रविवार, 20 जनवरी 2008

तो रेडिया का एक रूप यह भी है.....


यह एक रेडियो की विज्ञापन प्रसारण सेवा है। इस सेवा में आप यह ही एक्सपैक्ट करते हैं किसी गीतों भरे कार्यक्रम के दौरान किसी साड़ीयों की दुकान, किसी गहनों के शो-रूम या किसी जूतों के शो-रूम की मशहूरियां आप को सुनने को मिलेंगी......ठीक है, ठीक है, इतना तो चलता है, हमें एंटरटेन करने के साथ अगर यह सर्विस कुछ रैविन्यू भी कमा रही है तो ठीक ही है, इस में बुराई क्या है।

लेकिन, दोस्तो, कल मैं सुबह इस सेवा के अंतर्गत एक प्रोग्राम सुन रहा था....सेहत संभाल। यह कोई हकीम जी द्वारा दी गई इंटरवियू पर आधारित था। सब से पहले तो मैं यह क्लियर करना चाहता हूं कि मैं चिकित्सा की सभी पद्धतियों का एक सम्मान करता हूं। तो फिर , मेरे को उस हकीम जी की बातों से क्या आपत्ति नहीं, मुझे भला क्यों आपत्ति होने लगी, मुझे तो केवल आपत्ति यही है कि उस so-called सेहत संभाल कार्यक्रम से पहले उस हकीम जी का पूरा पता, फोन सहित बताया गया, और प्रोग्राम के बाद भी पूरा पता ,शायद फोन नंबर सहित बताया गया था। आपत्ति तो ,दोस्तो, मुझे इस में ही है----मैं भी इस तरह के इंटरवियू पर आधारित प्रोग्रामों का एवं फोन-इन कार्यक्रमों का कईं बार हिस्सा रह चुका हूं....कभी ऐसा किसी चिकित्सक का पता बताना, फोन नंबर बताना यह वाली विज्ञापनबाजी तो दोस्तो मेरे को पचानी मुश्किल हो रही है। प्रोग्राम के बाद एक मोबाइल नंबर भी बताया गया कि अगर आप को कोई तकलीफ है तो आप इस नंबर पर फोन कर लीजिए।

दोस्तो, ले दे कर एक फुटपाथ पर, किसी फ्लाई-ओवर के नीचे गीली बदबूदार मिट्टी पर सोने वाले बशिंदों के पास अपने गमों को गलत करने के लिए, सारे शरीर को मच्छरों, मक्खियों से छलनी करवाते हुए , आधा पेट खाली होते हुए अंगडाईयां ले लेकर थक चुकी, और बार-बार दूध के लिए बिलख रही अपनी लाडली को पीटने के बाद पश्चाताप की आग में जलते जलते कल के किसी सुनहरी सपनों में खोने का एक मात्र तो साधन है ...उस का एक सस्ता सा एफएम....दोस्तो, सस्ता जरूर होगा, लेकिन उस में भी आवाज़ किसी फाइव-स्टार होटल के कमरे में लगे एफएम से कम नहीं आती है...........अब इस में भी किसी हकीम जी की विज्ञापनबाजी घुसेड़ कर क्या कर लोगे.......क्यों हम उन बंदों की पहले से ही बेहद कंप्लीकेट लाइफ को और भी ....... !!

मुझे इस कार्यक्रम के format से ऐसा ही लगा कि यह कोई स्पोंसर्ड कार्यक्रम है...नहीं तो अभी तक यह प्राइवेट डाक्टरों के नाम,पते, फोन नंबर कहां इन प्रोग्रामों में सुनते को मिलते थे। लेकिन दोस्तो कुछ भी हो मेरे को तो यह सब अच्छा नहीं लगा।

दोस्तो, चाहे मैं हकीमी ज्ञान के बारे में कुछ भी नहीं जानता लेकिन जिस तरह की बातें उस कार्यक्रम में हो रहीं थीं, वह आप को बताना चाहूंगा.......शरीर की कमज़ोरी, जिगर की गर्मी, पिचके गाल, धंसी गाले...बाकी तो आप समझ ही गये होंगे। बार-बार यही कहा जा रहा था कि आपको चैक अप करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। वैसे तो आप भी सोचते होंगे कि इस में क्या नई बात है, सभी डाक्टर रेडियो-टीवी पर ऐसा ही तो कहते हैं.....अब बिना देखे थोड़ा ही वो दवा-दारू शुरू कर देते हैं। बात आप की ठीक है, लेकिन पता नहीं क्यों मुझे इस प्रोग्राम में यह सब अच्छा नहीं लग रहा था.....शायद sponsorship वाले छोंक की भनक मात्र से सारी दाल का ज़ायका ही बदल जाता है।

स्पांसरशिप वाली बात से एक बात याद गई कि मेरा बेटा मुझे कुछ दिनों से कह रहा है कि पापा, अपनी हैल्थ वाली बलोग्स पर कुछ विज्ञापन डाल लो, लोग तो इससे बहुत कमा रहे हैं। मुझे उस को समझाना ही पड़ा कि क्यों कोई दवाईयों के विज्ञापन मेरी ब्लोग पर देने की हिमाकत करेगा, क्योंकि मैंने जब किसी भी प्रोडक्ट को रिकमैंड ही नहीं करना अपनी बलोग पर , तो क्यों कोई देगा विज्ञापन। दूसरी बात यह भी है , मैंने उसे समझाया, कि अगर एक बार बिल्ली के मुंह पर खून लग गया ....एक बार मुझे इन विज्ञापनों से होने वाली पांच सौ-एक हज़ार रूपल्ली के नशे की लत गई , तो फिर मैं जो लिखूंगा,उन विज्ञापनों में दी गई वस्तुओं एवं सेवाओं को बेचने के लिए ही लिखूंगा..........मेरे लिए तो भई वह दोयम दर्जे का ही लेखन होगा.....जब मैं अपने मन की बात ही किसी तक पहुंचा पाऊं.......वह तो फिर बात हो गई स्पोंसर्ड लेखन की ....लेखन और वह भी स्पोंसर्ड ...बात हज़म नहीं हो रही....आप को भी नहीं हो रही ?---आप की यह बदहज़मी लेकिन आप के बारे में बहुत कुछ ब्यां कर रही है। इस के लिए कुछ लेने की ज़रूरत नहीं ....बस, हमेशा ऐसे ही बने रहिए।