शनिवार, 22 नवंबर 2014

अमृतसर के पापड़ों का जवाब नहीं...

अभी जो पापड़ खाया ... 
मैं अभी मुंह के छालों के इलाज पर एक लेख लिख रहा था कि सूप सामने आ गया ...अभी मैं सूप पी रहा था तो साथ में पापड़ खाने को मिले......मेरी मजबूरी यह है कि मुझे कभी भी पापड़ खाते समय अमृतसर के पापड़ याद आ जाते हैं।

और मुझे कभी भी ये लिज्जत या किसी भी और ब्रांड के या कहीं पर भी बिकने वाले पापड़ पसंद नहीं आते। बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं क्योंकि इन में अमृतसर के पापड़ों जैसी कोई बात होती नहीं......ये बिल्कुल पतले पतले से कमजोर और बहुत कम मसाले के होते हैं..जब कि अमृतसर के पापड़ अच्छे मोटे और मसालेदार होते हैं। 

मुझे बचपन याद आता है तो यही बात याद आती है कि जब भी हम लोग शहर से बाहर जाते थे तो एक बैग तो पापड़-वड़ियों का अलग से हुआ करता था.....कहीं भी जाना हो, तो पांच छः रिश्तेदारों के लिए और कईं बार उन के एक -दो पड़ोसियों के लिए भी पापड़ वड़ियों के आधा आधा किलो और एक एक किलो के पैकेट पैक करवा के चलते थे। और मेरे फूफा जी जो दिल्ली में रहते थे उन्हें अमृतसर की धुली हुई उड़द दाल बेहद पसंद थी......मुझे याद उन के पोस्ट कार्ड की यादें जिस में उन्होंने लिखा होता था कि आती बार पापड़-वड़ियां और धुली उड़द की दाल इतनी इतनी ले कर आईएगा। 



सच में अमृतसर की पापड़-वड़ियों को कोई जवाब नहीं.....मुझे याद है स्वर्ण मंदिर के आस पास बीसियों दुकानें पापड़-वड़ियों की हुआ करती थीं और हर एक अपनी दुकान को खानदानी दुकान प्रमोट किया करता था.....और सब की सब खूब चला करती थीं। उन दुकानदारों ने अपने बाप दादाओं की फोटू भी दुकान में लगा रखी होती थीं। 

अच्छा चलिए, आप को अमृतसर के पापड़ पर एक गीत सुनवाते हैं......मुझे बहुत अच्छा लगता है...बचपन से ही आल इंडिया रेडियो जलंधर से इसे बजता सुनते थे.....आप भी इस के शब्दों की तरफ़ ध्यान दीजिए.....

 इस गीत में यह मुटियार अपने गभरू से कह रही है कि मैं तो अमृतसर के पापड़ नहीं खाती, और जो तेरी अकड़ है वह मैं सहती नहीं..इसलिए तेरे सिर की चोटी मेरे हाथ में और मेरे सिर की चोटी तेरे हाथ में है......तूने मुझे घर में रखना है तो रख, लेकिन इस बात का ध्यान रख लेना कि मैं ही हूं जो तेरे साथ निभा रही हूं..........इस गीत में आगे अमृतसर की अन्य प्रसिद्ध खाने की चीज़ों का भी जिक्र है....वड़ियां, अमृतसर छोले, लुच्चियां....


एक बात और है, बहुत से ऐसे शहरों में देखा कि लोग दुकानदार के बाहर बोर्ड तो लगा देते हैं कि अमृतसरी पापड़-वड़ियों की दुकान ......लेकिन इन में वह बात होती नहीं......शायद अमृतसर के नाम को भुनाने की कोशिश......लेकिन एक बार यहां से खरीद कर फिर से कोई दोबारा जाता नहीं वहां......खास कर मेरे जैसे लोग जिन्होंने अमृतसर का असली माल चखा हुआ है।

बहरहाल, देखिए ना हमारा भी हाल.....लिखने क्या लगा था, और कहां से कहां निकल गया जैसे कि यह पापड़-वड़ियों वाला गीत ढूंढते ढूंढते एक गीत अपने आप बजने लग गया.......एक बार फिर से लेडीज़ संगीत वाले दिनों की याद ताज़ा हो आई......जब इस तरह के गीत खूब गाये जाते थे..........थे क्या, आज भी पंजाब तो वैसे ही खिलखिलाता है...अच्छा, तो आप भी सुनिए....वे गुरदित्ते दिआ लाला...



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