही दवाई की अलग अलग पावर की गोलियां हैं....मैंने जब २५ माईक्रोग्राम और पचास माईक्रोग्राम की गोलियां देखीं तो मुझे भी एक बार लगा कि २५ माईक्रोग्राम वाली टेबलेट ५० माईक्रोग्राम वाली टेबलेट से बडी कैसे......तुरंत ही ध्यान आ गया कि क्या मैं भी अपने मरीज़ों की तरह ही सोचने लगा हूं?

यह कोई इश्यू होता ही नहीं कि जिस टेबलेट में दवाई ज़्यादा होगी वह बड़ी होगी और जिस में दवाई की मात्रा कम रहेगा वह छोटे आकार की होगी।

सब से पहले तो आप टेबलेट में उपलब्ध दवाई की मात्रा की तरफ़ ध्यान करिए... २५ माइक्रोग्राम...मेरा तो हिसाब किताब ऐसा ही है, मैंने बेटे से पूछा कि यह कितना हुआ तो उसने केलकुलेट कर के बताया कि २५ माईक्रोग्राम का मतलब एक ग्राम का ४००००वां हिस्सा, ५० माइक्रोग्राम होता है एक ग्राम का २००००वां हिस्सा, और १०० माइक्रोग्राम होता है एक ग्राम का १०००० वां हिस्सा.......जब वह मेरे को यह आंकड़े बता रहा था तो हैरान भी हो रहा था कि कंपनियां क्या यह सब काम इतनी प्रिसिज़न से कर पाती होंगी!

आप को ध्यान होगा कि एक विज्ञापन आता है ...आयोडीन युक्त नमक का...जिस में बताया जाता है कि सारे जीवन भर में किसी व्यक्ति को एक चुटकी भर आयोडीन की मात्रा चाहिए होती है और इस की दैनिक ज़रूरत सूईं की नोक के समान होती है। आशा है आप को यह पोस्ट पढ़ने के बाद यह चुटकी और सूईं की नोक जैसी बातें सहज लगेंगी।

आप स्वयं नोटिस करिए कि कितनी कम मात्रा में यह दवाई इन टेबलेट्स में होती है......अब अच्छी बड़ी कंपनियां जिन के यहां परफैक्ट गुणवत्ता नियंत्रण होता है ... वे तो यह सब करती ही हैं...लेिकन लोकल कंपनियां जिन का कुछ अता पता नहीं होता, जिन की दवाईयां झोलाछाप डाक्टर और बस स्टैंड पर दवाईयां बेचने वाले लड़के ही बेचते हैं... वे किस हद तक आम जनता की सेहत से खिलवाड़ करते होंगे।

एक बात का अभी ध्यान आया कि जितना हो सके जितनी पावर की दवाई चाहिए वही टेबलेट लेना चाहिए.. आप देखिए कि एक दवाई में अगर है ही एक ग्राम का २००००वां हिस्सा, तो ऐसे में इस के दो टुकड़े करने में कैसे कोई आश्वस्त हो सकता है कि दोनों टुकड़ों में एक जैसी मात्रा में ही दवाई का सक्रिय घटक भी होगा।

एक प्रश्न आना स्वभाविक है आप के मन में कि अगर घटकों की मात्रा इतनी कम है तो फिर ये टेबलेट्स इतनी बड़ी कैसे बन गईं?....इस का जवाब यही है कि इन गोलियों में दवाई की मात्रा उतनी ही हैं जितनी इनके ऊपर लिखी है...बाकी तो टेबलेट तैयार करने के लिए इस्तेमाल करने वाले कोई अन्य हानिरहित पावडर होते हैं जिन्हें शायद adjuvants (एड्जुवेन्ट्स) कह दिया जाता है.....इन का अपना न तो कोई प्रभाव होता है, न ही कोई नुकसान होता है लेकिन इतनी कम मात्रा में दवाई को टेबलेट या कैप्सूल का रूप देने के लिए इन्हें टेबलेट्स बनाते समय इस्तेमाल करना होता है।

आशा है आप इस बात को अच्छे से समझ गये होंगे। टेबलेट्स का आकार कंपनियों पर भी निर्भर करता है....ये सब ट्रेड-सीक्रेट्स होते हैं।

आप देखिए कि क्यों कहा जाता है कि अच्छी कंपनियों की ही दवाईयां खरीदनी चाहिए.....लेकिन इस में भी आज कल इतनी सांठ-गांठ चलने लगी है विभिन्न लेवल पर कि दवाई खरीदने वाले का सब से ज़्यादा शोषण हो रहा है......कोई विदेश का टूर लगा आता है, कोई महंगे होटले में ठहर कर कांफ्रेंस कर आता है, किसी को नईं कार मिलती है तो किसी को कुछ...........बस बेचारा मरीज लुट (या XX) जाता है.....और कईं कईं बार तो थर्ड क्लास, गंदे वातावरण में तैयार, निम्न स्तर के गुणवत्ता मापदंडों वाली कंपनियों की दवाईयां जान ले लेती हैं......क्या हुआ छत्तीसगढ़ में.......अब कोई नाम भी लेता है उस कांड का?.....कितना हो-हल्ला हुआ कुछ िदन कि दवाई में चूहे मारने वाली दवाई मिली हुई थी......जिस तरह से अनपढ़ युवक तक इस काम के लिए लगा लिये जाते हैं, कोई हैरानगी नहीं कि यह सब हादसे नियमित होते रहते हैं.......और अनेकों जानलेवा हादसे तो अखबारों की सुर्खियों बन ही नहीं पाते!


मुझे ध्यान आया कुछ दिन पहले मैं जब मैं हरियाणा में गया था तो वहां पर दीवार पर यह विज्ञापन दिख गया था कि दवाईयों की पैकिंग के लिए अनपढ़ से लेकर बी ए तक पढ़े लड़के चाहिए....यह मेरे मोबाइल में है..पहली बार देखा कि अनपढ़ लड़के भी इस काम पर लगाये जा सकते हैं..... हम हिंदोस्तानियों की ज़िंदगी सच में बड़ी सस्ती है...

आज सुबह भी मुझे हम लोगों की जान सस्ती होने की याद एक मित्र --अनूप शुक्ल की फेसबुक पोस्ट ने दिलाई थी ...जिसे मैं कॉपी कर के यहां पेस्ट कर रहा हूं....
अमेरिका में न्यूक्लियर पावर प्लांट की स्थिति:
1. अमेरिका में 100 न्यूक्लियर रिएक्टर हैं जो कि वहां की 19.40 % ऊर्जा की कमी पूरा करते हैं।
2. वहां 1974 से कोई नया प्लांट नहीं लगा।
3. न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाना और उसका रखरखाव मंहगा है।
4. बचे हुये ईंधन का सुरक्षित रखरखाव कठिन काम है।
5. जापान में हुई नाभिकीय दुर्घटना के कारण।
6. 2013 में चार पुराने रिएक्टर लाइसेंस अवधि के पहले ही स्थायी रूप से बंद कर दिये गये। ऐसा करने के पीछे ऊंची रिपेयर और रखरखाव की कीमत और गैस के दाम कम होने के कारण किया गया।
7. बढ़ती आतंकवादी गतिविधियों के चलते न्यूक्लियर पावर प्लॉंट सुरक्षा की दृष्टि से बहुत संवेदनशील हैं।
जो देश मंहगे होने और सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक होने के चलते खुद अपने यहां नाभिकीय पावर प्लॉंट नहीं लगा रहा उसके साथ न्यूक्लियर पावर समझौता उल्लास का विषय है तो क्या सिर्फ़ इसलिये कि हमारे यहां लोगों की जान सस्ती है?