सोमवार, 31 दिसंबर 2007

जब केबल टी.वी ने भी रेडियो की दुनिया में घुस-पैठ कर डाली...

....लगभग 1985-86 के आस-पास तक तो हम लोग रेडियो के साथ साथ दूरदर्शन टीवी का आनंद लूटने में लगे हुए थे। दूरदर्शन के प्रोग्राम दिन में कुछ घंटों तक ही प्रसारित हुया करते थे -- बाकी समय तो अपना रेडियो के मनोरंजक प्रोग्रामों के नाम ही लगा होता था। अब तक मैंने भी 3-4 छोटे-छोटे ट्रांजिस्टर इक्टठे कर रखे थे। एक हास्पीटल में फुर्सत के लम्हों में सुनने के लिए रखा हुया था, एक घर के लिए ....मुझे, दोस्तो, अभी ध्यान आ रहा है कि यह वह समय था जब मैं नहाते हुए भी एक ट्रांजिस्टर गुसलखाने( जी हां, तब गुसलखाने ही हुया करते थे, ये बाथ-रूम तो अब हम ने बनाने शुरू किए हैं...) की शैल्फ पर रखना न भूलता था- आखिर उस दौरान भी मैं अपने चहेते विविध भारती की फिल्मी गीतों की बौछार से कैसे दूर रह सकता था !! उन दिनों यह भी बात होने लगीं कि अब वीसीपी या वीसीआर खरीदने या किराये पर लाने का भी कोई झंझट नहीं, अब तो भई केबल आ गया है, सारा दिन हिंदी फिल्मी व हिंदी फिल्मी गीतों पर आधारित कार्यक्रम छकाया करेगा --और वह भी सिर्फ 120रूपये महीने की दर से। खैर, हम लोगों को कभी यह केबल -वेबल लगवाने की बात जंची नहीं--बस यूं ही---शायद इस का कारण होगा कि हम लोग रेडियो एवं दूरदर्शन के कार्यक्रमों में बुरी तरह से ( या कहूं, अच्छी तरह से) डूबे रहते थे। तो दोस्तो, मैं कहना यह चाह रहा हूं कि इस केबल टीवी के आने से भी रेडियो की प्यारी सी दुनिया में कोई खास असर नहीं पड़ा। लोग, वही हिंदी फिल्में बार-बार देख कर ऊबने से लगे थे----वही गीत सुन सुन कर सिर फटा करता था।
दोस्तो, 1991 में मेरी सर्विस दिल्ली के सरकारी हस्पताल में लग गई। अभी कुछ दिन ही इस नौकरी को लगे हुए थे--- मुझे अभी पहली तनख्वाह भी न मिली थी। दोस्तो, मैं और मेरे बीवी चांदनी चौंक एरिया में टहल रहे थे- उस दिन मेरा जन्म-दिन था, बीवी ने पूछा कि बर्थ-डे प्रेसेंट क्या लोगे ?----मेरा कुछ खास जवाब न आने पर उस ने कहा कि आप को रेडियो सुनने का इतना शौक है, चलो एक रेडियो ही ले लेते हैं। सो, दोस्तो, मैं और मेरी पत्नी उस दिन सामने ही एक रेडियो की दुकान के अंदर गए--- हमें एक 600रूपये के करीब का ट्रांजिस्टर पसंद आया ....फिलिप्स का था....उस की यह खासियत कि चाहे तो सेल से चलाओ, चाहो तो बिजली से। दोस्तो, आप से क्या छिपाना, उन दिनों तो सैल भी बार-बार खरीदने चुभते थे। खैर, उस रेडियो पर मेरा दिल आ ही गया--- लेकिन मेरी जेब में केवल अढ़ाई-तीन सौ रूपये ही थे, मैं कुछ आना-कानी करने लगा था, लेकिन मिसिज ने जैसे मुझे उस दिन वह सैट दिलाने की ठान रखी थी, तो,दोस्तो, हम दोनों ने मिल कर उसे खरीद ही लिया। बस, उस दिन से उसे बिजली के साथ चलाने लगा और मेरी दुनिया में एक अनूठा संसार जुड़ गया --- यह सैट खरीदने से पहले तो सैल ज्यादा फुंकने की टेंशन होती थी, लेकिन अब तो बिना किसी रोक-टोक के दिन में जितना समय चाहो, आल इंडिया रेडियो के प्रोग्राम सुनने को मिलते थे। दोस्तो, मैं तो भई आज तक इस सैट के बारे में बड़ा इमोशनल हूं--- अब बीवी को भी अकसर कहता हूं कि हम दोनों द्वारा आज तक जितनी भी परचेजि़ग की गई है, वह रेडियो वाली खरीद मेरे लिए सब से ज्यादा मायने रखती है और सारी उम्र रखेगी। उस दिन मुझे उस रेडियो की ही जरूरत थी। एक तरह से देखा जाए तो उस रेडियो सैट की खरीद की याद हम दोनों के बीच एक भावनात्मक पुल का काम करती है। प्लीज़, आप कृपया इतने सीरियस न हो जाइए, लेकिन मुझे पता है कि इस पर आप का भी वश कहां है, ये लेखक लोग होते ही कुछ भावुक किस्म के हैं !!!
कुछ महीनों बाद, दोस्तो, हम दोनों की पोस्टिंग बम्बई हो गई ( मैं क्या करूं, मुझे तो दोस्तो अभी भी उसे पुराने नाम से ही पुकारने में आनंद मिलता है!!) सो , उस सैट के माध्यम से विविध भारती के प्रोग्रामों का भरपूर मजा लूटना जारी रहा। अभी बंबई गए हुए 2-3 महीने ही हुए थे कि वहां पर फिलिप्स का स्टीरियो (टू-इन वन) खरीद लिया और इस की स्टीरीयोफोनिक आवाज़ होने की वजह से उस का आनंद ज्यादा आने लगा। सो, अब उस पुराने वाले सैट के साथ साथ इस स्टीरिरयो पर भी रेडियो को सुनने का मजा आने लगा। पता नहीं, कितनी बार, शायद सैंकड़ो बार उन दिनों उस बेटा फिल्म की कैसेट के गीत सुन कर भी मैं कभी बोर नहीं हुया----!! लेकिन दोस्तो अब इन पुरानी यादों के झरोखों पर खड़ा-खड़ा ऊब सा गया हूं--- सो, फिर मिलते हैं।
Wish all of you and yours a Wonderful 2008------------may god fill your life with health and happiness during this year !!!!!!!

सोमवार, 24 दिसंबर 2007

जब रेडियो के मासूम से संसार में टू-इन वन ने धावा बोल दिया......

सीधी सादी रेडियो की दुनिया में भी टू-इन वन का धावा....
ज़िंदगी बहुत खुशनुमा उर्दू सर्विस के सहारे तैर रही थी, तब हम भी स्कूली छात्र थे। कभी कभी विविध भारती सुनने का जश्न भी हो ही जाता था-- विशेषकर रात के सन्नाटों के दौरान। आज बहुत समय बाद ध्यान आ रहा है कि स्कूल में भी क्रिकेट टैस्टों के दौरान अपने बहुत से साथी एक छोटा सा ट्रांसज़िस्टर ले कर आने का जोखिम उठा लिया करते थे- जोखिम इसलिए कि मास्टर जी की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर होती थी कि उस दिन उन का मूड कैसा था। लेकिन अपने दोस्त भी खिलाड़ी थे- वो भी इस जोखिम को कम कुछ इस प्रकार कर लेते थे कि आधी छुट्टी के समय ही उस करिश्माई मशीन को निकालते थे या फिर दो पीरियड़ों के बीच का जो अंतराल होता था जब तक मास्टर साहिब की क्लास में एंट्री नहीं हो जाती थी। मेरे एक दोस्त का चेहरा आज मेरी आंखों के सामने घूम रहा है जो इतनी शिद्दत के साथ उस को कान के पास रख कर घुमाता रहता था कि किसी तरह उस के साथ साथ उस को घेरे खड़े गैंग के और छात्रों को सब कुछ स्पष्ट सा सुन जाए कि मदन लाल कैसा खेल रहा है, या फिर बिशन सिंह बेदी ने दूसरी टीम को कैसे धो डाला। आज कल बच्चे स्कूल में या ट्यूशनों में महंगे महंगे मोबाइल फोन ले जा कर भी वह रोमांच हासिल नहीं कर पाते होंगे, जो हम लोग एक छोटे से ट्रांजिस्टर से कर लिया करते थे।
यह सब उन दिनों की बातें हैं जब शोले फिल्म का बोलबाला सारे हिंदोस्तान में छाया हुया था --मोहल्ले में मुंडन हो ,चाहे शगुन की रस्म हो, सिप्पी साहब की इस अनूठी देन के सुपरहिट गाने और रोटी कपड़ा मकान के गीत बडे बडे लाउड स्पीकरों से बजना इन समारोहों का हिस्सा ही बन चुका था --- और हमें यही इंतजार रहता था कि अब मोहल्ले में अगली शादी किस के कहां कब होनी है। कईं बार यह भी सोचता हूं कि दोस्तो क्या मेरी जिंदगी ही हिंदी फिल्मों से इतनी गुथी हुई है कि जब भी अपने अतीत की कोई भी बात याद करता हूं तो उस से भी पहले उस दौर की फिल्मों का ध्यान आ ही जाता है। ओह, मैं फिस से अपनी बात से थोड़ा डेविएट हो गया---प्लीज़ क्षमा करें।
दोस्तो, उन दिनों यानि 1976 के आस पास दिल्ली अपनी बुआ के यहां जाने का अवसर मिला- वहां पर एक अजूबा देख लिया। मेरी बुआ की लड़की अकसर एकांत में बैठ कर एक मशीन पर शोले के डायलाग और गीत बार बार सुना करती थी---मुझे अच्छी तरह याद है कि उस मशीन को सुन कर मज़ा आ जाता था, तब यह भी पता लगा कि इस को टेप-रिकार्डर कहते हैं। इतना भी अच्छी तरह से याद है कि वह हमें अपने पास एक शर्त पर बैठने देती थीं कि हम बिल्कुल शोर न करेंगे--- बीच बीच में हमारी वो रीटा दीदी अपने मुंह पर उंगली ऱख कर चुप रहने का इशारा करती ही रहती थीं। यह भी हमारी समय में आ गया था कि इस मशीन में एक टेप डालनी पड़ती है। बस, साथियो, उस टेप-रिकार्डर से अपना नाता दो-चार दिन का ही था जो वापिस अपने घर अमृतसर आने के बाद टूट गया। और वापिस वही उर्दू सर्विस का फरमाइशी प्रोग्राम और हम...।
कुछ समय बाद जब कालेज की हवा लगनी शुरू हुई तो बम्बई ( जी हां, तब वह अच्छा खासा बम्बई ही हुया करता था) में अपने बड़े भाई के पास जाने का मौका मिला----- उधर तो फिल्मी गीत सुबह ही से शुरू हो जाते थे- और उन दिनों विदेशों टेपरिकार्डरों का बड़ा क्रेज़ था। उन के यहां भी सोनी का एक छोटा सा टू-इन-वन था, जिस का नाम तब पहली बार सुना था। सारा दिन उस टू-इन-वन के साथ चिपके रहना अच्छा लगता था। उन्होंने ने मुझे बहुत कहा कि तू इसे ले जा, मैं दूसरा ले लूंगा। लेकिन मैं बस न-न ही करता रहा। बस, वही छोटी छोटी खुशियां, और छोटी छोटी ज़रूरतें। दोस्तो, ठीक तो नहीं लगता ,लेकिन उस दौर के बच्चों में लगता है एक बात बड़ी जबरदस्त थी कि उन्हें इस बात का पूरा ज्ञान होता था कि कौन सी चीज़ उन के पेरेन्टस की रीच में है, कौन सी नहीं है। इसलिए वे किसी भी चीज़ के लिए मचलना शुरू नहीं कर देते थे। इस बात को देखने का दूसरा ढंग यह भी है कि आज कल बच्चों में अपने आस पास से इतना पियर-प्रेशर है कि अपने पापा के साथ जब किसी फिल्म की सीडी खरीदने जाते हैं तो कोई दो-अढ़ाई हज़ार का एमपी4 पसंद आने पर उसे खरीदने का मन बनाने में दो-मिनट भी नहीं लगाते-----एक बात यह भी तो है न कि उन्हें पता है कि मां-बाप ये सब लग्ज़रीज़ अफोर्ड कर सकते हैं।
1980 के गर्मी के मौसम में मेरे बड़े भैया अमृतसर आए हुए थे- उन को मेरा टेप-रिकार्डर सुनने का शौक पता था,सो उन्होंने ने मुझे एक दिन 1500 रूपये देकर कहा कि जो तेरे मन को अच्छा लगे वो टू-इन वन खरीद लाना। कालेज से छुट्टी होने के बाद, दोस्तों, मैं अमृतसर के हाल बाजार में पहुंच गया सर्वे करने अपनी साइकिल पर---बस उस दिन मेरे लिए भी वही बात थी---आज मैं ऊपर, आसमां नीचे,.................सो, दुर्ग्याना मंदिर के बाहर एक बिजली की दुकान से वैस्टन का एक टु-इन वन मैंने भी खरीद लिया और बेहद खुशी से झूमता हुया उस टूइनवन के डिब्बे को जैसे तैसे साइकिल के कैरियर पर रख घर पहुंचा। दोस्तों, जितनी खुशी मुझे उस दिन हुई शायद उतनी तो मुझे अपनी पहली कार खरीदने पर भी न हुी होगी। क्या करूं--- आप से क्या छिपाना, सब कुछ साफ साफ कहूंगा तो ही ठीक है, नही तो मेरा ही सिर दुखेगा। तब हमारे घर में पड़े बुश के रेडियो ने बैक सीट ले ली थी -- वह भी अब थोड़ा बुजुर्ग हो चला था। खैर, मेरे मनोरंजन की दुनिया का एक नया अध्याय उस टू-इन वन ने शुरू कर दिया। जब भी पढ़ता तो वह मेरा साथी मेरे पास होता । आस-पड़ोस के लड़कों में भी इस की वजह से अच्छी धाक हो गई । लेकिन मेरी दिली इच्छा यही होती थी, कि देखो जो मर्जी, लेकर प्लीज़ इसे छुएं मत। कुछ महीनों बाद 1980 की अगस्त में टैक्सला का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी भी ले लिया --जी हां, वही बिलकुल आप के जैसे वाला---बड़ी सी लकड़ी की बाडी, शटर वाला और साथ में लम्बी लम्बी चार टांगो वाला।बस दोस्तो, अगले छः सात 1985-86 तक का समय इन्हीं के सहारे पास हो गया।
तब दिल्ली के पास ही रहने का अवसर मिला- तो सब से खुशी की बात वहां यह लगी कि वहां सुबह सुबह ही विविध भारती सुनने को मिलने लगा----जीहां,वह उर्दू सर्विस वाला साथी पीछे अमृतसर में ही छूट गया। शायद कभी कभी वह कैच तो हो जाता था, लेकिन वह भी धीरे धीरे पुराने दोस्तों की तरह छूट सा ही गया क्यों कि विविध भारती की चटपटी बातों और गीतों में ज्यादा मन लगने लगा।
दोस्तो, फिर कुछ दिनों में पता चला कि घर-घर में केबल लग रहे हैं जिस पर सारा दिन फिल्में दिखाया करेंगे। बहुत आश्चर्य हुया, लेकिन हम लोग ----हम लोग,खानदान, रामायण, रजनी- जैसे सीरियलों से ही मन बहलाने लगे। बाजार से किराये पर लाकर वीसीआर के साथ तीन फिल्मों की कैसेट ला कर सारा दिन चला कर देखने वाला रिवाज़ भी शुरू हो चुका था। हां,हां, हम कैसे पीछे रह जाते ---वह प्रयोग भी किया ,लेकिन बस वही झिक-झिक जो इन वीसीआर किराये पर चढ़ाने वालों से हुया करती थी कि बार बार रूकावट का कारण आप का पुराना हो चला टीवी सेट है जो आज कल चलता नहीं है। बस,दोस्तो, थोड़ी इंसल्ट सी लगती थी कि घर का सारा आंगन पड़ोस वाला से भरा हुया हो कि आज इन के घर में वीसीआर आया है और हम उन्हें एंटरटेन न कर पाएं.....और दूसरा उस केबल वाले को उस जमाने में पूरे पचास रूपये का किराया देने की टेंशन। घर आकर वीसीआर न चले, तो बिलकुल वही वाली बात......KLPD.... दोस्तो माफ कीजिएगा, मैं इस का फुल फार्म यहां बता नहीं सकता, लेकिन यह क्या आप तो पहले ही सी ज्ञानवान हैं और हंस रहे हैं। जी हां, आप हंसिए और मैं थोड़ा विश्राम ले लूं क्योंकि एक तो यह KLPD की याद आ गई है और दूसरा वीसीआर वाले से होने वाली झिकझिक से परेशान हूं। लेकिन आप क्यों परेशान हो रहे हैं, आप तो केएलपीडी की परिभाषा का ध्यान कर के हंसिए , खूब हंसिए .....अगर फुल-फार्म नहीं पता तो अपने साथियों से आज ही पूछने की ज़हमत उठाइए।
ok, friends, very good morning ...................आज हमारा बम्बई( नही, मुंबई) जाने का प्रोग्राम बना हुया है, छोटे बेटे की छुट्टियां हैं न , अपनी जन्म-भूमि के दर्शन करने के लिए पिछले कुछ अरसे से मचल रहा है। सो, फिर लगता है एक सप्ताह बाद इस मकड़जाल(वैब) के संसार में मुलाकात होगी। तब तक ...................Merry Christmas to all of you and yours......and Season's best wishes for a very very happy and healthy 2008.!!

रविवार, 23 दिसंबर 2007

जीवन चलने का नाम-----चलते रहो सुबह शाम !

दशकों पुराना यह एक अपने समय का बेहद पापुलर गीत तो हमें अच्छा-खासा याद है, पर हम उस की स्पिरिट कहीं भूल तो नहीं--- सब से पहले तो मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस हम में मैं भी पूरी तरह शामिल हूं। तो चलिए, उस फिल्म में कईं दिन तक लगातार साइकल चला रहे हीरो की बात को अगर हम ने नज़रअंदाज़ कर भी दिया है तो अब अंग्रेजों की ही सुन लें। वैसे भी कहा गया है न हम हिंदोस्तानियों को वह बात कहीं ज्यादा भाती है जो सात समुंदर पार कर के हमारे पास आती है---चाहे, वे बातें सदियों पहले हमारे ही तपस्वियों ने कह दी हों, लिख दी हों। खैर, कोई बात नहीं, हम सब भुल्लनहार हैं और हमारा दाता बख्शनहार है। तो,एक बार फिर अमेरिकन जर्नल आफ कारडीआलोजी में छपे एक अध्ययन में विशेषज्ञों ने फिर से एक बार आवाज़ लगाई है कि हफ्ते में छः दिन( आप भी मेरी तरह खुश हो गए न कि चलो कल तक तो यह मामला टल गया क्योंकि आज तो वैसे भी छुट्टी का दिन है, और वैसे भी यह छः दिन वाली कुछ बात ही कर रहा है) तक तीस मिनट तक तेज़ चलना ब्लड-प्रेशर को कम करने के लिए काफी है, कमर के साइज को घटा सकता है और मैटाबालिक सिंड्रोम के रिस्क को कम करता ही है। क्या हम यह कईं बार पहले भी नहीं सुन चुके हैं। लेकिन फिर भी अपने सैर के शूज़ पहनने में इतना भारीपन क्यों महसूस करते हैं।
एक बात और यह कि मैने सुना है कि उस अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अगर आप यह सब हासिल कर सकते हैं और वह भी अपने खाने-पीने की आदतों को कंट्रोल किए बिना ही। दोस्तो, एक रिक्वेस्ट है कि बस यह वाली खाने-पीने की लाइन बस मैंने लिखने के लिए लिख दी है क्योंकि यह मेरे नोटिस में आई। पर,मेरा हाथ जोड़ कर आप से विनम्र निवेदन है कि आप यह समझिए कि आप ने यह लाइन पढ़ी ही नहीं है। क्योंकि मुझे पता है न आप ने ब्रिस्क वाक वाली बात तो पता नहीं माननी है या नहीं, ये खान-पीन वाली बात पर आपने इंसटैंस्ट एक्शन ले लेना है--- और फिर रबड़ी, जलेबी, गुलाब-जामुन, चाट-पापड़ी, खस्ता कचौड़ी , समोसे, चने-भटूरे का दौर शुरू हो जाना है( मुझे पता है मुझे इस रविवार की सुस्ताई सी सुबह में बिना वजह आप के मुंह में पानी लाने का घोर पाप तो लगेगा ही)- बहरहाल मेरा यह विश्वास है कि किसी भी अध्ययन के परिणामों को थोड़े नमक के साथ ही लेने की जरूरत है। जो बात ठीक लगे ग्रहण करें, बाकी नकार दें।
.ठीक है, अभी तो आप भी नाश्ता कीजिए। इस बलागरी के मेले ( या मैदान) में फिर लौट कर आते हैं।

शनिवार, 22 दिसंबर 2007

उर्दू सर्विस की भी क्या बात थी.........मनोरंजन की दुनिया को एक-दम घुमाने वाली सर्विस......

प्रिय ई-मित्रो, जब तक टीवी आया नहीं था, या यूं कहूं कि खरीदा नहीं था, ले देकर हमारी मनोरंजन की दुनिया तो भाई अमृतसर में आल इंडिया रेडियो की उस प्यारी सी उर्दू सर्विस पर ही टिकी हुई थी। सुबह, शाम और रात को खूब फिल्मी गीत बजते थे----इन तीनों कार्यक्रमों का नाम भी अलग था। स्कूल-कालेज के दिन थे--- लेकिन छुट्टी वाले दिन सुबह से ही ये गीत सुनना हमारे शुगल में शामिल था। और, रविवार तो शायद कोई इकबाल भाई और एक आपा बच्चों का प्रोग्राम बच्चों के लिए पेश करते थे जिसे मैं बड़े चाव से सुना करता था। उस कार्यक्रम की रिकार्डिंग के लिए बच्चों को रेडियो स्टेशन बुलाया जाता था, और वह एक घंटा कैसे बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था। दोपहर में जहां तक मुझे याद है कभी कभी किसी फिल्म के अंश भी प्रसारित किए जाते थे—बीच बीच में डायलाग और बीच बीच में गीत। बस, इन गीतों के बीच जो तप्सरा ( पता नहीं मैं ठीक से इस का नाम लिख भी पाया हूं कि नहीं) पांच मिनट के लिए आता था, वह मुझे कभी नहीं भाता था। बस, शोले, रोटी, रोटी कपड़ा मकान और डान जैसै फिल्मों के गीत बारम-बार सुनने का सिर पर जुनून सवार रहता था...... देखिए, दोस्तो, आखिर होता भी क्यों न, रेडियो पर इन गीतों का लुत्फ लेने के इलावा बनारस वाले पान की गीत की ट्यून पर मन ही मन थिरकने का दूसरे तरह का मौका पता है कब मिलना होता था----- जब मोहल्ले में कोई शादी हो, किसी के घर जागरण हो, या कहीं रामलीला का आयोजन हो रहा हो-----भला, फिर जब लाऊड-स्पीकर पर कान का पर्दा-फाड़ वाल्यूम पर दस-नंबरी का कोई गीत, संयासी का कोई गाना , या फिर हरे रामा हरे कृष्णा का ही कोई गीत चल रहा हो ,तो कौन भला ऐसा होता होगा जो किसी दुनिया में न खो जाता होगा।
हां, तो बात हो रही थी उर्दू –सर्विस की--- तो रात में बजने वाले गीत हम लोग आंगन में चारपाई पर लेट कर ही सुना करते थे--- अपने रेडियो पर नहीं, सामने वाले घरों से ही इतनी सीधी आवाज़ आ जाया करती थी कि अपने ट्रांसिस्टर के सैल क्यों बर्बाद किए जाते। उस समय पाकीज़ा, बरसात की रात के गीत बज रहे होते थे .....और उस समय मैं और मेरी मां मेरे पिता जी के आने की बड़ी ही व्यग्रता से इंतजार कर रहे होते थे----जैसे ही बाहर किसी साइकिल की चेन सी आवाज़ सुनती, मैं खुश होता कि पिता जी आ गए....पिता जी आ गए। मौसम के अनुसार उन के द्वारा लाए हुए फलों एवं किसी मिठाई वगैरह का जश्न लूट कर पता नहीं कब निंदिया की गोद में चला जाता।
दोस्तो, यह ब्लाग तो बस मेरा मन हल्का करने का एक बहाना है, और आप से यह शेयर करने का एक बिलकुल तुच्छतम प्रयास है कि रेडियो किस तरह से मेरी जि़दगी से जुड़ा हुया है और आज तक जुड़ा हुया है।
लेकिन अतीत में गोते लगाना अब लगता है इतना आसान काम भी नहीं है...एक मिश्रित सा अनुभव है क्योंकि कुछ छोटी-छोटी बातें बेहद तंग करती हैं......छोटी2 बातें कहें, छोटी2 खुशियां कहें...........कुछ भी कहें.......लेकिन मैं तो इतना ही कहूंगा,दोस्तो........
Enjoy the little things in life……someday, you will look back and realize that those were indeed the big things..

OK, friends, good night……आज कल कभी वह वाली उर्दू-सर्विस के द्वारा प्रसारित गीत सुने नहीं......सर्विस तो अभी ज़रूर होगी, शायद मेरे इस नए शहर में मेरे वाला रेडियो कैच ही न कर पाता हो। तो , फिर अब क्या करूं.....वारदात की कुछ खौफनाक बातें टीवी पर देख कर डर कर, सहम कर सो जाएंगे, और क्या !!!

लिफ्ट प्लीज़..............

नहीं साहब, आप ने लगता है गलत अंदाज़ा लगा लिया - मुझे लिफ्ट मांगने वालों से तो न कभी कोई शिकायत है और न ही कभी ज़िंदगी में होगी। दोस्तो, मेरे तो शिकायत के पात्र हैं मेरे वह बंधु लोग जो लिफ्ट वाले की विनम्रता को नज़र-अंदाज़ कर के बिना परवाह किए आगे बढ़ जाते हैं। शायद इस का अंदाज़ा वह बंदा कभी लगा ही नहीं सकता जिस ने कभी खुद लिफ्ट न मांगी हो। दोस्तो, यह ब्लाग भी गज़ब की चीज़ है यारो, पता नहीं अपने बारे में कोई भी अच्छी बात कहते हुए अच्छी खासी हिचकिचाहट होती है। यह बात होने नहीं चाहिए, जाते जाते जायेगी। लेकिन सच्चाई ब्यां करना भी अपना फर्ज़ ही समझता हूं ----तो, दोस्तो जब भी मैं स्कूटर, मोटर-साइकल पर जा रहा होता हूं तो मैंने आज तक कभी भी किसी खुदा के बंदे को लिफ्ट देने से इंकार न ही तो किया है और न ही कभी करूंगा। यार, हम केवल आम बंदे के ऊपर ही शक करते जाएंगे--पता नहीं बंदा कैसा होगा, क्या हो जाएगा। क्या हमें यह तो नहीं लगता कि यह बंदा शायद कोई आत्मघाती हमलावर ही हो....आप भी इत्मीनान रखिए, दोस्तो, कुछ न होगा----कुछ भी मांगना (फिर वह चाहे लिफ्ट ही क्यों न हो ) क्या आप को नहीं लगता अच्छा खासा मुश्किल काम है, तो फिर उस खड़े बंदे के स्वाभिमान को एक छोटी सी बात के लिए क्यों आहत करें। किसी स्कूल के बाहर खड़े बच्चे में अथवा किसी चौराहे पर लिफ्ट मांग रहे स्टूडैंट में हमें अपने बेटे एवं छोटे भाई की तसवीर क्यों नहीं दिखती। हर बात के पीछे कोई तो कारण होता है, तो वह कारण भी आप से बांटना जरूरी हो गया है। दोस्तो, जब मैं पांचवी कक्षा में पढ़ता था तो एक-दो बार शिखर-दोपहरी में हमारे ही स्कूल एक मास्टर जी ने बीच रास्ते में अपने आप ही अपने साइकिल पर मुझे बुला कर लिफ्ट दी थी---मुझे बहुत अच्छा लगा था। हमारे स्कूल के यह मास्टर जी हमारे मोहल्ले में ही रहते थे----बस, बचपन की इन छोटी छोटी बातों से ही पता नहीं कितनी मजबूत मंज़िलों की नींवे पड़ जाती हैं, दोस्तो।

ले दे कर फक्त एक नज़र ही तो हमारे पास,
क्यों देखे दुनिया को किसी और की नज़र से ..

दोस्तो, आओ अब तो इन भ्रांतियों का भांडा फोड़ ही डालें.....

मेरी तरह से आप ने बहुत बार सुना है न कि अगर एकदम फिट रहना है तो सारे दिन में पानी के आठ गिलास पीने ही होंगे। और कितनी बार हम डाक्टरों ने ही इस बात पर मुंडी हिलाई होगी जब कोई यह कहता है कि हम अपने मस्तिष्क का केवल 10फीसदी हिस्सा ही इस्तेमाल कर पाते हैं। लेकिन दोस्तो इन दोनों में से कोई भी बात सच नहीं है। जी हां, इंडियाना यूनिवर्सिटी स्कूल आफ मैडीसन के वरिष्ट चिकित्सकों के अनुसार ऐसी कई तरह की भ्रांतियां हैं जो हमें विरासत में ही मिल जाती हैं और जिन्हें चिकित्सक भी जाने-अनजाने मानने लगते हैं। इन चिकित्सकों ने अपना यह अध्ययन ब्रिटिश मैडीकल जर्नल में छपवाया है। दिन में जबरदस्ती आठ-गिलास पानी पीने का कोटा पूरा करने वालों के लिए इन का कहना है कि पानी तो हमें नाना प्रकार के खाध्य पदार्थों से भी प्राप्त होता है जैसे कि फल, सब्जियां आदि.....इस लिए जबरदस्ती पानी के गिलास पर गिलाक गटक जाना सुरक्षित नहीं है। दिमाग के 10 फीसदी हिस्से को इस्तेमाल करने के बारे में उन का कहना है कि हमारा मस्तिष्क तो अभी तक दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य बना हुया है, अभी तो हम उस की पूरी तरह से खोज ही नहीं कर पाए हैं ! इसलिए इस धारणा को भी वे सिरे से नकार रहे हैं।
दोस्तो, आप को भी याद होगा जब आप के चेहरे पर दाढ़ी ने नई-नई दस्तक दी होगी, तो आप के भी पिता जी ने चेताया होगा कि बेटा,अभी से शेव-वेव के चक्कर में मत पड़ो, दाढ़ी सख्त हो जाएगी। और इस के लिए हम सब को अकसर हेयर-ड्रैसर के यहां जा कर मशीन चलवानी पड़ती थी। लेकिन,दोस्तो, अपने पिता जी की तरह हम भी गलत ही सोच रहे हैं, इन वैज्ञानिकों ने इस धारणा को भी बेबुनियाद बताया है कि जब बालों को शेव करना शुरू कर दें तो वापिस आने वाले बाल खुरदरे और सख्त होते हैं। इस बात के प्रमाण तो बताया जाता है कि आज से 80 साल ही मिल गए थे कि शेव के बाद आने वाले बाल न तो खुरदरे होते हैं और न ही सख्त.
अकसर लोग सोच लेते हैं कि बाल और नाखुन तो मरने के बाद भी बढ़ते रहते हैं (ड्रैकुला इफैक्ट) --- लेकिन ऐसी धारणा भी बिल्कुल गलत है। होता यूं है कि मरणोपरांत चमड़ी सिकुड़ती है जिसकी वजह से ऐसा लगता है कि बाल अथवा नाखुन बढ़ गए हैं। यह हमारे जीवन काल के दौरान भी तो होता है- कैसे हमारे दांत अकसर उम्र के साथ उगते या बड़े होते दिखते हैं.....वास्तव में एक बार मुंह में उगने के बाद वे क्हां और ज्यादा बड़े हो पाएंगे-- यह जो मसूड़ा जब उस से अपनी दूरी बनानी शुरू करता है तो दांतों के बड़े होने का केवल भ्रम ही पैदा करता है।
ऐसी भ्रांतियों की लिस्ट अच्छी खासी है दोस्तो, लेकिन एक और तो जल्दी से गिना ही दूं ----हम में कितने अभी भी यह सोचते हैं कि च्यूंइंग गम को अगर कोई व्यक्ति गल्ती से निगल ले तो वह सात साल तक उस के पेट में ही पड़ी रहती है।
सुन कर तो हमें हंसी आती है लेकिन हम बस यूं ही इन भ्रांतियों, इन मिथकों को , इन धारणाओं को खुद तो मान बैठते ही हैं, और इन के प्रचार-प्रसार में कोई कसर भी कहां छोड़ते हैं!! सच है या नहीं,दोस्तो ??

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2007

टोपीनुमा हैल्मेट पहनने वालो से ......

टोपीनुमा हैल्मट पहनने वाले मेरे भाइयो, शिकायत मुझे आप से भी बहुत है। ज़रा सोचो, तो दोस्तो, आप किस को धोखा दे रहे हैं। चलिए, मान लिया की इस टोपी से उस जनता हवलदार की आंखों में धूल झोंकने के लिए सफल भी हो गये, लेकिन अगर कोई हादसा होता है तो ..........सोचिए तो । दिल्ली जैसे शहरों में तो इस का अच्छा खासा चलन रहा है। मैं भी एक बार अपने बेटे के साथ स्कूटर की सवारी का आनंद लूट रहा था , तो रास्ते में चैकिंग देख कर माथा ठनका। सोचा, उस हवलदार को सौ रूपये देने की बजाए, एक सस्ता सा हैलमेट ही खरीद लूं.....सो, चौराहे से पहले ही स्कूटर खड़ा कर के 50रूपये में एक ऐसा ही फैशनेबल टोपा खरीद ही लिया। पचास रूपये की बचत कर लेने की खुशी में जैसे ही चौराहा पार किया उस टोपे का स्ट्रेप टूट गया---- जो फिर कभी लग नहीं पाया। इसलिेए वह टोप न तो पहनते बनता है न ही फैंकने की हिम्मत होती है। बस, ऐसे ही हमारे पुश्तैनी घर की एक लकड़ी की अल्मारी के ऊपर पड़ा हुया मुझे मुंह चिढ़ाता रहता है। ओहो, मैं भी बात कहां की कहां ले गया, बस मेरे जैसे चिट्ठाकारों की यही तो गलत आदत है दोस्तो.
वैसे जहां जहां भी चालक के पीछे बैठी सवारी के लिए भी हैल्मेट अनिवार्य है, मुझे बहुत बढ़िया लगता है। दोस्तो, पीछे जो बैठी है....अर्धांगणी, बहन , बेटी या मां, उस का सिर भी तो हाड़-मांस ही बना है न। यहां, तक कि जब किसी विज्ञापन में बच्चों ने भी छोटे हैल्मेट डाले होते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है। Just the right kind of training to these future citizens of the world. By the way, what do you say ??.....................................................Happy Driving ( with STUDDS helmet, of course) !!

जब रेड़ियो मन बहलाने के बावजूद थप्पड़ खाता था ....


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

जी हां, बात उस समय की है शायद 70 का दशक शुरू हो चुका था ....घर में केवल मन बहलाने का एक मात्र साधन बस एक मर्फी का रेडियो ही तो था। उस पर गाने-वाने सुन लिए जाते थे। मुझे याद है उन दिनों मेरे बड़े भाई को ,जो उन दिनों मैट्रिक कक्षा में था, सिबाका गीतमाला जो दिसंबर के महीने के आखिर दिनों में प्रसारित किया जाता था---उसे वह प्रोग्राम सुनना बड़ा अच्छा लगता था। लेकिन एक दिन जब वह जैसे ही उस रेडियो के बटनों को घुमा-फिरा कर अपने पसंदीदा प्रोग्राम के लगने की इंतजार कर रहा था तो उसे मेरे पिता जी ने किसी कारण वश खूब डांटा था। इस बात का कम्पैरीज़न मैं आज की नव-पीढ़ी के साथ करता हूं तो सोचने पर सचमुच विवश होना ही पड़ता है कि ज़माना काफी नहीं, बिल्कुल ही बदल गया है। ओह, मैं उस रेडियो की एक खासियत तो बताना भूल ही गया कि वह आन करते ही शुरू नहीं हो जाया करता था--उसे गर्म होने के लिेए टाइम चाहिेए होता था। फिर उस पर किसी प्रोग्राम सुनने का संघर्ष शुरू हो जाया करता था--- कभी कभी कुछ भी जब नहीं सुना जा रहा होता था तो मेरा भाई उस की बाडी पर आकर दो-चार बार हाथ थपथपा देता था तो वह चल पड़ता था। लेकिन जब कभी सौभाग्य से रेडियो सिलोन या बीबीसी लग जाता था, तो ऐसे लगता था कि लाटरी लग गई है। सचमुच पहले खुशियां भी कितनी छोटी छोटी हुया करतीं थीं। हां, याद आ रहा है कि कुछ कुछ एंटीने की तार का भी चक्कर जरूर था। खैर, जैसे तैसे टाइम तो पास हो रहा था।
शायद 1974 के आस पास हमें बम्बई जाने का मौका मिला - वहां हमारे एक निकट संबंधी बुश कंपनी में लगे हुये थे। उन्होंने शायद कुछ रियायती मोल पर एक ट्रांसिस्टर दिलवा दिया - वाह, क्या बात थी....हमारे तो रेडियो सफरनामे का अध्याय ही बदल गया- और उस मर्फी वाले सेट ने बैक-सीट ले ली। उस नये वाले ट्रांसिस्टर का यह फीचर कि जब चाहो बिजली से चला लो, और जब चाहो सैल से चला लो, हमारे अड़ोस-पड़ोस वालों को भी बहुत भाता था। उस का चमड़े का एक बस्ता भी था और साथ में कंधे अथवा खूंटी पर टांगने के लिए एक स्ट्रेप भी। हम सब उस को बड़ी हिफ़ाज़त से रखते थे। खास कर मैं गर्मी की रातों में आंगन में चारपाई पर जब लेकर लेटता था तो उस के साथ को बड़ा एंज्वाय करता था। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उन दिनों उस पर एक गाना बहुत ज्यादा बजा करता था ......बम्बई से आया मेरा दोस्त , दोस्त को सलाम करो।.........
कभी कभी सर्दी की सुनसान रातों में रजाई में दुबके हुए जब विविध भारती लग जाता था तो बेहद खुशी होती थी---- खासकर हवा महल प्रोग्राम सुन कर या कुछ ऐसे ही चटपटे गीत सुन कर। बस,ऐसे ही जैसे ही हवा का रूख बदलता था तो वह प्रोग्राम भी बजना बंद हो जाता था.....और फिर पता नहीं कितने समय तक प्रोग्राम को वापिस सुनने का अनथक संघर्ष करते करते कब नींद की गोद में पहुंच जाते थे पता ही न चलता था-----शायद कुछ कुछ वैसे जैसे आज कल हमारे बच्चे देर रात तक इंटरनेट पर कुछ ढूंढते 2 सो जाते हैं। खैर , यह सब मैं 1977-78 -79 की ही बात कर रहा हूं , उन दिनों मेरे बड़े भैया बम्बई में रहते थे, इसलिए जब विविध भारती पर कुछ सुनता था , तो लगता था कि मैं उस के पास ही बैठा हूं।

सिंदूर का एक ब्रांड भी निशाने पर........

हाल ही में अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने सिंदूर के एक ब्रांड को लेकर चेतावनी जारी की है। उस ब्रांड के सिंदूर की लेबलिंग के साथ कुछ गड़बड़ थी- वह यह कि उस की पैकिंग के ऊपर लिखा गया था कि यह बेहद स्वादिष्ट सिंदूर है। रैसिपीज़ के लिए कंपनी ने अपनी वेब-साइट पर आने का निमंत्रण कंपनी ने अपने ग्राहकों को दिया था। इस के परिणामस्वरूप लोगों ने उस सिंदूर को खाना बनाने के लिए उपयोग करना शुरू कर दिया होगा, जिस के परिणाम स्वरूप दो केस लैड प्वाईज़निंग के इस अथारिटी के नोटिस में आ गये, जिस के परिणाम स्वरूप यह चेतावनी जारी की गई है। साथ में यह भी बताया गया कि हाई-लैड कंटैंट वाले सिंदूर को सिर पर या चेहरे पर लगाना जोखिम मोल लेने से कम नहीं है।
दोस्तो, एक बात जिस से मैं अचंभित हूं कि वहां की एफडीआई कितनी सजग संस्था कितनी सजग संस्था है.....एक सिंदूर तक पर उस की पैनी निगाहें, यहां तक की उस की पैकिंग भी उन की कयामत भरी नज़रों से बच न पाईं। तो , दोस्तो, इस से हम सहज ही यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वे किस शिद्दत से काम करते होंगे। हालाकि ये सिंदूर वहां दक्षिण-एशियाई मूल की महिलाओं के द्वारा अपने सिर पर, चेहरे पर अथवा उन के धार्मिक फंक्शनों पर ही इस्तेमाल होता होगा।
और अपने यहां के कास्मैटिक्स की तो बात ही क्या करें.....कास्मैटिक्स के नाम पर कुछ भी मिलता, खूब धडल्ले से फुटपाथों पर बिकता है और खूब चाव से मांगों में भरा जाता है, होठों पर लगाया जाता है और अच्छे-खासे चेहरे पर लिपा जाता है। वैसे बात सोचने की है या नहीं?

वो रेडियो की लाइसैंस-फीस जमा करवाने वाले दिन.........

साथियो, रेडियो मेरी जिंदगी का एक ऐसा अभिन्न अंग है कि मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं अपनी बात कहां से कहनी शुरू करूं। बस ,अपनीज ज़िंदगी में पीछे पलट कर जिधर भी देखता हूं, मुझे रेडियो हर तरफ नज़र आता है। बस, सब से पुरानी और थोड़ी धुंधली सी याद उस समय की है जब मैं आठ-नौ बरस का रहा हूंगा और मेरी मां ने हिदायत दी कि बेटा, अब कुछ ही दिन बचे हैं, डाकखाने में जाकर रेडियो की लाइसेंस फीस जमा करवा कर दो। शायद दस रूपये के आस पास की यह फीस हुया करती थी । उस फीस को लेकर डाक बाबू एक किताब में इस के बाबत एंट्री कर के हमें वह रेडियो लाइसेंस बुक हमे वापिस कर देते थे। कुछ पाठक जो छोटे हैं ,उन का इस बात पर हंसना स्वाभाविक है---यार, यह रेडियो के लाइसैंस की बात कर रहा है या किसी स्टेनगन लेने की। लेकिन, दोस्तो यह उस जमाने की सच्चाई थी, यह मैं शायद सत्तर के दशक के शुरू शुरू की बात कर रहा हूं। और हां, कुछ इस तरह के इंस्पैक्टर भी घरों में आते थे जो पूछते कि घर में कितने ट्रांजिस्टर,रेडियो हैं और इस लिए किताने बताने हैं, कितने छिपाने हैं, घर के बाहर कंचे खेल रहे बच्चों को इस के बारे मे कड़ाई से हिदायतें जारी की गई होती थीं। लेकिन हमारे यहां तो मरफी का एक ही सैट था, जिस का डिब्बा मैंने आज भी संभाल कर रखा हुया है। दो महीने पहले जब हमारे पैत्तृक घर में चोरी हुई, काफी कुछ ले गए....लेकिन जब मैंने उस मरफी के डिब्बे को एक मेज़ के नीचे पड़ा देखा तो मेरा दुःख काफी कम हो गया---क्योंकि वह मेरे लिए एक डिब्बा नहीं है, मुझे मेरे अतीत से , मेरे बचपन से जोड़ने वाला मेरे लिए एक बेशकीमती यंत्र है, जिसे आज भी मेरी मां एक कपड़े से ढंक कर रखती है। उस डिब्बे से जुड़ी मैंने अपने 16 साल के बेटे को जब किस्से सुनाए तो उस को भी उस डिब्बे से प्यार सा हो गया लगता है...................
बस, अब मैं थोड़ा पुरानी यादों में खोना चाहता हूं..........Please excuse me!!

गुरुवार, 20 दिसंबर 2007

काश, किसी तरह भी इस लत को लात पड़ जाये !

किसी तरह भी अगर हम इस तंबाकू, गुटखे एवं पान-मसालों की लत को करारी लात मार दें न..........
एक डाक्टर होने के नाते नित-प्रतिदिन तंबाकू, गुटखे एवं पान-मसालों द्वारा किए जा रहे विनाश के केस देखता रहता हूं- और दुःखी होता रहता हूं। मुझे दुःख इस बात का ज्यादा होता है कि इस लत से होने वाली सारी भयकंर बीमारियों से कितनी आसानी से बचा जा सकता है- बस अगर हम लोग यह ठान लें कि इस लत को लात मारनी ही है। अब आप तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन कर रहे उस बेचारे (बेचारा न कहूं तो और फिर क्या कहूं दोस्तो) बंदे की मानसिक स्थिति की आप कल्पना कीजिए जब वह किसी डाक्टर के पास मुंह में एक घाव को दिखाने के लिए जाए और डाक्टर को उस घाव को देखते ही मुंह के कैंसर का संदेह हो जाए। यही हो रहा है---- यकीन माऩिये, ये सभी तंबाकू मिले पदार्थ मानव जाति की सेहत से खिलवाड़(इस से भयंकर शब्द मुझे कोई सूझ नहीं रहा है) ही कर रहे हैं।
प्रिंट मीडिया में आप भी तो इन सब के विज्ञापन अकसर देखते ही रहते होंगे- इन के विज्ञापनकर्ता भी क्या शातिर-दिमाग होते हैं, इस का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य संबंधी वैधानिक चेतावनी का पाखंड पूरा किया जाता है लेकिन इस का भी विशेष ध्यान रखा जाता है कि इस कम से कम लोग ही पढ़ पाएं। इस का फांट इतना छोटा होता है, इस को इतने अजीब से ढंग से छापा जाता है, अजीब से हाशिये में रखा जाता है कि कोई इसे पढ़ने की अच्छी खासी ज़हमत उठाए तो ही इसे वह देख पाएगा। यह सब देख कर मुझे बड़ी फ्रस्ट्रेशन होती है कि यार हम लोग इतने पढ.-लिख कर अपने ही बंदों को न तो बीड़ी बुझाने के लिए ही मना पाए और न ही उन्हें पान मसाले की आदत को हमेशा के लिए थूकना ही सिखा पाए। कहीं यह हम लोगों का ही फेल्यर ही तो नहीं है--- ऐसा विचार अकसर मुझे परेशान करता रहता है।
मीडिया की बात चल रही है तो एक और बात निकली कि जब देश में फिल्मों में सिगरेट बीड़ी पीते हुए कलाकार दिखाने पर मनाही की बात चली तो जो हंगामा हुया उस के बारे में आप सब जानते हैं, दोस्तो। बात छोटी नहीं है, एक छोटा बच्चा दिन में कईं बार विभिन्न कलाकारों को कश पर कश खींचते देखेगा तो क्या उस के कोमल मन पर कुछ छाप रह नहीं जाएगी --जरूर रह जाएगी - क्योंकि आज कल, दोस्तो, बच्चों के रोल-माडल यही लोग बन गए हैं। कुछ कह रहे हैं कि ऐसे तो फिल्मों में पान खाते हुए भी दिखाना बंद करना होगा-- निःसंदेह सादा पान सुपारी वाला अथवा तंबाकू वाला दोनों सेहत के लिए हानिकारक हैं - फिर भी इस बात को फिल्मों के दृश्यों तक खींचना बाल की खाल निकालने के बराबर होगा। इन रोल-माडलों की हम बात ही क्या करें, ये तो किसी समारोह में जा कर लाल फीता काटते हुए प्लास्टिक मुस्कान बिखेरने का एक करोड़ रूपया ऐँठ लेते हैं।
सीधी सी बात है कि तंबाकू एवं जिन भी वस्तुओं में तंबाकू का उपयोग किया जाता है ( कुछ मंजनों एवं पेस्टों में भी तंबाकू मिला होता है--ध्यान कीजिए) उन का सेवन करना आत्मघात के बराबर ही है। तो चलें, थोड़ी इस के बारे में जानकारी फैलाएं - जब एक बंदा भी इस लत को लात मारता है न, तो उस बंदे से जुड़े बीसियों लोगों की ज़िंदगी में भी अच्छे के लिए एक बदलाव आता है। आप मानते है न ऐसा होता है ? वैसे जाते जाते आज की ही एक बात ध्यान में आ रही है- आज दोपहर मैं याहू आंसर्स में स्वास्थ्य से संबंधित प्रश्नों के उत्तर लिख रहा था तो एक अमेरिकी लड़के का एक प्रश्न था ---कि मेरे मुंह में घाव है , लेकिन इस के बावजूद भी क्या मैं नसवार की पोटली मुंह में रख सकता हूं ( वहां पर इस तरह के सूखे तंबाकू का युवाओं में बड़ा फैशन है) और साथ में उस ने यह भी रिक्वेस्ट की थी कि कृपया मुझे इस तरह के उत्तर मत दीजिए कि इस से मुंह का कैंसर होता है,इस से यह होता है , इस से वह होता है, ----तो दोस्तो ...मैंने भी उस के प्रश्न का जवाब कुछ इस तरह से ही देना ठीक समझा .................Dear, you already know the answer to your question, so good luck. At this juncture I dont have much to say to you except wishing you all the best !!!

उभरने ही नहीं देतीं,
ये बेमाइगियां दिल की ,
नहीं तो कौन सा कतरा है,
जो दरिया हो नहीं सकता............

बुधवार, 19 दिसंबर 2007

बदपरहेज़ी करने का लाइसेंस ?

प्लीज़ आप चौंकिए, नहीं अब तो वैसे ही देश में लाइसेंस राज खत्म हो गया है, ऐसे में हम बदपरहेज़ी के लाइसेंस इश्यू करने की बात कर रहे हैं। जी हां, बात ही कुछ ऐसी है। आज के अंग्रेज़ी अखबार में छपी एक रिपोर्ट से पता चला है कि कोलेस्ट्रोल कम करने के लिए एक नई दवा के आने की उम्मीद लग गई है। वैसे यह दवा तो अभी ट्रायल स्टेज पर ही बताई जा रही है, लेकिन जैसा अकसर होता है - इस दवा की तारीफ़ के कसीदे पढ़ने वालों ने इस काम के लिए आज कल चल रही स्टेटिन्स नामक दवाईयों के साइड-इफैक्टस भी गिनवा दिए हैं जैसे कि दस्त लगना, सिर-दर्द आदि। अखबार में यह भी छपा है कि इंगलैंड में 30 लाख से भी ज्यादा लोग कोलेस्ट्रोल कम करने के लिए स्टेटिन्स नामक दवाईयां लेते हैं, लेकिन ब्रिटिश हार्ट फांउडेशन के अनुसार एक लाख से भी अधिक लोग वहां भी हर वर्ष दिल की बीमारी के कारण मुत्यु का ग्रास बन जाते हैं।
कोलेस्ट्रोल कम करने की कोई नई दवा की बात हो या पुरानी दवा की - मैं तो इस संबंध में केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि आने वाले समय में ये दवाईयां भी कहीं स्टेटस सिंबल अथवा कोई फैशन ही न बन जाए। लेकिन ये कोई जादू की पुड़िया तो हैं नहीं ........ये भी कोलेस्ट्रोल घटाने में तभी मददगार हो सकती हैं जब हम अपने खाने-पीने के तौर तरीकों पर भी थोड़ी लगाम लगाएं, चिकनाई से दूर ही रहें, ट्रांसफैटी एसिड्स से परहेज़ करें और इन सब के साथ साथ शारीरिक परिश्रम भी नियमित रूप से बिना किसी न-नुकुर के करें। समझने की बात यह है कि अगर हम इन बातों का पूरा ध्यान रखें तो शायद हमारे कोलेस्ट्रोल का स्तर बिना किसी फैंसी दवाइयों के वैसे ही ठीक रहे, और डाक्टर को हमें इन दवाईयों को खाने की सलाह की न देनी पड़े। लेकिन अगर हम अपने खान-पान में तो टस से मस होने को तैयार नहीं, शरीर हिलाने को राज़ी नहीं तो भला ये दवाईयां क्या कर लेंगी।
देखने में यही आया है कि कई लोग इन ट्रेंडी दवाइयों के उपयोग को अपनी बदपरहेज़ी करने का लाइसेंस सा ही मान लेते हैं। यह सोचना उनकी भूल है।
सदियों के गलियारों से यूं ही तो यह आवाज़ नहीं गूंज रही......
इलाज से परहेज बेहतर ..

ये साइकिल-रिक्शा वालों से मोल-तोल करने वालों से.....

पता नहीं मुझे उन लोगों से बड़ी शिकायत है जो साइकिल -रिक्शा चलाने वालों से मोल-तोल करते रहते हैं। आपत्ति मेरे को केवल इतनी है कि शापिंग मालों पर , बड़े बड़े मल्टीप्लैक्स ,ब्रांडेड लक्ज़री आइटम पर तो हम लोग सैंकड़ों का सिर मुंडवा आते हैं लेकिन जब इस फटी कमीज़ पहने बंदे की बारी आती है तो सारी नैगोशिएशन एबिलिटी हम वहीं आजमाना चाहते हैं। शायद हम जिस महंगे होटल में खाना खाने उस रिक्शे पर बैठ कर जा रहे होते हैं, वहां हमें सैंकड़ों का चूना लगेगा- वह हम खुशी खुशी सह लेते है् चाहे घर आकर सारी रात एसिडिटी से परेशान रहें। अगर हम सोचें कि 2-4-5 पांच रूपये में क्या फर्क पड़ेगा, शायद यह बंदा आज इन से कुछ फल ही खरीद ले, तो कितना अच्छा हो। दूसरा, कई बार पुल वगैरह आने पर या थोड़ी ऊंची जगह आने पर भी हम लोग नीचे उतरने में हिचकचाते हैं....ऐसा क्यों,भई। वो भी तो इंसान है,ऐसा व्यवहार करना भी उस का शोषण करना ही तो है। रास्ते में आप उस बंदे से थोड़ा बतिया कर के तो देखें..........कईं काम की बातें हम उस से भी सीख सकते हैं। बस,ऐसे ही यह विचार काफी समय से परेशान कर रहा था सो सांझा कर लिया। क्या आप मेरी बात से सहमत हैं.......................

कहीं से चुराया हुया एक शेयर आप के लिए .........
लहरों को शांत देख कर ये मत समझना
कि समुन्द्र में रवानी नहीं है,
जब भी उठेंगे तूफान बन कर उठेंगे,
अभी उठने की ठानी नहीं है।